श्रीगणेशाय नमः।
बृहदारण्यक उपनिषद
Brihadaranyak Upanishad with Shankar Bhashya - Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur · 1400 पृष्ठ · 140 खण्ड
In English
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara's Commentary
This book contains the Brihadaranyaka Upanishad, a major Upanishad from the Yajurveda. It includes the commentary (bhashya) by the philosopher Shankara and is published by Gita Press, Gorakhpur.
This book answers
- What is the meaning of the brihadaranyaka upanishad?
- What does shankara say about the brihadaranyaka upanishad?
- What is the dialogue between yajnavalkya and maitreyi?
- What are the teachings of the brihadaranyaka upanishad regarding the atman?
विषय सूची
- SHRI JA Please re Q1: 242 1832 15 N9 Shankara BrihadranyaKopanishada. II Q1: 24 1832 III II I I III I I III 15N9 Tranz 2.6 H31E SHRI JAGADGURU… 1–10
- जा उसका क पुरुषके स, सोम, कारनेपर वह तुरंत कि जितने T नहीं है; होनेपर भी ही सबका नी उसीकी भी नहीं का भी का संवाद नी । उनमें बुद्धिवाली… 11–20
- ४११ ४१२ ४१३ ४१४ ४१४ ४१५ ... ४१६ : ४१७ ४१८ ... ४१६ ... ४२१ ४३६ ४३६ ... ४४२ ४४८ ... ४५७ ( १७ ) विषय ६० - श्रोत्रादि प्राणोंके सहित शिरग़ चमस - दृष्टिका… 21–30
- पृष्ठ. ... १२७६. १२८१ ना ... १२८३. हना १२८४ T १२८४ १२८६ चित्र - सूची १२८८. १२६४ १२ ६ . १२६८. ... १२६६. ' १३०१ १३०२: १३११ . १३१८ • १३१६. १३२४ .. १३२६ ·… 31–40
- अध्याय १ मनसे भी सिद्ध नहीं हो श्रुति ' ( बीज ) लङ्ग प्रत्यक्ष-है, इसलिये न प्रमाणका आगमका ही कहना ठीक के सम्बन्ध-ग्रहण नहीं तथा वेदोक्तः रा आत्मा-ही… 41–50
- [ अध्याय १ अन्न है । सिन्धु 1 ) में समानता गुदा - नाडियाँ सिन्धवः ' और - बहुवचनान्त ऊँचे उठे हुए यकृत् और और ' क्लोमा ' -सीधे और बायें क्लोमान: ' यह -… 51–60
- अध्याय १ अनवस्था प्राप्त द्धिको स्वतः ऐसी दशा में ] यह बुद्धि केही अन्तर्गत. नेके कारण रहेगा । तथा ' वही ' - इन कर्ता न होने के होना सम्भव शता के कारण… 61–70
- [ अध्याय १ कहा जायगा, हीं । और यदि भिन्न पदार्थ का उत्तर ऊपर भी है, उत्पत्तिसे = अभावरूप घट-सत्तासे सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि रहा करता है… 71–80
- [ अध्याय १ है । श्रुति ( उल्लेख ) किसी अन्यका T- उस मिथुन-नशरीरी प्रजा-जो रेत यानी की आलोचना • जन्मान्तरकृत वा उस बीज-जलकी रचना के द्वारा जलमें से गर्भस्थ… 81–90
- अध्याय १ वेदमन्त्रों द्वारा सर्वदेवसम्बन्धी आलभन किये ही देवता सरे ग्राम्य और = य देवताओंके वयवभूत विभिन्न न किये जाते हैं-लिये आजकल देवताओंके लिये भषिक्त… 91–100
- - अध्याय १ ारण, उसकी कती है । कहना ठीक अर्थके ज्ञानसे सम्भव है; खा जाता है । विरुद्ध अर्थका अभीष्ट प्राप्त बचता है… 101–110
- [ अध्याय १ स्वर्गकामादि ये किया गया कारके अनर्थ-दि दोषवान् इष्टप्राप्ति और छा एवं इष्ट-प्तिके द्वेषरूप उन रागद्वेष नरूपसे प्रवृत्त -प्राप्ति और हावाले… 111–120
- [ अध्याय १ दिव होनेसे जप-उपास्य हैं— ओंने क्रमशः देवताओंको निश्चय था कि नेपर वागादि शेषका अपने-7 आसक्ति के का संसर्ग हो निर्वाह करने-तः अशुद्ध और के कारण… 121–130
