बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1301–1310

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1301–1310

पृष्ठ 1301

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[ अध्याय६ मानुष वरेषु मानु-म मनुष्यसम्बन्धी कहा, ' गौतम! हो, वह तो देव सम्बन्धी वरोंमेंसे ॥६ ॥

आरुणिद्वारा करना स्थापात्तं गो-मा नो भवान् दिति स वै मेति वाचा ह स ॥ ७ ॥

पास है । मुझे रधानकी भी प्राप्ति होकर मेरे लिये त्रोक्त विधिसे उसे प्रति शिष्यभावसे हो क्षत्रियादिके प्रति से कथनमात्र ७ ॥ ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८५ स होवाच गौतमो भवतापि विज्ञायते ह ममास्ति सः । न तेन प्रार्थितेन कृत्यं मम यं त्वं दित्ससि मानुषं वरम्, यस्मान्म-माप्यस्ति हिरण्यस्य प्रभूतस्या-पातं प्राप्तं गोश्रश्वानाम् - अपा-चमस्तीति सर्वत्रानुषङ्गः; दासी-नां प्रवराणां परिवाराणां परि-धानस्य च; न च यन्मम विद्य-मानम्, तत् स्वतः प्रार्थनी • त्वया वा देयम् । प्रतिज्ञातश्च वरस्त्वया त्वमेव जानीषे यदत्र युक्तं प्रतिज्ञा रक्षणीया तवेति । मम पुनरयमभिप्रायो मा भून्नोऽस्मानभ्यस्मानेव केवलान् प्रति भवान् सर्वत्र वदान्यो भूत्वा अवदान्यो भा भूत् कदर्यो मा भूदित्यर्थः । बहोः प्रभूतस्यानन्तस्यानन्तफलस्येत्ये-तत्, अपर्यन्तस्यापरिसमाप्ति -कस्य पुत्रपौत्रादिगामिकस्ये-स्वेतत्, ईदृशस्य वित्तस्य मां प्रत्येव केवलमदाता । उस गौतमने कहा, ' आप भी जानते हैं, वह तो मेरे पास है ही । आप जिस मनुष्यसम्बन्धी वरको मुझे देना चाहते हैं, उसके मांगने-से तो मेरा कोई प्रयोजन हे नहीं, क्योंकि मुझे भी बहुत - सा सुवर्णं प्राप्त हे तथा गौ - अश्वादिकी भी प्राप्ति है - इस प्रकार ' अपात्तम् अस्ति ’ इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध लगाना चाहिये ॥ अर्थात् दासी, परिवार और वस्त्र - इन सबकी मुझे भी प्राप्ति है । जो मेरे पास नहीं है, वही मुझे आपसे माँगना चाहिये और वही आपको देना भी चाहिये । आपने वर देनेकी प्रतिज्ञा तो की ही है, अब यहाँ क्या करना उचित है - यह आप ही जानें; आपको प्रतिज्ञा का पालन तो करना ही चाहिये । ' मेरा तो यह अभिप्राय है कि आप सर्वत्र दाता होकर भी हमारे प्रति ही, अर्थात् केवल हमारे लिये ही अदाता न हों -- कृपण न हों । ' बहोः ' - बहुत - सी, ' अनन्तस्य ' --अनन्त फलवाली, ' अपर्यन्तस्य ’ __ समाप्त न होनेवाली अर्थात् पुत्र-पौत्रादिकोंमें भी जानेवाली -- 17 इस प्रकारकी सम्पत्ति दाता होकर भी आप केवल मेरे

पृष्ठ 1302

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१२८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय मा भूद् भवान्; न चान्यत्रादेय- । मस्ति भवतः । एवमुक्त आह- स त्वं वै हे. गौतम तीर्थेन न्यायेन शास्त्र -विहितेन विद्यां मत्त इच्छासा इच्छान्वाप्तुमित्युक्तो गौतम थाह - उपैम्युपगच्छामि शिष्यस्वे -नाहं भवन्तमिति । वाचा ह स्मैव किल पूर्वे ब्राह्मणाः क्षत्रि-यान् विद्यार्थिनः सन्तो वैश्यान् वा चत्रिया वा वैश्यानापचुप-यन्ति शिष्यवृत्त्या ह्युपगच्छन्ति नोपायनशुश्रूषादिभिः । अतः स गौतमो होपायनकीयोंपग मन कीर्तनमात्रेण वो वा सोषित-वान्नोपायनं चकार ॥ ७ ॥

