बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 301–310

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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[ अध्याय १ समीपवर्ती धर्म य जाननेवाले वचन बोलता है, न्य बोलता है ' इसी तरह इससे नौकिक व्यवहार सत्य बोलता है, लता है ' ऐसा निवाली और की बतायी गयी हैं-अतः यह ज्ञान शास्त्रज्ञ और नियमन करता त्रका भी क्षत्र भिमान रखने-उसके किसी नुष्ठान करनेके , वैश्य अथवा तविशेषमें अभि-[ । ये ब्राह्मणादि कर्माधिकारके त्रु ब्रह्माभव-वैश्यः शूद्रेण पणे मनुष्ये-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २ ९ ५ वेताभ्याँ हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्रा प्रति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननुक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते । अस्माद्धये वात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥

वे ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं । [ इन्हें उत्पन्न करनेवाला ] ब्रह्म अग्निरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण हुआ । तथा मनुष्योंमें ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण, क्षत्रियरूपसे क्षत्रिय, वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ । इसीसे अग्निमें ही [ कर्म करके ] देवताओंके बीच कर्मफलकी इच्छा करते हैं तथा उसे मनुष्योंके बीच ब्राह्मणजातिमें ही कर्मफलकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्म इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था । तथा जो कोई इस लोकसे आत्मलोकका दर्शन किये बिना ही चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक [ शोक - मोहादिकी निवृत्तिके द्वारा ] पालन नहीं करता, जिस प्रकार कि बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान किया हुआ कोई अन्य कर्म । इस प्रकार ( आत्मलोकको ) न जाननेवाला पुरुष यदि इस लोकमें कोई महान् पुण्यकर्म भी करे तो भी अन्तमें उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है; अतः आत्मलोककी ही उपासना करनी चाहिये । जो पुरुष ' उसका कर्म क्षीण नहीं होता । इस कामना करता है, उसी उसीको प्राप्त तदेतच्चातुर्वण्यं सृष्टम् - ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्र इति; उत्तरार्थ उपसंहारः । आत्मलोक की ही उपासना करता है, आत्मासे पुरुष जिस जिस - वस्तुकी कर लेता है ॥ १५ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णोंको उत्पन्न किया-ऐसा जो उपसंहार है, वह आगे अर्थसे सम्बन्ध दिखानेके लिये है ।

पृष्ठ 302

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२ ९ ६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ यत्तत्स्रष्टृ ब्रह्म, नदग्निनैव नान्येन । रूपेण देवेषु ब्रह्म, ब्राह्मणजातिर भवत् । ब्राह्मणा ब्राह्मणस्वरूपेण मनुष्येषु ब्रह्माभवत्, इतरेषु वर्णेषु विकारान्तरं प्राप्य, क्षत्रियेण क्षत्रियोऽभवदिन्द्रादिदेवताधिष्ठि-a:, वैश्येन वैश्यः, शूद्रेण शूद्रः । यस्मात्क्षत्रादिषु विकारापन्नम्, श्रग्नौ ब्राह्मण एव चाविकृतं स्रष्टृ ब्रह्म, तस्मादग्नावेव देवेषु देवानां मध्ये लोकं कर्मफलम्, इच्छ-न्त्यग्निसम्बद्धं कर्म कृत्वेत्यर्थः । तदर्थमेव हि तद्ब्रह्म कर्माधिक-रणत्वेनाग्निरूपेण व्यवस्थितम् । तस्मात् तस्मिन्नग्नौ कर्म कृत्वा तत्फलं प्रार्थयन्त इत्येतदुपपन्नम् । ब्राह्मणे मनुष्येषु - मनुष्याणां पुनमध्ये कर्मफलेच्छायां नाग्न्या-ब्रा वह जो उत्पत्तिकर्ता ब्रह्म था वह किसी अन्यरूपसे नहीं, अग्निरूपसे ही देवताओंमें ब्रह्म यानी ब्राह्मण- जा जाति हुआ । तथा वह ब्रह्म मनुष्यों-में ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण हुआ । इसी षा प्रकार अन्य वर्णोंमें विकारान्तरको उ प्राप्त हो क्षत्रियरूपसे इन्द्रादि देवताओंसे अधिष्ठित क्षत्रिय हुआ स तथा वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ । क्योंकि सृष्टिकर्ता ब्रह्म क्षत्रि-यादिमें विकारको प्राप्त हो गया है, केवल अग्नि और ब्राह्मणमें ही वह निर्विकार है, इसलिये लोग अग्निमें ही देवताओंके बीच लोक - कर्मफल-की इच्छा करते हैं । अर्थात् अग्नि-सम्बन्धी कर्म करके [ उसके फलकी द इच्छा करते हैं ] ] ॥ उसी प्रयोजन के लिये [ अर्थात् कर्मफल- दान करनेके लिये ही ] वह ब्रह्म कर्मके आधार-भूत अग्निरूपस स्थित है । अतः उस क आंग्नमें कर्म करके लोग उसके फल-की प्रार्थना करते हैं - यह उचित ब हो है । तथा मनुष्यों में अर्थात् मनुष्योंके बोचमें कर्मफन पानेकी इच्छा होने पर ब अग्न्यादिके कारण होनेवाली क्रियाकी

