बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1121–1130

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130

पृष्ठ 1121

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[ श्रध्याय४ लोककेइच्छुक ही हैं ऐसा ? इसमें श्रुति हेतु दिखलाती वै तत्'- -उस रण बतलाया है कि पूर्व विद्वान् आत्मज्ञ ब्रह्मविद्याकी 7 ] –'प्रजाम् ' क, पितृलोक तीनों लोकों के नको ' प्रजा ' या है, निर्देश. प्रजाका क्या कामना नहीं लोकत्रय अनुष्ठान नहीं ब्रह्मोपासना-ही हैं, क्योंकि होता है । क्योंकि उस-ना गया है । अथक् जानता त कर देता आत्मासे सर्व उसको - इस प्रकार नका भी है; क्योंकि ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्मणोऽपि सर्वमध्यान्तर्भावात् " यत्र नान्यत्पश्यति " ( छा ० उ ० ७ | २८ ) इति च पूर्वा-परबाह्यान्तरदर्शनप्रतिषेधाच्च " अपूर्वमन परमनन्तर म बाह्यम् ” ( वृ ० उ ० २ । ५ । १ ९ ) इति, “ तत्केन कं पश्येत् " विजानीयात् " ( वृ ० उ ० २ । ४ । १४ ) इति च; तस्मान्न आत्मदर्शन व्यतिरेकेण अन्यद् व्युत्थानकारणमपेक्षते । कः पुनस्तेषामभिप्रायः १ इत्युच्यते - किं प्रयोजनं फलं साध्यं करिष्यामः प्रजया साध-नेन प्रजा हि बाह्यलोकसाधनं निर्माता; स च बाह्यलोको नास्त्यस्माकमात्मव्यतिरिक्तः; सर्वं हि श्रस्माकमात्मभूतमेव, सर्वस्य च वयम्रात्मभूताः । आत्मा च नः आत्मत्वादेव न केनचित् साधनेनोत्पाद्य आयो विकार्यः संस्कार्यो वा । ११०७ | अपरब्रह्मका भी सर्वके भीतर ही अन्तर्भाव है । " जहाँ अन्यको नहीं देखता " ऐसा भी कहा ही है । तथा " ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर और अवाह्य है " इस प्रकार ब्रह्म में पूर्व, अपर, बाह्य एवं अन्तर दृष्टि-योंका भी प्रतिषेध किया ही है । और " उस समय किसके द्वारा किसे जाते? " ऐसा भी कहा ही है | अतः आत्मदर्शनके सिवा ब्यु-स्थानके किसी अन्य कारणकी अपेक्षा नहीं है | तो फिर [ व्युत्थान करनेमें ] उनका क्या अभिप्राय होता है? सो ' वतलाया जाता है । हम प्रजा-रूप साधनसे किस प्रयोजन – फल अर्थात् साध्यका सम्पादन करेंगे? प्रजा तो वाह्यलोकका साधन समझी गयी है और वह बाह्यलोक हमारे लिये आत्मासे भिन्न नहीं है; हमारे लिये तो सब आत्मस्व-रूप ही है और हम भी सबके आत्मस्वरूप ही हैं तथा आत्मा भी आत्मा कारण ही किसी साधनसे उत्पाद्य, आप्य, विकार्यं अथवा संस्कार्यं नहीं है ।

