बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 311–320
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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[ श्रध्याय १ क्योंकि यह वाक्य की स्तुति करने-ही तात्पर्य है कि लोकसे ही हो भिन्न और कोई नहीं है, क्योंकि ता है; जैसा कि , आत्मा ही अन्य श्रुति - यह आत्मज्ञका त करनेके लिये परमात्मा ही हो स्माद्धय वात्मनः ' शब्दका प्रयोग का अर्थ यह है कि त आत्मलोकसे । - मात्मलोक और नाकृतरूपसे स्थित वृत्तिके लिये श्रुति अव्याकृतावस्था-स प्रकार विशेषण-। अतः यहाँ ' स्व ' T रहते हुए, जिसकी हीं करती उस पर ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५ विशेषितेऽश्रुवान्तरालावस्था प्रति- और अपर ब्रह्मके मध्यकी [ अब्धा-कृत नामवाली ] अवस्थाको ग्रहण पत्तं शक्यते ॥ १५ ॥ नहीं किया जा सकता ॥ १५ ॥
कर्माधिकारी जीव किन - किन कर्मोंके कारण समस्त प्राणियों का लोक है? अथो अयं वा श्रात्मा । अत्राविद्वान् वर्णाश्रमाद्यभिमानो धर्मेण नियम्यमानो देवादिकर्म-कर्तव्यतया पशुवत्परतन्त्र इत्यु -क्तम् । कानि पुनस्तानि कर्माणि यत्कर्तव्यतया पशुवत्परतन्त्रो भवति? के वा ते देवादयो येषां कर्मभिः पशुवदुपकरोति? इति तदुभयं प्रपञ्चयति— अथो अयं वा आत्मा । यहाँ वर्णाश्रमादिका अभिमान रखने-वाला तथा धर्मसे नियन्त्रित अज्ञानी पुरुष देवादिसम्बन्धी कर्मकी कर्त-व्यता के कारण पशुके समान पर-तन्त्र है - ऐसा बतलाया गया है । किंतु वे कर्म कौन - से हैं जिनकी कर्तव्यता ' वह पशुके समान पर-तन्त्र होता है? और कौन वे देवादि हैं जिनका वह कर्मोंके द्वारा उप-कार करता है? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति उन दोनोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करती है— अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुत्र ते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निष्पृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयास्या पिपीलि-काभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेव हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टि-मिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमाँ सितम् ॥ १६ ॥
ि दृ ० उ०२०-
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३०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह यह आत्मा ( गृही कर्माधिकारी ) समस्त जीवोंका लोक ( भोग्य ) है । वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका लोक होता है; परि जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान धि करता है और संतानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण क्षण एवं जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका लोक होता है । इसके घरमें देव जो [ कुत्ते - बिल्ली आदि ] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यंन्त जीव - जन्तु इसके प्रति आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका लोक़ होता है । घ जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा ते जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं । उस इस कर्मकी अवश्य-कर्तव्यता [ पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें ] ज्ञात है और [ अवदानप्रकरणमें ] इसकी अथ मीमांसा की गयी है ॥ १६ ॥