पृष्ठ 303

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[ अध्याय १ ब्रह्म था वह, हीं, अग्निरूपसे यानी ब्राह्मण-ब्रह्म मनुष्यों-हुआ । इसी विकारान्तरको रूपसे इन्द्रादि न्त क्षत्रिय हुआ और शूद्ररूपसे ब्रह्मक्षत्रि-प्त हो गया है, ह्मणमें ही वह नये लोग अग्नि में लोक - कर्मफल-अर्थात् अग्नि-[ उसके फलकी उसी प्रयोजन के ल - दान करनेके कर्मके आधार-है । अत: उस लोग उसके फल-३- यह उचित अर्थात् मनुष्यों के की इच्छा होने नेिवाली क्रियाक ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ दिनिमित्तक्रियापेक्षा, किं तर्हि १ । जातिमात्रस्वरूपप्रतिलम्मेनैव पुरु-पार्थसिद्धिः । यत्र तु देवाधीना पुरुषार्थसिद्धिः, तत्रैवाग्न्यादि - । " सम्बद्ध क्रियापेक्षा । स्मृतेश्व--" जप्येनैव तु संसिध्ये-ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्या -न्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ " ( मनु ० २ । ८७ ) इति । पारिव्राज्यदर्शनाच्च । तस्मा-ब्राह्मणत्व एव मनुष्येषु लोकं कर्मफलमिच्छन्ति । यस्मादेता भ्यां हि ब्राह्मणाग्निरूपाभ्यां कर्मकर्त्रधिकरणरूपाभ्यां यत्स्रष्टृ ब्रह्म साक्षादभवत् । अत्र तु परमात्मलोकमग्नौ ब्राह्मणे चेच्छन्तीति केचित् ।! २ ९ ७ अपेक्षा नहीं है; तो फिर क्या बात है? वहाँ ब्राह्मणमें अर्थात् ब्राह्मण-जातिमात्रका स्वरूप प्राप्त कर लेने-पर पुरुषार्थंसिद्धि हो जाती है । जहाँ पुरुषार्थकी सिद्धि देवाधीन होती है, वहीं अग्नि आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंकी अपेक्षा होती है । यही बात स्मृति से भी सिद्ध होती है - " इसमें संदेह नहीं, ब्राह्मण अन्य [ अग्न्यादिसम्बन्धी ] कर्म करे अथवा न करे जपसे ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है । मित्र ( सूर्य ) -देवतासम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करनेके कारण अथवा सम्पूर्ण भूतोंको मित्रकी भाँति अभय देने-वाला होनेसे ब्राह्मण मैत्र कहलाता है । " इसके सिवा [ ब्राह्मणके लिये ही ] संन्यासका विधान होनेसे भी [ मनुष्यलोकमें उसीकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है । ] अतः मनुष्यों में ब्राह्मणत्वमें ही लोक — कर्मफलकी इच्छा करते हैं; क्योंकि जो साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्म था, वह कर्मके कर्ता और अधिकरणरूप ब्राह्मण और अग्नि- इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था । यहाँ कोई - कोई ( भर्तृ प्रपञ्च आदि ) ऐसी व्याख्या करते हैं कि ' अग्नि [ -में हवन करके ] और ब्राह्मणमें [ उसे दान देकर ] परमात्मलोककी इच्छा