पृष्ठ 1122

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११०८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 यदप्यात्मयाजिनः संस्कारार्थं कर्मेति, तदपि कार्यकरणात्म -दर्शनविषयमेव, इदं मे अनेन अङ्गं संस्क्रियते — इत्यङ्गाङ्गि-स्वादिश्रवणात्; न हि विज्ञान घनैकरसनैरन्तर्यदर्शिनोऽङ्गाङ्गि-संस्कारोपधानदर्शनं संभवति । तस्मान्न किञ्चित् प्रजादिसाधनैः करिष्यामः श्रविदुषां हि तत् प्रजादिसाधनैः कर्तव्यं फलम्; न हि मृगतृष्णिकायामुदकपानाय तदुदकदर्शी प्रवृत्त इति तत्र । ऊपरमात्रमुदकाभावं पश्यतोऽपि प्रवृत्तिर्युक्ताः एवमस्माकमपि परमार्थात्मलोकदर्शिनां प्रजादि-साधनसाध्ये मृगतृष्णिकादिसमे- । ऽविद्वद्दर्शनविषये न प्रवृत्तिर्युक्ते-त्यभिप्रायः । और ऐसा जो कहा है कि कर्म आत्मयाजीके संस्कारके लिये है, वह भी देह और इन्द्रियोंमें आत्म-बुद्धि करनेको लक्ष्य करके ही है; क्योंकि इसके द्वारा मेरे इस अङ्गका संस्कार होता है - इस प्रकार श्रुतिसे उसमें अङ्गाङ्गित्व - भाव ज्ञात होता है । जो निरन्तर एक विज्ञा-नघनरसस्वरूपको ही देखता है, उसके लिये अङ्गाङ्गिसंस्कारोंका अवलम्ब देखना सम्भव नहीं है, इसलिये प्रजादि साधनों से हम कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध करेंगे । जो अविद्वान् हैं, उन्हें ही उन प्रजादि साधनोंसे फल प्राप्त करना है । मृगतृष्णा में जल देखनेवाला जल-पानके लिये उसकी ओर जाता है, इसलिये उसे ऊसरमात्र और उसमें जलका अभाव देखनेवाले की भी प्रवृत्ति होनी ही चाहिये – ऐसी बात नहीं है । इसलिये जो अज्ञा-नियोंकी दृष्टिका विषय और मृग-तृष्णादिके समान है, उस प्रजादि-साघन से साध्य फल में हम परमार्थ आत्मलोकदर्शियोंकी भी प्रवृत्ति होनी उचित नहीं है - ऐसा इसका अभिप्राय है । इ ड प

पृष्ठ 1123

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- अध्याय 8 20 हा है कि कर्म के लिये है, योंमें आत्म-करके ही है; इस अङ्गका - इस प्रकार -व - भाव ज्ञात र एक विज्ञा-देखता है, संस्कारोंका भव नहीं है, से हम कोई करेंगे । जो उन प्रजादि करना है । नेवाला जल-ओर जाता रमात्र और देखनेवाले की हिये- ऐसी ये जो अज्ञा-य और मृग-उस प्रजादि-हम परमार्थं भी प्रवृत्ति -ऐसा इसका ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं तदेतदुच्यते येषामस्माकं परमार्थदर्शिनां नः, अयमात्मा अशनायादिविनिर्मुक्तः साध्व-साधुभ्यामविकार्योऽयं लोक: फलमभिप्रेतम्; न चास्यात्मनः साध्यसाधनादिसर्व संसारधर्मवि-निर्मुक्तस्य साधनं किञ्चिदेषि -तव्यस्; साध्यस्य हि साधना-न्वेषणा क्रियते; असाध्यस्य साध-नान्वेषणायां हि, जलबुद्धया | स्थल इव तरणं कृतं स्यात्, खे । वा शाकुन पदान्वेषणम् । तस्मा-देतमात्मानं विदित्वा प्रव्रजेयुरेव ब्राह्मणाः, न कर्म भारमेरनि-त्यर्थः; यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एवं विद्वांसः प्रजामकामयमानाः । त एवं साध्यसाधनसंव्यवहारं निन्दन्तः ' विद्वद्विषयोऽयम् ' इति कृत्वा, किं कृतवन्तः १ इत्युच्यते- ' ते ह स्म किल । पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोक-पणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्य चरन्ति ' इत्यादि व्याख्यातम् । ११० ९ वही बात यहाँ बतलायी जाती है - जिन हम परमार्थदर्शियोंको यह क्षुधादिधर्मसे रहित तथा शुभा-शुभ कर्मसे अविकार्यं आत्मलोक-रूप फल अभिप्रेत है; साध्यसाध-नादि सम्पूर्ण संसारधर्मोसे रहित इस आत्माको किसी भी साधनकी अपेक्षा नहीं है; जो साध्य होता है, उसीके साधनकी खोज की जाती है, असाध्य साधनकी खोज करनेमें तो मानो जलबुद्धिसे स्थल में तैरना है अथवा आकाशमें पक्षीके पदोंकी खोज करना है । अत: इस आत्माको जानकर ब्राह्मणलोग सब कुछ त्याग कर चले जायँ ( संन्यासी हो जायँ ), किसी कर्म-का आरम्भ न करें - ऐसा इसका तात्पर्य है; क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले पूर्ववर्ती ब्राह्मण भी प्रजाकी इच्छा करनेवाले नहीं थे । वे इस प्रकार साध्यसाधनरूप व्यवहारकी निन्दा करते हुए ' यह सब अज्ञानियोंका विषय है ' ऐसा सोचकर, क्या करते थे? सो बत-लाया जाता है— ' वे निश्चय हो पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकैषणा-पृथक् होकर भिक्षाचर्या करते थे, इस प्रकार इसकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है ।

