बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 41–50

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 41 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १ मनसे भी सिद्ध नहीं हो श्रुति ' ( बीज ) लङ्ग प्रत्यक्ष-है, इसलिये न प्रमाणका आगमका ही कहना ठीक के सम्बन्ध-ग्रहण नहीं तथा वेदोक्तः रा आत्मा-ही उसीका मांसक और तीति और नारी बुद्धिसे सी कल्पना त्मा प्रत्यक्ष न्य है ' । रसे सम्बन्ध सा जानने-प्राप्ति और श्रत होते हैं; - इच्छादिके होती । व्यापार ही ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ निष्टप्राप्तिपरिहारोपाय विशेषार्थिन । स्तद्विशेषज्ञापनाय कर्मकाण्ड मार-ब्धम् । न त्वात्मन इष्टानिष्ट प्राप्ति -परिहारेच्या कारणमात्मविषय-मज्ञानं कर्तृभोक्तृस्वरूपाभिमान -लक्षणं तद्विपरीतब्रह्मात्मस्वरूप विज्ञानेनापनीतम् । यावद्धि तन्ना-पनीयते तावदयं कर्मफल-रागद्वेषादिस्वाभाविक दोष प्रयुक्तः शास्त्रविहितप्रतिषिद्धातिक्रमेणापि वर्तमानो मनोवाक्कायैर्दृष्टादृष्टानिष्ट-साधनानि अधर्मसंज्ञकानि कर्मा-v युपचिनोति बाहुल्येन, स्वाभा -विकदोषबलीयस्त्वात् । ततः स्थावरान्ताधोगतिः । कदाचि -च्छास्त्रकृत संस्कार बलीयस्त्वम्, ततो मनआदिभिरिष्टसाधनं बाहु-ल्येनोपचिनोति धर्माख्यम् । तद्द्द्विविधम् - ज्ञानपूर्वकं केवलञ्च । तत्र केवलं पितृलोकादिप्राप्ति-फलम् । ज्ञानपूर्वकं देवलोकादि - । अनिष्टनिवृत्ति के उपायविशेषको जाननेकी इच्छावाले पुरुषों को उस विशेष उपायका ज्ञान करानेके लिये कर्मकाण्ड आरम्भ किया गया है । उसमें आत्माकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्ट-निवृत्तिकी इच्छा के कारण कर्तृत्व-भोक्तृत्वाभिमानरूप आत्मविषयक अज्ञानको उससे विपरीत ब्रह्मात्म-स्वरूप ज्ञानके द्वारा दूर नहीं किया गया । जबतक उस ( अज्ञान ) की निवृत्ति नहीं होती, तबतक यह जीव कर्मफलके राग - द्व ेषादिरूप स्वाभा-विक दोषोंसे प्रेरित होनेके कारण शास्त्रकथित विधि और निषेधका उल्लङ्घन करके भी बर्तता हुआ मन, वाणी और शरीरसे दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टके साधनभूत अधर्मसंज्ञक कर्मोंको अधिकतासे है, क्योंकि स्वभावजनित दोष बहुत प्रबल होता है । इससे उसे स्थावर-पर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है । कभी शास्त्रोक्त संस्कारोंकी प्रबलता होती है, उस समय यह मन आदि अधिकतर धर्मसंज्ञक इष्टसाधनोंका सम्पादन करता है । ज्ञ ( उपासना ) पूर्वक और केवल भेदसे दो प्रकारके हैं । उनमें केवल धर्म पितृलोकादिकी प्राप्तिरूप फलवाले हैं और ज्ञानपूर्वक धर्म देवलोकसे

पृष्ठ 42

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 42 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रह्मलोकान्तप्राप्तिफलम् । तथा । च शास्त्रम् - " आत्मयाजी श्रेया-न्देवयाजिनः " ( शत ० ब्राह्म ० ) इत्यादि । स्मृतिश्च " द्विविधं कर्म वैदिकम् ' " ( मनु ०१२।८८ ) इत्या-द्या । साम्ये च धर्माधर्मयोः मनुष्य-त्वप्राप्तिः । एवं ब्रह्माद्या स्थावरान्ता स्वाभाविकाविद्यादिदोषवती धर्मा -धर्मसाधनकृता संसारगतिर्नाम रूपकर्माश्रया । तदेवेदं व्याकृतं साध्यसाधनरूपं जगत्प्रागुत्पत्ते-व्याकृतमासीत् । स एष बीजाङ्कुरादिवदविद्याकृतः संसार आत्मनि क्रियाकारक फलाध्या-रोपलक्षणोऽनादिरनन्तोऽनर्थः, इत्येतस्माद्विरक्तस्याविद्यानिवृत्तये तद्विपरीतब्रह्मविद्याप्रतिपच्यर्थोप-निषदारभ्यते । अस्य त्वश्वमेधकर्मसम्बन्धिनो अश्वमेघब्राह्मण- विज्ञानस्य प्रयोजनं प्रयोजनम् येषामश्वमेधे न १. सर्वत्र परमात्मबुद्धि रखकर लेकर ब्रह्मलोकतक रूप ब्राह फलवाले हैं । ऐसा ही शास्त्र भी कहता है- " देवोपासककी अपेक्षा अ आत्मोपासक श्रेष्ठ है । " " तथा " वैदिक कर्म दो प्रकारका है " ( प्रवृत्ति- फल प्रधान और निवृत्तिप्रधान ) ऐसी स्मृति भी है । धर्म और अधर्मंकी चा समान मात्रा होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार धर्म एवं उव अधर्मरूप साधनसे होनेवाली ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यंन्त नाम, रूप एवं श्रा

कर्मके आश्रित स्वाभाविक अवि-। यदि दोषवाली सांसारिक गति है ॥

वह यह साध्यसाधनरूप व्याकृत चे जगत् उत्पत्तिसे पूर्वं अव्याकृत था । आत्मामें क्रिया, कारक एवं फलका चै आरोपरूप यह अविद्याकृत संसार बीजाङ्कुरादिके समान [ प्रवाहरूप- वि से ] अनादि और अनन्त अनर्थरूप है; अत: इससे विरक्त हुए पुरुषकी च अविद्याकी निवृत्तिके लिये इससे विपरीत ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाली यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है । स [ इस उपनिषद्के आरम्भमें कहे हुए ] इस अश्वमेधकर्मसम्बन्धी विज्ञानका तो यही प्रयोजन है कि नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष आत्मयाजी ( आत्मोपासक ) है और कामनापूर्वक देवताओंकी उपासना करनेवाला देवयाजी ( देवोपासक ) है ।

पृष्ठ 43

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 43 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ प्राप्तिरूप ही शास्त्र भी की अपेक्षा है । " तथा का है " ( प्रवृत्ति-धान ) ऐसी और अधर्मकी मनुष्यत्वक कार धर्म एवं वाली ब्रह्मासे म, रूप एवं भाविक अवि-रिक गति है । रूप व्याकृत व्याकृत था । क एवं फलका चाकृत संसार न [ प्रवाहरूप -नन्त अनर्थरूप हुए पुरुषकी ये की प्राप्तिरूप निषद् आरम्भ आरम्भ कहे धर्मसम्बन्धी प्रयोजन है कि करनेवाला पुरुष चना करनेवाला ब्राह्मण १ ] शाङ्करभायार्थ ३७ अधिकारस्तेषामस्मादेव विज्ञानात् । फलप्राप्तिः । ' विद्यया वा कर्मणा चा ' " तद्वैतल्लोक जिदेव " ( बृ ० उ ० १ । ३ । २८ ) इत्येवमादि-श्रुतिभ्यः । कर्मविषयत्वमेव विज्ञानस्येति चेन्न, " योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद " इति विकल्पश्रुतेः । विद्याप्रकरणे चाम्नानात् कर्मान्तरे सम्पादनदर्शनाद् विज्ञानात् तत्फलप्राप्तिरस्तीत्यवगम्यते । सर्वेषां च कर्मणां परं कर्माश्वमेघः जिनका [ असामर्थ्यंवश ] अश्वमेध यज्ञमें अधिकार नहीं है उन्हें इस विज्ञानसे ही उसके फलकी प्राप्ति हो जाय; जैसा कि " ज्ञान ( उपासना ) से अथवा कर्मसे [ उसके फलकी प्राप्ति होती है ] " " वह यह ( प्राणदर्शन ) लोक - प्राप्तिका साधन है " इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । यदि कहो कि अश्वमेधविज्ञान अश्वमेधकर्मसे ही सम्बन्ध रखता है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि " जो अश्वमेधसे यजन करता है अथवा जो इसे इस प्रकार जानता है [ वह सब पापोंको पार कर जाता है ] " इस प्रकार कर्मके ज्ञान और अनु-ष्ठानका विकल्प बतलानेवाली श्रुति है । इसके सिवा इसका उल्लेख उपासनाप्रकरणमें होनेसे तथा अश्वमेधसे भिन्न [ चित्याग्नि ] कर्ममें ' इसका सम्पादन देखा जानेसे भी यह ज्ञात होता है कि अश्वमेध-विज्ञान से भी अश्वमेधका ही फल मिलता है । समष्टि और व्यष्टि समष्टिव्यष्टिप्राप्तिफलत्वात् । तस्य हिरण्यगर्भकी प्राप्तिरूप फलवाला होनेसे समस्त कर्मोंमें अश्वमेध कर्म . चेह ब्रह्मविद्याप्रारम्भ आम्नानं उत्कृष्ट है । यहाँ ब्रह्मविद्याके आरम्भ-सर्वकर्मणां संसारविषयत्वप्रदश - में उसका उल्लेख समस्त कर्मोंका १ ‘ अयं वै लोकोऽग्निः ' ( वृ ० उ ० ६ । २ । ११ ) इत्यादि वाक्यद्वारा ।

पृष्ठ 44

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 44 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ नार्थम् । तथा च दर्शयिष्यति फलमशनायामृत्युभावम् । ननित्यानां संसारविषयफल-त्वमिति चेन, सर्वकर्मफलोप-संहारश्रुतेः । सर्व हि पत्नीसम्बद्धं कर्म | " जाया में स्यात् "... एतावान्वै कामः ” ( बृ ० उ ० १ । ४ । १७ ) इति निसर्गत एव सर्वकर्मणां काम्यत्वं दर्शयित्वा पुत्रकर्मापरविद्यानां च " मनुष्य-लोकः पितृलोको देवलोकः " ( बृ ० उ ० १ । ५ । १६ ) इति फलं दर्शयित्वा त्र्यन्नात्मकतां चान्ते उपसंहरिष्यति " त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म " ( ब्र ० उ ० १ । ६ । १ ) इति । सर्वकर्मणां फलं व्याकृतं संसार एवेति । इदमेव त्रयं प्रागुत्पत्तेस्तर्ह्य-व्याकृतमासीत् । तदेव पुनः सर्व-प्राणिकर्मवशाद्वयाक्रियते बीजा-दिव वृक्षः । सोऽयं व्याकृता- ' ब्राह | संसारसम्बन्धित्व प्रदर्शित करने के लिये किया गया है । इसी प्रकार व्या श्रुति हिरण्यगर्भको क्षुधारूप मृत्यु- क्रिय भावकी प्राप्ति दिखलावेगी । रूप यदि कहो कि नित्यकर्म संसार-मृत विषयक फलवाले नहीं हैं तो यह विल ठीक नहीं, क्योंकि समस्त कर्मफलों-निल का [ सांसारिक विषयोंमें ही ] उपसंहार किया जाता है- ऐसी याक श्रुति है । सारे ही कर्मोंका सम्बन्ध भास स्त्रीसे है । " मुझे स्त्री प्राप्त हो ' ' ' फल इतनी ही कामना है " इस प्रकार साध स्वभावसे ही समस्तकर्मोंकी सकामता दिद दिखलाकर फिर पुत्र, कर्म और अपरा विद्याके " मनुष्यलोक, पितृलोक और रज्ज देवलोक ” इस प्रकार विभिन्न फल ब्रह्म दिखाते हुए श्रुति " यह जगत् नाम, रूप और कर्म – इन तीन अवयवोंसे युक्त है " ऐसा कहकर अन्तमें इसकी तीन अन्नरूपताका तन्त्रा उपसंहार करेगी । तात्पर्य यह है कि समस्त कर्मोंका माँका फल व्याकृत प्राध संसार ही है । तन यही त्रय उत्पत्तिसे पूर्वं तो अव्याकृत ही था । वही ' बीजसे. स्वा वृक्षके समान समस्त प्राणियों के कर्मवश व्याकृत हो जाता है । वह यह व्यक्ताव्यक्तरूप संसार अविद्याका

पृष्ठ 45

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 45 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १ शत करने के इसी प्रकार धारूप मृत्यु -नेगी । कर्म संसार-हैं तो यह त कर्मफलों-योंमें ही ] है - ऐसी का सम्बन्ध प्राप्त हो... इस प्रकार की सकामता र्न और अपरा पितृलोक और विभिन्न फल " यह जगत् - इन तीन सा कहकर न्नरूपताका पर्य यह है ल कृ पूर्व ही बीजसे. प्राणियों के है । वह अविद्याका ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ९ व्याकृतरूपः संसारोऽविद्याविषयः । क्रियाकारक फलात्मकतया आत्म-रूपत्वेनाभ्यारोपितः अविद्ययैव सूतमूर्ततद्वासनात्मकः । अतो विलक्षणोऽनामरूपकर्मात्मकोऽद्वयो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽपि क्रि-याकारकफज भेदादिविपर्ययेणाव भासते । अतोऽस्मात्क्रियाकारक-फलभेदस्वरूपाद् एतावदिदमिति साध्यसाधनरूपाद्विरक्तस्य कामा-दिदोषकर्मबीजभूता विद्यानिवृत्तये रज्ज्वामित्र सर्पविज्ञानापनयाय ब्रह्मविद्या आरभ्यते । तत्र तावदश्वमेधविज्ञानाय ' उषा वा अस् ' इत्यादि । तत्राश्वविषयमेव दर्शनमुच्यते प्राधान्यादश्वस्य । प्राधान्यं च तन्नामाङ्कितत्वात्क्रतोःप्राजापत्य-त्वाच्च । विषय है । अविद्यासे ही सूक्तं, अमूर्त्त और उनकी वासनारूप यह संसार क्रिया, कारक और फलरूप होनेसे आत्मभावसे आरोपित होता है । इससे भिन्न आत्मा नाम, रूप और कमसे रहित, अद्वितीय तथा नित्य-शुद्ध - बुद्ध - मुक्तस्वरूप होनेपर भी क्रिया, कारक और फल - भेदादि विपरीत भावसे प्रतीत होता है । अतः इस साध्य - साधनरूप एवं क्रिया, कारक और फल - भेदरूप संसारसे ' यह इतना ही है ' इस प्रकार विरक्त हुए पुरुषकी कामादि दोषमय कर्मों-की बीजभूता अविद्याकी, रज्जुमें सर्पज्ञानके बाधके समान, निवृत्ति करनेके लिये ब्रह्मविद्याका आरम्भ किया जाता है । शत्र उसमें अश्वमेधविद्याका वर्णन करनेके लिये ' उषा वा अश्वस्य ' इत्यादि मन्त्र कहा जाता है । अश्वमेघ यज्ञमें अश्वकी प्रधानता होनेके कारण यहाँ अश्वविषयक दृष्टि ही कही गयी है । यह यज्ञ ' अश्व ' नामसे अङ्कित है और इसका देवता प्रजापति है, इसीलिये इसमें अश्वकी प्रधानता मानी गयी है । अश्वके अवयवोंमें कालादि - दृष्टि ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूर्यश्चक्षु-

पृष्ठ 46

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 46 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह वतः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य शि मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः अश्व पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमा-यस साश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यक्कृच्च क्लोमा- कम नश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो का निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥ यद

ॐ उषा ( ब्राह्ममुहूर्त्तं ) यज्ञसम्बन्धी अश्वका शिर है, सूर्य नेत्र है, लो वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्वका आत्मा है । द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, हि ऋतुएँ अङ्ग हैं, मास और अर्द्धमास पर्व ( सन्धिस्थान ) हैं, दिन और रात्रि प्रतिष्ठा ( पाद ) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश ( आकाशस्थित मि मेघ ) मांस हैं, बालू ऊवध्य ( उदरस्थित अर्धपक्व अन्त ) है, नदियाँ नाडी हैं, पर्वत यकृत् ( जिगर ) और हृदयगत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ लोम हैं, ऊपर की ओर जाता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग स और नीचेकी ओर जाता हुआ सूर्य कटिसे नीचेका भाग है । उसका चा " जमुहाई लेना बिजलीका चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है । वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और वाणी ही उसकी म वाणी है ॥ १ ॥ इ

उषा इति, " ब्राह्मो मुहूर्त उषाः । ‘ उषा वा ' इत्यादि । ब्राह्ममुहूर्तका नाम उषा है । ' वै ' शब्द स्मरण न वैशब्दः स्मरणार्थः प्रसिद्धं कालं करानेके लिये है । यह प्रसिद्ध काल-म का स्मरण कराता है । वह प्रसिद्ध स्मारयति । शिरः प्राधान्यात् ॥ उषाकाल प्रधान होनेके श कारण

पृष्ठ 47

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 47 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ आत्माश्वस्य नस्यं दिशः नाश्चार्धमा-श्रीनि नभो च्च क्लोमा-पूर्वार्धो यद्विधूनुते क् ॥ १ ॥

• सूर्य नेत्र है, संवत्सर यज्ञीय है, पृथिवी पैर पसलियां हैं, हैं, दिन और आकाशस्थित ) है, नदियाँ ओषधि और ऊपरका भाग है । उसका मेघका गर्जन ही उसकी ब्राह्ममुहूर्तका शब्द स्मरण - प्रसिद्ध काल-- वह प्रसिद्ध के कारण ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ शिरश्च प्रधानं शरीरावयवानाम् ॥ अश्वस्य मेध्यस्य मेधार्हस्य यज्ञि-यस्योषाः शिर इति सम्बन्धः ॥ कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात कालादिदृष्टयः शिर आदिषु क्षि-प्यन्ते । प्राजापत्यत्वं च प्रजा-पतिदृष्टयध्यारोपणात् । काल-लोकदेवतात्वाध्यारोपणं च प्रजा यतित्वकरणं पशोः । एवंरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरण-मिव प्रतिमादौ । सूर्यश्चक्षुः शिरसोऽनन्तरत्वात् सूर्याधिदैवतत्वाच्च । वातः प्राणो चायुस्वाभाव्यात् । व्यात्तं विवृतं सुखमग्निर्वैश्वानरः । वैश्वानर इत्यग्नेर्विशेषणम् । वैश्वानरो नामाग्निर्विवृतं मुखमित्यर्थो मुखस्याग्निदैवतत्वात् । संवत्सर आत्मा, संवत्सरो द्वादशमासस्त्र -शिर है । शिर भी शरीरके अवयवों-में प्रधान है । अत: मेध्य - मेधार्ह ( यज्ञार्ह ) यानी यज्ञसम्बन्धी अश्वका उषा शिर है - ऐसा इसका अन्वय है । कर्मके अङ्गभूत पशुका संस्कार किया जाना चाहिये, इसलिये उसके शिर आदिमें कालादिदृष्टियाँ की जातीं हैं । उसमें प्रजापति - दृष्टिका अध्या-रोप किया जाता है, इसीसे यह प्राजापत्य ( प्रजापतिदेवतासम्बन्धी ) है । काल, लोक और देवत्वका आरोप करना ही पशुका प्रजापतित्व सम्पादन करना है । जिस प्रकार प्रतिमादिमें विष्णुत्वादिकी प्रतिष्ठा की जाती है उसी प्रकार यह उक्त-रूपसे प्रजापति है । [ जिस प्रकार उषाके अनन्तर सूर्य दिखायी देता है उसी प्रकार ] शिरके अनन्तर नेत्र हैं और सूर्य ही | नेत्रोंका अभिमानी देव है, इसलिये सूर्यं उसका नेत्र है । वायु प्राण है, क्योंकि वह वायुके से स्वभाववाला है । वैश्वानर अग्नि व्याप्त यानी खुला हुआ मुख है । ' वैश्वानर ' यह अग्नि-का विशेषण है । अर्थात् वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है; क्योंकि मुखका अधिष्ठातृदेव अग्नि ही है । संवत्सर आत्मा है; संवत्सर | बारह या तेरह महीनेका होता है,

पृष्ठ 48

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 48 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म योदशमासो वा आत्मा शरीरम् ॥ वह उसका आत्मा यानी शरीर है । कालावयवानां च संवत्सरः शरीरम्, शरीरं चात्मा‘मध्यं ह्येषा मङ्गानामात्मा " इति श्रुतेः । अश्वस्य मेध्यस्येति सर्वत्रानु-षङ्गार्थं पुनर्वचनम् । द्यौः पृष्ठमूर्ध्वत्वसामान्यात् । अन्तरिक्षमुदरं सुषिरत्वसामान्यात् । पृथिवी पाजस्यं पादस्य पाजस्य-मिति वर्णव्यत्ययेन, पादासन-स्थानमित्यर्थः । दिशश्चतस्रोऽपि पार्श्वे पार्श्वेन दिशां सम्बन्धात् । पार्श्वयोर्दिशां च सङ्ख्यावैषम्या-दयुक्तमिति चेन्न, सर्वमुखत्वोप-पत्तेरश्वस्य पार्श्वाभ्यामेव सर्वदिशां सम्बन्धाददोषः । अवान्तरदिश कालके अवयवोंका संवत्सर ही शरीर है, और " इन सब अङ्गका ऋत मध्यभाग आत्मा है " इस श्रुतिके इसा अनुसार शरीर ही आत्मा है । ' अश्वस्य मेध्यस्य ' इसकी पुनरुक्ति पर्चा इसका सबके साथ सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये है । अहो ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेके कारण प्राज द्युलोक उसका पृष्ठभाग है, अवकाश या छिद्ररूपतामें समानता होनेके तिष्ठ कारण अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी अहो पाजस्य - पादस्य यानी पैर रखनेका स्थान है | ‘ पादस्य ' के वर्णं ( द ) का त्यश्व [ ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( पा ० सू ० ३।१ । न ८५ ) इस सूत्र के अनुसार जकारके रूपमें ] व्यत्यय होनेसे ' पाजस्य ' हुआ न्यात है । चारों दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, क्योंकि पार्श्वसे दिशाओंका सम्बन्ध रिक्ष है । [ यदि कहो कि ] पार्श्व और दिशाओंकी संख्या में समानता न होनेके कारण ऐसा कहना उचित रुधि नहीं है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि अश्वका मुख सभी दिशाओंकी ओर उदर हो सकता है, अतः उसके पार्श्वका सभी दिशाओंसे सम्बन्ध होनेके 7470 कारण इसमें कोई दोष नहीं है । रात्र १. क्योंकि दिशाएँ चार हैं और पार्श्व केवल दो होते हैं । कृष्ण

पृष्ठ 49

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 49 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय १ नी शरीर है । संवत्सर हो सब अङ्गोंका ', इस श्रतिके आत्मा है । की पुनरुक्ति बन्ध प्रदर्शित होनेके कारण - है, अवकाश नता होनेके र है, पृथिवी पैर रखने का वर्णं ( द ) का ना ० सू ० ३ | १ | T र जकारके नजस्य ' हुआ भाग हैं, का सम्बन्ध | पार्श्व और समानता न हना उचित हीं, क्योंकि ओंकी ओर के पार्श्वका बन्ध होने नहीं है । ब्राह्मण १ ] शाङ्करभायार्थ ४३ श्राग्नेय्याद्याः पशवः पार्श्वास्थिीनि । ऋतवोऽङ्गानि संवत्सरावयवत्वाद-ङ्गसाधर्म्यात् । मासाचार्घमासाश्च पर्वाणि सन्धयः सन्धिसामान्यात् । ॥ अहोरात्राणि प्रतिष्ठाः । बहुवचनात् प्राजापत्य दैवपित्र्यमानुषाणि, प्र-तिष्ठाः पादाः प्रतितिष्ठत्येतैरिति । अहोरात्र हि कालात्मा प्रतितिष्ठ-त्यश्चश्च पादैः । नक्षत्राण्यस्थीनि शुक्लत्वसामा-न्यात् । नभो नभःस्था मेघा अन्त-रिक्षस्योदरत्वोक्तः, मांसान्युदक-रुधिरसेचनसामान्यात् । ऊवध्यं उदरस्थमर्धजीर्णमशनं सिकता आग्नेयी आदि अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ याँ अर्थात् पार्श्वभागकी अस्थियाँ हैं । ऋतुएँ अङ्ग हैं, क्योंकि संवत्सरके अवयव होनेके कारणः अङ्गोंसे उनकी समानता है । मास और अर्धमास पर्व – सन्धियाँ हैं; क्योंकि सन्धिसे उनकी समानता है । दिन और रात्रि प्रतिष्ठा है । ‘ अहो-रात्राणि ' इस पदमें बहुवचन होने के कारण प्रजापति, देवता, पितृगण. और मनुष्य सभीके दिन - रात 9. प्रतिष्ठा अर्थात् पाद हैं, क्योंकि इनसे वह प्रतिष्ठित होता है । कालात्मा दिनरात्रिके द्वारा प्रतिष्ठित होता है और अश्व पैरोंके द्वारा । शुक्लत्वमें समानता होने कारण नक्षत्र अस्थियाँ हैं । आकाश अर्थात् आकाशस्थित मेघ, क्योंकि अन्तरिक्ष ( श्राकाश ) की उदर-रूपता कही जा चुकी है, मांस हैं, क्योंकि जलरूप रुधिर बरसाने में उनकी मांससे समानता है । अव--यवोंके बिलग - बिलग रहनेमें समा-नता होनेके कारण बालू ऊवध्य-१. प्रजापतिका एक अहोरात्र दो सहस्र युगका होता है, देवताओंका अहो -रात्र उत्तरायण और दक्षिणायनरूप है, पितृगणका अहोरात्र शुक्लपक्ष और कृष्ण पक्ष है तथा मनुष्यका अहोरात्र एक दिन और एक रात्रि है ।

पृष्ठ 50

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विश्लिष्टावयवत्वसामान्यात् ॥ सिन्धवः स्यन्दनसामान्यान्नद्यो गुदा नाड्यो बहुवचनाच्च । यकृच्च क्लोमानश्च हृदयस्याधस्ताद्दति-' णोत्तरौ मांसखण्डौ । क्लोमान इति नित्यं बहुवचनमेकस्मिन्नेव । पर्वताः काठिन्यादुच्छ्रितत्वाच्च । प्रोषधयश्च क्षुद्राः स्थावरा वनस्प-तयो महान्तो लोमानि केशाश्च यथासम्भवम् । उद्यन्नुद्गच्छन्भवति सविता आमध्याह्लादश्वस्य पूर्वार्धो नाभे-रूर्ध्वमित्यर्थः । निम्लोचन्नस्तं यन्नामध्याह्नाञ्जघनार्घोऽपरार्धः पू-च परत्वसाधर्म्यात् । यद्विजृम्भते गात्राणि विनामयति विक्षिपति तद्विद्योतते विद्योतनं मुखधन -विदारणसामान्यात् । यद्विधनुतेगा १. अतएव यहाँ ' गुदा ' शब्द लोकप्रसिद्ध उदरस्थित अर्धजीर्णं अन्न है । सिन्धु अर्थात् स्यन्दन ( बहने ) में समानता होने के कारण नदियाँ गुदा - नाडियाँ हैं, क्योंकि यहाँ ' सिन्धवः ' और ' गुदाः ' दोनों ही पद बहुवचनान्त हैं ' । कठिन और ऊँचे उठे हुए होनेके कारण पर्वत यकृत् और क्लोमा हैं । ' यकृत् ' और ' क्लोमा'-हृदयके अधोभागमें सोधे और बायें दो मांसखण्ड हैं । ' क्लोमानः ' यह एकके ही अर्थमें नित्य बहुवचनान्त होता है । ओषधि - क्षुद्र स्थावर और वनस्पति - महान् स्थावर ये यथासम्भव लोम और केश हैं । सूर्य जो मध्याह्नकालपर्यन्त उदित होता - ऊपर की ओर जाता है वह अश्वका पूर्वार्ध यानी नाभिसे ऊपर-का भाग है और निम्लोचन् अर्थात् मध्याह्नकालसे अस्तकी ओर जाता हुआ वह सूर्य जघनार्धं-अपरार्धं ( नीचेका भाग ) है, क्योंकि पूर्वत्व और अपरत्वमें उन ( उदित और अस्त होते हुए सूर्य ) की समानता है । तथा वह जो जमुहाई लेता अर्थात् अङ्गोंको फैलाता यानी उन्हें विशेषरूपसे झाड़ता है । वह बिजलीका चमकना है, क्योंकि विद्योतन और मुख एवं मेघके विदारणमें नितम्ब - अर्थका बोधक नहीं हो सकता । ब्राह A गात्र गर्ज मूत्रं सेच एवा कल महि पृष्ठ दश यो , स I