बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1331–1340

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340

पृष्ठ 1331

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अध्याय ६ य्य ' भर - भरकर द्वारा अपक्षय भक्षण करते हैं । चन्द्रलोकमेंशरीर अपने उपकरण-देवता भी पुन: -हुए - उन्हें कर्मा · 5, क्योंकि सोमके न यही उनका प्रकार [ आप्या-अपने उपकरण-देवगण उपभोग जिस समय उन सोमलोककी प्राप्ति दानादिरूप कर्म रसे चला जाता हो जाता है तो आकाशको ही ताते हैं । जो कि -हवन किया य आप सोमके हुआ रहता रा सोमलोक में शरीर आरम्भ ह आप कर्मोंका के सम्पर्क से पिघल जाता सूक्ष्म अर्थात् ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५ श्राकाशभूता इव भवन्ति । तदिदमुच्यत इममेवाकाशम-मिनिष्पद्यन्त इति । ते पुनरपि कर्मिणस्तच्छरीराः सन्तः पुरोवातादिना इतश्चामु-तश्च नीयन्तेऽन्तरिक्षगोस्तदाह--आकाश्चाद् वायुमिति ॥ वायो-र्दृष्टिं प्रतिपद्यन्ते; तदुक्तम् — पर्जन्याग्नौ सोमं राजानं जुह्वतीति 1 । ततो दृष्टिभूता इमां पृथिवीं पतन्ति । ते पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नं भवन्ति, तदुक्तम स्मिँल्लोकेऽग्नौ वृष्टि जुह्वति तस्या हुत्या अन्नं सम्भवतीति । ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्तेऽन्न-भूता रेतस्सिचि; ततो रेतोभूता योषाग्नौ हूयन्ते; ततो जायन्ते लोकं प्रत्युत्थायिनस्ते लोकं प्रत्युत्तिष्ठन्तोऽग्निहोत्रादिकर्मानु-तिष्ठन्ति । ततो धूमादिना पुनः पुनः सोमलोकं पुनरिमं लोक- । आकाशभूत - सा हो जाता है । इसीसे यह कहा जाता है कि वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभि-निष्पन्न होते हैं । वे आकाशशरीर हुए कर्मी फिर भी पूर्व वायु आदिसे अन्तरिक्ष-में इधर - उधर ले जाये जाते हैं, इसीसे श्रुति कहती है- ' आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं । ' ' वायुसे वृष्टिको प्राप्त होते हैं ', इसीसे ऊपर कहा है-- ' देवगण पर्जन्याग्निमें सोम राजाको हवन करते हैं । ' वहाँसे वे वृष्टिरूप होकर पृथिवीपर गिरते हैं । पृथिवीपर पहुँचकर वे व्रीहि एवं यवादि अन्न हो जाते हैं, इसीसे कहा है -- ' देवतालोग इस लोकरूप अग्नि में वृष्टिको होमते हैं, उस आहुति से अन्न होता है । ' अन्न होनेपर वे वीर्याधान करनेवाले पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं; फिर वीर्यरूप हुए स्त्रीरूप अग्निमें होम किये जाते हैं; तदनन्तर वे परलोकगमनके लिये उद्यत होकर जन्म लेते हैं; वे परलोकके प्रति उद्यत होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करते हैं । फिर घूमादिके क्रमसे पुनः पुनः सोमलोकको और पुनः इस लोकको

