बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1161–1170
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170
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[ अध्याय४. -पक्षमें तो शरीर-हो ही नहीं सिवा " जिसके श्मशानपर्यन्त - विधान मन्त्रों-है, उसीका इस समझना चाहिये, हीं " ऐसी स्मृति दने जिस कर्मका किया है, वह होता है, ऐसा कर रही है । व प्रदर्शित करने-नेवालेका श्रुतिमें र नहीं है - ऐसा इसके सिवा " जो करता है, वह्न हा है " इस प्रकार न्दा करनेसे भी है । तु हमारे विचार-नादिका विधान दार्थका क्रिया में लिक है । क्योंकि व्युत्था-तात्पर्य दूसरा विशद करते " जीवनपर्यन्त III " जीवन-बासद्वारा यजन नयाँ जीवनमात्र-ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७ श्रुतीनां जीवनमात्रनिमित्तत्वाद् । यदा न शक्यतेऽन्यार्थता कल्प-यितुं तदा व्युत्थानादिवाक्यानां कर्मानधिकृतविषयत्व संभवात् । " कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजी-विषेच्छत समाः ” " ( ईशा ० २ ) इति च मन्त्रवर्णात् " जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा " इति च जरामृत्युभ्यामन्यत्र कर्म-वियोगच्छिद्रासंभवात् कर्मिणां श्मशानान्तत्वं न वैकल्पिकम् । काणक्कुब्जादयोऽपि कर्मण्यनधि-कृता अनुग्राह्या एव श्रुत्येति व्युत्थानाद्याश्रमान्तरविधानं नानुपपन्नम् । पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानव-काशत्वमिति चेत् । न; विश्वजित्सर्वमेधयोर्पाव-निमित्तवाली होनेके कारण, जब कोई अन्य तात्पर्यं होनेकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, तो व्युत्था-नादि वाक्योंका कर्मके अनधि-. कारियोंके विषयमें होना सम्भव है । " कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जोनेकी इच्छा करे " इस मन्त्रवर्णंसे भी यही सिद्ध होता है; तथा " इससे वृद्धावस्था के कारण मुक्त होता हैं । अथवा मृत्युसे " इस प्रकार जरा-और मृत्युके सिवा अन्यत्र कर्मका त्याग अथवा अवकाश सम्भव न होनेसे कर्मियों का श्मशानान्त होना. वैकल्पिक नहीं है ॥ कर्मके अनधि-कारी काने और कूबड़े लोगों पर भी श्रुतिको अनुग्रह करना ही है,. | इसलिये उनके लिये व्युत्थानादि अन्य आश्रमोंका विधान करना अयुक्त नहीं है । सिद्धान्ती - तो फिर [ ब्रह्मचर्यं से लेकर [ ] ] पारिव्राज्य ( संन्यास ) तक-के आश्रमका क्रमविधान निरव-काश होगा! पूर्व ० - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञोंमें जीवन-१. अर्थात् उस विधिके पालनका अवसर न मिलने से श्रुति में उसका विधान व्यर्थ होगा ।
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११४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय पारिव्राज्यक्रमविधा - जीवविघ्यपवाद -नस्यानवकाशत्व- त्वात् । यावज्जी-वारणम् वाग्निहोत्रादिविधे -विश्वजित्सर्वमेधयोरेवापवादः, तत्र च क्रमप्रतिपत्तिसम्भवः ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ' इति । विरोधानुपपत्तेः - न ह्येवंविष - । यत्वे पारिव्राज्यक्रमविधानवा -चयस्य कश्चिद् विरोधः क्रमप्रति । पत्तेः । अन्यविषयपरिकल्पनार्या तु यावज्जीवविधानश्रुतिः स्ववि-षयात् संकोचिता स्यात् । । क्रमप्रतिपत्तेस्तु