बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1311–1320

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320

पृष्ठ 1311

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[ अध्याय६ के कर्ताके शरीर-नेवाला कर्मसम्ब-ब्दवाच्य है । अन्य जलकी अधिकता आपः पुरुषवाचः ' या जाता है, ऐसी - अन्य भूत हैं ही रम्भ कर्मप्रयुक्त ही से सम्बन्ध रखता रचना में ' आप ' की इससे भी ' आपः उल्लेख किया 7 जगह जन्मका कारण ही है । वहाँ रण में यद्यपि अग्नि-योंकी स्तुति के द्वारा छः पदार्थ प्रस्तुत भी उससे अग्नि-वैदिक कर्म लक्षित और अग्नि से सम्बन्ध इक्तकर्मका आरम्भ पितृलोक प्राप्त होता गया है तथा आगे दान और तपसे करते हैं " ऐसा श्रुति र एव समिद-विस्फुलिङ्गास्त-ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२ ९ ५ स्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोम राजानंजुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥

हे गौतम! मेघ ही अग्नि है धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि विस्फुलिङ्ग है । उस इस अग्निमें उस आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० पर्जन्यो वा अग्निगतम द्वितीय आहुत्याधार आहुत्यो-रावृत्तिक्रमेण । पर्जन्यो नाम वृष्टथुपकरणाभिमानी देवतात्मा, तस्य संवत्सर एव समित् - सं-वत्सरेण हि शरदादिभिग्रष्मान्तैः स्वावयवैर्विपरिवर्तमानेन पर्ज न्योऽग्निर्दीयते । आणि धूमः, धूमप्रभवत्वाद् धूमवदुपलक्ष्यत्वाद्वा । विद्यु-दचिः, प्रकाशसामान्यात् । अश-निरङ्गाराः, उपशान्तत्वकाठिन्य-सामान्याभ्याम् । ह्रादुनयो | ह्रादुनयः स्तनयित्नुशब्दा विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपानेकत्व-सामान्यात् । तस्मिन्नेव स्मिनित्याहुत्यधि-करणनिर्देशः । देवा इति त एव । संवत्सर ही उसका समिघ् है, अभ्र ( इन्द्रका वज्र ) अङ्गार है, मेघगर्जन

देवगण सोम राजाको हवन करते हैं ।

हे गौतम! मेघ ही अग्नि है अर्थात् आहुतियोंकी वृत्ति क्रमसे द्वितीय आहुतिका आधार है । वृष्टिकी सामग्री के अभिमानी देवताको पर्जन्य ( मेघ ) कहा गया है । उसका संवत्सर समिघ् है । शरदुसे लेकर ग्रीष्मपर्यन्त अपने अंशोंद्वारा विभिन्नरूपसे परिवर्तित होते हुए संवत्सरके द्वारा ही मेघ-रूप अग्नि दीप्त होता है । अन ( बादल ) धूम हैं; क्योंकि वे घूमसे उत्पन्न होते हैं अथवा घूम-के समान दिखायी देते हैं । विद्युत् ज्वाला है; क्योंकि प्रकाशमें उनकी समानता है । उपशान्तत्व और कठिनतामें समानता होनेके कारण अशनि अङ्गारे हैं । ' ह्रादुनयः ' अर्थात् मेघकी गर्जनाएँ विक्षेप और अनेकत्वमें समानता होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं । ' उस इस ( अग्नि ) में ' ऐसा कह-कर आहुति के अधिकरणका निर्देश किया गया है— देवगण अर्थात् वे

पृष्ठ 1312

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१२ ९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ होतारः सोमं राजानं जुह्वति ॥ योऽसौ द्यलोकाग्नौ श्रद्धायां हुता यामभिनिर्वृत्तः सोमः स द्वितीये पर्जन्याग्नौ द्रूयते; तस्याश्च सोमा-हुतेर्वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥

ही होतृगण सोम राजाको होमते ब्राह्मण हैं ॥ जो यह द्युलोकाग्निमें श्रद्धाका अि हवन करनेपर निष्पन्न हुआ सोम था, उसीको इस द्वितीय पर्जन्य सामान ( मेघ ) रूप अग्निमें होमा जाता माश्रि है । उस सोमकी आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० ॥ दाश्रय

रा ३ - इहलोकाग्नि सामा अयं वै लोकोऽग्निगौतम तस्य पृथिव्येव समि- ह्यर्चि दग्निर्धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फु- समित लिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नगौ देवा वृष्टि जुह्वति तस्या छाया आहुत्या अन्न ँ संभवति ॥ ११ ॥

च हे गौतम । यह लोक ही अग्नि है । इसकी पृथिवी ही समिधु है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग सामा हैं । उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न प्रभव होता है ॥ ११ ॥

अयं वै लोकोऽग्निगतम; श्रयं लोक इति प्राणिजन्मोप-क्रियाकारकफल-विशिष्टः स तृतीयोऽग्निः; तस्याग्नेः पृथिव्येव समित्; पृथिव्या हायं लोकोऽनेक प्राण्युप-भोगसंपन्नया समिध्यते । हे गौतम! यह लोक ही अग्नि उप है । यह लोक अर्थात् प्राणियोंके नक्षत्र जन्म और उपभोगका आश्रयभूत तथा क्रिया, कारक और फलसे युक्त ऐसा जो यह लोक है, वही लिङ्ग तृतीय अग्नि है । उस अग्निका ता पृथिवी हो समिघ् है । प्राणियोंके अनेकों उपभोगोंसे सम्पन्न इस वृष्टि पृथिवीसे ही यह लोक दीप्त । होता है ।

पृष्ठ 1313

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[ अध्याय६ राजाको होमते काग्नि में श्रद्धाका निष्पन्न हुआ सोम द्वितीय पर्जन्य नमें होमा जाता आहुतिवृष्टि थिव्येव समि-त्राणि विस्फु जुह्वति तस्या थिवी ही समिधु है, नक्षत्र विस्फुलिङ्ग उस आहुति से अन्न यह लोक ही अग्नि अर्थात् प्राणियोंके भोगका आश्रयभूत कारक और फलसे यह लोक है, वही है । उस अ मधु है । प्राणियों के गोंसे सम्पन्न इस यह लोक दीप्त ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२ ९ ७ NANN अग्निर्धूमः पृथिव्याश्रयोत्थान । सामान्यात्; पार्थिवं हीन्धनद्रव्य-माश्रित्याग्निरुत्तिष्ठति, यथा समि-दाश्रयेण धूमः । रात्रिरचिः, समित्सम्बन्धप्रभव-सामान्यात्, अग्नेः समित्सम्बन्धेन ह्यर्चिः संभवति । तथा पृथिवी-समित्सम्बन्धेन शर्वरी, पृथिवी -छायां हि शार्वरं तम आचक्षते । चन्द्रमा अङ्गाराः, तत्प्रभवत्व-सामान्यात् । अर्चिषो घङ्गाराः प्रभवन्ति तथा रात्रौ चन्द्रमा उपशान्तत्वसामान्याद् वा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः, विस्फु-लिङ्गवद् विक्षेपसामान्यात् । तस्मिन्नेत स्मिन्नित्यादि पूर्ववत् । वृष्टि जुह्वति तस्या आहुतेरन्नं वृ ० उ०- ८२ अग्नि धूम है; क्योंकि पृथिवी-रूप आश्रयसे उठने में इनकी समानता है; क्योंकि पार्थिव इंधन द्रव्यको आश्रय करके ही अग्नि उठती है, जिस प्रकार कि समिघ्के आश्रयसे घूम उठता है । रात्रि ज्वाला है, समिघ् के सम्बन्धसे उत्पन्न होने में इनकी समानता है; क्योंकि समिधुका सम्बन्ध होनेसे ही ज्वाला उत्पन्न होती है और इसी प्रकार पृथिवोरूप समिधुके सम्बन्ध . रात्रि होती है; पृथिवीकी छायाको ही रात्रिका अन्धकार कहते हैं । चन्द्रमा अङ्गार है; क्योंकि ज्वालासे उत्पन्न होने में इनकी समानता है । ज्वालासे हो अङ्गारे होते हैं, इसी प्रकार रात्रिमें चन्द्रमा होता है । अथवा उपशान्तत्वमें समानता होनेके कारण चन्द्रमा अङ्गार हे । नक्षत्र विस्फुलिङ्ग है, क्योंकि विस्फुलिङ्गोंके समान इधर - उधर बिखरे रहने में इनकी भी समानता है । ' तस्मिन्नेतस्मिन् ' इत्यादि वाक्यका अथं पूर्ववत् है । इसमें वृष्टिको होमते | हैं, उस आहुतिसे अन्न होना है;

