बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1291–1300
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1291–1300
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[ अध्य६ बृहदारण्यकोपनिषद् मिदं विश्वमे-चेतिनाहमत जाती है- ' सो क्या . ] ' जिस प्रकार न है? ' ' नहीं ' ऐसा पुनः पुनः बहूतोंके ना नहीं है, सो क्या -- ], ' क्या तू जानता ( जल ) पुरुष - शब्द-चितकेतुने कहा । ' क्या का कर्मरूप साधन हैं अथवा पितृयान-- ' मैंने पितरोंका और से सम्बन्ध रखनेवाले यक् प्रकारसे जाता है माताके मध्य में हैं? ' नानता ' ऐसा उत्तर कार यह प्रसिद्ध प्रजा - मरनेपर विप्रतिपन्न क्या तू जानता है? द्यन्ता ३ ' इसमें प्लुत लये है । समान मार्ग-प्रजाके जहाँसे दो हो जाते हैं, वहाँ अन्य मार्ग जाती दूसरेसे – इस प्रकार गति की विभिन्न पर्य यह है कि जिस प्रवाहणकी सभा में श्वेतकेतु
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ब्राह्मण पत्तिः पद्यन्त नेति त रापद्य यथा नेति यथार न्याय प्रिय संपूय लोक काय पुरुष यास पुरुष पुरुष वाच गुर इति
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७७ पत्तिः । यथा ताः प्रजा विप्रति । पद्यन्ते तत् किं वेत्थेत्यर्थः । नेति होवाचेतरः । तर्हि वेत्थ उ यथेमं लोकं पुन-रापद्यन्ता ३ इति पुनरापद्यन्ते यथा पुनरागच्छन्तीमं लोकम् १ नेति हैवोवाच श्वेतकेतुः 1 ॥ वेत्थो यथासौ लोक एवं प्रसिद्धेन न्यायेन पुनः पुनरसकृत् प्रयद्भि-प्रियमाणैर्यथा येन प्रकारेण न संपूर्यता ३ इति न संपूर्यतेऽसौ लोकस्वरिक वेत्थ? नेति हैवोवाच । वेत्थो यतिभ्यां यत्संख्या-कायामाहुत्यामाहुती हुतायामापः पुरुषवाचः पुरुषस्य या वाक् सैंव यासां वाक् ता पुरुषवाचो भूत्वा पुरुषशब्दवाच्या वा भूत्वा यदा पुरुषाकारपरिणतास्तदा पुरुष-वाचो भवन्ति, समुत्थाय सम्य-गुत्थायोद्भूताः सत्यो वदन्ती ३ इति १ नेति हैवोवाच । प्रकार उस प्रजाकी विभिन्न गति होती है, वह क्या तू जानता है? ' इसपर इतर ( श्वेतकेतु ) ने कहा-' नहीं । ' ' तो फिर, जिस प्रकार प्रजा पुनः इस लोकको प्राप्त होती है— पुनः इस लोकमें आती है, वह क्या तू जानता है? ' श्वेतकेतुने कहा ' नहीं । ' ' तो क्या तू जानता है कि इस प्रकार — इस प्रसिद्ध न्यायसे प्रजाके पुनः - पुनः निरन्तर मरते रहनेपर भी वह लोक कैसे-किस प्रकारसे नहीं भरता? अर्थात् जिस प्रकार वह लोक नहीं भरता, सो क्या तुझे मालूम है? " इसपर भी श्वेतकेतुने ' नहीं ' ऐसा कहा । ' क्या तू जानता है कि ' यतिथ्याम् ' - जितनी संख्यावाली आहृतिके हवन किये जानेपर आप ( जल ) पुरुषवाक् - पुरुषकी जो वाक् है, वही जिसकी वाक् है, इस प्रकार पुरुषवाक् होकर अथवा ' पुरुष ' शब्दवाच्य होकर – जिस समय वह पुरुषाकारमें परिणत होता है, उस समय पुरुषवाक् होता है— ' समुत्थाय ' – सम्यक् प्रकारसे उठकर बोलता हे? ' श्वेतकेतुने ' ' नहीं ' ऐसा कहा ।
