बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1261–1270

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270

पृष्ठ 1261

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[ अध्याय५ ! हमें ' राये ' प्राप्ति के लिये सु-ले चल । पुनरा-अर्थात् घूममार्गसे किससे? सुपथ विवयान ] मार्गसे हो देव! तू सम्पूर्ण वाला है । हमारे - कुटिल एनस् -बोधि ' -- दूर कर । क होकर हम तेरी मार्गसे जायँगे । परिचर्या -- सेवा हीं हैं, अतः तेरे चार नमउक्ति-— का विधान करें । करनेमें असमर्थ नमस्कारोक्तिद्वारा रें ॥ १ ॥

न्याये ॥ परिव्राजकाचार्यस्य षष्ठ अध्याय - + -प्रथम ब्राह्मण. ॐ प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । कस्मात् पुनः कारणात् प्राणभावो गायत्र्या न पुनर्वागादिभाव इति? यस्माज्ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च प्राणः; न वागादयो ज्यैष्ठयभैष्ठयभाजः । कथं ज्येष्ठत्वं श्रेष्ठत्वं च प्राणस्येति तन्निर्दिधारयिषयेदमारभ्यते । अथवोक्थयजुःसामक्षत्त्रादि-भावः प्राणस्यैवोपासनमभिहितं सत्स्वप्यन्येषु चक्षुरादिषु । तत्र हेतुमात्रमिहानन्तर्येण सम्बध्यते । न पुनः पूर्वंशेषता । विवक्षितं तु खिलत्वादस्य काण्डस्य पूर्वत्र यदनुक्तं विशिष्टफलं प्राणविषय-मुपासनं तद् वक्तव्यमिति । ॐ प्राण गायत्री है - ऐसा पहले कहा जा चुका है । गायत्रीका प्राणभाव ही किस कारण से है, वागादिभाव क्यों नहीं हे? क्योंकि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है, वागादि ज्येष्ठता और श्रेष्ठता के पात्र नहीं हैं । प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व क्यों है — इसका निश्चय करनेकी इच्छासे यह [ आगे-का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।. अथवा उक्थ, यजुः, साम, क्षत्त्रादि भावोंसे चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंके रहते हुए भी प्राणकी ही उपासना बतलायी गयी है । यहाँ उसका हेतुमात्र है, जो उसके अनन्तर अनन्तर होनेके होनेके कारण उससे सम्बन्ध रखता है । यह पूर्वं ग्रन्थका शेष नहीं है । इसका विवक्षित विषय विशिष्टफलवती प्राणोपासना ही है । यह काण्ड उसका खिलस्वरूप होनेके कारण जो पूर्वग्रन्थ में नहीं कहा गया, उसीको यहाँ बतलाना है ।

पृष्ठ 1262

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१२४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ cacacias ब्राह्मण ज्येष्ठ - श्रेष्ठ दृष्टि से प्रारणोपासना X निषेक ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च प्राण श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च चक्षुर ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति प्राण य एवं वेद ॥ १ ॥ भ

जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ गुणह और श्रेष्ठ होता है । प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है । जो इस प्रकार उपासना कनि करता है, वह अपने ज्ञाति जनों में तथा उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ॥ १ यः कश्चिद्ध वा इत्यव - । धारणार्थौ । यो ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं वक्ष्यमाणं यो वेदासौ भवत्येव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठच । एवं फलेन प्रलोभितः सन् प्रश्नायाभिमुखी-भूतस्तस्मै चाह- ' प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । कथं पुनरव गम्यते प्राणो ज्येष्ठश्च श्रं ष्ठश्चेति? यस्माभिषेक-काल एव शुक्रशोणितसम्बन्धः प्राणादिकलापस्याविशिष्टः; तथापि नामाणं शुक्रं विरोहतीति और भी जिन लोगों में चाहता है, ॥ जो कोई; यहां ' ह ' और ' वै ' हेल्थ निश्चयार्थक हैं, जो आगे बतलाये श्रेष्ठ जानेवाले ज्येष्ठ और श्रेष्ठ गुणवाले गम्य प्राणको जानता है, वह ज्येष्ठ और दर्श श्रेष्ठ हो ही जाता है । इस प्रकार स फलसे प्रलोभित होनेपर जब साधक प्रश्नके लिये अभिमुख होता है तो गुण उससे श्रुति कहती है- ' प्राण ही ज्ञा ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है । ' ज्य किंतु यह जाना कैसे जाता है । I स्व कि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है । क्यों- I मध कि गर्भाधानके समय ही यद्यपि मी प्राणादिसमूहका शुक्र और I तेष शोणितसे समान सम्बन्ध है, तो भी बिना प्राणके शुक्रमें शरीरका I ज्य अङ्कुर नहीं होता; अतः चक्षु प्रथमो वृत्तिलाभः प्राणस्य चक्षुरा- आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षा प्राणको पहले वृत्तिलाभ होता है; इस-दिभ्यः अतो ज्येष्ठो वयसा प्राणः । | लिये आयुके द्वारा प्राण ज्येष्ठ है ।