पृष्ठ 304

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२ ९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तदसत्, अविद्याधिकारे कर्मा-धिकारार्थं वर्णविभागस्य प्रस्तुत-स्वात् परेण च विशेषणात्; यदि ह्यत्र लोकशब्देन पर एवा-त्मोच्येत, परेण विशेषणमनर्थकं स्यात् ' स्वं लोकमदृष्ट्वा ' इति । स्वलोकव्यतिरिक्तश्चेदग्न्यधी-नतया प्रार्थ्यमानः प्रकृतो लोकः, ततः स्वम् इति युक्तं विशेष-णम्, प्रकृतपरलोकनिवृत्यर्थ-त्वात्; स्वत्वेन चाव्यभिचारात्प-रमात्मलोकस्य, अविद्याकृतानां च स्वत्वव्यभिचारात् । ब्रवीति च कर्मकृतानां व्यभिचारम् — ' क्षीयत एव ' इति । ब्रह्मणा सृष्टा वर्णाः कर्मार्थम्; तच्च कर्म धर्माख्यं सर्वानेव कर्त-व्यतया नियन्तृ पुरुषार्थसाधनं च । तस्मात्तेनैव चेत्कर्मणा स्वो लोकः परमात्माख्योऽविदितो-ऽपि प्राप्यते, किं तस्यैव पदनी- । । करते हैं । ' किंतु यह अर्थ नहीं है, क्योंकि वर्णविभागका प्रस्ताव अविद्याके प्रकरणमें कर्मा-धिकारका निरूपण करनेके लिये किया गया है, इसके सिवा आगेके वाक्यमें ' स्वम् ' ऐसा विशेषण दिया है; यदि यहाँ ' लोक ' शब्दसे पर-मात्मा ही कहा जाय तो ‘ स्व लोक-मदृष्ट्वा ' इस आगेके वाक्यमें ' स्वम् ' यह विशेषण निरर्थक होगा । यदि अग्निक अधीनता से प्रार्थना किया जानेवाला प्रकृत लोक स्वलोकसे भिन्न हो तभी ' स्वम् ' यह विशेषण प्रस्तुत परलोक-की निवृत्तिके लिये होनेके कारण सार्थक होगा; क्योंकि स्वरूपसे पर-मात्मलोकका तो व्यभिचार ( भेद ) है नहीं, केवल अविद्याकृत लोकोंका ही व्यभिचार है । आगेके ' क्षीयत एव ' इस वाक्यसे श्रुति कर्मजनित लोकोंका स्वलोकसे व्यभिचार बतलाती है । ब्रह्मने कर्म करनेके लिये वर्णोंकी रचना की थी । वह धर्मंसंज्ञक कर्म कर्तव्यरूपसे सभीका नियन्ता और पुरुषार्थंका साघन है । अतः यदि उसी कर्मसे परमात्म - सज्ञक स्वलोकअ ज्ञात होनेपर भी प्राप्त हो जाता है तो फिर प्राप्तव्यरूपसे उसीके लिये और क्या ब्राह य अ यः सा द्याव भि मात्र का मा चा ब्रह स दि इ इव न दो SF भु व्य भु