पृष्ठ 1124

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१११० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्मादात्मानं लोकमिच्छन्तः इसलिये आत्मलोकको इच्छा करनेवाले प्रव्रजन करें - संन्यासी प्रव्रजन्ति प्रव्रजेयुः - इत्येष विधि- हो जायँ — इस प्रकार यह विधि रर्थवादेन संगच्छते; न हि सार्थ - अर्थवादसे संगत होती है । इस वादस्य अस्य लोकस्तुत्या-भिमुख्यमुपपद्यतेः प्रव्रजन्तीत्य-स्यार्थवादरूपो हि ' एतद्ध स्म ' इत्यादिरुत्तरो ग्रन्थः । अर्थवाद -खेत, नार्थवादान्तरमपेक्षेत; अपेक्षते तु ‘ एतद्ध स्म ' इत्याद्यर्थ-वादं ' प्रव्रजन्ति ' इत्येतत् । यस्मात् पूर्वे विद्वांसः प्रजादि-कर्मभ्यो निवृत्ताः प्रब्रजितवन्त एव, तस्मादधुनातना अपि प्रत्रजन्ति प्रव्रजेयुः - — इत्येवं संबध्यमानं न लोकस्तुत्यभिमुखं भवितुमर्हति; विज्ञानसमानकर्तृक-स्वोपदेशादित्यादिना श्रवोचाम । वेदानुवचनादिसहपाठाच्च, यथात्मवेदनसाधनत्वेन विहि-तानां वेदानुवचनादीनां यथार्थ-स्वमेव, नार्थबादस्त्वम्, तथा तैरेव | अर्थासहित विधि - वायका आत्मलोक की स्तुति के लिये होना सम्भव नहीं है; ' प्रव्रजन्ति ' इस विधि वचनका अर्थवादरूप ' एतद स्म ' इत्यादि आगेका ग्रन्थ है । यदि ' प्रव्रजन्ति ' यह वचन भी अर्थ-वाद ही होता तो इसे दूसरे अर्थ-वादकी अपेक्षा नहीं हो सकती थी । किंतु ' प्रव्रजन्ति ' इस ग्रन्थको ' एतद्ध स्म ' इत्यादि अर्थवादकी अपेक्षा है ही । क्योंकि प्रजादि कर्मोंसे निवृत्त हुए पूर्ववर्ती विद्वान् प्रव्रजित हुए ही थे, इसलिये आधुनिक ब्रह्मवेत्ता भी प्रव्रजन्ति अर्थात् प्रव्रजन ( संन्यास ) करें, इस प्रकार सम्बन्ध रखनेवाला वाक्य आत्मलोकको स्तुति के लिये होना सम्भव नहीं है, क्योंकि विज्ञान और व्युत्थान-का एक ही कर्ता है - ऐसा श्रुतिका उपदेश है— इत्यादि कथनसे हम यह बात पहले कह चुके हैं । वेदानुवचनादिके साथ इसका पाठ होनेसे भी यह स्तुत्यर्थंक नहीं हो सकता; जिस प्रकार आत्मज्ञान के साधनरूपसे विहित बेदानुवचनादि यथार्थ हैं— अर्थवाद नहीं हैं, उसी चा म च हम य ल जह इत जो बो शी सि बो वृत्र