पृष्ठ 1263

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[ अध्याय६ वेद ज्येष्ठश्च उश्च श्रेष्ठश्च विषां बुभूषति ज्ञातिजनों में ज्येष्ठ -प्रकार उपासना चाहता है, हां ' ह ' और ' ' आगे बतलाये र श्रेष्ठ गुणवाले है, वह ज्येष्ठ और है । इस प्रकार होनेपर जब साधक मुख होता है तो ती है - ' प्राण ही । ' ना कैसे जाता है । र श्रेष्ठ है । क्यों-समय ही यद्यपि शुक्र और सम्बन्ध है, तो शुक्रमें शरीरका ता; अतः चक्षु अपेक्षा प्राणको होता है; इस-प्राण ज्येष्ठ है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२४ ९ निषेककालादारम्य गर्भ पुष्यति । प्राणः प्राणे हि लब्धवृत्तौ पश्चा-चक्षुरादीनां वृत्तिलाभ:; अतो युक्त प्राणस्य ज्येष्ठत्वं चक्षुरादिषु । भवति तु कश्चित् कुले ज्येष्ठः; गुणहीनत्वात्तु न श्र ेष्ठः । मध्यमः कनिष्ठो वा गुणाढ्यत्वाद् भवे -च्छ्रेष्ठो न ज्येष्ठः । न तु तथे-हेत्याह – ' प्राण एव तु ज्येष्ठश्च श्र ेष्ठश्च । ' कथं पुनः श्रैष्ठयमव-गम्यते प्राणस्य १ तदिह संवादेन दर्शयिष्यामः । सर्वथापि तु प्राणं ज्येष्ठश्र -गणं यो वेदोपास्ते, स स्वानां ज्ञातीनां ज्येष्ठश्व श्रेष्ठश्च भवति ज्येष्ठश्र ेष्ठगुणोपासनसामर्थ्यात् । स्वव्यतिरेकेणापि च येषां मध्ये ज्येष्ठश्च श्रष्टश्च भविष्या-मीति बुभूषति भवितुमिच्छति गर्भाधान के समयसे ही प्राण गर्भका पोषण करता है । प्राणके वृत्तियुक्त हो जाने के पीछे हो चक्षु आदिको वृत्तिलाभ होता है; अत: चक्षु आदिमें प्राणका ज्येष्ठत्व उचित कुल में कोई व्यक्ति ( आयुमें ) ज्येष्ठ तो होता है, किंतु गुणहीन होनेके कारण वह श्रेष्ठ नहीं माना जाता । इसी प्रकार गुणसम्पन्न होनेके कारण मध्यम अथव कनिष्ठ श्रेष्ठ तो होता है, किंतु ज्येष्ठ नहीं माना जाता; किंतु यहाँ ऐसा नहीं है । ( यही बात श्रुति बतलाती है ) - - ' प्राण ही ज्येष्ठ है और श्रेष्ठ भी ' । प्राणकी श्रेष्ठता कैसे जानी जाती है? यह बात यहाँ हम संवादसे प्रदर्शित करेंगे । जो किसी भी प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठगुणवाले प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है, वह ज्येष्ठ - श्रेष्ठ गुणवान्की उपासना-के सामथ्यसे अपनोंमें अर्थात् ज्ञातिजनों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है । अपनोंसे भिन्न दूसरे जिन-किन्हीं में भी वह ' मैं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाऊँ ' इस प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ होनेत्री इच्छा करता है, तेषामपि ज्येष्ठश्रष्ठप्राणदर्शी उनमें भी यह ज्येष्ठ - श्रेष्ठ प्राणो-ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति । पासक ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है । १. अर्थात् प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व आरोपित हो अथवा वास्तविक । बृ ० उ ० ७६-