विश्वजित्सर्वमे-धविषयत्वान्न कश्चिद् बाधः । न, श्रात्मज्ञानस्यामृतत्वहेतुत्वा-' परमतनिराकरणपूर्व - भ्युपगमात् । यत् -कं स्वमतस्थापनम् तावत्‘आत्मेत्येवो -४ ब्राह भर अग्निहोत्र करनेकी विधिका यह क्रम विधायक वचन अपवाद पार ( बाधक ) है [ अत: व्यर्थ नहीं है ] | नेि यावज्जीवन अग्निहोत्रादिकी जो संह विधि है, उसका विश्वजित् और सर्वमेघ यज्ञमें ही अपवाद है ' इस धन लिये वहाँ ' ब्रह्मचर्यं समाप्त करके गृहस्थ बने और गृहस्थसे वनवासी साथ होकर परिव्राजक हो ' ऐसी आश्रमों-तन की क्रमशः प्रतिपत्ति सम्भव है । इस प्रकार उन वाक्योंमें कोई विरोध नहीं आ सकता - पारि- मा व्राज्यके क्रमका विधान करनेवाले वाक्यका ऐसा विषय मान लेनेपर क्रमप्रतिपत्तिका कोई विरोध नहीं स्व रहता । उसका कोई अन्य विषय मज कल्पना करनेपर तो यावज्जीवन प्रा कर्मका विधान करनेवाली श्रुतिका मृ अपने विषयसे संकोच कर देना होगा । क्रमप्रतिपत्तिका विषय तो पा विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञ हैं, इस- वेद लिये उसका कोई बाध नहीं होता । क सिद्धान्ती -- ऐसा नहीं कह सकते; व क्योंकि आत्मज्ञानको अमृतत्वका हेतु माना गया है । ' आत्मेत्येवोपासीत ' १. क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध — इन दो यज्ञोंमें सर्वस्व दान कर दिया जाता है, इसलिये फिर अग्निहोत्रादि कर्मकी सामग्री न रहनेसे उनका होना असम्भव हो जाता है । अत: उन यज्ञोंमेंसे किसीका अनुष्ठान करनेवालेके लिये ही · अन्याश्रममें जानेकी विधि है - ऐसा इसका तात्पर्य है ।
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[ अध्याय8 करने की विधिका क वचन अपवाद तः व्यर्थ नहीं है ] । ग्निहोत्रादिकी जो विश्वजित् और अपवाद है ' इस-चर्य समाप्त करके गृहस्थसे वनवासी हो ' ऐसी आश्रमों-पत्ति सम्भव है । वाक्यों में कोई T सकता - पारि-विधान करनेवाले षय मान लेनेपर कोई विरोध नहीं कोई अन्य विषय तो यावज्जीवन करनेवाली श्रुतिका संकोच कर देना त्तिका विषय तो र्वमेध यज्ञ हैं, इस-बाध नहीं होता । नहीं कह सकते; को अमृतत्वका हेतु आत्मेत्येवोपासीत ' स्व दान कर दिया हने से उनका होना करनेवालेके लिये ही ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४ ९ पासीत ' इत्यारभ्य ' स एष नेति नेवि ' एतदन्तेन ग्रन्थेन यदुप-संहृतमात्मज्ञानं तदमृतत्वसा-धनम् — इत्यभ्युपगतं भवता । तत्र ' एतावदेवामृतत्व-साधनम्, अन्यनिरपेक्षम् ' इत्ये-तन्न मृष्यते । तत्र भवन्तं पृच्छामि किमर्थ -मात्मज्ञानं मर्षयति भवानिति? शृणु तत्र कारणम् —यथा स्वर्गकामस्य स्वर्गप्राप्त्युपाय-मजानतोऽग्निहोत्रादि स्वर्ग-प्राप्तिसाधनं ज्ञापयति, तथेहाप्य -मृतत्वप्रतिपित्सोरमृतत्वप्राप्त्यु-पायमजानतः “ यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि " इत्येवमा-काङ्क्षितममृतत्वसाधनम् “ एता-वदरे " इत्येवमादौ वेदेन ज्ञाप्यत इति । एवं तर्हि यथा ज्ञापितमग्नि-होत्रादि स्वर्गसाधनमभ्युपगम्पते यहाँसे लेकर ' स एष नेति नेति ' यहाँतक के ग्रन्यसे जिस आत्मज्ञान-का उपसंहार किया गया है, वह अमृतत्वका साधन है-- ऐसा आपने स्वीकार किया है । पूर्व ० - किंतु वहाँ अन्य किसी ( कर्म आदि ) की अपेक्षासे रहित केवल ज्ञान ही अमृतत्वका साधन है- यह कथन