पृष्ठ 1125

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[ अध्याय ४ किकी इच्छा - संन्यासी र यह विधि तो है । इस विका लिये होना जन्ति ' इस दरूप ' एतद्ध ग्रन्थ है । चन भी अर्थ -दूसरे अर्थ-- सकती थी । न्थको ' एतद्ध दकी अपेक्षा से निवृत्त अब्रजित हुए ब्रह्म त् प्रव्रजन कार सम्बन्ध नात्मलोक की सम्भव नहीं र व्युत्थान-ऐसा श्रुतिका कथन से हम हैं । साथ इसका नहीं हो आत्मज्ञान के ज्ञानुवचनादि हीं हैं, उसी ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ सह पठितस्य पारिव्राज्यस्य आत्मलोकप्राप्तिसावनत्वेनार्थ-चादत्वषयुक्तम् । फलविभागोपदेशाच्च; ' एत-मेवात्मानं लोकं विदित्वा इति अन्यस्माद् बाह्याद् लोकादा-त्मानं फलान्तरत्वेन प्रविभजति, यथा “ पुत्रेणैवायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृ-लोक " ( १ । ५ । १६ ) इति । न च प्रव्रजन्तीत्येतत् प्राप्तत्र-ल्लोकस्तुतिपरम्, प्रधानवच्चार्थ ११११ | प्रकार उनके साथ ही पढ़े गये पारिव्राज्य ( संन्यास ) का भी आत्मलोककी प्राप्तिका साघन होने-के कारण अर्थवाद होना उचित नहीं है । फलविभागका उपदेश दिये जानेके कारण भी यह स्तुत्यर्थंक नहीं है । ' इस आत्मलोकको ही जानकर ' इस वाक्यसे श्रुति अन्य लोकोंसे आत्माका फनान्तररूपसे विभाग करती है, जिस प्रकार कि “ यह लोक पुत्रसे ही प्राप्तब्ध है, किसी अन्य कर्मसे नहीं तथा कर्मसे पितृलोक प्राप्तव्य है " इस वाक्य-द्वारा पुत्रादि साधनों का फल -विभाग किया गया है । इसके सिवा प्रमाणान्तरसे प्राप्त [ वायु आदि ] के समान भी ' प्रव्रजन्ति ' यह वाक्य स्तुतिपरक ( अर्थवाद ' ) नहीं हो सकता । तथा । अन्य प्रधान कमोंके समान इसे १. अर्थवाद तीन तरहके होते हैं — गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद । जहाँ अन्य प्रमाणोंसे विरोध हो वह गुणवाद कहलाता है । जैसे ' आदित्यो यूपः ' इत्यादि वाक्य यहाँ यूप ( पशु बाँधने के लिये स्थापित काष्ठ ) को सूर्य कहा है, जो प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध है । इसी प्रकार जो अन्य प्रमाणोंद्वारा ज्ञात अर्थका बोध करानेवाला है, उसे अनुवाद कहते हैं । जैसे ' अग्निहिमस्य भेषजम् ' ( अग्नि शीतको दवा है ) इत्यादि । अग्निसे शीतका कष्ट दूर होना प्रत्यक्ष है । इसके सिवा जो अन्य प्रमाणोंसे न तो ज्ञात हो और न विरुद्ध ही हो, उस अर्थका बोधक वाक्य भूतार्थवाद कहलाता है । जैसे ' इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत् ' ( इन्द्रने वृत्रासुर को मारने के लिये वज्र उठाया ) इत्यादि ।

