बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1131–1140

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1131–1140

पृष्ठ 1131

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[ श्रध्याय8 प - अपुण्य कर्म ये बड़े ही क्लेशका पापकर्मके कारण - होऊंगा ' – इस कर्म किया है, यह पश्चात्ताप है, इस श्रुति पको प्राप्त हुए होता । दूसरी बात यह इस फलविषयक नसे मैंने कल्याण-अर्थात् शुभ सलिये मैं दूसरे लरूप सुख भोगू -हर्ष भी उसे ब्रह्मवेत्ता इन ही प्रकारके जाता है । इस संन्यासी के जो हैं, वे और होते हैं वे दोनों नीण हो जाते हैं - भी आरम्भ कृत और अकृत-कहते हैं और करनेको - वे कृत ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ न तपतः; अनात्मज्ञं हि कृतं फलदानेन, अकृतं प्रत्यत्रायोत्पा-दनेन तपत: । अयं तु ब्रह्मविद् आत्मविद्याग्निना सर्वाणि कर्माणि भस्मीकरोति, " यथै-धांसि समिद्धोऽग्निः " ( गीता । ४ । ३७ ) इत्यादिस्मृतेः; शरीरा-रम्भकयोस्तु उपभोगेनैव क्षयः । अतो ब्रह्मविदकर्मसम्बन्धी । २२ । १११७ और अकृत भी इसे ताप नहीं पहुँचाते 1 । जो अनात्मज्ञ है, उसे ही कृत तो फलप्रदानके द्वारा और अकृत प्रत्यवाय उत्पन्न करके ताप पहुँचाते हैं । यह ब्रह्मवेत्ता तो आत्मज्ञानरूप अग्नि से सम्पूर्ण कर्मों--को भस्म कर देता है, जंसा कि " जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्म कर देता है " इस स्मृति से सिद्ध होता है । जो [ प्रार-ब्धरूपसे ] नूतन शरीरको उत्पत्ति ' करानेवाले पाप - पुण्य कर्म होते हैं, उनका तो उपभोगसे ही क्षय होता है, इसलिये ब्रह्मवेत्ताका कर्मसे सम्बन्ध नहीं है ॥ २२ ॥

ब्रह्मवेत्ता की स्थिति और याज्ञवल्क्य के प्रति जनकका आत्मसमर्पण तदेतचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् । तस्यैव स्यात् पद-वित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मा-देवविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा-. त्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्व पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1132

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१११८ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ ब्राह्म 200 यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—- यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है । उस महिमा ही कनी स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं क्रिय होता । अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और हेतुभ समाहित होकर आत्मामें ही आत्मा को देखता है, सभीको आत्मा देखता है । उसे [ पुण्य - पापरूप ] पापकी प्राप्ति नहीं होती, यह सम्पूर्ण पापों को इति ` पार कर जाता है । इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको तो s संतप्त करता है । यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है । हे सम्राट् । यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो- ऐसा महिम याज्ञवल्क्यने कहा । [ तब जनकने कहा - ] ' वह में श्रीमान्को विदेह स्याद् ' देश देता हूँ, साथ ही आपकी दासता ( सेवा ) करनेके लिये अपने - आपको ' भी समर्पण करता हूँ ' ॥ २३ ॥

