बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1141–1150

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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[ अध्याय४ द्वारा केवल संख्या-- कराते हैं, किंतु रेखारूप ही नहीं कार अकारादि कराने की इच्छा-ज, स्याही ओर रूप उपायका वर्णोंका स्वरूप गज - स्याही आदि हैं- ऐसा नहीं कार यहाँ उत्पत्ति का अवलम्बन काही बोध फिर उस कल्पित विशेषका निरास ति नेति ' ऐसा उपसंहार किया वह उपसंहृत, ज्ञान ही अपने सकण्डिकामें २५ ॥ पञ्चम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - मैत्रेयी- संवाद श्रागमप्रधानेन मधुकाण्डेन ब्रह्म तच्चं निर्धारितम् । पुनः तस्यैवोपपत्तिप्रधानेन याज्ञवल्की । येन काण्डेन पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहं कृत्वा विगृह्यवादेन विचारितम् । शिष्याचार्यसम्बन्धेन च पष्ठे प्रश्नप्रतिवचनन्यायेन सविस्तरं विचार्योपसंहृतम् । अथेदानीं fare स्थानीयं मैत्रेयीब्राह्मण-मारम्यते । अयं च न्यायो । वाक्यकोविदैः परिगृहीत: -8 ' हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्व-चनं निगमनम् ' इति । श्रथवाऽऽगमप्रधानेन मधु-काण्डेन यदमृतत्वसाधनं ससं-न्यास मात्मज्ञानमभिहितम्, तदेव तर्केणाप्यमृतत्वसाधनं ससं-न्यासमात्मज्ञानमधिगम्यते । तर्कप्रधानं हि याज्ञवल्कीयं काण्डम्; तस्माच्छास्त्रतर्काभ्यां निश्चितमेतत् — यदेतदात्मज्ञानं ससंन्यासममृतत्वसाधनमिति । [ द्वितीय अध्यायमें ] आगम-प्रधान मधुकाण्डद्वारा ब्रह्मतत्वका निश्चय किया गया । फिर [ तीसरे अध्याय में ] युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्डद्वारा उसीके पक्ष - प्रतिपक्ष लेकर जल्पन्यायद्वारा विचार किया गया और तदनन्तर इस छठे प्रपाठक [ अर्थात् चतुर्थ अध्यायमें ] गुरु - शिष्यसम्बन्धसे प्रश्नोत्तरकी शैलीद्वारा उसका विस्तारपूर्वक विचार करके उपसंहार किया गया । उसके पश्चात् अब निगमन-स्थानीय मैत्रेयोब्राह्मण आरम्भ किया जाता है । वाक्यमर्मज्ञोंने इस न्यायको स्वीकार भी किया है यथा 1 - ' हेतुका उल्लेख करके प्रतिज्ञाका पुनः कथन करना निगमन है ' इति । अथवा आगमप्रधान मधुकाण्ड जिस संन्यासयुक्त आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधनं बतलाया है, वही ससंन्यास आत्मज्ञान तर्कसे भी अमृतत्वका साधन जाना जाता है । याज्ञवल्कीय काण्ड तर्कप्रधान ही है; अतः यह जो अमृतत्वका साधन संन्यासयुक्त आत्मज्ञान है, वह शास्त्र और तर्क दोनोंहीसे निश्चित है ।

पृष्ठ 1142

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११२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्माच्छास्त्रश्रद्धावद्भिरमृतत्वप्रति / इसलिये अमृतत्व - प्राप्तिके ब्राह एवं शास्त्रमें श्रद्धा रखनेवाले इच्छुक पित्सुभिरेतत् प्रतिपत्तव्यमिति को इसे प्राप्त करना पुरुषों-आगमोपपत्तिभ्यां हि निश्चितोऽर्थः कि शास्त्र और युक्ति चाहिये दोनोंही, क्यों- के भा श्रद्धेयो भवति श्रव्यभिचारा- द्वारा निश्चय किया हुआ अर्थ मैत्र अव्यभिचारी होनेके कारण श्रद्धेय का दिति । अक्षराणां तु चतुर्थे यथा । होता है । इन अक्षरोंके अर्थकी तो यो व्याख्यातोऽर्थः तथा प्रतिपत्त-व्योऽत्रापि । यान्यतराण्य-व्याख्यातानि तानि व्याख्यां-स्यामः । याज्ञवल्क्य और चतुर्थ प्रपाठक [ यानी द्वितीय ब्रह अध्याय ] में जिस प्रकार व्याख्या | की गयी है, वैसी ही यहां भी स्त्री समझनी चाहिये । वहाँ जिन अक्षरोंकी व्याख्या नहीं की गयी, उनकी व्याख्या हम यहाँ करेंगे । उनकी दो स्त्रियाँ अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्व े भार्ये बभूवतुमैत्रेयीच कि कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्री- स्म प्रज्ञेव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्त- पा मुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥

यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो भार्याएँ थीं । उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी तो स्त्रियोंकी - सी बुद्धि-वाली ही थी । तब याज्ञवल्क्यने दूसरे प्रकारकी चर्याका आरम्भ करने-की इच्छासे [ कहा- ] ॥१ ॥

अथेति हेतूपदेशानन्तर्य प्रदर्श-नार्थः हेतु प्रधानानि हि वाक्यान्यतीतानि । तदनन्तर-मागमप्रधानेन प्रतिज्ञातोऽर्थो । निगम्यते मैत्रेयीब्राह्मणेन । हृ-शब्दो वृत्तावद्योतकः । ' अथ ' यह शब्द यह दिखानेके लिये है कि यह सिद्धान्तप्रतिपादक प्रकरण हेतुका उपदेश करनेके बाद आरम्भ किया गया है; क्योंकि 3 इससे पहले हेतुप्रधान वाक्य कहे ल जा चुके हैं । उनके पश्चात् अब आगमप्रधान मैत्रेयीब्राह्मणद्वारा पहले प्रतिज्ञा किये हुए अर्थका निगमन किया जाता है । ' ह ' शब्द पूर्ववृत्तको सूचित करनेवाला है ।

पृष्ठ 1143

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[ अध्याय8 -प्राप्ति के इच्छुक रखनेवालेपुरुषों-ना चाहिये, क्यों-युक्ति दोनों ही के किया हुआ अर्थ के कारण श्रद्धेय क्षरोंके अर्थकी तो यानी द्वितीय - प्रकार व्याख्या ही यहाँ भी | वहाँ जिन नहीं की गयी, यहाँ करेंगे । तुमैत्रेयीच बभूव स्त्री-न्यद् वृत्त-ये दो भार्याएँ योंकी - सी बुद्धि-आरम्भ करने-यह दिखाने के द्वान्तप्रतिपादक करने के बाद है; क्योंकि न वाक्य कहे पश्चात् अब ब्राह्मणद्वारा हुए अर्थका ' ' शब्द नेवाला है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२ ९ याज्ञवल्क्यस्य ऋषेः किल द्वे भार्ये पत्न्यौ बभूवतुः - आस्ताम् -मैत्रेयी च नामत एका, अपरा कात्यायनी नामतः । तयोर्भार्य-योमैत्रेयी ह किल ब्रह्मवादिनी ब्रह्मवदनशीला बभूव आसीत् स्त्रीप्रज्ञा - स्त्रियां या उचिता सा स्त्रीप्रज्ञा- सैव यस्याः प्रज्ञा गृह-प्रयोजनान्वेषणालक्षणा, सा स्त्रीप्र-ज्ञैव तर्हि तस्मिन् काल आसीत् प्रसिद्ध है, याज्ञवल्क्य ऋषिकी दो भार्याएं-- पत्नियाँ थीं; एक मैत्रेयी नामवाली थी और दूसरी कात्यायनी नामवाली । उन दोनों पत्नियोंमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी--ब्रह्मसम्बन्धी भाषण करनेवाली थी । किंतु कात्यायनी उस समय ' स्त्रीप्रज्ञा ' - - जो प्रज्ञा स्त्रियों के योग्य हो, उसे स्त्रीप्रज्ञा कहते हैं, जिसकी वह स्त्रीप्रज्ञा अर्थात् गृहसम्बन्धी प्रयोजनको ही खोजमें रहनेवाली कात्यायनी । अथैवं सति ह । बुद्धि थो, ऐसी स्त्रीप्रज्ञा ही थी । किल याज्ञवल्क्योऽन्यत् पूर्व- ऐसी स्थितिमें याज्ञवल्क्यने अन्य स्माद् गार्हस्थ्यलक्षणाद् वृत्तात् अर्थात् गार्हस्थ्यरूप पूर्वचर्यासे भिन्न पारिव्राज्यलक्षणं वृत्तमुपाकरि- | संन्यासरूप चर्याका आरम्भ करनेके व्यन्नुपाचिकीषुः सन् ॥ १ ॥ इच्छुक होकर [ कहा-- ] ॥ १ ॥

