बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1211–1220
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220
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व्याय ५ -सूर्यादि जाओंके. किया --नजापति-जापतिने । चूँकि ब्रह्मसे ही सत्य ब्रह्म व्य ) क्यों —वे इस पिता रके उस करते हैं, सत्य ब्रह्म प्रकार झका भी रोंवाला सो श्रुति अक्षर र है-निर्देश है--। इनमें इले और क उनके मध्यतः ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ मध्येऽनृतम्, अनृतं हि मृत्युः मृत्य्वनृतयोस्तकारसामान्यात् । तदेतदनृतं वकाराचरं मृत्यु-रूपमुभयतः सत्येन सकारयकार-लक्षणेन परिगृहीतं व्याप्तमन्तर्भा | वितं सत्यरूपाभ्यामतोऽकिश्चि-त्करं तत्, सत्यभ्रूयमेव सत्यवाहु -ल्यमेव भवति । एवं सत्यबाहुल्यं सर्वस्य मृत्योरनृतस्याकिञ्चित्करत्वं च यो विद्वान्, तमेवं विद्वांसम-नृतं कदाचित् प्रमादोक्तं न हिनस्ति ॥ १ ॥
११ ९ ७ । अर्थात् वीचमें अनृत है, अनृत मृत्यु है; क्योंकि मृत्यु और अनृत इनकी तकार में समानता है । वह यह मृत्युरूप अनृत तकार अक्षर दोनों ओरसे सकार - यकार-रूप सत्य से परिगृहीतव्याप्त है, अर्थात् इन सत्यरूप अक्षरोंसे अन्त-र्भावित है, अतः वह अकिञ्चित्कर है; इसलिये ' सत्य ' यह नाम सत्य-भूय - सत्यप्राय ही है । इस प्रकार इस सम्पूर्ण अक्षरके सत्यबाहुल्य और मृत्युरूप अनृतके अकिञ्चित्क-रत्वको जो जानता है, उस इस प्रकार जाननेवाले को कभी प्रमाद-से बोला हुआ अनृत ( असत्य ) नहीं मारता ॥ १ ॥
एक - दूसरेमें प्रतिष्ठित सत्य मंज्ञक ग्रादित्यमण्डलस्थ और चाक्षुष पुरुष अस्याधुना सत्यस्य ब्रह्मणः अब उस सत्य - ब्रह्मकी संस्थान-संस्थानविशेष उपासनमुच्यते-- | विशेष में उपासना बतलायी जाती है-तद् यत्तत् सत्यमसौस आदित्यो य एष एत-स्मिन् मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावे-तावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रति-ष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्या-यन्ति ॥ २ ॥
वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष एक - दूसरे में
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११ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ प्रतिष्ठित हैं । आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष पुरुष में प्रतिष्ठित है चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें प्रतिष्ठित है । जिस समय यह ( चाक्षुष पुरुष ) उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही -देखता है । फिर ये रश्मियां इसके पास नहीं आतीं ॥ २ ॥
तद् यत्, किं तत् १ सत्यं ब्रह्म । प्रथमजम्, किम्? असौ सः । कोऽसौ? आदित्यः कः पुनर-सावादित्यः १ य एषः, क एषः १ य एतस्मिन्नादित्यमण्डले पुरुषो -ऽभिमानी सोऽसौ सत्यं ब्रह्म; यश्चायमध्यात्मं योऽयं दक्षिणे-अक्षन्नक्षणि पुरुषः चशब्दात् स च सत्यं ब्रह्मेति संबन्धः । तावेतावादित्याक्षिस्थौ पुरुषा-चेकस्य सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थान-विशेषौ यस्मात् तस्मादन्योन्यस्मि -नितरेतरस्मिन्नादित्यञ्चाक्षुषे चा-क्षुषवादित्ये प्रतिष्ठितौ अध्या-समाधिदैवतयोरन्योन्योपकार्यो-पकारकत्वात् । कथं प्रतिष्ठितौ १ इत्युच्यते रश्मिभिःप्रकाशेनानुग्रहं कुर्वन्नेष आदित्योऽस्मिंश्चाक्षुषेऽध्यात्मे प्र-तिष्ठितः । श्रयं च चाक्षुषः प्राणै-वह जो, वह कौन? प्रथम उत्पन्न हुआ सत्य - ब्रह्म, क्या है? यह वह है । कौन है? आदित्य; किंतु यह आदित्य कौन है? जो यह है, यह कौन? जो इस आदित्यमण्डलमें इसका अभिमानी पुरुष है, वह यह सत्य - ब्रह्म है; जो कि यह अध्यात्म है, अर्थात् जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वह भी ब्रह्म है - ऐसा ' च ' शब्दसे सम्बन्ध लगाना चाहिये । क्योंकि वे ये आदित्यस्थ और नेत्रस्थ पुरुष एक सत्य ब्रह्मके ही संस्थान ( आकार ) विशेष हैं, इसलिये एक - दूसरेमें अर्थात् आदित्य - पुरुष चाक्षुष और चाक्षुष पुरुष आदित्यमें प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि अध्यात्म और अधिदैव पुरुष एक - दूसरेके उपकार्य और उपकारक होते हैं । वे किस प्रकार प्रतिष्ठित हैं, सो बतलाया जाता है - रश्मियों अर्थात् प्रकाशके द्वारा अनुग्रह करता हुआ यह आदित्य- पुरुष इस अध्यात्म चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित है तथा यह चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा इस ब्राह्म रादि सो भोक्त मिष्य आदि केवल तिष्ठत पश्या तन्मण तदेत ते यत्नव तं प्रत कर्तव्य पुनस्त नोपय अतो कारक
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ध्याय ५ और - ( चाक्षुष को शुद्ध हो ? प्रथम क्या है? आदित्य है? जो जो इस अभिमानी है; जो अर्थात् जो. वह भी से सम्बन्ध व्यस्थ और ब्रह्मके ही विशेष हैं, अर्थात् में और प्रतिष्ठित अधिदेव कार्य और ष्ठित हैं, सो यों अर्थात् करता हुआ अध्यात्म तथा द्वारा इस ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९९ रादित्यमनुगृह्णन्नमुष्मिन्नादित्ये -ऽधिदैवे प्रतिष्ठितः । सोऽस्मिञ्छरीरे विज्ञानमयो भोक्ता यदा यस्मिन् काल उत्क्र-मिष्यन् भवति तदासौं चाक्षुष श्रादित्यपुरुषो रश्मीनुपसंहृत्य केवलेनौदासीन्येन रूपेण व्यव-तिष्ठते । तदायं विज्ञानमयः पश्यति शुद्धमेव केवलं विरइम्ये-तन्मण्डलं चन्द्रमण्डलमिव । तदेतदरिष्टदर्शनं प्रासङ्गिकं प्रद-शर्यते । कथं नाम पुरुषः करणीये यत्नवान् स्यादिति । नैनं चाक्षुषं पुरुषमुररीकृत्य तं प्रत्यनुग्रहायै ते रश्मयः स्वामि -कर्तव्यवशात् पूर्व मागच्छन्तोऽपि पुनस्तत्कर्मक्षयमनुरुध्यमाना इव
नोपयन्ति न प्रत्यागच्छन्त्येनम् ।
अतोऽवगम्यते परस्परोपकार्योप-कारकभावात् सत्यस्यैवैकस्यात्म-नोंऽशावेताविति ॥ २ ॥
| आदित्य- पुरुषका उपकार करता हुआ इस अधिदैव आदित्य - पुरुषमें प्रतिष्ठित है । इस शरीर में जो यह विज्ञान-मय ( जीव ) भोक्ता है, यह जिस कालमें उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह चाक्षुष आदित्य -पुरुष रश्मियोंका उपसंहार कर अपने शुद्ध औदासीन्यरूपसे स्थित । हो जाता है । तब यह विज्ञानमय इस आदित्यमण्डलको चन्द्रमण्डलके समान शुद्ध — केवल अर्थात् रश्मि-रहित देखता है । यहाँ यह प्रासंगिक अरिष्टदर्शन प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि किसी प्रकार पुरुष अपने कर्त्तव्यमें सयत्न रहे । इस चाक्षुष पुरुषको स्वीकार कर उसके प्रति अनुग्रह करने के लिये ये रश्मियाँ, जो स्वामीके कर्त्तव्यवश पहले आती थीं, अब उसके कर्मक्षयके पश्चात् अवरुद्ध हुई - सी इसके पास प्रत्यागमन नहीं करतीं - नहीं आतीं । अतः यह ज्ञात होता है कि परस्पर उपकार्य - उपकारकभाव रहने के कारण ये दोनों एक सत्यात्मा के ही अंश हैं ॥ २ ॥