- [ अध्याय १ जाय वैसे ही रा उपलब्ध मीप आसन त् लौकिक न आने देकर माभिमानके के स्वरूपमें उत्पन्न न हो वन्तन करना कि " देवता न होता है " किस देवता-की उपासना… 131–140
- [ अध्याय१ यदन्नं तदा-वेति यविशन्त । वा एनँ : पुर एता विदस्वेषु भवत्यथ य सहैवाल ना ही है; उसे जैसे हमें भी इस ग सब ओरसे वे सब ओर. खाता है उससे उसका… 141–150
- - अध्याय १ वामश्चेति णा समो समो ऽनेन सलो-] ' अम ' है । क्योंकि यह के समान है, यह साम है । और उसकी कस प्रकार? ' ' है… 151–160
- अध्याय १ ह तिष्ठति तत्प्राणः २७ । होता है । यह प्राण -ष्ठित होकर इस साम । जिसमें वह वाक् उस सामकी जानता है “ उसे जो करता है इस श्रुति गुणवाला हो नत हुए… 161–170
- [ अध्याय १ करने के लिये भी प्रकार तृषाहीन-वृत्ति नहीं होती व्यसाधनादि भेद-यसे विरक्त नहीं एकत्वज्ञानरूप नहीं है… 171–180
- अध्याय १ है तथा न् या गुण-नों के भेद हो नैकत्वज्ञान में कर्म निमित्त नजापतिका; ताकि " तप-इच्छा करो " ना है और को ज्ञान पुरुष ज्ञान-प्रणिपात के द्वारा… 181–190
- [ अध्याय १ वैश्यजातिके को और वैश्य-किया । अतः कर्मोंमें संलग्न सु आदि देव-होता है । इसी षा और परि-तिको चरणोंसे -स्मृति जनित T है… 191–200
- [ अध्याय१ र्थात् विशिष्टरूपसे निश्चयकी मर्यादासे प्राप्त हुआ । इस पद ' अ ' किसी प्रकारका कर श्रुति नाम-करती है - देव-त्यादि इसके नाम पुरुष ' असौनामा ' यह… 201–210
- [ अध्याय १ यी के अभावका जाय, क्योंकि । ' समान एकका यी भी होना एक साथ ऐसा | इसके सिवा सम्भव न होने से ता है । इससे हक उभयरूप हो जाता है… 211–220
- [ अध्याय १ कि आत्मामें पड़े हुए सूर्य-एक हो जाते बतलाये हुए नों से कहे जाने-योंके कारण शेष एक होते को प्राप्त हो त ' यह अपूर्व-ोंकि यह एक " जो साक्षात्… 221–230
- [ अध्याय १ भीतक देरी है ", जानता है अभय है " इत्यादि सिद्ध होता है । निरोध भी किसी होनेवाला नहीं विज्ञान और उसकी सिवा चित्तवृत्ति-अन्य साधन नहीं, हम उसे… 231–240
- [ अध्याय१ IIIII है, अनात्मलाभके अप्राप्तकी प्राप्ति योंकि यहाँ लाभ लब्ध होनेवाली हीं है । जहाँ अना धन्य होता है वहाँ करनेवाला और - होने योग्य होता अर्थात्… 241–250
- [ अध्याय १ हो जाता है । हूँ ' इस प्रकार है वैसे ही वह पालन करते हैं, है । एक पशुका हरण होनेपर हीं है कि मनुष्य दसे अपरब्रह्म क्योंकि उसीका - साध्य हो सकता… 251–260
- [ अध्याय १ ' ब्रह्म ' और सामानाधि-इनका एक ही ज्ञात होती है । दूसरे भन्न तद्रूपताका ] ना है, एक होने-- " यह जो कुछ यह श्रुति इस माका एकत्व : आत्मा के लिये… 261–270
- अध्याय १ को विषय TI र जाना? मैं दृष्टिका सा जाना । त् अपरोक्ष विकारोंसे प्रतिपादित, द प्रकारके मैं हूँ; जैसा अन्य यानी इस प्रकार-सर्वरूप अब्रह्मरूप… 271–280
- - अध्याय १ बात है तो अभाव होने के वृत्ति और जानेसे यह न्तिम आत्मा-की निवृत्ति ती है, पहली मत कहो, की तरह व्यभिचारी आत्मविषयक की निवृत्ति तरह अन्तिम रेगा,… 281–290
- [ अध्याय १ - " हे कौन्तेय! पुरुषोंसे भरा को यह इष्ट नहीं ऊपर ( ब्रह्म-यह सोचकर कि के कारण मनुष्य पावें, पशुओं को खने के समान नसे दूर रखने के करते हैं 1… 291–300
- [ अध्याय १ समीपवर्ती धर्म य जाननेवाले वचन बोलता है, न्य बोलता है ' इसी तरह इससे नौकिक व्यवहार सत्य बोलता है, लता है ' ऐसा निवाली और की बतायी गयी हैं-अतः… 301–310
