बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1251–1260

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260

पृष्ठ 1251

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

- अध्याय ५ गायत्र्युपा-ही कल्पना बात नहीं है; और प्रतिग्रह हो सकता है, कोई अपराध मर्थ नहीं है, यत्रीके चतुर्थ से भी अधिक - अवशिष्ट है आती है-पता है यही चौथा दर्शत यह जो है, - द्वारा आप्य है, जिस कार हैं । वास्तव में आप्य नहीं हैं, ऐसा कहा हैं । दिके समान प्रतिग्रह करेगा? है कि इस ही उपासना ॥ T पदी त्रिपदी य दर्शताय याद सावस्मै ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३७ कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७ ॥

उस गायत्रीका उपस्थान - हे गायत्रि! तू [ त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे ] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है और [ तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है, [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है; क्योंकि तू जानी नहीं जाती । अतः व्यवहार के अविषयभूत एवं समस्त ' लोकोंसे ऊपर विराजमान तेरे, दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है । यह पापरूपी शत्रु इस [ विघ्नाचरणरूप ] कार्य में सफलता नहीं प्राप्त करे । इस प्रकार यह ( विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो ' उसकी कामना पूर्ण न हो ' ऐसा कह-कर उपस्थान करे । जिसके लिये इस प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती । अथवा ' मैं इस वस्तुको प्राप्त करूं ' ऐसी कामना से उपस्थान करे ॥ ७ ॥

तस्या उपस्थानं तस्या गायत्र्या उपस्थानमुपेत्य स्थानं नमस्करण-मनेन मन्त्रेण 1 । कोऽसौ मन्त्रः १ इत्याह- हे गायसि भवसि त्रैलोक्य पादेनैकपदी । त्रयीविद्या-रूपेण द्वितीयेन द्विपदी । प्राणा-दिना तृतीयेन त्रिपद्यसि । चतुर्थेन तुरीयेण चतुष्पद्यसि । एवं चतुर्भिः पादैरुपासकैः पद्यसे ज्ञायसे । श्रतः परं परेण निरुपाधिकेन स्वेनात्मनापदसि । अविद्यमानं पदं यस्यास्तव येन पद्यसे सा उस गायत्रीका इस मन्त्र से उपस्थान – समीप जाकर स्थित होना अर्थात् नमस्कार होता है । वह मन्त्र कौन - सा है? सो बतलाती हैं - हे गायत्रि! तू पूर्वोक्त रूपसे तीन लोकरूपी प्रथम पादद्वारा एकपदी है; त्रयीविद्यारूप द्वितीय पादसे द्विपदी है, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी है और चतुर्थ - तुरीय पादसे चतुष्पदी है । इस प्रकार चार पादोंसे तू उपासकोंद्वारा जानी जाती है । इसके आगे अपने सर्वोत्तम निरु-पाधिक स्वरूपसे तू अपद् है । जिस तेरा कोई पद, जिससे कि तेरा ज्ञान