याज्ञवल्क्य - मैत्रेयी - संवाद मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रत्रजिष्यन् वा अरेऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्या-यन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥

' अरी मैत्रेयि! ' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा- ' मैं इस स्थान ( गार्हस्थ्य-आश्रम ) से अन्यत्र सब कुछ त्याग कर जानेवाला हूँ, अर्थात् संन्यास लेनेका विचार है । इसलिये [ मैं तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस कात्यायनी के साथ तेरा बँटवारा कर दूँ ' ॥ २ ॥

हे मैत्रेयीति ज्येष्ठां भार्यामा- ' हे मैत्रेयि! ' इस प्रकार याज्ञ-वल्क्यने बड़ी स्त्रीको लक्ष्य करके मन्त्रयामास, आमन्त्र्य चोवाच | सम्बोधन किया और उसे बुलाकर

पृष्ठ 1144

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११३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ह - प्रवजिष्यन् पारिव्राज्यं करि -ष्यन् वै अरे मैत्रेयि । अस्मात् स्थानाद् गार्हस्थ्यादहमस्मि भवामि । मैत्रेयि अनुजानीहि । माम्, हन्त इच्छसि यदि, ते अनया कात्यायन्या अन्तं कर-वाणि - इत्यादि व्याख्यातम् । २ । ४ | कहा, ' अरी मैत्रेयि! मैं इस गार्हस्थ्य-आश्रमसे प्रव्रजन - - पारिव्राज्य ( संन्यास ) स्वीकार करनेवाला हूँ । सव सो हे मैत्रेयि! तू मुझे अपनी अनुमति दे, और यदि तेरी इच्छा नु हो तो इस कात्यायनी के साथ तेरा घर बँटवारा कर दूँ ' -- इत्यादि वाक्य- स्थ की व्याख्या पहले की जा चुकी व है || २ || सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनास्मृताऽहो ३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवित स्यादमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, ' भगवन्! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी " मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा याज्ञवल्क्यने कहा, ' नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो है नहीं ' ॥ ३ ॥

मैत्रेयीका अमृतत्व- -साधनविषयक प्रश्न तु द पृथिवी नहीं? ' जीवन आशा सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥४ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, ' जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें ' ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1145

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[ श्रध्याय ४ मैं इस गार्हस्थ्य. वन -- पारिव्राज्य - करनेवाला हूँ । तू मुझे अपनी यदि तेरी इच्छा नोके साथ तेरा -इत्यादि वाक्य-की जा चुकी भगोः सर्वा मृताऽहो ३ पकरणवतां वस्य तु सारी पृथिवी अथवा नहीं? ' का जैसा जीवन की तो आशा यां किमहं ति ॥४ ॥

7, उसे लेकर नते हों, वही ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१ सा एवमुक्ता उवाच मैत्रेयी — । सर्वेयं पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, नु किं स्याम्, किमहं वित्तसा-ध्येन कर्मणा अमृता, हो स्यामिति । नेति होवाच याज्ञ-वल्क्य इत्यादि समानमन्यत् ॥! इस प्रकार कहे जानेपर उस मैत्रेयी ने कहा, ' यदि यह सारी पृथिवी धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या उस धनसाध्य कर्मसे मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं? ' याज्ञवल्क्य --ने कहा, ' नहीं ' इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृद्धन्त तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥

उन याज्ञवल्क्यजी ने कहा, ' निश्चय ही तू पहले भी हमारी प्रिया रही हे और इस समय भी तूने हमारे प्रिय ( प्रसन्नता ) को बढ़ाया है । अतः हे देवि! में प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस ( अमृतत्व के साधन ) की व्याख्या करूंगा । तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका चिन्तन करना ' ॥ ५ ॥

स ह उवाच – प्रियैव पूर्व खलु नः — अस्मभ्यं भवती, भव-न्ती सती, प्रियमेव अवृधद् बर्षि तवती निर्धारितवती असि; त । स्तुष्टोऽहम्, हन्त इच्छसि चेद-मृतत्वसाधनं ज्ञातुम्, हे भवति, ते तुभ्यं तदमृतत्वसाधनं व्याख्यास्यामि ॥ ५ ॥

उन्होंने कहा, तू निश्चय ही पहले भी हमारी प्रिया रही है, अब भी तूने हमारे प्रियकी ही वृद्धि की है, प्रसन्नताको ही बढ़ाया है— संतोषजनक निश्चय किया है, इस-लिये मैं तुझपर प्रसन्न । अब यदि तू अमृतत्वका साधन जानना चाहती है तो हे भवति -- हे देवि! मैं तेरे प्रति उस अमृतत्वके साधन-की व्याख्या करूँगा ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1146

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११३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय8 बाह प्रियतम आत्माके लिये ही सब वस्तुएँ प्रिय होती हैं TO स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा लिय अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु प्रिय स्त्री कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां प्रयो कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः होत प्रिया भवन्ति । न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं लिय भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे ब्राहलिय पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय होत पशवः प्रिया भवन्ति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म लिय प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा देवो अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय प्रिय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रयोहोत प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिय । भवन्ति । सब नवा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु अ कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भव-त्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ( मन इत श्रुत ' अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इद ँ सर्व वि विदितम् ॥ ६ ॥ मा

पृष्ठ 1147

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[ अध्याय8 - होती हैं - पतिः प्रियो यति । न वा वत्यात्मनस्तु अरे पुत्राणां माय पुत्राः य वित्तं प्रियं । न वा अरे स्तु कामाय कामाय ब्रह्म चति । न वा स्तु कामाय नाय लोकाः भवन्ति । त्यात्मनस्तु रे वेदानां नाय वेदाः भूतानि प्रियाणि प्रियं भव-आत्मा वा पासितव्यो इद सर्व ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ. ११३३ उन्होंने कहा - ' अरी मैत्रेयि! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय नहीं होते, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; होता, अपने ही प्रयोजन के लिये लोक प्रिय नहीं होते देवोंके प्रयोजन के लिये देव लिये धन प्रिय होता है; पशुओं के प्रयोजन के अपने ही प्रयोजन के लिये पशु प्रिय होते हैं, ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजन के क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकों के प्रयोजन के , अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते है; प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देव प्रिय होते हैं; वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं; भूतोंके प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिये भूत प्रिय होते हैं; सबके प्रयोजन के लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी मैत्रेयि! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और निदिध्यासन ( ध्यान ) करनेयोग्य है । हे मैत्रेयि! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है ' ॥ ६ ॥

आत्मनि खलु अरे मैत्रेयि दृष्टेः कथं दृष्ट आत्मनि १ इत्युच्यते — पूर्वमाचार्यागमाभ्यां श्रुते, पुनः तर्केणोपपच्या मते विचारिते, श्रवणं त्वागम-मात्रेण, मते उपपच्या, पश्चाद् ' हे मैत्रेयि! निश्चय ही आत्माका दर्शन हो जानेपर; किस प्रकार आत्माका दर्शन हो जानेपर, सो कहा जाता है— पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण और फिर तर्क एवं युक्तिसे मनन और विचार करनेपर शास्त्रमात्रसे तो श्रवण, युक्तिसे मनन और पीछे विशेषरूपसे जान लेनेपर

पृष्ठ 1148

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११३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ विज्ञाते - — एवमेतन्नान्यथेति निर्धारिते; किं भवति १ इत्यु-च्यते — - इदं विदितं भवति इदं सर्वमिति यदात्मनोऽन्यत्, आत्मव्यतिरेकेणाभावात् ॥ ६ ॥

