बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1171–1180

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180

पृष्ठ 1171

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[ श्रध्याय8 ता - पितामह आदि सांख्य और योग-न्यास ज्ञानका हा जाता है । का अभाव होने-ज्ञानका अन्तरङ्ग मप्रवृत्ति ज्ञानके सभी शास्त्रों में विरक्त मुमुक्षुके र भी ' ब्रह्मचर्य -' इत्यादि विधि यह पहले ह ग्री के अभाव में ] करे इस हो जाने से त् ' इस श्रुतिको ता है, इसलिये है कि संन्यास के लिये ही है । यह दोष नहीं कि जीवनभर न करनेवाली ही अवकाश है ध नहीं होता ]; मकी कर्तव्यता काम पुरुषोंके बता आये कसी इच्छा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११५७ जीवननिमित्तमेव कर्तव्यं कर्म, । प्रायेण हि पुरुषाः कामच हुलाः, कामश्चानेकविषयोऽनेक कर्मसाध-नसाध्यश्च, अनेक फलसाधनानि च वैदिकानि कर्माणि दाराग्नि-सम्बन्ध पुरुषकर्तव्यानि पुनः पुन-श्वानुष्ठीयमानानि बहुफलानि कृप्यादिवद् वर्ष रातसमाप्तीनि च गार्हस्थ्ये वारण्ये वा अतस्तद-पेक्षया ' यावज्जीव ' श्रुतयः, " कुर्वन्नेवेह कर्माणि " इति च मन्त्रवर्णः । तस्प्रिश्च पक्षे विश्व-जित्सर्वमेधयोः कर्म परित्यागः । यस्मिश्च पक्षे यावज्जीवानुष्ठानं तदा श्मशानान्तत्वं भस्मान्तता च शरीरस्य । इतरवर्णापेक्षा वा यावज्जीव-श्रुतिः । न हि चत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति । तथा " मन्त्रैर्यस्यो दितो विधिः " " ऐका-श्रम्यं त्वाचार्याः " इत्येवमादीनां । ही केवल जीवन के निमित्त ही कर्म कर्तव्य नहीं है, प्रायः लोग अधिक कामनाएँ रखनेवाले होते हैं, कामना-के विषय भी बहुत - से हैं और वे अनेकों कर्म एवं साधनोंसे साध्य हैं; वैदिक कर्म भी अनेक फलोंके साधन हैं और वे स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके ही कर्तव्य हैं, बारंबार अनुष्ठान किये जानेपर वे कृषि आदिके समान. बहुत - से फल देनेवाले हैं तथा गार्हस्थ्य अथवा वानप्रस्थ आश्रममें सौ वर्षों में समाप्त होनेवाले हैं; अतः उनकी अपेक्षा से आजीवन अग्नि -होत्रका विधान करनेवाली श्रुतियाँ और " कुर्वन्नेवेह कर्माणि ” यह मन्त्रवर्णं है । उसी पक्षमें विश्वजित् और सर्वमेधमें कर्मका परित्याग भी है और जिस पक्षमें कर्मका जीवनभर अनुष्ठान विहित है, वहीं शरीरका अन्त श्मशान और भस्म-के रूपमें होता है । अथवा आजीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुति ब्राह्मणेतर वर्णों की अपेक्षा से भी हो सकती है; क्योंकि क्षत्रिय और वैश्य के लिये संन्यासकी प्राप्ति नहीं है तथा " जिस की विधि मन्त्रोंद्वारा बतलायी गयी है " " आचार्योंने इनको एकाश्रमी बतलाया है "

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११५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ 2 क्षत्रियवैश्यापेक्षत्वम् । तस्मात । पुरुषसामर्थ्यज्ञानवैराग्यकामाद्य-पेक्षया व्युत्थान विकल्पक्रम पारि-व्राज्यप्रतिपत्तिप्रकारा न विरु-ध्यन्ते । अनधिकृतानां च पृथ-ग्विधानात् पारिव्राज्यस्य “ स्ना-तको बास्नाको वोत्सन्नाग्निर नग्निको वा " इत्यादिना । तस्मात् सिद्धान्याश्रमान्तराण्यधिकृताना-मेव ॥ १५ ॥