- [ श्रध्याय १ क्योंकि यह वाक्य की स्तुति करने-ही तात्पर्य है कि लोकसे ही हो भिन्न और कोई नहीं है, क्योंकि ता है; जैसा कि , आत्मा ही अन्य श्रुति - यह… 311–320
- [ अध्याय १ दिये जानेपर अलग वर्णन ना नहीं होती, सीके लिये होता नरूपा एषणाएँ म ) से प्रेरित रेशमके कीड़ेके वश होकर लपेट नको कर्ममार्ग में - बहिर्मुख हो जान… 321–330
- [ अध्याय १ नका साधारण होता; क्योंकि दो अन्न उसने - देवताओंके हैं कि दो प्रवृत्त न हो । पहले दुग्ध बालकको पहले - बछड़ेको भी क्रिया करते हैं हैं… 331–340
- [ अध्याय१ या क्यों की गयी क्योंकि यह कर्मका होत्रादि कर्म दुग्ध-आश्रित हैं । और जानेवाले साध्य-नों का वित्तसाध्य क पहले बतलाये मासनामक अन्न… 341–350
- [ अध्याय १ ने - अपने विषय-रूप एवं शब्दा-ता और जिसके ता है, वह उन मस्त इन्द्रियोंके रखनेवाला मन है - ऐसा ज्ञात - लोग मनसे ही ही सुनते हैं; होनेपर दर्शनादि… 351–360
- [ अध्याय १ -णके आधाररूपसे क है । तथा उतना रूप - करण यानी है । आदित्य अर्थात् और मन माता-नों मिथुन अर्थात् संसर्गको प्राप्त नीय आदित्यरूप नौर मातृस्थानीय… 361–370
- [ अध्याय १ आदि । नि - सर्वस्वाप-होन हो जाता-जाता है, तथापि भिस्थानीय अपने है तो लोग यही यानी बाह्य या अर्थात् क्षीण र कि अरे और तात्पर्य यह है वित रहता है… 371–380
- [ अध्याय १ का प्रकार र आविष्ट होते हैं, म् ' इत्यादिश्रुति प्रकार श्रुतिने स्वयं र अपरा विद्याको लोक एवं देवलोक -न रूप से दिखलाया… 381–390
- [ अध्याय १ [ लगी हुई उन किया; अर्थात् श्रम से अपनेको दिख-हें व्याप्त करके मृत्युने किया- अपने - अपने र दिया… 391–400
- [ अध्याय १ ना कहा गया है कि है वह वाक् ही है " - स शब्दका जो अर्थ ान्यमात्र इन नाम-कारण अर्थात् उपा-प्रकार सैन्धवगिरि का… 401–410
- [ अध्याय २ न है । इसीसे आख्या-और अजातशत्रुकी तादेखी जाती है । रूष ज्ञान - लाभ करता भी है । प्राये हुए गार्ग्यको रना आस ति स होवाचा-जनको जनक ( गर्वीला )… 411–420
- [ अध्याय २ अजातशत्रुद्वारा पुरुष एतमेवाह मैतस्मिन्संव-बास इति स य छति नाप्रतिरूप-सीकी में ब्रह्मरूपसे नहीं, इसके विषय में ता हूँ… 421–430
- [ अध्याय २ है । किंतु गार्ग्यके व्यस्थानीय ब्रह्म और अभिमत स्वामि-के पार्थक्यनिश्चयका जो संकीर्ण ( मिला हुआ ) उनके भेदका निश्चय भोक्तामें द्रष्टृत्व ही… 431–440
- [ अध्याय २ अरे और नेमि संहत हैं देह और प्राण मिले नाभिस्थानीय प्राणमें समर्पित हैं [ - ऐसा चुका है ] | अत: वह त ] गृहादिके समान -समुदायकी जातिवाले न [… 441–450
- [ अध्याय २ — ऊँची देवत्वादि और स्वादि, इस प्रकार ऊँची-[ गतियों ] को प्राप्त कंतु इसके ये महाराज-मिथ्या ही हैं; क्योंकि ' इव ' शब्दका प्रयोग है और [… 451–460
- [ अध्याय २ ती - तो फिर क्या बात है? -मैं दूसरे प्रश्नका कोई सुनना चाहता हूँ, इसी व्यर्थता की शङ्का करता - अच्छा, तो फिर ' कुतः ’ की [ ' कहाँसे ' - इस… 461–470
- [ अध्याय २ मोंवाला रहता है । यदि धर्मो का त्याग कर दे तो प्रमाण - व्यवहारका लोप I इसी प्रकार सांख्यवादी नांसकादि न्यायवेत्ता भी क्तियोंसे असंसारी ईश्वरके… 471–480
- [ अध्याय २ ती - ऐसी बात नहीं है; ति तो केवल ज्ञान ही है । शास्त्रकी प्रवृत्ति अन्यथा करनेके लिये फिर किस लिये है? ज्ञात पदार्थोंको ज्ञात नये… 481–490
