बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1101–1110

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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[ अध्याय४ पर्य यह है कि जिसे जा हो वह ब्रह्मको के द्वारा उपासना मृत ही हूँ

तेष्ठितः ।

मृतम् ॥ १७ ॥

आकाश भी प्रतिष्ठित ब्रह्मको जाननेवाला - जिस ब्रह्ममें पांच चर्वादि, क्योंकि गंधर्व सुर और राक्षस- इस व ही गिने गये हैं, जिनमें पाँचवाँ वर्णं तथा अव्याकृत-श, जिसके विषय में तप्रोत है ' ऐसा कहा ब जिसमें प्रतिष्ठित -! इस अक्षरमें ही प्रोत है " ऐसा पहले है, उस आत्माको ह्य मानता हूँ, उससे मैं आत्माको नहीं फिर क्या हुआ? -बननेवाला होने से मैं ज्ञानमात्रसे ही मरण-की निवृत्ति हो जानेसे मृत ही हूँ ॥ १७ ॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८७ ब्रह्मको प्राणका प्राणादि जाननेवाले ही उसे जानते हैं 2 किं च तेन हि चैतन्यात्म- तथा उस आत्मभूत चैतन्यात्म-ज्योतिषावभास्यमानः प्राण ज्योतिसे प्रकाशित होता हुआ ही आत्मभूतेन प्राणिति तेन प्राण- प्राण प्राणक्रिया करता है, इस-स्यापि प्राणः सः - = लिये वह प्राणका भी प्राण है -प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं

मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणम-ग्रयम् ॥ १८ ॥

जो उसे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका मन जानते हैं वे उस पुरातन और अग्रच तं प्राणस्य प्राणम्; तथा चक्षुषोऽपि चक्षुः उत श्रोत्रस्यापि श्रोत्रम्; ब्रह्मशक्त्य धिष्ठितानां हि चक्षुरादीनां दर्शनादिसामर्थ्यम्; स्वतः काष्ठलेोष्टसमानि हि तानि । चैतन्यात्मज्योतिः शून्यानि , मनसोऽपि मन: - इति ये विदुः - — चक्षुरादिव्यापारानुमि--तास्तित्वं प्रत्यगात्मानम्, न विषयभूतं ये विदुः, ते निचि -क्युः - निश्चयेन ज्ञातवन्तो ब्रह्म, पुराणं चिरन्तनम्, अग्रथम् अग्रे भवम् । " तद्यदात्मविदो विदुः " ( मु ० उ ० २ । २ । ९ ) इति ह्याथर्वणे ॥ १८ ॥

ब्रह्मको जानते हैं ॥ १८ ॥

उसे जो प्राणका प्राण तथा चक्षुका भी चक्षु एवं श्रोत्रका भी श्रोत्र जानते हैं; — क्योंकि ब्रह्मकी शक्ति से अधिष्ठित चक्षु आदिमें हो दर्शनादिका सामर्थ्य है, चैतन्यात्म-ज्योतिसे शून्य होनेपर तो वे स्वतः काष्ठ और मिट्टी के ढेले के समान हे -- तथा वह मनका भी मन है--इस प्रकार जो जानते हैं अर्थात् चक्षु आदिके व्यापारसे जिसके अस्तित्वका अनुमान होता है, उस प्रत्यगात्माको जो ' वह इन्द्रियोंका विषयभूत नहीं है ' इस प्रकार जानते हैं उन्होंने पुराण-- पुरातन और अग्रथ: - - आगे रहनेवाले ब्रह्म-को निश्चय ही जाना है । " वह जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं " ऐसा आथर्वण श्रुति में भी कहा है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1102

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१०८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ ब्रा नानात्वदर्शीकी दुर्गतिका वर्णन तद्ब्रह्मदर्शने साधनमुच्यते— । उस ब्रह्मदर्शन में साधन बत- चा लाया जाता है- सू मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १६ ॥ वि

