बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1181–1190
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1181–1190
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[ अध्याय५ पूर्णता ही है । यह कार्य - कारणके भेदसे इस प्रकार द्वैताद्वैत-है । समुद्र जल - तरङ्ग-ही है और सत्य है, उसी निवाले आविर्भाव-तिरङ्ग, फेन एवं मुद्ररूप और पर-। इस प्रकार यह नीय सारा द्वैत है और परब्रह्म तो यही है । तके सत्य होनेपर प्रामाणिकता हो द्वैत केवल द्वेत - सा और मृगतृष्णा के परमार्थतः अद्वैत कहते हैं तब तो अभाव हो जाने के - अप्रामाणिक ही - ऐसा माननेपर वस्तुका प्रतिपादन के कारण वेदकी दें तो प्रामाणिक द्वेतविषयक अप्रामाणिक ड ध अनिवार्य उस विरोधका ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ र्षया श्रुत्यैतदुक्तं कार्यकारणयोः सत्यस्वं समुद्रवत् ' पूर्णमद: ' इत्यादिनेति । तदसत्, विशिष्टविषयापवाद-विकल्पयोरसम्भवात् । न हीयं सुविवक्षिता कल्पना, कस्मात् १ यया क्रियाविषय उत्सर्गप्राप्तस्यै-कदेशेऽपवादः क्रियते, यथा " अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थे -भ्यः " ( छा ० उ ० ८ । १५ । १ ) । इति हिंसा सर्वभूतविषयोत्सर्गेण निवारिता, तीर्थे विशिष्टविषये ज्योतिष्टोमादावनुज्ञायते; न च । ११६७ | परिहार करनेकी इच्छासे ही ' पूर्ण-मदः ' इत्यादि मन्त्रद्वारा श्रुतिने समुद्रके समान यह कार्य - कारणकी सत्यता बतलायी है । सिद्धान्ती – ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [ निर्विशेष ब्रह्ममें ] विशिष्टके विषयभूत अपबाद और विकल्प सम्भव नहीं हैं । [ आपकी ] यह कल्पना सुविर्वाक्षत ( युक्तियुक्त ) नहीं है! क्यों? - जिस प्रकार क्रिया के विषय में उत्सर्गसे ( सामा • न्यतः ) प्राप्त किसी क्रियाका किसी एक देशमें [ विशेष वचनद्वारा ] अपवाद कर दिया जाता है, जैसे " तीर्थों ( पुण्यकर्मों ) को छोड़कर अन्यत्र सभी प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ " इस वाक्य में जिस सब प्राणियोंकी हिंसाका सामान्यतः निवारण किया है, उसकी तीर्थं यानी विशिष्ट विषय - ज्योतिष्टो-मादि यज्ञों में अनुज्ञा दी जाती है । * वास्तवमें इस श्रुतिके द्वारा कहीं भी हिंसाका विधान नहीं प्राप्त होता है । इसके द्वारा तो सर्वत्र अहिंसाका ही आदेश किया गया है । छान्दोग्य उपनिषद् में श्रीशंकराचार्यने ' अन्यत्र तीर्थेभ्यः ' की व्याख्या इस प्रकार की है -- ' भिक्षानिमित्त-मनादिनापि परपीडा स्यादित्यत आह -- अन्यत्र तीर्थेभ्य: । तीर्थं नाम शास्त्रा-नुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः । ' इसका भाव इस प्रकार है -- भिक्षा के लिये घूमने आदिसे भी तो दूसरोंको पीड़ा पहुँच सकती है, इसके निवारणके लिये कहा— अन्यत्र तीर्थेभ्यः । जो शास्त्राज्ञाका विषय है अर्थात् जिसके लिये शास्त्रकी आज्ञा है, उस कर्मको करते हुए यदि किसीको अनायास कष्ट पहुँच जाय तो उसके लिये कोई दोष नहीं होता; यदि ऐसी बात नहीं होती तो भिक्षाटनका दृष्टान्त नहीं दिया