पृष्ठ 305

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[ अध्याय १ अर्थं ठीक वर्णविभागका करणमें कर्मा-करनेके लिये सिवा आगे के विशेषण दिया शब्दसे पर-तो ' स्व लोक-' स्वम् ' होगा । अधीनता वाला प्रकृत हो तभी स्तुत परलोक-के कारण स्वरूप से पर-नचार ( भेद ) कृत लोकों का गे ' क्षीयत कर्मजनित व्यभिचार लिये वर्णोंकी नर्मसंज्ञक कर्म नियन्ता और नतः यदि उसी वलोकअज्ञात है तो फिर नये और क्या ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २ ९९ यत्वेन क्रियत इत्यत श्राह — । अथेति पूर्वपक्षविनिवृत्यर्थः; यः कश्चित्, ह वै अस्मात्सां-सारिका त्पिण्डग्रहणलक्षणादवि-द्याकामकर्महेतुकादग्न्यधीनकर्मा -भिमानतया वा ब्राह्मणजाति | मात्रकर्माभिमानतया वा आगन्तु-कादस्वभूताल्लोकात्, स्वं लोक-मात्माख्यम् आत्मत्वेनाव्यभि-चारित्वात्, अदृष्ट्वा - ' अहं ब्रह्मास्मि ' इति, प्रैति म्रियते स यद्यपि स्वो लोकः, अवि-दितोऽविद्यया व्यवहितोऽस्त्र इवाज्ञातः, एनम् — सङ्ख्यापूरण इव लौकिक आत्मानम् — नभुनक्ति न पालयति शोकमोहमयादि-दोषापनयेन । यथा च लोके वेदोऽननुक्तो-नीतः कर्माद्यवबोधकत्वेन न भुनक्ति, अन्यद्वा लौकिकं कृ-प्यादि कर्म अकृतं स्वात्मनानभि-व्यञ्जितम् आत्मीय फल प्रदानेन न भुनक्ति, एवमात्मा स्वो लोकः करनेकी आवश्यकता है? इसपर श्रुति कहती है – यहाँ ' अथ ' यह पद पूर्वपक्षकी निवृत्तिके लिहै । [ क्या कहती है - ] जो कोई भी इस अविद्याकामकर्मजनित तथा अग्न्य-धीन कर्माभिमान के कारण अथवा ब्राह्मणजातिमात्रके कर्माभिमानके कारण आगन्तुक पिण्डग्रहणरूप सांसारिक अनात्मभूतलोकसे, अपने ' आत्मा ' संज्ञक लोकको, जो आत्म-स्वरूप होनेके कारण अव्यभिचारी है, ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार न देख-कर ( न जानकर ) चला जाता अर्थात् मर जाता है, वह यद्यपि स्वलोक है, तो भी अविदित- अविद्या-से व्यवहित अर्थात् अस्वलोकके समान अज्ञात रहनेपर, लौकिक दृष्टान्तमें दशम संख्याको पूर्ति समान, इस आत्माका शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिद्वारा भरण यानी पालन नहीं करता । तथा लोकमें जिस प्रकार अन-नुक्त- क- बिना अध्ययन किया हुआ वेद कर्मादिके अवबोधकरूपसे पालन नहीं करता एवं अन्य कृषि आदि लौकिक कर्म अकृत यानी अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अपने. फलप्रदान के द्वारा पालन नहीं करता, उसी प्रकार स्वलोक आत्मा अपने

पृष्ठ 306

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३०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्वेनैव नित्यात्मस्वरूपेणानभि -व्यञ्जितोऽविद्यादि प्रहाणेन न नक्त्येव । मनु किं स्वलोकदर्शन निमित्त-‘ परिपालनेन १ कर्मणः फलप्राप्ति -धौव्यात्, इष्टफलनिमित्तस्य च कर्मणो बाहुल्यात्, तन्निमित्तं ' पालनमक्षयं भविष्यति । तन्न, कृतस्प क्षयवश्वात्; इत्ये-तदाह तदाह - – यदिह यदिह वै संसारेऽद्भुत-चत्कश्चिन्महात्मापि, अनेवंचित - स्वं लोकं यथोक्तेन विधिना अविद्वान्, -महदहु अश्वमेधादि पुण्यं कर्म इष्ट-' फलमेव नैरन्तर्येण करोति, ' अने-नैवानन्त्यं मम भविष्यति ' इति, तत्कर्म हास्याविद्यावतोऽविद्या-जनितकाम हेतुत्वात् स्वप्नदर्शन-विभ्रमोद्भूतविभूतिवदन्ततोऽन्ते | फलोपभोगस्य क्षीयत एव । नित्य आत्मस्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अविद्यादि के विनाशद्वारा पालन नहीं करता । शङ्का — किंतु आत्मलोक के साक्षात्कार ( ज्ञान ) के कारण होने-वाले परिपालन की आवश्यकता क्या है? क्योंकि कर्मके फलकी प्राप्ति तो निश्चित है और इष्ट फलका हेतु होनेवाला कर्म [ स्वभावत: ] अधिक होता ही है, इसलिये उसके कारण उसका पालन अक्षय हो जायगा । समाधान - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि किया जानेवाला कर्म क्षीण होनेवाला होता है । इसीसे श्रुति ऐसा कहती है- जो कोई इस संसारमें, चाहे वह आश्चर्य - जैसा महात्मा भी हो, इस प्रकार न जाननेवाला अर्थात् आत्मलोकको उपर्युक्त रीतिसे जाननेवाला नहीं है, वह इस विचारसे कि मुझे अनन्तत्वकी प्राप्ति होगी निरन्तर महान् अर्थात् बहुत - से इष्ट फल देनेवाले अश्वमे-धादि पुण्य कर्म भी करे तो भी उस अविद्वान्का वह कर्म अविद्याजनित कामरूप हेतुवाला होनेसे स्वप्न-दर्शनरूप भ्रमसे होनेवाले ऐश्वर्य-के समान फलोपभोगके अन्तमें क्षीण हो ही जाता है, क्योंकि उसके ब्राह तत्का कृत पुण्य अरु स्वल वि स्वं च उपा लोक इत्य कम यथ रदुः विद्य प्रदी यद्व स