. भेददृष्टिसे हानि दिखाकर ' तत्त्वका 2 ब्राह अर्थात् यह ऐसा ही है, अन्य A प्रकारका नहीं है - ऐसा निश्चय त कर लेनेपर क्या होता है? सो बत- परा लाया जाता है — यह ज्ञात हो जाता है अर्थात् यह सब जो कि आत्मासे कुमा भिन्न है, जान लिया जाता है; पश्य क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ है ही | नहीं || ६ || सब कुछ आत्मा ही है ' इस उपदेश— ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं घा तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परा-दुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रा- हे, त्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् नहीं उसक वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्व तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीद ँ सर्व ञ्छ यदयमात्मा ॥ ७ ॥ वा

ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न समझता है । क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजाति- बाह को आत्मासे भिन्न जानता है । लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको बजा आत्मासे भिन्न जानता है 1 । देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओं-को आत्मासे भिन्न समझता है । वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदों को आत्मासे भिन्न जानता है । भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न समझते हैं । सब उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको शह आत्मासे भिन्न जानता है । यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही वा हे ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1149

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[ अध्याय ४ ही है, अन्य - ऐसा निश्चय है? सोबत-ज्ञात हो जाता जो कि आत्मासे लिया जाता है; भिन्न कुछ है ही ही है ' इस वेद क्ष कास्तं परा-दुर्योऽन्यत्रा-मनो वेदान् वेद सर्व दं क्षत्रमिमे नीद सर्व पतिको आत्मासे जो क्षत्रियजाति-हैं, जो लोकों को हैं, जो देवताओं-ते हैं, जो वेदों को हैं, जो भूतोंको हैं, जो सबको जाति, ये लोक, सब आत्मा ही ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५ तमयथार्थदर्शिनं परादात् तात्पर्य यह है कि उस अनात्म-पराकुर्यात्, कैवन्यासम्बन्धिनं दर्शीको ' यह मुझे आत्मासे भिन्न-रूपमें देखता है ' इस अपराधसे कुर्यात् -- श्रयमनात्मस्वरूपेण मां परादात् -- पराकृत -- परास्त अर्थात् कैवल्यसे सम्बन्धरहित कर देते

पश्यतीत्यपराधादिति भावः । ७ ॥ है ॥ ७ ॥

सबको ' आत्मा ' रूपसे ग्रहरण करनेमें दृष्टान्त — स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दा-ञ्क्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्या-धातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥

वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि ( नक्कारे ) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ॥ ८ ॥

स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दा-ञ्क्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ६ ॥

वह [ दूसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुहसे फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करने में कोई समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ६ ॥

स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दा-ञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥

पृष्ठ 1150

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११३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ वाह वह [ तीसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे बजायी जाती हुई वीणा बाह्य शब्दों को ग्रहण करने में कोई समर्थ नहीं होता, किंतु वीणा या व्या वीणा बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥१० ॥ ( खि

सम्प ऐस स यथाऽऽद्वैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनि-श्वरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद् गन्ध यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः जिह इसी पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्या- संक नानि व्याख्यानानीष्ट ५ हुतमाशितं पायितमयं च अय लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सम पाय सर्वाणि निश्वसितानि ॥ ११॥ स यथा सर्वासामपा और

L समुद्र एकायनमेव सर्वेषा स्पर्शानां त्वगेकायनमेव सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव सर्वेषां रसानां का जिह्वैकायनमेव सर्वेषा रूपाणां चक्षुरेकायनमेव सर्वेषाँ शब्दाना श्रोत्रमेकायनमेव सर्वेषाँ संक- भव ल्पानां मन एकायनमेव सर्वासां विद्याना हृदयमेका- सर्व यनमेव सर्वेषां कर्मणा ँ हस्तावेकायनमेव सर्वेषामा- प्र नन्दानामुपस्थ एकायनमेव सर्वेषां विसर्गाणां पायु-पृथ रेकायनमेव सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ १२ ॥

वहा वह [ चौथा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला तं है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूएँ निकलते हैं, उसी प्रकार अत हे मैत्रेयि! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक ( ब्राह्मण - मन्त्र ), सूत्र ( वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य ), सूत्रोंकी