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१२७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ यद्येवं वेत्थ उ देवयानस्य पथो मार्गस्य प्रतिपदं प्रतिपद्यते येन साप्रतिपत् तां प्रतिपदं पिठयाणस्य वा प्रतिपदं प्रतिपच्छब्दवाच्य-अर्थमाह - यत् कर्म कृत्वा यथा-विशिष्टं कर्म कृत्वेत्यर्थः देवयानं वा पन्थानं मार्ग प्रतिपद्यन्ते पिठ्याणं वा यत् कर्म कृत्वा प्रतिपद्यन्ते तत् कर्म प्रति-' पदुच्यते तां प्रतिपदं किं वेत्थ देवलोक पितृलोकप्रतिपत्तिसाधनं किं वेत्थेत्यर्थः । अप्यत्रास्यार्थस्य प्रकाशकमृषे-मन्त्रस्य वचो वाक्यं नः श्रुतमस्ति । मन्त्रोऽप्यस्यार्थस्य प्रकाशको विद्यत ' इत्यर्थः । कोऽसौ मन्त्रः १ इत्युच्यते - द्वे सृती द्वौ मार्गा-वणवं श्रुतवानस्मि, तयोरेका पितॄणां प्रापिका पितृलोकसंबद्धा तया सुत्या पितृलोकं प्राप्नो-तीत्यर्थः । अहमशृणवमिति व्य-वहितेन संबन्धः । देवानाम्रुतापि देवानां संबन्धिन्यन्या देवान् प्रापयति सा । के पुनरुभाम्यां ब्राह्मण ' यदि ऐसी बात है, तो क्या तू देवयान मार्ग के प्रतिपद् - जिसके सूति द्वारा पुरुष प्रतिपन्न होते ( गमन गच्छ करते ) हैं, उसे प्रतिपद् कहते हैं, मत्या उस प्रतिपद्को तथा पितृयानके मनुष प्रतिपद्को जानता है? ' श्रुति गच्छा ' प्रतिपद ' शब्दका अर्थं बतलात या है- जो कर्म करके अर्थात गच्छ विशिष्ट कर्म करके देवयान या वे पितृयानमार्गको प्राप्त होते हैं, वह कर्म ' प्रतिपद् ' कहलाता है, ' उस रन्तर प्रतिपदको क्या तू जानता है? मात अर्थात् क्या तुझे देवलोक और कौ पितृलोककी. प्राप्तिके साधनका व्याव ज्ञान है? ' पित ' हमने इस अर्थ प्रकाशक ऋषि अर्थात् मन्त्रका वाक्य भी सुना है । अर्थात् इस अर्थका संसा प्रकाशक मन्त्र भी विद्यमान है । न्वि वह मन्त्र कौन - सा है सो बतलाया आह जाता है— मैंने दो मार्ग सुने हैं । समुद्र उनमें एक पितृगणकी प्राप्ति कराने- न श्वेत वाला अर्थात् पितृलोकसे सम्बद्ध है, तात्पर्य यह है कि उस मार्ग से पुरुष पितृलोकको प्राप्त करता है । ' मूलमें ‘ अहम् अश्वणवम् ' इस प्रकार व्यवहित पदोंका सम्बन्ध है । ' और प्रद दूसरा मार्गं देवताओंका यानी नो | देवताओंसे सम्बद्ध है अर्थात् जो देवताओंको प्राप्त कराता है, वह है । '
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[ अध्याय६ बात है, तो क्या प्रतिपद् - जिसके पन्न होते ( गमन प्रतिपद् कहते हैं, तथा पितृयानके ता है? ' श्रुति T अर्थ बतलाती अर्थात् यथा • रके देवयान या प्राप्त होते हैं, वह कहलाता है, ' उस तू जानता है? के देवलोक और के साधनका अर्थके प्रकाशक न्त्रका वाक्य भी इस अर्थका भी विद्यमान है । है सो बतलाया दो मार्ग सुने हैं । णकी प्राप्ति कराने-पितृलोकसे सम्बद्ध है कि उस मार्ग से प्राप्त करता है । ' गुणवम् ' इस प्रकार सम्बन्ध है । ' और देवताओंका यानी बद्ध है अर्थात् जो ' कराता है, वह है । ' ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ ९ सुतिभ्यां पितॄन् देवांश्च । गच्छन्ति? इत्युच्यते – उतापि मर्त्यानां मनुष्याणां संबन्धिन्यौ मनुष्या एव हि सृतिभ्यां गच्छन्तीत्यर्थः । ताभ्यां स्रुति-स्यामिदं विश्वं समस्तमेजद् गच्छत् समेति संगच्छते । ते च द्वे सुती यदन्तरा ययो-रन्तरा यदन्तरा पितरं मातरं च मातापित्रोरन्तरा मध्य इत्यर्थ:, कौ तौ मातापितरौ द्यावापृथि-व्यावण्डकपाले ' इयं वै मातासौ पिता ' इति हि व्याख्यातं ब्राह्मणेन, अण्डकपालयोर्मध्ये संसारविषये एवैते सृती नात्य-न्तिकामृतस्वगमनाय । इतर चाह - नाहमतोऽस्मात् प्रश्न-समुदायादेकं च नैकमपि प्रश्नं न वेद नाहं वेदेति होवाच श्वेतकेतुः ॥ २ ॥