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ १२०० अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव तत्र योऽसौ, कः? 1 ऐसी स्थितिमें जो यह है, कौन? य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एक शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्व े प्रतिष्ठे द्वे ते अक्षरे तस्योपनिषद हरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥
इस मण्डलमें जो यह पुरुष है, उसका ' भू: ' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । ' भुवः ' यह भुजा है; भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं; । ' स्वः ' यह प्रतिष्ठा ( चरण ) है; प्रतिष्ठा ( चरण ) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । ' अहरू ' यह उसका उपनिषद् ( गूढ़ नाम ) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है ॥३ ॥
य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सत्यनामा तस्य व्याहृत-योऽवयवाः । कथम् १ भूरिति येयं व्याहृतिः, सा तस्य शिरः प्राथम्यात् । तत्र सामान्यं स्वय-मेवाह श्रुतिः - एकमेकसंख्या-युक्तं शिरस्तथैतदक्षरमेकं भूरिति भुव इति बाहू द्वित्वसामान्याद् द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे ॥ तथा स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते जो कि इस मण्डलमें सत्य नामवाला पुरुष है, उसके अवयव व्याहृतियाँ हैं । किस प्रकार? [ सो बतलाते हैं- ] ' भू: ' ऐसी जो यह व्याहृति है, वह प्रथम होनेके कारण उसका शिर है । उनकी समानता श्रुति स्वयं ही बताती है - शिर एक अर्थात् एक संख्या-। वाला है, इसी प्रकार ' भू: ' यह भी एक अक्षर है । दो होने में समानता होने के कारण ' भुवः ' यह भुना है, दो भुजाएँ हैं और दो ही हैं । तथा ' स्व: । यह प्रतिष्ठा है, दो प्रतिष्ठाएँ हैं ब्राह्म अक्षर I त्याम F तस E सत्य E मभि E E भवति E इत्या F चैतद Gव E पाम एव एक एते तस्य एवं ज और य अक्षर १ २
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अध्याय ५ चयव है, कौन? भूरिति बाहू एते जहाति एक है - हैं और ये रण ) दो हैं नाम ) है; हे ॥३ ॥
में सत्य अवयव कार? [ सो सी जो यह यम होनेके ही बताती एक संख्या-' भूः ' यह दो होने में ' भुवः ' जाएं हैं और तथा ' स्वः ' प्रतिष्ठाएँ हैं ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थं १२०१ अक्षरे । प्रतिष्ठे पादौ प्रतितिष्ठ-त्याभ्यामिति । तस्यास्य व्याहृत्यवयवस्य सत्यस्य ब्रह्मण उपनिषद्रहस्य-मभिधानम्ः येनाभिधानेनाभि-धीयमानं तद् ब्रह्माभिमुखी-भवति लोकवत् । कासौ १ इत्याह- श्रहरिति । अहरिति चैतद् रूपं हन्तेर्जहातेथ । इति यो वेद स हन्ति जहाति च पाप्मानं य एवं वेद ॥ ३ ॥
20791 । और दो ही ये अक्षर हैं । इन ( चरणों ) से पुरुष प्रतिष्ठित होता है - इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रतिष्ठा चरणको कहते हैं । उस इस व्याहृतिरूप अवयवों-वाले सत्य ब्रह्मका उपनिषद् -- रहस्य अर्थात् गूढ नाम, जिस नामसे पुकारे जानेपर वह ब्रह्म अन्य लोगोंके समान अभिमुख होता है । वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है — अहर् । ' अहुर् ' यह ' हन् ' और ' हा " इन धातुओंका रूप है । जो ऐसा जानता है [ अर्थात् अहसंज्ञक ब्रह्मको उपा-सना करता है | वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३ ॥
हंसंज्ञक चाक्षुष पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव एवम्— 1 इसी प्रकार-योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एक शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू इ एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा े द्व प्रतिष्ठे द्व े एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥
जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, उसका ' भू: ' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है । ' भुवः ' यह भुजा हे, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । स्वः यह प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा ( चरण ) दो हैं और ये १. ' हन हिंसागत्योः ' ( ' हन् ' धातु हिंसा और गमन अर्थ में है ) । २. ' ओहाक् त्यागे ' ( ' हा ' धातु त्याग - अर्थ में है ) । बृ ० उ ० ७६–
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१२०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ अक्षर भी दो हैं । ‘ अहम् ' यह उसका जानता है, वह पापको मारता और योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर इत्यादि सर्वं समा-नम्, तस्योपनिषदहमिति; प्रत्य-गात्मभूतत्वात् । पूर्ववद् इन्ते-जहातेचेति ॥ ४ ॥
उपनिषद् ( गूढ नाम ) है; जो ऐसा त्याग देता है ॥ ४ ॥
जो यह दक्षिणनेत्रमें पुरुष है, उसका ' भूः ' यह शिर है - इत्यादि सब अर्थं पूर्ववत् है । उसका ' अहम् ' यह उपनिषद् है; क्योंकि वह प्रत्य-गात्मस्वरूप है पूर्ववत् यानी ' अहर् ' के समान ' अहम् ' भी ' हत् ' और ' हा ' इन दोनों धातुओं का रूप 118 11 इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चमं सत्यब्रह्मसंस्थानब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
300 ----षष्ठ ब्राह्मण हृदयस्थ मनोमय उपाधीनामनेकत्वादनेकविशे-पणत्वाच्च तस्यैव प्रकृतस्य ब्रह्मणो मनउपाधिविशिष्टस्यो-पासनं विधित्सन्नाह— मनोमयोऽयं पुरुषो यथा व्रीहिर्वा यवो वा स पुरुषकी उपासना उपाधियाँ अनेक हैं और उनके बहुत - से विशेषण हैं, इसलिये उस मनउपाधिविशिष्ट प्रकृत ब्रह्मकी ही उपासनाका विधान करने की इच्छा-से श्रुति कहती है-भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तहृ दये एष सर्वस्येशानः सर्वस्था-धिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥ १ ॥
ब्राझ चह तथा मन लभ्य लभत भाःस स्वर आस्व fa भास्व व स्तरि वो स्वसि इत्यथ सर्वस स्वामी तथा पाला
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अध्याय५ है; जो ऐसा में पुरुष है, है - इत्यादि का ' अहम् ' क वह प्रत्य-वत् यानी ' भी ' हन् ' लुओंका रूप i और उनके इसलिये उस -ब्रह्मकी ही नेकी इच्छा-तहृदये सर्वस्या-३ ॥ ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३ प्रकाश ही जिसका सत्य ( स्वरूप ) है, ऐसा यह युरुष मनोमय है । वह उस अन्तहृदयमें जैसा व्रीहि ( धान ) या यव ( जो ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है । वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है, तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता है ॥ १ ॥
