बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1091–1100
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100
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[ अध्याय 8 पुण्य पापके त्याग-दिया गया है । " जो आशाओंसे रहित, -मस्कार और स्तुति ला, निषिद्धाचरण-क्षीणकर्मा है, उसे ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते ताका ऐसा कोई जैसे कि एकता, शील, स्थिति, वा और विभिन्न से निवृत्त होना तियोंसे भी यही ' यह ब्रह्मवेत्ता की जो कर्मसे न तो ती ही है ' इस नोजन के अभाव में अतः इस प्रकार त, दान्त [ उपरत द वाक्यसे सम्पूर्ण तका उपदेश दिया हां जिस प्रकार गयी है, वही रूप है । वेत्ता उस मार्ग से कर्मा और तैजस यह ब्रह्मवेत्ताकी कृत् और तेजस न रहता है - यह ; अतः लोकमें ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७७ ताभ्यामतो ब्रह्मवित् स्तूयते प्र- प्रख्यात महाभाग्यशाली होने के कारण इन दोनों विशेषणोंसे ब्रह्म-ख्यातमहाभाग्यत्वाल्लोके || ९ || | वेत्ताकी स्तुति की जाती है ॥९ ॥
विद्या और विद्यारत पुरुषोंकी गति
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥ १० ॥
जो अविद्या ( कर्म ) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानसंज्ञक अन्ध-कारमें प्रवेश करते हैं और जो विद्या ( कर्मकाण्डरूप त्रयीविद्या ) में रत हैं, वे उनसे भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥
अन्धम् अदर्शनात्मकं तमः संसार नियामकं प्रविशन्ति प्रति-पद्यन्ते के? ये विद्यां विद्या-तोऽन्यां साध्यसाधनलक्षणाम् उपासते, कर्म अनुवर्तन्त इत्यर्थः । ततस्तस्मादपि भूय इव बहुतर-मित्र तमः प्रविशन्ति के १ ये उ विद्यायाम्, अविद्यावस्तुप्रति पादिकायां कर्मार्थायां त्रय्यामेव विद्यायाम्, रता अभिरताः । विधिप्रतिषेधपर एव वेदः, नान्योऽस्ति इति, उपनिषदर्था नपेक्षिण इत्यर्थः ॥ १० ॥
अन्ध अर्थात् संसारके नियामक अदर्शनात्मक ( अज्ञानरूप ) अन्ध-कारमें प्रवेश करते हैं; कौन? जो अविद्या - विद्यासे भिन्न साध्य-साधनरूप कर्मकी उपासना अर्थात् अनुगमन करते हैं; और उससे भी भूयः इव - मानो अधिकतर अन्ध-कार में वे प्रवेश करते हैं; कौन? जो विद्यामें अर्थात् अविद्यारूप वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली कर्मार्था त्रयीविद्यामें रत यानी अभिनिविष्ट हैं अर्थात् जो ऐसा समझकर कि वेद तो विधि - प्रति-बेधपरक ही है, उससे भिन्न नहीं है, उपनिषदर्थं की उपेक्षा करनेवाले हैं ॥ १० ॥
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१०७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन यदि ते प्रदर्शनलक्षणं तमः यदि वे अदर्शनात्मक अन्ध-प्रविशन्ति, को दोषः १ इत्यु- कार में प्रवेश करते हैं तो दोष क्या च्यते-- है? यह बतलाया जाता है-अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । ताँ स्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्य विद्वाँसो बुधो जना: ११ वे अनन्द ( असुख ) नामके लोक अन्धतमसे व्याप्त हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥
अनन्दा अनानन्दा असुखा नाम ते लोकाः, तेन अन्धेना-दर्शनलक्षणेन तमसा भावृता व्याप्ताः – ते तस्याज्ञानतमसो गोचराः । तान् ते प्रेत्य मृत्वा अभिगच्छन्ति अभियान्ति; के? ये अविद्वांसः किं सामान्येन श्रविद्वत्तामात्रेण १ नेत्युच्यते - । अबुधः, बुधेः अवगमनार्थस्य धातोः क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपम्, श्रात्मावगमवर्जिता इत्यर्थः; ।
जना: प्राकृता एव जननधर्माणो ।
वा इत्येतत् ॥। ११ ॥
अनन्द- द - अनानन्द अर्थात् असुख नामके वे लोक उस अन्ध - अदर्शन- ia रूप अन्धकारसे आवृत — व्याप्त हैं; अर्थात् वे उस अज्ञानान्धकारके विषय हैं । उन्हें वे मरकर प्राप्त होते हैं; कौन? जो अविद्वान् हैं; क्या सामान्य अविद्वत्तामात्र से ही उन्हें प्राप्त होते हैं ॥ नहीं; यह बतलाया जाता है— जो अबुध हैं, यह अवगत्यर्थक दुष् धातुका क्विप्-प्रत्ययान्तरूप है, अर्थात् जो आत्म-ज्ञानसे रहित हैं वे जनाः — उपर्युक्त प्राकृत लोक ही अथवा जननधर्मी [ मनुष्यादि ही उन लोकोंको प्राप्त होते हैं ] ॥ ११ ॥
श्रात्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति..