पृष्ठ 307

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अध्याय १ अभिव्यक्त न विनाशद्वारा आत्मलोक के कारण होने-वश्यकता क्या नकी प्राप्ति तो फलका हेतु [: ] अधिक उसके कारण हो जायगा । बात नहीं है, ला कर्म क्षीण श्रुति ई इस संसार में, महात्मा भी जाननेवाला उपर्युक्त नहीं है, वह महान् अर्थात् वाले अश्वमे-रे तो भी उस अविद्याजनित नेसे स्वप्न-वाले ऐश्वर्य-के अन्त में क्योंकि उसके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ तत्कारण योरविद्याकामयोश्चलत्यात्, कृतक्षयधौव्योपपत्तिः । तस्मान्न पुण्यकर्मफलपातनानन्त्याशा अस्त्येव । छत श्रात्मानमेव स्वं लोकम्--स्वलोकशब्दार्थ ' आत्मानम् ' इति ' स्वं विवेचनम् लोकम् ' इत्यस्मिन्नर्थे, स्वं लोकमिति प्रकृतत्वात् इह च स्वशब्दस्याप्रयोगात्-उपासीत । स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते, तस्य किम् ९ १ इत्युच्यते — न हास्य कर्म क्षीयते; कर्माभावादेव, इति नित्यानुवादः । यथाविदुषः कर्मक्षयलक्षणं संसा-रदुःखं सन्ततमेव, न तथा तदस्य विद्यत इत्यर्थः । ' मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन " इति यद्वत् । स्वात्मलोकोपासकस्य विदुषो | ३०१ कारणभूत अविद्या और काम चलायमान हैं, इसलिये उस कर्म-फलके क्षयकी अनिवार्यता उचित ही है | अतः पुण्यकर्मफलके द्वारा अनन्तकालतक पालन की आशा है । ही नहीं । अतः स्वलोक आत्माकी ही उपासना करे । ' आत्मानमेव लोक-. मुपासीत ' इस वाक्यमें ' आत्मानम् ' यह पद ' स्वं लोकम् ' इस अर्थ में है.. क्योंकि ' स्वं लोकमदृष्ट्वा ' इस प्रकार ' स्व ' शब्द से प्रकरणका आरम्भ हुआ है और यहाँ ' स्व ' शब्दका ' प्रयोग किया नहीं गया । वह जो आत्मलोककी ही उपासना करता है, उसे क्या होता है, सो बतलाते. हैं उसका कर्म क्षीण नहीं होता; क्योंकि [ वस्तुतः ] उस आत्मवेत्ता-में कर्मका अभाव ही है, अतः यह कथन तो नित्यका अनुवादमात्र है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार afaai लिये कर्मक्षयरूप संसार-दुःख निरन्तर रहता है, उस प्रकार इस विद्वान् के लिये उसकी सत्ता नहीं है; जैसे कि राजा जनकने कहा था " मिथिलाके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता । " [ भर्तृ प्रपञ्चादि ] कुछ अन्य व्याख्याकारों का कथन है कि स्वात्म-

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३०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विद्यासंयोगात्कर्मैव न क्षीयत । इत्यपरे वर्णयन्ति । लोकशब्दार्थ च कर्मसमवायिनं द्विधा परि-कल्पयन्ति किल - एको व्याकृता -वस्थः कर्माश्रयो लोको हैरण्य-गर्भाख्यः, तं कर्मसमवायिनं लोकं व्याकृतं परिच्छिन्नं य उपास्ते, तस्य किल परिच्छिन्न-कर्मात्मदर्शिनः कर्म क्षीयते । । तमेव कर्मसमवायिनं लोकमव्या-कृतावस्थं कारणरूपमापाद्य यस्तू-' पास्ते, तस्यापरिच्छिन्न कर्मात्म-- दर्शित्वात्तस्य कर्म न क्षीयत इति । भवतीयं शोभना कल्पना न तु श्रौती । स्वलोकशब्देन प्रकृ-तस्य परमात्मनोऽभिहितत्वात् । स्वं लोकमिति प्रस्तुत्य स्वशब्दं ' विहायात्मशब्दप्रक्षेपेण पुन-स्तस्यैव प्रतिनिर्देशादात्मानमेव लोकमुपासीतेति । तत्र कर्मसम-१. यहाँ मूलमें जो ' किल ' शब्द है ब्राह लोकके उपासकका कर्म ज्ञानका संयोग होनेके. कारण क्षीण नहीं वा होता । वे कर्मसे सम्बद्ध ' लोक ’ शब्दका अर्थं दो प्रकारसे कल्पना एव करते हैं - उनमें एक तो व्याकृत विश रूपसे स्थित कर्माधीन हैरण्यगर्भ-नामक लोक है, उस कर्मसम्बन्धी व्या व्याकृत और परिच्छिन्न लोककी ( ब जो उपासना करता है, उस परि- पुत्र च्छिन्नकर्मात्मदर्शीका कर्म क्षीण हो लोग जाता है । और जो उसी कर्म- नो केन सम्बन्धी लोकको अव्याकृतरूपसे एषो स्थित अर्थात् कारणरूपको प्राप्त च । करके उपासना करता है, उसका युक्त वह कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि विशे वह अपरिच्छिन्न कर्मात्मदर्शी है । उनकी यह कल्पना है तो सुन्दर, परंतु श्रुतिसम्मत नहीं है, क्योंकि चेत्-श्रुतिके द्वारा तो ' स्वलोक ' शब्दसे प्रकरणप्राप्त परमात्माका ही प्रति- तदुप पादन किया गया है । कारण उसने यद्य ' स्वं लोकम् ' इस प्रकार आरम्भ कर फिर ' स्व ' शब्दको त्याग कर उसकी सृजन जगह ' आत्मा ' शब्दका प्रयोग करके रेके उसीका ' आत्मानमेव लोकमुपासीत ' वह इस बातका द्योतक है कि उनकी यह क्या कल्पना केवल तर्क के आधारपर है, श्रुतिसम्मत नहीं है ।

पृष्ठ 309

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[ अध्याय १ कर्म ज्ञानका क्षीण नहीं सम्बद्ध ' लोक ' कारसे कल्पना तो व्याकृत न हैरण्यगर्भ-कर्मसम्बन्धी च्छन्न लोककी है, उस परि-कर्म क्षीण हो उसी कर्म-अव्याकृतरूपसे रूपको प्राप्त ता है, उसक होता, क्योंकि त्मिदर्शी है । ना है तो सुन्दर, चलोक ' शब्दसे नाका ही प्रति-| कारण उसने र आरम्भ कर बाग कर उसकी का प्रयोग करके व लोकमुपासीत ' है कि उनकी यह ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३ वायिलोककल्पनाया अनवसर एव । परेण च केवलविद्याविषयेण विशेषणात् - " किं प्रजया करि-ष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः ” ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २२ ) इति । पुत्रकर्मापर विद्याकृतेभ्यो लोकेभ्यो विशिनष्टि ' अयमात्मा नो लोकः ' इति । " न हास्य केनचन कर्मणा लोको मीयत एषोऽस्य परमो लोकः " इति च । तैः सविशेषणैरस्यैकवाक्यता युक्ता, इहापि स्वं लोकमिति विशेषणदर्शनात् । अस्मात्कामयत इत्ययुक्तमिति चेत् — इह स्वो लोकः परमात्मा, तदुपासनात्स एव भवतीति स्थिते, यद्यत्कामयते तत्तदस्मादात्मनः सृजत इति तदात्मप्राप्तिव्यति-रेकेण फलवचनमयुक्तमिति चेत्, | इस प्रकार पुनः निर्देश किया है इसलिये यहाँ कर्मसम्बन्धी लोककी कल्पनाका तो अवसर है ही नहीं । इसके सिवा आगेके “ किं ' प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः ” इस केवल ज्ञानविषयक वाक्यसे उसे विशेषित भी किया गया है । यहाँ श्रुति ‘ अयमात्मा नो लोकः ' ऐसा कहकर उसे पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा प्राप्त होनेवाले लोकोंसे पृथक् करती है । तथा यह भी कहा है “ इसका यह लोक किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता, यह इसका उत्कृष्ट लोक है । ” उन विशेषणयुक्त वाक्योंसे इस वाक्यकी एकवाक्यता होनी चाहिये, क्योंकि यहाँ भी ' स्वं लोकम् ' ऐसा विशेषण देखा जाता है । यदि कहो कि [ ऐसी बात है तो ] ' इससे कामना करता है ' ऐसा कहना उचित नहीं है । अर्थात् यदि ऐसी शङ्का की जाय कि यदि यहाँ स्वलोक पर-मात्मा ही है और उसकी उपासनासे पुरुष तद्रूप ही हो जाता है, तो ऐसा निश्चय होनेपर ' उससे जो जो -चाहता है उसी - उसीकी रचना कर लेता है ' इस प्रकार आत्मप्राप्तिसे भिन्न फल बतलाना उचित नहीं है— १. जिन हमको केवल यह आत्मलोक ही अभीष्ट है, वे हम संतानको लेकर क्या करेंगे?