ब्रह्मको आचार्योपदेशपूर्वक मनसे ही देखना चाहिये । इसमें नाना श कुछ भी नहीं है । जो इसमें नानाके प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

मनसैव परमार्थज्ञान संस्कृतेन आचार्योपदेशपूर्वकं चानुद्रष्ट-व्यम् । तत्र च दर्शनविषये ब्रह्मणि नेह नाना अस्ति किंचन किंचिदपि । श्रसति नानात्वे, नानात्वमध्यारोपयत्य विद्यया, स मृत्योर्मरणात्, मृत्युं मरणम् प्राप्नोति । कोऽसौ १ य इह नानेव पश्यति 1 । अविद्याध्यारो-पणव्यतिरेकेण नास्ति परमार्थ-तो द्वैतमित्यर्थः ॥ १ ९ ॥ समान देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको य य परमार्थज्ञान से संस्कारयुक्त हुए मनसे ही आचार्योपदेशपूर्वक उसे अ देखना चाहिये । उस दर्शन के अ विषयभूत ब्रह्ममें नाना कुछ भी नहीं है । नानात्वके न रहते हुए क ही [ जो ] अविद्यासे उसमें नानात्व-का आरोप करता है, वह मृत्यु यानी मरणसे मृत्यु- मरणको प्राप्त मे होता है | वह कौन है? जो इसमें नानाके समान देखता है । तात्पर्य यह है कि अविद्याजनित आरोप-के सिवा परमार्थतः द्वेत नहीं म हे ॥ १६ ॥

ब्रह्मदर्शन की विधि यस्मादेवं तस्मात् — क्योंकि ऐसा है, इसलिये -एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम् विरजः: पर आकाशादज आत्मा महान् ध्रुवः ॥ २० ॥

उस ब्रह्मको [ आचार्योपदेशके ] अनन्तर एक प्रकारसे ही देखना

पृष्ठ 1103

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[ अध्याय ४ च

दर्शन में साधन बत-कञ्चन ।

नश्यति ॥ १६ ॥

हिये । इसमें नाना - वह मृत्युसे मृत्युको नसे संस्कारयुक्त हुए आर्योपदेशपूर्वक उसे ॥ उस दर्शन के में नाना कुछ भी त्वकेन रहते हुए यासे उसमें नानात्व-करता है, वह मृत्यु मृत्यु- मरणको प्राप्त कौन है? जो इसमें देखता है । तात्पर्य वद्याजनित आरोप-रमार्थतः द्वैत नहीं

है, इसलिये -ध्रुवम् ।

ध्रुवः ॥ २० ॥

प्रकारसे ही देखना ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८ ९ चाहिये । यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप । आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और एकधैव एकेनैव प्रकारेण विज्ञान घर्नैकरसप्रकारेण श्रका-शवनिरन्तरेण अनुद्रष्टव्यम्, यस्मादेतद्ब्रह्म अप्रमयम् अप्रमे-यम्, सर्वैकत्वात् अन्येन हि अन्यत् प्रमीयते; इदं त्वेकमेव, श्रतोऽप्रमेयम्; ध्रुवं नित्यं कूटस्थमविचालीत्यर्थः । ननु विरुद्धमिदमुच्यते - अप्र-मेयं ज्ञायत इति च; ' ज्ञायते ' इति प्रमाणैमयत इत्यर्थः, ' अप्र-मेयम् ' इति च तत्प्रतिषेधः । नैष दोषः, अन्य वस्तुवद् अना-गमप्रमाणप्रमेयत्वप्रतिषेधार्थ-त्वात् यथा अन्यानि वस्तूनि श्रागमनिरपेक्षैः प्रमाणैर्विषयी वृ ० उ ० ६६-अविनाशी है ॥ २० ॥