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १२ ॥
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[ अध्याय ४ का वर्णन नदर्शनात्मक अन्ध-हैं तो दोष क्या जाता है-वृताः । बुधो जना: ११ प्त हैं; वे अविद्वान् नन्द अर्थात् असुख उस अन्ध - अदर्शन-आवृत - व्याप्त हैं; अज्ञानान्धकारके वे मरकर प्राप्त जो अविद्वान् है; नविद्वत्तामात्र से ही हैं । नहीं; यह हे – जो अबुध हैं, बुध् धातुका क्विप्-अर्थात् जो आत्म-वे जना: - उपर्युक्त अथवा जननधर्मी उन लोकोंको प्राप्त 11
पूरुषः ।
ज्वरेत् ॥ १२ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७ ९ यदि पुरुष आत्माको ' मैं यह हूँ ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे संतप्त हो? ॥ १२ ॥
आत्मानं स्वं परं सर्वप्राणि-मनीषितज्ञं हृत्स्थमशनायादिधर्मा -तीतम्, चेद् यदि, विजानीयात्! सहस्रेषु कश्चित् चेदिति आत्म-विद्याया दुर्लभत्वं दर्शयति कथम्? अयं पर आत्मा सर्व-प्राणिप्रत्ययसाक्षी, यो नेति नेतीत्याद्युक्तः, यम्मान्नान्योऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, समः सर्वभूतस्थो नित्यशुद्धबुद्धमुक्त स्वभावः - अस्मि भवामि — इति; पूरुषः पुरुषः, स किमिच्छन्– तत्स्वरूपव्यतिरिक्तम् अन्यद्वस्तु फलभूतं किमिच्छन् कस्य वा अन्यस्य श्रात्मनो व्यतिरिक्तस्य कामाय प्रयोजनाय; न हि तस्य आत्मन एष्टव्यं फलं न चाप्यात्मनोऽन्यः अस्ति, यस्य । यदि सहस्रोंमें कोई एक आत्मा-को-- अपने परस्वरूपको – सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिवृत्तिको जाननेवाले. हृदयस्थ और क्षुधादि धर्मोसे अतीत आत्माको विशेषरूप से जान जाय, ' चेत् ' इस निपातसे श्रुति आत्म-विद्याकी दुर्लभता प्रकट करती है, किस प्रकार जान जाय? यह पर आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रत्ययों ( ज्ञानों ) का साक्षी, जो ' नेति नेति ' इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा गया है, जिससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है तथा सम, सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और नित्य - शुद्ध - बुद्ध - मुक्त-स्वरूप है, वह मैं हूँ -- इस प्रकार जो पुरुष [ जान जाय ] वह क्या इच्छा करता हुआ -- उस अपने स्त्ररूपके अतिरिक्त किस दूसरी फलभूत वस्तुकी इच्छा करता हुआ अथवा किस आत्मासे भिन्न वस्तुकी कामना अर्थात् प्रयोजनके लिये क्योंकि उस आत्मा के लिये. कोई इच्छा करनेयोग्य फल है ही नहीं और न आत्मासे भिन्न कोई अन्य पदार्थ ही है, जिसकी
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१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय कामाय इच्छति, सर्वस्य आत्म-भूतत्वात्; अतः किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्, भ्रंशेत्, शरीरोपाधिकृत दुःखमनु दुःखी स्थात्, शरीरतापमनु-तप्येत । अनात्मदर्शिनो हि तद् व्यति-रिक्त वस्त्वन्तरेऽसोः । ' ममेदं स्यात्, पुत्रस्य इदम, भार्याया इदम् ' इत्येवमीहमानः पुनः पुनर्जननमरणप्रबन्धरूढः शरीर-रोगमनु रुज्यते, सर्वात्मदर्शिनस्तु तदसम्भव इत्येतदाह ॥ १२ ॥ ।