पृष्ठ 1314

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१२ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ • संभवति वृष्टिप्रभवत्वस्य प्रसिद्ध | क्योंकि व्रीहियवादि अन्नका ब्राह्म से उत्पन्न होना दृष्टि-स्वाद् व्रीहियवादेरन्नस्य ॥। ११॥ | है ॥ ११ ॥ प्रसिद्ध ही चक्ष

४ - पुरुषाग्नि प्रकार पुरुषो वा अग्निर्गोतम तस्य व्यात्तमेव समित् विस्प प्राणो धूमो वागर्चिश्चतुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गास्त-स्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्ये तस्मि रेतः संभवति ॥ १२ ॥

हे गौतम! पुरुष ही अग्नि है । है, प्राण धूम हैं, वाक् ज्वाला है, उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होता है ॥ १२ ॥

पुरुषो वा अग्निर्गौतम प्रसिद्धः शिरः पाण्यादिमान् पुरुषश्चतुर्थो -ऽग्निस्तस्य व्यात्तंविवृतंमुखंसमित्; विवृतेन हि मुखेन दीप्यते पुरुषो वचनस्वाध्यायादौ; यथा समिधा-ग्निः । प्राणो धूमस्तदुत्थानसामा -न्यात्; मुखाद्धि प्राण उत्तिष्ठति । वाक् — शब्दोऽचिंर्व्यञ्जकत्व-सामान्यात्; अर्चिश्च व्यञ्जकम्, तथा वाक्शब्दोऽभिघेपव्यञ्जकः । न उसका खुला हुआ मुख ही समिघ् दृश्य नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं । नै होमते हैं । उस आहुतिसे वीर्यं पतेः हे गौतम! पुरुष ही अग्नि एवा है । हाथ - पाँव आदि अवयवोंवाला पुरुषे प्रसिद्ध पुरुष ही चतुर्थं अग्नि है । त उसका व्यात्त — खुला हुआ मुख ही समिध है; क्योंकि खुले हुए चन मुखसे ही बोलने और स्वाध्याया-दिमें पुरुष दीप्त होता ( शोभा पाता ) है, जिस प्रकार कि समिधुसे अग्नि । इंधनसे उठनेमें समानता होनेके कारण प्राण धूम लो है, क्योंकि मुखसे ही प्राण अरि उठता है । जुह्व व्यञ्जकत्वमें समानता होने के कारण वाक् यानी शब्द ज्वाला याव है । ज्वाला वस्तुको प्रकाशित | करनेवाली होती है, इसी प्रकार वाक् अर्थात् शब्द भी वाच्यको अङ्गा अभिव्यक्त करनेवाला होता है ।