- [ अध्याय २ जिस प्रकार भेद न होने--ड निरालम्ब ( अधि-) होकर अपनी प्रामा-नहीं कर सकता, उसी निषद् भी स्वयं प्रामा-हो सकती… 491–500
- [ अध्याय २ उपलब्ध करनेवाले का अनुष्ठान करनेवाले भी प्रत्येक शरीरमें. - ऐसा अनुमान होता तिमें ब्रह्मकी एकता वाक्योंका अनुमान विरोध है… 501–510
- [ अध्याय २ शुका आधान क्या है? यह कार्यरूप भौतिक धान है - जिसमें कुछ उसे आधान कहते हैं, = अर्थात् प्राणका यह न है; क्योंकि इसमें कर अपने स्वरूपको ली… 511–520
- [ अध्याय २ कारण उसका ' नेति-प्रकार निर्देश किया जिनके अपवादद्वारा न - नेति ' इस प्रकार जाता है वे उस पर-माके ये दो रूप हैं । शब्द निश्चयार्थक है… 521–530
- [ श्रध्याय २ का ही सार है ' यह विशेषरूपसे - त्यत् ( अमूर्त दोनों क्षण नेत्रस्थित पुरुष-सारत्वमें ही हेतुत्व के लिये है || ५ || वर्णन बदके वाच्य एवं… 531–540
- [ अध्याय२ हेतुओं का भी कोई है; जैसा कि छठे ( उप-चौथे ) अध्याय में " इदंमयः - आदि श्रुति बतलावेगी… 541–550
- [ अध्याय २ रूपसे संन्यासका विधान इच्छासे ही यह आख्या-रम्भ की जाती है-वल्क्य उद्यास्यन्वा तेऽनया कात्या-' मैं इस स्थान ( गार्हस्थ्य-नेवाला हूँ… 551–560
- [ अध्याय २ दन यका ज्ञान होने-स्तुका ज्ञान कैसे कोई दोष नहीं नको छोड़कर नहीं है; यदि नसे ही ] उसका ; किंतु अन्य नहीं, आत्मा ही अत: आत्माका का ज्ञान हो जाता… 561–570
- [ अध्याय २ समुद्र एक अयन चा एक अयन है, इसी है, इसी प्रकार समस्त नका चक्षु एक अयन इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक यन है, इसी प्रकार र समस्त विसर्गों का… 571–580
- [ अध्याय २ धान ध कराये जाने-समुहन्न प्रेत्य हं ब्रवीम्यलं नहीं रहती-नाज्ञवल्क्यने कहा, ! यह तो उस कहा, यही - इस विरुद्ध धर्मवत्ता-श्रीमान्ने तो कर दिया है… 581–590
- [ अध्याय २. रनेके लिये है और रा निदिध्यासन की जाती है । भी अर्थ किया कार जैसा शास्त्राने वैसा ही तर्कद्वारा हिये और जैसा गया है उस तर्क किये हुए अर्थ… 591–600
- [ अध्याय२ ध्वस्य सत्यस्य सत्ये तेजोमयो-त्यस्तेजोमयो-मृत मि भूत इस सत्यके मधु-और जो यह अध्यात्म जो कि ' यह आत्मा है, यह ब्रह्म है, यह र वही धर्म दृष्ट-नी… 601–610
- [ अध्याय २ की अपेक्षासे रहित विद्याके द्वारा ही प्राप्त कि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप में कहनेके लिये प्राप्त से विरुद्ध होनेके प्रकरणसे निकाल -धनके लिये… 611–620
- [ अध्याय २ ALALAL श्विभ्यामुवाच । प्रतिरूपोबभूव याभिःपुरुरूप शेति । अयं वै चानन्तानि च मात्मा ब्रह्म को उपदेश किया 1 हो गया… 621–630
- [ अध्याय ३ प्रकार अनूचानतमविषयक उत्पन्न होने पर उसे उपाय करनेके लिये नयी अवस्थावाली गौएँ रोक लीं अर्थात् एक में रोकवा दीं… 631–640
- [ अध्याय३ लसे पृथक् जो अतिमुक्ति - जो उस कालसे मुक्त धन है ] उसका वर्णन इसलिये यह आरम्भ ना है, क्योंकि क्रियाके बिना भी क्रिया के पूर्व त् उसके साधनोंके… 641–650
- [ अध्याय३ होती हैं, वे समिघ् और बाहुतियाँ, जो होम की अत्यन्त शब्द करती हुतियाँ और जो होम की अधिशयन करतीं अर्थात् चीपर जाकर लीन हो वे दुग्ध और सोमकी I… 651–660
- [ अध्याय३ और स्वर्गादिका ग्रहण होना चाहिये, परंतु त्र्यरूप विशेषोंका ग्रहण है । यदि वैदिक कर्म होते तो संसार ही नहीं था… 661–670