| एकधा - एक प्रकारसे ही अर्थात् आकाश के समान निरन्तर एकमात्र विज्ञानघनरसस्वरूपसे ही अनुदर्शन करना चाहिये ( आचार्योपदेशके अनन्तर देखना चाहिये ); क्योंकि यह ब्रह्म अप्रमय - अप्रमेय है, कारण ब्रह्ममें सबकी एकता है । अन्यके द्वारा ही अन्य की प्रमिति ( प्रमाबुद्धि ) होती है, किंतु ब्रह्म तो एक ही है, इसलिये यह अप्रमेय है तथा ध्रुव - कूटस्थ यानी विचलित न होनेवाला है । शङ्का - किंतु ' ब्रह्म अप्रमेय हे और वह जाना जाता है ' यह कथन तो विरुद्ध है । जाना जाता है— इससे तो यही तात्पर्य है कि प्रमाणों-द्वारा उसका मान होता है और अप्रमेय - ऐसा कहने से उसका प्रतिषेध होता है । समाधान- यहाँ यह दोष नहीं है; क्योंकि ' अप्रमेयम् ' यह विशेषण, अन्य वस्तुओंके समान उसके आाग-मातिरिक्त प्रमाणसे प्रमित होनेका प्रतिषेध करनेके लिये है । जिस प्रकार अन्य वस्तुएँ आगमकी अपेक्षा | न रखकर अन्य प्रमाणोंका विषय

पृष्ठ 1104

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१० ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय क्रियन्ते, न तथा एतदात्म-तवं प्रमाणान्तरेण विषयीकृत शक्यते; सर्वस्यात्मत्वे केन कं पश्येद् विजानीयात् - इति प्र-मातृप्रमाणादिव्यापारप्रतिषेधेनैव आगमोऽपि विज्ञापयति, न तु श्रभिधानाभिघेयलक्षणवाक्यध-र्माङ्गीकरणेन; तस्मात्नागमेनापि स्वर्गमेर्वादिवत् तत् प्रति-पाद्यते; प्रतिपादयित्रात्मभूतं हि तत् प्रतिपादयितुः प्रतिपादनस्य प्रतिपाद्यविषयत्वात्, भेदे हि सति तद् भवति । ज्ञानं च तस्मिन् परात्मभाव-निवृत्तिरेव; न तस्मिन् साक्षा-दात्मभावः कर्तव्यः, विद्यमान -त्वादात्मभावस्य नित्यो हि आत्मभावः सर्वस्य, श्रतद्विषय इव प्रत्यवभासते; तस्मादतद्विषया-भासनिवृत्तिव्यतिरेकेण न तस्मि-न्नात्मभावो विधीयते; अन्यात्म-भावनिवृत्तौ, आत्मभावः स्वात्मनि 8 | होती हैं, उस प्रकार यह आत्मतत्व किसी अन्य प्रमाणद्वारा विषय नहीं G किया जा सकता । सभी के आत्मा होनेपर किसके द्वारा किसे देखे अर्थात् जाने - इस प्रकार शास्त्र भी प्रमाता प्रमाणादि व्यवहारका प्रतिषेध करके ही उसका बोध कराता है, प्रतिपाद्यप्रतिपादक रूप वाक्य के धर्मको स्वीकार करके नहीं । अतः शास्त्र भी उसका स्वर्गं एवं मेरु आदिके समान प्रतिपादन नहीं करता; क्योंकि वह तो प्रति. पादन करनेवालेका आत्मा ही है । प्रतिपादन करनेवालेका प्रतिपादन तो प्रतिपाद्यको विषय करनेवाला होता है और यह भेद होनेपर ही सम्भव है | यहाँपर अर्थात् देहादि अनात्म- E वस्तुओं में आरोपित आत्मभावकी निवृत्ति ही ब्रह्मविषयक ज्ञान है ॥ उस ( ब्रह्म ) में साक्षात् आत्मभाव करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि आत्मभाव तो उसमें विद्यमान ही है । सबका ही ब्रह्म के साथ आत्मभाव नित्य सिद्ध है, केवल अज्ञानवश वह अब्रह्म विषयक-सा प्रतीत होता है; अतः अब्रह्म-विषयक आत्मावभासकी निवृत्तिके सिवा उसमें आत्मभावका विधान नहीं किया जाता । अन्यात्मभावकी निवृत्ति हो जानेपर अपने आत्मामें