पृष्ठ 1315

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[ अध्याय६ दि अन्नका वृष्टि. ना प्रसिद्ध हो तमेव समित् विस्फुलिङ्गास्त-स्या आहुत्यै T मुख ही सम त्रविस्फुलिङ्ग हैं । आहुति से वीर्य पुरुष ही अग्नि दि अवयवोंवाला चतुर्थं अग्नि है । खुला हुआ मुख क्योंकि खुले हुए और स्वाध्याया-होता ( शोभा जस प्रकार कि I इंधनसे उठने में कारण प्राण धम मुखसे ही प्राण समानता होने के ती शब्द ज्वाला वस्तुको प्रकाशित है, इसी प्रकार द भी वाच्यको वाला होता है । ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ M चक्षुरङ्गाराः, उपशमसामान्यात् । प्रकाशाश्रयत्वाद् वा । श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपसामान्यात् । तस्मिन्नन्नं जुह्वति । ननु नैव देवा अन्नमिह जुह्वतो दृश्यन्ते १ नैष दोषः, प्राणानां देवत्खोप-पत्तेः I । अधिदैवमिन्द्रादयो देवास्त एवाध्यात्मं प्राणास्ते चान्नस्य पुरुषे प्रक्षेतारः । तस्या आहुते रेतः संभवतिः अन्नपरिणामो हि रेतः ॥ १२ ॥ ।

१२ ९९ उपशममें समानता होनेके कारण अथवा प्रकाशके आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गार हैं । विक्षेप में समानता होनेके कारण श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं । इस पुरुषरूप अग्निमें अन्न होम करते हैं । शङ्का - किंतु देवगण इसमें अन्न होम करते देखे तो नहीं जाते? समाधान - यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणोंको देव माना जा सकता है । जो अधिदेव इन्द्रादि देव हैं, वे ही अध्यात्म प्राण हैं, वे ही पुरुषमें अन्न डालनेवाले हैं । उस आहुतिसे वीर्यं होता है; क्योंकि वीर्य अन्नका ही परिणाम है ॥ १२ ॥

५ - योषाग्नि योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समि-लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १३ ॥

हे गौतम! स्त्री ही अग्नि है । उपस्थ ही उसकी समिघ् है, लोम ' धूम है, योनि ज्वाला है, जो भीतरको [ मैथुनव्यापार ] करता है, वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण वीर्यं

पृष्ठ 1316

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१३०० बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय६ ब्राह्मण होमते हैं, उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है । वह जीवित रहता है । भन्ते जबतक कर्म शेष रहते हैं, वह जीवित योषा वा श्रग्निगतम | योषेति स्त्री पञ्चमो होमाधिकरणोऽग्नि-स्तस्या उपस्थ एव समित्; तेन हि । सा समिध्यते लोमानि धूमस्तदु-त्थानसामान्यात् । योनिरर्चिर्वर्ण-सामान्यात् । यदन्तः करोति ते-ऽङ्गारो अन्तःकरणं मैथुन व्यापारः तेऽङ्गारा वीर्योपशम हेतुत्वसामा-न्यात् - वीर्याद्युपशमकारणं मैथु-नम्, तथाङ्गारभावोऽग्नेरुपशम-कारणम् । अभिनन्दाः सुखलवाः, क्षुद्रत्वसामान्याद् त्रिस्फुलिङ्गाः । तस्मिन् रेतो जुह्वति, तस्था श्राहुतेः पुरुषः संभवति । एवं पर्जन्यालोक पुरुषयोषा-ग्निषु क्रमेण हूयमानाः श्रद्धासोम-वृष्टथन्नरेतोभावेन स्थूलतारतम्य-क्रममापद्यमानाः श्रद्धाशब्द-वाच्या आप पुरुषशरीरमार-रहता है और जब मरता है ॥ १३ ॥