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११६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ तथा वस्तुविषय इहाद्वैतं ब्रह्मो । त्सर्गेण प्रतिपाद्य पुनस्तदेकदेशे ऽपवदितुं शक्यते, ब्रह्मणो-ऽद्वैतत्वादेवैकदेशानुपपत्तेः । तथा विकल्पानुपपत्तेश्च । यथा ' अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णावि ' ' नातिरात्रे षोडशिनं । गृह्णाति ' इति ग्रहणाग्रहणयोः । पुरुषाधीनत्वाद् विकम्पो भवति, न स्वि T तथा वस्तुविषये ' द्वैतं वा स्याद्वैतं वा ' इति विकल्पः सम्भवति, अपुरुषतन्त्रत्वादात्म-वस्तुनः विरोधाच्च द्वैताद्वैतस्व-योरेकस्य । तस्मान्न सुविवक्षितेय कल्पना । श्रुतिन्यायविरोधाच्च – सैन्धव-घनवत् प्रज्ञानैकरसघनं निरन्तरं जाता । भिक्षाटनमें किसीकी हिंसा नहीं ब्राह्मण वैसा उस प्रकार वस्तुके विषयमें यहाँ सामान्यतः अद्वैत ब्रह्मका पूर्वाप प्रतिपादन कर फिर उसके ि | एक देशमें ब्रह्मका अपवाद ( बाघ ) सबाह नहीं किया जा सकता; क्योंकि स्थूल अद्वैत होने के कारण ब्रह्मका कोई एक देश नहीं हो सकता । मृतम इसी प्रकार विकल्प न हो निश्चि सकनेके कारण भी ऐसा होना ङ्कारहि असम्भव है । जिस प्रकार ' अति- स्युरव रात्रयाग में षोडशीका ग्रहण करें ' अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण तथ नहीं करे ' इस प्रकार ग्रहण और यवस्य अग्रहण पुरुषके अधीन होनेके कारण नित्य उनमें विकल्प ' हो सकता है, उस प्रकार यहाँ वस्तुके विषय में ' वह चात्म द्वैत हो अथवा अद्वैत हो ' ऐसा विकल्प ' नहीं हो सकता, क्योंकि मीयते । आत्मतत्त्व पुरुषके अधीन नहीं है । निस्य इसके सिवा एक ही वस्तुका द्वैता-द्वैतरूप होना विरुद्ध भी है । च; इसलिये यह कल्पना सुविवक्षित कर्मका नहीं है । श्रुति और युक्तिसे विरुद्ध होने के भ्याग कारण भी ऐसा कहना ठीक नहीं ननु है । ' सैन्धवधनके समान प्रज्ञानेक समुद्रा की जाती; अनजानमें पैरसे दबकर किसो मुच्यते जीवको वष्ट पहुंचने की सम्भावनामात्र रहती है । विरुद्धा १. विकल्प इस प्रकार है; ' कचिद् अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति क्वचिद् व बृ ० गृह्ह्णाति ' अर्थात् ‘ कहीं अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे और कहीं न करे । '
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[ श्रध्याय५ वस्तु के विषयमें -: अद्वैत ब्रह्मा फिर उसके किसी का अपवाद ( बाघ ) सकता; क्योंकि रण ब्रह्मका कोई सकता । विकल्प न हो भी ऐसा होना जिस प्रकार ' अति-शीका ग्रहण करे ' षोडशीका ग्रहण प्रकार ग्रहण और धीन होने के कारण हो सकता है, उस इतुके विषय में ' वह अद्वैत हो ' ऐसा सकता, क्योंकि के अधीन नहीं है । ही वस्तुका देता-विरुद्ध भी है । कल्पना सुविवक्षित [ क्तिसे विरुद्ध होने के कहना ठीक नहीं के समान प्रज्ञानैक-में पैर से दबकर किसो गृह्णाति क्वचिदन कहीं न करे । ' ब्राह्मण १ ] - शाङ्करभाष्यार्थ पूर्वापरबाह्याभ्यन्तरभेदविवर्जितं सबाह्याभ्यन्तरमजं नेति नेत्य-स्थूलमनण्वहस्व मजरमभयम-मृतम् - इत्येवमाद्याः