बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1201–1210

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1201–1210

पृष्ठ 1201

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अध्याय ५ का फल तो - ज्ञान होने-भी दोष ता है, जैसे दिको निवृत्त वता आदि गया और इनमें से एक-अतः आज-तीनोंहोके नहीं है । कहना यह है दि विशिष्ट साधनों का मनुष्यों को हिये । में भी दया-नहीं हो ? तो इस-असुरोंद्वारा TI क्योंकि ये अतः यहाँ है— देवादि त्र हैं और रा हितकी किया जाना उनके हित-हैं, इसलिये नहीं करते । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११८७ पुत्रानुशासनं प्रजापतेः परम- । मेतद्धितम्, अतो मनुष्यैरेवैतत् त्रयं शिक्षितव्यमिति । अथवा न देवा असुरा वा अन्ये केचन विद्यन्ते मनुष्येभ्यः, मनुष्याणामेवादान्ता येऽन्यैरुतमै-गुणैः संपन्नास्ते देवाः, लोभ- । प्रधाना मनुष्याः, तथा हिंसापराः क्रूरा असुराः, त एव मनुष्या श्रदान्तत्वादिदोषत्रयमपेक्ष्य देवादिशब्दभाजो भवन्ति, इतरांश्च गुणान् सत्वरजस्तमांस्य-पेक्ष्य । अतो मनुष्यैरेव शिक्षि-तव्यमेतत् त्रयमिति, तदपेक्षयैव प्रजापतिनोपदिष्टत्वात् । तथा हि मनुष्पा श्रदान्ता लुब्धाः क्रूराश्च दृश्यन्ते, तथा च स्मृतिः-" कामः क्रोधस्तथा लोभस्त-स्मादेतत् त्रयं त्यजेत् । ” ( गीता १६ । २१ ) इति ॥ ३ ॥

अतः प्रजापतिका यह पुत्रोंको दिया हुआ उपदेश उनका परम हित है । इसलिये मनुष्यों को भी इन तीनों-हीकी शिक्षा लेनी चाहिये । अथवा यों समझो कि यहां मनुष्योंसे भिन्न कोई देव या असुर नहीं हैं; मनुष्यों में ही जो दमन-शोल नहीं हैं, किंतु अन्य उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हैं उन्हें ही देव कहा है, लोभप्रधान व्यक्ति मनुष्य कहे गये हैं तथा हिंसापरायण और क्रूर व्यक्ति असुर हैं । वे मनुष्य ही अदान्तता आदि तीन दोषोंकी अपेक्षासे तथा सत्त्व, रज और तम इन अन्य गुणोंके अनुसार देवता आदि नाम धारण करते हैं । अत: ये तीनों साधन मनुष्योंको ही सीखने चाहिये; क्योंकि उनके उद्देश्यसे ही प्रजापतिने इनका उपदेश किया है । तथा मनुष्य अ-जितेन्द्रिय, लोभी और क्रू र प्रकृति-के देखे भी जाते ही हैं, ऐसा ही यह स्मृति भी कहती है- " काम, क्रोध और लोभ [ ये तीन नरकके द्वार हैं ] अत: इन तीनोंका त्याग करना चाहिये ” ॥ ३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्वितीयं प्राजापत्यब्राह्मणम् ॥ २ ॥

पृष्ठ 1202

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तृतीय ब्राह्मण हृदय -ब्रह्मकी दमादिसाधनत्रयं सर्वोपासन-शेषं विहितम् । दान्तोऽलुब्धो । दयालुः सन् सर्वोपासनेष्वधि -क्रिपते । तत्र निरुपाधिकस्य ब्रह्मणो दर्शनमतिक्रान्तम्, अथा-धुना सोपाधिकस्य तस्यैवाभ्युदय -फलानि वक्तव्यानि, इत्येवमर्थो ऽयमारम्भ : --उपासना समस्त उपासनाओंके अङ्गभूत दमादि तीन साधनों का विधान किया गया । दमनशील, निलम और दयालु होनेपर ही पुरुषका सारी उपासनाओं में अधिकार होता है । तहाँ निरुपाधिक ब्रह्म-ज्ञानका निरूपण तो समाप्त हो चुका, अब सोपाधिक ब्रह्मकी अभ्युदयरूप फलवाली उपासनाएँ बतलानी हैं, इसीके लिये आरम्भ किया जाता है-एष प्रजापतिर्यद् हृदयमेतद् ब्रह्मेतत् सर्वं तदे-तंत् त्र्यक्षर हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्य-स्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्य-स्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्ग लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