पृष्ठ 1332

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१३१६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय मिति । त एवं कर्मिणोऽनुपरि । वर्तन्ते घटीयन्त्रवच्चक्रीभूता बंभ्रमतीत्यर्थः - — उत्तरमार्गाय सद्योमुक्तये वा यावद् ब्रह्म न विदुः । " इति नु कामयमानः संसरति " इत्युक्तम् । अथ पुनर्य उत्तरं दक्षिणं चैतौ पन्थानौ न विदुरुत्तरस्य दक्षिणस्य वा पथः प्रतिपत्तये । ज्ञानं कर्म वा नानुतिष्ठन्तीत्यर्थः । ते किं भवन्ति १ इत्युच्यते— ते कीटाः पतङ्गा यदिदं यच्चेदं दन्दशूकं दंशमशकमित्येतद् भवन्ति ॥ एवं दीयं संसारगतिः कष्टा, अस्यां निमग्नस्य पुनरु-द्धार एव दुर्लभः तथा च श्रुत्यन्तरम् — " तानीमानि क्षुद्राण्य सकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्व " ( छा ० उ ० ५। १० । ८ ) इति । तस्मात् सर्वोत्साहेन यथा-शक्ति स्वाभाविक कर्मज्ञानहानेन दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं शास्त्रीयं कर्म ज्ञानं वानुतिष्ठ-६ प्राप्त होते रहते हैं । वे कर्मीलोग ब्राह इस प्रकार निरन्तर आते - जाते रहते हैं अर्थात् घटीयन्त्रके समात दि चक्राकार होकर घूमते रहते हैं, जबतक वे ब्रह्मको नहीं जानते तबतक उत्तरमागं अथवा सद्यो- ( ह मुक्ति के लिये इसी प्रकार भ्रमते " त रहते हैं । [ चतुर्थ अध्याय में ] ' कामना करनेवाला इस प्रकार उ संसरित होता रहता है ' ऐसा कहा श्रुत भी है । श्र और जो उत्तर या दक्षिण-इन दोनों ही मार्गोंको नहीं जानते, ग अर्थात् उत्तर या दक्षिण मार्गंकी इ प्राप्तिके लिये ज्ञान अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे क्या होते हैं, सो कहा जाता है । वे कीट, पतंग और जो ये दन्दशक अर्थात् डाँस और मच्छर आदि हैं, होते हैं । इस प्रकार यह संसारगति बड़ी कष्टमयी है । इसमें डूबे हुएका पुन: उद्धार होना ही दुर्लभ है । ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है - " वे ये क्षुद्र और निरन्तर आने - जानेवाले जीव होते हैं, जन्म लो और मर जाओ [ - ऐसा उनका तीसरा स्थान होता है ] । " अतः स्वाभाविक कर्म और ज्ञान-को छोड़कर पूर्ण उत्साहके साथ यथाशक्ति दक्षिण और उत्तरमा गौकी | प्राप्तिके साधनभूत शास्त्रीय कर्म और