तदेतद् वस्तु ब्राह्मणेनोक्त-मृचा मन्त्रेण अभ्युक्तं प्रका -शितम् । एष नेति नेस्यादि-· लक्षणो नित्यो महिमा, अन्ये तु -महिमानः कर्मकृता इत्यनित्याः; श्रयं तु तद्विलक्षणो महिमा स्वा-भाविकत्वान्नित्यो ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य त्यक्तसर्वैषणस्य । कुनोऽस्य नित्यत्वमिति हेतु-वेचा, ब्राह्मण के द्वारा कही गयी यह महिम्न बात ऋचा अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही - प्रकाशित की गयी है । यह पदस्य ' नेति नेति ' इत्यादि श्रुतिके द्वारा लक्षित आत्मा नित्य महिमा है; च्यते-दूसरी जो महिमाएँ हैं वे तो कर्म- नलि द्वारा सम्पन्न हुई हैं इसलिये पापकेन अनित्य हैं; किंतु ब्राह्मण अर्थात् मपि पा सम्पूर्णं एषणाओंका त्याग करने-वाले ब्रह्मवेत्ताकी यह उनसे विल- यस्म क्षण महिमा स्वाभाविक होनेके ब्राह्मणस्य कारण नित्य है । इसकी नित्यता क्यों है — इसमें लक्षणः, माह -कर्मणा न वर्धते शुभलक्ष- श्रुति हेतु बतलाती है — यह कर्मसे बाह्येन्द्रिय णेन कृतेन वृद्धिलक्षणां विक्रियां नहीं बढ़ती अर्थात् किये हुए शुभरूप -तथा दान न प्राप्नोति; अशुमेन कर्मणा कर्मसे यह वृद्धिरूप विकारको प्राप्त निवृत्तः, नो नहीं होती । तथा अशुभ कर्मसे

पृष्ठ 1133

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[ अध्याय४ की नित्य महिमा समहिमा ही कर्मसे लिप्त नहीं , तितिक्षु मोर आत्मा देखता सम्पूर्ण पापों को - सारे पापोंको ह्मण हो जाता गये हो - ऐसा मान्को विदेह ये अपने - आपको - कही गयी यह मन्त्रद्वारा भी गयी है । यह त्य महिमा है; - हैं. वे तो कर्म-ई हैं इसलिये ब्राह्मण अर्थात् त्याग करने-यह उनसे विल-भाविक होने के क्यों है— इसमें है - यह कर्मसे ये हुए शुभरूप विकारको प्राप्त अशुभ कर्म से ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११ ९ कनीयान् नाप्यपक्षयलक्षणां वि | कनीयान् -क्षयरूप विकारको प्राप्त क्रियां प्राप्नोति । उपचयापचय- नहीं होती । समस्त विकार वृद्धि या क्षयके ही हेतुभूत हैं, अत: इन हेतुभूता एव हि सर्वा विक्रिया दो विकारोंके प्रतिषेघद्वारा उन इति एताभ्यां सभीका प्रतिषेध कर दिया जाता प्रतिषिध्यन्ते । है । इसलिये अविक्रिय होनेके कारण अतोऽविक्रियात्वान्नित्य एष यह नित्य महिमा है । अत: उस महिमा महिमाका ही पदवित्-- स्त्ररूपको । तस्मात् तस्यैव महिम्नः, जाननेवाला होना चाहिये स्यादु भवेत्, पदवित् —पदस्य चेत्ता, पद्यते गम्यते ज्ञायत इति महिम्नः स्वरूपमेव पदम्, तस्य पदस्य वेदिता । किं तत्पदवेदनेन स्यादित्यु-च्यते - तं विदित्वा महिमानम्, न लिप्यते न सम्बध्यते कर्मणा । पापकेन धर्माधर्मलक्षणेन, उभय-मपि पापकमेव विदुषः । यस्मादेवमकर्मसम्बन्धी एष ब्राह्मणस्य महिमा नेति नेत्यादि-· लक्षणः, तस्माद् एवंवित् शान्त: -बाह्येन्द्रियव्यापारत उपशान्तः, तथा दान्तः - अन्तःकरण तृष्णातो निवृत्तः, उपरतः सर्वैषणाविनि -। [ ' पद्यते इति पदम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ] जिसकी प्रतिपत्ति- अवगम अर्थात् ज्ञान होता है, वह पद है; अतः यहाँ स्वरूप ही पद है, उस पदका वेत्ता ( जाननेवाला ) ' पदवित् ' कह-लाता है । उस पदको जाननेसे क्या होगा, सो बतलाया जाता है - उस महिमाको जानकर पुरुष पाप-धर्माधर्मरूप कर्मसे लिप्त — सम्बद्ध नहीं होता । ज्ञानीके लिये तो | पाप - पुण्य ] दोनों पापक पापके तु तुल्य ही हैं । क्योंकि इस प्रकार यह ' ति नेति ' इत्यादि लक्षण वाली ब्राह्मणकी महिमा कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है, इसलिये इस प्रकार जानने-वाला शान्त - बाह्य - इन्द्रिय- व्यापार से उपशान्त, दान्त - अन्तःकरणकी तृष्णासे निवृत्त, उपरत – सम्पूर्णं