अथो इत्ययं वाक्योपन्या-सार्थः । अयं यः प्रकृतो गृही कर्माधिकृतोऽविद्वाञ्छरीरेन्द्रिय-सङ्घातादिविशिष्टः पिण्ड आत्मे त्युच्यते; सर्वेषां देवादीनां पिपीलिकान्तानां भूतानां लोको भोग्य आत्मेत्यर्थः; सर्वेषां वर्णा-श्रमादिविहितैः कर्मभिरुपकारि-त्वात् । कैः पुनः कर्मविशेषेरुपकुर्वन् केषां भूतविशेषाणां लोकः १ इत्यु-च्यते - स गृही यज्जुहोति यद्य-जते, यागो देवतामुद्दिश्य स्वत्व- । च्छा • मूल में ' अथो ' यह निपात वाक्य- मिच का उपक्रम ( आरम्भ ) करनेके लिये है । यह जो कर्माधिकारी इच्छ अज्ञानी गृहस्थरूप शरीरेन्द्रिय- प्रज संघातविशिष्ट प्रकृत पिण्ड है, वह कर्म ' आत्मा ' कहलाता है; वह देवताओं-से लेकर चींटीपर्यन्त समस्त लोक प्राणियोंका लोक - भोग्य है; क्योंकि तन्त्र वर्णाश्रमादिविहित कर्मोंके द्वारा वह सबका उपकारी है । दका वह किन कर्मविशेषोंके द्वारा किन भूतविशेषोंका उपकार करनेके चस कारण उनका लोक ( भोग्य ) होता ऽशन है? सो कहा जाता है - वह गृही जो अथ हवन और यजन करता है - देवता के उद्देश्यसे वस्तुमें स्वत्व त्यागना योग लम्भ
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[ अध्याय १ लोक ( भोग्य ) लोक होता है; लिये पिण्डदान जो मनुष्योंको तो पशुओंको तृण है । इसके घरमें जीव - जन्तु इसके लोक होता है । उसी प्रकार ऐसा कर्मकी अवश्य-करणमें ] इसकी इनिपात वाक्य-रम्भ ) करनेके कर्माधिकारी न शरीरेन्द्रिय-पिण्ड है, वह है; वह देवताओं-पर्यन्त समस्त भोग्य है; क्योंकि कर्मोंके द्वारा है । विशेषों के द्वारा उपकार करनेके ( भोग्य ) होता है - वह गृही जो रता है - देवता त्व त्यागना याग ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ परित्यागः, स एव आसेचना धिको होमः तेन होमयागल-क्षणेन कर्मणावश्यकर्तव्यत्वेन देवानां पशुवत्परतन्त्रत्वेन प्रतिबद्ध इति लोकः । अथ यदनुब्रूते स्वाध्यायमधी-तेऽहरहस्तेन ऋषीणां लोकः । अथ यत्पितृभ्यो निपुणाति प्रय-च्छति पिण्डोदकादि, यच्च प्रजा-मिच्छति प्रजार्थमुद्यमं करोति — इच्छा चोत्पत्युपलक्षणार्था-प्रजां चोत्पादयतीत्यर्थः तेन कर्मणावश्यकर्तव्यत्वेन पितॄणां लोकः पितॄणां भोग्यत्वेन पर-तन्त्रो लोकः । अथ यन्मनुष्यान्वासयते भूम्यु-दकादिदानेन गृहे, यच्च तेम्यो चसद्ध्योऽवसद्भयो वा अर्थिभ्यो-ऽंशनं ददाति, तेन मनुष्याणाम्; अथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति लम्भयति, तेन पशूनाम्; यदस्य ३०७ | है - उसीमें जब ' आहुति देना ' इतना कर्म अधिक होता है तो उसे होम कहते हैं, उस होम - यागरूप कर्मसे, उसकी अवश्यकर्तव्यताके कारण पुरुष पशुके समान देवताओंके अधीन होनेसे बँधा हुआ है— इसलिये उनका लोक ( भोग्य ) है । तथा जो अनुवचन अर्थात् नित्य-प्रतिस्वाध्याय करता है, उसके कारण वह ऋषियोंका लोक है । जो पितृ-गणको ' निपुणाति ' – पिण्डोदकादि प्रदान करता है और जो प्रजाकी इच्छा यानी संतानके लिये प्रयत्न करता है — यहाँ ' इच्छा ' शब्द उत्पत्तिका उपलक्षण करानेके लिये है, तात्पर्य यह कि वह जो प्रजा उत्पन्न करता है, उस कर्मके द्वारा उसकी अवश्य-कर्तव्यताके कारण वह पितृगणका लोक अर्थात् पितरोंके भोग्यरूपसे उनका परतन्त्र लोक होता है । तथा वह जो स्थान और जल आदि देकर मनुष्योंको घरमें ठहराता है तथा घरमें ठहरे हुए अथवा न ठहरे हुए भी भोजनार्थी मनुष्योंको जो भोजन देता है, उससे वह मनुष्योंका लोक है; और पशुओंको जो तृण और जल प्राप्त कराता है, उससे वह पशुओंका लोक है; एवं
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ३०८ ब्रा च पिपी - | इसके घरमें जो श्वापद, पक्षी एवं चींटी-गृहेषु श्वापदा वयांसि लिकाभिः सह कणबलिभाण्डक्षा-लनाद्युपजीवन्ति, तेन तेषां लोकः । यस्मादयमेतानि कर्माणि कुव-न्नुपकरोति देवादिभ्यः, तस्मा द्यथा ह वै लोके स्वाय लोकाय स्वस्मै देहायारिष्टिमविनाशं स्वत्व-भावाप्रच्युतिमिच्छेत् स्वत्वभाव-प्रच्युतिभयात्पोषणरक्षणादिभिः सर्वतः परिपालयेत्, एवं हैवंविदे ‘ सर्वभूतभोग्योऽहमनेन प्रकारेण मया श्रवश्यमृणिवत्प्रतिकर्तव्यम् ' इत्येवमात्मानं परिकल्पितवते सर्वाणि भूतानि देवादीनि यथो-कानि अरिष्टिमविनाशमिच्छन्ति पर्यन्त जीव - जन्तु कण, बलि तथा वद पात्रोंके घोवनके उपजीवी होते हैं. प्रध उससे वह उनका लोक है । मीप्रव क्योंकि इन कर्मोंको करता हुआ यह देवादिका उपकार करता है, इसलिये जिस प्रकार लोकमें प्रव अपने शरीर के लिये पुरुष अरिष्टि- f अविनाश अर्थात् अपनेपन के के भावकी अप्रच्युति चाहता है तथा का अपनेपन के भावकी च्युतिके भयसे | उसका पोषण एवं रक्षण करके सब द्विर प्रकारसे पालन करता है, उसी प्रकार इस तरह जाननेवालेका | अर्थात् ' मैं समस्त भूतोंका भोग्य हूँ, मुझे ऋणीके समान इन सबका इस प्रकार अवश्य प्रतीकार करना रूव चाहिये ' इस प्रकार अपने विषयमें कल्पना करनेवालेका उपर्युक्त देव-तादि समस्त भूत अरिष्टि - अविनाश कृत चाहते हैं । जिस प्रकार कोई कुटुम्बी जिस अपने पशुओंकी रक्षा करता है, उसी स्वत्वाप्रच्युत्यै सर्वतः संरक्षन्ति प्रकार अपने अधिकार की अप्रच्युति- she के लिये वे इसकी सब ओरसे रक्षा कुटुम्बिन, इच पशून् – “ तस्मादेषां करते हैं; इसीसे पहले ( १ | ४ | १७ है 15th ' मन्त्र में ) यह कहा गया है " अतः होन तन्न प्रियम् " इत्युक्तम् । तद्वा एत- देवताओंको यह प्रिय नहीं है [ कि कर्त लोग आत्मतत्त्वको जानें ] " । वह तदेतद्यथोक्तानां कर्मणाम् ऋण - | यह अर्थात् उपर्युक्त कर्मोंका ऋण
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[ अध्याय १ -, पक्षी एवं चींटी-ऋण, तथा पजीवी होते हैं, कहै । कर्मोंको करता उपकार करता प्रकार लोकमें पुरुष अरिष्टि-अपनेपन के चाहता है तथा । च्युतिके भयसे रक्षण करके सब करता है, उसी जाननेवालेका भूतोंका भोग्य हूँ, न इन सबका इस प्रतीकार करना र अपने विषय में नका उपर्युक्त देव-अरिष्टि- अविनाश कार कोई कुटुम्बी क्षा करता है, उसी कार की अप्रच्युति-सब ओरसे रक्षा नहले ( १।४।१० हा गया है " अतः प्रिय नहीं है [ कि को जानें ] " । वह त कर्मोंका ऋण ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३० ९ वदवश्यकर्तव्यत्वं पञ्चमहायज्ञ- । प्रकरणे विदितं II कर्तव्यतया मीमांसितं विचारितं चावदान -प्रकरणे ॥ १६ ॥