पृष्ठ 1105

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[ अध्याय४ प्रकार यह आत्मतत्त्व माणद्वारा विषय नहीं कता । सभीके आत्मा के द्वारा किसे देखे - इस प्रकार शास्त्र भी नादि व्यवहारका के ही उसका बोध तिपाद्यप्रतिपादकरूप को स्वीकार करके भी उसका स्वर्ग के समान प्रतिपादन क्योंकि वह तो प्रति लेका आत्मा ही है । नेवालेका प्रतिपादन विषय करनेवाला यह भेद होनेपर ही र्थात् देहादि अनात्म-पित आत्मभावकी विषयक ज्ञान है । साक्षात् आत्मभाव श्यकता नहीं है; भाव तो उसमें | सबका ही ब्रह्म व नित्य सिद्ध है, वह अब्रह्मविषयक-है; अतः अब्रह्म-विभासकी निवृत्तिके त्मभावका विधान । अन्यात्मभावकी पर अपने आत्मामें ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १० ९ १ स्वाभाविको यः, स केवलो । भवतीति - श्रात्मा ज्ञायत इत्यु-च्यतेः स्वतश्चाप्रमेयः प्रमाणान्त-रेण न विषयीक्रियते इति उभयमप्यविरुद्धमेव । विरजो विगतरजः, रजो नाम धर्माधर्मादिमलम्, तंद्रहित इत्येतत् । परः - परो व्यति-रिक्तः सूक्ष्मो व्यापी वा आका शादपि अव्याकृताख्यात् । अज:: - - न जायते; जन्मप्रति -षेधाद् उत्तरेऽपि भावविकाराः

प्रतिषिद्धाः, सर्वेषां जन्मादित्वात् ।

आत्मा, महान् परिमाणतो मह-तरः सर्वस्मात्, ध्रुवोऽवि -नाशी ॥ २० ॥

जो स्वाभाविक आत्मभाव है, वह शुद्ध हो जाता है; इसलिये आत्मा जान लिया गया – ऐसा कहा जाता है; किंतु स्वयं वह अप्रमेय है— किसी भी अन्य प्रमाणका विषय नहीं होता; अतः उसका अप्रमेयत्व और ज्ञान दोनों विरुद्ध नहीं हैं । विरज - रजोहीन है, रज धर्म-अधर्मादिरूप मलको कहते हैं, उससे रहित है । ' आकाशात्सरः ' - अव्या-कृतसंज्ञक जो आकाश है, उससे भी पर – व्यतिरिक्त — सूक्ष्म अथवा व्यापक है । अज – जन्म नहीं लेता; जन्मका प्रतिषेध करनेसे ‘ अस्ति वर्धते ' आदि आगे भावविकारों. का भी प्रतिषेध हो जाता है; क्योंकि सबका आरम्भ जन्मरूप भाव-। विकारसे ही होता है । वह आत्मा है, महान् है - परिमाणमें सबसे बड़ा है तथा ध्रुव - अविनाशी हे ॥ २० ॥

ब्रह्मनिष्ठामें अधिक शास्त्राभ्यास बाधक है तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापन हि तदिति बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये । शब्दोंका अनुध्यान ( निरन्तर चिन्तन ) न करे; वह तो वाणोका बहुत श्रम ही है ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1106