पृष्ठ 1126

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१११२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ Rene ब्राह वादापेक्षम् सकृच्छ्रत स्थात्ः । अर्थवादकी अपेक्षा भी है । यदि , तस्माद् भ्रान्तिरेवैषा - लोक- । स्तुतिपरमिति । न च अनुष्ठेयेन पारिघ्राज्येन स्तुतिरुपपद्यते । यदि पारिव्राज्य-मनुष्ठेयमपि सदन्यस्तुत्यथ स्यात्, दर्शपूर्णमासादीनाम-प्यनुष्ठेयानां स्तुत्यर्थता स्यात् । न चान्यत्र कर्तव्यतैतस्माद् विष-यान्निर्ज्ञाता, यत इह स्तुत्यर्थो भवेत् । यदि पुनः क्वचिद् विधिः । इसका श्रुतिमें एक ही बार श्रवण होता तो यह अविवक्षित एवं स्तुति-परक माना जाता, पर इसका तो अनेकों बार श्रवण हुआ है । अत: यह आत्मलोककी स्तुति के लिये है - ऐसा विचार भ्रान्ति हो है । अनुष्ठान करने योग्य पारि-व्राज्यसे किसीकी स्तुति नहीं हो सकती । यदि अनुष्ठानके योग्य होकर भी पारिव्राज्य दूसरेकी स्तुति के लिये हो सकता है, तो दर्श - पूर्णमासादि अनुष्ठेय कर्म भी स्तुति के लिये ही सिद्ध होंगे । इस आत्मज्ञानरूप विषयको छोड़कर और कहीं इसकी कर्तव्यता नहीं ज्ञात हुई, जिससे कि यहाँ यह स्तुत्यर्थंक हो । यदि कहीं पारिव्राज्य ' प्रव्रजन्ति ' में किसी भी प्रकारके अर्थवादको सम्भावना नहीं है । इ यहाँ वार - वार समर्थन किया गया है । ' प्रमाणान्तर से प्राप्तके समान ' ऐसा कहकर यहाँ अनुवादरूप अर्थवादका खण्डन किया गया है । जैसे ‘ वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता ' ( वायु शीघ्र चलनेवाला देवता है ) यह एक वाक्य है । वायुका शीघ्रगामो होना प्रत्यक्ष प्रमाणसे सिद्ध है । अतः यह अनुवादमात्र होनेके कारण अर्थवाद है । परंतु उसके समान ‘ प्रव्रजन्ति ' ( संन्यास लेते हैं ) यह वचन किसीकी स्तुति करने. वाला नहीं है; क्योंकि यह अन्य प्रमाणोंते ज्ञात नहीं है । १. इसके सिवा जो प्रधान कर्म होते हैं, उन्हींको फलादिके द्वारा स्तुति का जाती है, वे स्वयं किसीको स्तुति नहीं होते; जैसे दर्श - पूर्णमासादि प्रधान कर्मोको उनके फल स्वर्गप्राप्ति आदिसे स्तुति की जाती है, उसी प्रकार पारिव्राज्य की भी आत्मलोकप्राप्तिद्वारा स्तुति की गयी है और यह स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करता । इससे भी इसका अर्थवाद होना सम्भव नहीं है । परि यद परिव द्यपि कर्तव तस्म शक्य य किम येव ज्येन लोक त्मान आत उत्पा त्वेन और

