बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1341–1350

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1341–1350

पृष्ठ 1341

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( अध्याय६ त्रोंसे आवापस्था • रे ॥ १ ॥

हुत्वा मन्ये स्वाहेत्य-स्वाहा प्रति-नयति चक्षुषे स्त्रवमवन-हुत्वा मन्ये स्वाहेत्यनौ स्वाहेत्यग्नौ हवन करके संस्रव-' प्राणाय स्वाहा, को मन्थमें डाल हवन करके स्वाहा ' इस मन्त्रसे - ' श्रोत्राय स्वाहा नवको मन्थमें डाल निमें हवन करके त्रसे अग्नि में हवन मन्थे स मन्थे हुत्वा बग्नौ हुत्वा ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२५ मन्थे स ँस्त्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौहुत्वा मन्थे स ँस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्त्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुला मन्थे सत्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ मन्थे सत्रवमवनयति मन्थे स ँ स्त्रवमवनयति मन्थे सत्रवमवनयति मन्थे स ँ स्त्रवमवनयति हुत्वा क्षत्त्राय स्वाहेत्यग्नौहुत्वा भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा भविष्यते स्वाहेत्यग्नौहुखा विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे स ँ स्त्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवनयति ॥ ३ ॥

' अग्नये स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' सोमाय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थ में डाल देता है । ' भूः स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रवको मन्थ में डाल देता है । ' भुव: स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थ में डाल देता है । ' स्वः स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' भूर्भुवः स्वः स्वाहा ' इस मन्त्र से अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' ब्रह्मणे स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' क्षत्त्राय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' भूताय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' भविष्यते स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्यमें डाल देता है । ' विश्वाय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' सर्वाय स्वाहा ' इस मन्त्रसे अग्नि में हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है । ' प्रजापतये स्वाहा ' इस मन्त्र से अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1342

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१३२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहे-त्यारभ्य द्वे द्वे आहुती हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति । स्रुव -लेपनमाज्यं मन्थे संस्स्रावयति । एतस्मादेव ज्येष्ठाय श्रेष्ठायेत्यादि-" प्राणलिङ्गाज्ज्येष्ठश्रेष्ठादिप्राणविद एवास्मिन् कर्मण्यधिकारः । रेतस इत्यारभ्यैकैका माहुति हुत्वा मथे संस्रवमवनयत्यपरयोपमन्थन्या-नर्मध्नाति ॥ २-३ ॥ ६ ' जेष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय बाह | यहाँसे लेकर दो - दो आहुतियां स्वाहा ' स्तब्ध करके संस्रवको मन्यमें डाल हवन देता एक है । अर्थात् स्रु वासे लगे हुए है, घृतको - उद्गात मन्थमें गिरा देता है । इस ' ज्येष्ठाय मध्य म श्रेष्ठाय ' इत्यादि प्राणके लिखसे ही और यह निश्चय होता है कि इस कर्ममें प्रकार है, तू ज्येष्ठ - श्रेष्ठादिरूप प्राणोपासकका हो तथ अधिकार है । ' रेतसे स्वाहा ' यहाँ- श्र से लेकर एक - एक आहुति हवन करके मन्थमें संस्रव डालता है । फिर दूसरी उपमथानीसे उसका 1 मन्थन करता है ॥ २-३ ॥ अ शान मन्थाभिमर्शका मन्त्र f मन्त्रव अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि महिम है । व प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिङ्कृतमसि हिक्रियमाण--मस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याचा- इस्ते वितमस्याद्रे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि त्यने ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥

इसके पश्चात् उस मन्थको ' भ्रमदसि ' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है । [ मन्यद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होने के कारण वह सर्वात्मक है " भ्रमदसि ' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है-ऋत तू [ प्राणरूपसे सम्पूर्ण देहोंमें ] भ्रमनेवाला है, [ अग्निरूपसे सर्वत्र ] प्रचलित होनेवाला है, [ ब्रह्मरूपसे ] पूर्णं है, [ आकाशरूपसे ] अत्यन्