श्रुतयो निश्चितार्थाः संशयविपर्यासाश-ङ्कारहिताः सर्वाः समुद्रे प्रक्षिप्ताः स्युरकिश्चित्करत्वात् । तथा न्यायविरोधोऽपि साव-यवस्यानेकात्मकस्य क्रियावतो नित्यत्वानुपपत्तेः । नित्यत्वं चात्मनः स्मृत्यादिदर्शनादनु-मीयते । तद्विरोधच प्राप्नोत्य-नित्यत्वे, भवत्कल्पनानर्थक्यं च; स्फुटमेव चास्मिन् पक्षे कर्मकाण्डानर्थक्यम्; अकृता-भ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गात् । ननु ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, कथ-मुच्यते भवतैकस्य द्वैताद्वतत्वं विरुद्धमिति । ११६ ९ । रसघनस्वरूप निरवकाश तथा पूर्वापर और बाह्याभ्यन्तर भेदसे रहित है ' ' सबाह्याभ्यन्तर अज है ' ' नेति नेति ' ' अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अजर, अभय और अमृत है ' इत्यादि श्रुतियां, जो निश्चितार्थ और संशय - विपर्यय एवं शङ्कासे | रहित हैं, सारी ही समुद्रमें डाल देनी होंगी, क्योंकि रहकर भी वे कुछ कर नहीं सकतीं । इसी प्रकार युक्तिसे भी विरोध • आता है; क्योंकि सावयव, अनेका-त्मक और क्रियावान् पदार्थका नित्य होना सम्भव नहीं है । और स्मृति आदि देखनेसे आत्मा के नित्यत्वका अनुमान होता है । उसका अनित्यत्व माननेपर उस युक्तिसिद्ध नित्यत्वसे विरोध प्राप्त होता है । [ और यदि आत्माका अनित्यत्व स्वीकार भी किया जाय तो भी ] आपकी कल्पना व्यर्थ ही ठहरती है । इस पक्षमें कर्मकाण्ड की व्यर्थता स्पष्ट ही है, क्योंकि [ आत्माको अनित्य माननेपर ] बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश होने-का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । पूर्व ० - किंतु ब्रह्मके द्वेताद्वेतरूप होनेमें समुद्रादि दृष्टान्त विद्यमान हैं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि एकका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध है? बृ ० उ ० ७४-
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११७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय न अन्य विषयत्वात् । नित्य-निश्वयववस्तुविषयं हि विरुद्धत्व-मवोचाम द्वैताद्वैतत्वस्य, न कार्य -विषये सावयवे ॥ तस्माच्छ्रुति-स्मृतिन्यायविरोधादनुपपन्नेयं कल्पना; अस्याः कल्पनाया वरमुपनिषत्परित्याग एव । अध्येयत्वाच्च न शास्त्रार्थेयं कल्पना । न हि जननमरणाद्यन -र्थशतसहस्र मेदसमाकुलं समुद्र-वनादिवत् सावयवमनेकरसं ब्रह्म ध्येयत्वेन विज्ञेयत्वेन वा श्रुत्योपदिश्यते! प्रज्ञानघनती चोपदिशति, “ एकधैवानुद्रष्टव्यम् ” ( वृ ० उ ० ४ । ४ । २० ) इति च अनेक -धादर्शनापवादाच्च – “ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( ४।४।१ ९ ) इति । ५ 1 ब्राह्म सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ हम जो विरोध दिखलाते यच्च हैं ] उसका विषय दूसरा है । हमने व्यम् नित्य और निरवयव वस्तुके विषय-में द्वैताद्वैतका विरोध बतलाया है, शास्त्रा सावयव कार्यंके विषयमें नहीं ॥ नेक अतः श्रुति - स्मृति और युक्तिसे विरोध होने के कारण यह कल्पना त्वान्न अनुचित है । इस कल्पनाकी अपेक्षा शास्त्र तो उपनिषद्का परित्याग कर देना ही अच्छा है । तद् द्र सावयव ब्रह्मका ध्येय रूपसे त्वाच्च उपदेश न होनेके कारण भी यह यत्त कल्पना शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सक़ती । जो जन्म - मरणादि सैकड़ों- कर्मव सहस्रों अनर्थरूप भेदसे सम्पन्न और प्रामाण समुद्र एवं वनादिके समान सावयव तथा अनेक रस है, ऐसे ब्रह्मका देशाथ श्रुतिद्वारा ध्येय या ज्ञेयरूपसे चाव उपदेश नहीं किया जाता । इसके सिवा श्रुति उसकी ज्ञाप प्रज्ञानघनताका भी उपदेश देती है विद्यां तथा ऐसा भी कहती है कि " उसे न निरन्तर एक प्रकार ही देखना चाहिये । " " जो यहाँ नानावत् | देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त मात्रप्रा होता है ' इस प्रकार अनेकरूप देखनेकी, निन्दा की जानेसे भी द्वैतस्य यही सिद्ध होता है । और
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[ अध्याय५ सी बात नहीं है, विरोध दिखलाते य दूसरा है । हमने यव वस्तुके विषय-बरोध बतलाया है, विषय में नहीं । ति और युक्तिसे रण यह कल्पना कल्पनाकी अपेक्षा परित्याग कर देना ब्रह्मका ध्येय रूपसे के कारण भी यह तात्पर्य नहीं हो - मरणादि सैकड़ों-भेदसे सम्पन्न और के समान सावयव न है, ऐसे ब्रह्मका य या ज्ञेयरूपसे ना जाता । वा श्रुति उसकी भी. उपदेश देती है । कहती है कि " उसे प्रकार ही देखना यहाँ नानावत् से मृत्युको प्राप्त प्रकार अनेकरूप की जानेसे भी होता है । और 1 ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ यच्च श्रुत्या निन्दितं तन्न कर्त -व्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसश्त्रम-नेकधात्वं च द्वैतरूपं निन्दित-त्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः । यच्वेकरसत्वं ब्रह्मणः तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्त स्वाच्च शास्त्रार्थो भवितुमर्हति । यत्क्तं वेदैकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वैताभावादद्वैते च प्रामाण्यमिति तन्नः यथाप्राप्तोप-देशार्थत्वात् । न हि द्वैतमद्वैतं चा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्म-विद्यां वोपदिशति शास्त्रम् । न चोपदेशार्ह द्वैतम्; जात-मात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च द्वैतस्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेव । ११७१ | जिसकी श्रुतिने निन्दा की हो वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो किया नहीं जाता वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्मके तरूप अनेकरसत्व और नानात्व-की निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्म में नहीं देखना चाहिये, अतएव वह शास्त्रको तात्पर्य नहीं है । ब्रह्मकी जो एकरसता है, वही - द्रष्टव्य होनेके कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होने के कारण वह शास्त्रका तात्पर्य भी हो सकती है । और ऐसा जो कहा कि द्वैतका अभाव होनेके कारण वेदके कर्म-विषयक एक भागकी तो अप्रामा-णिकता हो जायगी