जो हृदय है, वह प्रजापति है । यह ब्रह्म है, यह सर्व है, यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है । ' हृ ' यह एक अक्षर है । जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन बलि समर्पण करते हैं । ' द ' यह एक अक्षर है । जो ऐसा जानता है, उसे यह एक अक्षर है । जो ऐसा जानता एष प्रजापतिर्यद् हृदयं प्रजाप-तिरनुशास्तीत्यनन्तरमेवाभिहित-म् । कः पुनरसावनुशास्ता प्रजा-स्वजन और अन्यजन देते हैं । ' यम् ' है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ १ ॥

जो हृदय है वह प्रजापति है । प्रजापति अनुशासन करता है — यह अभी कहा जा चुका है । किंतु यह अनुशासनकर्ता प्रजापति कौन है? सो पतिः १ इत्युच्यते - एष प्रजापतिः । बतलाया जाता है -- यह प्रजापति ब्राह्मण कोऽसौ हृदयस्था ब कन्यब्राह मुपसंहार तदेतत् स भूतं हृद स्रष्टा । सर्वात्मस्व उक्तं पञ्च स्वम् । त दुपास्यं ह तत्र तावदुपास हृदयमिति त्रीण्यक्ष रा कानि पुन च्पन्ते १ ह हरन्ति इत्येतदूर हृदयाय न च विषया

पृष्ठ 1203

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अङ्गभूत का विधान ल, निर्लोभ ही पुरुषका अधिकार कि ब्रह्म-समाप्त हो क ब्रह्मकी उपासनाएँ लिये आरम्भ सर्वं तदे-महरन्त्य-ददत्य-निति स्वर्ग है, यह हृदय जानता है, ' द ' यह एक ते हैं । ' यम् ' ता है ॥१ ॥

ह प्रजापति सन करता जा चुका नुशासनकर्ता ? सो प्रजापति ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११८ ९ कोऽसौ १ यद् हृदयं हृदयमिति । हृदयस्था बुद्धिरुच्यते । यस्मिञ्छा -कन्यन्त्राह्मणान्ते नामरूपकर्मणा-मुपसंहार उक्तो दिग्विभागद्वारेण, तदेतत् सर्वभूतप्रतिष्ठं सर्वभूतात्म-भूतं हृदयं प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा । एतद् ब्रह्म —बृहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च ब्रह्म; एतत् सर्वम्; उक्तं पञ्चमाध्याये हृदयस्य सर्व-स्वम् । तत् सर्वं यस्मात् तस्मा-दुपास्यं हृदयं ब्रह्म । तत्र हृदयनामाक्षर विषयमेव तावदुपासनम्रुच्यते ॥ तदेवद् हृदयमिति नाम त्र्यतरम्, त्रीण्यक्ष राण्यस्येति पक्षरम् । कानि पुनस्तानि त्रीण्यक्षराण्यु-च्यन्ते १ हृ इत्येक मतरम्, अभि-हरन्ति हृतेराहृतिकर्मणो हृ इत्येतद् रूपमिति यो वेद यस्मादू हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्चेन्द्रियाण्यन्ये च विषयाः शब्दादयः स्वं स्वं । है । वह कौन है? जो हृदय है । ' हृदयम् ' इस पदके द्वारा हृदयस्था बुद्धि कही जाती है । जिसमें कि शाकल्यब्राह्मणके अन्तमें दिग्विभाग-के द्वारा नाम, रूप और कर्मोंका उपसंहार बतलाया गया है । वह यह सम्पूर्ण भूतों में प्रतिष्ठित तथा सबका आत्मस्वरूप हृदय प्रजापति – प्रजाओं का रचयिता है । यह ब्रह्म है - बृहत् तथा सबका आत्मा होनेके कारण यह ब्रह्म है । यह सर्व है । पश्र्चम अध्यायमें हृदयके सर्वत्वका वर्णन किया जा चुका है । क्योंकि वह सर्व है, इसलिये वह हृदयरूप ब्रह्म उपास्य है । अब ' हृदय ' इस नामके अक्षरों-से सम्बन्ध रखनेवाली उपासना ही बतलायी जाती है । वह यह ' हृदयम् ' ऐसा नाम त्र्यक्षर है, इसके तीन ही अक्षर हैं, इसलिये यह त्र्यक्षर है । वे तीन अक्षर कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं । ' हृ ' यह एक अक्षर है । ' अभिहरन्ति'-आहरण जिसका कर्म है, उस ' हृ ' धातुका ' हृ ' यह रूप है; जो ऐसा जानता है; [ उसको मिलने-वाला फल बताते हैं ] चूँकि हृदयरूप ब्रह्मके प्रति ही ' स्वा: ' -इन्द्रियाँ और शब्दादि दूसरे