पृष्ठ 1343

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[ अध्याय६ हा श्रेष्ठाय -दो स्वाहा ' आहूतियाँ हवन मन्थमें डाल देता से लगे हुए घृतको ना है । इस ' ज्येष्ठाय प्राणके लिङ्गसे ही है कि इस कर्म प्राणोपासकका ही = रेतसे स्वाहा ' यहां-एक आहुति हवन संस्रव डालता है । पानी से उसका है ॥ २-३ ॥ न्दसि पूर्णमसि हेक्रियमाण-नसि प्रत्याश्रा-भूरस्यन्नमसि ४ । त्रद्वारा स्पर्श करता णसे एकरूप होने के वर्थ इस प्रकार है- ] अग्निरूपसे सर्वत्र ] काशरूप से ] अत्यन्त ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७ स्तब्ध ( निष्कम्प ) है, [ सबसे अविरोधी होनेके कारण ] तू यह एक सभाके समान है, तू ही [ यज्ञके आरम्भ में प्रस्तोताके द्वारा ] हिङ्कृत जगद्रूप है, तथा. [ उसी प्रस्तोताद्वारा यज्ञमें ] तू ही हिङ क्रियमाण है, [ यज्ञारम्ममें उद्गाताद्वारा ] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ हे और [ यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा ] तू ही उद्गीयमान है । तू ही [ अध्वर्यु द्वारा ] श्रावित और [ आग्नीध्रद्वारा ] प्रत्याश्रावित है; आर्द्र [ अर्थात् मेघ ] में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु ( विविध रूप होनेवाला ) है और प्रभु ( समर्थ ) है, तू [ भोक्ता अग्निरूपसे ] ज्योति है, [ कारणरूपसे ] सबका प्रलयस्थान है तथा [ सबका संहार करनेवाला होनेसे ] संवर्ग है ॥ ४ ॥

अथैनमभिमृशति भ्रमदसीत्य- इसके पश्चात् ' भ्रमदसि ' इत्यादि नेन मन्त्रेण ॥ ४ ॥ मन्त्रसे इसे स्पर्श करता है ॥ ४ ॥

मन्थको उठानेका मन्त्र अथैनमुयच्छत्याम ँ स्याम ' हि ते महि स हि राजे-शानोऽधिपतिः समा राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति । ५ । फिर ' आमंसि आमंहि ' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता है । [ इस मन्त्रका अर्थ - ] ' आमंसि ' तू सब जानता है, ' आमंहि ते महि ' - मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता हूँ । वह प्राण राजा, ईशान और अधिपति है । वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥

श्रथैनमुद्यच्छति सह पात्रेण इसके पश्चात् ' आमंस्यामहि ते हस्ते गृह्णात्या मंस्यामंहि ते मही- महि ' इत्यादि मन्त्रसे उसे पात्रके त्यनेन ॥ ५ ॥ सहित हाथपर ऊपर उठाता है ॥ ५ ॥

wwwwww मन्थभक्षणकी विधि अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यम् । मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः 1 ।

पृष्ठ 1344

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१३२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ ब्राह्मण भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि । मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिव रजः । मधु चौरस्तु नः पिता । भवन्तु ' I [ इतने भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् । मधुमान्नो सावित्री वनस्पतिर्मधुमा अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु ऋचा स्वाहा ' नः । स्वः स्वाहेति ॥ सर्वां च सावित्री मन्वाह सर्वाश्च घो ' दिशा अ म मधुमतीरहमेवेद सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्य- उपस्था उसीसे न्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्नि प्राक्शिराः वंशको संविशति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीक- श्र मस्यहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य गायत्र कया जघनेनाग्निमासीनो व शं जपति ॥ ६ ॥ ग्रासम