हे गौतम! योषा ही अग्नि है । थ्याम योषा अर्थात् स्त्रो यह पांचवां बाचो होमाघिकरणरूप अग्नि है । उपस्थ sa ही उसका समिध् है । उसीसे वह दीप्त होती है । समिघूसे उठनेमें समानता होनेके कारण लोम हो धूम हैं । वर्णंमें समानता होनेकं आप कारण योनि ज्वाला है । जो अन्तः स ( भीतर ) करता है, वह अङ्गार जीव है । भीतर करना मैथुनव्यापार अङ्गार है; क्योंकि वीर्यके उपशमके इत्युच हेतु होने में उनकी समानता है । ञ्छरी मैथुन वीर्यादिके उपशमका कारण है, इसी प्रकार अङ्गारभाव अग्नि- तावदि के उपशमका कारण है । क्षुद्रत्वमें यस्मि समानता होनेके कारण अभिनन्द-लेशमात्र सुख विस्फुलिङ्ग हैं । उस प्रथ ( योषाग्नि ) में देवगण वीर्यं होमते हैं । उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न समि होता है । विस इस प्रकार द्युलोक, मेघ, इह-लोक, पुरुष और स्त्रीरूप अग्नियोंमें तस्य क्रमसे हवन किये गये श्रद्धा, सोम, त वृष्टि, अन्न और वोर्यरूपसे स्थूल अग्नि तारतम्य क्रमको प्राप्त हुआ श्रद्धा- ज्वाल शब्दवाच्य आपपुरुषशरीरको आरम्भ

पृष्ठ 1317

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अध्याय६ जीवित रहता है । ब मरता है || १३ || षा ही अग्नि है । स्त्री यह पांचवां अग्नि है । उपस्थ घ् है । उसीसे वह समिसे उठने में कारण लोग हो समानता होनेक ला है । जो अन्तः ता है, वह अङ्गार ना मैथुनव्यापार क वीर्यके उपशमके की समानता है । उपशमका कारण अङ्गारभाव अग्नि-कारण है । क्षुद्रत्वमें कारण अभिनन्द-विस्फुलिङ्ग हैं । उस देवगण वीर्यं होमते तसे पुरुष उत्पन्न लोक, मेघ, इह-स्त्रीरूप अग्नियों में ये गये श्रद्धा, सोम, र वोर्यरूपसे स्थूल प्राप्त हुआ श्रद्धा-आरम्भ लुरुषशरीरको ब्राह्मण २ | शाङ्करभाष्यार्थ भन्ते । यः प्रश्नश्चतुर्थो वेत्थ यति- । ध्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुष-वाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्वी ३ इति स एष निर्णीतः; पञ्चम्यामा-हुत योषाग्नी हुतायां रेतोभूता प्रापः पुरुषवाचो भवन्तीति । स पुरुष एवं क्रमेण जातो जीवति । कियन्तं कालम् । इत्युच्यते - यावज्जीवतियावदस्मि ञ्छरीरे स्थितिनिमित्तं कर्म विद्यते तावदित्यर्थः, अथ तत्क्षये यदा यस्मिन् काले म्रियते ॥ १३ ॥

१३०१ करता है । ' क्या तू जानता है कि कितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्द-वाच्य होकर उठकर बोलने लगता है? ' ऐसा जो चतुर्थं प्रश्न था, उसका यह निर्णय हो गया कि योषाग्निमें पांचवीं आहूतिके हवन किये जानेपर वीर्यंभूत आप पुरुष-शब्दवाच्य होता है । इस क्रमसे उत्पन्न हुआ वह पुरुष जीवित रहता है । कितने काल जीवित रहता है? सो बतलाया जाता है - ‘ यावज्जीवति’– जबतक इस शरीर में इसकी स्थिति-के निमित्तभूत कर्म रहते हैं. तब-तक जीवित रहता है-- ऐसा इसका तात्पर्य है । फिर उनका क्षय होने-पर जब वह मरता है ॥ १३ ॥

प्रथम प्रश्नका उत्तर —– अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम प्रति अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् संमिद् धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति ॥ १४ ॥

तस्या तब इसे अग्निके पास ले जाते हैं । उस ( आहुतिभूत पुरुष ) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिधू समिघ् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं ।