प्रवाहणकी क्षमाप्रार्थना और एवं गौतमेनापदन्तर उक्ते-१. स्वयं विद्यानभिज्ञ होनेके कारण ६ लिये ही अदाता न हों । दूसरोंके बा लिये तो आपको कुछ भी अदेय नहीं है । इस प्रकार कहे जानेपर राजाने. पि कहा, ' अच्छा तो हे गौतम! तुम उ ' तीर्थेन ' - - - शास्त्रविहित विधिसे म मुझसे विद्याग्रहण करनेकी इच्छा करो । ' ऐसा कहे जानेपर गौतमने कहा, ' उपेमि ' में शिष्यभावसे मा आपके प्रति उपसन्न होता हूँ । तुम विद्या प्राप्त करनेकी इच्छावाले. तुम पूर्ववर्ती ब्राह्मणलोग क्षत्रिय या स वैश्योंके प्रति अथवा क्षत्रियलोग वैश्यों के प्रति आपत्तिकाल में केवल वाणीद्वारा ही शिष्यवृत्तिसे उपसन्न होते थे, किसी प्रकारकी भेंट मा देकर अथवा शुश्रूषादिके द्वारा उनका शिष्यत्व स्वीकार नहीं करते थे । ' अतः उस गौतमने ' उपायन कीर्त्या ' - उपसत्तिके कथ- ह नमात्रसे ही वहाँ निवास किया, प वस्तुतः सेवा आदिके द्वारा उप-गमन नहीं किया ॥ ७ ॥ भ

वि विद्यादानके लिये तत्पर होना त गौतमके इस प्रकार आपदन्तर कहनेपर- II किसी हीन वर्णके पुरुषके पास शिष्यभावसे ६ जाना - यह आपदन्तर ( आपत्तिकाल ) कहलाता है ।

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[ अध्याय६ न हों । दूसरोंके कुछ भी अ जानेपर राजाने हे गौतम! विहित विधिसे करनेकी इच्छा जाने पर गौतमने - मैं शिष्यभावसे -सन्न होता हूँ । 1 नेकी इच्छावाले नोग क्षत्रिय या थवा क्षत्रियलोग पत्तिकाल में केवल व्यवृत्तिसे उपसन्न प्रकारकी भेंट शुश्रूषादिके द्वारा स्वीकार नहीं : उस गौतमने - उपसत्तिके कथ-- निवास किया, दिके द्वारा उप-॥ ७ ॥

तत्पर होना प्रकार आपदन्तर के पास शिष्यभावसे ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८७ स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिँश्चन ब्राह्मण उवास तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वैवं ब्रुवन्त-मर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ८ ॥

उस राजाने कहा, ' गौतम! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना । इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही । उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ । भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करने में ( विद्या देनेसे सकता है? ' ॥ ८ ॥

स होवाच राजा पीडितं मत्वा चामयंस्तथा नोऽस्मान् प्रति मापराधा अपराधं मा कार्षीरस्म-दीयोऽपराघो न ग्रहीतव्य इत्यर्थः तव च पितामहा अस्मत्पिताम-हेषु यथापराधं न जगृहुस्तथा पितामहानां वृत्तमस्मास्त्रपि । भवता रक्षणीयमित्यर्थः । यथेयं विद्या त्वया प्रार्थिता, इतस्त्व-त्संप्रदानात् पूर्वं प्राड् न कस्मि-न्नपि ब्राह्मणे उवासोषितवती तथा स्वमपि जानीषे सर्वदा क्षत्रियपरम्परयेयं विद्यागता; इनकार करने में ) कौन समर्थ हो उसे पीडित समझकर उस राजाने क्षमा कराते हुए कहा, ' हमारे प्रति इसी प्रकार अपराध न करें, अर्थात् हमारे अपराधको आप इसी प्रकार ग्रहण न करें, जिस प्रकार कि आपके पितामहोंने हमारे पितामहों-का अपराध ग्रहण नहीं किया था; तात्पर्यं यह है कि इस प्रकार आप-को भी हमारे प्रति अपने पितामहों-के आचरणकी रक्षा करनी चाहिये । जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा प्रार्थित यह विद्या इससे यानी तुम्हें सम्त्र-दान करनेसे पूर्वं किसी भी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही सो तुम भी जानते ही हो, यह विद्या सर्वदा क्षत्रिय-परम्परासे ही आयी है; यदि हो