ब्रह्म विद्वांश्चेचस्मात्पशुभावा-प्रवृत्तिबीज- त्कर्तव्यताबन्धन-विवेचनम् रूपात्प्रतिमुच्यते, केनायं कारितः कर्मबन्धनाधि -कारेऽवश इव प्रवर्तते, न पुनस्त -द्विमोक्षणोपाये विद्याधिकार इति । ननूक्तं देवा रक्षन्तीति । बाढम् कर्माधिकारस्वगोचरा-समान अवश्यकर्तव्यत्व पञ्चमहायज्ञ-प्रकरण में विदित है तथा अवदान-प्रकरण में कर्तव्यरूपसे इसकी मीमांसा हुई है - विचार किया गया है ॥ १६ ॥
यदि ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष कर्तव्यताबन्धनरूप उस पशुभावसे मुक्त होता है तो यह किसकी प्रेरणा-से विवश - सा होकर कर्मबन्धनके अधिकारमें प्रवृत्त होता है तथा उससे मुक्ति पानेके उपायरूप ज्ञानाधिकार में प्रवृत्त नहीं होता । पूर्व ० - पहले कहा जा चुका है कि देवगण उसकी रक्षा करते हैं । सिद्धान्ती - ठीक है, परंतु वे भी कर्माधिकार के द्वारा अपनी विषयता-को प्राप्त हुए लोगोंकी ही रक्षा करते हैं, रूढानेव तेऽपि रक्षन्ति, अन्यथा - अन्यथा [ यदि ऐसा माना जाय कि सभीकी रक्षा करते हैं तो ] बिना किये कर्मकी प्राप्ति और कृतकर्मका नाश कृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात् । होनेका प्रसंग उपस्थित होगा । वे १. भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ – इन पाँच यज्ञोंका जिसमें विधान किया गया है, वह पञ्चमहायज्ञप्रकरण है । २. एक आहुतिकी पूर्ति के लिये लिया हुआ घृतादि हव्य अवदान कहलाता है । ' तदेतदवदयते यद्यजते स यदग्नी जुहोति ' इत्यादि अवदानप्रकरण है । अर्थात् ' जो यजन करता है यानी वह जो अग्निमें हवन करता है, वह यह अवदान करता है ' इत्यादि । इसमें ' ऋणं ह वाव जायते जायमानो योऽस्ति ' अर्थात् जो उत्पन्न होनेवाला है, उसे निश्चय ऋण प्राप्त होता है-: - इस अर्थवादद्वारा कर्मको अवश्य-कर्तव्यताका विचार किया है । ३. इसलिये वह नियमसे प्रवृत्तिमार्ग में ही रहता है ।
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३१० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रा न तु सामान्यं पुरुषमात्रं विशिविशिष्ट अधिकारपर आरूढ़ न हुए ष्टाधिकारानारूढम्; तस्माद्भवि-तव्यं तेन, येन प्रेरितोऽवश एव । बहिर्मुखो भवति स्वस्माल्लोकात् । नन्वविद्या सा, अविद्यावान्हि बहिर्मुखीभूतः प्रवर्तते । सापि नैव प्रवर्तिका वस्तु-स्वरूपावर्णात्मिका हिसा; प्रव-र्तकवीजत्वं तु प्रतिपद्यतेऽन्धत्व-मिव गर्तादिपतनप्रवृत्तिहेतुः । एवं तर्पुच्यतां किं तद् यत्प्र-वृत्तिहेतुरिति १ तदिहाभिधीयते - एषणा कामः सः, ' स्वाभाविक्यामविद्यायां वर्त-माना बालाःपराचः कामाननुयन्ति ' इति काठकश्रुतौ, स्मृतौ च " काम एष क्रोध एषः " ( गीता ३ । ३७ ) इत्यादि, मानवे च सर्वा प्रवृत्तिः कामहेतुक्येवेति । स एषो-सामान्य पुरुषमात्रकी रक्षा नहीं करते; अतः कोई ऐसा होना चाहिये, TM प्रेरित होकर वह बलात्कारसे आत्म- अ लोकसे बहिर्मुख हो जाता है । पूर्व ० - अच्छा तो वह अविद्या है, क्योंकि अविद्यावान् पुरुष ही बहिर्मुख से होकर प्रवृत्त होता है । ता सिद्धान्ती - वह भी