पृष्ठ 1134

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११२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ मुक्तः संन्यासी, तितिक्षुद्वन्द्व । सहिष्णुः समाहितः - – इन्द्रि -यान्तःकरणचलन रूपाद् व्यावृत्त्या ऐकाग्र्यरूपेण समाहितो भूत्वा तदेतदुक्तं पुरस्तात् — " बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य " इति; श्रात्मन्येव स्वे कार्यकरणसंघाते श्रात्मानं प्रत्यक्चेत यितारं पश्यति । तत्र किं तावन्मात्रं परिच्छि-न्नम् १ नेत्युच्यते -- सर्व समस्त-मात्मानमेव पश्यति, नान्यद् श्रात्मव्यतिरिक्तंवालाग्र मात्रमध्य-स्तीत्येवं पश्यति, मननान्मुनि-र्भवति जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं | स्थानत्रयं हित्वा । एवं पश्यन्तं ब्राह्मणं नैनं पाप्मा पुण्यपापलक्षणस्तरति, न प्राप्नोति; अयं तु ब्रह्मविद सर्व पाप्मानं तरति - श्रात्मभावेनैव व्याप्नोति, अतिक्रामति । नैनं पाप्मा कृताकृतलक्षणस्तपति । ब्राह्म एषणाओंसे सर्वथा निवृत्त संन्यासी तितिक्षु - द्वन्द्व ( सुख - दुःख, सर्दी - गर्मी, 736 इष्टफ आदि ) सहन करनेवाला और सर्व समाहित – इन्द्रिय और अन्तः- वित करणके चलनरूपसे व्यावृत्त होकर करो ऐकाग्रघरूपसे समाहित हो — यही स बात पहले " बाल्य और पाण्डित्य-. विग को पूर्णतया जानकर " इस वाक्य-रज द्वारा कही गयी है - आत्मामें अर्थात् देहेन्द्रियसंघातरूप अपनेमें अन्तर्वतीं श्र चेतन आत्माको देखता है । अह तो क्या उस शरीर में वह उतने नि ड ही परिमाणवाले परिच्छिन्न आत्मा-को देखता है? इसपर कहा जाता स्थ है ' नहीं ' वह सबको आत्मा ही तर देखता है । आत्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु बालके अग्र-भागके बराबर भी नहीं है - इस प्रकार वह देखता है । वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति संज्ञक तीनों अवस्थाओंको छोड़कर मनन करने-के कारण मुनि हो जाता है । प इस प्रकार देखनेवाले इस ब्राह्मणको पुण्य - पापरूपी दोष नहीं तरता नहीं प्राप्त होता । किंतु यह ब्रह्मवेत्ता तो सम्पूर्ण पापको तर जाता है -- उसे आत्मभावसे हो व्याप्त - - आक्रान्त कर लेता है | इसे कृताकृतरूप पाप