द्विती • इसके पश्चात् ' तत्सवितुर्वरेण्यम् ' इत्यादि मन्त्रसे इस मन्थको भक्षण द्विती करता है । [ ' तत्सवितु: ' इत्यादि मन्त्रका अर्थ - ] ' तत्सवितुर्वरेण्यम् ' - ग्रासम सूर्यके उस वरेण्य - श्रेष्ठ पदका मैं ध्यान करता हूँ । ' वातामधु ऋतायते ' - पादे हवा मधुर मन्द गतिसे बह रही है । ' सिन्धवः मधु क्षान्ति'- नदियां मधु- तृती रसका स्राव कर रही हैं । ' नः ओषधी! माध्वी ' सन्तु ' – हमारे लिये ग्रास ओषधियाँ मधुर हों । ' भूः स्वाहा: ' [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे मन्थका पहला मधुम प्रास भक्षण करे । ] ' देवस्य भर्गः धीमहि ' - हम सवितादेवके तेजका समि ध्यान करते हैं । ' खनक्तमुत उषसः मधु ' — रात और दिन सुनेकर ख हों । स्वा ‘ पार्थिवं रजः मधुमत्’— पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों । ‘ द्यौः पिता नः मधु अस्तु ' - पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो । ' भुवः सर्वं स्वाहा ' [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण करे ] । ' यः नः धियः प्रचोदयात् ' -- जो सवितादेव हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है । वनस्पतिः मधुमान् ’ -- हमारे लिये वनस्पति ( सोम ) मधुर रसमय हो । एक ' सूर्यः मधुमान् अस्तु ' -- सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो । ' गावः नः माध्वीः

पृष्ठ 1345

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[ अध्याय६ क्तमुतोषसो नः पिता । मधुमान्नो वो भवन्तु चाह सर्वाच बः स्वाहेत्य-प्राक्शिराः कपुण्डरीक-यथेतमेत्य मन्थको भक्षण नवितुर्वरेण्यम्'-मधु ऋतायते ' -' नदियां मधु-तु ' — हमारे लिये मन्थका पहला तादेव के तेजका दन सुनकर ख हों । नेवाले हों । ' द्यौः कर हो । ' भुवः ] । ' यः नः धियः करता है । ' नः धुर रसमय हो । गावः नः माध्वीः ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२ ९ भवन्तु ' - किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर हों । ' स्वः स्वाहा ’ [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे तृतीय ग्रास भक्षण करे ] । इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री ( गायत्रीमन्त्र ), ' मधु वाता ऋतायते ' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और ' अहमेवेदं सर्वं भूयासम् ' ( यह सब मैं ही हो जाऊँ ) ' भूर्भुवः स्वाहा ' इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण कर दोनों हाथ घो अग्नि पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर सिर करके बैठता है । प्रातःकालमें ' दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं.... भूयासम् " इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान ( नमस्कार ) करता है । फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको जपता है ॥ ६ ॥

श्रयैनमाचामति भक्षयति । गायत्र्याः प्रथमपादेन मधुमत्यै-कया व्याहृत्या च प्रथमया प्रथम-ग्रासमाचामति; तथा गायत्री-द्वितीयपादेन मधुमत्या द्वितीयया द्वितीयया च व्याहृत्या द्वितीयं ग्रासम्; तथा तृतीयेन गायत्री पादेन तृतीयया मधुमत्या तृतीयया च व्याहृत्या तृतीयं ग्रासम् | सर्वां सावित्रीं सर्वाश्च मधुमती रुक्त्वाहमेवेदं सर्व भूया समिति चान्ते भूर्भुवः स्वः स्वाहेति समस्तं भक्षयति । यथा चतुर्भिर्ग्रासैस्तद् द्रव्यं सर्वं परिसमाप्यते तथा पूर्वमेव १. तू दिशाओंका एक पुण्डरीक एक पुण्डरीक होऊँ । वृ ० उ०- ८४ इसके पश्चात् वह मन्थको भक्षण करता है । गायत्री के प्रथम पाद, एक मधुमती ऋचा और एक व्याहृतिसे प्रथम ग्रास खाता है तथा गायत्री के द्वितीय पाद, द्वितीय मधुमती ऋचा और द्वितीय व्याहृ-तिसे दूसरा ग्रास खाता है और गायत्रीके तृतीय पाद, तृतीय मधुमती ऋचा और तृतीय व्याहृति-से अन्तमें तीसरा ग्रास भक्षण करता है । फिर समस्त गायत्री, सम्पूर्णं मधुमती ऋचा और ' मैं ही यह सब हो जाऊँ ' ऐसा कहते हुए ' भूर्भुवः स्वः स्वाहा ' ऐसा कहकर समस्त मन्थको भक्षण कर जाता है । वह सारा द्रव्य जिस प्रकार चार | ग्रासोंमें समाप्त हो जाय इसका पहले [ अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ ] है, मैं मनुष्योंमें