- [ अध्याय ३ मृत्युरूप देखा गया न भक्षण कर जाता अग्नि जलका खाद्य समझ लो कि मृत्युका उस मृत्यु के मृत्युद्वारा तिग्रहसमुदाय भक्षण ता है… 671–680
- [ अध्याय३ हम दोनों ही मिलकर देंगे । क्यों? क्योंकि हम वस्तुका जनसमुदायमें कर सकते; इसलिये चार करनेके लिये लेंगे इत्यादि श्रुतिका वचन वल्क्य और आर्तभागने… 681–690
- [ अध्याय३ करनी आवश्यक त्तिका हो है तो पर्यवसान कर्मके विषयों ( उत्पत्ति, आप्ति और विकार ) में ही होनेके, उन्हीं की कल्पना करनी नत्य मोक्ष अथवा मोक्षके त… 691–700
- [ अध्याय ३ NNNNN के अनुसार ] भिन्न-= किया जा सकता हुआ है । अत: कर्मफलों-दर्शित करनेके लिये आरम्भ किया - याज्ञवल्क्येति... लिस्य काप्यस्य ना तमपृच्छाम इति… 701–710
- [ अध्याय ३ तथा जो सर्वान्तर— तर है - श्रुतिमें ' यत् ' न पदोंसे यह प्रदर्शित है कि यह प्रसिद्ध है - उस आत्माका व्याख्यान करो - जि को पकड़कर गौ दिख-प्रकार… 711–720
- [ अध्याय ३ नमो याज्ञवल्क्य हं जरां मृत्यु-- ब्राह्मणाः पुत्रै-श्च व्युत्थायाथ वित्तैषणा या एव भवतः… 721–730
- [ अध्याय ३ है और हिरण्य-यिणी विद्या ही है, क्योंकि वह हेतु है । निरु-विषयिणी ब्रह्म-की हेतु नहीं तः वह सर्व हो आत्मा ही हो श्रुतियों से प्रमा-और व्युत्थान… 731–740
- [ अध्याय ३ ग्रहण कराने के ब्रद्ध अन्य एषणाओं-राती ही है - यदि सी बात नहीं है, पश्चात् भोजन भिक्षाचर्या किसी नहीं है, हवन के राना भी शेषप्रति-के कारण किसी… 741–750
- [ अध्याय ३ ( शरीर ) के गत हुए परस्परसंहत त हैं, इसलिये वे गी हैं । - ] ' अच्छा तो, वे में ओतप्रोत हैं? ' ज्ञवल्क्य ने कहा, ' हे -ने प्रश्नको अतिप्रश्न… 751–760
- [ अध्याय ३ और करण ( देह • उसके कर्मानुसार ही इस अन्तर्यामी त्र्यमुक्त होनेके कारण कर्म नहीं हैं… 761–770
- [ अध्याय ३ - या विदेहका रहने-चढ़ाकर शत्रुओं को - खड़ा होता है, उसी होती हूँ; तुम मुझे ! ‘ पूछ ' । २… 771–780
- [ अध्याय ३ नवा अक्षरस्य सन्ति यजमानं चन्द्रमा विशेषरूप से नक्षरके ही प्रशासन में रहते हैं । हे गागि! अर्धमास ( पक्ष ) एस्थित रहते हैं… 781–790
- [ अध्याय३ अक्षर ) ही पराकाष्ठा गति है, यह परब्रह्म वही पृथिवीसे लेकर न्त समस्त सत्यका सत्य तदेव बहु मन्ये-' जातु युष्माक इ वाचक्नव्युप-इसीको बहुत मानें… 791–800
- [ अध्याय ३ मासाः संवत्सर-ददाना यन्ति ते दित्या इति । ५ । ज्ञवल्क्य - ] ' संवत्सर के ये इस सबका आदान हैं । ५… 801–810
- [ अध्याय ३ COSACA ? ' तब याज्ञवल्क्यने ही जिसका आयतन श्रोत्रमें रहनेवाला में भी जो प्रतिश्रवण-रूपसे रहता है, वह उसका देवता कौन [ याज्ञवल्क्यने ] कहा, कि… 811–820
- [ अध्याय ३ ऽथ दक्षिणां इति कस्मिन्नु दयेन हि श्रद्धां भवतीत्येव -' [ याज्ञवल्क्य - ] समें प्रतिष्ठित है? " कसमें प्रतिष्ठित है? ' किसमें प्रतिष्ठित है? "… 821–830
- ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ ९ प्रागेव प्रयात् अपानवृत्त्या चेन्न निगृह्य ेत । कस्मिन्न्वपानः प्रति ष्ठित इति १ व्यान इति – साप्य -! पानवृत्तिरध एव… 831–840
- [ अध्याय ३ - किये जानेपर पुरुष-रित होते नहीं देखा ह किसीसे अङ्कुरित चाहिये; इसीसे में हूँ कि यदि न्यका छेदन कर दिया किस मूलसे अङ्कुरित त् मरे हुए पुरुषकी… 841–850
- [ श्रध्याय३ माननेपर ' जक्षत् क्रीडन् ' तिसे विरोध होगा । ती - नहीं; क्योंकि यह की अनुभूति होनेपर भक्षणादिका अनुवाद है… 851–860