प्रवर्तिका नहीं है, वह तो वस्तुके स्वरूपका आवरण त करनेवाली ही है । हाँ, जिस प्रकार मे अन्धत्व गढ़में गिरनेका हेतु होता है, उसी प्रकार यह प्रवर्तकबीजरूपताको ए तो प्राप्त होती है । च पूर्व०- ऐसी बात है तो तुम्हीं त्म बताओ, जो प्रवृत्तिका हेतु है, वह क्या है? यह सिद्धान्ती - वह यहाँ बतलाया र्या जाता है - वह एषणा यानी काम है । ' स्वाभाविक अविद्यामें रहनेवाले फिर मूर्खलोग बाह्य कामनाओंका अनुसरण बस करते हैं ' - ऐसा कठश्रुतिमें भी कहा इसी है, तथा स्मृतिमें भी " यह काम, मैं यह क्रोध " ऐसा कहा है । मानव- वह धर्मशास्त्रमें भी सारी प्रवृत्ति कामसे अप ही होनेवाली है - ऐसा कहा है । १ आ है, १. अकामतः क्रिया काचिदृदृश्यते न हि कस्यचित् । वित्त कु जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥
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[ अध्याय १ र आरूढ़ न हुए रक्षा नहीं करते; T चाहिये, जिससे लात्कारसे आत्म-जाता है । तो वह अविद्या है, पुरुष ही बहिर्मुख है । श्री प्रवर्तिका नहीं वरूपका आवरण हाँ, जिस प्रकार का हेतु होता है, तकबीजरूपताको त है तो तुम्हीं तका हेतु है, वह यहाँ बतलाया यानी काम है । विद्यामें रहनेवाले नाओं का अनुसरण श्रुतिमें भी कहा भी " यह काम, कहा है । मानव-प्रवृत्ति कामसे ऐसा कहा है ।
चित् ।
तम् ॥
" ब्राह्मण ४ ] ३११. ऽर्थः सविस्तर: प्रदर्श्यत इह श्रा | वही विषय यहाँ अध्यायकी समाप्ति-पर्यन्त विस्तारसे प्रदर्शित किया अध्यायपरिसमाप्तेः- जाता है-प्रवृत्ति के बीजभूत काम और पाङ्क्तकर्मका वर्णन आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्त मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्ये-तावान् कामो नेच्छश्च नातो भूयो विन्देत्तस्मादप्ये-तकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्त मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्त ं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं देव श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्या-मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिद ँ सर्वं यदिदं किञ्च तदिदु सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥
पहले एक ' आत्मा ही था । उसने कामना की कि ' मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ । तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूं । ' बस इतनी ही कामना है । इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता । इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं संतानरूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ । वह जबतक इनमें से एक - एकको भी प्राप्त नहीं करता तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है । उसको पूर्णता इस प्रकार होती है - मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण संतान है और नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि वह नेत्र से ही गौ आदि मानुष वित्तको जानता है । श्रोत्र देव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे ( दैववित्तको ) सुनता है । आत्मा