पृष्ठ 1135

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[ अध्याय ४ निवृत्त संन्यासी, दुःख, सर्दी - गर्मी रनेवाला और और अन्त: -व्यावृत्त होकर हित हो - यहो और पाण्डित्य--र " इस वाक्य-आत्मामें अर्थात् नप में अन्तर्वर्ती ता है । रीरमें वह उतने दच्छिन्न आत्मा-नर कहा जाता को आत्मा ही के अतिरिक्त बालके अग्र-नहीं है - इस । वह जाग्रत्, संज्ञक तीनों कर मनन करने-नाता है । देखनेवाले इस रूपी दोष नहीं होता । किंतु सम्पूर्ण पापको आत्मभावसे त कर लेता कृतरूप पाप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१ इष्टफलप्रत्यवायोत्पादनाभ्याम्; । सर्व पाप्मानमयं तपति ब्रह्म-वित सर्वात्मदर्शन वह्निना भस्मी-करोति । स एष एवंविद् विपापो विगतधर्माधर्मः, विरजो विगत-रजः, रजः कामः, विगतकामः, श्रविचिकित्सः - छिन्नसंशयः, श्रहमस्मि सर्वात्मा परं ब्रह्मेति निश्चितमतिः, ब्राह्मणो भवति । अयं त्वेवंभूत एतस्यामव-स्थायां मुख्यो ब्राह्मणः, प्रागे-तस्माद् ब्रह्मस्वरूपावस्थानादू गौणमस्य ब्राह्मण्यम् । एष ब्रह्म-लोक: - ब्रह्मैव लोको ब्रह्म-लोको मुख्यो निरुपचरितः सर्वात्मभावलक्षणः, हे सम्राट्! एनं ब्रह्मलोकं परिप्रापितोऽसि इष्टफल प्रदान और प्रत्यवायोत्पादन-के द्वारा ताप नहीं पहुँचाता और यह ब्रह्मवित् सम्पूर्ण पापको तप्त करता यानी सर्वात्मदर्शन रूप अग्नि-से भस्म कर देता है । वह यह इस प्रकार जाननेवाला विपाप - धर्माधर्महीन, विरज— विगतरज, ' रज ' कामको कहते हैं, अतः निष्काम, अविचिकित्स-संशयहीन और ' मैं सर्वात्मा परब्रह्म हूँ ' इस प्रकार जिसका निश्रय है वह ब्राह्मण हो जाता है । इस अवस्था में ऐसी स्थितिको प्राप्त हुआ यह ब्रह्मवेत्ता ही मुख्य ब्राह्मण है । इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थिति होनेसे पूर्व तो इसका ब्राह्मणत्व गौण ही है [ मुख्य नहीं ] । यह ब्रह्मलोक हे ब्रह्मही लोक है अर्थात् मुख्य ( प्रधान ) एवं उप-चाररहित सर्वात्मभावरूप ब्रह्मलोक यही है । हे सम्राट्! इस ' नेति नेति ' इत्यादिरूपसे लक्षित अभय अभयं नेति नेत्यादिलक्षणम् - ब्रह्मलोकको तुम्हें पहुँचा दिय: -ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा । इति होवाच याज्ञवल्क्यः । एवं ब्रह्मभूतो जनको याज्ञ- इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा ब्रह्म-वल्क्येन ब्रह्मभावमापादितः प्र- भावको प्राप्त कराये हुए ब्रह्मभूत त्याह - सोऽहं त्वया ब्रह्मभाव - | जनकने उत्तर दिया, आपके द्वारा वृ ० उ०७१-

पृष्ठ 1136

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११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 मापादितः सन् भगवते तुभ्यं । ब्रह्मभावको प्राप्त कराया ब्राह्म हुआ मैं आप श्रीमान्को विदेहदेश अर्थात् विदेहान् देशान् मम राज्यं | अपना सारा राज्य देता हूँ तथा स विदेहदेशके साथ अपने - आपको भी अना समस्तं ददामि मां च सह दास्य - - दासकर्मके लिये मत्ता विदेहैर्दास्याय दासकर्मणे-ददामीति चशब्दात् सम्बध्यते । परिसमापिता ब्रह्मविद्या सह संन्यासेन साङ्गा सेतिकर्तव्यताका परिसमाप्तः परमपुरुषार्थः, एता-वत् पुरुषेण कर्तव्यम्, एषा निष्ठा, एषा परा गतिः, एतन्निःश्रेय-सस्, एतत् प्राप्य कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवति, एतत् सर्ववेदानु-शासनमिति ॥ २३ ॥