- [ अध्याय ४ स्वयं प्रज्ञा ही प्रज्ञता का प्रज्ञा निमित्त है, प्रज्ञता है? जिस न और प्रतिष्ठा ब्रह्मसे भिन्न हैं, उसी भी है क्या? नहीं, प्रकार है? ! वह वाक… 861–870
- [ अध्याय ४ देवानप्येति लहस्रं ददामीति ज्ञवल्क्यः पिता G । कहा है वह हम सुनें । ' हृदय ही ब्रह्म है… 871–880
- [ अध्याय४ पश्चिम दिशा पश्चिम दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व प्राण हैं; नीचे की प्राण हैं और सम्पूर्ण प्राण हैं… 881–890
- [ अध्याय ४ यते कर्म कुरुते तथा चन्द्रमाके अस्त ग्नि ही इसकी ज्योति र - उधर जाता, कर्म ऐसी ही है ' । ४… 891–900
- [ अभ्याय8 के मूंदनेपरस्मरण ले रूपको देखता है, न मूंदनेपर भी द्रष्टा ना जाता है । वा शरीरके मर जाने-कोई विकार न होनेपर पादिका दर्शन नहीं देह ही द्रष्टा… 901–910
- [ श्रध्याय ४ देती है, उसी ज्योति बुद्धि सूक्ष्म होनेके नत हृदयादिक भी अपने से आत्मज्योतिकी कर देती है, सूक्ष्म - स्थूल नबकी अपेक्षा - और आत्मा-- इसलिये वह… 911–920
- अध्याय ४ - रस्सी और पुनः - पुनः नेपर उनमें इ भेद है तो अन्य प्रका-हो जाता प्रकाशित तो स्वयं ही करता देखा किक पुरुष को देखने ग्रहण नहीं स्वयं ही है… 921–930
- [ अध्याय 8 मान है ' ऐसा करता है, खे हुएका स्मरण पदसे वर्तमान-है; यदि ' वेन ' हुएको स्मरण ' इदम् ' ऐसे T न क्षणकालतक की हानि होगी नहीसे स्मृतिज्ञान ' इदम्… 931–940
- - अध्याय ४ आक्रमको --हुए बीजके के प्रति उन्मुख आक्रान्त कर, र्थात् आश्रय देखता है । बहुवचन धर्मा-कारण अर्थात् उभय नापोंको अर्थात् क्षात् पापों का म्भव है… 941–950
- [ अध्याय ४ आध्यात्मिक अपने स्वरूप से सोये रहते हैं, तात्पर्य यह अलुप्त आत्म-अवभासित ज्योतिष्मान् ग्रहणकर वह रित स्थान में हिरण्मय-चैतन्यज्योतिः-है; अकेला… 951–960
- अध्याय ४ स सम्प्रसाद-रसे प्रसन्न वस्था में स्थित म्यक् प्रसन्न सुषुप्तावस्था-इच्छावाला रहने पर ही - दर्शना दिसे तथा अनेक अर्थात् उस श्रमकी उप-है कि केवल [… 961–970
- [ अध्याय ४ विस्तारसे प्रति-वो केवल दृष्टान्त-है, उसका वर्णन यसे श्रुति आरम्भ दृष्टान्त संचरति पूर्व तावनुसंचरति और अपर दोनों स्वप्नस्थान और -रता है । १८… 971–980
- [ अध्याय ४ V विद्याका उत्कर्ष भाव होनेपर नो इसे कोई शमें करते हैं ' विद्याका फल होता है । वे ये नरिच्छिन्नात्म-और अविद्या पुरुष सर्वात्मा अविद्यासे अस… 981–990
- [ अध्याय 8 ठीक ही कही गयी प सब प्रकार के-है; चूँकि यहाँ इस यह रूप कामरहित, - और अभय होता - लोका अलो-स्नो स् डाल: पौल्क-नापसोऽनन्वा-दा सर्वाञ्छो-अमाता हो… 991–1000
- [ अध्याय ४ और परमात्मा की के कारण वह नहीं नात्मा स्वयंज्योति या; स्वयंज्योतिष्ट् तन्यात्मस्वरूपता… 1001–1010
- [ अध्याय ४ की कल्पना विव-जानने के कारण वणखण्डकेसमान रूप है ' ऐसा प्रति-श्रुति से विरोध भी यह कल्पना तथा " ब्रह्म विज्ञान पहे " " ब्रह्म सत्य है " एवं "… 1011–1020
- [ श्रध्याय ४ दिव्य भोगसामग्री-ये है अर्थात् जो सामग्रियाँ हैं, सम्पन्न हैं, उनमें चक सम्पन्न होता - परम आनन्द है… 1021–1030
- [ अध्याय ४ ऐसा किस समय जिस समय ऐसा लाया जाता है । क्रियाविशेषण है । र्थात् जहां इसका 7 जाता है… 1031–1040
- [ अध्याय४ धिकृत होना समान हीका एक कर्ता वागादि प्राण इस आते हैं । तब का अङ्गोंसे सर्वथा किंतु वह मोक्ष कैसे किस प्रकार ये आते हैं? सो है— इन… 1041–1050