हम नहीं सह सकते! सिद्धान्ती - तो मैं श्रीमान्से पूछता हूँ कि आप आत्मज्ञानको किसलिये सहन करते हैं! पूर्व ० - इसमें जो कारण है वह सुनिये - जिस प्रकार स्वर्गप्राप्तिका उपाय न जाननेवाले स्वर्गकामी पुरुषको श्रुति अग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिके साधन बतलाती है, उसी प्रकार यहां भी अमृतत्व-प्राप्तिका साधन न जाननेवाले अमृतत्वप्राप्तिके अभिलाषीको वेदके द्वारा " एतावदरे खल्बमृतत्वम् ” इत्यादि मन्त्रोंमें " यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि " इत्यादि प्रकारसे इच्छा किये हुए अमृतस्वके साधन-का बोध कराया जाता है । सिद्धान्ती - इस प्रकार तो, जैसे श्रुति के द्वारा ज्ञात कराये हुए अग्नि-होत्रादि स्वर्गके साधन माने जाते हैं,
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११५० बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय तथेहाप्यात्मज्ञानम्; यथा ज्ञाप्यते । तथाभूतमेवामृतत्वसाधनमात्म--ज्ञानमभ्युपगन्तुं युक्तम्; तुल्य-प्रामाण्यादुभयत्र । यद्येवं किं स्यात् १ सर्व कर्महेतूपमर्दकस्वादात्म-ज्ञानस्य विद्योद्भवे कर्मनिवृत्तिः स्यात् । दाराग्निसम्बद्धानां ताव-दग्निहोत्रादिकर्मणां भेदबुद्धि-विषयसम्प्रदान कारकसाध्यत्वम् । श्रन्यबुद्धिपरिच्छेद्यां ह्यग्न्यादि-देवतां सम्प्रदानकारक भूतामन्त-रेण न हि तत् कर्म निर्वस्यते ॥ यया हि सम्प्रदानकार कंबुद्धया -सम्प्रदान कारकं कर्मसाधनत्वेनो-पदिश्यते, सेह विद्यया निव-त्येते - " अन्योऽसावन्योऽहम-स्मीति न स ' वेद " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) “ देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् 8 ब्राह उसी प्रकार यहाँ आत्मज्ञान भी समझना चाहिये । जिस प्रकार वेद ज्ञान कराया गया है, उसी स आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन मानना उचित है; क्योंकि श्रुतिका " ए प्रामाण्य दोनों जगह समान है । २० पूर्व ० - यदि ऐसा माना जाय ( ४ तो इससे क्या सिद्ध होगा? सिद्धान्ती - आत्मज्ञान कर्मके सम्पूर्ण हेतुओंका निवर्तक है, इस स्व लिये ज्ञानोदय होनेपर कर्मकी त्वा निवृत्ति हो जायगी । पत्नी और पुरु अग्निसे सम्बद्ध जो अग्निहोत्रादि नि कर्म हैं, वे भेदबुद्धिके विषय ' सम्प्रदानकारकद्वारा साध्य हैं । बस्त अन्य बुद्धि से परिच्छेद्य एवं ता | सम्प्रदानकारकभूता अग्नि आदि देवता के बिना वह कर्म निष्पन्न आ नहीं हो सकता और जिस सम्प्रदान- मण कारक बुद्धिसे सम्प्रदानकारक कर्मके साधनरूपसे उपदेश किया जाता है, वह इस ज्ञानावस्थामें कम ज्ञान से निवृत्त हो जाती है; जैसा तुल कि " वह अन्य है में अन्य हूँ — ऐसा जो जानता है, वह नहीं युक्त जानता ”, " जो देवताओंको अपने से भिन्न समझता है, निय देवता उसे परास्त कर देते हैं, निर १. जिसके उद्देश्यसे कुछ दिया जाता है; उसे सम्प्रदानकारक कहते हैं । अग्निसाध्य कर्मों में अग्निके उद्देश्यसे आहुति दी जाती है, इसलिये अग्निमें सम्प्रदान- मेद कारकत्व है; अत: वह कर्म सम्प्रदानकारकसाध्य कहा जाता है ।