पृष्ठ 1204

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११ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ 2320 कार्यममिहरन्ति हृदयं च भोक्त्र- । र्थमभिहरति । अतो हृदयनाम्नो । हृ इत्येतदक्षरमिति यो वेदास्मै विदुषेऽभिहरन्ति स्वाथ ज्ञात-योऽन्ये चासंबद्धाः; बलिमिति । वाक्यशेषः । विज्ञानानुरूप्येणैतत् फलम् । तथा द इत्येतदप्येकाक्षरमेत-दपि दानार्थस्य ददातेर्द इत्येतद् रूपं हृदयनामाक्षरत्वेन निबद्धम् । अत्रापि --- हृदयाय ब्रह्मणे स्त्राश्च करणान्यन्ये च विषयाः स्वं स्वं वीर्यं ददति हृदयं च भोक्त्रे । ददाति स्वं वीर्यमतो दकार इत्येवं यो वेदास्मै ददति स्वा-चान्ये च । तथा यमित्येतदप्येकमतरम्, इणो गत्यर्थस्य यमित्येतद् रूप-मस्मिन्नाम्नि निबद्धमिति यो वेद स स्वर्ग लोकमेति । एवं नामा-चरादपीदृशं विशिष्टं फलं प्रा-विषय अपने - अपने कार्यका अभि हरण करते हैं और हृदय उन्हें भोक्ताके प्रति ले जाता है । अत: ' हृदय ' नामका ' हृ ' यह एक अक्षर है - ऐसा जो जानता है उस विद्वान्के प्रति ' स्वाः’– उसके सजातीय और ' अन्ये ' – दूसरे असम्बद्ध पुरुष बलि अभिहरण करते हैं । ' बलिम् ' यह वाक्यशेष है | विज्ञान ( उपासना ) के अनुरूप ही यह फल है । तथा ' द ' यह भी एक अक्षर है । यह भी दानार्थक ' दा ' धातुका ' द ' यह रूप ' हृदय ' नामके अक्षर-रूपसे निबद्ध है । यहाँ भी हृदयरूप ब्रह्मको ' स्वाः ' इन्द्रियाँ और ‘ अन्ये’-अर्थात् अन्यान्य विषय अपना-अपना वीर्यं देते हैं । हृदय भी भोक्ताको अपना वीयं देता है । अतः जो दकार इस प्रकारसे उसे जानता है, उसे स्वजन और अन्य-देते हैं । तथा ' यम् ' यह भी एक अक्षर है । गत्यर्थक ' इण ' धातुका ' यम् ' यह रूप इस नाममें निबद्ध है - ऐसा जो जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है । इस प्रकार नामके अक्षरमात्र-से जब पुरुष ऐसा विशिष्ट फल ब्राह्मण प्नोति व पासनादि तरोपन्य तस्यैव सस्यमिय महद् ञ्जित सत्यं वही -महत्, य है, वह इ जाता है-यक्ष ( पूज [ उसे उप

पृष्ठ 1205

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अध्याय ५ का अभि हृदय उन्हें ता है । अत: ह एक अक्षर उस वाः ' - उसके अन्ये ' - दूसरे अभिहरण वह वाक्यशेष - ) के अनुरूप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९ १ प्नोति किमु वक्तव्यं हृदय स्वरूपो | प्राप्त कर लेता है तो हृदयस्वरूप ब्रह्मकी उपासनासे जो फल मिलेगा पासनादिति हृदयस्तुतये नामा- उसके विषयमें तो कहना ही क्या है? इस प्रकार हृदयकी स्तुति के लिये उस नामके अक्षरोंका उप-क्षरोपन्यासः ॥ १ ॥ न्यास किया गया है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये तृतीयं हृदयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥

- एक अक्षर ' दा ' धातुका नामके अक्षर-भी हृदयरूप और ' अन्ये'- ' षय अपना-। हृदय भी यं देता है । प्रकारसे उसे न और अन्य-ह भी एक " इण ' धातुका इस नाम जो जानता कको जाता के अक्षरमात्र-विशिष्ट फल चतुर्थ ब्राह्मण सत्य - ब्रह्मकी उपासना तस्यैव हृदयाख्यस्य ब्रह्मणः उस हृदयसंज्ञक ब्रह्मकी ही ' सत्य ' ऐसी उपासनाका विधान करनेकी सत्यमित्युपासनं विधित्सन्नाह- इच्छासे श्रुति कहती है-तद् वै तदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोका-ञ्जित इन्न्वसावसद्य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्य ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥

वही - वह हृदय ब्रह्म ही वह था जो कि सत्य हो है । जो भी इस महत्, यक्ष ( पूज्य ) प्रथम उत्पन्न हुएको ' यह सत्य ब्रह्म है ' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है । [ उसका शत्रु ] उसके अधीन हो जाता है - असत् ( अभावभूत ) हो जाता है । जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष ( पूजनीय ) प्रथम उत्पन्न हुएको ' सत्य ब्रह्म ' - इस प्रकार जानता है [ उसे उपर्युक्त फल मिलता है ], क्योंकि ब्रह्म सत्य ही है ॥ १ ॥

पृष्ठ 1206

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११ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ तत् तदिति हृदयं ब्रह्म परा-सृष्टम् इति स्मरणार्थम्, तद् यद् हृदयं ब्रह्म स्मर्यत इत्येकस्त-च्छन्दः, तदेतदुच्यते प्रकारान्त-रेणेति द्वितीयस्तच्छन्दः, किं पुनस्तत् प्रकारान्तरम् १ एतदेव तदित्येतच्छब्देन संबद्ध्यते तृती-यस्तच्छन्दः । एतदिति वक्ष्य-मार्ण बुद्धौ सन्निधीकृत्याह आस बभूव । किं पुनरेतदेवास यदुक्तं हृदयं ब्रह्मेति तदिति तृतीयस्तच्छब्दो विनियुक्तः । किं तदिति विशेषतो निर्दि-शति - ' सत्यमेव सच्च त्यच्च मूर्त चामूर्त च सत्यं ब्रह्म पञ्चभूता-त्मकमित्येतत् । ' स यः कश्चित् सत्यात्मानमेतं महन्महत्त्वाद् यक्षं ब्राह्म तत्- ' तत् ' ऐसा कहकर हृदय-ब्रह्मका परामर्श किया गया है । पूज्य ' वे ' यह अव्यय स्मरणके लिये है । संसा तत् -- वह अर्थात् जो हृदय - ब्रह्म स्मरणका विषय हो रहा है, वह अत इस भावको व्यक्त करनेके लिये सत्य प्रथम तत् शब्दका प्रयोग हुआ है । मुच्य उसीका यह प्रकारान्तरसे वर्णन य किया जाता है, इसलिये [ अर्थात् चार जिसका स्मरण होता है उसीका यह वर्णन है - इस सम्बन्धको व्यक्त सत्य करनेके लिये ] दूसरा ' तत् ' शब्द मजं दिया है । किंतु वह प्रकारान्तर किं क्या है? इसी बातका [ तीसरे ] ' तत् ' शब्दसे सम्बन्ध दिखाया गया स्थम है, इसी से तीसरा ' तत् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । फिर ' एतत् ' इस रिति शब्दसे श्रुति कही जाने वाली बात- भवेद को बुद्धिमें रखकर कहती है--' आस'- ' - था । किंतु वह कौन क था? यही, जिसका कि हृदय ब्रह्म मर्या ऐसा कहकर वर्णन किया है- यह बतानेके लिये तीसरे ' तत् ' शब्दका प्रथम प्रयोग किया गया है । विद्य वह क्या है? इसपर श्रुति उसका होव विशेष रूपसे निर्देश करती है--' सत्यमेव ' । सत् और त्यत्-- मूर्त और अमूर्त सत्य ब्रह्म ही है, अर्थात पञ्चभूतात्मक है, जो कोई इस सत्यात्मा, महान होने के कारण महत्; यक्ष-

पृष्ठ 1207

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- अध्याय५ कहकर हृदय-या गया है । के लिये है 1 । हृदय - ब्रह्म रहा है, वह-करने के लिये योग हुआ है । तरसे वर्णन लये [ अर्थात् है उसीका बन्धको व्यक्त रा ' तत् ' शब्द प्रकारान्तर का [ तीसरे ] दिखाया गया ' तत् ' शब्द ' एतत् ' इस नेवाली बात-कहती है--वह कौन कि हृदय ब्रह्म किया है - यह ' तत् ' शब्दका श्रुति उसका करती है--त्यत् - पूर्त ही है, अर्थात् ई इस सत्यात्मा, महत्; यक्ष-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं ११ ९ ३ पूज्यं प्रथमजं प्रथमजातं सर्वस्मात् संसारिण एतदेवाग्रे जातं ब्रह्म, अतः प्रथमजम्, वेद विजानाति सत्यं ब्रह्मेति । तस्येदं फल-मुच्यते-यथा सत्येन ब्रह्मणेमे लोका आत्मसात्कृता जिताः, एवं सत्यात्मानं ब्रह्म महद् यक्षं प्रथ-मजं वेद स जयती माँल्लोकान् । किं च जितो वशीकृतः, इन्व त्थम्, यथा ब्रह्मणा । असौ शत्रु-रिति वाक्यशेषः असच्चासद् -भवेदसौ शत्रुर्जितो भवेदित्यर्थः । कस्यैतत् फलमिति पुनर्निंग-मयति — य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति, तो विद्यानुरूपं फलं युक्तम्, सत्यं ह्येव यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥

पूज्य, प्रथमज अर्थात् समस्त संसा-रियोंसे पहले उत्पन्न हुए —यह ब्रह्म ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, इसलिये यह प्रथमज है - ' यह सत्य ब्रह्म है, इस प्रकार जानता है, उसके लिये यह फल बतलाया जाता है-जिस प्रकार सत्य -ब्रह्मके द्वारा ये लोक आत्मसात् किये हुए अर्थात् जीते हुए हैं, इसी प्रकार जो सत्या-त्मा प्रथमोत्पन्न, महत्, पूज्य ब्रह्म-को जानता है, वह इन लोकों को जीत लेता है । तथा उसके द्वारा उसका यह शत्रुजित होता - वशी-भूत कर लिया जाता है, जिस प्रकार ब्रह्मके द्वारा सब वशीभूत किये हुए हैं । मूलमें ' असौ ' के आगे ' शत्रुः ' यह वाक्यशेष है । तथा असत् अर्थात् यह शत्रु अभावरूप यानी पराजित हो जाता है । यह किसका फल है - यह बतलानेके लिये श्रुति पुनः निगमन करती है -- जो इस प्रकार इस महत् पूज्य प्रथमजको ' सत्य ब्रह्म ' ऐसा जानता है । अत: उपासनाके अनुरूप फल मिलना उचित ही है, क्योंकि ब्रह्म भी सत्य ही है ॥१ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्थं सत्यब्राह्मणम् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1208