पृष्ठ 1333

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[ श्रध्याय६ | वे कर्मी लोग तर आते - जाते टीयन्त्र के समान घूमते रहते हैं, नहीं जानते अथवा सद्यो -प्रकार भ्रमते अध्याय में ] ला इस प्रकार ना है ' ऐसा कहा या दक्षिण-को नहीं जानते, दक्षिण मार्गकी अथवा कर्मका , वे क्या होते ना है । वे कीट, दन्दशूक अर्थात् : आदि है, होते संसारगति बड़ी - डूबे हुएका पुनः लभ है । ऐसी ही हे - " वे ये क्षुद्र न - जानेवाले जीव और मर जाओ तीसरा स्थान कर्म और ज्ञान-उत्साह के साथ गौर उत्तरमागौकी शास्त्रीय कर्म और ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७ दिति वाक्यार्थः । तथा चोक्तम् -“ मतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम् " ( छा ० उ ० ५ । १० । ६ ) " तस्माज्जुगुप्सेत " ( छा ० उ ० ५ । १० । ८ ) इति श्रुत्यन्तरान्मोक्षाय प्रयतेतेत्यर्थः । अत्राप्युत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधन एव महान् यत्नः कर्तव्य इति गम्पते । एवमेवानुपरिवर्तन्त इत्युक्तत्वात् । एवं प्रश्नाः सर्वे निर्णीताः; ' असौ वै लोकः ' इत्यारभ्य पुरुषः सम्भवति ' इति चतुर्थः प्रश्नः ' यतिध्यामाहुत्याम् ' इत्यादिः प्राथम्येन । पञ्चमस्तु द्वितीयत्वेन देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वेति दक्षि-णोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनकथ-नेन । तेनैव च प्रथमोऽपि 1 । अग्नेरारभ्य केचिदचिः प्रति -शास्त्रीय ज्ञान ( उपासना ) का अनु-ष्ठान करे – ऐसा इस वाक्यका तात्पर्य है । ऐसा ही कहा भी है-" अतः इस व्रीहि - यवादिभावसे छूटना बड़ा कठिन है " " इसलिये इससे बचता रहे " इन दूसरी श्रुति-योंसे तात्पर्य यही है कि मोक्षके लिये प्रयत्न करे | उनमें भी उत्तर-मार्गकी प्राप्तिके साधन में ही महान् यत्न करना चाहिये - ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि । i धूमादि मार्गके विषयमें ] यह कहा गया है कि ' वे इस प्रकार निरन्तर आते - जाते रहते हैं । ' इस प्रकार सब प्रश्नोंका निर्णय हो गया । ' असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम ' यहाँसे लेकर ' पुरुषः सम्भवति ' इस स्थलतक ' यतिथ्यामाहुत्याम् ' इत्यादि चतुर्थ प्रश्नका पहले उत्तर दिया गया है । ' देवयान - मार्गकी प्राप्तिका साधन तथा पितृयानका साधन क्या है? इस पश्र्चम प्रश्नका दक्षिण और उत्तर मार्गकी प्राप्तिके साधन बतलाकर द्वितीय उत्तर-द्वारा निर्णय किया है । उसीसे प्रथम प्रश्नका भी उत्तर हो जाता है । [ अन्त्येष्टि - संस्कारके समय ] अग्निमें डाले जानेपर फिर वहाँ-| से कोई अचिरादि मार्गको प्राप्त १. पहला प्रश्न था ' क्या तू जानता है कि यह प्रजा मरकर किस प्रकार मार्गोंको प्राप्त होती है? ' उसका किस प्रकार निर्णय हुआ है — यह इस विभिन्न वाक्यसे बतलाया जाता है ।

पृष्ठ 1334

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१३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय पद्यन्ते केचिद् धूममिति विप्रति पत्तिः । पुनरावृत्तिश्च द्वितीयः प्रश्नं श्राकाशादिक्रमेणेमं लोक-मागच्छन्तीति । तेनैवासौ लोको न सम्पूर्यते कीटपतङ्गादिप्रति-पत्तेश्च केषांचिदिति तृतीयोऽपि प्रश्नो निर्णीतः ॥ १६ ॥

६ बाल | होते हैं और कोई घूमादिमार्गको- 66 इस प्रकार उन्हें विभिन्न मार्गोकी मन्थ प्राप्ति होती है । पुनरावृत्तिदूसरा प्रास प्रश्न है; उसका ' आकाशादि क्रम इस लोकमें आते हैं ' - इस प्रकार हि निर्णय किया गया है । इसीसे परलोक भरता नहीं है तथा कुछ कीट - पतंगादि योनियों को प्राप्त हो जाते हैं - इस लिये भी वह नहीं म भरता - इस प्रकार तीसरे प्रश्नका क भी निर्णय हो गया है ॥ १६ ॥

म स इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये द्वितीयं कर्मविपाकन्ब्राह्मणम् ॥ २ ॥ य

क तृतीय ब्राह्मण f म श्रीमन्थकर्म और उसकी विधि स यः कामयेत - ज्ञानकर्मणो । गत्तिरुक्ता । तत्र ज्ञानं स्वतन्त्रं कर्म तु दैवमानुषविचद्वयायचं तेन कर्मार्थं वित्तमुपार्जनीयम् । तच्चा-प्रत्यवायकारिणोपायेनेति तदर्थं ' स य: कामयेत'- ज्ञान और कर्म- प की गति बतला दी गयी । इनमें ज्ञान व स्वतन्त्र है, किंतु कर्म देव और मानुष — इन दो वित्तोंके अधीन है, द अतः कर्मके लिये वित्तोपार्जन करना चाहिये । वह भी, जो प्रत्यवाय न करनेवाला हो, उस मार्गंसे उपार्जन करना चाहिये । अतः उसके लिये