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३१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ( शरीर ) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है । वह यह यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह जो कुछ है, पाङ्क्त है । जो ऐसा जानता है, वह इस आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मैव स्वाभाविकोऽविद्वान्कार्यकरण-सङ्कगतलक्षणो वर्णी, अग्रे प्राग्दार-सम्बन्धात्, आत्मेत्यभिधीयते; तस्मादात्मनः पृथग्भूतं काम्यमानं जायादिभेदरूपं नासीत् स एवैक श्रासीत् — जायाद्येषणाबीजभूता-विद्यावानेक एवासीत् । स्वाभाविक्या स्वात्मनि कर्त्रादि-कारकक्रियाफलात्मकताध्यारोप-लक्षणया अविद्यावासनया वासितः सोऽकामयत कामित-वान् । कथम्? जाया कर्माधि-कारहेतुभूता मे मम कर्तुः स्यात्; तया विनाहमनधिकृत एवं कर्मणि; अतः कर्माधिकारसम्पत्तये भवे-जाया; अथाहं प्रजायेय प्रजा-रूपेणाहमेवोत्पद्येय । अथ वित्तं मे स्यात्कर्मसाधनं गवादिलक्षणम् अथाहमभ्युदयनिः-सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ ह
आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मा न ही अर्थात् स्वाभाविक अविद्वान् देह का और इन्द्रियका संघातरूप वर्णी ना ( ब्रह्मचारी ) ही अग्र े - स्त्री - सम्बन्ध होनेसे पूर्व था । इस प्रकार यहाँ [ देहे न्द्रयसंघात ही ] आत्मा कहा गया है । उस आत्मासे पृथग्भूत उसकी कामनाका विषय स्त्री आदि सा भेदरूप नहीं था । वही एक था— स्त्री आदि एषणाकी बीजभूता म अविद्यासे युक्त वह अकेला ही था । उसने अपने में कर्त्रादि - कारक, क्रिया एवं कर्मात्मकताकी अध्या-रोपरूपा स्वाभाविको अविद्याजनित कर वासनासे युक्त होकर कामना की । त्स किस प्रकार कामना की? मेरे सेव अर्थात् मुझ कर्ताके कर्माधिकारकी द्वि हेतुभूता स्त्री हो, क्योंकि उसके बिना तो मैं कर्मका अनधिकारी ह्येत ही हूँ; अतः कर्माधिकारकी प्राप्तिके लिये मुझे स्त्री प्राप्त हो; फिर मैं प्रजात होऊँ अर्थात् प्रजारूपसे मैं षण स्वयं ही उत्पन्न होऊँ । तथा मेरे कर्मका साधनभूत गौ एत आदिरूप धन हो, फिर मैं अभ्युदय
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[ अध्याय १ कर्म करता है । हजो कुछ है, सब ता है ॥ १७ ॥
नासीत् । आत्मा क अविद्वान् देह संघातरूप वर्णी - स्त्री - सम्बन्ध इस प्रकार यहाँ 7 ] आत्मा कहा मासे पृथग्भूत विषय स्त्री आदि वही एक था-बीजभूता अकेला ही था । कर्त्रादि - कारक, कताकी अध्या-की अविद्याजनित कामना की । ना की? मेरे कर्माधिकार की क्योंकि उसके का अनधिकारी कारकी प्राप्तिके बाप्त हो; फिर मैं तु प्रजारूपसे मैं का साधनभूत गौ फिर मैं अभ्युदय ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१३ श्रेयससाधनं कर्म कुर्वीय; येना- | और निःश्रेयसका साधनरूप कर्म हमनृणी भूत्वा देवादीनां लोकान् करूँ; अर्थात् वह कर्म करूँ, जिससे प्राप्नुयाम्, तत्कर्म कुर्वीय; मैं उऋण होकर देवादिके लोकोंको प्राप्त कर सकूँ तथा पुत्र, धन और काम्यानि च पुत्रवित्तस्वर्गादिसाध- स्वर्गादिके साधन काम्य कर्म भी नानि । एतावान्वै काम एता चद्विपय परिच्छिन्न इत्यर्थः । एतावानेव हि कामयितव्यो विषयो यदुत जायापुत्रविचकर्माणि साधनलक्षणैषणा; लोकाश्च त्रयो मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति फलभूताः साधनैषणायाथा -स्याः । तदर्था हि जायापुत्रवित्त कर्मलक्षणा साधनैषणा, तस्मा-त्सा एकैवैषणा या लोकैषणा । सैकैव सत्येषणा साधनापेक्षेति द्विधा; अतोऽवधारयिष्यति " उमे ह्येते एषणे एव " ( ३ । ५ । १ ) इति । फलार्थत्वात्सर्वारम्भस्य लोकै-षणार्थ प्राप्ता उक्तैवेति । एतावान्वा । एतावानेव काम इत्यवधियते । करूँ । इतना ही अर्थात् इतने विषय-से परिच्छिन्न ही काम है । ये जो स्त्री, पुत्र, वित्त और कर्म हैं — बस, इतना ही कामना करने-योग्य विषय है, यह साधनरूपा एषणा है; मनुष्यलोक, पितृलोक और देव-लोक- ये तीनों लोक इस साधनेषणा-के फलस्वरूप हैं । इन्हीं तीनों लोकों-के लिये जाया, पुत्र, वित्त एवं कर्म-रूपा साधन - एषणा होती है; अतः यह एक ही एषणा है, जो लोकैषणा कहलाती है । वह एषणा एक होने-' पर भी साधनकी अपेक्षावाली है, इसलिये दो प्रकारकी है । इसीसे श्रुति यह निश्चय करेगी कि " ये दोनों एषणाएँ ही हैं । " सारे आरम्भ फलके ही लिये होते हैं, अत: अर्थतः प्राप्त लोकैषणाका वर्णन कर ही दिया गया । एतावान् - इतना ही काम है, इस प्रकार उसीका निश्चय किया जाता है ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ३१४ भोजनेऽभिहिते तृप्तिर्न हि पृथग-भिघेया, तदर्थत्वाद्भोजनस्य । ते एते एषणे साध्यसाधनलक्षणे कामः, येन प्रयुक्तोऽविद्वानवश एव कोशकारवदात्मानं वेष्टयति-कर्ममार्ग एवात्मानं प्रणिदधद्बहि-सुखीभूतो न स्वं लोकं प्रतिजा -नाति । तथा च तैत्तिरीयके " अग्निमुग्धो हैव धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति " इति । कथं पुनरेतावत्त्वमवधार्यते कामानाम्? अनन्तत्वात् । अनन्त हि कामाः इत्येतदाशङ्कय हेतु-माह — यस्माद् न इच्छन् च न-इच्छन्नपि ब्रा भोजनका वर्णन कर दिये जानेपर तज्जनित तृप्तिका अलग वर्णन वि करनेकी आवश्यकता नहीं होती, ति क्योंकि भोजन तो उसीके लिये होता ' ए है । वे ये साध्य - साधनरूपा एषणाएँ काम हैं, जिस ( काम ) से प्रेरित दृष्ट हुआ अज्ञानी पुरुष रेशमके कीड़ेके अ समान अपनेको विवश होकर लपेट णा लेता है तथा अपनेको कर्ममार्ग में ही अटकाये रखकर बहिर्मुख हो व्य आत्मलोकको नहीं जान पाता । ऐसा ही तैत्तिरीयकमें भी कहा है- पूर्व " जो पुरुष अग्निसम्बन्धी कर्मोंमें मुग्ध है, उसकी चरमगति धूममागं एष ही है, वह आत्मलोकको नहीं जान मेष पाता " इत्यादि । विद्य किंतु कामनाओंकी एतावत्ता ( इतनापन ) कैसे निश्चय की जाती एक है, क्योंकि वे तो अनन्त हैं । काम- खि | नाओंका तो कोई अन्त नहीं है-सग ऐसी आशङ्का करके श्रुति उसका कारण बतलाती है; क्योंकि इच्छा तस , अतोऽस्मात्फलसाधन- करनेपर भी पुरुष इस फल और का लक्षणाद् भूयोऽधिकतरं न चिन्देन्न लभेत । न हि लोके फलसाधनव्यतिरिक्तं दृष्टमदृष्टं वा लब्धव्यमस्ति । लब्धव्य-साधनभूत कामनासे अधिक कुछ भी कार प्राप्त नहीं कर सकता । लोकमें फल और साधनसे व्यतिरिक्त कोई भी दृष्ट प्रज । या अदृष्ट प्राप्तव्य पदार्थ नहीं है । कामना | तो किसी प्राप्तव्य विषयके लिये ही कर्म