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१० ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय तमीदृशमात्मानमेव, धीरो धीमान् विज्ञाय उपदेशतः शास्त्र-तश्च, प्रज्ञां शास्त्राचार्योपदिष्ट-विषयां जिज्ञासापरिसमाप्तिकरीम्, कुर्वीत ब्राह्मणः — एवं प्रज्ञाकरण -साधनानि संन्यासशमदमोपरम-तितिक्षासमाधानानि कुर्यादि-त्यर्थः । न अनुध्यायात् —नानुचिन्त-येत्, बहून् प्रभूतान् शब्दान्; । तत्र बहुत्वप्रतिषेधात् केवलात्मै कत्वप्रतिपादकाः स्वल्पाः शब्दा अनुज्ञायन्ते, " ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् " ( मु ० उ ० २ । २ । ६ ) “ अन्या वाचो विभु ञ्चथ ” ( मु ० उ ० २ । २ । ५ ) इति च आथर्वणे । वाचो विग्लापनं विशेषेण ग्लानिकरं श्रमकरम्, हि यस्मात्, तद् बहु-शब्दाभिध्यानमिति ॥ २१ ॥

४ वीर अर्थात् बुद्धिमान् a ब्राह्मण उस ऐसे आत्माको हो आचार्यक उपदेश और शाखसे जानकर | शास्त्र और आचार्यने जिसके विषय-, का उपदेश किया है तथा जो जिज्ञासाकी सर्वथा समाप्ति देनेवाली है, ऐसी प्रज्ञा ( बुद्धि ) करे । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार -की प्रज्ञा उत्पन्न करनेके साधन संन्यास, शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधिका पालन करे । बहुत - से शब्दोंका अनुध्यान— अनुचिन्तन न करे । यहाँ बहुत्वका प्रतिषेध करनेसे केवल आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाले थोड़े - से शब्दोंके अनुशीलन के लिये अनुमति सूचित होती है । आथर्वणश्रुति में भी कहा है – “ आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे ", " अन्य वाणी-का त्याग करो " इत्यादि । क्योंकि वह अधिक शब्दोंका अनुध्यान वाणीका विग्लापन - विशेषरूपसे ग्लानि करनेवाला अर्थात् श्रम उत्पन्न करनेवाला है ॥ २१ ॥

आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन सहेतुकौ बन्धमोक्षावभिहितौ मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा बन्ध और मोक्षका कारणसहित मन्त्रब्राह्मणाभ्याम् श्लोकैश्च पुन- निरूपण किया गया; फिर मन्त्रोंके

पृष्ठ 1107

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[ अध्याय४ यत् बुद्धिमान् ब्राह्मण माको हो आचार्यके शाखसे जानकर, चार्यने जिसके विषय-किया है तथा जो सर्वथा समाप्ति कर ऐसी प्रज्ञा ( बुद्धि ) यह है कि इस प्रकार-पन्न करनेके साधन दम, उपरति, तितिक्षा का पालन करे । शब्दों का अनुध्यान-करे | यहाँ बहुत्वका से केवल आत्माका दन करनेवाले थोड़े - से लन के लिये अनुमति है 1 । आथर्वणश्रुति में - " आत्माका ॐ इस करे ”, “ अन्य वाणी-- " इत्यादि । क्योंकि शब्दों का अनुध्यान लापन — विशेषरूपसे वाला अर्थात् श्रम ला है ॥ २१ ॥

त संन्यास और न ब्राह्मण दोनोंके द्वारा क्षिका कारणसहित गया; फिर मन्त्रोंके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १० ९ ३ र्मोक्षस्वरूपं विस्तरेण प्रतिपादि -तम् । एवमेतस्मिन् श्रात्मविषये सर्वो वेदो यथोपयुक्तो भवति, तत्तथा वक्तव्यमिति तदर्थेयं कण्डिका आरभ्यते । तच्च यथा अस्मिन् प्रपाठकेऽभिहितं सप्रयोजनमनूद्य अत्रैवोपयोगः | द्वारा विस्तारसे मोक्षके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया । इस प्रकार इस आत्मविषयमें जिस तरह सारा | वेद उपयोगी होता है, उसे उसी प्रकार बतलाना है, अतः इसी प्रयोजन से यह कण्डिका आरम्भ की जाती है । इस प्रपाठकमें सप्रयोजन ( फलयुक्त ) आत्मज्ञानका जिस | प्रकार निरूपण किया गया है, उसी प्रकार उसका अनुवाद करके, काम्यवेदराशिको छोड़कर शेष कृत्स्नस्य वेदस्य काम्पराशिवजिं- सम्पूर्ण वेदका इसमें उपयोग हे— तस्य - — इत्येवमर्थ उक्तार्थानुवादः यह दिखानेके लिये, ' स वा एषः ’ इत्यादि मन्त्र में उसका अनुवाद ' स वा एष: ' इत्यादिः । किया गया है— स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तहृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोका-नामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदि-पन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति । एतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्तः प्रत्र-जन्ति । एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वासः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येत्र