पृष्ठ 1318

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१३०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ उस इस अग्निमें देवगण पुरुषको होमते हैं । उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त ब्राह्मण दीप्तिमान् हो जाता है ॥ १४ ॥

श्रथ तदैनं मृतमग्नये ऽग्न्यर्थमेवा । न्त्याहुत्यै हरन्ति ऋत्विजस्तस्याहु-तिभृतस्य प्रसिद्धोऽग्निरेव होमाधि -करणं न परिकल्प्योऽग्निः प्रसिद्धैव समित् समिद् घूमो धूमोऽर्चिरर्चि-रङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गाविस्फु लिङ्गाः - यथाप्रसिद्धमेव सर्व-मित्यर्थः । तस्मिन् पुरुषमन्त्याहुतिं जुह्वति । तस्या आहुत्या आहुतेः पुरुषो भास्वरवर्णोऽतिशय दीप्ति-मान्; निषेकादिभिरन्त्या हुत्यन्तैः । कर्मभिः संस्कृतत्वात् संभवति निष्पद्यते ॥ १४ ॥

पञ्चम प्रश्नका उत्तर-इदानीं प्रथम प्रश्ननिराकरणार्थ-माह- --तब इस मृत पुरुषको ' अग्नये’- माण अग्नि के हो लिये अन्तिम आहूतिके माझ प्रयोजनसे ऋत्विग्गण ले जाते हैं । तान उस आहुतिभूत पुरुषका प्रसिद्ध अग्नि हो होमाधिकरण होता है, पुनर कोई कल्पित अग्नि नहीं । प्रसिद्ध व तथा ज समिध ही समिध् होती है, घूम घूम अर्थात होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, ताओं देवता अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फु शुक्लप लिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं । तात्पर्यं चलता यह हैं कि ये सब जैसे प्रसिद्ध हैं वे होते ह और अ ही होते हैं । देवोंके उसमें पुरुषरूप अन्तिम आहु- उन ब्र तिको होम करते हैं । उस आहुति- होती से पुरुष भास्वरवर्णं — अत्यन्त ते, दीप्तिमान् हो जाता है; गर्भाधानसे पञ्चा लेकर अन्त्येष्टितकके सम्पूर्ण कर्मों- एवंश संस्कारयुक्त होनेके कारण वह अतिशय दीप्तिमान् हो जाता ङ्गारव हे ॥ १४ ॥ पञ्च

मेवान देवयानमार्गका वर्णन अब प्रथम प्रश्नका निराकरण न करनेके लिये राजा कहता है- मेवैत ते य एवमेतद् विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धा सत्यमु-पासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्ष स्पष्ट क

पृष्ठ 1319

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[ अध्याय६ तिसे पुरुष अत्यन्त रुषको ' अग्नये'-अन्तिम आहुतिके गणले जाते हैं । पुरुषका प्रसिद्ध चकरण होता है, नहीं । प्रसिद्ध होती है, घूम घूम ज्वाला होती है, हैं और विस्फु होते हैं । तात्पर्य जैसे प्रसिद्ध हैं वे -प अन्तिम आहु-हैं । उस आहूति-स्वरवर्ण - अत्यन्त ना है, गर्भाधान से कके सम्पूर्ण कर्मों-होनेके कारण प्रमान् हो जाता वर्णंन इनका निराकरण ना कहता है-द्धा ँ सत्यमु-आपूर्यमाणपक्ष ब्राह्मण २. ] शाङ्करभाष्यार्थ १३०३ मापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥

वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस [ पञ्चाग्निविद्या ] को जानते हैं तथा जो [ संन्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भ ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देव-ताओं को प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छ: महीनों में सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है उन उत्तरायणके छः महीनों के अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं, ] षण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्यसे विद्युत् सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं । उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है । वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यंन्त रहते हैं! उनको पुनरावृत्ति नहीं होती ॥ १५ ॥