पृष्ठ 1346

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१३३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय निरूपयेत् । यत्पात्रावलिप्तं तत् पात्रं सर्वं निर्णिज्य तूष्णीं पिबेत् । पाणी प्रक्षाल्याप आचम्य जघ-नेनाग्नि पश्चादग्नेः प्राक्शिराः संविशति । प्रातः संध्यामुपास्या-दित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्ड-रीकमित्यनेन मन्त्रेण । यथेतं यथा-• गतमेत्यागस्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥

६ । ही विभाग कर ले । जो कुछ पात्रमें ब्राह्मण | लगा रह जाय उस पात्रको धोकर उस उस सबको चुपचाप पी जाय उपदेश व फिर दोनों हाथ धोकर जलसे । शाखाएँ आचमन कर ' जघनेन अग्निम् ' अर्थात् अग्निके पश्चिम भागमें ऽन्तेव पूर्वकी ओर शिर करके बैठता है । ञ्चेज प्रातःकालिक संध्योपासन कर दिशामेकपुण्डरीकमसि ' इस मन्त्र- उस से आदित्यका उपस्थान करता है । उपदेश फिर जिस मार्गंसे गया था उसीसे शाखाएँ लौटकर अग्नि के पश्चिम भागमें बैठकर [ इस ] वंशको जपता यान्ते है ॥ ६ ॥ निषि

मन्थकर्मका वंश. उस उपदेश तँ हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्या- शाखाए यान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरशाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥

लाय उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य वाजसनेय निषि याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, ' यदि कोई इस मन्थको सूखे हूँ ठपर डाल देगा तो उससे शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल उ आयेंगे ' ॥ ७ ॥ उपदेश

एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय शाखा पैङ्गयायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँ शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरशाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥ चाच

पृष्ठ 1347

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[ अध्याय६ जो कुछ पात्रमें पात्रको घोकर पी जाय । धोकर जलसे वनेन अग्निम् पश्चिम भाग में रके बैठता है । योपासन कर ' स ' इस मन्त्र-यान करता है । 1 या था उसीसे श्चिम भागमें वंशको जपता ज्ञवल्क्या-के स्थाणौ ते ॥७ ॥

न्य वाजसनेय सूखे हूँ ठपर पत्ते निकल मधुकाय के स्थाणौ ॥८ ॥

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३१ उस इस मन्थका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैनयको उपदेश करके कहा था, ' यदि कोई इसे सूखे ठूंठ पर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ' ॥ ८ ॥

एतमु हैव मधुकः पैङ्गचरचूलाय भागवित्तये-ऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन - शुष्के स्थाणौ निषि-ञ्चेजायेरशाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ६ ॥

उस इस मन्थका मधुक पेजयने अपने शिष्य चूल भागवित्तिको उपदेश करके कहा था, ' यदि कोई इसे सूखे हूँ ठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ' ॥ ६ ॥

एतमु हैव चूलो भागवित्तिजनकय आयस्थूणा-यान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरशाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥

उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, ' यदि कोई इसे सूखे हूँ ठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ' ॥ १० ॥

एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबा-लायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषिञ्चज्जायेरशाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥

उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, ' यदि कोई इसे सूखे हूँ ठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे ॥ ११ ॥

उक्त्वो. एतमु हैव सत्यकाम जाबालोऽन्तेवासिभ्य चाचापि य एन शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरशाखाः

पृष्ठ 1348

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१३३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्राह्मण प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥ । विद्या