किंतु इन दोनों मार्गोंसे पितृगण और देवताओंके पास कौन जाते हैं? सो बतलाया जाता है - ' ये दोनों मार्ग मत्योंके यानी मनुष्यों के सम्बन्धी हैं, अर्थात् इन मार्गोंसे मनुष्य ही जाते हैं । उन मार्गों जानेवाला यह सम्पूर्ण जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है । ' ' वे दोनों मागं ' यदन्तरा ' - जिनके मध्यवर्ती हैं, उन माता - पिताको [ क्या तू जानता है? ] अर्थात् ये माता - पिता के मध्य में हैं, वे माता-पिता कौन हैं? द्युलोक और पृथिवी-रूप ब्रह्माण्डकपाल; ‘ यह ( पृथिवी ) ही माता है और वह ( द्युलोक ) पिता है ' - इस प्रकार ब्राह्मणद्वारा व्याख्या की जा चुकी है, ब्रह्माण्ड-कपालोंके मध्यमें ये दोनों मार्ग संसारविषयक ही हैं, आत्यन्तिक अमृतत्वकी प्राप्तिके लिये नहीं हैं । ' इसपर दूसरेने कहा, ' मैं इस प्रश्न-समुदायमेंसे एक भी प्रश्नको नहीं जानता- मुझे किसीका पता नहीं है, ' ऐसा श्वेतकेतुने कहा ॥ २ ॥
श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आकर उलाहना देना अथैनं वसत्योपमन्त्रयाञ्चक्रेऽनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आजगाम पितर्र त होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोच इति कथ सुमेध इति
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१२८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ ब्राह पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥
श्रुत फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की । किंतु वह कुमार तव शो ठहरनेकी परवा न करके चल दिया । वह अपने पिता के पास आया और भृ ' उनसे बोला, ' आपने यही कहा था न, कि मुझे सब विषयों की शिक्षा दे प दी गयी है? ' [ पिता- ] ' हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले! क्या हुआ? ' रा [ पुत्र - ] ' मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमें से में एकको भी यस नहीं जानता । ' [ पिता- ] ' वे कौन - से थे? ' [ पुत्र - ] ' ये थे ' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥ ज
अथानन्तरमपनीय विद्याभि-मानगर्वमेनं प्रकृतं श्वेतकेतुं वसत्या वसतिप्रयोजनेनोपमन्त्र-याञ्चक्रे - इह वसन्तु भवन्तः, पाद्यमर्घ्यं चानीयतामित्युपमन्त्रणं कृतवान् रोजा । अनादृत्य तां वसतिं कुमारः श्वेतकेतुः प्रदुद्राव प्रतिगतवान् पितरं प्रति । स चाजगाम पितरमागत्य चोवाच तम्, कथमिति १ वाव किलैवं किल नोऽस्मान् भवान् पुरा समावर्तनकालेऽनुशिष्टान् सर्वा -मिर्विद्यामिरवोचोऽवोचदिति । वा इसके पश्चात् उसके विद्याभिमान- न को तोड़कर इस प्रकरणमें प्राप्त क श्वेतकेतुसे राजाने ' वसति ' ठहरने-के प्रयोजनसे प्रार्थना की; अर्थात् [ श्वेतकेतुसे कहा- ] ' आप यहाँ न ठहरिये ' [ और सेवकोंसे कहा- ] ' अरे! पाद्य और अर्घ्यं लाओ ' इस प्रकार राजाने विनयपूर्वक निवेदन किया । किंतु वह कुमार उस ' निवासका निरादर कर ' प्रदुद्राव ' f अपने पिताके पास चल दिया । वह पिताके पास आया और वहाँ आकर उससे बोला, किस प्रकार बोला- ' आपने पहले समावर्तन संस्कारके समय यही कहा था न, कि तुझे सब विद्याओं में अनुशिक्षित कर दिया गया है? '
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[ अध्याय६ कंचन वेदेति पर ॥ ३ ॥
किंतु वह कुमार पास आया और योंकी शिक्षा दे ! क्या हुआ? ' मेंसे मैं एकको भी - ] ' येथे ' ऐसा सके विद्याभिमान-न प्रकरणमें प्राप्त ' वसति ' - ठहरने-र्थना की; अर्थात् - ] ' आप यहाँ विकोंसे कहा- ] - अर्घ्यं लाओ ' इस वनयपूर्वक निवेदन वह कुमार उस दर कर ' प्रदुद्राव ' सचल दिया । वह नाया और वही बेला, किस प्रकार पहले समावर्तन यही कहा था न अनुशिक्षित -? ' ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८१ सोपालम्भं पुत्रस्य वचः श्रुत्वाह पिता कथं केन प्रकारेण तव दुःखमुपजातं हे सुमेधः! शोभना मेघा यस्येति सुमेधाः । । शृणु मम यथा वृत्तम् — पञ्च पञ्चसंख्याकान् प्रश्नान् मा मां राजन्यवन्धू राजन्या बन्धवो यस्येति; परिभववचनमेतद्रा-जन्यबन्धुरिति, अप्राचीत् पृष्ट-वांस्ततस्तस्मान्नैकं चनैकमपि न वेद न विज्ञातवानस्मि । कतमे ते राजा पृष्टाः प्रश्नाः ' इति पित्रोक्तः पुत्रः ' इमे ते ' इति ह प्रतीकानि मुखानि प्रश्ना-नामुदाजहारोदाहृतवान् ॥ ३ ॥
पुत्रका उपालम्भयुक्त वचन सुनकर पिताने कहा, ' हे सुमेध! तुझे किस प्रकार दुःख उत्पन्न हुआ है । ' जिसकी सुन्दर मेधाशक्ति होती है, उसे सुमेधा कहते हैं । [ पुत्र ] - ' मेरे साथ जैसा हुआ है; सो सुनिये- मुझसे एक राजन्य-बन्धु ( क्षत्रबन्धु ) ने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता । ' जिसके राजन्य ( क्षत्रिय ) बन्धु हों, उसे राजन्यबन्धु कहते हैं, यह राजन्यबन्धु तिरस्कारसूत्रक वचन है । ' राजाके द्वारा पूछे हुए वे प्रश्न कौन से थे? ' इस प्रकार पिताके पूछने पर पुत्रने ‘ वे ये थे ’
ऐसा कहकर उन प्रश्नोंके प्रतीक-। मुख ( संकेत ) बतलाये ॥ ३ ॥
पिता आरुणिका उनके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बताकर उसे शान्त करना और उनका उत्तर जाननेके लिये प्रवाहरण के पास आना स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्च वेद सर्वमहं तत्तुभ्यमवोचं प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेन गच्छत्विति स आज-गाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरास तस्मा हास्मा अयं चकार आसनमाहृत्योदकमाहारयाञ्चकाराथ त होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥
बृ ० उ ० ८१-
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १२८२ ६ उस पिताने कहा, ' हे तात! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे वह सब हमने तुझसे कह दिया था । अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे । ' द्वयं [ पुत्र - ] ' आप ही जाइये । ' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी माय बैठक थी, वहीं आया । उसके लिये और उसे अर्घ्यदान किया । फिर हूँ? ॥ ४ ॥
स होवाच पिता पुत्रं क्रुद्धसुप-शमयंस्तथा तेन प्रकारेण नो-ऽस्मांस्त्वं हे तात वत्स जानीथा आसन लाकर राजाने जल मँगवाया दकं बोला, ' मैं पूज्य गौतमको वर देता हास्म मन्त्र क्रुद्ध पुत्रको शान्त करने के पूजा लिये उस पिताने कहा, ' हे तात! गौत हे वत्स! तू हमसे इस प्रकार समझ दिल कि जो कुछ विज्ञान में जानता था, गृह्णीथा यथा यदहं किश्च विज्ञान- वह सब मैंने तुझसे कह दिया था-जातं वेद सर्वं तत् तुभ्यमवोच मित्येव जानीथाः कोऽन्यो मम प्रियतरोऽस्ति त्वत्तो यदर्थं रक्षिष्ये १ श्रहमप्येतन जानामि यद् राज्ञा पृष्टम् । तस्मात् प्रेह्या-गच्छ तत्र प्रतीत्य गत्वा राज्ञि ब्रह्मचर्यं वत्स्यात्री विद्यार्थमिति । स आह - भवानेव गच्छत्विति, नाहं तस्य मुखं निरीचितुमुत्सहे । स श्राजगाम गौतम गोत्रतो गौतम श्रारुणिर्यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरासा सनमास्थायिकाः षष्ठी-१. अर्थात् आप जिस प्रयोजनसे करूँगा । ऐसा ही तू जान । भला तुझसे अधिक प्रिय मेरा और कौन है जिसके लिये उसे छिपाऊँगा । राजाने जो पूछा है, वह तो मैं भी नहीं जानता । अतः आ, वह अन चलकर हम दोनों विद्योपार्ज़नके लिये राजाके यहाँ ब्रह्मचर्यपालन-पूर्वक निवास करेंगे । ' उस ( पुत्र ) मेम ने कहा, ' आप ही जाइये, मैं तो उसका मुँह भी नहीं देख सकता । ' वह गौतम गोत्रतः गौतम आरुणि, कुम जहाँ प्रवाहण जैवलिका आस आसन वा आस्थायिका अर्थात् बैठक थी, वहीं मे आया । ' प्रवाहणस्य जैवलेः ' ये दो यहाँ पधारे हैं, वह कहिये; मैं उसको पूर्ति कत
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[ अध्याय६ ऐसा समझ दया था । अब नवास करेंगे । ' ल प्रवाहणकी जल मँगवाया कोवर देता बात करनेके हा, ' हे तात! प्रकार समझ मैं जानता था, कह दिया था-भला तुझसे और कौन है छिपाऊँगा । वह तो मैं भी न आ, वहीं विद्योपार्ज़न के ह्मचर्यपालन-- उस ( पुत्र ) नाइये, मैं तो देख सकता । ' तम आरुणि, आस आसन ठिक थी, वहीं जेवले: ' ये दो मैं उसको पूर्ति ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ द्वयं प्रथमास्थाने; तस्मै गौत । मायागतायासन मनुरूपमाहृत्यो-दकं भृत्यैराहारयाञ्चकारः अथ हास्मा श्रयं पुरोधसा कृतवान् मन्त्रवन्मधुपर्क चः कृत्वा चैवं पूजां तं होवाच वरं भगवते गौतमाय तुभ्यं दद्म इति गोऽश्वा-दिलक्षणम् ॥ ४ ॥
१२८३ षष्ठी प्रथमाके स्थानमें हैं ' । अपने पास आये हुए उस गौतमके लिये राजाने उचित आसन देकर सेवकों-से जल मँगवाया और फिर पुरोहितद्वारा बध्यं और मन्त्रयुक्त मधुपर्क कराया । इस प्रकार पूजा-कर उसने गौतमसे कहा, ' मैं आप भगवान् गौतमको गौ - अश्वादिरूप वर देता हूँ ' ॥ ४ ॥