पृष्ठ 1335

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[ अध्याय६ घूमादिमार्गको-विभिन्न मार्गोको सुनरावृत्तिदूसरा नकाशादिक्रमसे हैं ' – इस प्रकार ना है । इसीसे कुछ नियोंको प्राप्त हो भी वह नहीं तीसरे प्रश्नका - है ॥ १६ ॥

तीयं ज्ञान और कर्म-गयी । इनमें ज्ञान कर्म देव और तोंके अधीन है, त्तोपार्जन करना जो प्रत्यवाय न मार्गसे उपार्जन तः उसके लिये ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१ ९ 55098370 मन्थाख्यं कर्मारभ्यते महत्त्व | महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थसंज्ञक कर्म आरम्भ किया जाता है । महत्त्व प्राप्तये; महश्वे च सत्पर्थसिद्धं होनेपर तो वित्त स्वतः सिद्ध ही हि वित्तम् तदुच्यते— है । इसीसे कहा जाता है-मन्थकर्मकी सामग्री और हवनविधि स यः कामयेत महत् प्राप्नुयामित्युद्गयन आपूर्य-माणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कसे चमसे वा सर्वोषधं फलानीति संभृत्य परिस-मुझ परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्य सँस्कृत्य पुसा नक्षत्रेण मन्थ संनीय जुहोति । यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् । तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा । या तिरची निपद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजे स ँ राधनी-मह ँ स्वाहा ॥ १ ॥

" जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूं, वह उत्तरायण में शुक्ल पक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती ( पयोव्रती ) होकर गूलरकी लकड़ी के कंस ( कटोरे ) या चमसमें सर्वोषध, फल तथा अन्य सामग्रियों-को एकत्रित कर, [ जहाँ हवन करना हो उस स्थानका ] ' परिसमूहन चारों एवं परिलेपन कर अग्नि स्थापन करता है और फिर अग्निके नाम ओर कुशा बिछाकर गृह्यसूत्रोक्त विधिसे घृतका संस्कारकर जिसका ] हो, उस [ हस्त आदि ] नक्षत्रमें मन्यको [ अपने और अग्निके पुँल्लिङ्ग १. कुशोंसे बुहारना ॥ २. गोबर और जलसे वेदीको लीपना

पृष्ठ 1336

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१३२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ बीचमें रखकर हवन करता है ॥ " यावन्तो ' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ- ब्राह्म हे जातवेदः! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी ] नाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग में काम. रम्य हवन करता हूँ । वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें- तुझमें स्वाहा ' । [ ‘ या तिरश्ची ' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ - ] ‘ मैं सबकी त्सु व मृत्युको धारण करनेवाला हूँ ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा टोमे आश्रय करके रहता है, सर्वसाधनोंकी पूर्ति करनेवाले उस देवता के लिये मैं घृतकी धारासे यजन करता हूँ-स यः कामयेत स यो वित्तार्थी कर्मण्यधिकृतो यः कामयेत; किम्? महन्महत्वं प्राप्नुयां महान् स्यामितीत्यर्थः । तत्र मन्थकर्मणो विधित्ति-तस्य कालोऽभिधीयते - उद्गय-नम् श्रादित्यस्य, तत्र सर्वत्र प्राप्तावापूर्यमाणपक्षस्य शुक्ल-पक्षस्य तत्रापि सर्वत्र प्राप्तौ पुण्याहेऽनुकूल आत्मनः कर्मसिद्धिकर इत्यर्थः । द्वादशाहं यस्मिन् पुण्येऽनुकूले कर्म चिकीर्षति ततः प्राक् पुण्याहमेवा -स्वाहा ॥ १ ॥ द्वारेण