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पञ्चम ब्राह्मण प्रथमज सत्य - ब्रह्म और ' सत्य ' नामके अक्षरोंकी उपासना सत्यस्य ब्रह्मणः स्तुत्यर्थमिद | सत्य - ब्रह्मकी स्तुति के लिये यह ब्राह्मण उसे ' महत्, यक्ष, प्रथमज ' माह, महद् यक्षं प्रथमजमित्यु- इस प्रकार कहता है, सो पहले बतला दिया । उसका प्रथमजत्व क्तम्, तत् कथं प्रथमजत्वम्? किस प्रकार है? सो बतलाया इत्युच्यते- जाता है-आप एवेदमग्र आसुरता आपः सत्यमस्सृजन्त सत्यं ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवास्ते देवाः सत्यमे-वोपासते तदेतत् त्र्यक्षर ँ सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तोत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीत सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वा- समनृत ँ हिनस्ति ॥ १ ॥

यह [ व्यक्त ं जगत् ] पहले आप ( जल ) ही था । उस आपने सत्यकी रचना की । अतः सत्य ब्रह्म है । ब्रह्मने प्रजापति ( विराट् ) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया । वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं । वह यह ' सत्य ' तीन अक्षरवाला नाम है । ' स ' यह एक अक्षर है, ' ती ' यह एक अक्षर है और ' यम् ' यह एक अक्षर है । इनमें प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है । वह यह अनृत दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है । इसलिये यह सत्यबहुल ही है । इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता ॥ १ ॥

आप एवेदमग्र आसुः । आप आरम्भमें यह आप ( जल ) ही इति कर्म समवायिन्योऽग्निहोत्राद्या- था । ' आप ' शब्दसे कर्मसम्बन्धी अग्निहोत्र आदिकी आहुतियाँ कही गयी ब्राह्म हुतय त्मक होत्रा चिय समव भूत कर्म मिति स L रव्य निर्दि बीज विक्र कि त तस्म तदे जन्म व्या कुत इत्य कथ

पृष्ठ 1209

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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९ ५ सना लिये यह प्रथमज ' नो पहले प्रथमजत्व बतलाया सृजन्त त्यमे कमक्षरं सत्यं हीत त ॥ १ ॥

आपने ट् ) को उपासना क अक्षर प्रथम त दोनों प्रकार जल ) ही सम्बन्धी कही गयी हृतयः, अग्निहोत्राद्याहुतेर्द्रवा । त्मकत्वादप्त्वम्, ताचापोऽग्नि-होत्रादिकर्मापवर्गोचरकालं केन-चिद्दष्टेन सूक्ष्मेणात्मना कर्म-समवायित्वमपरित्यजन्त्य इतर-भूतसहिता एव न केवलाः । कर्मसमवायित्वात्तु प्राधान्यमपा-मिति । सर्वाण्येव भूतानि प्रागुत्पचे-रव्याकृतावस्थानि कर्तृसहितानि निर्दिश्यन्त आप इति । ता आपो बीजभूता जगतोऽव्याकृतात्मना-वस्थितास्ता एवेदं सर्व नामरूप-विकृतं जगदग्र आसुर्नान्यत् किञ्चिद् विकारजातमासीत् । ताः पुनरापः सत्यमसृजन्त; तस्मात् सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, तदेतद् हिरण्यगर्भस्य सूत्रात्मनो जन्म, यदव्याकृतस्य जगतो व्याकरणम् । तत् सत्यं ब्रह्म, कुतः.१ महत्त्रात् । कथं महन्त्रम् १ इत्याह – यस्मात् सर्वस्य स्रष्टृ । कथम् १ यत् सत्यं ब्रह्म तत् हैं । अग्निहोत्रादिको आहुति द्रवरूप होनेके कारण आप ( जल ) है । अग्निहोत्र - कर्मकी समाप्ति के पश्चात् वह आप किसी अदृष्ट सूक्ष्मरूपसे अपने कर्म - सम्बन्धको न छोड़ते हुए अन्य भूतोंके साथ ही रहता है, अकेला नहीं रहता । कर्मसम्ब-न्धित्व रहनेके कारण प्रधानता आप ( जल ) की ही है [ इसलिये यहाँ उसे ' आप ' शब्दसे ही कहा है । ] यहाँ ' आप ' ऐसा कहकर उत्पत्ति-से पहले अव्याकृत ( अव्यक्त ) रूपमें स्थित कर्तासहित सभ भूतोंका निर्देश किया जाता है । जगत्का बीजभूत वह आप अव्या-कृतरूपसे स्थित था । यह नाम - रूप विकारको प्राप्त हुआ जगत् आरम्भमें वही था, उससे भिन्न कोई और विकारसमुदाय नहीं था । फिर उस आपने सत्यकी रचना की । इसीसे सत्य ब्रह्म प्रथमज है । वही यह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति है; जो कि अव्याकृत जगत्का व्यक्त होना है । वह सत्य ब्रह्म है, क्यों ब्रह्म है? महत्ता के कारण । उसकी महत्ता किस प्रकार है? सो श्रुर्ति बतलाती है- क्योंकि वह सबका स्रष्टा है । किस प्रकार? जो सत्य