पृष्ठ 1127

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[ अध्याय४ भी है । यदि ही बार श्रवण क्षत एवं स्तुति-पर इसका तो हुआ है । अत: स्तुति के लिये बात हो है । योग्य पारि-स्तुति नहीं हो ष्ठान योग्य नाज्य दूसरे की सकता है, तो ष्ठे कर्म भी द्ध होंगे । इस नको छोड़कर कर्तव्यता नहीं कि यहाँ यह नहीं पारिव्राज्य हृीं है । इसका न ' ऐसा कहकर - क्षेपिष्ठा देवता ' चामो होना अर्थवाद है । की स्तुति करने. द्वारा स्तुति का प्रधान कर्मों को रिव्राज्य की भी नहीं करता । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ परिकल्प्येत पारिव्राज्यस्य, स इहैव मुख्य नान्यत्र संभवति । यदप्यनधिकृतविषये पारिव्राज्यं परिकल्प्यते, तत्र वृक्षाद्यारोहणा-द्यपि पारिव्राज्यवत् कल्प्येत, कर्तव्यत्वेनानिर्ज्ञातत्वाविशेषात् । तस्मात् स्तुतित्वगन्धोऽप्यत्र न शक्यः कल्पयितुम् । यद्यपमात्मा लोक इष्यते, किमर्थं तत्प्राप्तिसाधनत्वेन कर्मा-ण्येव नारभेरन्. " किं पारित्रा-ज्येनेति? अत्रोच्यते— अस्य आत्म-लोकस्य कर्मभिरसंबन्धात् । यमा-त्मानमिच्छन्तः प्रव्रजेयुः, स आत्मा साधनत्वेन फलत्वेन च उत्पाद्यत्वादिप्रकाराणामन्यतम-त्वेनापि कर्मभिर्न संबध्यते; १. अर्थात् अनधिकारी के लिये न और न वृक्ष आदिपर चढ़ना आदि हो । १११३ | ( संन्यास ) की विधिकी कल्पना की जाय, तो यहीं मुख्य विधि होगी । उसका अन्यत्र होना सम्भव नहीं है । यदि [ कर्मके ] अनधिकारीके विषय में पारिव्राज्य की कल्पना की जाय, तो उसके लिये तो पारि व्राज्यके समान वृक्ष आदिपर चढ़ने आदिकी भी कल्पना की जा सकती है; क्योंकि कर्तव्यरूपसे ज्ञात न होनेमें दोनों समान हैं । ' अतः इस ' वाक्य स्तुतिरूप होनेकी लेशमात्र भी कल्पना नहीं की जा सकती । शङ्का - यदि आत्मरूप लोककी इच्छा की जाती है, तो उसकी प्राप्तिके साधनरूपसे कर्मोंका हो आरम्भ क्यों नहीं करते, पारिव्राज्य-क्या प्रयोजन है? समाधान- इसपर हमारा यह कथन है कि इस आत्मनोकका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध न होनेके कारण इसके लिये कर्मोंका आरम्भ, । नहीं किया जाता है । लोग जिस आत्माकी इच्छा करते हुए संन्यास | करें, उस आत्माका साधनरूपसे, फलरूपसे अथवा उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्यं, विकार्य — इन चार प्रकारों में से किसी भी एक | रूपसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध तो संन्यास ही कर्तव्य बताया गया है

पृष्ठ 1128

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१११४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय तस्मात् ' स एष नेति नेत्यात्माऽ- । गृह्यो न हि गृह्यते ' – इत्यादि-लक्षणः । यस्मादेवंलक्षण आत्मा कर्म-फलसाधनासम्बन्धीसर्वसंसारधर्म -विलक्षणः, अशनायाद्यतीतः, अस्थूलादिधर्मवान्, अजोऽजरो-मरोऽमृतोऽमयः सैन्धवचनवद्- । विज्ञानैकरसस्वभावः स्वयंज्योति रेक एवाद्वयः, अपूर्वोऽनपरो-ऽनन्तरो ऽबाह्यः - इत्येतदागमत-स्तर्कतश्च स्थापितस्, विशेष-1 तश्चेह जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे -ऽस्मिन् तस्मादेवंलक्षणे आत्मनि विदिते आत्मत्वेन नैव कर्मारम्भ उपपद्यते । तस्मादात्मा निर्विशेषः । न हि चक्षुष्मान् पथि प्रवृत्तो-ऽहनि कूपे कण्टके वा पतति कृत्स्नस्य च कर्मफलस्य विद्या- । फलेऽन्तर्भावात्; न चायत्नप्राप्ये 8 ब्राह्मण नहीं होता । अतः ' वह नेति नेति ABS इस प्रकार निर्देश किया गया वस्तु आत्मा अगृह्य है, उसका ग्रहण नहीं किया जाता ' - इत्यादि वचनों- ' अ से बताये हुए लक्षणवाला है । पर्वत क्योंकि ऐसे लक्षणवाला आत्मा संप्राप्तौ कर्मके फल या साधनसे असम्बद्ध सम्पूर्ण संसारधर्मोसे विलक्षण चरेत् । क्षुधादि धर्मोंसे अतीत, अस्थूलत्व ज्ञाने 1 आदि धर्मोंसे युक्त, अजन्मा, अजर, इति अमर, अमृत, अभय, लवणखण्डके परमान समान एकमात्र विज्ञान रसस्वरूप, स्वयंज्योति, एकमात्र, अद्वितीय, न्यानि अपूर्व, अनपर, ( जिससे बढ़कर त्युक्तम दूसरा कोई उत्कृष्ट तत्त्व नहीं हो ) कर्मारम अनन्तर और और अबाह्य है — ऐसा आगम और तर्कद्वारा निश्चय यस किया गया है और विशेषतः एष न यहाँ इस जनक - याज्ञवल्क्य संवाद में. इसका निरूपण किया गया है; नोपगम अतः ऐसे लक्षणोंवाले आत्माको एवमेवं आत्मस्वरूपसे जान लेनेपर कर्मका आरम्भ होना सम्भव नहीं है । इस उह निये आत्मा निविशेष है । तरतो कोई भी नेत्रवाला दिन के समय मार्गमें चलता हुआ कुएँ या काँटोंमें मेवेति नहीं गिरता; और कर्मके भी सारे फ़लका ज्ञानके फलमें ही इत्युच्य हो जाता है; तथा जो वस्तु बिना शरीरधा प्रयत्न के ही प्राप्त हो सकती है, उसके