और अद्वेत-विषय में प्रामाणिकता होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तुका उपदेश करनेके लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वेत या अद्वैत तत्त्व-का बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्याका उपदेश शास्त्र नहीं कर देता । इसके सिवा द्वैत तो उपदेश के योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धिका विषय है । आरम्भसे ही किसकी द्वैतमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती,
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११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ कस्यचित् स्यात् • येन द्वैतस्य । सत्यत्वमुपदिश्य पश्चादात्मनः प्रामाण्यं प्रतिपादयेच्छास्त्रम् । नापि पाषण्डिभिरपि प्रस्थापिताः शास्त्रस्य प्रामाण्यं न गृह्णीयुः । तस्माद् यथाप्राप्तमेव द्वैत-मविद्याकृतं स्वाभाविकमुपादाय । स्वाभाविक्यैवाविद्यया युक्ताय रागद्वेषादिदोषवते यथाभिमत-पुरुषार्थसाधनं कर्मोपदिशत्यग्रे पश्चात् प्रसिद्धक्रियाकारकफल-स्वरूपदोषदर्शनवते तद्विपरीतौदा-सीन्यस्वरूपावस्थानफलार्थिने त-दुपायभूतामात्मैकत्वदर्शनात्मिकां ब्रह्मविद्यामुपदिशति । श्रथैवं सति तदौदासीन्यस्वरूपावस्थाने फले प्राप्ते शास्त्रस्य प्रामाण्यं प्रत्यर्थित्वं निवर्तते । तदभावा-च्छास्त्रस्यापि शास्त्रत्वं तं प्रति निवर्तत एव । तथा प्रतिपुरुषं परिसमाप्तं शास्त्रमिति न शास्त्रविरोधगन्धो-जिससे कि शास्त्र उसे द्वैतका ब्राह्म सत्यत्व समझकर फिर अपनी प्रामाणिकताका प्रतिपादन करे । ऽप्य तथा [ बौद्धादि ] पाखण्डियोंद्वारा. च्छा श्रेयोमार्ग में प्रवृत्त किये हुए शिष्य. गण भी शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार अन्य न करें - ऐसी बात भी नहीं है । अतः अविद्याकृत यथाप्राप्त स्वा- स्याद भाविक द्वैतको ही ग्रहणकर जो पेचर स्वाभाविक अविद्यासे युक्त बौर रागद्वेषवान् है, उस पुरुषको शास्त्र नान्य पहले उसके अभिमत कर्मरूप पुरु-षार्थंके साधनका उपदेश करता समा है । पीछे जो प्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलस्वरूप कर्मंमें दोष देखने-वाला तथा उससे विपरीत उदा- नाप्य सीनरूपसे स्थितिरूप फलका इच्छुक अ होता है, उसे ही वह उसकी उपाय- द्वैताई भूता आत्मैकत्वदर्शनरूपा ब्रह्म-विद्याका उपदेश करता है । फिर धस्य ऐसा होनेपर उस औदासीन्यस्व समुद्र रूपमें स्थितिरूप फलकी प्राप्ति ब्रह्मा हो जानेपर शास्त्रके प्रामाण्यके प्रति वस्त्व आकांक्षाकी निवृत्ति हो जाती है । उसका अभाव हो जानेपर उसके च्छा लिये शास्त्रका शास्त्रत्व भी निवृत्त कथम हो ही जाता है । इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके प्रति शास्त्रका प्रयोजन पूरा हो जाता है, # | इसलिये शास्त्रके विरोधको तो गन्ध • चोप