इत्यादि वाक्य क्षत्रिय और वैश्यको अपेक्षासे हैं | अतः पुरुषके सामर्थ्यं, ज्ञान, वैराग्य और कामनादिकी अपेक्षा से व्युत्थान के विकल्प तथा क्रमसे संन्यासग्रहण के प्रका विरोध नहीं है । स्नातक ' हो अथवा अस्नातक ' हो, उत्सन्नाग्नि हो अथवा अनग्नि ' हो " इत्यादि वाक्यद्वारा अनधिकारियोंके लिये. तो पारिव्राज्यका अलग ही विधान किया है अतः यह सिद्ध हुआ कि आश्रमान्तर अधिकारियोंके लिये ही हैं ॥ १५ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये पञ्चमं मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ५ ॥

षष्ठ ब्राह्मण ब्रा गौ ग I I ग I I स I क I श क I ज गौ I I ल्य याज्ञवल्कीय काण्डकी वंश - परम्परा अथ वँशः पौतिमाष्यो गौपवनः गौपवनः कौण्डिन्यः १. जिसने २. जिसने ३. जिसने ४. जिसने पौतिमाष्यात् पौतिमाष्यो कौशिकात् कौशिकः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः , विद्यासमाप्ति के अनन्तर गुरुगृह त्याग किया हो विद्यासमाप्तिसे पूर्व ही गुरुगृह छोड़ दिया हो । स्त्रीके रहते हुए ही अग्निको त्याग दिया हो । स्त्रीके न रहनेपर अग्निको छोड़ा हो । गौपवनाद् गौपवनाद् कौण्डिन्यात् कौशिकाच्च । क वि I I I सौ I I स एक I

पृष्ठ 1173

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[ अध्याय ४ त्रय और वैश्य की पुरुष के सामर्थ्य, कामनादिकी के विकल्प तथा के प्रकारोंका नातक ' हो अथवा उत्सन्नाग्निहो हो " इत्यादि कारियोंके लिये. अलग ही विधान सिद्ध हुआ कि कारियोंके लिये गौपवनाद् गौपवनाद् कौण्डिन्यात् कौशिकाच्च ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ ९ गौतमाच्च गौतमः ॥ १॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद्

गायों गार्ग्याद् गार्ग्यो गौतमाद् गौतमः सैतवात् सैतवः पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् गार्ग्यायण उद्दालकायनादुद्दालकायनो जाबालायना-ज्जाबालायनो माध्यन्दिनायनान्माध्यन्दिनायनः सौकरायणात् सौकरायणः काषायणात् काषायणः सायकायनात् सायकायनः कौशिकायनेः कौशि-कायनिः ॥ २ ॥ घृतकौशिकाद् घृतकौशिकः पारा-शर्यायणात् पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातू-कर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायणस्त्रे-वणेस्त्रैवणिरौपजन्धने रौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वा-जादू भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो माण्टेर्माण्टिगतमाद्

गौतमो गौतमाद गौतमो वात्स्याद् वात्स्यः शाण्डि -ल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवाद् गालबो विदर्भीकौण्डिन्याद् विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूते-स्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्राद् विश्वरूप-स्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद् दध्यङ्-ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्व ँ -सनान्मृत्युः प्राध्व ँसनः प्रध्वसनात प्रसन एकर्षे रेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः

पृष्ठ 1174

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११६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 ब्राह सनारुः सनातनात् सनातनः सनगात् सनगः परमेष्ठिनः. परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥

काय मधु अब [ याज्ञवल्कीय काण्डका ] वंश बतलाया जाता है— पौतिमाष्यने तु गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने नम कौशिकसे, कोशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे तथा गौतमने ॥ १ ॥ अग्निवेश्य से, आग्निवेश्यते