पृष्ठ 1264

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ १२५० ननु वयोनिमित्तं ज्येष्ठत्वम्; किंतु ज्येष्ठत्व तो बा भवति १ कारण होता है, वह इच्छा से कैसे तदिच्छातः कथं हो सकता है । ऐसी शङ्का होनेपर इत्युच्यते 1 । नैष दोषः, प्राणवद् कहते हैं -- यह दोष नहीं है; क्यों-ज्येष्ठत्वस्य विवक्षि- कि प्राणके समान [ यहाँ भी ] वृत्तिलाभस्यैव वृत्तिलाभ ज्येष्ठत्व रूपसे तत्वात् ॥ १ ॥ विवक्षित है ' ॥ १ ॥

वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग् वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥

जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है । वाक् ही वसिष्ठा है । जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनोंमें तथा और भी जिनमें चाहता है, उनमें वसिष्ठ होता है ॥ २ यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति । तद्दर्शनानुरूपेण फलम् । येषां च ज्ञातिव्यति-रेकेण वसिष्ठो भवितुमिच्छति तेषां च वसिष्ठो भवति । उच्यतां तर्हि कासौ वसिष्ठेति १ वाग वै वसिष्ठा । वासयत्यतिशयेन वस्ते १. जिस प्रकार मन्नभक्षणादिके लाभका कारण होनेसे प्राण ज्येष्ठ है, उसी बघीन होनेसे वह उनमें ज्येष्ठ है । उसका जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है । उसकी उपासना के अनुसार हो फल होता है । तथा अपनी जाति-से भिन्न जिन लोगों में वह बसिष्ठ होना चाहता है, उनमें भी वसिष्ठ हो जाता है । अच्छा तो बतला-इये, वसिष्ठा कौन है? [ इसपर कहते हैं-- ] वाक् ही वसिष्ठा है । | अतिशयरूपसे बसाती है, अथवा कारण चक्षु आदि इन्द्रियोंके वृत्ति-प्रकार अन्य जीवोंका जीवन प्राणोपासकके ज्येष्ठत्व आयुके कारण नहीं है । ब्राह्म धनव अ सिष्ठा चागि गुणव भवत ति प्रत एक और कर विष्ठ प्रति फल का च

पृष्ठ 1265

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[ अध्याय ६ तो आयु इच्छा से कैसे शङ्का होनेपर नहीं है; क्यों [ यहाँ भी ] ज्येष्ठत्वरूपसे भवति पच येषां है । वाक् ही तथा और भी नानता है, वह होता है । अनुसार ही अपनी जाति-में वह वसिष्ठ में भी वसिष्ठ तो बतला-? [ इसपर वसिष्ठा है । हे, अथवा इन्द्रियों के वृत्ति-प्राणोपासक के है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१ वेति वसिष्ठा । वाग्मिनो हि । धनवन्तो वसन्त्यतिशयेन । आच्छादनार्थस्य वा वसेर्व-सिष्ठा । श्रभिभवन्ति हि वाचा चाग्मिनोऽन्यान् । तेन वसिष्ठ- । गुणवत्परिज्ञानाद् वसिष्ठगुणो भवतीति दर्शनानुरूपं फलम् ॥ २ ॥

60447000 बसती है, इसलिये यह वसिष्ठा है; क्योंकि जो अच्छे वक्ता धनवान् होते हैं, वे ही अतिशयतापूर्वक बसते हैं । अथवा माच्छादनार्थक ' वस् ' धातुसे ' वसिष्ठा ' शब्द निष्पन्न होता है । वाक्कुशल लोग वाणीसे दूसरों-का पराभव कर देते हैं । अतः वसिष्ठगुणयुक्त पदार्थके विज्ञानसे उपासक वसिष्ठगुणवान् हो जाता है - इस प्रकार ज्ञान के अनुसार फल होता है ॥ २ ॥