पृष्ठ 1252

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ त्वमपदसि, यस्मान्न हि पद्यसे हो, नहीं है, वह तू अपद है; क्यों कि नेति नेति स्वरूप होनेके कारण नेति नेत्यात्मत्वात् १ अतोऽव्य- तेरा ज्ञान नहीं होता वहारविषयाय नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसे । असौ शत्रुः पाप्मा त्वत्प्राप्ति-विघ्नकरोऽदस्तदात्मनः कार्यं यत् त्वत्प्राप्तिविघ्नकर्तृत्वं मा प्रापन्मैव प्राप्नोतु । इविशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । यं द्विष्याद्यं प्रति द्वेषं कुर्यात् स्वयं विद्वांस्तं प्रत्यनेनोपस्था-नम् । असौ शत्रुरमुकनामेति नाम गृह्णीयादस्मै यज्ञदत्तायाभि-प्रेतः कामो मा समृद्धि समृद्धिं मा प्राप्नोत्विति वोपतिष्ठते । न हैवास्मै देवदत्ताय स कामः समृध्यते । कस्मै १ यस्मा एवमुपविष्ठते । अहमदो देव-दत्ताभिप्रेतं प्रापमिति वोप-व्यवहारके अविषयभूत तेरे तुरीय दर्शत ( दर्शनीय ) परोरजा ( समस्त लोकोंसे ऊपर विराजमान ) पदको. नमस्कार है । वह शत्रु पाप तेरी प्राप्ति में विघ्न करनेवाला है । वह तेरी प्राप्तिमें विघ्न करनेरूप कार्यमें समर्थ न हो । यहाँ ' इति ' शब्द मन्त्री समाप्ति के लिये है । यह उपासक जिसके प्रति द्वेष करता हो, उसके लिये यह उपस्थान है । यह अमुक नाम-वाला शत्रु - इस प्रकार यहाँ नाम ले, अर्थात् इस यज्ञदत्तको इसका अभिप्रेत अर्थ समृद्ध न हो अर्थात् सम्पन्नताको प्राप्त न हो ऐसा कहकर उपस्थान करता है । ऐसा करने से इस देवदत्तकी अभीष्ट कामना पूर्ण नहीं ही होती है । किस देवदत्तके लिये ऐसी बात है? जिसके उद्देश्य से इस प्रकार उपस्थान करता है, उसके लिये अथवा इस देवदत्त अभीष्ट अर्थको में प्राप्त कर लू-इस उद्देश्यसे उपस्थान करता है । ब्राह्मण दिल्या यथाव गा उच्यत मुब भूत चक अप है संपर ' तूने फिर ' नेक रख बहुत पवि u गाय बुद्ध तिष्ठते । असावदो मा प्राप- -'असो ' ' अदः ' ' मा प्रापत् ' इन

पृष्ठ 1253

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ है; क्यों नेके कारण ता; अतः तेरे तुरीय रजा ( समस्त नान ) पदको नेरी प्राप्ति में । वह तेरी रूप कार्य में ' इति ' शब्द है । सके प्रति द्वेष लिये यह अमुक नाम-यहां नाम तो इसका हो अर्थात् न हो- ऐसा रता है । ऐसा की अभीष्ट ही होती है । ऐसी बात से इस प्रकार है, उसके देवदत्त नाप्त कर लू -न करता है । प्रापत् ' इन ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ ९ दित्यादित्रयाणां मन्त्रपदानां | तीन मन्त्रपदोंका उपासकके इच्छा-यथाकामं विकल्पः ॥ ७ ॥ नुसार विकल्प हो सकता है ' ॥ ७ ॥

गायत्री के मुखविधान के लिये श्रर्थवाद गायत्र्या मुखविधानायार्थवाद गायत्रीका मुखविधान करनेके उच्यते- लिये अर्थवाद कहा जाता है— एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्वि-मुवाच यन्नु हो तद् गायत्रीविद था कथ ँ हस्ती-भूतो वहसीति मुख ँ ह्यस्याः सम्रान विदां-चकारेति होवाच तस्या अग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्निवाग्नावस्यादधति सर्वमेव तत् संदहत्येव हैवैवंविद् यद्यपि बह्निव पापं कुरुते सर्वमेव तत् संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽस्मृतः संभवति ॥ ८ ॥

उस विदेह जनकने बुडिल आश्वतराश्विसे यही बात कही थी कि ' तूने जो अपनेको गायत्री विद् ( गायत्री तत्त्वका ज्ञाता ) कहा था, तो फिर [ प्रतिग्रह दोषसे ] हाथी होकर भार क्यों ढोता है? ' इसपर उसने ' हे सम्राट्! मैं इसका मुख ही नहीं जानता था ' ऐसा कहा । [ तब जनक-ने कहा- ] ' इसका अग्नि ही मुख है । 1 यदि अग्निमें लोग बहुत - सा ईंधन रख दें तो वह उस सभीको जला डालता है । इसी प्रकार ऐसा जाननेवाला करता रहा हो तो भी वह उस सबको भक्षण करके शुद्ध, बहुत - सा पाप, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥

पवित्र, अजर उस गायत्री - विज्ञान के विषय में एतद्ध किल वै स्मर्यते । तत्तत्र भी किया जाता है-ऐसा ही स्मरण गायत्रीविज्ञानविषये जनको वैदेहो विदेह जनकने बुडिल नामसे प्रसिद्ध बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्य- व्यक्तिसे, जो अश्वतराश्वके पुत्र होने के १. अर्थात् वह जिसके लिये जिस वस्तुकी प्राप्ति या अप्राप्तिकी कामना रखता हो; उन्हींका इनके स्थानमें उच्चारण किया जा सकता है ।

पृष्ठ 1254

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ माश्वतराश्विस्तं किलोक्तवान् ॥ यन्नु इति वितर्क, हो अहो इत्ये-तत् तद् यत् स्वं गायत्रीविद-जुथाः, गायत्रीविदस्मीति यद-ब्रूयाः किमिदं तस्य वचसोऽन-नुरूपम् १ अथ कथं यदि गायत्री -बित् प्रतिग्रहदोषेण हस्तीभूतो वहसीति । स प्रत्याह राज्ञा स्मारितो मुखं गाय या हि यस्मादस्या हे सम्राण्न विदांचकार न विज्ञात-वानस्मीति होवाच । एकाङ्गवि-कलत्वाद् गायत्रीविज्ञानं ममा-फलं जातम् । शृणु तहिं तस्या गायत्रया अग्निरेव मुखम् । यदि हवा अपि बह्निवेन्धनमग्नावस्याद-धति लौकिकाः सर्वमेव तत् संदहत्येवेन्धनमग्निः, एवं हैवै -वंविद गायत्रचा अग्निमुखमि -त्येवं वेत्तीत्येवंवित् स्यात् स्वयं गायत्रयात्माग्निमुखः सन् । यद्यपि बह्निव पापं कुरुते प्रतिग्रहादिदोषं तत् कारण आश्वतराश्वि कहलाते थे, उनसे कहा था । ' यत् + नु ' ये अव्यय वितर्कके अर्थ में हैं । ' हो! अर्थात् अहो! तूने जो अ गायत्रीका जानकार बतलाया था अर्थात् तू जो कहता था कि में गायत्रीका ज्ञाता हूँ, सो तेरे उस वचनके विपरीत ऐसा क्यों है? यदि तू गायत्रीका ज्ञाता है तो प्रतिग्रहदोष के कारण तू हाथी बन-कर भार क्यों ढोता है? ' राजाके द्वारा स्मरण कराये जानेपर उनसे उत्तर दिया, ' हे सम्राट्! क्योंकि मैं इस गायत्रीका मुख नहीं जानता था, ऐसा उसने कहा, ' एक अङ्गसे रहित होनेके कारण मेरा गायत्रीविज्ञान निष्फल हो गया है । ' [ तब जनकने कहा- ] ' अच्छा तो सुन उस गायत्रीका अग्नि ही मुख हे! यदि लौकिक पुरुष अग्नि में बहुत - सा इंधन भी डालें, तो वह अग्नि उस सभीको भस्म कर देता है । इसी प्रकार जो ऐना जानने-वाला है, अर्थात् गायत्रोका मुख अग्नि है - ऐसा जो जानता है तथा स्वयं अग्नि मुख होकर गायत्रीका स्वरूप हो गया है, वह बहुत - सा पाप यानी प्रतिग्रहादि दोष भी करता रहा हो, उस ब्राह्मण शुद्धोऽ ग्रहदोष ऽमृत ज्ञानक यो सोन अस्ति पादो अतः पूषन्न प्राज कल्य सोऽ