४ | कामना से वह इच्छा करे, क्योंकि वह तो सबका आत्मस्वरूप हो जाता है । अतः वह क्या इच्छा | करता हुआ और किस कामना के लिये शरीर के पीछे संतप्त - भ्रष्ट हो? अर्थात् शरीररूप उपाधिके दुःखके पीछे दुःखी हो – शरीरके तापसे अनुतप्त हो । जो शरीरादि अनात्मोंमें आत्म-बुद्धि करनेवाला है, आत्मासे भिन्न वस्तुकी इच्छा करनेवाले उस अनात्मज्ञको ही वह ( अनुताप ) [ हो सकता है ] । ' मुझे यह मिल जाय, पुत्रको यह मिल जाय, पत्नीको यह हो जाय ' इस प्रकार इच्छा करता हुआ वह पुनः पुनः जन्म - मरणपरम्परामें पड़ा रहकर शरीरके रोगके पीछे रोगी होता है । किंतु सर्वात्मदर्शीको ऐसा होना असम्भव है — यही बात श्रुति यहाँ बतलाती है ॥ १२ ॥
आत्माका महत्त्व किं च- 1 इसके सिवा-यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेह्ये गहने प्रविष्टः । स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥
इस अनेकों अनर्थोंसे पूर्ण और विवेक विज्ञानके विरोधी विषम
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[ अध्याय ४ इच्छा करे, क्योंकि का आत्मस्वरूपहो नः वह क्या इच्छा और किस कामना के पीछे संतप्त - भ्रष्ट शरीररूप उपाधिके दुःखी हो - शरीरके हो । -दि अनात्मों में आत्म-ला है, आत्मासे - इच्छा करनेवाले ही वह ( अनुताप ) ] । ' मुझे यह मिल यह मिल जाय, जाय ' इस प्रकार हुआ वह पुनः पुनः रामें पड़ा रहकर - पीछे रोगी होता दर्शीको ऐसा होना ही बात श्रुति यहाँ ३२ ॥ स्मन् संदेह्ये व्य कर्ता तस्य - विरोधी विषम ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१ शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा जिस ब्राह्मणको प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही विश्वकृत् ( कृतकृत्य ) है । वही और स्वयं वही लोक भी है ॥ १३ ॥
यस्य ब्राह्मणस्य, अनुवित्त: -अनुलब्धः, प्रतिबुद्धः साक्षात्कृतः, कथम् १ श्रहमस्मि परं ब्रह्मेत्येवं प्रत्यगात्मत्वेनावगतः; आत्मा अस्मिन् संदेह्ये संदेहे - अने-कानर्थसंकटोपचये, गहने बिषसे अनेकशतसहस्रविवेकविज्ञान-प्रतिपक्षे विषमे प्रविष्टः स यस्य ब्राह्मणस्यानुवित्तः प्रतिबोघे-नेत्यर्थः स विश्वद् विश्वस्य कर्ता कथं विश्वम् तस्य किं विश्वकृदिति नाम इत्याशङ्-क्याह - स हि यस्मात् सर्वस्य कर्ता, न नाममात्रम्; न केवलं विश्वकृत् परप्रयुक्तः सन् किं तहिं? तस्य लोकः सर्वः; किमन्यो लोकः, अन्योऽसौ? इत्युच्यते-स उ लोक एव; लोकशब्देन । सबका कर्ता है, उसीका लोक है जिस ब्राह्मणको आत्मा अनु-वित्त अनुलब्ध और प्रतिबुद्ध - साक्षा-त्कृत है, किस प्रकार -- ' मैं परब्रह्म हूँ ' इस प्रकार