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| अध्याय8 हाँ आत्मज्ञान भी प्रका या है, उसी प्रकार अमृतत्वका साधन है; क्योंकि श्रुतिका जगह समान है । ऐसा माना जाय सिद्ध होगा? - आत्मज्ञान कर्मके निवर्तक है, इस होनेपर कर्मकी यगी । पत्नी और जो अग्निहोत्रादि भेदबुद्धिके विषय द्वारा साध्य हैं । परिच्छेद्य एवं भूता अग्नि आदि वह कर्म निष्पन्न और जिस सम्प्रदान-सम्प्रदानकारक पसे उपदेश किया इस ज्ञानावस्था में हो जाती है; जैसा है मैं अन्य हूँ-ता है, वह नहीं " जो देवताओंको न समझता है, T स्त कर देते हैं, दानकारक कहते हैं । लिये अग्निमें सम्प्रदान-है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ वेद " ( ४ । ५। ७ ) “ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति " ( ४ । ४ । १ ९ ) | " एकधैवानुद्रष्टव्यम् ” ( ४।४ । २० ) " सर्वमात्मानं पश्यति " ( ४ । ४ । २३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च देशकालनिमित्ताद्यपेक्ष-त्वम् व्यवस्थितात्मवस्तुविषय-त्वादात्मज्ञानस्य । क्रियायास्तु पुरुषतन्त्रत्वात् स्याद् देशकाल -निमित्ताद्यपेक्षत्वम् । ज्ञानं तु वस्तुतन्त्रत्वान्न देशकालनिमि-चाद्यपेक्षते । यथाग्निरुष्ण आकाशोऽमृर्त इति तथात्मविज्ञान-अपि । नन्वेवं सति प्रमाणभूतस्य कर्मविधेर्निरोधः स्यात् । न च तुल्यप्रमाणयोरितरेतरनिरोधो न्युक्तः । न स्वाभाविक मेदबुद्धिमात्र -निरोधकत्वात्, न हि विध्यन्तर-निरोधकमात्मज्ञानं स्वाभाविक-मेदबुद्धिमात्रं निरुणद्धि । ११५१ “ जो यहाँ नाना देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ”, “ निर-न्तर एकरूप ही देखना चाहिये ”, " सबको आत्मरूप देखता है " इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । आत्मज्ञानका विषय कूटस्थ - नित्य आत्म - वस्तु है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं है । कर्म तो पुरुषके अधीन है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमि-तादिकी अपेक्षा है । किंतु ज्ञान वस्तुतन्त्र होनेके कारण देश, काल, निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं रखता । जिस प्रकार अग्नि उष्ण है और आकाश अमूर्त है – इन ज्ञानोंको देशादिकी अपेक्षा नहीं है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको भी नहीं है । पूर्व ० - किंतु ऐसा माननेपर तो प्रमाणभूत कर्मविधिका बाध हो जायगा और समान प्रमाणोंमेंसे एक - दूसरेका बाघ होना उचित नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान तो स्वाभाविक भेदबुद्धिमात्रका बाधक है, वह अन्य विधिका बाधक नहीं है, वह तो केवल स्वाभाविक भेदबुद्धिका ही बाघ करता है ।
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११५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तथापि हेत्वपहारात् कर्मा-नुपपत्तेर्विधिनिरोध एव स्यादिति चेत् । न, कामप्रतिषेधात् काम्य-प्रवृत्तिनिरोधवददोषात् । यथा स्वर्गकामो यजेतेति स्वर्गसाधने यागे प्रवृत्तस्य कामप्रतिषेधविधेः कामे विहते काम्ययागानुष्ठान -प्रवृत्तिर्निरुध्यते न चैतावता काम्यविधिर्निरुद्धो भवति । कामप्रतिषेधविधिना काम्य-विधेरनर्थकत्वज्ञानात् प्रवृत्यनुप-पत्तेर्निरुद्ध एव स्यादिति चेत् । भवत्वेवं कर्मविधिनिरो-धोऽपि । यथा कामप्रतिषेधे काम्य-विघेरेवं प्रामाण्यानुपपत्तिरिति पूर्व ० - इस प्रकार भी तो हेतुको वा निवृत्तिसे कर्मोंका होना असम्भव चेत | होनेके कारण विधिका ही निरोध हुआ । भा सिद्धान्ती- नहीं, कामनाके प्रति- मार षेधसे सकाम प्रवृत्तिके बाधके समान इसमें कोई दोष नहीं है । चेत जिस प्रकार ' स्वर्गकी कामनावाला यजन करे ' - इस वचनसे जो पुरुष पत्त स्वर्गके साधनभूत यज्ञमें प्रवृत्त है, उसकी कामनाका कामप्रतिषेध- फ विधिके अनुसार बाध हो जानेपर ज्ञा उसकी सकाम यज्ञके अनुष्ठानको प्रवृत्ति रुक जाती है; किंतु इतनेहीसे य सकाम कर्मों की विधिका बाध नहीं त हो जाता । पूर्व ० - कामप्रतिषेधविधिसे सकाम कर्मविधिको व्यर्थताका बोध हो भा जानेसे काम्यकमोंमें प्रवृत्ति न हो सकनेके कारण उसका निरोध हो च ही जायगा – ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - इस प्रकार भले ही कर्मविधिका भी निरोध हो जाय । ख पूर्व ० - जिस प्रकार कामनाका प्रतिषेध होनेपर काम्यविधिका प्रति-षेघ हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे स्थ कर्मविधिका बाध हो जानेपर उसका प्रामाण्य नहीं हो सकता । कर्म त १. क्योंकि जिनकी कामना निवृत्त नहीं हुई है, उनके लिये ल तो वह विधि सार्थक रहती ही है ।
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[ अध्याय४ भी तो हेतुको होना असम्भव विका ही निरोध , कामना के प्रति-प्रवृत्तिके बाधके ई दोष नहीं है की कामनावाला वचन से जो पुरुष यज्ञमें प्रवृत्त है, का कामप्रतिषेध-बाध हो जाने पर यज्ञके अनुष्ठानको है; किंतु इतनेहीसे विधिका बाध नहीं षेधविधि सकाम ताका बोध हो ममें प्रवृत्ति न हो उसका निरोध हो कहें तो? स प्रकार भले ही निरोध हो जाय । प्रकार कामनाका काम्यविधिका प्रति-उसी प्रकार ज्ञानसे हो जाने पर उसका हो सकता । कर्म लिये वह विधि ब्राह्मण ५! शाङ्करभाष्यार्थ ११५३ चेत् । अननुष्ठेयत्वेऽनुष्ठातुर - । मावादनुष्ठानविष्यानर्थक्यादप्रा-माण्यमेव कर्म विधीनामिति चेत् । न प्रागात्मज्ञानात् प्रवृत्युप-पत्तेः । स्वाभाविकस्य क्रियाकारक-फल मेद विज्ञानस्य प्रागात्म-ज्ञानात् कर्महेतुत्वमुपपद्यत एव, यथा कामविषये दोषविज्ञानोत्प-तेः प्राक् काम्यकर्मप्रवृत्तिहेतुत्वं स्यादेव स्वर्गादीच्छायाः स्वा-भाविक्यास्तद्वत् । तथा सत्यनर्थार्थो वेद इति चेत्! न अर्थानर्थयोरभिप्रायतन्त्र-स्वात् । मोक्षमेकं वर्जयित्वान्य-स्याविद्याविषयत्वात् । पुरुषाभिप्राय -तन्त्रौ झर्थानर्थो, मरणादिकाम्ये-अनुष्ठान करनेके योग्य नहीं है, ऐसा सिद्ध होनेपर अनुष्ठानकर्ताका अभाव हो जानेसे जब अनुष्ठान-विधिको सार्थकता हो नहीं रहो तो कर्मविधियों की अप्रामाणिकता ही होगी - ऐसा यदि कहें तो? सिद्धान्ती - यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें: प्रवृत्ति हो सकती है । स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलरूप भेद-ज्ञानका आत्मज्ञान से पूर्व कर्ममें हेतु होना सम्भव है ही; जिस प्रकार कि कामनाके विषयमें दोष-बुद्धि होनेसे पूर्व स्वर्ग आदिकी स्वाभाविक इच्छा ही काम्यकर्मों में सकाम मनुष्यकी प्रवृत्ति कराने में कारण हो ही सकती है, वैसे ही यहां समझना चाहिये । पूर्व ० - ऐसा माननेपर तो वेद अनर्थका हेतु है - यह सिद्ध होगा । सिद्धान्ती -नहीं; क्योंकि अर्थ और अनर्थं तो उद्देश्यके अधीन हैं । एकमात्र मोक्षको छोड़कर और सब अविद्या के ही विषय हैं । इस-लिये अर्थ और अनर्थं तो पुरुषके अभिप्रायके ही अधीन हैं, कारण [ महाभारतादिमें महाप्रस्थान-रूप | मरण आदिकी इच्छासे भी इष्टियों ( यज्ञों ) का विधान वृ ० उ ० ७३–