पृष्ठ 1255

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ कहलाते थे, ' यत् + नु ' ये में हैं । ' हो! जो अपनेको बतलाया था था कि मैं सो तेरे उस क्यों है? ज्ञाता है तो तू हाथी बन-? ' मरण कराये र दिया, ' हे इस गायत्रीका , ऐसा उसने रहित होने के ज्ञान निष्फल हा- ] ' अच्छा अग्नि ही - पुरुष अग्नि. डालें, तो वह स्म कर देता ऐना जानने-यत्रोका मुख नता है तथा कर गायत्रीका वह यद्यपि प्रतिग्रहादि हा हो, उस ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२४१ सर्व पापजातं संप्साय भक्षयित्वा | सम्पूर्णं पापसमूहको ' संप्साय ' – शुद्धोऽग्निवत् पूतश्च तस्मात् प्रति भक्षण करके वह गायत्र्यात्मा शुद्ध होकर और उस प्रतिग्रहदोष से ग्रहदोषाद् गायत्रयात्माजरो- अग्निके समान पवित्र होकर अजर-ऽमृतश्च सम्भवति ॥ ८ ॥ अमर हो जाता है ॥ ८ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्दशं गायत्रीब्राह्मणम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश ब्राहाग ज्ञानकर्मसमुच्चयकारीकी अन्तकालमें आदित्य और अग्निसे प्रार्थना यो ज्ञानकर्मसमुच्चयकारी सोऽन्तकाल यादित्यं प्रार्थयति, अस्ति च प्रसङ्गः, गायत्र्पास्तुरीयः पादो हि सः । तदुपस्थानं प्रकृतम्, अतः स एव प्रार्थ्यते— जो ज्ञान और कर्मका समुच्चय करनेवाला है, वह अन्त समय में आदित्यकी प्रार्थना करता है । यहाँ आदित्यका प्रसङ्ग तो है ही, क्योंकि वह गायत्रीका चतुर्थ पाद है 1 । उसके उपस्थानका प्रकरण है, इसलिये उसीकी प्रार्थना को जाती है-हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । पूषन्नकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् । समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ँ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृतँ स्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर । अग्ने

पृष्ठ 1256

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ ब्राह्मण नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् तदपि युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम १ सत्यसंज्ञक ब्रह्मका मुख ज्योतिर्मय पात्रसे आच्छादित है । हे संसार- दर्शनप्र का पोषण करनेवाले सूर्यदेव! तू उसे, मुझ सत्यधमंके प्रति उसके पूषन् दर्शन के लिये उघाड़ दे । हे पूषन्! हे एकर्षे! हे यम! हे सूर्यं! हे प्राजापत्य! अपनी किरणोंको हटा ले और तेजको समेट ले । तेरा जो चित अत्यन्त कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखता हूँ । यह जो आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही में अमृतस्वरूप हूँ । [ मुझ अमृत एवं सत्यस्वरूप आत्माका प्रतिब शरीरपात हो जानेपर इस शरीर के भीतरका ] प्राणवायु इस बाह्यवायुको प्राप्त हो तथा यह शरीर भस्मशेष होकर पृथ्वीको प्राप्त हो । हे सत्यध प्रणवरूप एवं मनोमय क्रतुरूप अग्निदेव! जो स्मरण करने सोऽहं योग्य है, उसका स्मरण कर । मैंने जो किया है, उसका स्मरण कर । हे क्रतुरूप अग्निदेव! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर; किये भूताये हुएका स्मरण कर । हे अग्ने! हमें तू कर्मफलकी प्राप्ति के लिये शुभ मार्ग पूष [ यानी देवयानमार्गं ] से ले चल । हे देव! तू सम्पूर्णं प्राणियोंके समस्त णार्था प्रज्ञानोंको जाननेवाला है । हमारे कुटिल पापोंको हमसे दूर कर । हम तुझे अनेकों बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥ सावृषि

हिरण्मयेन ज्योतिर्मयेन पात्रेण । हिरण्मय अर्थात् ज्योतिर्मय पात्रसे सर्वस्य जिस प्रकार पात्रसे अपनी अभीष्ट सर्व यथा पात्रेणेष्टं वस्त्वपिधीयते, एव मिदं सस्याख्यं ब्रह्म ज्योतिर्मयेन मण्डलेनापिहितमिवासमाहित-चेतसा महश्यत्वात् । तदुच्यते— वस्तु ढक दी जाती है, इसी प्रकार त्येकर्षि यह सत्यसंज्ञक ब्रह्म मानो ज्योतिर्मय इति म मण्डलसे ढका हुआ है; क्योंकि जिनका चित्त समाहित ( स्थिर एवं जगत: विशुद्ध ) नहीं है, उन पुरुषोंके लिये सुष्ठवी यह अदृश्य है । वही बात कहीं प्राणाद सत्यस्यापिहितं मुखं मुख्यं स्वरूपं जाती है । सत्यका मुख यानी मुख्य-