पृष्ठ 1108

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१० ९ ४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ म पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो ह प न हि गृह्यतेऽशीर्थो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्य- क तेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत नि इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥

वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है । वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला और सबका अधिपति है | वह शुभ म कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता । यह सर्वेश्वर है; यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है । इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो — इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है । [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मणं वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं । इसीको जानकर मुनि होता है । इस आत्म-लोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर चले जाते ( संन्यासी हो जाते ) हैं । इस संन्यासमें कारण यह है— पूर्ववर्ती विद्वान् संतान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे । [ वे सोचते थे— ] हमें प्रजासे क्या लेना है? जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है । अतः वे पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे । जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तेषणा है और जो वित्तेषणा है, वही लोकेषणा है । ये दोनों एषणाएँ ही हैं । वह यह ' नेति नेति ' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्यं है, उसका नाश नहीं होता, असङ्ग है, वह कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता । इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप - पुण्यसम्बन्धी शोक,

पृष्ठ 1109

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[ अध्याय४ सालोकैषणो नेत्यात्मागृह्यो न हि सज्य-हैवैते न तरत करवमित्युभेउ ॥ २२ ॥

प्राणोंमें विज्ञानमय । वह सबको वशमें -धिपति है | वह शुभ ता । यह सर्वेश्वर है; है । इन लोकोंको करनेवाला सेतु है । गया है ] उस इस निष्काम तपके द्वारा ता है । इस आत्म-त्याग कर चले जाते है- पूर्ववर्ती विद्वान् रते थे । [ वे सोचते आत्मलोक अभीष्ट व्युत्थान कर फिर तेषणा है और जो हैं । वह यह ' नेति है, वह ग्रहण नहीं असङ्ग है, वह कहीं होता तथा उसका यसम्बन्धी शोक, ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १० ९ ५ VIG 2N हर्ष ) प्राप्त नहीं होते । अत: इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [ – ऐसा पश्चात्ताप ] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ ऐसा हर्षं ] - – इन दोनों-को ही वह पार कर जाता है । इसे नित्यकर्म [ फलप्रदान और प्रत्यवायके स इति उक्त परामर्शार्थः कोऽसावुक्तः परामृश्यते १ तं प्रतिनिर्दिशति — य एष विज्ञान -मय इति । अतीतानन्तरवाक्यो-संप्रत्ययो मा भूदिति, य एषः । कतम एषः १ इत्युच्यते— विज्ञानमयः प्राणेष्विति । उक्तवाक्यल्लिङ्गनं संशय-निवृत्यर्थम् उक्तं हि पूर्व जनक-प्रश्नारम्भे ' कतम आत्मेति यो- | ऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ' ( ४ । ३ । ७ ) इत्यादि । एतदुक्तं भ-बति — - योऽदम् ' विज्ञानमयः प्राणेषु ' इत्यादिना वाक्येन प्रतिपादितः स्वयंज्योतिरात्मा, स एष कामकर्माविद्यानाम-नात्मधर्मत्वप्रतिपादनद्वारेण किया हुआ और न किया हुआ द्वारा ] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥

' सः ' यह शब्द पूर्वोक्तके परा-मर्श के लिये है । वह पूर्वोक्त कौन है जिसका श्रुति परामर्शं करती हे? ' य एष विज्ञानमय: ' ऐसा कह-कर श्रुति उसका प्रतिनिर्देश करती है । पूर्वोक्त मन्त्रके पहलेवाले ' वाक्य · . में कहे हुए आत्माको हो न समझ लिया जाय, इसलिये ‘ य एषः ’ ( जो यह ) ऐसा कहा है । यह कौन सा? सो ' विज्ञानमयः प्राणेषु ' इस वाक्यसे कहा जाता है । यहाँ पूर्वोक्त वाक्यका उल्लेख संशयनिवृत्ति के लिये है । पहले जनकके प्रश्न के आरम्भमें ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु ’ इत्यादि कहा है । यहाँ कहना यह है कि ' विज्ञानमयः प्राणेषु ' इत्यादि वाक्यसे जिस स्वयंज्योति आत्माका प्रतिपादन किया गया है, उस इस आत्माको ‘ काम, कर्म और अविद्या - ये अनात्मा के धर्म हैं ' १. बीसवें मन्त्रके ' विरजः पर आकाशात् ' इत्यादि वाक्य में ।

पृष्ठ 1110

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१० ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय MA ४ मोक्षितः, परमात्मभावमापादित: - ऐसा कहकर उन घमेस दिया गया है और मुक्त कर पर एवायं नान्य इति एष स अन्य नहीं ' यह पर ही है है ' ऐसा कहकर उसे साक्षान्महानज आत्मेत्युक्तः परमात्मभावको प्राप्त करा दिया । गया है; वही यह साक्षात् ' महान् योऽयं विज्ञानमयः प्राणेष्विति अजन्मा आत्मा है ' ऐसा कहा गया यथाव्याख्यातार्थ एव । य एषोऽन्तहृदये - हृदयपुण्ड-रीकमध्ये य एष श्राकाशो बुद्धि-विज्ञानसंश्रयः तस्मिन्नाकाशे बुद्धिविज्ञानसहिते शेते तिष्ठति; अथवा संप्रसादकाले अन्तहृदये य एष श्राकाशः पर एव आत्मा निरुपाधिको विज्ञानमयस्य स्व-स्वभाव:, तस्मिन् स्वस्वभावे परमात्मन्याकाशाख्ये शेते; चतुर्थे एतद् व्याख्यातम् —'क्ष तदा-भूत् ' इत्यस्य प्रतिवचनत्वेन । स च सर्वस्य ब्रह्मेन्द्रादे, वशी सर्वो हि अस्य वशे वर्तते; उक्तं । च– “ एतस्य वा अक्षरस्य । प्रशासने " ( ३८ । ९ ) इति । न केवलं वशी, सर्वस्य ईशानः - ईशिता च ब्रह्मन्द्रप्र-भृतीनाम् । ईशितृत्वं च कदाचि-१. उप नषट्के द्वितीय अध्याय में । है । ' योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इसका अर्थ पूर्वं व्याख्या के समान ही है । ' य एषोऽन्तहृ'दये ' – हृदयकमल-के भीतर जो यह बुद्धि - विज्ञानका विज्ञानसहित आश्रयभूत आकाश है, उस बुद्धि-आकाशमें यह शयन करता अर्थात् रहता है अथवा सुषुप्तिके समय जो यह हृदयके भीतर आकाश अर्थात् विज्ञानमय-का स्वस्वरूप निरुपाधिक परमात्मा ही है, उस अपने स्वरूपभूत परमा-त्माकाशमें यह शयन करता है । ' चतुर्थं प्रपाठकमें ' उस समय यह कहाँ था? ' इस प्रश्न के उत्तररूप-से इसकी व्याख्या की जा चुकी है । वही ब्रह्मा एवं इन्द्रादि सबका वशी है; सभी इसके वशमें रहते हैं । [ हे गागि 1 ] " इस अक्षरके ही प्रशासन में " ऐसा कहा भी है । केवल वशी ही नहीं, ब्रह्मा एवं इन्द्रादि सबका ईशान — ईशन अर्थात् शासन करनेवाला भी है । ईशितृत्व