- [ अध्याय ४ अथवा शरीरस्थ इन्द्रियाँ मरनेपर, प्रकाशके समान कर देहान्तरका पुन: संकोचको - अथवा वैशेषिक तानुसार केवल देशमें जाता है? दान्त के अनुसार अन्तर की… 1051–1060
- [ अध्याय8 सोच्छील्य प्रत्ययको T है, इसलिये कर्म में होनेका स्वभाव केवल उस कर्म-नहीं होती - ऐसी श्रुति कहती है-पुण्यवान् हो जाता पापी हो जाता नापरूप कर्मसे… 1061–1070
- [ अध्याय ४ 7--06 उष्ण और प्रकाश-अभिव्यक्त होता है, नपेक्षा से नहीं है, तो त है? – अग्नि के काशरूप धर्म दूसरे हित ( ओमल ) हैं दृष्टि से असम्बद्ध हैं,… 1071–1080
- [ श्रध्याय४ जाती हैं ] तब यह र्मा होनेपर भी समूल नाश हो अमृत हो जाता है । : यह बात कह दी -मविषयक कामनाएं मृत्यु हैं, अतः मृत्यु-जानेपर विद्वान् हुए ही… 1081–1090
- [ अध्याय 8 पुण्य पापके त्याग-दिया गया है । " जो आशाओंसे रहित, -मस्कार और स्तुति ला, निषिद्धाचरण-क्षीणकर्मा है, उसे ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते ताका ऐसा कोई… 1091–1100
- [ अध्याय४ पर्य यह है कि जिसे जा हो वह ब्रह्मको के द्वारा उपासना मृत ही हूँ तेष्ठितः । मृतम् । १७… 1101–1110
- [ अध्याय४ र उन धमांस मुक्त कर और ' यह पर है ' ऐसा ही है कहकर उसे को प्राप्त करा दिया यह साक्षात् ' महान् मा है ' ऐसा कहा गया विज्ञानमयः प्राणेषु, पूर्वं… 1111–1120
- [ श्रध्याय४ लोककेइच्छुक ही हैं ऐसा ? इसमें श्रुति हेतु दिखलाती वै तत्'- -उस रण बतलाया है कि पूर्व विद्वान् आत्मज्ञ ब्रह्मविद्याकी 7 ] –'प्रजाम् ' क,… 1121–1130
- [ श्रध्याय8 प - अपुण्य कर्म ये बड़े ही क्लेशका पापकर्मके कारण - होऊंगा ' – इस कर्म किया है, यह पश्चात्ताप है, इस श्रुति पको प्राप्त हुए होता… 1131–1140
- [ अध्याय४ द्वारा केवल संख्या-- कराते हैं, किंतु रेखारूप ही नहीं कार अकारादि कराने की इच्छा-ज, स्याही ओर रूप उपायका वर्णोंका स्वरूप गज - स्याही आदि हैं-… 1141–1150
- [ अध्याय४ जाती हुई वीणाके , किंतु वीणा या हो जाता है || १० || नग्धूमा विनि-नश्वसितमेतद् स इतिहासः व्यनुव्याख्या. पायितमयं च सर्वासामपा कायनमेव वैषां… 1151–1160
- [ अध्याय४. -पक्षमें तो शरीर-हो ही नहीं सिवा " जिसके श्मशानपर्यन्त - विधान मन्त्रों-है, उसीका इस समझना चाहिये, हीं " ऐसी स्मृति दने जिस कर्मका किया है, वह… 1161–1170
- [ श्रध्याय8 ता - पितामह आदि सांख्य और योग-न्यास ज्ञानका हा जाता है । का अभाव होने-ज्ञानका अन्तरङ्ग मप्रवृत्ति ज्ञानके सभी शास्त्रों में विरक्त मुमुक्षुके… 1171–1180
- [ अध्याय५ पूर्णता ही है । यह कार्य - कारणके भेदसे इस प्रकार द्वैताद्वैत-है । समुद्र जल - तरङ्ग-ही है और सत्य है, उसी निवाले आविर्भाव-तिरङ्ग, फेन एवं… 1181–1190
- [ अध्याय५ त्रण न होनेपर ' ब्रह्म ' मात्रका वाचक है, ब्रह्म ' इस प्रकार जाता है । ब्रह्म है वह ॐ शब्द ॐ शब्द स्वरूप हो से इनके समाना-कोई विरोध नहीं… 1191–1200
- अध्याय ५ का फल तो - ज्ञान होने-भी दोष ता है, जैसे दिको निवृत्त वता आदि गया और इनमें से एक-अतः आज-तीनोंहोके नहीं है… 1201–1210
- व्याय ५ -सूर्यादि जाओंके. किया --नजापति-जापतिने । चूँकि ब्रह्मसे ही सत्य ब्रह्म व्य ) क्यों —वे इस पिता रके उस करते हैं, सत्य ब्रह्म प्रकार झका भी रोंवाला… 1211–1220