पृष्ठ 1257

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1257 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय ५ नि विद्वान् तं विधेम १ है । हे संसार-के प्रति उसके ! हे सूर्यं! हे ले । तेरा जो दित्यमण्डलस्थ वरूप आत्माका सबाह्यवायुको प्राप्त हो । हे स्मरण करने स्मरण कर । रण कर किये लिये शुभ मार्ग णियों के समस्त दूर कर । हम योतिर्मय पात्रसे अपनी अभीष्ट है, इसी प्रकार नानो ज्योतिर्मय है; क्योंकि हृत ( स्थिर एवं न पुरुषोंके लिये ही बात कहीं सुख यानी मुख्य-ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ तदपिधानं पात्रमपिधानमिव दर्शनप्रतिबन्धकारणं तत् त्वं हे पूषन्! जगतः पोषणात् पूषा सवितापोवृण्वपावृतं कुरु, दर्शन-प्रतिबन्धकारणम् अपनयेत्यर्थः, सत्यधर्माय सत्यं धर्मोऽस्य मम सोऽहं सत्यधर्मा तस्मै स्वदात्म-भूतायेत्यर्थः, दृष्टये दर्शनाय । पूषन्नत्यादीनि नामान्यामन्त्र-णार्थानि सवितु:, एकर्ष एका-सावृषिश्चैकर्षिर्दर्शनादषिः, स हि सर्वस्य जगत श्रात्मा चक्षुश्च सन् सर्व पश्यत्येको वा गच्छती त्येकर्षि: - " सूर्य एकाकी चरति " इति मन्त्रवर्णात् । यम सर्वं हि जगतः संयमनं त्वत्कृतम्; सुष्ठवीरयते रसान् रश्मीन प्राणान् धियो वा जगत इति ॥ १२४३ | स्वरूप ढका हुआ है, उसके आवरक पात्रको जो ढक्कन के समान उसके दर्शनके प्रतिबन्धका कारण है, उसे हे पूषन्! —जगत्का पोषण करनेके कारण सूर्य ' पूषा ' हे अपावृत कर; अर्थात् जो दर्शन--में रुकावट डालनेका कारण हो रहा है, उसे दृष्टये - दर्शनके लिये दूर कर दे । [ किस व्यक्तिके लिये? ] जिस मेरा सत्य धर्म है, वह मैं सत्यधर्मं हूँ, उसके लिये अर्थात् तुम्हारे स्वरूपभूत मेरे लिये [ उस आवरणको हटा दो, जिससे मैं सत्यका साक्षात्कार करूँ ] । ' पूषन् ' इत्यादि नाम सूर्यको सम्बोधन करनेके लिये हैं । ' हैं एकर्षे ' – जो एक ऋषि हो, वह एकषि है । दर्शन करनेके कारण वह ऋषि है; क्योंकि वही सम्पूर्ण: जगत्का आत्मा और नेत्र होकर सबको देखता है 1 । अथवा वह अकेला ही चलता है, इसलिये एकषि है, जैसा कि " सूर्य अकेला चलता है " इस मन्त्रवर्णसे ज्ञात होता है । ' हे यम! ' - क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का संयमन तेरा किया हुआ ही है । ' हे सूर्यं! —जगत्के रस, रश्मि, प्राण और बुद्धिको सुष्ठु – सम्यक् प्रकारसे प्रेरित