पृष्ठ 1129

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[ श्रध्याय४ : ' वह नेति नेति देश कियागया उसका ग्रहण -- इत्यादि वचनों-वाला है । क्षणवाला आत्मा नसे असम्बद्ध मोंसे विलक्षण नतीत, अस्थूलत्व अजन्मा, अजर, _य, लवणखण्डके विज्ञान रसस्वरूप, मात्र, अद्वितीय, ( जिससे बढ़कर तत्त्व नहीं हो ) बाह्य है - ऐसा तर्कद्वारा निश्चय और विशेषतः बाज्ञवल्क्यसंवाद में किया गया है; वाले आत्माको लेनेपर कर्मका नहीं है । इस शेष है । ला दिन के समय कुएँ या कांटों कर्म भी सारे ही अन्तर्भाव जो वस्तु बना सकती है, उसके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ वस्तुनि विद्वान् यत्नमातिष्ठति । ' अङ्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् । इष्ट पार्थस्य संप्राप्तौ को विद्वान् यत्नमा चरेत् || ' “ सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते " ( ४ | ३३ ) इति गीतासु । इहापि चैतस्यैव परमानन्दस्य ब्रह्मवित्प्राप्यस्या-न्यानि भूतानि मात्रानुपजीवन्ती-त्युक्तम् । अतो ब्रह्मविदां न कर्मारम्भः । यस्मात् सर्वेषणाविनिवृत्तः स एष नेति नेत्यात्मानमात्मत्वे-नोपगम्य तद्रूपेणैव वर्तते, तस्माद् एतमेवंविदं नेति नेत्यात्मभूतम्, उ इ एव एते वक्ष्यमाणे न तरतो न प्राप्नुतः - इति युक्त मेवेति वाक्यशेषः । के ते १ इत्युच्यते- ' अतोऽस्मान्निमित्तात् शरीरधारणादिहेतोः पापम् । १११५-| लिये समझदार व्यक्ति प्रयत्न भी नहीं करता । जैसा कि कहा है-" यदि अपने पास ही शहद मिल | जाय तो फिर पर्वतपर किसलिये जाय? अपने अभीष्ट पदार्थंके मिल जानेपर कौन समझदार उसके लिये -प्रयास कर सकता है? " तथा गीता में कहा है- " हे पार्थं । सारा--का सारा कर्म ज्ञानमें पूर्णतय समाप्त हो जाता है । " यहाँ भी यही कहा है कि ब्रह्मवेताके प्राप्त करने योग्य इसी परमानन्दके अंश-के ही सहारे दूसरे समस्त भूत जीवित रहते हैं । अत: ब्रह्मवेत्ताओं-के लिये कर्मके आरम्भको आवश्य-कता नहीं है । क्योंकि सम्पूर्ण इच्छाओंसे. निवृत्त होकर ' वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है ' इस प्रकारके आत्माको आत्मरूपसे जानकर तद्रू--पसे ही विद्यमान रहता है, बतेः इस प्रकार जाननेवाले इस ' नेति-नेति ' आत्मस्वरूप हुए पुरुषको ये आगे बतलाये जानेवाले दोनों प्राप्त नहीं होते, सो उचित ही है-इस प्रकार ' इति ' शब्दके आगे ' युक्तमेव ' यह वाक्यशेष है । वे [ प्राप्त न होनेवाले ] दो क्या हैं, सो बतलाया जाता है - [ पहली बात यह है कि ] ' अत: अर्थात् इस निमित्तसे यानी शरीरधारणादिके