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११५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ष्टिदर्शनात् । तस्माद् यावदात्म-ज्ञानविधेराभिमुख्यं तावदेव कर्मविधयः । तस्मान्नात्मज्ञान-सहभावित्वं कर्मणामित्यतः सिद्ध-मात्मज्ञानमेवामृतत्वसाधनम् ' ए-तावदरे खल्वमृतत्वम् ' इति, कर्म-निरपेक्षत्वाज्ज्ञानस्य । श्रतो विदुषस्तावत् पारिव्राज्यं सिद्धं सम्प्रदानादिकर्मकारकजात्यादि -शून्याविक्रियब्रह्मात्म दृढप्रतिपत्ति-मात्रेण वचनमन्तरेणाप्युक्त-न्यायतः । तथा च व्याख्यातमेतत् ' येषां नोऽयमात्मायं लोकः ' इति हेतु -वचनेन पूर्वे विद्वांसः प्रजामका-मयमाना व्युत्तिष्ठन्तीति पारित्रा-ज्यं विदुषामात्मलोकावबोधादेव । तथा च विविदिषोरपि सिद्धं पारिव्राज्यम्, " एवमेवात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ” इति ४ । देखा जाता है । अत: जबतक पुरुष आत्मज्ञानसम्बन्धी विधिके अभि- व मुख न हो जाय तभीतक कर्मविधियाँ हैं । इसलिये कर्मोंका आत्मज्ञान के साथ रहना सम्भव नहीं है, अत: ' हे मैत्रेयी! निश्चय यही अमृतत्व है ' इस प्रमाणसे सिद्ध र होता है कि आत्मज्ञान ही अमृतत्व- म का साधन है, क्योंकि ज्ञानको न कर्मकी अपेक्षा नहीं है । इसलिये कोई प्रमाणभूत वचन न होनेपर भी उक्त न्यायसे सम्प्रदानादि कर्मों के कारक एवं जाति आदिसे या शून्य अविकारी ब्रह्ममें ही सुदृढ प्र आत्मभावके बोधमात्र से ही विद्वानके लिये तो संन्यास सिद्ध हो स हो जाता है । इसी प्रकार ' जिन हमको यह रा आत्मलाक अभीष्ट है ' इस हेतुवाक्य- क के द्वारा यह भी व्याख्या कर ही य दो गयी है कि पूर्ववर्ती विद्वान् प्रजा आदिकी इच्छा न करके गृहत्याग कर देते थे, अतः आत्मलोकके ज्ञानमात्रसे विद्वानोंके लिये पारि-व्राज्य ( संन्यास ) सिद्ध हो जाता है । ऐसे ही " इस आत्मलोककी हो 46 इच्छा रखनेवाले परिव्राजक वि ( संन्यासी ) होते हैं " इस वचनसे जिज्ञासुके लिये भी पारिव्राज्य सिद्ध
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[ अध्याय४ तः जबतक 2 पुरुष - विधि के अभि-जाय तभीतक इसलिये कर्मोंका रहना सम्भव मैत्रेयी! निश्चय प्रमाणसे सिद्ध न ही अमृतत्व-क्योंकि ज्ञानको हीं है । इसलिये चन न होनेपर सम्प्रदानादि जाति आदि में ही सु मात्र से ही संन्यास सिद्ध ही जन हमको यह ' इस हेतुवाक्य-याख्या कर ही विद्वान् प्रजा करके गृहत्याग आत्म लोकके के लिये पारि होता है । हम लोककी ही परिव्राजक इस वचनसे रिव्राज्य सिद्ध ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५५ A वचनात् । कर्मणां चाविद्वद्विषय- । स्वमवोचाम । अविद्याविषये चोत्पत्यादिविकारसंस्कारार्थानि कर्माणीत्यत श्रात्मसंस्कारद्वा-रेणात्मज्ञानसाधनत्वमपि कर्मणा-मवोचाम यज्ञादिभिर्विविदिष-न्तीति । अथैवं सति श्रविद्वद्विषयाणा-माश्रमकर्मणां बलाबलविचारणा-यामात्मज्ञानोत्पादनं प्रति यम-प्रधानानाममानित्वादीनां मान-सानां च ध्यानज्ञानवैराग्यादीनां सन्निपत्योपकारकत्वम्, हिंसा-रागद्वेषादिवाहुन्याद् बहुक्लिष्ट -कर्मविमिश्रिता इतरे, इत्यतः पारिव्राज्यं मुमुक्षूणां प्रशंसन्ति-" त्याग एव हि सर्वेषा-मुक्तानामपि कर्मणाम् । वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमोऽवधिः ॥ " " किं ते धनेन किमु बन्धुभिस्ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं होता है! कर्म अज्ञानियोंके लिये हैं - यह भी हम कह चुके हैं । अविद्याके क्षेत्रमें भी उत्पत्ति आदि विकार और संस्काररूप प्रयोजनके लिये कर्म हैं, इसलिये हमने ' यज्ञादिके द्वारा आत्माको जानने-की इच्छा करते हैं ' ऐसा कहकर | चित्तके संस्कारद्वारा कर्मोंका आत्मज्ञान में साधन होना भी बतलाया है । ऐसी स्थितिमें अज्ञानियों से सम्बद्ध आश्रमकर्मो के बलाबलका विचार करनेपर यह सिद्ध होता है कि अमानित्वादि यमप्रधान और ध्यान -ज्ञान - वैराग्यादि मानस कर्म आत्मज्ञानको उत्पत्ति में सन्निपत्योप-कारक ( साक्षात् उपयोगी ) हैं । अन्य कर्म हिंसा एवं राग - द्वेष आदिकी बहुलता के कारण बहुत - से क्लिष्ट कर्मोंसे मिले हुए हैं; इसलिये मुमुक्षुके लिये पारिव्राज्य ( संन्यास ) की ही प्रशंसा करते हैं; यथा-“ सम्पूर्ण उक्त कर्मोंका भी त्याग ही करना चाहिये । इस मोक्षकी परम अवधि वैराग्य ही है । " " हे ब्राह्मण! जो तू एक दिन मरेगा हो, तो तेरे लिये घनसे, बन्धुओंसे अथवा स्त्रियोंसे क्या प्रयोजन हे? तू अपनी बुद्धिरूपी गुहामें प्रविष्ट आत्माका अनुसंधान
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१ ९ ५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥ " एवं सांख्ययोगशास्त्रेषु च संन्यासो ज्ञानं प्रति प्रत्यासन्न उच्यते । कामप्रवृत्त्यभावाच्च । कामप्रवृत्तेर्हि ज्ञानप्रतिकूलता सर्वशास्त्रेषु प्रसिद्धा, तस्माद् विरक्तस्य मुमुक्षोर्विनापि ज्ञानेन ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेदित्याद्युप पन्नम् । ननु सावकाशत्वादनधिकृत-विषयमेतदित्युक्तम्, यावज्जीव-श्रुत्युपरोधात् । नैष दोषः, नितरां सावकाश-त्वाद् ' याबञ्जीव’श्रुतीनाम् अविद्वत्कामिकर्तव्यतां ह्यवोचाम सर्वकर्मणाम् । न तु निरपेक्षमेव ४ कर देख, तेरे पिता - पितामह आदि वा कहाँ चले गये? ” इसी प्रकार सांख्य और योग- जी शास्त्रोंमें भी संन्यास ज्ञानका प्रा समीपवर्ती कहा जाता है । कामना की प्रवृत्तिका अभाव होने- का के कारण भी वह ज्ञानका अन्तरङ्ग नय साधन है । सकामप्रवृत्ति ज्ञानके प्रतिकूल है, यह तो सभी शास्त्रोंमें च प्रसिद्ध है; अतः विरक्त मुमुक्षुके स लिये ज्ञान न होनेपर भी ' ब्रह्मचर्यं -से ही संन्यास ले ले ' इत्यादि विधि उचित ही है । पूर्व ० - किंतु हम यह पहले कह गा . चुके हैं कि [ सामग्री के अभाव में ] ' जीवनभर अग्निहोत्र करे ' इस पेच विधिका निरोध हो जानेसे ' ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' इस श्रुतिको मन अवकाश मिल जाता है, इसलिये जि यही मानना उचित है कि संन्यास य कर्मके अनधिकारी के लिये ही है । त सिद्धान्ती – यहाँ यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि जीवनभर अग्निहोत्र विधान करनेवाली श्रुतियोंको सदा ही अवकाश है श्र [ उनका कभी निरोध नहीं होता ]; पा क्योंकि सम्पूर्ण कर्मोंकी कर्तव्यता अज्ञानी और सकाम पुरुषोंके " लिये है, यह हम बता आये हैं । बिना किसी इच्छा के थ