घ वह जो कामना करे अर्थात् वह मिति जो वित्तार्थी और कर्मका अधिकारी कामना करे; क्या कामना करे? महत्- महत्त्व प्राप्त करूँ अर्थात् महान् हो जाऊँ - ऐसी कामना करे । विग्रह अब जिसका विधान करना ग्राह्यं अभीष्ट है उस मन्थकर्मका काल इति बतलाया जाता है - आदित्यके उच उदगयन - उत्तरायणमें होनेपर, उस उत्तरायणमें सर्वत्र प्राप्ति होती है, स्मात इसलिये कहते हैं ' आपूर्यमाणपक्षस्य ' शुक्लपक्षकी, उसमें भी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर कहते हैं- पुण्याहे ' –शुभ स्मात अर्थात् अपने कर्मकी सिद्धि करने-वाले दिनपर । ' द्वादशाहम्'– जिस पुण्य अर्थात् अनुकूल दिनपर कर्म करना चाहे उससे पूर्वं पुण्यदिवससे ही आरम्म कैसे क १. जहाँ - जहाँ ' स्वाहा ' आवे वहाँ आहुति देनी चाहिये । स्मृति

पृष्ठ 1337

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[ अध्याय६ मन्त्रका अर्थ- ] पुरुषकी काम-व्यभाग में तुझमें असे तृप्त करें-- ] ' में सबकी मति देवता तेरा स देवता के लिये करे अर्थात् वह कर्मका अधिकारी कामना करे? करूँ अर्थात् ती कामना करे । विधान करना थकर्मका काल है- आदित्यके में होनेपर, उस प्राप्ति होती है, पूर्यमाणपक्षस्य ' भी सर्वत्र प्राप्ति हैं- पुण्याहे ' - शुभ सिद्धि करने-' द्वादशाहम्'-त्अिनुकूल ना चाहे उससे ही आरम्भ ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ रम्य द्वादशाहमुपसद्व्रती - उपस-त्सु व्रतम्, उपसदःप्रसिद्धा ज्योति-ष्टोमे । तत्र च स्तनोपचयापचय-द्वारेण पयोभक्षणं तद्व्रतम् अत्र च तत्कर्मानुपसंहारात् केवल -मितिकर्तव्यताशून्यं पयोभक्षण-मात्रमुपादीयते । ननूपसदो व्रतमिति यदा विग्रहस्तदा सर्वमितिकर्तव्यतारूपं ग्राह्यं भवति तत् कस्मान्न परिगृह्यत इति? उच्यते - स्मार्तत्वात् कर्मणः स्मार्त हीदं मन्थकर्म । ननु श्रुतिविहितं सत् कथं स्मात भवितुमर्हति? स्मृत्यनुवादिनी हि श्रुति-१३२१ | करके बारह दिनतक उपसद्व्रती - जो व्रत उपसदोंमें किया जाता है, ज्योतिष्टोम यागमें ' उपसद् ' नामकी इष्टियां प्रसिद्ध हैं । उनमें स्तनोंके उपचय और अपचयके द्वारा दुग्ध-का आहार किया जाता है; वह उपसद्व्रत कहलाता है । किंतु यहाँ उस कर्मका उपसंहार ( संग्रह ) नहीं किया गया है, इसलिये केवल - ' इति-कर्तव्यता से रहित पयोभक्षणमात्र ही ग्रहण किया जाता है । शङ्का - किंतु यदि ' उपसद्व्रती ' इस समस्त पदका उपसद् - रूप ही व्रत ' ऐसा विग्रह किया जाय तब तो सारा ही इतिकर्तव्यतारूप कर्म ग्रहण किया जाना चाहिये, सो वह क्यों ग्रहण नहीं किया जाता? समाधान- बतलाते हैं - मन्थकर्म स्मार्त होनेके कारण । यह मन्थकर्म स्मार्त है [ अतः यहाँ वैदिक ' उपसद्-व्रत ' का ग्रहण नहीं हो सकता ] । शङ्का - किंतु श्रुतिविहित होकर भी यह स्मार्त कैसे हो सकता है? समाधान - यह श्रुति स्मृतिका अनुवाद करनेवाली ही है । यदि इसे १. अर्थात् स्तनोंके उपचय - अपचयसे रहित । २. यदि कहें, श्रुति तो स्मृति से पहले प्रकट हुई है, अत: वह स्मृतिका अनुवाद कैसे कर सकती है? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति त्रिकालविषयिणी है, अतः स्मृतिका अनुवाद भी उसके द्वारा सम्भव है ।