ते, के १ य एवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनमेतद् विदुः । एवं शब्दादग्निसमिद्धूमाचिर-ङ्गारविस्फुलिङ्गश्रद्धादिविशिष्टाः पञ्चाग्नयो निर्दिष्टाः, तानेव-मेतान् पञ्चाग्नीन् विदुरित्यर्थः । नन्वग्निहोत्राहुतिदर्शनविषय-मेवैतद्दर्शनम् । तत्र ह्युक्तमुत्का १. ' एवं ' शब्द प्रकृत पञ्चाग्नियोंका स्पष्ट करनेके लिये यह शङ्का उठायी जाती वे, कौन? जो इस प्रकार इस पञ्चाग्नि विद्याको जानते हैं । ' एवम् ' शब्द से अग्नि, समिघ्, धूम, ज्वाला, अङ्गार, विस्फुलिङ्ग और श्रद्धादिविशिष्ट पाँचों अग्नियोंका निर्देश किया गया है । उन पाँच अग्नियोंको जो इस प्रकार जानते हैं - ऐसा इसका तात्पर्य है । शङ्का ' - किंतु यह दर्शन तो अग्निहोत्रकी आहुतियोंके दर्शन के विषयमें ही है । वहीं उत्क्रान्ति ही परामर्श करता है— इस बातको है ।

पृष्ठ 1320

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१३०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय न्त्यादिपदार्थषट्कनिर्णये दिव- । मेवाहवनीयं कुर्वाते इत्यादि । इहाप्यमुष्य लोकस्याग्नित्व-मादित्यस्य च समित्वमित्यादि बहुसाम्यम् ॥ तस्मात्तच्छेषमेवै-तद्दर्शनमिति । न यतिथ्यामिति प्रश्नप्रति-वचनपरिग्रहात् । यतिध्या-मित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनस्य यावदेव परिग्रहस्तावदेवैव शब्देन पराम्रटुं युक्तम्; अन्यथा प्रश्नानर्थक्यान्निर्ज्ञातत्वाच्च संख्याया अग्नय एव वक्तव्याः । अथ निर्ज्ञातमप्यनूद्यते । यथाप्राप्तस्यैवानुवदनं युक्तं न त्वसौ लोकोऽग्निरिति । ६ बाह आदि छः पदार्थोंका निर्णय करने हुए ' लोकको ही आहवनीय करते हैं ' इत्यादि कहा गया है । यहाँ भी उस द्युलोकका अग्निस्व बोर आदित्यका समित्व इत्यादि उससे बहुत कुछ साम्य है; अतः यह युर विद्या उस अग्निहोत्राहुतिदर्शनका ही शेष है । समाधान- नहीं, क्योंकि इस वेद ( ' एवं ' शब्द ) से ' यतिथ्याम् ' इत्यादि प्रश्न और उसका उत्तर ग्रहण किये दा गये हैं । ' यतिथ्याम् ' इत्यादि प्रश्न और उत्तरका जितना भी परिग्रह है, उतना ही ' एवस् ' शब्दसे परामर्श सा करना उचित है, नहीं तो यह प्रश्न त्य | व्यर्थ हो जायगा; तथा अग्निहोत्र-सम्बन्धी पदार्थों की संख्या तो दि अच्छी तरहसे ज्ञात ही है, इसलिये द्म अग्नियोंका ही निर्देश करना न उचित है । शङ्का - अच्छी तरहसे ज्ञात विषय-का भी तो अनुवाद किया जाता है । ध समाधान- अनुवाद तो जो पदार्थ जैसा प्राप्त है, उसका उसी प्रकार करना उचित होता है, ऐसा नहीं कि वह द्युलोक अग्नि है । ' अ १. क्योंकि वास्तवमें तो द्युलोक अग्नि है नहीं; इसलिये यह अग्निके स्वरूप-का अनुवाद नहीं हो सकता । यहाँ तो द्युलोक में अग्निदृष्टि ही विवक्षित है ।