प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञात है; इस संदेह्य – संदेह अर्थात् अनेकों अनर्थं - समूहोंके पुञ्ज और गहन - विषम यानी विवेक - विज्ञान-के अनेकों शतसहस्र प्रतिपक्षों के कारण विषमस्थान में प्रविष्ट हुआ जो आत्मा है, वह जिस ब्राह्मणको प्रतिबोध - साक्षात्कार के द्वारा उप-लब्ध है - ऐसा इसका तात्पर्य है, वह विश्वकृत् — विश्वका कर्ता ( रचनेवाला ) है । उसका विश्वकर्तृत्व किस प्रकार है, क्या ' विश्वकृत् ' यह उसका नाम है? ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है -- क्योंकि वही सबका कर्ता है, यह केवल उसका नाम ही नहीं है । वह किसी अन्य द्वारा प्रेरित होनेसे विश्वकृत् नहीं है; तो फिर क्या बात है? उसीका सारा लोक है । तो क्या लोक दूसरा है और वह दूसरा है? -- इसपर कहा जाता है - वही लोक भी है । यहाँ
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१०८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ श्रात्मा उच्यते; तस्य सर्व आत्मा, स च सर्वस्यात्मेत्यर्थः । य एष ब्राह्मणेन प्रत्यगात्मा प्रतिबुद्धतया अनुवित्त आत्मा अनर्थसंकटे गहने प्रविष्टः स न संसारी, किंतु पर एव यस्मादू विश्वस्य कर्ता सर्वस्य आत्मा, तस्य च सर्व आत्मा । ' एक एवाद्वितीयः पर एवास्मि ' इत्यनुसंघातव्य इति श्लोका-र्थः ॥ १३ ॥
आत्मज्ञानके बिना किं च-' लोक ' शब्दसे आत्मा कहा गया बा है । तात्पर्य यह है कि सब आत्मा उसके हैं और वह सबका आत्मा है । त आत्मा अनर्थपूर्ण और गहन-शरीरमें प्रविष्ट है - इस प्रकार ब्र इस प्रत्यगात्माको ब्राह्मणने साक्षा-त्कारके द्वारा उपलब्ध कर लिया वे है, वह संसारी जीव नहीं है, अपि व तु पर ही है; क्योंकि वह विश्वका कर्ता है, सबका आत्मा है और उसीके सब आत्मा हैं । इस मन्त्रका म तात्पर्य यह है कि मैं एकमात्र म अद्वितीय परात्मा ही हूँ ' – ऐसा श अनुसन्धान करना चाहिये ॥ १३ । वि होनेवाली दुर्गति ब्र तथा- झ इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदद्वेदिर्महती विनंष्टिः । ए ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥१४ १४ । f हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [ तो कृतार्थं हो त गये ] यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है 1 । जो उसे जान लेते हैं, वे व अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥
इहैव — अनेकानर्थसंकुले सन्तो यहीं - इस अनेकों अनर्थपूर्ण प भवन्तः, अज्ञानदीर्घ निद्रामोहिताः शरीरमें अज्ञानरूप रहते हुए हो अर्थात् दीर्घ निद्रा मोह सन्तः, कथंचिदिव ब्रह्मतन्त्रम् रहते हुए ही किसी प्रकार f आत्मत्वेन अथ विद्मो विजानीमः, प्राप्त यदि हम इस उस ब्रह्मको ब्रह्मतत्त्वको - प्रकरण-आत्मभावसे