- अध्याय ५ स्वधाकारके । अर्थात् त्रयो और साम ) की जो उपा सामान धेनु अपने चार तन्य अर्थात् कार वाग्धेनु स्तनों से समान अन्न न कौन - से ये वह दूध हैं? धेनु दो… 1221–1230
- अध्याय ५ धु - शोभन यह है कि ना करूँ ओर का में असाधु है कि वह तो र प्राण - ये जो जानने-शुभ करने से और शुभ ता… 1231–1240
- अध्याय ५ श्रिया E 11 वाला हो का ' तृतीय ' जितना यह ( प्रकाशित चतुर्थ होता है - मानो नर्थ है -- यह है । जो कार शोभा व्यान - ये ठही अक्षर पाद है… 1241–1250
- - अध्याय ५ गायत्र्युपा-ही कल्पना बात नहीं है; और प्रतिग्रह हो सकता है, कोई अपराध मर्थ नहीं है, यत्रीके चतुर्थ से भी अधिक - अवशिष्ट है आती है-पता है यही… 1251–1260
- [ अध्याय५ ! हमें ' राये ' प्राप्ति के लिये सु-ले चल । पुनरा-अर्थात् घूममार्गसे किससे? सुपथ विवयान ] मार्गसे हो देव! तू सम्पूर्ण वाला है… 1261–1270
- [ श्रध्याय ६ बत पुरुषका भी , किंतु जिसके यह उससे भी दंशाग्रस्त ) हो वसिष्ठ होगा । ' वैराग्यके लिये तिने वसिष्ठको रौंको अप्रिय न ' यह वसिष्ठ है ' कहा । ७… 1271–1280
- | अध्याय६ षेधका अतिक्रम होगा, क्योंकि - आगे वाक्यका प्राण ] ही है । यहाँ ब्राह्मणादि - दृष्टिका विधान नाता, किंतु केवल -नत्वदृष्टि बतलायी कार सामान्यरूप--… 1281–1290
- [ अध्य६ बृहदारण्यकोपनिषद् मिदं विश्वमे-चेतिनाहमत जाती है- ' सो क्या . ] ' जिस प्रकार न है? ' ' नहीं ' ऐसा पुनः पुनः बहूतोंके ना नहीं है, सो क्या -- ], '… 1291–1300
- [ अध्याय६ मानुष वरेषु मानु-म मनुष्यसम्बन्धी कहा, ' गौतम! हो, वह तो देव सम्बन्धी वरोंमेंसे । ६… 1301–1310
- [ अध्याय६ के कर्ताके शरीर-नेवाला कर्मसम्ब-ब्दवाच्य है । अन्य जलकी अधिकता आपः पुरुषवाचः ' या जाता है, ऐसी - अन्य भूत हैं ही रम्भ कर्मप्रयुक्त ही से सम्बन्ध… 1311–1320
- [ अध्याय६ का निर्णय करते आहवनीय करते है । यहाँ भी अग्नित्व और व इत्यादि उससे है; अतः यह होत्राहुतिदर्शन का , क्योंकि इस तिथ्याम् ' इत्यादि उत्तर ग्रहण… 1321–1330
- अध्याय ६ य्य ' भर - भरकर द्वारा अपक्षय भक्षण करते हैं । चन्द्रलोकमेंशरीर अपने उपकरण-देवता भी पुन: -हुए - उन्हें कर्मा · 5, क्योंकि सोमके न यही उनका प्रकार… 1331–1340
- ( अध्याय६ त्रोंसे आवापस्था • रे । १ । हुत्वा मन्ये स्वाहेत्य-स्वाहा प्रति-नयति चक्षुषे स्त्रवमवन-हुत्वा मन्ये स्वाहेत्यनौ स्वाहेत्यग्नौ हवन करके संस्रव-'… 1341–1350
- [ श्रध्याय६ ग्रहण करने चाहिये । सो बतलाये जाते तिल, माष, अणु शब्दके वाच्य अणु एक भेद ) है तथा किसी देश में कङ्ग ब्दसे प्रसिद्ध है… 1351–1360
- [ अध्याय६ पत्नी यदि इस करने दे तो वह 5 द्वारा उसपर करे । करनेपर भी वह - न दे तो पति अनुसार दण्डका के साथ बलपूर्वक करे… 1361–1370
- [ अध्याय६ अभीष्ट 2 है । धिक अवस्था कहते हैं, उसके ओषधिशेषका । उसी के गूदे-' भ ' समझना ग्रेज विद्वान् सर ' नामक पौधेका एवं प्रामाणिक अध्याय में ( जो उल्लेख… 1371–1380
- | अध्याय ६ ण्डूकीपुत्रान्मा त्रो राथीतरी भालुकपुत्रः तीपुत्राद्वैद. : प्राचीन योगी-साञ्जीवीपुत्र: सुरायणादासु-क्याद् या ज्ञव-उपवेशेरुपवेशिः बावतो… 1381–1390
- पृष्ठ २ ३५२ १३३० ६२२ ६६२ १२३२ १३४ १३०२ १०७ . १२५५ ३ ११ ३ ९ २ ११८१ ३४८ ३४८ ३४२ ६५६ ८२५ ३७७ ४०४ ३४८ ८५ ५१३ ६३२ ४५ १२६४ ३४८ १२६८ ११६३ ७६४ ३७६ १०८७ ३६ १२२५… 1391–1400