पृष्ठ 1304

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१२८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ सा स्थितिर्मयापि रक्षणीया यदि । शक्यते; इत्युक्तं देवेषु गौतम तद् वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति न पुनस्तवादेयो वर इति । इतः परं न शक्यते रक्षितुम् तामपि विद्यामहं तुम्यं वक्ष्यामि; को ह्यन्योऽपि हि यस्मादेवं ब्रुवन्तं त्वामर्हति प्रत्याख्यातुं न वक्ष्या-मीति अहं पुनः कथं न वक्ष्ये तुम्यमिति ॥ ८ ॥

सके तो उस स्थितिकी रक्षा मुझे ब्राह्म भी करनी चाहिये थी; इसीसे मैंने यह कहा था कि ' हे गौतम! यह समि वर तो देव वरोंमेंसे है, तुम मानुष अवा बरोंमेंसे माँगो । ' यह वर तुम्हारे श्रद्ध लिये अदेय है- ऐसी बात नहीं अस है । अब आगे इसे छिपाना सम्भव नहीं है; मैं उस विद्याको मी तुम्हारे प्रति कहे देता हूँ क्योंकि इस प्रकार यथ बोलनेवाले तुमको मेरे सिवा दूसरा भी ऐसा कौन है, जो ' मैं नहीं का कहूँगा ' ऐसा कहकर निषेध करनेमें ना समर्थं हो सके? फिर भला में तुमसे वह विद्या क्यों न कहूँगा? ' || ८ || लो चतुर्थ प्रश्नका उत्तर- पञ्चाग्निविद्या सा १ - द्युलोकाग्नि असौ वै लोकोऽग्निर्गौतमे । ' असौ वै लोकोऽग्निगतम ' इत्यादि नि मन्त्रसे चौथे प्रश्नका पहले निर्णय स्यादि चतुर्थः प्रश्नः प्राथम्येन किया जाता है । क्रमभंग तो इस्-निर्णीयते क्रमभङ्गस्त्वेतन्निर्ण- लिये किया गया है कि इस प्रश्नके निर्णयके अधीन ही अन्य प्रश्नोंका यायत्तत्वादितरप्रश्ननिर्णयस्य ॥ निर्णय है । असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्र-f श्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फु-लिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1305

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[ अध्याय ६ 2322 तिकी रक्षा मुझे थी; इसीसे मैंने ' हे गौतम! यह है, तुम मानुष यह वर तुम्हारे ऐसी बात नहीं - छिपाना सम्भव या को भी तुम्हारे -योंकि इस प्रकार मेरे सिवा दूसरा , जो ' मैं नहीं कर निषेध करने में कर भला मैं तुमसे कहूँगा? ' || ८ || गौतम ' इत्यादि का पहले निर्णय क्रमभंग तो इस-है कि इस प्रश्न के अन्य प्रश्नोंका एव समिद्र-देशो विस्फु-जुह्वति तस्या ब्राह्मण २ ] १२८ ९ हे गौतम! यह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है । आदित्य ही उसका समिध् ( इंधन ) है, किरणें घूम है, दिन ज्वाला है, दिशाएं अङ्गार हैं, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं । उस इस अग्निमें देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं; उस आहुतिसे असो द्यौर्लोकोऽग्निर्हे गौतमः । द्युलोकेऽग्निदृष्टिरनग्नौ विधीयते, यथा योषित्पुरुषयोः तस्य धुलो-काग्नेरादित्य एव समित् समिन्ध-नात च्यादित्येन हि समिध्यतेऽसौ लोकः । रश्मयो धूमः समिध उत्थान-सामान्यात्, आदित्याद् हि रश्मयो निर्गताः समिधश्च धूमो लोक उत्तिष्ठति । हरचिः प्रकाशसामा-न्यात् दिशोऽङ्गारा उपशमसामा-न्यात्; अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गवद् विक्षेपात् । तस्मिन्नेतस्मिन्नेवं गुणावशिष्टे लोकाग्नौ देवा इन्द्रादयः श्रद्धां सोम राजा होता है ॥ ६ ॥