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[ श्रध्याय ४ आत्मा कहा गया है कि सब आत्मा ह सबका आत्मा है । पूर्ण और गहन-है - इस प्रकार जिस को ब्राह्मणने साक्षा-उपलब्ध कर लिया जीव नहीं है, अपि योंकि वह विश्वका आत्मा है और = मा हैं । इस मन्त्रका - मैं एकमात्र मा ही हूँ ' - ऐसा ना चाहिये ॥ १३ ॥
ति
हती विनंष्टिः ।
पियन्ति ॥१४ ॥
-हैं [ तो कृतार्थं हो उसे जान लेते हैं, वे म होते हैं ॥ १४ ॥
अनेकों अनर्थपूर्ण हुए हो अर्थात् र्च निद्रासे मोहित किसी प्रकार ह्मतत्त्वको - प्रकरण-को आत्मभावसे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३ तदेतद् ब्रह्म प्रकृतम्, अहो वयं । कुतार्था इत्यभिप्रायः । यदेतद् ब्रह्म विजानीमः, तद् न चेद् विदितवन्तो वयम् वेदनं वेदः, वेदोऽस्यास्तीति वेदी, वेद्येव वेदिः, न वेदिः अवेदिः, ततः अहम् अवेदिः स्याम् । यदि वेदिः ६: स्याम्, को दोषः स्यात्? महती अनन्तपरिमाणा जन्म मरणादिलक्षणा विनष्टिः - विन-शनम् । श्रहो वयमस्मान्महतो विनाशाद् निर्मुक्ताः, यदद्वयं ब्रह्मविदितवन्त इत्यर्थः । यथा च वयं ब्रह्म विदित्वा अस्माद् विनशनाद् विप्रमुक्ताः, एवं ये तद्विदुः, अमृतास्ते भव-न्ति; ये पुनः नैवं ब्रह्म विदुः, ते इतरे ब्रह्मविद्धयोऽन्ये ब्रह्म-विद इत्यर्थः दुःखमेव जन्ममर-णादिलक्षणमेव पियन्ति प्रति-पद्यन्ते न कदाचिदप्य विदुषां ततो विनिवृत्तिरित्यर्थः; दुःख-मेव हि ते आत्मत्वेनोपगच्छ-न्ति ॥ १४ ॥
जान लें तब तो अहो! हम कृतार्थं हो गये - ऐसा इसका अभिप्राय है । हम जिस इस ब्रह्मको जानते है; यदि उसे हमने न जाना होता, ' वेद ' का अर्थं वेदन है, जिसे वेद ( ज्ञान ) है, उसे वेदी कहते हैं, वेदीको ही ' वेदि ' कहा गया है, जो वेदि न हो वह ' अवेदि ' है, - तो इससे मैं अवेदि हो जाता । यदि मैं ' अवेदि ' हो जाता तो क्या दोष होता? महती - जन्म - मरणादिरूप अनन्त परिमाणवाली विनष्टि--क्षति होती । तात्पर्य यह है कि हमने जो अद्वय ब्रह्मतत्त्वको जान लिया है, इससे अहो! हम महान् विनाशसे मुक्त हो गये हैं । जिस प्रकार ब्रह्मको जानकर हम इस विनाशसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त हो गये हैं, इसी प्रकार जो उसे जानते हैं, वे अमृत हो जाते हैं । किंतु जो उसे इस प्रकार नहीं जानते, वे इतर - - ब्रह्मवेत्ताओंसे भिन्न अन्य लोग अर्थात् अब्रह्मवेत्ता जन्म - मरणादिरूप दुःखको ही प्राप्त होते हैं । तात्पर्य यह है कि अज्ञा--नियोंकी उससे कभी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वे दुःखको ही ( दुःख-मय शरीरको ही ) आत्मभावसेः ग्रहण करते हैं ॥ १४ ॥
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१०८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ ब्रा प्रभेददर्शी आत्मज्ञकी निर्भयता 20 स यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते पश ॥१५ ॥