देता हूँ इस सर्वप्र प्रकार ' च ' शब्द से ' ददामि ' ( देता हूँ ) इस क्रियाका सम्बन्ध लगाया प्राण जाता है । यिते संन्यास, अङ्ग और इतिकर्त्त- वस व्यता के सहित ब्रह्मविद्याकी सर्वथा गुण समाप्ति हो गयी । परम पुरुषार्थका भूते पर्यवसान हो गया । पुरुषको इतना विन ही कर्तव्य है, यही निष्ठा है, यही लभ परा गति है और यही निःश्रेयस यथ है । इसे पाकर ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है और यही सम्पूर्ण वेदका अनुशासन है ॥ २३ ॥ गुप

वस श्रात्मा अन्नाद और वसुदान है - इस प्रकारकी उपासनाका फल झ योऽयं जनकयाज्ञवल्क्याख्या- इस जनक - याज्ञवल्क्य - आख्या-यिकायां यिकामें जिस आत्माकी व्याख्या की य व्याख्यात आत्मा- गयी है-स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥

वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है । जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्णं कर्मोंका फल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1137

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[ श्रध्याय४ कराया हुआ मैं विदेहदेशअर्थात् - देता हूँ तथा पने - आपको भी लये देता हूँ - इस ' ददामि ' ( देता सम्बन्ध लगाया और इतिकर्त्त-बाकी सर्वथा हम पुरुषार्थका रुषको इतना निष्ठा है, यही ही निःश्रेयस कृतकृत्य हो पूर्ण की वय - आख्या-व्याख्या की वसुदानो और कर्मफल फल प्राप्त ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३ स वै च एष महान् अज आत्मा अन्नादः सर्वभूतस्थः सर्वान्नाना-मत्ता वसुदान: - वसु धनं सर्वप्राणिकर्मफलम्, तस्य दाता, प्राणिनां यथाकर्म फलेन योज- । यितेत्यर्थः; तमेतमजमन्नादं वसुदानमात्मानमन्नादवसुदान-गुणाभ्यां युक्तं यो वेद, स सर्व- । भूतेष्वात्मभूतः -- अन्नमति, विन्दते च वसु सर्वं कर्मफलजातं लभते सर्वात्मत्वादेव, य एवं यथोक्तं वेद । अथवा दृष्टफलार्थिभिरप्येवं-गुण उपास्यः तेन अन्नादो वसोश्च लब्धा, दृष्टेनैव फलेन अन्नात्वेन गोऽश्वादिना चास्य योगो भवतीत्यर्थः ॥ २४ ॥

वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्नाद - सम्पूर्ण भूतोंमें ि रहकर समस्त अन्नोंका भोक्ता, वसुदान – वसु — धन अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका कर्मफल उसे देनेवाला है; अर्थात् प्राणियोंको उनके कर्मा-नुसार फलसे संयुक्त करनेवाला है । उस इस अजन्मा, अन्नाद और वसुदान आत्माको जो अन्नाद और वसुदान गुणोंसे युक्त जानता है, वह समस्त भूतोंमें आत्मभूत हुआ अन्न भक्षण करता है तथा जो ऐसा अर्थात् उपर्युक्त विषयको जानता है, वह सर्वात्मा होनेके कारण ही वसु यानी सम्पूर्णं कर्मों-का फल प्राप्त करता है । अथवा जिन्हें [ अन्न और धन-रूप ] दृष्टफलकी इच्छा है, उनको भी ऐसे गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना । करनी चाहिये । इससे वह अन्नाद और धन प्राप्त करनेवाला होता है, अर्थात् प्रत्यक्ष प्राप्त होनेवाले हो अन्नादत्व और गौ, घोड़े आदि फल से उसका योग होता है ॥ २४ ॥

ब्रह्मके स्वरूप और ब्रह्मज्ञकी स्थितिका वर्णन अब इस सारे ही आरण्यकमें इदानीं समस्तस्यैवारण्यकस्य जो बात कही गयी है, वह संगृहीत योऽर्थ उक्तः, स समुच्चित्य करके इस कण्डिकामें बतलायी अस्य कण्डिकायां निर्दिश्यते, जाती है कि सारे आरण्यकका समस्तारण्यकार्य इति | इतना ही तात्पर्य है— एतावान्