प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रति-तिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद || ३ || जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश - कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गम देश - कालमें भी प्रतिष्ठित होता है । चक्षु ही प्रतिष्ठा है । चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश - कालमें प्रतिष्ठित होता है । जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥

यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति-तिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा तां प्रतिष्ठां प्रतिष्ठागुणवतीं यो वेद तस्यैतत् फलम् - प्रतितिष्ठति समे देशे काले च तथा दुर्गे विषमे च दुर्गमने च देशे दुर्भिक्षादौ वा काले विषमे । जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, जिससे प्रतिष्ठित होता है, उसे प्रतिष्ठा कहते हैं; उस प्रतिष्ठाको अर्थात् प्रतिष्ठागुणवती ( चक्षु ) को जो जानता है, उसे यह फल मिलता है कि वह समान देश और कालमें प्रतिष्ठित होता है तथा दुर्ग - विषम यानी दुर्गम्य देशमें और दुर्भिक्षादि विषम काल में भी प्रतिष्ठित होता है ।

पृष्ठ 1266

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१२५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ यद्येवमुच्यतां कासौं प्रतिष्ठा? चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । कथं चक्षुषः प्रतिष्ठात्वम् १ इत्याह- ' चक्षुषा हि समे च दुर्गे च दृष्ट्वा प्रतितिष्ठति ' श्रतोऽनुरूपं फलं प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेदेति ॥ ३ ॥

ब्राह्म यदि ऐसी बात है, तो बताइये यह प्रतिष्ठा क्या है? ( ऐसा प्रश्न पुनः होनेपर कहा जाता है- ) चक्षु हो प्रतिष्ठा है । चक्षुका प्रतिष्ठात्व कैसे त्युच्य है? यह श्रुति बतलाती है - ' क्योंकि सर्वे सम और विषम देश - काल में च देखकर ही पुरुष प्रतिष्ठित होता है । वतो s अतः जो ऐसी उपासना करता है, उसे यत्ता उसके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह सममें प्रतिष्ठित होता है और अतो दुर्ग में भी प्रतिष्ठित होता है || ३ || हास्य य ए सम्पदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना यो ह वै संपदं वेद सहास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥४ ॥ जन

जो सम्पद्को जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही तन उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है । श्रोत्र ही सम्पद है । श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं । जो ऐसी उपासना करता है, वह अन्य जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो उपा जाता है ॥ ४ ॥

यो ह वै संपदं वेद संपद्गुण - | जो भी सम्पदको जानता है, अर्थात् भी सम्पद्गुणवान् को जानता है, उसे यह य युक्तं यो वेद तस्यैतत् फलमस्मै फल मिलता है — उस विद्वानुको तनम विदुषे संपद्यते ह । किम् १ यं प्राप्त हो जाता है । क्या प्राप्त हो भवत कामं कामयते स काम; किं पुनः जाता है? जिस भोगकी वह इच्छा किं करता है वह भोग । अच्छा तो, मनो संपद्गुणकम्? श्रोत्रं वै संपत्, कथं | सम्पद्गुणयुक्त क्या है? श्री ही

पृष्ठ 1267

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[ अध्याय ६ हे, तो बताइये e ( ऐसा प्रश्न है ) चक्षु हो प्रतिष्ठात्व कैसे ती है - ' क्योंकि - कालमें चक्षुसे तष्ठित होता है । ना करता है, उसे मिलता है कि - होता है और होता है || ३ || ब्राह्मग १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५३ पुनः श्रोत्रस्य संपद्गुणत्वम् १६- । त्युच्यते । श्रोत्रे सति हि यस्मात् सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः श्रोत्रेन्द्रिय-वतोऽध्येयत्वात् । वेदविहितकर्मा -यत्ताश्च कामास्तस्माच्छ्रोत्रं संपत् अतो विज्ञानानुरूपं फलम्; सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥

सम्पद है । किंतु श्रोत्रका सम्पद्-गुणत्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है । श्रोत्रके रहते ही सम्पूर्ण वेद सब प्रकार निष्पन्न होते हैं, क्योंकि वे श्रोत्रेन्द्रियवान्द्वारा हो अध्ययन किये जा सकते हैं और भोग तो वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं, इसलिये श्रोत्र सम्पद् है । अतः विज्ञान ( उपासना ) के अनुरूप ही फल मिलता है । जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे मिल जाता है । ४ । यं कामं अभिसंपन्नाः वेद || ४ || करता है, वही है । श्रोत्रमें ही करता है, वह कारसे प्राप्त हो जानता है, अर्थात् तानता है, उसे यह - उस विद्वानुको | क्या प्राप्त हो नोगकी वह इच्छा ग । अच्छा तो, है? श्रोत्रही आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना यों ह वा आयतनं वेदायतन ( स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतन स्वानां भवत्याय-तनं जनानां य एवं वेद ॥ जो आयतनको जानता है, वह अन्य जनोंका भी आयतन होता है । उपासना करता है; वह स्वजनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥

यो ह वा श्रायतनं वेद - आय-तनमाश्रपस्तद् यो वेदायतनंस्वानां भवत्यायतनं जनानामन्येषामपि । किं पुनस्तदायतनम् इत्युच्यते-मनोवा आयतनमाश्रय इन्द्रियाणां ५ ॥ स्वजनोंका आयतन होता है तथा मन ही आयतन है जो इस प्रकार आयतन होता है तथा अन्य जनोंका जो भी आयतनको जानता है-आयतन आश्रयको कहते हैं, उसे जो कोई जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है । अच्छा तो वह आयतन क्या है? इसपर कहा जाता है - मन हो आयतन अर्थात् इन्द्रिय

पृष्ठ 1268

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १२५४ विषयाणां च । मनश्राश्रिता हि । विषया श्रात्मनो भोग्यत्वं प्रति-पद्यन्ते मनः संकल्पवशानि चेन्द्रि-याणि प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते च; अतो मन आयतनमिन्द्रियाणाम् । श्रतो दर्शनानुरूपेण फलमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥

६ ब्राह्म और विषयोंका आश्रय है । मनकें A आश्रित रहकर ही विषय आत्मा के अप भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं । मन के संकल्प-केअधीन ही इन्द्रियाँ [ अपने - अपने विषयोंमें ] प्रवृत्त और [ उनसे ] निवृत्त होती हैं; अतः मन इन्द्रियोंका आय- ज तन है । इसलिये जो ऐसी उपासना व उ करता है, उसे इस दृष्टिके अनुरूप ही इति यह फल मिलता है कि वह स्वजनों-का आयतन होता है तथा अन्य जनों-का भी आयतन होता है ॥ ५ ॥ पास

जिस प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना को अ यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी त श्रेय रेतो वै प्रजातिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं जना वेद ॥ ६ ॥ मान

जो भी प्रजापतिको जानता है वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात- ब्रह्म ( वृद्धिको प्राप्त ) होता है । रेतस् ही प्रजापति है । जो ऐसा जानता है, चत वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ ६ ॥ नोड

यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते । जो प्रजातिको जानता है, वह SE प्रजात होता अर्थात् प्रजा और यति ` इ प्रजया पशुभिश्च संपन्नो भवति । पशुओंद्वारा सम्पन्न होता है ॥ वीर्य त रेतो वै प्रजातिः । रेतसा प्रजन- ही प्रजाति है । ' रेतस् ’ शब्दसे कव प्रजननेन्द्रिय उपलक्षित होती है । जो नेन्द्रियमुपलक्ष्यते । तद्विज्ञानानु- ऐसी उपासना करता है, उसे उसकी उत्ख रूपं फलं प्रजायते ह प्रजया दृष्टिके अनुरूप यह फल मिलता है कि पूर्व वह प्रजा और पशुओंसे प्रजात मन पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥ ( सम्पन्न ) होता है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1269

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[ अध्याय ६ 2 है । मन विषय आत्माके है | मन के संकल्प-[ अपने - अपने [ उनसे ] निवृत्त न्द्रियोंका आय-ऐसी उपासना = ष्टि के अनुरूप ही कि वह स्वजनों-तथा अन्य जनों-ता है ॥ ५ ॥

जया पशुभी शुभिर्य एवं ओद्वारा प्रजात-ऐसा जानता है, जानता है, वह त् प्रजा और होता है । वीर्य ‘ रेतस् ’ शब्दसे क्षत होती है । जो ता है, उसे उसकी फल मिलता है कि पशुओंसे प्रजात है ॥ ६ ॥