पृष्ठ 310

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३०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ न; स्वलोकोपासनस्तुतिपरत्वात्; । स्वस्मादेव लोकात्सर्वमिष्टं सम्प-द्यत इत्यर्थः; नान्यदतः प्रार्थ-नीयमाप्तकामत्वात्, " श्रात्मतः प्राण आत्मत आशा ” ( छा ० उ ० । ७ । २६ ॥ १ ) इत्यादि श्रुत्यन्तरे यथा । सर्वात्मभाव प्रदर्शनार्थो वा पूर्ववत् । यदि हि पर एवात्मा सम्पद्यते तदा युक्तः ' अस्माद्धथे वात्मनः ' इत्यात्मशब्दप्रयोगः, स्वस्मादेव प्रकृतादात्मनो लोका-दित्येवमर्थः । अन्यथा ' अव्या-कृतावस्थात्कर्मणो लोकात ' इति सविशेषणमवक्ष्यत् प्रकृतपरमात्म-लोकव्यावृत्तये व्याकृतावस्थाव्या-वृत्तये च । न ह्यस्मिन्प्रकृते | १. ' तस्मात्सर्वमभवत् ' इस वाक्यके २. अव्याकृतरूपसे स्थित कर्मलोकसे ब्राह तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यह वाक्य स्वलोककी उपासनाकी स्तुति करने- विशे वाला है । इसका यही तात्पर्य है कि पत्त सारी इष्टसिद्धि आत्मलोकसे ही हो सकती है; इससे भिन्न और कोई वस्तु माँगने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञ पूर्णकाम होता है; जैसा कि " आत्मासे प्राण है, आत्मासे ही आशा है ” इत्यादि अन्य श्रुतिसे धर्म सिद्ध होता है । कर्ता अथवा पूर्ववत् यह आत्मज्ञका क्त सर्वात्मभाव प्रदर्शित करनेके लिये यत्व है । यदि आत्मज्ञ परमात्मा ही हो भव जाता है, तभी ' अस्माद्धय े वात्मनः ' कर्म इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग उचित होगा । इसका अर्थ यह है कि तदुर इस स्वरूपभूत प्रकृत आत्मलोकसे । अन्यथा प्रकृत परमात्मलोक और यज व्याकृतावस्था ( व्याकृतरूपसे स्थित तेन ब्रह्मलोक ) की व्यावृत्तिके लिये श्रुति तेन [ लोकशब्दका ] " अव्याकृतावस्था- दद त्कर्मणो लोकात् ' इस प्रकार विशेषण- तेन पूर्वक उल्लेख करती । अतःयहाँ ‘ स्व ’ का | ऐसा प्रकृत विशेषण रहते हुए, जिसकी लो श्रुति कोई चर्चा नहीं करती उस पर मि समान | ।