पृष्ठ 1258

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1258 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ब्राह्मण प्राजापत्य प्रजापतेरीश्वरस्या- । पत्यं हिरण्यगर्भस्य वा हे प्राजा पत्य व्यूह विगमय रश्मीन् ॥ समूह संक्षिपात्मनस्तेजो येनाहं शक्नुयां द्रष्टुम् । तेजसा ह्यप-इतदृष्टिर्न शक्नुयां तत्स्त्ररूप-मञ्जसा द्रष्टुम्, विद्योतन इव रूपाणाम्; अत उपसंहर तेजः । यत्ते तव रूपं सर्वकल्याणा-नामतिशयेन कल्याणं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि पश्यामो वयं चचनव्यत्ययेन । योऽसौ भूर्भुव: -स्वर्व्याहृत्यवयवः पुरुषः, पुरुषा-कृतित्वात् पुरुषः, सोऽहमस्मि ` मवामि ॥ अहरहमिति चोपनिषद उक्तत्वादादित्यचाक्षुष योस्तदेवेदं ५ करता है, इसलिये सूर्य है । ' है परामृ प्राजापत्य ' - प्रजापति अर्थात् ईश्वर अथवा हिरण्यगर्भके पुत्र होनेके सम्बन कारण हे प्राजापत्य! रश्मियोंको ' ब्यूह ' — - निवृत्त कर । और अपने मम शरीर वेजको ' समूह ' — समेट ले, जिससे मैं सत्य -ब्रह्मको देख सकौं । जिस बाह्यं प्रकार बिजलीकी चमकमें मनुष्य तथान रूपोंको नहीं देख सकते, गच्छ प्रकार तेरे तेजसे दृष्टि नष्ट हो पृथिव जानेके कारण मैं तेरे स्वरूपको अ साक्षात् नहीं देख सकता; अतः अपने तेजका उपसंहार कर । मनस तेरा जो सम्पूर्ण कल्याणों में अतिशय कल्याणमय कल्याणतम प्रार्थ रूप है, तेरे उस रूपको मैं देखता क्रतो हूँ । ' पश्यामो वयम् ' इस प्रकार ' वचनव्यत्ययके द्वारा बहुवचन ॐका करके ' हम देखते हैं ' ऐसा अर्थ समझना चाहिये । यह जो ' भूर्भुव: त्वाच्च स्व: ' इन व्याहृतिरूप अवयवोंवाला स्मर्त पुरुष है, जो पुरुषाकार होने के कारण पुरुष है, वह में ही हूँ । रणव | आदित्य और चाक्षुष पुरुषकी अतः और ' अहम् ' ये उप-। निषदे ( गुह्यनाम ) कही गयी । स्मर है, अतः यहाँ उन्हींका परामर्श १. ' व्यत्ययो बहुलम् ' इस पाणिनिसूत्र के अनुसार ।

पृष्ठ 1259

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1259 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय५ सूर्य है।'हे ति अर्थात् ईश्वर के पुत्र होने के य! रश्नियों को र । और अपने समेट ले, जिससे देख सकू । जिस - चमक मनुष्य ख सकते, उसी दृष्टि नष्ट हो तेरे स्वरूपको व सकता; अतः संहार कर । म्पूर्ण कल्याणोंमें मय कल्याणतम रूपको मैं देखता यम् ' इस प्रकार द्वारा बहुवचन हैं ' ऐसा अर्थ । यह जो ' भूर्भुव: रूप अवयवोंवाला होने के पुरुषाकार वह मैं ही हूँ । चाक्षुष पुरुषकी ' अहम् ' ये उप-म. ) कही गयी उन्हींका परामर्श ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२४५ 23730607 परामृश्यते, सोऽहमस्म्यमृतमिति सम्बन्धः । ममामृतस्य सत्यस्य शरीरपाते शरीरस्थो यः प्राणो वायुः सोऽनिल बाह्यं वायुमेव प्रतिगच्छतु । . तथान्या देवताः स्वां स्वां प्रकृतिं गच्छन्तु । अथेदमपि भस्मान्तं सत् पृथिवीं यातु शरीरम् । श्रथेदानीमात्मनः संकल्पभूतां मनसि व्यवस्थितामग्निदेवतां प्रार्थयते - ॐ क्रतो – ओमिति क्रतो इति च सम्बोधनार्थादेव, ॐकार प्रतीकत्वादोम्, मनोमय-त्वाच्च ऋतुः, हे ॐ हे क्रतो स्मर स्मर्तव्यम्, अन्तकाले हि त्वत्स्म-रणवशादिष्टा गतिः प्राप्यते, अतः प्रार्थ्यते - यन्मया कृतं तद स्मर । पुनरुक्तिरादरार्था । किया जाता है; अर्थात् ' सोऽहमस्मि अमृतम् ' -- वह मैं अमृत हूँ, इस प्रकार इसका सम्बन्ध है । शरीरपात होनेपर मुझ अमृतरूप सत्यका जो शरीरस्थ वायु - प्राण हे वह अनिल अर्थात् बाह्य वायुको ही प्राप्त हो जाय! तथा दूसरे देव अपने - अपने मूलको प्राप्त हो जायँ । तथा यह शरीर भी भस्मशेष होकर पृथिवीको प्राप्त हो जाय । अब इस समय मन में स्थित अपने संकल्पभूत अग्निदेवता की प्रार्थना की जाती है -- ॐ क्रतो--' ॐ ' शब्द और ' क्रतो ' शब्द सम्बोधन के लिये हैं; अग्नि ओङ्कार रूप प्रतीकवाला होनेके कारण ' ॐ ' तथा मनोमय होनेके कारण ' ऋतु ' हे, हे ॐ! हे क्रतो! जो स्मरण करनेयोग्य है, उसका स्मरण कर, अन्तकाल में तेरे स्मरणके अधीन ही इष्ट गति प्राप्त की जाती है; अतः प्रार्थना है कि मैंने जो कुछ किया है, उसे स्मरण कर । यहाँ ' ॐ क्रतो स्मर ' इत्यादि वाक्य-की पुनरुक्ति आदर के लिये है ।