गार्ग्यसे, गार्ग्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गौतमसे, गौतमने सैतवसे, सैतवने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने गार्ग्यायणसे, गार्ग्यायणने उद्दालकायनसे, उद्दालकायनने जाबालायन से, जाबालायन ने माध्यन्दिनायन से, माध्यन्दि नायनने सोकरायणसे, सौकरायणने काषायणसे, काषायणने सायकायनसे, सायकायन ने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने ॥ २ ॥ घृतकौशिकंसे,

घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने जातकयंसे, जातूकर्ण्यने आसुरायणसे, और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्यं काप्यसे, कैशोर्यं काप्यने कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विदर्भी कौण्डिन्यसे, विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपाद् बाभ्रवसे, वत्सनपाद् बाभ्रवने पन्था सोभरसे, पन्था सौभरने अथास्य आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रसे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा देवसे, अथर्वा देवने मृत्यु प्राध्वंसनसे, मृत्यु प्राध्वंसनने प्रध्वंसन से, प्रध्वंसनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे व्यष्टिने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातन

सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे, परमेष्ठीने ब्रह्मासे [ यह विद्या प्राप्त की ] ।

ब्रह्म स्वयम्भू है; ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1175

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[ अध्याय8 गः परमेष्ठिनः : 113 11 हे - पोतिमाष्यने नवनसे, गौपवनने न्यसे, शाण्डिल्यने यसे, आग्निवेश्य - सेतवसे, सैतवने न उद्दालकायनसे, यनसे, माध्यन्दि सायकायनसे, ॥ घृतकौशिकंसे, से, पाराशर्यने से, आसुरायणने सुरसे, आसुर माण्टिने गौतमसे, न्यसे, शाण्डिल्यने हारितने गालवसे, नपाद् बाभ्रवसे, नास्य आङ्गिरससे, विश्वरूप त्वाष्ट्रसे, दध्यङ्काथर्वणसे, प्राध्वंसनसे, मृत्यु ने विप्रचित्तिसे, नसे, सनातनने प्राप्त की ] । ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ अथानन्तरं याज्ञवल्कीयस्य काण्डस्य वंश श्रारभ्यते यथा मधुकाण्डस्य वंशः । व्याख्यानं तु पूर्ववत् । ब्रह्म स्वयं ब्रह्मणं नम श्रमिति ॥ १-३ ॥ ११६१ अथ - आगे याज्ञवल्कीय काण्डका वंश आरम्भ किया जाता है । जैसा कि मधुकाण्डका वंश था । इसकी व्याख्या तो पूर्ववत् समझनी चाहिये । ब्रह्म स्वयम्भू है, ब्रह्मको नमस्कार है, ॐ इति ॥ १-३ ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये ६ ष्ठं वंशब्राह्मणम्ः ॥ ६ ॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंस परिब्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद् -भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1176

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ब्राह्म पञ्चम अध्याय प्रथम ब्राह्मण a ( का पूर्णक रहता पूर्णब्रह्म और उससे उत्पन्न होनेवाला पूर्ण कार्य पूर्ण पूर्णमद इत्यादि खिलकाण्ड-मारस्यते । अध्यायचतुष्टयेन यदेव ' साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरो निरुपाधिको ऽशनायाद्यतीतो नेति नेतीति व्यपदेश्यो निर्धारितः यद्विज्ञानं केवल ममृतत्वसाधनम्, अधुना तस्यैवात्मनः सोपाधिकस्य शब्दार्थादिव्यवहार विषयापन्नस्य पुरस्तादनुक्तान्युपासनानि कर्म-मिरविरुद्धानि प्रकृष्टाभ्युदय-साधनानि क्रममुक्तिमाञ्जि च वानि वक्तव्यानि इति परः सन्दर्भः, सर्वोपासनशेषत्वेनोङ्कारो दमं दानं दयामित्येतानि च विधित्सितानि । ! अब ' पूर्णमद: ' इत्यादि ' खिल- व्याव काण्ड आरम्भ किया जाता है । कर्तर चार अध्यायोंके द्वारा जिस साक्षात् | अपरोक्ष ब्रह्म तथा जिस सर्वान्तर, ताम निरुपाधिक, क्षुधादिसे रहित और ब्रह्मेर ' नेति नेति ' इस प्रकार संकेत किये जाने योग्य आत्माका निश्चय किया वद्व गया है तथा जिसका भलीभाँति चत | ज्ञान हो जाना ही एकमात्र अमृत-| त्वका साधन है, शब्दार्थादि व्यवह व्यवहारकी विषयताको प्राप्त हुए परमा उसी सोपाधिक आत्माकी उन् उपासनाओं का, जिनका कि पहले परिि उल्लेख नहीं हुआ और जो कमसे वा अविरुद्ध, परम उत्तम अभ्युदयकी साधनभूत एवं क्रममुक्तिकी प्राप्ति ब्रह्म करानेवाली हैं, अब वर्णन करना उद्रिच है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ है । यद्यप सम्पूर्ण उपासनाओंके अङ्गरूपसे तथा ओंकार, दम, दान और दया-इनका विधान करना अभीष्ट है । परमा १. पूर्वकथित विषयसे अवशिष्ट विषयको ' खिल ' कहते हैं । अत: खिल- मेवो काण्डका अर्थ ' परिशिष्ट प्रकरण ' समझना चाहिये ।

पृष्ठ 1177

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कार्य ' इत्यादि ' खिल-किया जाता है । द्वारा जिस साक्षात् ना जिस सर्वान्तर, दिसे रहित और नकार संकेत किये का निश्चय किया जसका भलीभांति एकमात्र अमृत-है, शब्दार्था यताको प्राप्त हुए आत्माकी उन जिनका कि पहले और जो कमसे उत्तम अभ्युदयकी मुक्तिकी प्राप्ति नब वर्णन करना का ग्रन्थ है | ओंके अङ्गरूपसे न और दया-दना अभीष्ट है । हैं । अत: खिल-ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६३

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ १ ॥

वह ( परब्रह्म ) पूर्ण है और वह ( सोपाधिक ब्रह्म भी ) पूर्ण है । यह ( कार्यात्मक ) पूर्ण ( कारणात्मक ) पूर्णसे ही उत्पन्न होता है । इस पूर्णका पूर्ण ( अविद्याकृत अन्यत्वाभास ) निकाल लेनेपर पूर्ण ही बच रहता है ॥ १ ॥

पूर्णमदः पूर्णं न कुतश्चिद् व्यावृत्तं व्यापीत्येतत् । निष्ठा च कर्तरि द्रष्टव्या । अद इति परो-क्षाभिधायि सर्वनाम, तत् परं ब्रह्मेत्यर्थः । तत् सम्पूर्णमाकाश-वद् व्यापि निरन्तरं निरुपाधिक च तदेवेदं सोपाधिकं नामरूपस्थं व्यवहारापन्नं पूर्णं स्वेन रूपेण परमात्मना व्याप्येव नोपाधि-परिच्छिन्नेन विशेषात्मना । तदिदं विशेषापन्नं कार्यात्मकं ब्रह्म पूर्णात् कारणात्मन उदच्यत उद्रिच्यत उद्गच्छतीत्येतत् । यद्यपि कार्यात्मनोद्रिच्यते तथापि यत् स्वरूपं पूर्णत्वं परमात्मभावं तन्न जहाति पूर्ण-मेवाद्रिच्यते । ' पूर्णमदः ' - पूर्णम् - जो कहीं से भी व्यावृत्त नहीं है, यानी व्यापक है । पूर्ण शब्द में जो निष्ठासंज्ञक ' क्त ' ' प्रत्यय हुआ है, उसे कर्ता अर्थमें-समझना चाहिये । ' अदः ' यह पद परोक्ष अर्थको बतलानेवाला सर्व-नाम है, इसका अर्थ है वह-परब्रह्म । वह सम्पूर्ण है, यानी आकाशके समान व्यापक, अन्तर-रहित और उपाधिशून्य है । वह यह नाम - रूप में स्थित व्यवहार -दशाको प्राप्त सोपाधिकरूप भी पूर्ण है अर्थात् अपने परमात्मस्वरूपसे. व्यापक ही है- उपाधिपरिच्छिन्न ( सोमित ) विशेषरूप से व्यापक-नहीं है । वह यह विशेषभावको प्राप्त हुआ कार्यात्मक ब्रह्म पूर्णसे कारणा-त्मक ब्रह्मसे ' उदच्यते ' -- उद्रिक्तः होता अर्थात् उद्गत ( प्रकट ) होता है । यद्यपि यह कार्यंरूपसे प्रकट होता है तो भी इसका स्वरूप-भूत जो पूर्णत्व अर्थात् परमा-त्मभाव है, उसे नहीं छोड़ अर्थात् पूर्ण ही प्रकट होता है ।

पृष्ठ 1178

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११६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय पूर्णस्य कार्यात्मनो ब्रह्मणः पूर्ण पूर्णत्वमादाय गृहीत्वा आत्म-स्वरूपैकरसत्वमापद्य, विद्यया विद्याकृतं भूतमात्रो राधिसंसर्ग ' जमन्यत्वाभासं तिरस्कृत्य पूर्णमे चानन्तरमबाह्यं प्रज्ञानघनैकरस स्वभावं केवलं ब्रह्मावशिष्यते । यदुक्तम ' ब्रह्म वा इदमग्र -'ब्रह्म वै ' इत्यादि आसीत् तदात्मान-मन्त्रेण समानार्थत्व- मेवावेत् तस्मात्चत् प्रदर्शनम् सर्वमभवत् ' ( १ । -४ । १० ) इत्येषोऽस्य मन्त्र-स्यार्थः । तत्र ब्रह्मेत्यस्यार्थः पूर्णमद इति । इदं पूर्णमिति ब्रह्म चां इदमग्र आसीदित्यस्यार्थः 1 - तथाच श्रुत्यन्तरम् “ यदेवेह तदमुत्र मुत्र तदन्विह " ( क ० उ ० २। १ । १० ) इति । श्रतोऽदः शब्दवाच्यं पूर्ण ब्रह्म -तदेवेदं पूर्णं कार्यस्थं नामरूपो पाधिसंयुक्तम विद्ययोद्रिक्तम् । तस्मादेव परमार्थस्वरूपा-दन्यदिव प्रत्यवभासमानम् । तद् यदात्मानमेव परं पूर्ण ब्रह्म विदित्वा ' अहमदः पूर्णं ५ ब्राह्म इस पूर्ण यानी कार्यरूप सम्पूर्ण पूर्णत्व ' आदाय ' ब्रह्मका लेकर ब्रह्मा अर्थात् उसे आत्मस्वरूपके साथ एकरस करके विद्याके द्वारा स्कूल द्याकृत भूतमात्रोपाधिके संस अवि- नामर होनेवाली भेद - प्रतीतिको मिटा देने. aapa पर पूर्णं ही अर्थात् अन्तरबाह्यक्षय शिष्य प्रज्ञानघनैकरसस्वरूप शेष रहता है । शुद्ध ब्रह्म हो ' तस्म पहले जो यह कहा गया था १० ) ' ब्रह्म ' वा इदमग्र आसीत् तदात्मान. यः मेवावेत् तस्मात् तत् सर्वमभवत् ' • एषोऽ यही इस मन्त्रका भी अर्थ है । इसमें सम्ब ' ब्रह्म ' इस पदका अर्थ है ' पूर्णमद: ' वे और ' इदं पूर्णम् ' यह ' ब्रह्म वा ङ्कारद इदमग्र आसीत् ' इस वाक्यका अर्थ तानि है । ऐसी ही एक दूसरी श्रुति भी सर्वोप हे " यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । ” अतः ' अदः ' शब्दवाच्य जो पूर्णब्रह्म है वही ' इदं पूर्णम् ' द्वैताद्वैत अर्थात् कार्यवर्ग में स्थित नाम - रूपा प्रद त्मक उपाधिसे युक्त अविद्याजनित कार्य ( कार्यंब्रह्म ) है । वह उसी परमार्थ-स्वरूप परब्रह्म से अन्यके समान परमाथ प्रतीत होता है । ऐसी स्थिति में प्रलयच जब अपनेको ही पूर्ण परब्रह्म जानकर ' में ही वह पूर्ण ब्रह्म हैं ' तामाद सर्व हो १. आरम्भ में यह एक ब्रह्म हो था, उसने अपनेको जाना, इसलिये वह मेवाव गया । २. जो यहाँ है, वही परलोकमें है और जो परलोकमें है, वही यहाँ मुत्पत्त ( इस देहेन्द्रियरूप उपाधि में ) है ।

पृष्ठ 1179

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[ अध्याय५ नी कार्यरूप ब्रह्मका च ' आदाय ' - लेकर आत्मस्वरूपके साथ विद्याके द्वारा अवि-त्रोपाधिके संसर्गसे प्रतीतिको मिटा देते. र्थात् अन्तरबाह्यशून्य स्वरूप शुद्ध ब्रह्म हो यह कहा गया था आसीत् तदात्मान. न्तु तत् सर्वमभवत् ' कभी अर्थ है । इसमें का अर्थ है ' पूर्णमद: ' ' म् ' यह ' ब्रह्म वा इस वाक्यका अर्थ एक दूसरी श्रुति भी तदमुत्र यदमुत्र : ' अदः ' शब्दवाच्च वही ' इदं पूर्णम् ' में स्थित नाम - रूपा व्युक्त अविद्याजनित । वह उसी परमार्थ-अन्य के समान 61. ऐसी स्थिति में ही पूर्णं परब्रह्म वह पूर्ण ब्रह्म हूँ ' जाना, इसलिये वह में हैं, वही यहाँ ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्मास्मि ' इत्येवं पूर्णमादाय तिर स्कृत्या पूर्णस्वरूपतामविद्याकृतां नामरूपोपाचिसम्पर्कजामेतया व्र-अविद्यया पूर्णमेव केवलमव -शिष्यते । तथा चोक्तम् — ' तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' ( १ । ४ । ( १० ) इति । यः सर्वोपनिषदर्थो ब्रह्म स - एषोऽनेन मन्त्रेणानूद्यत उत्तर-सम्बन्धार्थम् । ब्रह्मविद्यासाधन-त्वेन हि वक्ष्यमाणानि साधनान्यो ङ्कारदमदानदयाख्यानि विधित्सि-तानि खिलप्रकरणसम्बन्धात् सर्वोपासनाङ्गभूतानि च । अत्र वर्णयन्ति पूर्णात द्वैताद्वैतवादिमत कारणात् पूर्ण कार्य -प्रदर्शनम् मुद्रिच्यते । उद्रिक्तं कार्य वर्तमानकालेऽपि पूर्णमेव परमार्थवस्तुभूतं द्वैतरूपेण । पुनः प्रलयकाले पूर्णस्य कार्यस्य पूर्ण-तामादायात्मनिधित्वा पूर्ण-मेवावशिष्यते कारणरूपम् । एव-मुत्पत्तिस्थितिप्रलयेषु त्रिष्वपि ११६५ - इस प्रकार पूर्णत्वको लेकर इस ब्रह्मविद्या के द्वारा अविद्याकृत नाम-रूप पाधिके संसर्गसे उत्पन्न हुई: अपूर्णरूपताका तिरस्कार कर दिया जाता है तो केवल पूर्णं ही रहः जाता है । यही बात ' तस्मात्तत्सर्वं--मभवत् ' इस वाक्यके द्वारा कही गयी है । जो सारे उपनिषद्का अर्थभूत-[ ब्रह्म ] है, उसीका आगेके ग्रन्यसे सम्बन्ध प्रदर्शित करने के लिये इस: मन्त्रके द्वारा अनुवाद किया जाता हे तथा जो खिलप्रकरणकेः सम्बन्धसे सारी उपासनाओंके अङ्गभूत हैं, उन ओङ्कार, दम, दान और दयासंज्ञक साधनों का भी यहीं ब्रह्मविद्या के साधन रूपसे विधानः करना अभीष्ट है । यहाँ एक पक्षवाले ( द्वेताद्वेत-वादी ) विद्वान् ऐसा वर्णन करते हैं कि पूर्णं कारणसे पूर्ण कार्य उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न हुआ कार्य वर्तमान समय में भी पूर्णं ही है.. अर्थात् द्वेतरूपसे परमार्थं वस्तुभूत ही है । फिर प्रलयकाल में पूर्ण कार्यंकी पूर्णताको लेकर उसका आत्मामें ही आधान करनेपर कारणरूप पर्णं ही रह जात है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तीनों ही कालोंमें