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५ 2 अपनी श्रेष्ठता के लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणों का ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माद्वारा उसका निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना ते मे प्राणा अहँ श्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इद ँ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥

वे ये प्राण ' मैं श्रेष्ट हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये । उससे बोले ' हममें कौन वसिष्ठ है? ' उसने कहा, ' तुममें से जिसके उत्क्रमण करनेपर ( शरीर से अलग हो जानेपर ) यह शरीर अपने-को अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है ॥ ७ ॥

ते हेमे प्राणा वागादयोऽहं । श्रेयसेऽहं श्रेयानित्येतस्मै प्रयो- । जनाय विवदमाना विरुद्धं वद-माना ब्रह्म जग्मुर्ब्रह्म गतवन्तो ब्रह्मशब्दवाच्यं प्रजापतिं गत्वा च तद् ब्रह्म होचुरुक्तवन्तः - को । नोऽस्माकं मध्ये वसिष्ठः; को-ऽस्माकं मध्ये वसति च वास-यति च १ तद् ब्रह्म तैः पृष्टं सद्धोवाचो-क्तवद् यस्मिन् वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते निर्गते शरीरादिदं शरीरं वे ये वागादि प्राण ' अहं श्रेय-से ' - ' मैं श्रेष्ठ हूँ ' इस प्रयोजनके लिये आपसमें विवाद करते हुए— एक दूसरेके विरुद्ध बोलते हुए ब्रह्मा के पास गये । अर्थात् ब्रह्म-शब्दवाच्य प्रजापति के पास गये; उन्होंने जाकर उस ब्रह्मासे कहा-' हममें कौन वसिष्ठ है; हममेंसे कौन बसता और बसाता है? " उनसे पूछे जाने पर वह ब्रह्मा बोला, ' तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर - शरीर से निकल जानेपर इस शरीर को लोग पहले की अपेक्षा अत्यन्त पापीय – अधिक पापमय पूर्वस्मादतिशयेन पापीयः पापतर ( अपवित्र ) मानते हैं - यों तो मन्यते लोक: - शरीरं हि नामा- | अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात

पृष्ठ 1270

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१२५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ नेकाशुचिसंघातत्वाञ्जीवतोऽपि । पापमेव, ततोऽपिकष्टतरं यस्मि-न्नुत्क्रान्ते भवति; वैराग्यार्थमिद-मुच्यते - पापीय इति स वो युष्माकं मध्ये वसिष्ठो भविष्य-वि । जानन्नपि वसिष्ठं प्रजा पतिर्मोवाचायं वसिष्ठ इतीतरे-षामप्रिय परिहाराय ॥ ७ ॥

होनेके कारण जोवित पुरुषका भी शरीर पापमय ही है, किंतु जिसके उत्क्रमण करनेपर यह उससे भी अधिक कष्टतर ( दुर्दशाग्रस्त ) हो जाय वही तुममेंसे वसिष्ठ होगा । ' ' पापीय: ' यह बात वैराग्यके लिये कही गयी है । प्रजापतिने वसिष्ठको जानते हुए भी दूसरोंको अप्रिय न लगे इसके लिये ' यह वसिष्ठ है '

ऐसा [ स्पष्ट । नहीं कहा ॥ ७ ॥

अपनी उत्कृष्टताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमरण और पुनः प्रवेश त एवमुक्ता ब्रह्मणा प्राणा ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जाने-श्रात्मनो वीर्यपरीक्षणाय क्रमेणो- पर उन प्राणोंने अपने पराक्रमकी परीक्षा करनेके लिये क्रमशः उत्क्र-च्चक्रमुः; तत्र— मण करना आरम्भ किया; उनमेंसे-वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत महते जोवितुमिति ते होचुर्यथाकला बा ( जी श वि S भ I क ह अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्व-न्तः श्रोत्रेण विद्वा ँसो मनसा प्रजायमाना रेतसैव-मजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥

[ पहले ] वाक्ने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्षतक बाहर रहकर लौटकर कहा - ' मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे? ' यह सुनकर उन्होंने कहा, ' जसे मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा