बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 31–40

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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पृष्ठ. ... १२७६. १२८१ ना ... १२८३. हना १२८४ T १२८४ १२८६ चित्र - सूची १२८८. १२६४ १२६ . १२६८. ... १२६६. ' १३०१ १३०२: १३११ . १३१८ • १३१६. १३२४ .. १३२६ · १३२७ - १३२७. • १३३० - १३३३ १ – भाष्यकार भगवान् शंकर २ - मैत्रेयीको उपदेश ३ – ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्य ४- शाकल्यका शिर गिरना ५ — जनक - याज्ञवल्क्य - संवाद ६ – प्रवाहणकी सभा में श्वेतकेतु पृष्ठ ( तिरंगा ) २६ " ५४७. 11 ६२२ " ८१८ 13 ८४१ 31 १२७६ ' १३३४ः १३६१. १३६३

पृष्ठ 32

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यस्मिन्नापूर्यमाणे पतति करतला-च्छङ्करस्यापि शूलं त्रासादुद्भ्रान्तचित्ता रविरथतुरगा भ्रष्टमार्गाः प्रयान्ति । ब्रह्मा ब्रह्माण्डभाण्डस्फुटनपरिभया-त्स्तौति नारायणाख्यं सोऽस्मान्पायात्सुनादो वदनविनिहितः पाञ्चजन्यो मुरारेः ॥

पृष्ठ 33

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शूलं मान्ति । गाख्यं इतः रारेः ॥

पृष्ठ 34

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बृहदारण्यकोपनिषद् क ( ह भाष्यकार भगवान् शङ्कर

पृष्ठ 35

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ॐ तत्सद्द्ब्रह्मणे नमः बृहदारण्यकोपनिषद मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

शङ्करः शङ्कराचार्यः सद्गुरुः शर्वसन्निभः ।

सर्वेषां शङ्कराः सन्तु सच्चिदानन्दरूपिणः ॥

शान्तिपाठ

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! ॐ वह ( परब्रह्म ) पूर्ण है और यह ( कार्यब्रह्म ) भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्णसे पूर्णकी ही उत्पत्ति होती है । तथा [ प्रलयकालमें ]. पूर्ण ( कार्यब्रह्म ) का पूर्णत्व लेकर ( अपनेमें लीन करके ) पूर्णं ( परब्रह्म ) ही बच रहता है । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

पृष्ठ 36

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प्रथम अध्याय ब्राह्मण प्रथम ब्राह्मण सम्बन्ध - भाष्य ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्म-' विद्यासम्प्रदाय कर्तृभ्यो वंश-ऋषिभ्यो नमो गुरुभ्यः । ' उषा वा अश्वस्य ' इत्येव-माद्या वाजसनेयि-• नामनिरुक्तिः ब्राह्मणोपनिषत् । तस्या इयमल्पग्रन्था वृत्तिरा -रम्यते संसारव्याविवृत्सुभ्यः संसारहेतुनिवृत्तिसाधनब्रह्मात्मै-कत्वविद्याप्रतिपत्तये ॥ सेयं ब्रह्म-विद्या उपनिषच्छब्दवाच्या तत्पराणां सहेतोः संसारस्यात्य-न्तावसादनात् । उपनिपूर्वस्य सदेस्तदर्थत्वात् । तादर्थ्याद् ग्रन्थोऽप्युपनिषद् उच्यते । १. इस उपनिषदुके द्वितीय, चतुर्थ ' वंशब्राह्मण ' कहलाते हैं; क्योंकि उनमें आचार्य परम्पराका उल्लेख किया गया है ॐ ब्रह्मविद्या - सम्प्रदाय के प्रवर्तक [ ' वंश - ब्राह्मणोक्त ] गुरुपरम्परागत ब्रह्मादि वंश - ऋषियोंको तथा गुरु-देवको नमस्कार है । ' उषा वा अश्वस्य ' इत्यादि मन्त्र-से आरम्भ होनेवाली वाजसनेयि-ब्राह्मणोपनिषद् है । संसार - बन्धन-को दूर करनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये संसारके कारण ( अज्ञान ) की निवृत्तिके साधन ब्रह्मात्मैक्यबोधकी प्राप्तिके लिये उसकी यह अल्प ग्रन्थवाली ( संक्षिप्त ) व्याख्या आरम्भ की जाती है । यह ब्रह्मविद्या अपने में लगे हुए पुरुषों के संसारका कारणसहित अत्यन्त अवसादन ( उच्छेद ) करती है, इसलिये उपनिषद् शब्दसे कही जाती है; क्योंकि ' उप ' और ' नि ' उपसर्गपूर्वक सदधातुका यही ( अवसादन ही ) अर्थं है । उस ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजन-वाला होनेके कारण यह ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है । और षष्ठ अध्यायोंके अन्तिम ब्राह्मण इस ग्रन्थद्वारा प्रतिपादित विद्याओं की । सेय मानत रिमाप य धीयत ज्ञानु शिप पुरुष परिह चेष्टा अत्य नाग न आत्म शास्त्र रेष्ट स्वभ जन्मा नहीं

पृष्ठ 37

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१ के प्रवर्तक रम्परागत तथा गुरु-यदि मन्त्र-वाजसनेयि-T र - बन्धन-विरक्त कारण के साधन के लिये ( संक्षिप्त ) नी है । यह पुरुषों अत्यन्त करती है, दसे की और ' नि ' का यही हे । उस प्रयोजन-ग्रन्थ भी तम ब्राह्मण विद्याओंकी सेयं षडध्यायी श्ररण्येऽनूच्य- यह छः अध्यायवाली उपनिषद् ' अरण्य ( वन ) में कही जाने के मानत्वादारण्यकम्, बृहच्वात्प-रिमाणतो बृहदारण्यकम् । तस्या-स्य कर्मकाण्डेन सम्बन्धोऽभि-धीयते । सर्वोऽव्ययं वेद: प्रत्य-क्षानुमानाभ्यामन बगतेष्टानिष्टप्रा-लिपरिहारोपायप्रकाशनपरः सर्व-पुरुषाणां निसर्गत एव तत्प्राप्ति परिहारयोरिष्टत्वात् । दृष्टविषये चेष्टानिष्ट प्राप्तिपरिहारोपायज्ञानस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव सिद्धत्वा नागमान्वेषणा । न चासति जन्मान्तरसम्ब-आत्मतत्वनिरूपणे न्ध्यात्मास्तित्ववि -शास्त्रस्यार्थवत्त्वम् ज्ञाने जन्मान्त-रेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छा स्यात् स्वभाववादिदर्शनात् । तस्मा १. अर्थात् आत्माके अस्तित्वको न कारण आरण्यक है और [ अन्य उपनिषदों की अपेक्षा ] परिमाणमें बृहद् ( बड़ी ) होने के कारण बृहदा-रण्यक कही जाती है । अब इसका कर्मकाण्ड के साथ सम्बन्ध बतलाया जाता है । यह सारा ही वेद, जिनका प्रत्यक्ष और अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे ज्ञान नहीं होता, उन इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति के उपायोंको प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि सभी पुरुषों-को स्वभावसे ही इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टको निवृत्ति इष्ट है । जो विषय प्रत्यक्ष हैं उनमें इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायोंका ज्ञान तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंसे ही सिद्ध है, इसलिये वहाँ आगमप्रमाण ढूँढनेकी आवश्यकता नहीं होती । किंतु जन्मान्तर से सम्बन्ध रखनेवाले आत्माके अस्तित्वका ज्ञान न होनेपर जन्मान्तर-सम्बन्धिनी इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-निवृत्तिकी इच्छा भी नहीं हो सकती, जैसा कि स्वभाववादियों ( चार्वाकादिकों ) में देखा । जाता है । अतः शास्त्र जाननेवाले लोकायतिक और बौद्धोंकी जन्मान्तर में इष्ट - प्राप्ति और अनिष्ट परिहार के उद्देश्यसे वैदिक क्रियाओंमें प्रवृत्ति नहीं होती - यह बात देखी गयी है ।

पृष्ठ 38

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३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्मण ज्जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वे जन्मान्तरेष्टानिष्ट प्राप्तिपरिहारो-पायविशेषे च शास्त्रं प्रवर्तते । " येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये-ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके " ( क ० उ ० १ । १ । २० ) इत्युपक्रम्य “ अस्तीत्येवोपलब्ध व्यः " ( क ० उ ०२ । ३ । १३ ) इत्येवमादिनिर्णयदर्शनात् । " यथा च मरण ं प्राप्य " ( क ० उ ० २ । २ । ६ ) इत्युपक्रम्य “ यो निमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनु संयन्ति यथाकम यथाश्रुतम् ” ( क ० उ ० २ । २ । ७ ) इति च । “ स्वयज्ज्योतिः " ( बृ ० उ ० ४ । ३ । ६ ) इत्यु-पक्रम्य " तं विद्याकर्मणी सम-न्वारभेते " ( ४ । ४ । २ ) " पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन " ( ३ । २ । १३ ) इति च । " ज्ञपयि प्यामि " ( बृ ० उ ० २ । १ । १५ ) इत्युपक्रम्य " विज्ञानमयः " जन्मान्तर -- सम्बन्धी आत्मा ( २ अस्तित्व और जन्मान्तरकी इष्टप्राप्ति व्यति एवं अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषका निरूपण करनेमें प्रवृत्त होता है । प्रत्यक्ष जैसा कि [ श्रुतिमें ] " मृत मनुष्य-के विषयमें जो ऐसी शङ्का होती है नार कि कोई तो कहते हैं [ शरीरादिसे सि अतिरिक्त देहान्तरसम्बन्धी ] आत्मा आत रहता है और कोई कहते हैं यह लोक नहीं रहना " इस प्रकार उपक्रम करके " आत्मा है - ऐसा ही जानना कूल चाहिये ” इत्यादि निर्णय देखा जाता न हे तथा " [ ब्रह्मको न जाननेसे ] द्वि मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है " इस प्रकार आरम्भ स्थ करके " जिसने जैसा कर्म किया है चेन तथा जिसने जैसा शास्त्रज्ञान प्राप्त प्रत किया है उसके अनुसार कोई तो वि देह धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त हो जाते हैं और कोई स्त स्थावर हो जाते हैं " इस प्रकार देह कहा है । एवं " स्वयंप्रकाश है " " इस प्रकार आरम्भ कर " ज्ञान प्र और कर्म उसके जन्मान्तरके आर-म्भक होते हैं " तथा " वह पुण्यकर्म-से पुण्यवान् और पापकमौसे पापमय होता है " इत्यादि कहा गया है । इसी प्रकार " बतलाऊँगा " | ऐसा उपक्रम कर “ आत्मा विज्ञान-

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अध्याय १ आत्मा की इष्टप्राप्ति यविशेषका होता है । त मनुष्य-का होती है शरीरादिसे ची ] आत्मा कहते हैं यह T र उपक्रम ही जानना - देखा जाता जानने से ] आत्मा जैसा पर आरम्भ कर्म किया है त्रज्ञान प्राप्त र कोई तो लिये किसी हैं और कोई इस प्रकार प्रकाश " हे " कर " ज्ञान -तरके आर-वह पुण्यकर्म-पापकर्मोसे इत्यादि कहा बतलाऊँगा " त्मा विज्ञान-ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थं ३३ ( २ । १ । १६ ) इति च | मय है " इस प्रकार देहसे भिन्न आत्मा-व्यतिरिक्तात्मास्तित्वम् । तत्प्रत्यक्षविषयमेवेति चेन्न, प्रत्यक्षानुमानाभ्यां वादिविप्रतिपत्ति-नात्मनोऽस्तित्त्व- दर्शनात् । न हि सिद्धिः देहान्तरसम्बन्धिन । श्रात्मनः प्रत्यक्षेणास्तित्वविज्ञाने लोकायतिका बौद्धाश्व नः प्रति-कूलाः स्युर्नास्त्यात्मेति वदन्तः । न हि घटादौ प्रत्यक्षविषये कश्चि-द्विप्रतिपद्यते नास्ति घट इति । स्थाण्वादौ पुरुषादिदर्शनान्नेति चेन्न, निरूपितेऽभावात् । न हि प्रत्यक्षेण निरूपिते स्थाण्वादौ विप्रतिपत्तिर्भवति । वैनाशिका-स्त्वहमितिप्रत्यये जायमानेऽपि का अस्तित्व बतलाया गया है । यदि कहो कि आत्माका अस्तित्व तो प्रत्यक्ष प्रमाणका ही विषय है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इसके सम्बन्धमें विभिन्न वादियोंका मतभेद देखा जाता है । यदि देहान्तर-सम्बन्धी आत्मा अस्तित्वका ज्ञान प्रत्यक्ष होता तो लोकायतिक और बौद्ध ' आत्मा नहीं है ' ऐसा कहते हुए हमारे प्रतिकूल न होते । घटादि जों प्रत्यक्षप्रमाणके विषय हैं, उनमें ' घट नहीं है ' ऐसा संदेह किसीको नहीं होता । यदि कहो कि स्थाणु ( हूँठ ) आदिमें पुरुषादिका भ्रम देखा जानेके कारण प्रत्यक्ष वस्तुमें संशयका अभाव नहीं बताया जा सकता तो | यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि अच्छी तरह देख लेनेपर उस संशयका अभाव हो जाता है । स्थाणु आदि-का प्रत्यक्ष निरूपण हो जानेपर उसमें किसीको संदेह नहीं रहता । किंतु वैनाशिक तो ' अहम् ' ऐसी देहान्तरव्यतिरिक्तस्य नास्तित्वमेव वृत्तिके उदय होनेपर भी देहान्तरसे भिन्न आत्माके न होनेका ही निश्चय प्रतिजानते । तस्मात्प्रत्यक्षविषय- करते हैं । अतः प्रत्यक्ष प्रमाणके विषयसे विलक्षण होनेके कारण वैलक्षण्यात् प्रत्यक्षान्नात्मा- प्रत्यक्षसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि स्तित्वसिद्धिः । नहीं हो सकती । बृ ० उ ० ३–

पृष्ठ 40

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३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तथानुमानादपि । श्रुत्या आत्मास्तित्वे लिङ्गस्य दर्शित-त्वाल्लिङ्गस्य च प्रत्यक्षविषयत्वा-न्नेति चेन्न, जन्मान्तरसम्बन्ध -स्याग्रहणात् । आगमेन त्वात्मा -स्तित्वेऽवगते वेदप्रदर्शित लौकिक-लिङ्गविशेषैश्च तदनुसारिणो मी-मांसकास्ताकिकाच अहम्प्रत्यय-लिङ्गानि च वैदिकान्येव स्वमति-प्रभवाणीति कल्पयन्तो वदन्ति प्रत्यक्षश्चानुमेयश्वात्मेति । सर्वथाप्यस्त्यात्मा देहान्तर-कर्मंज्ञानकाण्डयोः सम्बन्धीत्येवं प्रति-प्रयोजनम् पतुर्देहान्तरगतेष्टा - / १. अनुमानका स्वरूप यों है— = इसी प्रकार अनुमानसे भी [ आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता ] । यदि कहो कि श्रुतिने आत्मा के अस्तित्वमें लिङ्ग ' ( बीज ) दिखलाया है और लिङ्ग प्रत्यक्ष-प्रमाणका विषय होता है, इसलिये आत्मा [ प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणका भी विषय हैं ] केवल आगमका ही विषय नहीं है - तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जन्मान्तरके सम्बन्ध-का किसी अन्य प्रमाणसे ग्रहण नहीं होता । आगमप्रमाणसे तथा वेदोक्त लौकिक लिङ्गविशेषोंके द्वारा आत्मा-का अस्तित्व जान लेनेपर ही उसी का अनुसरण करनेवाले मीमांसक और नैयायिक वैदिक अहंप्रतीति और वैदिक लिङ्गोंको ही ' ये हमारी बुद्धिसे निकले हुए तर्क हैं ' ऐसी कल्पना करते हुए कहते हैं कि ' आत्मा प्रत्यक्ष और अनुमानका भी विषय है ' । सब प्रकार देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है - ऐसा जानने-वाले तथा देहान्तरगत इष्टप्राप्ति और इच्छा आदि किसीके आश्रित होते हैं; क्योंकि वे गुण हैं, जैसे रूप आदि । इस प्रकारके अनुमानद्वारा इच्छादिके आश्रयरूपसे भी आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इच्छादिका अधिष्ठान मन ही प्रसिद्ध है, मनसे अतिरिक्त इच्छादिकी उपलब्धि नहीं होती । २. ‘ यः प्राणेन प्राणिति ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्राणनादि व्यापार आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग है । ही ब्राह निष्ट स्ति ब्धम परिह मज्ञ! लक्ष विज्ञ पनी राग शास्त्र वर्तम साध यु विक स्था च्छा ततो ल्ये तद् । तत्र फल