पृष्ठ 1180

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११६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय कालेषु कार्यकारणयोः पर्णतैव । सा चैकैव पूर्णता कार्यकारणयो-र्भेदेन व्यपदिश्यते । एवं च द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्म । यथा किल समुद्रो जलतरङ्ग-फेनबुदबुदाद्यात्मक एव । यथा च जलं सत्यं तदुद्भवाश्च तरङ्ग-फेन बुदबुदादयः समुद्रात्मभूता एवाविर्भाव तिरोभावधर्मिणः पर-मार्थसत्या एव । एवं सर्वमिदं द्वैतं परमार्थसत्यमेव जल -तरङ्गादिस्थानीयम्, समुद्रजल -- स्थानीयं तु परं ब्रह्म । एवं च किल द्वैतस्य सत्यत्वे कर्मकाण्डस्य प्रामाण्यम्, यदा पुनद्वैतं द्वैतमिवाविद्याकृतं मृग--तृष्णिकावदनृतम्, अद्वैतमेव पर मार्थतः, तदा किल कर्मकाण्डं विषयाभावादप्रमाणं भवति ॥ तथा च विरोध एव स्यात् — देशभूतोपनिषत् प्रमाणम्, परमार्थाद्वैतवस्तु प्रतिपादकत्वात्; अप्रमाणं कर्मकाण्डम्, अद्वैत-विषयत्वात् । तद्विरोधपरिजिही- । ५ ब्राह्म । कार्य - कारणकी पूर्णता ही है । यह एक पूर्णता ही कार्य - कारणके संदर्भ र्षया कही जाती है । इस प्रकार द्वैताद्वैत- सत्यत रूप एक ही ब्रह्म है । जिस प्रकार समुद्र जल - नरङ्ग- इत्या फेन बुदबुदादिरूप ही है और तद उसमें जैसे जल सत्य है, विकल प्रकार उससे होनेवाले आविर्भाव-तिरोभाव - धर्मी तिरङ्ग, फेन एवं सुविच बुदबुदादि भी समुद्ररूप और पर-मार्थं सत्य ही हैं । इस प्रकार यह यया | जलतरङ्गादिस्थानीय सारा द्वैत परमार्थं सत्य ही है और परब्रह्म तो कदेशेऽ समुद्रके जलस्थानीय ही है । इस प्रकार द्वैतके सत्य होनेपर " अहि ही कर्मकाण्डकी प्रामाणिकता हो भ्यः " सकती है । जब द्वैत केवल द्वेत - सा तथा अविद्याकृत और मृगतृष्णा के इति हिं समान मिथ्या है, परमार्थतः अद्वैत ही सत्य है - ऐसा कहते हैं तब तो निवारि अपने विषयका अभाव हो जानेके ज्योतिष्ट कारण कर्मकाण्ड अप्रामाणिक ही हो जाता है और ऐसा माननेपर इसके द्वारा परमार्थ अद्वैत वस्तुका प्रतिपादन मनादिना श्रीशंकराच करनेवाली होनेके कारण वेदकी नुज्ञाविषय एकदेशभूत उपनिषदें तो प्रामाणिक आदिसे भी हैं; किंतु अन्यत्र ती होनेसे कर्मकाण्ड अप्रामाणिक उस कर्मको है - यह विरोध अनिवार्य दोष नहीं होगा, अतः उस विरोधका