पृष्ठ 1338

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१३२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय रियम्; श्रौतस्वे हि प्रकृतिविकार भावस्ततश्च प्राकृतधर्मग्राहित्वं विकारकर्मणो न त्विह श्रौतत्वम्; श्रत एव चावसथ्याग्नावेतत् कर्म विधीयते; सर्वा चावृत् स्मार्वैवेति । उपसद्व्रती भूत्वा पयोव्रती सन्नित्यर्थः । श्रदुम्बर उदुम्बर-वृक्षमये कैसे चमसे वा तस्यैव विशेषणं कंसाकारे चमसाकारे बौदुम्बर एव । आकारे तु विकल्पो नौदुम्बरत्वे । अत्र सर्वोषधं सर्वासामोषधीनां समूहं यथासम्भवं, यथाशक्ति च सर्वा श्रोषधीः समाहृत्य तत्र ग्राम्याणां तु दश नियमेन ग्राह्या व्रीहि-यवाद्या वक्ष्यमाणाः । अधिक-ग्रहणे तु न दोषः । ग्राम्याणां ६ श्रोत माना जायगा तो ज्योतिष्टो ब्राह्म मकर्मके साथ इसका ' प्रकृति.. विकारभाव सम्बन्ध होगा, ऐसी फला | स्थितिमें विकारभत कर्ममें प्राकृत शक्त [ ज्योतिष्टोम ] कर्मके इतिकर्तव्यता- म्भार रूप धर्मोंका ग्रहण करना आवश्यक दपि होगा; किंतु [ यहाँ परिसमूहन-परिलेपनादिका सम्बन्ध रहने के सम्भृ को कारण ] यह श्रौतकर्म नहीं है; अतः इस कर्मका विधान आव पा सथ्याग्नि में ही है । तथा इसमें संस्क समस्त आवृत् ( इतिकर्तव्यता ) स्मार्त ही है । वचन उपसती होकर अर्थात् पयो- ते; व्रती होकर ' औदुम्बरे ' —— उदुम्बर • वृक्षमय कंस या चमसमें; उस णाच्च प्रकृत पात्रका ही यह विशेषण है-नम् कंसाकार अथवा चमसाकार औदुम्बरपात्रमें ही । अर्थात् विकल्प स्मात केवल आकार में ही है औदुम्बर ( गूलरका ) होने में नहीं । उसमें का सर्वौषध-- सम्पूर्ण औषधियों के त्य, समूहको अर्थात् यथासम्भव और नक्षत्र यथाशक्ति सभी ओषधियोंको लाकर उनमें ग्राम्य ओषधियोंमेंसे तो सर्वो आगे बतायी जानेवाली व्रीहि - यवादि द दश ओषधियां तो अवश्य लेनी कयो चाहिये; अधिक लेने में तो कोई । दोष है ही नहीं; तथा यथासम्भव मध्ये १. प्रकृतभूत कर्म समग्र अङ्गोंसे युक्त होता है और विकारभूत कर्म अङ्ग होता । श्रीत माननेसे यह ज्योतिष्टोमरून प्रकृतिका विकार होगा ।