जब भूत और भविष्य के स्वामी इस प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता ॥ यदा पुनरेतमात्मानम्, कथं-चित् परमकारुणिकं कंचिदा-चार्य प्राप्य ततो लब्धप्रसादः सन्, अनु पश्चात् पश्यति साक्षा-त्करोति स्वमात्मानम्, देवं द्योतनवन्तं दातारं वा सर्व प्राणिकर्मफलानां यथाकर्मानु रूपम्, अञ्जसा साक्षात्, ईशानं स्वामिनं भूतभव्यस्य कालत्रय-स्येत्येतत् —न ततस्तस्मादीशा-नाद् देवादात्मानं विशेषेण जुगुप्सते गोपायितुमिच्छति । सर्वो हि लोक ईश्वराद् गुप्ति-मिच्छति भेददर्शी; अयं त्वेक--स्वदर्शी न बिभेति कुतश्चन; श्रतो | न तदा विजुगुप्मते, यदा ईशानं ' देवमञ्जसा आत्मत्वेन पश्यति । न तदा निन्दति वा जान लेता है तो यह उससे अपनी १५ ॥ किंतु जिस समय मनुष्य किसी रा | प्रकार किसी परम करुणामय त आचार्यके पास पहुँचकर उससे प्रसाद पाकर फिर इस आत्माको लग देख लेता है अर्थात् इस देव– देव द्योतनवान् अथवा कर्मोंके अनुसार प्राणियोंके सम्पूर्णं कर्मफलोंको देने- यस वाले तथा भूत - भविष्यत् आदि त्स तीनों कालोंके स्वामी अपने मत आत्माका साक्षात्कार कर लेता है, च्हि उसे अञ्जसा - साक्षात् जान लेता अ है; तो उस ईशानदेवसे अपनेको रात्र विशेषरूपसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा ज्य नहीं करता । म भेददर्शी सभी लोग ईश्वरसे पार अपनी रक्षा चाहते हैं; किंतु यह FRE अभेददर्शी किसीसे नहीं डरता; ज्य इसलिये जब यह ईशान देवको साक्षात् आत्मरूपसे देखता है तो अपनेको सुरक्षित रखने- आ की इच्छा नहीं करता अथवा ज्य ' न विजुगुप्सते ' - – उस समय किसी-कंचित्, | की निन्दा नहीं करता, क्योंकि
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[ अध्याय४ ता नञ्जसा । जुगुप्सते ॥ १५ ॥
शमान अथवा कर्म-तो यह उससे अपनी स समय मनुष्य किसी परम करुणामय नास पहुँचकर उससे फिर इस आत्माको अर्थात् इस देव-थवा कर्मों के अनुसार पूर्ण कर्मफलों को देने-भूत - भविष्यत् आदि के स्वामी अपने सत्कार कर लेता है, - साक्षात् जान लेता ईशान देवसे अपनेको रक्षित रखनेकी इच्छा सभी लोग ईश्वरसे चाहते हैं; किंतु यह सीसे नहीं डरता; यह ईशान देवको मरूपसे देखता है सुरक्षित रखने-ह्रीं करता अथवा -उस समय किसी-ह्रीं करता, क्योंकि ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८५ सर्वम् श्रात्मानं हि पश्यति, स एवं सबको अपना आत्मा BABAL ही देखता है । जो इस प्रकार देखनेवाला है, वह
पश्यन् कमसौ निन्द्यात् १ ॥ १५ ॥ । किसकी निन्दा करे? ॥ १५ ॥
देवोंद्वारा उपास्य ग्रायुसंज्ञक ब्रह्म
किं च- तथा-यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥१६ ॥
जिसके नीचे संवत्सर चक्र अहोरात्रादि अवयवोंके सहित चक्कर लगाता रहता है, उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण ' आयु ' इस प्रकार उपासना करते हैं ॥ १६ ॥