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[ अध्याय५ शास्त्र उसे द्वेतका कर फिर अपनी प्रतिपादन करे | ] पाखण्डियोंद्वारा त किये हुए शिष्य-प्रामाण्य स्वीकार त भी नहीं है । कृत यथाप्राप्त स्वा-ही ग्रहणकर जो विद्यासे युक्त मोर उस पुरुषको शास्त्र भिमत कर्मरूप पुरु • का उपदेश करता सिद्ध क्रिया, कारक कर्म में दोष देखने-से विपरीत उदा-नरूप फलका इच्छुक वह उसकी उपाय-= वदर्शनरूपा ब्रह्म-करता है । फिर उस औदासीन्यस्व-= प फलकी प्राप्ति प्रामाण्यके प्रति वृत्ति हो जाती है । हो जानेपर उसके शास्त्रत्व भी निवृत्त त्येक पुरुषके प्रति पूरा हो जाता है, विरोधकी तो गन्ध ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ऽप्यस्ति अद्वैतज्ञानावसानत्वा च्छास्त्रशिष्यशासनादिद्वैत मेदस्य अन्यतमावस्थाने हि विरोधः स्यादवस्थितस्य, इतरेतरा -पेक्षत्वात्तु शास्त्र शिष्यशासनानां नान्यतमोऽप्यवतिष्ठते । सर्व-समाप्तौ तु कस्य विरोध आश-ङ्कयेताद्वैते केवले शिवे सिद्धे १ नाप्यविरोधता अत एव । अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः - -द्वैताद्वैतात्मकत्वेऽपि शास्त्रविरो-धस्य तुल्यत्वात् । यदापि समुद्रादिवद् द्वैताद्वैतात्मकमेकं नान्यद् वस्त्वन्तरम्, तदापि भवदुक्ता-च्याविरोधान्न मुच्यामहे ॥ कथम् १ एकं हि परं ब्रह्म द्वैताद्वैवात्मकं तच्छोकमोहा-द्यतीतत्वादुपदेशं न काङ्क्षति । चोपदेष्टा अन्यो ब्रह्मणो द्वैता- । ११७३ भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र, शिष्य और शासनादि द्वैतभेदकी तो । अद्वैतज्ञान होनेपर समाप्ति हो जाती है । यदि इनमेंसे कोई भी रह जाता तो उस रहे हुएका विरोध रहता । किंतु ये शास्त्र, शिष्य और शासन तो एक - दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं, इसलिये इनमें -से कोई भी स्थित नहीं रहता इस प्रकार सबकी समाप्ति हो जाने-पर तो एकमात्र, शिवस्वरूप, नित्यसिद्ध अद्वैत में किसके विरोध-की आशङ्का की जाय? और इसी से उसका किसी से अविरोध भी नहीं है । अब हम ब्रह्मको द्वैताद्वैतरूप मानकर भी बतलाते हैं कि उसके द्वैताद्वैतरूप होनेपर भी शास्त्रका विरोध ऐसा ही है । जब हम समुद्रादिके समान द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार करते हैं, उसके सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं मानते उस समय भी हम आपके बतलाये हुए शास्त्रविरोधसे मुक्त नहीं होते! किस प्रकार? [ सो बतलाते हैं- ] द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, वह शोकमोहादिसे अतीत होनेके कारण उपदेशकी आकांक्षा नहीं रख सकता । इसके सिवा उपदेश करनेवाला भी
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११७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय द्वैतरूपस्य ब्रह्मण एकस्यैवा म्युपगमात् । अथ द्वैतविषयस्यानेकत्वाद-न्योन्योपदेशो न ब्रह्मविषय उप-देश इति चेत् १ तदा द्वैताद्वैता-त्मकमेकमेव ब्रह्म नान्यदस्तीति विरुध्यते । यस्मिन् द्वैतविषये -ऽन्योन्योपदेशः सोऽन्योऽद्वैतं चान्यदेवेति समुद्रदृष्टान्तो विरुद्धः । न च समुद्रोदकैकत्ववद् विज्ञानैकत्वे ब्रह्मणोऽन्यत्रोपदेश-ग्रहणादिकल्पना सम्भवति । न हि हस्तादिद्वैताद्वैतात्मके देवदत्ते वाक्कर्णयोर्देवद चौकदेशभृतयोर्वागु-पदेष्ट्री कर्णः केवल उपदेशस्य ग्रहीता, देवदत्तस्तु नोपदेष्टा नाप्युपदेशस्य ग्रहीतेति कन्पयितुं शक्यते; समुद्रैकोदकात्मत्ववदे-कविज्ञान व च्वाद् देवदत्तस्य । त-५ ब्राह्म ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकता; क्यों । कि द्वैताद्वैतरूप एक ही स्मान ब्रह्म स्वीकार किया गया है । ि और यदि ऐसा कहो कि द्वैत विषय अनेकरूप है, इसलिये उसमें तस्मा परस्पर उपदेश हो सकता है; ब्रह्म-' पूर्ण रूप विषयमें उपदेश नहीं होता, तब तो द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, उससे भिन्न कोई नहीं है - इस कथन से विरोध होगा । जिस द्वेत- स्म विषयमें परस्पर उपदेश होता है, यद वह तो अन्य होगा और अद्वैत अन्य होगा - इस प्रकार समुद्रका [ पर दृष्टान्त विरुद्ध ही रहा । यदि कौरव समुद्रके जलकी एकता समान हैं विज्ञानकी भी एकता है, तो ब्रह्मसे भिन्न उपदेशग्रहणादिकी कल्पना चान संभव नहीं हो सकती । हस्त-पादादि द्वैताद्वैतरूप देवदत्त में ध्यान देवदत्तके एकदेशभूत वाणी और च कर्णंमेंसे केवल वाणी उपदेश करने- खमि वाली है और अकेला कर्ण उपदेश- विशे को ग्रहण करनेवाला है, देवदत्त न निर्दे तो उपदेश देनेवाला है और न उसे ग्रहण करनेवाला - ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि जिस प्रकार समुद्र एकमात्र जलस्वरूप है, नपुस उसी प्रकार देवदत्त भी एक ही
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[ अध्याय५ ह्रीं हो सकता; क्यों T एक ही ब्रह्म गया है । ऐसा कहो कि द्वेत न है, इसलिये उसमें हो सकता है; ब्रह्म-उपदेश नहीं होता, नरूप एक ही ब्रह्म कोई नहीं है – इस होगा । जिस द्वेत-र उपदेश होता है, होगा और अद्वैत प्रकार समुद्रका - ही रहा । यदि - एकताके समान कता है, तो ब्रह्म इणादिकी कल्पना सकती । हस्त-द्वितरूप देवदत्त में शभूत वाणी और वाणी उपदेश करने-केला कर्ण उपदेश-वाला है, देवदत्त न ला है और न उसे ना - ऐसी कल्पना कती; क्योंकि जिस मात्र जलस्वरूप है, वदत्त भी एक ही ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ स्माच्छ्रुतिन्यायविरोधश्चाभिप्रेता- । र्थासिद्धिश्चैवं कम्पनायां स्यात् । तस्माद् यथाव्याख्यात एवास्माभिः ' पूर्णमदः ' इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः । ११७५ विज्ञानवान् है । अत: ऐसी कल्पना करनेमें श्रुति और युक्तिसे विरोध तथा अभिमत अर्थकी असिद्धि भी होगी । इसलिये ' पूर्णमदः ' इत्यादि इस मन्त्रका अर्थ, जैसी हमने व्याख्या की है, वही है । ॐ खं ब्रह्म और उसकी उपासनाका वर्णन ॐ खं ब्रह्म! खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदनेन यद् वेदितव्यम् ॥ १ ॥
आकाश ब्रह्म ॐकार है । आकाश [ यहाँ जड नहीं ] सनातन [ परमात्मा ] है । ' जिसमें वायु रहता, वह आकाश ही ख है'- ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है । यह ओङ्कार वेद है - ऐसा ब्राह्मण जानते हैं; क्योंकि जो ज्ञातव्य है, उसका इससे ज्ञान होता है ॥ १ ॥
ॐ खं ब्रह्मेति मन्त्रोऽयं चान्यत्राविनियुक्त इह ब्राह्मणेन ध्यानकर्मणि विनियुज्यते । अत्र च ब्रह्मेति विशेष्याभिधानं खमिति विशेषणम् । विशेषण -विशेष्ययोश्व सामानाधिकरण्येन निर्देशो नीलोत्पलवत् खं ब्रह्मेति । ' ॐ खं ब्रह्म ' यह मन्त्र है । इसका कहीं अन्यत्र विनियोग नहीं हुआ, यहाँ ब्राह्मण इसका ध्यान-कर्ममें विनियोग करता है । इसमें भी ' ब्रह्म ' यह विशेष्य - नाम है और ' खम् ' यह विशेषण है । इस प्रकार ' नील कमल ' के समान ' खं ब्रह्म ' इस विशेष्य और विशेषणका यहाँ ' समानाधि करणरूपसे निर्देश किया गया * ' ॐ खं ब्रह्म ' यह मन्त्र है । इससे आगे इसका व्याख्यानभूत ब्राह्मण है । १. जिन पदोंकी विभक्ति, वचन और लिङ्ग एक - से हों, वे ' समानाधिकरण ' होते हैं । यहाँ ' ख ' और ' ब्रह्म'- दोनों हो शब्दों में प्रथमा विभक्ति एकवचन और नपुंसकलिङ्ग है ।
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११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ब्रह्मशब्दो वृहद्वस्तुमात्रास्पदो विशेषितः, अतो विशेष्यते खं ब्रह्मेति । यत्तत् खं ब्रह्म तदशब्दवाच्य-मौशब्दस्वरूपमेव वा, उभयथापि सामानाधिकरण्यम विरुद्धम् । इह च ब्रह्मोपासन साधनस्वार्थ मोंशब्दः प्रयुक्तः । तथा च श्रुत्यन्तरात्-" एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् " ( क ० उ ० १ । २ । १७ ) " श्रोमित्यात्मानं युञ्जीत ” ( महानारा ० २४ । १ ) " यो-मित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभि-ध्यायीत " ( प्र ० उ ० ५ । ५ ) " ओमित्येवं ध्यायथ आत्मा-नम् " ( मु ० उ ० २ । २ । ६ ) इत्यादेः । अन्यार्थासम्भवाच्चोपदेशस्य-यथान्यत्र “ श्रमिति शंसत्यो-मित्युद्गायति " ( छा ० उ ० १ । १ । ९ ) इत्येवमादौ स्वाध्याया-रम्भापवर्गयोश्श्रोङ्कारप्रयोगो विनि-योगादवगम्यते, न च तथार्था-न्तरमिहावगम्यते । तस्माद् ध्या-नसाधनत्वेनैवेहोङ्कारशब्दस्योप-देशः । ५ है । कोई विशेषण न होनेपर ब्रा ' ब्रह्म ' शब्द बृहत् वस्तुमात्रका वाचक है, इसलिये इसे ' खं ब्रह्म ' इस विशेषित किया जाता है । प्रकार णो वह जो खं ब्रह्म है वह ॐ शब्द-वाच्य है अथवा ॐ शब्दस्वरूप हो पय है, दोनों ही प्रकारसे इनके समाना- सो धिकरणत्वमें कोई विरोध नहीं पत्त आता । यहाँ ब्रह्मोपासनाके साघ-द्वि नार्थ होनेके कारण ॐ शब्दका प्रयोग किया गया है । ऐसा ही " यह वे श्रेष्ठ आलम्बन है, यह उत्कृष्ट विष आलम्बन हे ”, “ ॐ इस प्रकार उच्चा · रण कर चित्तको संयत करे ", इस अक्षरके द्वारा ही परब्रह्मका राल ध्यान करे ",, " ॐ इस प्रकार आत्मा-का ध्यान करो " इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इसके सिवा इस उपदेशका एत कोई दूसरा अर्थ सम्भव न होनेसे भी उसे उपासनार्थं ही मानना चाहिये । जिस प्रकार " ऐसा तन कहकर शास्त्रपाठ करता है, ॐ तिम ऐसा कहकर उद्गान करता है " चि इत्यादि स्थलोंमें विनियोगसे स्वाध्यायके आरम्भ और अन्तमें मिल ओङ्कारका प्रयोग विदित होता पुरा है, उस प्रकार यहाँ इसका कोई अर्थान्तर ज्ञात नहीं होता । अतः अनेक यहाँ ध्यानके साधनरूपसे ही ओङ्कार इन्द्र शब्दका उपदेश किया गया है ।