आरुणिका प्रवाहणसे अपने पुत्र से पूछी हुई बात कहने की प्रार्थना करना स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तु कुमार-स्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥
उसने कहा, ' आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी वह मुझसे कहिये ' ॥ ५ ॥
स होवाच गौतमः प्रतिज्ञातो मेममैषव रस्त्वयास्यां प्रतिज्ञायाम् ' कुत्मानम् यां तु वाचं कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे चाचमभाषथाः प्रश्नरूपां तामेव मे ब्रूहि स एव नो वर इति ॥५ ॥ ।
उस गौतमने कहा, ' आपने इस प्रतिज्ञामें मुझे यह वर देनेकी प्रतिज्ञा की है - ' कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके समीप आपने प्रश्नरूप जो बात कही थी, वही आप मुझसे कहिये, वही मेरा वर है । यह वर देनेके लिये अब आप अपनेको सुस्थिर कीजिये ' ॥ ५ ॥
१. क्योंकि ' आस ' यह क्रियापद है, अत: ' प्रवाहणः जैवलिः ' यह उसका कर्ता होना चाहिये । षष्ठी होनेके कारण ही ' मास ' का अर्थ ' आसन ' किया गया है ।
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१२८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ प्रवाहणका उसे दैव वर बताकर अन्य मानुष ब्राह्म वर माँगने के लिये कहना स होवाच देवेषु वै गौतम तद् वरेषु मानु- विज्ञ षाणां ब्रूहीति ॥ ६ ॥
तेन उसने कहा, ‘ गौतम! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है; तुम मनुष्यसम्बन्धी दिल्य वरोंमें से कोई वर मांगो ' ॥ ६ ॥
स होवाच राजा देवेषु वरेषु उस राजाने कहा, गौतम '! माय तद् वै गौतम यस्त्वं प्रार्थयसे तुम जो वर मांगते हो, वह तो देव पात मानुषाणामन्यतमं प्रार्थय वरोंमेंसे है । मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे वरम् ॥ ६ ॥ कोई वर माँगो ' ॥ ६ ॥ त्तम
नां आरुरिणका आग्रह और प्रवाहरणकी स्वीकृति से प्रारुणिद्वारा धान वाणीमात्रसे उसका शिष्यत्व स्वीकार करना मान स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो-त्वय अश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिदानस्य मा नो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्यो भूदिति स वै चर गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा ह युक्त स्मैव पूर्व उपयन्ति स होपायनकीत्यवास ॥ ७ ॥ भून
उस गौतमने कहा, आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है । मुझे प्रति सुवर्णकी प्राप्ति तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और परिधानकी भी प्राप्ति भूत है । आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये कद अदाता न हों । ' [ राजा—- ] ' तो गौतम! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे प्रभ पानेकी इच्छा करो । ' ( गौतम -- ) ' अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे तत उपसन्न ( प्राप्त ) होता है । पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति कर उपसन्न होते रहे हैं । ' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र त्य गौतम वहां रहने लगा [ सेवा आदिके द्वारा नहीं ] ॥ ७ ॥ मा