यस्मादीशानाद् अर्वाक, । यस्मादन्यविषय एवेत्यर्थः, संब-त्सरः कालात्मा सर्वस्य जनि-मतः परिच्छेत्ता, यम् अपरि-च्छिन्दन् श्रर्वागेव वर्तते अहोभिः स्वावयवैः - अहो -रात्रैरित्यर्थः; तद् ज्योतिषां ज्योतिः - आदित्यादिज्योतिषा -मध्यवभासकत्वात् श्रायुरित्यु-पासते देवाः, अमृतं ज्योतिः-अतोऽन्यद् म्रियते, न हि ज्योतिः । सर्वस्य हि एतज्ज्योतिः आयुः; आयुर्गुणेन यस्माद् देवास्तद्-ज्योतिरुपासते, तस्मादायुष्म- । जिस ईशानसे अर्वाक् अर्थात् जिससे दूसरे ही विषयवाला संव-त्सर कालात्मा -- जो सम्पूर्णं उत्पन्न होनेवालोंका परिच्छेद करनेवाला है, उस ( ईशान ) का परिच्छेद न करता हुआ ' अहोभिः ' अर्थात् अपने अवयव अहोरात्र के द्वारा उससे नीचे ही रहता है, आदि-त्यादि ज्योतियोंके भी प्रकाशक होनेके कारण उस ज्योतियों के ज्योतिकी देवगण ' आयु ' इस प्रकार उपासना करते हैं । वह अमृत ज्योति है, उससे अन्य ज्योति मरती है, परन्तु यह ज्योति नहीं मरती । यह ज्योति सभीकी आयु है । क्योंकि देवगण इस ज्योतिकी आयुरूप गुणके कारण उपासना करते हैं, इसलिये वे आयुष्मान् होते
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१०८६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ न्तस्ते । तस्मादायुष्कामेन आयु- । है आयुकी | अतः यह है कि जिसे इच्छा हो वह ब्रह्म आयुरूप गुणके द्वारा उपासना -र्गुणेनोपास्यं ब्रह्मेत्यर्थः ॥ १६॥ । करे ॥ १६ ॥
सर्वाधारभूत ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ किं च- तथा-यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥
जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥
यस्मिन् यत्र ब्रह्मणि, पञ्च पञ्चजना: - गन्धर्वादयः पञ्चैव - संख्याता गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसि - निषादपञ्चमा वा वर्णाः; आकाशच अव्याकृता-ख्यः– 1 यस्मिन् सूत्रम् तं च प्रोतं च - यस्मिन् प्रतिष्ठितः; " एतस्मिन् नु खल्वक्षरे गार्ग्य “ काशः ” ( ३ । ८ । ११ ) इत्यु-क्तम्; तमेव आत्मानम् अमृतं ब्रह्म मन्ये अहम्, न चाहमा-- त्मानं ततोऽन्यत्वेन जाने । किं तर्हि १ अमृतोऽहं ब्रह्म विद्वान् · सन्; अज्ञानमात्रेण तु मत्र्योऽ--हमासम्; तदपगमाद् विद्वानहम-मृत एव ॥ १७ ॥
मानता हूँ । उस ब्रह्मको जाननेवाला जिसमें — जिस ब्रह्ममें पांच पञ्चजन - गन्धर्वादि, क्योंकि गंधर्व पितर, देव, असुर और राक्षस- इस प्रकार वे पाँच ही गिने गये हैं, अथवा निषाद जिनमें पाँचवां है, S वे ब्राह्मणादि वर्णं तथा अव्याकृत-संज्ञक आकाश, जिसके विषय में ' जिसमें सूत्र ओतप्रोत है ' ऐसा कहा गया है, ये सब जिसमें प्रतिष्ठित हैं, " हे गागि! इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है " ऐसा पहले कहा भी गया है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ, उससे भिन्नरूपसे मैं आत्माको नहीं जानता । तो फिर क्या हुआ? -उस ब्रह्मको जाननेवाला होनेसे में अमृत हूँ, मैं अज्ञानमात्रसे ही मरण-धर्मा था, उसकी निवृत्ति हो जानेसे मैं ब्रह्मवेत्ता अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