पृष्ठ 1339

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[ अध्याय६ गा तो ज्योतिष्टो. इसका प्रकृति-+ बन्ध होगा, ऐसी भत कर्ममें प्राकृत के इतिकर्तव्यता-ण करना आवश्यक - यहाँ परिसमूहन-सम्बन्ध रहने के श्रौतकर्म नहीं है; का विधान आव है । तथा इसमें ( इतिकर्तव्यता ) होकर अर्थात् पयो-बौदुम्बरे ' -- उदुम्बर-या चमसमें; उस ही यह विशेषण है-थवा चमसाकार ही । अर्थात् विकल्प में ही है औदुम्बर होनेमें नहीं । उसमें र्णं औषधियों के - यथासम्भव और ओषधियों को लाकर ओषधियों से तो नेवाली व्रीहि - यवादि तो अवश्य लेनी क लेने में तो कोई ; तथा यथासम्भव चारभूत कर्म अङ्गहीन र होगा । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३ फलानि च यथासम्भवं यथा शक्ति च । इतिशब्दः समस्तस-म्भारोपचय प्रदर्शनार्थः, अन्य दपि यत् सम्भरणीयं तत् सर्वं सम्भृत्येत्यर्थः । क्रमस्तत्र गृह्यो-को द्रष्टव्यः । परिसमूहन परिलेपने भूमि-संस्कारः । अग्निमुपसमाधायेति वचनादावसथ्येऽग्नाविति गम्य- । ते; एकवचनादुपसमाधानश्रव-णाच्च । विद्यमानस्यैवोपसमाधा-नम् । परिश्वीर्य दर्भानावृता, स्मार्तत्वात् कर्मणः स्थालीपा-कात् परिगृह्यते तयाज्यं संस्कृ-त्य, पुंसा नक्षत्रेण पुंनाम्ना नक्षत्रेण पुण्याहसंयुक्तेन मन्थं सर्वौषधफलपिष्टं तत्रैौदुम्बरे चमसे दधनि मधुनि घृते चोपसिच्यै-कयोपमन्थन्योपसम्मथ्य संनीय मध्ये संस्थाप्यौदुम्बरेण सुवेणा १. बुहारना और लीपना ॥ और यथाशक्ति ग्राम्य फल भी लाकर । मूलमें ' इति ' शब्द समस्त सामग्रीका संग्रह प्रदर्शित करने के लिये है; तात्पर्य यह कि और भी जो संग्रह करने योग्य वस्तु हो, उसका संग्रह करके । इसका क्रमः गृह्यसूत्रोंमें देखना चाहिये । परिसमूहन और परिलेपर्न - ये भूमिके संस्कार हैं । ' अग्निमुपसमा-धाय ' अग्निका उपसमाधान--स्थापन कर - इम वचनसे ज्ञात होता है कि गृह्य अग्नि में होम करे; क्योंकि यहां अग्निम् ' ऐसा एकवचन है और उपसमाधान श्रुत है । विद्य-मान अग्निका ही उपसाधन होता है । दर्भों को बिछाकर, ' आवृ-ता ' – विधिसे, यह कम स्मार्त है, इसलिये यहाँ स्थालीपाकरूप विधि गृहीत होती है । उससे घीका संस्कार कर, ' पुसा नक्षत्रेण ' –— पुँल्लिङ्ग नामवाले नक्षत्र में जो पुण्यतिथिसे युक्त हो मन्यको -- सम्पूर्णं ओष-धियोंके पिष्ट - पिण्डको उस औदुम्बर चमसमें दही, मधु और घृतमें डाल-कर एक मथानीसे मथकर फिर अपने और अग्निके मध्य में स्थापित । करे । फिर गुलरके स्रु वासे ‘ यावन्तो

पृष्ठ 1340

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१३२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ वापस्थान आाज्यस्य जुहोत्येतैर्म- देवा: ' इत्यादि मन्त्रोंसे आवापस्या-स्त्रैर्याव- तो देवा इत्याद्यैः ॥ १ ॥ | नमें घृतसे हवन करे ॥ १ ॥

हवनके मन्त्र ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्ये सँ स्त्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्य-ग्नौ हुला मन्थे सँ स ँ स्त्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रति-ष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स ँ स्त्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे मन्थे स स v स्त्रवमवन-यति श्रोत्राय स्वाहायतनाय स्वाहेत्यनौ हुत्वा मन्ये स ँ स्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स ँ स्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स ँ स्रवमवनयति ॥ २ ॥

' ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रव-को ( स्रु वामें बचे हुए घृतको ) मन्थमें डाल देता है । ' प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' मनसे स्वाहा प्रजात्ये स्वाहा ' इस मन्त्र से अग्नि में हवन संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' रेतसे स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ २ ॥

अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स स्त्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स ँ स्रवमवनयति भूः हुत्वा ब्राह्मण मन्थे स ँस स मन्थे मन्थे I मन्थे I मन्थे I मन्थे I मन्थे I मन्थे मन्थे I " अ डाल द मन्थ में मन्थ में संस्रवक करके अग्नि म मन्त्रसे इसम स्वाहा ' भविष देता ह डाल मन्थ म संस्रव