पृष्ठ 1210

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११५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ प्रजापतिं प्रजानां पतिं विराजं । सूर्यादिकरणमसृजतेत्यनुषङ्गः । प्रजापतिर्देवान् स विराट्प्रजा-पतिर्देवानसृजत । यस्मात् सर्वमेवं क्रमेण सत्याद् ब्रह्मणो जातं तस्मान्महत् सत्यं ब्रह्म । कथं पुनर्यक्षम् १ इत्युच्यते— त एवं सृष्टा देवाः पितरमपि विराजमतीत्य तदेव सत्यं ब्रह्मो-पासते । अत एतत् प्रथमजं महद् यक्षम् । तस्मात् सर्वात्मनो -पास्यं तत्, तस्यापि सत्यस्य अह्मणो नाम सत्यमिति । तदेतत् त्र्यक्षरम् । कानि तान्य-क्षराणि १ इत्याह - स इत्येक-मतरम्, तीत्येकमक्षरम् - - तीती कारानुबन्धो निर्देशार्थ: -यमि-त्येकमक्षरम्; तत्र तेषां प्रथमो-तमे अक्षरे सकारयकारौ सत्यम् मृत्युरूपाभावात् । मध्यतो ब्रह्म था, उसने प्रजापतिको सूर्यादि जिसकी इन्द्रियां हैं, उस प्रजाओंके. स्वामी विराट्को उत्पन्न किया --ऐसा इसका सम्बन्ध है । ' प्रजापति-देवान् ' - – उस विराट् प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया । चूँकि इस क्रमसे सब कुछ सत्य ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है, इसलिये सत्य ब्रह्म महत् है । किंतु वह यक्ष ( पूज्य ) क्यों है, सो बतलाया जाता है - वे इस प्रकार रचे हुए देवगण अपने पिता विराट्का भी अतिक्रमण करके उस सत्य - ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं, इसलिये यह प्रथमोत्पन्न सत्य - ब्रह्म महत् यक्ष है । अतः वह सब प्रकार उपासनीय है, उस सत्य - ब्रह्मका भी ' सत्य ' यह नाम है । वह यह नाम तीन अक्षरोंवाला है । वे अक्षर कौन - से हैं, सो श्रुति बतलाती है -- ' स ' यह एक अक्षर है । ' ती ' यह एक अक्षर है— ' ती ' इसमें ईकारानुबन्ध निर्देश ( स्पष्ट उच्चारण ) के लिये है-' यम् ' यह एक अक्षर है । इनमें सकार और यकार — ये पहले और अन्तिम अक्षर सत्य हैं, क्योंकि उनके मृत्युरूपका अभाव है । मध्यतः ब्राह्म मध्य मृत्यव रूपम ल वितं त्करं यम सर्वस चय नृतं हिन श्र संस्थ स्मि ताव ष्ठित शुर यन्त I ओ