पृष्ठ 1130

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१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय अपुण्यं कर्म करवं कृतवा-नस्मि, कष्टं खलु मम वृत्तम्, अनेन पापेन कर्मणा अहं नरकं ' प्रतिपत्स्ये ' – इति योऽयं पश्चात् पापं कर्म कृतवतः --- परितापः स एनं नेति नेत्यात्मभूतं न तरति । तथा - ' अतः कल्याणं फल-' विषयकामानिमित्ताद् यज्ञदाना दिलक्षणं पुण्यं शोभनं कर्म कृतवानस्मि, अतोऽहमस्य फलं ' सुखमुपभोक्ष्ये देहान्तरे ' इत्ये-षोऽपि हर्षस्तं न तरति । उमेउ । द एव एष ब्रह्मविदेते कर्मणी वरति पुण्यपापलक्षणे । एवं ब्रह्मविदः संन्यासिन उमे अपि कर्मणी श्रीयेते - पूर्वजन्मनि कृते ये ते, इह जन्मनि कृते ये ते च, अपूर्वे च नारभ्येते । किं च नैनं कृताकृते — BIR कृतं नित्यानुष्ठानम्, अकृतं तस्यैव अक्रिया, ते अपि कृताकृते एनं ४ ब्राह्मण कारण मैंने पाप - अपुण्य कर्म किया, यह मेरे लिये बड़े ही क्लेशका न तप कारण हुआ, इस पापकर्मके कारण फलदान मैं नरकको प्राप्त होऊंगा ' – इस प्रकार जिसने पापकर्म किया है, द उस पुरुषका जो यह पश्चात्ताप है, आत्मवि वह इस ' नेति नेति ' इस श्रुतिसे वर्णित आत्मस्वरूपको प्राप्त हुए कर्माणि पुरुषको नहीं प्राप्त होता । इसी प्रकार [ दूसरी बात यह है- ] ' अत: - इस फलविषयक ४ । ३७ कामनारूप निमित्तसे मैंने कल्याण- रम्भकय यज्ञ - दानादिरूप पुण्य अर्थात् शुभ कर्म किया है, इसलिये में दूसरे तो ब्रह शरीर में इसका फलरूप सुख भोगू-गा'- - - इस प्रकारका हर्ष भी उसे नहीं प्राप्त होता । यह ब्रह्मवेत्ता इन पाप - पुण्यरूप दोनों ही प्रकारके कर्मोंसे पार हो जाता है । इस न वर्ध प्रकार ब्रह्मवेत्ता संन्यासीके जो वित्तं पूर्वजन्ममें किये होते हैं, वे और देवंविच जो इस जन्ममें किये होते हैं बे - दोनों त्मन्येव ही प्रकारके कर्म क्षीण हो जाते हैं तरति तथा नये कर्मोंका भी भी आरम्भ पाप्मान नहीं होता । भवत्ये इसी प्रकार इसे कृत और अकृत-कृत नित्यानुष्ठानको कहते हैं और याज्ञव अकृत उसे न करनेको- वे कृत सह द