मनोमयो मनःप्रायो मनस्युप-लभ्यमानत्वात् । मनसा चोप-लभत इति मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यो भा एव सत्यं सद्भावः स्वरूपं यस्य सोऽयं भाः सत्यो आस्वर इत्येतत् । मनसः सर्वा -विभासकत्वान्मनोमयत्वाच्चास्य भास्वरत्वम् । तस्मिन्नन्त हृदये हृदयस्थान्त-स्तस्मिन्नित्येतत्, यथा व्रीहिर्वा यवो वा परिमाणत एवं परिमाण -स्तस्मिन्नन्तर्हृदये योगिभिर्दृश्यत इत्यर्थः । स एष सर्वस्येशानः । सर्व स्त्रमेदजातस्येशानः । स्वामी | स्वामित्वेऽपि सति कश्चिदमात्यादितन्त्रोऽयं तु न तथा किं तधिपतिरधिष्ठाय पालयिता । मनमें उपलब्ध होनेवाला होने से यह मनोमय - मनःप्राय है । इसे मनसे उपलब्ध करते हैं, इसलिये यह पुरुष मनोमय है; तथा भाःसत्य हे — भा ही सत्य – सद्भाव अर्थात् स्वरूप है जिसका, ऐसा यह पुरुष भाःसत्य अर्थात् भास्वर है । मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोमय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है । उस अन्तर्हृदयमें अर्थात् हृदय-का जो अन्तर्भाग है उसमें, जैसा कि परिमाणतः व्रीहि या यव होता है, उतने ही परिमाणवाला यह उस अन्तहृदयमें योगियोंद्वारा देखा जाता है — ऐसा इसका तात्पर्यं है । वह यह सबका ईशान अर्थात् अपने [ औपाधिक ] भेदसमुदायका स्वामी है । स्वामी होनेपर भी कोई मन्त्री आदिके अधीन रहता है, किंतु यह ऐसा नहीं है । तो फिर क्या है? यह अधिपति अर्थात् अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला है ।
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१२०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किश्च यत् किञ्चित् सर्वं जगत् तत् सर्वं प्रशास्ति । एवं मनोमय. स्योपासनात् तथारूपापत्तिरेव फलम् । " तं यथा यथोपासते तदेव भवति " इति | ब्राह्मणम् ॥ १ ॥
[ फल - ] इन सबका प्रशासन करता है — यह जो कुछ है अर्थात् जितना कुछ भी यह जगत् है, उन सबका प्रकर्षतया शासन करता है । इस प्रकार मनोमय ब्रह्मकी उप-सनासे तद्रूपता की प्राप्तिरूप ही फल मिलता है । " उसकी जो ज प्रकार उपासना करता है वही हो जाता है " - ऐसा ब्राह्मणवाक्य ॥ १ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षष्ठ मनोब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
सप्तम ब्राह्मण ब्राह्म 000 कारं विद्य यो बिना प्रति तान् तीत्य ब्रह्मो विद्य इति विद्यद्ब्रह्मकी उपासना तथैवोपासनान्तरं सत्यस्य इसी प्रकार सत्य - ब्रह्मकी विशिष्ट फलवाली एक दूसरी उपासनाका ब्रह्मणो विशिष्टफलमारभ्यते- आरम्भ किया जाता है--विद्युद् ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युद् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति वियुद्ध व ब्रह्म ॥ १ ॥
विद्युत् ब्रह्म है - ऐसा कहते हैं । विदान ( खण्डन या विनाश ) करनेके कारण विद्युत् है । जो ' विद्युत् ब्रह्म है ' ऐसा जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥
विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः । विद्युतो । ' विद्युद् ब्रह्म ेत्याहु: ' -श्रुतिविद्युत्-ब्रह्मणो निर्वचनमुच्यते — विदा- ब्रह्मकी निरुक्ति ( व्युत्पत्ति ) बतलाती है -- अन्धकार के विदान- खण्डनके नादवखण्डनात् तमसो मेघान्ध- कारण, क्योंकि यह मेघके अन्धकार-ब्रह्मण हाक देवा मनु वत्स व वषट
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अध्याय ५ का प्रशासन अर्थात् गत् है, उन - करता है । ह्मकी उपा रूप ही फल जो जिस वही हो ह्मणवाक्य म् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०५ कारं विदायै ह्यवभासतेऽता विद्युत् । एवंगुणं विद्युद् ब्रह्मेति यो वेदासौ विद्यत्यवखण्डयति विनाशयति पाप्मन एनमात्मानं प्रति प्रतिकूल भूताः पाप्मानो ये
तान् सर्वान् पाप्मनोऽवखण्डय -तीत्यर्थः । य एवं वेद विद्युद् ।
ब्रह्मेति तस्वानुरूपं फत्तम् ॥
विद्युद्धि यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥
224 | को विदीर्ण करके प्रकाशित होती है, इसलिये विद्युत् है । ऐसे गुण-वाले विद्युद् ब्रह्मको जो जानता है, वह पापको ' विद्यति - खण्डित । अर्थात् नष्ट कर देता है । तात्पर्यं | यह है कि इस आत्माके प्रतिकूलभूत जितने पाप होते हैं, उन सबका यह खण्डन कर देता है । जो ' विद्युत् ब्रह्म है ' ऐसा जानता है, यह उसका अनुरूप फल है । क्योंकि विद्युत् ब्रह्म है ॥ १ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तमं विद्युद्ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥
चुकी विशिष्ट उपासनाका पाप्मनो ॥ १ ॥
T ) करने के इस आत्मा है ॥ १ ॥
श्रुतिविद्युत्-त ) बतलाती न - खण्डन के के अन्धकार-अष्टम ब्राह्मणं धेनुरूपसे वाक्की उपासना पुनरुपासनान्तरं तस्यैव पुनः उस सत्यब्रह्म की ही ' वाग् ब्रह्म ' ऐसी अन्य उपासना आरम्भ ब्रह्मणो वाग् वै ब्रह्मेति- - की जाती है— वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वा-हाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकार मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ । वाक्रूप घेनुकी उपासना करे । उसके चार स्तन हैं — स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार । उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्-
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१२०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ कारके उपजीवी देवगण हैं, हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं और स्वधाकार के पितृगण । उस घेनुका प्राण वृषभ है वागिति शब्दत्रयी तां वाचं धेनुं धेनुरिव घेनुर्यथा धेनुश्चतुर्भिः स्तनैः स्तन्यं पयः क्षरति वत्सायैवं वाग्घेनुर्वक्ष्यमाणैः स्तनैः पय इवान्नं चरति देवादिभ्यः । के पुनस्ते स्तनाः १ के वा ते येभ्यः चरति? तस्या एतस्या वाचो घेन्वा द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति वत्स-स्थानीयाः । कौ तौ? स्वाहाकारं च वषट्कारं च आभ्यां हि हविर्दीयते देवेभ्यः । इन्तकारं मनुष्याः - हन्तेति मनुष्येभ्यो-ऽन्नं प्रयच्छन्ति । स्वधाकारं पितरः - स्वधाकारेण हि पितृभ्यः स्वधां प्रयच्छन्ति । तस्या घेन्वा वाचः प्राण ऋषभः प्राणेन हि वाक् प्रस्तूयते । मनो वत्सः, मनसा हि प्रस्राव्यते और मन बछड़ा है ॥ १ ॥
वाक् यह शब्द अर्थात् त्रयी ( तीन वेद - ऋक्, यजुः और साम ) है; उस वाकूरूप धेनुकी जो उपा-सना करे, जो धेनुके सामान धेनु है । जिस प्रकार धेनु अपने चार | स्तनोंसे बछड़ेके लिये स्तन्य अर्थात् दूध बहाती है, उसी प्रकार वाग्धेनु आगे बतलाये जानेवाले स्तनोंसे देवादिके लिये दूधके समान अन्न प्रकट करती है । वे स्तन कौन - से हैं? और जिनके लिये वह दूध देती है, वे भी कौन - कौन हैं? उस इस वाक्रूपी धेनु दो स्तनोंके वत्सस्थानीय देवगण उप-जीवी हैं 1 । वे दो स्तन कौन - से हैं? स्वाहाकार और वषट्कार; क्योंकि इन्होंके द्वारा देवताओंको हवि दी जाती है । हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं, ' हन्त ' ऐसा कहकर मनुष्योंको अन्न देते हैं । स्वधाकार-के उपजीवी पितृगण हैं- स्वधा-| कारके द्वारा ही पितृगणको स्वधा ( श्राद्धीय वस्तु ) देते हैं । , उस धेनुरूप वाणीका प्राण वृषभ है, क्योंकि प्राणके द्वारा ही वाक् प्रसव करती है । मन उसका वत्स है, क्योंकि मनसे ही वह प्रत्रवि ब्राह्म मनस प्रवर्त यम् व्यम प पच वि घोष जो है, करन नान S य