हे गौतम! यह द्युलोक अग्नि है | स्त्री और पुरुष के समान अग्नि न होनेपर भी द्युलोकमें अग्नि-दृष्टिका विधान किया जाता है । उस लोकरूप अग्निको सम्यक् प्रकार से दीप्त करनेवाला होने से आदित्य उसका समिघ् है, क्योंकि आदित्यसे हो उस लोकका सम्यक् प्रकारसे दीपन ( प्रकाशन ) होता है । किरणें धूम हैं; क्योंकि जिस प्रकार इंधनसे धुआं उठता है, उसी प्रकार आदित्यरूपी इंधन से उठने में इन किरणोंकी घूमसे समानता है; कारण, आदित्थसे ही किरणें निकलती हैं और लोकमें समिध् ( ईंधन ) से धूम निकलता है । प्रकाशमें समानता होनेके कारण दिन ज्वाला है; उपशममें समानता होनेसे दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा विस्फुलिङ्गोंके समान बिखरी हुई होनेके कारण अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं | ऐसे गुणोंसे युक्त उस इस । द्युलोकरूप अग्नि में इंद्रादि देवगण

पृष्ठ 1306

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१२ ९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय जुहत्याहुतिद्रव्यस्थानीयां प्रति । पन्ति । तस्या आहुत्या आहुतेः सोमो राजा पितॄणां ब्राह्मणानां च संभवति । तत्र के देवाः १ कथं जुह्वति? आहुत्यादि- किं वा श्रद्धाख्यं स्वरूपविचारः हविः १ इत्यत उक्त-मस्माभिः सम्बन्धेनत्वेवैनयोस्त्व-मुत्क्रान्तिमित्यादि । पदार्थषट्क-निर्णयार्थमग्निहोत्र उक्तम् - ते वा एते श्रग्निहोत्राहुती हुते सस्यावुत्क्रामतः; ते अन्तरिक्षमा -विशतः; ते अन्तरिक्षमाहवनीयं । कुवति वायुं समिधं मरीचीरेव शुक्रामाहुतिस्; ते अन्तरिक्षं तर्पयतः, ते तत उत्क्रामतः; ते दिवमाविशतः ते दिवमा-हवनीयं कुर्वाते आदित्यं समिध मित्येवमाद्युक्तम् । ६ ब्रा आहुतिद्रव्यस्थानीय श्रद्धाको करते अर्थात् डालते हैं हवन । उस आहुतिसे पितरों और ब्राह्मणोंका राजा सोम उत्पन्न होता है । तहाँ देवता कौन हैं? वे किस प्रकार हवन करते हैं? और श्रद्धा-संज्ञक हवि भी क्या हैं? इन सब व्य बातोंका विचार करना है - इसीसे हमने इस ब्राह्मणके सम्बन्ध - भाष्य-में कहा था कि ' तू इन सायं-कालिक, प्रातः कालिक अग्निहोत्रकी धूय दोनों आहुतियोंकी न तो उत्क्रान्ति-को जानता है ' इत्यादि । इसी लि प्रकार उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थों-के निर्णयके लिये अग्निहोत्रप्रकरण- मा में कहा गया है वे ये अग्निहोत्रकी स दोनों आहुतियों हवन की जानेपर उत्क्रमण करती ( ऊपर उठती ) पर हैं; वे अन्तरिक्षमें प्रवेश करती हैं; वे अन्तरिक्षको ही आहवनीय म अग्नि करती हैं, वायुको समिधु करती हैं और किरणोंको ही शुक्ल आहुति करती हैं; वे अन्तरिक्षको क तृप्त करती हैं; वे उससे भी ऊपर नी जाती हैं; वे द्युलोक में प्रवेश करती हैं; वहाँ वे द्युलोकको आहवनीय म बनाती हैं और आदित्यको ' समिघ् '; इत्यादि प्रकारसे वहीं कहा गया है । जा १. क्योंकि न तो इन्द्रादि देवताओंका कर्ममें अधिकार है, न व हवन किया जा सकता है और न श्रद्धा में द्रव्यत्व है ।

पृष्ठ 1307

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[ अध्याय६ य श्रद्धाको हवन डालते हैं । उस और ब्राह्मणोंका न होता है । कौन हैं? वे किस हैं? और श्रद्धा-क्या हैं? इन सब - करना है - इसी से के सम्बन्ध - भाष्य-क ' तू इन सायं-लिक अग्निहोत्रकी कीन तो उत्क्रान्ति-इत्यादि । इसी आदि छः पदार्थों-अग्निहोत्रप्रकरण ये अग्निहोत्रकी हवन की जानेपर ( ऊपर उठती ) प्रवेश करती हैं; ही आहवनीय , वायुको समिघ् करणों को ही शुक्ल हैं; वे अन्तरिक्षको उससे भी ऊपर कमें प्रवेश करती को आहवनीय नौर आदित्यको दि प्रकारसे वहीं हैं, न लोकादि ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२ ९ १ तत्राग्निहोत्राहुती ससाधने एवोत्क्रामतः । यथेह यैः साधनै-विंशिष्टे ये ज्ञायेते आहवनीयाग्नि-समिद्धूमाङ्गगर विस्फुलिङ्गाहुतिद्र व्यैस्ते · तथवोत्क्रोमतोऽस्मा-ल्लोकादमुं लोकम् । तत्राग्नि-रग्नित्वेन समित् समिवेन धूमो धूमत्वेनाङ्गारा अङ्गारत्वेन विस्फु-लिङ्गा विस्फुलिङ्गत्वेनाहुतिद्रव्य -मपि पाद्याहुतिद्रव्यत्वेनैव सर्गादावव्याकृतावस्थायामपि परेण सूक्ष्मेणात्मना व्यवतिष्ठते । तद् विद्यमानमेव ससाधन-मग्निहोत्रलक्षणं कर्मा पूर्वेणात्मना व्यवस्थितं सत् तत् पुनर्व्याकरण-काले तथैवान्तरिक्षादीनामाहव-नीयाद्यग्न्यादिभावं कुर्वद् विपरिण मते । तथैवेदानीमप्यग्निहोत्राख्यं! [ यजमानकी मृत्युके समय ] अग्निहोत्रकी आहुतियाँ साघनके सहित ही उत्क्रमण करती हैं । इस लोकमें जिस प्रकार वे जिन आहव--नीयाग्नि, समिघ्, घूम, अङ्गार,, विस्फुलिङ्क और बाहुतिद्रव्यरूप-साधनोंसे युक्त जानी जाती हैं, उसी प्रकार वे इस लंकसे उस लोकके प्रति उत्क्रमण करती हैं । वहाँ सर्गके आरम्भ में अव्यक्ता-वस्थामें भी अपने परम सूक्ष्मरूपसे, अग्नि अग्निभावसे, समिध् समि द्भावसे, धूम धूमभावसे, अङ्गार अङ्गारभावसे, विस्फुलिङ्ग विस्फु-लिङ्गभावसे और आहुतिद्रव्य भी दुग्धादि आहुतिद्रव्यभावसे ही रहते हैं । ' वह साधनसहित अग्निहोत्ररूप कर्म अपूर्वरूपसे व्यवस्थित होकर विद्यमान रहता हुआ ही जगत्के अभिव्यक्त होने के समय पुन: उसी प्रकार अन्तरिक्षादिका आहवनीयादि-अग्निभाव करता हुआ विपरिणाम-को प्राप्त हो जाता है । इसी प्रकार इस समय भी अग्निहोत्रसंज्ञक कर्म १. अर्थात् प्रलयमें इनका स्थूलरूप न रहनेपर भी ये सब पदार्थ अपनी व्यक्तियोंके रूपमें रहते हैं । अतः ये सब सामान्यभावको प्राप्त नहीं होते और आहुतियोंसे उत्पन्न हुए अपूर्वसे पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तो जब अग्निहोत्रकी व्यक्त जगत् के रूपमें परिणत हो जाते हैं । पुनः

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१२ ९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ बाह कर्म । एवमग्निहोत्राहुत्यपूर्व । विपरिणामात्मकं जगत् सर्वमित्याहुत्योरेव स्तुत्यर्थ-त्वेनोत्क्रान्त्याद्या लोकं प्रत्यु-स्थायितान्ताः षट् पदार्थाः कर्मप्रकरणेऽधस्तान्निर्णीताः । इह तु कर्तुः कर्मविपाकविव-चायां द्युलोकाग्न्याद्यारभ्य पञ्चाग्निदर्शनमुत्तरमार्गप्रतिपत्ति-साधनं विशिष्टकर्मफलोपभोगाय विधित्सितमिति द्युलोकाग्न्या -दिदर्शनं प्रस्तूयते । तत्र य आध्यात्मिकाः प्राणा इहाग्नि-होत्रस्य होतारस्त एवाधिदैवि-कत्वेन परिणताः सन्त इन्द्रादयो मवन्ति । त एव तत्र होतारो चुलोकाग्नौ । ते चेहाग्निहोत्रस्य फलभोगायाग्निहोत्रं हुतवन्तः । त एव फल परिणाम कालेऽपि तत्फलभोक्तृत्वात् तत्र तत्र होतृत्वं प्रतिपद्यन्ते तथा तथा विपरिणम-माना देवशब्दवाच्याः सन्तः ॥ जगत्का आरम्भक है । इस प्रकार यह सारा जगत् अग्निहोत्र उत्पन्न हुए अपूर्वका विपरिणाम- हो रूप है, अतः आगे कर्मप्रकरणमें प्र आहुतियोंकी ही स्तुतिके लिये सूक्ष उत्क्रान्तिसे लेकर यजमान के पुनः क परलोकगमन के लिये उत्थान करने- दि तक छः पदार्थोंका निर्णय किया गया है । लो यहाँ ( इस ब्राह्मणमें ) तो कर्ताके अ कर्मफलके निरूपणकी इच्छा होनेपर हो धुलोकाग्नि इत्या दिसे आरम्भ करके, विशिष्टफलके उपभोगके लिये उत्तर- श मार्गकी प्राप्तिकी साधनभूता श पञ्चाग्निविद्याका विधान करना ता अभीष्ट है, इसलिये द्युलोकाग्नि म आदि दृष्टि प्रस्तुत की जाती है । त अतः यहां व्यवहार में जो आध्या-त्मिक प्राण अग्निहोत्रके होता है, त वे ही आधिदैविकरूपमें परिणत स होनेपर इन्द्रादि हो जाते हैं । वे ही वहाँ चुलोकाग्निमें हवन करनेवाले हैं । उन्होंने यहाँ ( इस लोक में ) म अग्निहोत्रका फल भोगने के लिये अग्निहोत्र किया था । फलके व परिणामकालमें भी वे ही उस वि फलके भोक्ता होने के कारण उस - उस स्थानमें वैसे - वैसे ही रूपसे परिणत I होकर देवशब्दवाच्य हुए होतृत्वको प्राप्त होते हैं ।

पृष्ठ 1309

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[ अध्याय६ क है । इस प्रकार त् अग्निहोत्रसे का विपरिणाम-आगे कर्मप्रकरण में स्तुति के लिये यजमान के पुनः लिये उत्थान करने-का निर्णय किया ह्मण में तो कर्ताके की इच्छा होनेपर दिसे आरम्भ करके, भोगके लिये उत्तर-की साधनभूता = विधान करना लिये द्युलोकाग्नि की जाती है । हारमें जो आध्या-नहोत्र होता है, विकरूपमें परिणत हो जाते हैं । वे ही में हवन करनेवाले हाँ ( इस लोक में ) कल भोगनेके लिये नाथा । फलके भी वे ही उस के कारण उस - उस ही रूपसे परिणत च्य हुए होतृत्वको ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ अत्र च यत् पयोद्रव्यमग्नि-होत्रकर्माश्रयभूतमिहाहवनीये प्रक्षिप्तमग्निना भक्षितमदृष्टेन सूक्ष्मेण रूपेण विपरिणतं सह कर्त्रा यजमानेनामुं लोकं धूमा-दिक्रमेणान्तरिक्षमन्तरिक्षाद् धु -लोकमाविशति । ताः सूक्ष्मा आप आहुतिकार्यभूता अग्नि-होत्रसमवायिन्यः कर्तृसहिताः श्रद्धा शब्दवाच्याः सोमलोके कर्तुः शरीरान्तरारम्भाय द्युलोकं प्रवि-शन्त्यो हूयन्त इत्युच्यन्ते । तास्तत्र द्युलोकं प्रविश्य सोम- । मण्डले कतु: शरीरमारभन्ते । तदेतदुच्यते देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवतीति । “ अद्धा वा आपः " इति श्रुतेः । वेत्थ यतिथ्यामाहुत्यां हुताया-मापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्तीति प्रश्नः, तस्य च निर्णय-विषये ' असौ वै लोकोऽग्निः ' इति प्रस्तुतम् । तस्मादापः कर्मसम- । १२ ९ ३ इस लोकमें जो अग्निहोत्रकर्म-का आश्रयभूत दुग्धरूप द्रव्य आह-वनीय अग्नि में डाला गया था, वह अग्निद्वारा भक्षित होकर अदृष्ट सूक्ष्मरूप में परिणत हो कर्ता यज-मानके सहित धूमादि क्रमसे उस अन्तरिक्षलोकमें और फिर अन्तरिक्ष-से द्युलोकमें प्रवेश करता है वह आहुतिका कार्यभूत, श्रद्धाशब्द-वाच्य, अग्निहोत्रसम्बन्धी सूक्ष्म आप सोमलोकमें कर्ताके शरोरा-न्तरका आरम्भ करनेके लिये कर्ता-के सहित द्युलोकमें प्रवेश करते हुए ' हवन किया जाता है ' ऐसा कहा जाता है, वह वहां द्युलोकमें प्रवेश कर सोममण्डलमें कर्ताका शरीर आरम्भ करता है । इसीसे यह कहा जाता है कि ' देव-गण श्रद्धाको होमते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा उत्पन्न होता हे । " श्रद्धा ही माप है " इस श्रुति-से भी यही सिद्ध होता है । ' क्या तू जानता है कि कितनो संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलने लगता है? ' यह प्रश्न है । उसीका निर्णय करनेके प्रसङ्गमें ' यह द्युलोक ही अग्नि है ' इस प्रकार आरम्भ किया गया है । अतः यह

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१२ ९ ४ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ वायिन्यः कतु: शरीरारम्भिकाः । -श्रद्धाशब्दवाच्या इति निश्चीयते । भूयस्त्वादापः पुरुषवाच इति व्यपदेशो न त्वितराणि भूतानि न सन्तीति । कर्मप्रयुक्तश्च शरीरारम्भः, कर्म ' चा समवायि । ततश्चापां प्राधा-न्यं शरीरकर्तृत्वे । तेन चाप: पुरुषवाच इति व्यपदेशः कर्म-कृतो हि जन्मारम्भः सर्वत्र । तत्र यद्यप्यग्निहोत्राहुतिस्तुति -द्वारेणोत्क्रान्त्यादयः प्रस्तुताः षटपदार्था अग्निहोत्रे तथापि वैदिकानि सर्वाण्येव कर्माण्य-ग्निहोत्रप्रभृतीनि लक्ष्यन्ते ॥ दाराग्निसम्बद्धं हि पाङतं कर्म प्रस्तुत्योक्तम् - " कर्मणा पितृ-लोक " ( १ । ५ । १६ ) इति । वक्ष्यति च - " अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्ज-यन्ति ( ६ । २ । १६ ) इति ॥ ९ ॥

२ -ब्राह्म निश्चय होता है कि कर्ताके शरीर-का आरम्भ करनेवाला कर्मसम्ब- स्मि न्धी आप श्रद्धाशब्दवाच्य है । अन्य भूतोंकी अपेक्षा जलकी अधिकता तस्य होनेके कारण ' आपः पुरुषवाचः ' ऐसा व्यपदेश किया जाता है, ऐसी धूम ह बात नहीं है कि अन्य भूत हैं ही विस्फ नहीं । उस अ शरीरका आरम्भ कर्मप्रयुक्त ही प है और कर्म आपसे सम्बन्ध रखता द्विती है । अतः शरीररचनामें ' आप ' की रावृति प्रधानता है । इससे भी ‘ आपः वृष्टचु पुरुषवाच: ' ऐसा उल्लेख किया तस्य गया है । सभी जगह जन्मका चत्सर आरम्भ कर्मके कारण ही है । वहाँ स्वाव अग्निहोत्र के प्रकरण में यद्यपि अग्नि- न्योऽजी होत्रकी आहुतियोंकी स्तुतिके द्वारा अ उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थ प्रस्तुत किये गये हैं, तो भी उससे अग्नि- धूमवत होत्रादि सारे ही वैदिक कर्म लक्षित दचिः, होते हैं । स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध निरङ्ग रखनेवाले पाङ्क्तकर्मका आरम्भ करके " कर्मसे पितृलोक प्राप्त होता सामान है " ऐसा कहा गया है तथा आगे ह्रादुन भी " जो यज्ञ, दान और तपसे विस्फ लोकोंको जय करते हैं " ऐसा श्रुति कहेगी ॥ ६ ॥ सामान

तसि पर्जन्याग्नि • पर्जन्यो वा अग्निर्गोतम तस्य संवत्सर एव समिद- करण आणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गास्त- 1