पृष्ठ 1260

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1260 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

.१२४६ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय किश्च हे अग्ने नय प्रापय शोभनेन मार्गेण राये सुपथा धनाय कर्मफलप्राप्तय इत्यर्थः । न दक्षिणेन कृष्णेन पुनरावृत्ति युक्तेन किं तर्हि १ शुक्लेनैव सुपथा अस्मान् । विश्वानि सर्वाणि हे देव वयुनानि प्रज्ञानानि सर्वप्राणिनां विद्वान् । किश्च - युयोध्यपनय वियोजयास्मदस्मतो जुहुराणं कुटिलमेनः पापं पापजातं सर्वम् । तेन पापेन विमुक्ता वयमे घ्याम - उत्तरेण यथा त्वत्प्रसादात् । किंतु वयं तुभ्यं परिचय कर्तुं न शक्नुमो भूयिष्ठां बहुतमां ते - तुभ्यं नमउक्ति नमस्कारवचनं ' विधेम नमस्कारोक्त्या परिचरे-मेत्यर्थः, अन्यत् कर्तुमशक्ताः सन्त इति ॥ १ ॥

५ तथा हे अग्ने! हमें ' राधे ' अर्थात् कर्मफलकी प्राप्तिके लिये पथसे -- शुभमागंसे ले चल । सु-पुनरा वृत्तियुक्त दक्षिण अर्थात् घूममार्ग मत ले चल, तो किससे? सुपय अर्थात् उज्ज्वल [ देवयान ] मार्ग से हो हमें ले चल । हे देव! तू सम्पूर्ण प्रज्ञानोंको जाननेवाला है । हमारे सम्पूर्ण जुहुराण -- कुटिल एनस्— कस्थ पापोंको हमसे ' युयोधि ' -- दूर कर । गाय उन पापोंसे विमुक्त होकर हम तेरी यस्म कृपासे उत्तरायणमार्गसे जायँगे । चाग किंतु हम तेरी परिचर्या -- सेवा कथं करनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः तेरे तन्नि लिये अनेकों बार नमउक्ति-नमस्कार - वचनोंका विधान करें । अर्थात् और कुछ करनेमें असमर्थ भाव होनेके कारण नमस्कारोक्तिद्वारा सत्स तेरी परिचर्या करें ॥ १ ॥

हेतुम इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये न पु पञ्चदशं सूर्याग्निप्रार्थनाब्राह्मणम् ॥१५ ॥

खिल इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद शिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य यदन श्रीमच्छङ्करभगवतः कृत्तौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ मुपास