पृष्ठ 1138

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११२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 222 ४ स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्राह्म ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभय हि वै ब्रह्म भवति य एवं ग एवं वेद ॥ २५ ॥ परिव

वहीं यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय अभ ब्रह्म है । अभय ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता लोक हे ॥ २५ ॥ युक्त

स वा एष महानज श्रात्मा वही यह महान् अजन्मा आत्मा ब्रह्म अजरो न जीर्यत इति, न विप-रिणमत इत्यर्थः, अमर: -यस्माच्च अजरः, तस्माद् अमरः, न म्रियत इत्यमरः; यो हि जायते जीर्यते च, स विनश्यति म्रियते वा; अयं तु अजत्वाद् अजरत्वाच्च अविनाशी यतः, श्रत एव अमृतः । यस्माद् जनिप्रभृतिभिस्त्रिभिर्भाव विकारै-र्वजितः तस्माद् इतरैरपि भावविकारैस्त्रिभिस्तत्कृतैश्व कामकर्ममोहादिभिर्मृत्युरूपैर्वजित इत्येतत् । श्रमयोऽत एव यस्माच्चैवं पूर्वोक्तविशेषणः, तस्माद् मय वर्जितः, भयं च हि नाम अविद्याकार्यम्, तत्कार्यप्रति षेघेन भावविकारप्रतिषेधेन चाविद्यायाः प्रतिषेधः सिद्धो वेदितव्यः । अभय आत्मा । जीर्णं नहीं होता, इसलिये अजर है अर्थात् इसका विपरिणाम नहीं ब्रह्म होता । ' अमर: ' - क्योंकि अजर है, इसलिये अमर है, जो नहीं मरता भवा उसे अमर कहते हैं । जो उत्पन्न संच होता अथवा जीर्ण होता है, वही स्थ विनष्ट होता अथवा मरता है । चूँकि यह अज और अजर होनेके स्थि कारण अविनाशी है, इसीलिये. कार अमृत है । क्योंकि यह जन्मादि तीन भावविकारोंसे रहित है, इस- कृत लिये अन्य तीन भावविकारोंसे प तथा उनसे होनेवाले मृत्युरूप काम, कर्म और मोहादिसे भी रहित है— पुन ऐसा इसका तात्पर्य है । इसीसे यह अभय भी है । इ प्रकार चूँकि यह पूर्वोक्त विशेषणों- रूप वाला है, इसलिये भयशून्य है; भय तो अविद्याका ही कार्य है, कु अविद्या के कार्य और भावविकारोंके प्रतिषेधसे अविद्याका प्रतिषेध भी सिद्ध हुआ समझना चाहिये । इस •

पृष्ठ 1139

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[ अध्याय४ ऽमृतोऽभयो ति य एवं एवं अभय ब्रह्म ही हो जाता - अजन्मा आत्मा [ सलिये अजर है परिणाम नहीं योंकि अजर है, जो नहीं मरता । जो उत्पन्न होता है, वही मरता है । अजर होनेके है, इसीलिये. यह जन्मादि रहित है, इस भावविकारों से मृत्युरूप काम, रहित है-॥ है । इ क्त विशेषणों-भयशून्य है; ही कार्य है, विकारोंके प्रतिषेध भी चाहिये । इस ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२५ एवं गुणविशिष्टः किमसौ १ ब्रह्म! परिवृढं निरतिशयं महदित्यर्थः । अभयं वै ब्रह्म, प्रसिद्धमेतद् लोके – अभयं ब्रह्मेति । तस्मा-द्युक्तमेवं गुणविशिष्ट आत्मा ब्रह्मेति । य एवं यथोक्तमात्मानमभयं ब्रह्म वेद, सोऽमयं हि वै ब्रह्म भवति । एष सर्वस्या उपनिषदः संक्षिप्तोऽर्थं उक्तः । एतस्यैवार्थ-स्य सम्यक् प्रबोधाय उत्पत्ति-स्थितिप्रलयादिकल्पना क्रिया-कारक फलाध्यारोपणा चात्मनि कृता, तदपोहेन च नेति नेतीत्य-ध्यारोपित विशेषापनयद्वारेण पुनस्तत्वमावेदितम् । यथैकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्व-रूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा, दशेषम्, शतेयम्, सहस्रेयम् - इति ग्राह-प्रकारके गुणोंसे युक्त यह अभय आत्मा क्या है? ब्रह्म — सब ओरसे बढ़ा हुआ अर्थात् निरतिशय महान् । ब्रह्म अभय ही है; लोकमें यह बात प्रसिद्ध है कि ब्रह्म अभय है, इस लिये ऐसे गुणोंवाला आत्मा ब्रह्म है -- यह कहना उचित ही है । जो इस प्रकार उपर्युक्त आत्मा-रूप अभय ब्रह्मको जानता है, वह निश्चय अभय ब्रह्म ही हो जाता है । यह समस्त उपनिषद्का संक्षिप्त अर्थ कहा गया । इसी अर्थंका अच्छी तरह ज्ञान करानेके लिये आत्मा में उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादिकी कल्पना तथा क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप किये गये हैं । तथा उसके अपोहनके द्वारा अर्थात् ' नेति नेति ' इत्यादि रूपसे अध्या-रोपित विशेषको निवृत्तिद्वारा पुनः तत्त्वका ज्ञान कराया गया है । जिस प्रकार एकसे लेकर परार्धं-तककी संख्या के स्वरूपका परिज्ञान करानेके लिये रेखाओंका अध्यारोपण करके [ अर्थात् अनेकों रेखाएं खींच-कर ] यह ( पहली ) रेखा एक है, यह ( दूसरी ) रेखा दश है, यह ( तीसरी ) सौ है, यह ( चौथी ) सहस्र है -- इस प्रकार ग्रहण कराते हैं

पृष्ठ 1140

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११२६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय यति, अवगमयति संख्यास्वरूपं केवलम्, न तु संख्याया रेखा त्मत्वमेव, यथा च — प्रकारा-दीन्यक्षराणि विजिग्राहयिषुः पत्रमषीरेखादिसंयोगोपायमा-स्थाय वर्णानां सतच्वमावेदयति, न पत्रमष्याद्यात्मतामक्षराणां ग्राहयति - तथा चेहोत्पच्याद्यने-कोपायमास्थायैकं ब्रह्मतत्त्वमावे -दितम्, पुनस्तत्कन्पितोपायज-नितविशेष परिशोधनार्थं नेति

नेतीति तच्चोपसंहारः कृतः ।

तदुपसंहृतं पुनः परिशुद्धं केवल-मेव सफलं ज्ञानमन्तेऽस्यां कण्डि-कायामिति ॥ २५ ॥

8 | तथा उन रेखाओंद्वारा केवल संख्या-के स्वरूपका ज्ञान कराते हैं, किंतु वास्तवमें संख्या रेखारूप ही नहीं है । तथा जिस प्रकार अकारादि अक्षरोंको ग्रहण करानेकी इच्छा- ब्रह्म वाला पुरुष कागज, स्याही और तस रेखाओंके संयोगरूप उपायका येना आश्रय लेकर वर्णोंका स्वरूप समझा देता है, कागज - स्याही आदि कृत | ही अक्षरोंके स्वरूप हैं— ऐसा नहीं शि समझाता, उसी प्रकार यहाँ उत्पत्ति प्रश आदि अनेकों उपायोंका अवलम्बन वि कर एक ब्रह्मतत्त्वका ही बोध नि कराया गया है । फिर उस कल्पित उपायसे पैदा हुए विशेषका निरास मा करनेके लिये ' नेति नेति ' ऐसा वा कहकर तत्त्वका उपसंहार किया है । फिर अन्तमें वह उपसंहृत, परिशुद्ध, केवल ज्ञान ही अपने फलके सहित इस कण्डिकामें क बतलाया गया है ॥ २५ ॥

त इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये द चतुर्थं शारीरक्रब्राह्मणम् ॥ ४ ॥