उस इस मन्थका सत्यकाम जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश मिह सप्र करके स्पाधिग कहा था, ' यदि कोई इसे सूखे ठँ ठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ हो जायेंगी और पत्ते निकल आयेंगे न हो, उसे उपदेश न करे ॥ १२ ॥

तं तमुद्दालक इत्यादि सत्य-कामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उ-क्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणों निषिञ्चेज्ञायेरन्नेवास्मिञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीत्येवमन्तमेनं मन्थमुद्दालकात् प्रभृत्येकैकाचार्य-क्रमागतं सत्यकाम आचार्यो बहु-भ्योऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाच । किमन्यदुवाचेत्युच्यते - अपि य एनं शुष्के स्थाणौ गतप्राणेऽप्येनं मन्थं भक्षणाय संस्कृतं निषिश्चेत् प्रक्षिपेज्जायेरन्नुत्पद्येरन्नेवास्मिन् स्थाणौ शाखा अवयवा वृक्षस्य प्ररोहेयुश्च पलाशानि पर्णानि - यथा जीवितः स्थाणोः किमुता-नेन कर्मणा कामः सिध्येदिति । ध्रुवफलमिदं कर्मेति कर्मस्तुत्यर्थ । मेतत् ॥ ' उस इस मन्थका जो पुत्र या उत्पन्न शिष्य पुत्रवान्त ' तं हैतमुद्दालकः ' यहाँसे आरम्भ करके ' सत्यकामो जाबालोऽन्तेवा-सिभ्य उक्त्वोवाचापि... प्ररोहे: मस पलाशानि ' यहाँतक उद्दालकसे ग्राम्य कर एक - एक आचार्य के क्रम प्रियङ्क प्राप्त हुए इस मन्थका सत्यकाम तान् । जाबालने बहुत - से शिष्योंको उप-देश करके कहा । और क्या कहा, जुहो सो बतलाया जाता है— ' यदि कोई यह इसमें अ भक्षण के लिये संस्कार किये गये औदुम्बर इस मन्थको किसी शुष्क – गतप्राण इसमें स्थाणु ( ठूंठ ) पर भी डाल दे प्रियङ्गु तो इस इठमें शाखाएँ - वृक्षके ( कुलथी अवयव उत्पन्न हो जायँगे और पत्ते और घु भी निकल आयेंगे,, जैसे कि जीवित चतुर स्थाणु ( हरे ठूंठ ) में होत हैं; फिर इस कर्मसे यदि कामनाक व्याख्य सिद्धि हो जाय तो कौन बड़ी बात धान्या है? तात्पर्य यह है कि यह कर्म १. निश्चित फल देनेवाला है - इस प्रिय पुत्र प्रकार यह उक्ति कर्मकी स्तुति के लिये है ।

पृष्ठ 1349

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[ अध्याय ६ वानन्तेवासिने को उपदेश करके नमें शाखाएँ उत्पन्न - जो पुत्र या शिष्य कः ' यहाँ से आरम्भ जाबालोऽन्तेवा-चापि...... प्ररोहेयुः दाँतक उद्दालकसे आचार्य के क्रमसे मन्थका सत्यकाम शिष्योंको उप-और क्या कहा, ना है - ' यदि कोई स्कार किये गये - शुष्क - गतप्राण पर भी डाल दे शाखाएँ - वृक्षके जायेंगे और पत्ते जैसे कि जीवित ६ ) में होत हैं । यदि कामना की कौन बड़ी बात है कि यह कर्म विवाला है - इस कर्मकी स्तुतिके ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३ विद्याधिगमे पटतीर्थानि तेषा- विद्याप्राप्तिके छः ' तीर्थ ( अघि-मिह सप्राणदर्शनस्य मन्थविज्ञान- कारी ) हैं, उनमें से इस प्राणदर्शन-स्याधिगमे द्वे एव तीर्थे अनुज्ञायेते युक्त मन्थविज्ञान की प्राप्तिको अनुज्ञा पुत्रश्चान्तेवासी पुत्र और शिष्य दो ही तीर्थों के च ॥ ७-१२ ॥ | लिये है ॥ ७-१२ ॥ मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः खुव औदुम्बरश्च-मस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणु-प्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान्ं पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥

यह मन्थकर्म चतुरीदुम्बर ( चार औदुम्बर काष्ठके पदार्थोंवाला ) है ।. इसमें औदुम्बरकाष्ठ ( गूलरकी लकड़ी ) का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं । इसमें व्रीहि ( धान ), यव ( जौ ), तिल, माष ( उड़द ), अणु ( साँवा ), प्रियङ्गु ( काँगनी ), गोधूम ( गेहूँ ), मसूर, खल्व ( बाल ) और खलकुल ( कुलथी ) - दश ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते हैं । उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमें मिलाकर घृतसे हवन करता है ॥ १३ ॥

भवतीति ' चतुरौदुम्बरो भवति ' इस वाक्य-चतुरौदुम्बरो की व्याख्या श्रुतिने स्वयं की है । व्याख्यातम् । दश ग्राम्याणि दश ग्राम्य धान्य होते हैं । हम पहले धान्यानि भवन्ति ग्राम्याणां कह चुके हैं कि ग्राम्य धान्योंमेंसे १. शिष्य, वेदाध्यायी श्रोत्रिय, धारणाशक्तिसम्पन्न पुरुष, धन देनेवाला, प्रिय पुत्र और जो एक विद्या सीखकर दूसरी सिखानेवाला हो -- ये छ: विद्यादान-के अधिकारी हैं ।

पृष्ठ 1350

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१३३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय तु धान्यानां दश नियमेन ग्राह्या इत्यवोचाम । के त इति निर्दिश्यन्ते — व्रीहियवास्तिल-भाषा अणुप्रियङ्गवोऽणवश्चा-णुशब्दवाच्याः । क्वचिद्देशे प्रिय-ङ्गवः प्रसिद्धाः कङ्गुशब्देन । खल्वा निष्पावा वल्लशब्दवाच्या लोके खलकुलाः कुलत्थाः । एतद् व्यतिरेकेण यथाशक्ति सर्वोषधयो-ग्राह्याः फलानि चेत्यवोचामाया-ज्ञिकानि वर्जयित्वा ॥ १३ ॥

६ दश तो अवश्य ग्रहण करने ब्राह्म वे कौन - से हैं, सो बतलाये चाहिये ।जाते पितु हैं- व्रीहि, यव, तिल, माष प्रियङ्गु, ‘ अणु ' शब्दके वाच्य, असू तत्स ( चावलों का एक भेद ) है तथा प्रियङ्गु किसी - किसी देशमें प्राण कडू ( काँगनी ) शब्दसे प्रसिद्ध है । खल्व या निष्पाव लोकमें वल्ल पुत्रम ( बाल ) शब्दसे कहे जाते है । खलकुल कुलत्थों ( कुलथी ) को मन्थ कहते हैं । इनके अतिरिक्त बो यज्ञसम्बन्धी नहीं हैं, उन्हें छोड़कर कृत्क यथाशक्ति सभी ओषधियां और फल लेने चाहिये -- - - यह हम कह इस्पे चुके हैं ॥ १३ ॥

स्तुत इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये तृतीयं श्रीमन्थब्राह्मणम् ॥ ३ ॥ डप

फ चतुर्थ ब्राह्मण सन्तानोत्पत्ति - विज्ञान अथवा पुत्रमन्थ कर्म ' ओष ( अ याग्जन्मा यथोत्पादितो | जिस प्रकार जन्म लेनेवाला, जिस विधिसे उत्पन्न किया हुआ अथवा जिन यर्वा गुणैर्विशिष्टः पुत्र आत्मनः | गुणोंसे विशिष्टताको प्राप्त हुआ पुत्र पृथि १. पूर्वोक्त तीसरे ब्राह्मण में धनार्थी प्राणोपासकके लिये ' श्रीमन्थ ' कर्मका मि विधिपूर्वक वर्णन किया गया है; अब इच्छानुसार सद्गुणयुक्त संतान उत्पन्न करनेकी । रस युक्ति बतानेके लिये ' पुत्रमन्थ ' कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं ।