बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 331–340
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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[ अध्याय १ नका साधारण होता; क्योंकि दो अन्न उसने - देवताओंके हैं कि दो प्रवृत्त न हो । पहले दुग्ध बालकको पहले - बछड़ेको भी क्रिया करते हैं हैं । अर्थात् जो ष्ठत हैं । अतः ना पुरुष अप-कि वह जिस [ एक सालकी - करनेवाला ) तु सर्वदा खाये रण यह है कि देता है । जो है, वही इस इसे उत्पन्न न वह प्रतीकके रता है । वह । यह ( फल-न्नानि मेधया इत्यादि प्रथम बताया जाता रमें यह द्वितीय ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५ प्रसिद्धार्थावद्योतकेन । प्रसिद्धो ह्यस्य मन्त्रस्यार्थ इत्यर्थः । यदजन -यदिति चानुवादस्वरूपेण मन्त्रेण १. प्रसिद्धार्थतैव प्रकाशिता । अतो ब्राह्मणमविशङ्कयैवाह - ' मेधया । हि तपसाजनयत्पिता ' इति । ननु कथं प्रसिद्धतास्यार्थस्य ९ इत्युच्यते -जायादिकर्मान्तानां लोकफलसाधनानां पितृत्वं तावत् प्रत्यक्षमेव, अभिहितं च ' जाया मे स्यात् ' इत्यादिना । तत्र च दैवं वित्तं विद्या कर्म पुत्रश्च फलभूतानां लोकानां साधनं त्रष्टृत्वं प्रतीत्य-भिहितम्, वक्ष्यमाणं च प्रसिद्ध-मेव, तस्माद्युक्तं वक्तुं मेधये-त्यादि । एषणा हि फलविषया प्रसि-द्वैव च लोके । एषणा च जाया-दीत्युक्तम् ' एतावान्वै कामः ' इत्य -मन्त्ररूप ब्राह्मण प्रसिद्ध अर्थके द्योतक ' हि ' शब्दसे ही उक्त मन्त्रकी व्याख्या करता है । इसका तात्पर्य यह है कि इस मन्त्रका अर्थं प्रसिद्ध ही है । ' यदजनयत् ' ( जो उत्पन्न किया ) इस अनुवादस्वरूप मन्त्रसे भी इसकी प्रसिद्धार्थता ही प्रकाशित होती है । अतः ब्राह्मण निःशङ्कभावसे हो कहता है - ' पिताने विज्ञान और कर्मसे ही उत्पन्न किया । ' इस अर्थी प्रसिद्धार्थता कैसे है? सो बतलायी जाती है — स्त्रीसे लेकर कर्मपर्यन्त लोक, फल और साधनों का पितृत्व तो प्रत्यक्ष ही है, यह बात ' मेरे स्त्री हो ' इत्यादि वाक्यसे कही ही गयी है । पूर्वग्रन्थमें यह बतलाया गया है कि दैव वित्त, ज्ञान, कर्म और पुत्र अपने फलभूत लोकों के स्रष्टृत्वमें साधन हैं; तथा आगे जो कहा जायगा वह भी प्रसिद्ध ही है । अत: ' मेधया ' इत्यादि कथन उचित ही है । एषणा भी किसी फलको ही लेकर होती है - यह बात भी लोकमें प्रसिद्ध ही है । ' एतावान्वै कामः ' इस वाक्य-से यह बतलाया गया है कि स्त्री आदि ही एषणा है । ब्रह्मविद्याका १. ' पुत्रेणैवायं लोको जय्य: ' इस वाक्यसे ।
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३२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ नेन । ब्रह्मविद्याविषये च सर्वै-कत्वात्कामानुपपत्तेः । एतेनाशास्त्रीयप्रज्ञातपोभ्यां स्वाभाविकाभ्यां जगत्स्रष्टृत्व मुक्तमेव भवति; स्थावरान्तस्य , जो विषय है, उसमें तो सबकी एकता हो जानेके कारण कामनाका होना सम्भव ही नहीं है । ' इस ' उपर्युक्त कथनसे यानी अविद्याजनित काम ही संसार-बन्धनका कारण है - ऐसा दिख-लाये जानेसे अशास्त्रीय एवं स्वा-| भाविक ज्ञान - कर्मोंके द्वारा संसारकी चानिष्टफलस्य कर्मविज्ञाननिमित्त- सृष्टि होती है - यह भी प्रतिपादित स्वात् । विवक्षितस्तु शास्त्रीय एव साध्यसाधनभावो ब्रह्मविद्या-विधित्सया तद्वैराग्यस्य विवक्षि-तत्वात् । सर्वो ह्ययं व्यक्ताव्यक्त-लक्षणः संसारोऽशुद्धोऽनित्यः साध्यसाधनरूपो दुःखोऽविद्या-१. यहाँ यह शङ्का होती है कि ही हो जाता है; क्योंकि स्थावर-पर्यन्त सारा अनिष्ट फल कर्म और विज्ञान से ही होनेवाला है । किंतु यहाँ शास्त्रीय साध्य - साधनभाव ही बताना इष्ट है, क्योंकि ब्रह्म-विद्याका विधान करनेकी इच्छासे उस ( साध्य - साधन ) में वैराग्य बतलाना आवश्यक है । यह व्यक्त और अव्यक्तरूप सारा ही संसार अशुद्ध, अनित्य, साध्य - साधनरूप, दुःखमय और जिस प्रकार जाया आदि विषयक कामना संसारबन्धनमें डालनेवाली है, उसी प्रकार मोक्षविषयक कामना भी हो सकती है; क्योंकि कामनामात्र बन्धनकी हेतु है, इसके उत्तरमें कहते हैं -- ब्रह्मविद्याके विषयमें कामना नहीं होती । कामना रागके कारण होती है और राग अन्य में होता है । ब्रह्मविद्याके विषयभूत मोक्षमें द्वैतका सर्वथा अभाव है; अतः कामना नहीं होती । २. यदि कोई कहे, ' जाया मे स्यात् ' इत्यादि शास्त्रवचनोंके द्वारा जायादि-विषयक कामनाका उल्लेख होनेसे वह शास्त्रीय है; अतः शास्त्रीय कामना संसारो-त्पत्तिमें हेतु हो, किंतु अशास्त्रीय कर्म आदि क्योंकर कारण हो सकते उत्तरमें कहते हैं- --इस उपर्युक्त कथनसे हैं? तो इसके इत्यादि । ि स इ द ह प ट २
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- अध्याय १ तो सबकी ण कामनाका है । ' यनसे यानी ही संसार-- ऐसा दिख-य एवं स्वा-रा संसारकी प्रतिपादित कि स्थावर-कर्म और है । किंतु न - साधन भाव क्योंकि ब्रह्म-की इच्छा में वैराग्य है । यह करूप सारा , अनित्य, वमय और वषयक कामना हो सकती है; द्या के विषय में में होता है । नहीं होती । द्वारा जायादि-मना संसारो-हैं? तो इसके ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२७ विषय इत्येतस्माद्विरक्तस्य ब्रह्म-विद्या आरब्धव्येति । तत्रान्नानां विभागेन विनियोग उच्यते - ' एकमस्य साधारणान-विवेचनम् साधारणम् ' इति मन्त्रपदम्, तस्य व्याख्यानम् ' इदमेवास्य तत्साधारणमन्नम् ' इत्युक्तम् । अस्य भोक्तृसमु-दायस्य, किं तत् १ यदिदमद्यते
भुज्यते सर्वैः प्राणिभिरहन्य-हनि, तत्साधारणं सर्वभोक्त्रर्थम ।
कल्पयत्पिता सृष्ट्वान्नम् ॥
स य एतत्साधारणं सर्वप्राण-भृरिस्थतिकरं भुज्यमानमनधु-पास्ते तत्परो भवतीत्यर्थः- --उपासनं हि नाम तात्पर्यं दृष्टं लोके ' गुरुमुपास्ते ' ' राजानमु-पास्ते ' इत्यादौ - तस्माच्छरीर-स्थित्यर्थान्नोपभोग प्रधानो नाह-ष्टार्थकर्मप्रधान इत्यर्थः स एवं-भूतो न पाप्मनोऽधर्माद्वथाव-| अविद्याका विषय है, अतः इससे विरक्त हुए पुरुषके लिये ही ब्रह्म-विद्याका आरम्भ करना उचित है । तहाँ अन्नोंका विभागपूर्वक । विनियोग बतलाया जाता है । ' एकमस्य साधारणम् ' यह मन्त्रका पद है, उसका ' इदमेवास्य तत्सा-धारणमन्नम् ' यह् व्याख्यान कहा । गया है । ' अस्य ' अर्थात् इस भोक्तृ समुदायका, वह साधारण अन्न है, वह कौन - सा? यह जो प्रतिदिन समस्त प्राणियोंद्वारा अदन - भोजनं किया जाता अर्थात् खाया जाता है । भाव यह कि पिताने अन्नकी रचना करके, उसे समस्त भोक्ताओं-के लिये साधारण अन्न नियत कर दिया । वह जो समस्त प्राणियोंका भरण - पोषण और स्थिति करनेवाले एवं उनसे. भोगे जाते हुए इस साधारण अन्नकी उपासना करता है, अर्थात् तत्पर होता है— लोकमें ' गुरुकी उपासना करता है, ' ' राजा-की उपासना करता है ' इत्यादि प्रसङ्गों में तत्परता ही उपासनारूप-से देखी गयी है अतः जो प्रधान-तया शरीरकी स्थिति करनेवाले अन्नका ही उपभोग करनेवाला है, अर्थात् अदृष्टोत्पादककर्मप्रधान नहीं है, वह इस प्रकारका पुरुष पाप यानी अधर्मसे नहीं बचता अर्थात्
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३२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ र्तते — न विमुच्यत इत्येतत् ॥ तथा च मन्त्रवर्णः - – “ मोघमन्नं-बिन्दते " इत्यादिः । स्मृतिरपि -“ नात्मार्थं पाचयेदन्नम् ” “ अप्रदा-यैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः " ( गीता ३ । २२ ) " अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि " ( मनु ० ८ । ३१७ ) इत्यादिः । कस्मात्पुनः पाप्मनो न व्या-वर्तते १ मिश्रं ह्येतत्सर्वेषां हि स्वं तदप्रविभक्तं यत्प्राणिभिर्भुज्यते । सर्वभोज्यत्वादेव यो सुखे प्रति - । प्यमाणोऽपि ग्रासः परस्य पीडा -करो दृश्यते, ' ममेदं स्यात् ' इति हि सर्वेषां तत्राशा प्रतिबद्धा । उससे उसका छुटकारा नहीं होता । ऐसा ही ' " वह व्यर्थ अन्नका भोग करता है " इत्यादि मन्त्रवर्णं कहता है । तथा " अपने लिये अन्नपाक न करे ", " जो इन्हें बिना दिये भोजन करता है वह चोर ही है " " अपना अन्न खानेवालेको गर्भंकी हत्या करनेवाला पापी [ अपना पाप देकर ] उसका मार्जन करता है " इत्यादि स्मृतिवाक्य भी ऐसा ही कहते हैं । वह पाप से मुक्त क्यों नहीं होता? क्योंकि जो प्राणियोंद्वारा बिना बाँटे खाया जाता है, वह अन्न मिश्र यानी सभीका स्व - धन है । सबका भोज्य होने के कारण ही उस अन्नका मुखमें दिया जानेवाला ग्रास भी दूसरेको पीडा देनेवाला देखा जाता है, क्योंकि उसपर ‘ यह मेरा हो ' इस प्रकार सभीकी आशा ब्राह यद के त्वं आप ना वच देव द्या तस्मान्न परमपीडयित्वा बँधी रहती है । अत: दूसरोंको कष्ट ति ग्रसितु- दिये बिना उसे खाया भी नहीं जा मपि शक्यते । “ दुष्कृतं हि सकता; जैसा कि " दुष्कृतं हि मनु-मनुष्याणाम् ष्याणाम् " इत्यादि स्मृति ' भी ' इत्यादिस्मरणाच्च । । कहती है ।
१. यह स्मृतिवाक्य इस प्रकार है-दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठते ।
यो हि यस्यान्नमश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम् ॥
अन्न अर्थात् मनुष्योंका पाप उनके अन्नके आश्रित रहता है । अतः जो जिसका खाता है, वह मानो उसका पाप खाता है । द इ ग त्व
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1 [ अध्याय १ नहीं होता । अन्नका भोग वर्ण कहता अन्नपाक न दिये भोजन है " " अपना गर्भकी हत्या [ अपना पाप न करता है " भी ऐसा ही क क्यों नहीं प्राणियोंद्वारा ना है, वह अन्न स्व – धन है । कारण ही उस । जानेवाला कि उसपर ' यह सभीकी आशा दूसरोंको कष्ट भी नहीं जा दुष्कृतं हि मनु-स्मृति ' भी तः जो जिसका ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२ ९ गृहिणा वैश्वदेवाख्यमन्नं यदहन्यहनि निरूप्यत इति केचित्, तन्न, सर्वभोक्तृसाधारण-त्वं वैश्वदेवाख्यस्यान्नस्य न सर्व-प्राणभृद्भुज्यमानान्नवत्प्रत्यक्षम्, नापि ' यदिदमद्यते ' इति तद्विषयं चचनमनुकूलम् । सर्वप्राणभृद्भु-ज्यमानान्नान्तःपातित्वाच्च वैश्व-देवाख्यस्य युक्तं श्वचाण्डाला-द्याद्यस्यान्नस्य ग्रहणम्, वैश्वदेवव्य-तिरेकेणापि श्वचाण्डालाद्याद्यान -दर्शनात्, तत्र युक्तम्, ' यदिदमद्यते ' इति वचनम् । यदि हि तन्न गृह्यत, साधारणशब्देन पित्रासृष्ट-त्वाविनियुक्तत्वे तस्य प्रसज्येया- । किन्हीं - किन्हीं ( भर्तृ प्रपञ्च आदि ) का कथन है कि गृहस्थद्वारा नित्य-प्रति जो वैश्वदेवनामक अन्न निकाला जाता है, वही साधारण अन्न है । यह मत ठीक नहीं, क्योंकि समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्न-के समान वैश्वदेवसंज्ञक अन्नका समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण होना प्रत्यक्ष नहीं है और न उसके विषयमें ' यदिदमद्यते ' ( जो यह खाया जाता है ) यह वचन ही अनुक्कल है । इसके सिवा वैश्वदेव-संज्ञक अन्न तो समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके अन्तर्गत ही है, अत: वहाँ कुत्ते और चाण्डा-लादिद्वारा खाये जानेवाले अन्नको ही ग्रहण करना उचित है, क्योंकि वैश्वदेवसे अतिरिक्त भी कुत्ते और चाण्डालादिके खानेयोग्य अन्न | देखा जाता है, अत: वहाँ ' जो यह अन्न खाया जाता है ' यह वचन उचित होगा और यदि साधारण-शब्दसे उस अन्नको ग्रहण नहीं किया जायगा तो ' पिताने उसकी सृष्टि नहीं की और उसका विनि-योग भी नहीं किया ' ऐसे कथनका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । पर वास्तव-
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३३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ताम् । इष्यते हि तत्सृष्टत्वं तद्वि नियुक्तत्वं च सर्वस्यान्नजातस्य । न च वैश्वदेवाख्यं शास्त्रोक्तं कर्म कुर्वतः पाप्मनोऽविनिवृत्ति -र्युक्ता, न च तस्य प्रतिषेधोऽस्ति, न च मत्स्यबन्धनादिकर्मवत्स्व-भावजुगुप्सितमेतत्, शिष्ट -निर्वर्गस्यात्, करणे च प्रत्यवायश्रवणात् । इतरत्र च प्रत्यवायोपपत्तेः “ अहमन्नमन्नम -दन्तमा ३ झि ” ( तै ० उ ० ३ । १० । ६ ) इति मन्त्रवर्णात् । ' द्वे देवानभाजयत् ' इति मन्त्र-द्वेदेवान्ने पदम्, ये द्वे अन्ने सृष्ट्वा देवानभाज-यत् । के ते द्वे १ इत्युच्यते — हुतं च प्रहुतं च । हुतमित्यग्नौ हव-नम्, प्रहुतं हुत्वा बलिहरणम् । यस्माद्द् द्वे एते अन्ने हुतप्रहुते । ब्राह्म में समस्त अन्न उसीने रचे हैं और उसीने उनका विनियोग किया है— देवान यही सिद्धान्त यहाँ इष्ट है । गृहिण इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक | शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले पुरुषका देवेभ पाप से निवृत्त न होना युक्तिसङ्गत मिति नहीं है । तथा [ शास्त्रोंमें ] बलि- चह वैश्वदेवका कहीं भी प्रतिषेध नहीं किया इत्यथ गया है । मछली पकड़ने आदि कर्मों- ६ के समान यह स्वभावत: निन्दनीय | भी नहीं है, क्योंकि यह शिष्ट पुरुषों- पित्रा द्वारा निष्पन्न होनेवाला है और किं इसके न करनेपर प्रत्यवाय भी द्वित्व सुना गया है । तथा " मैं अन्न हो [ अतिथि आदिको बिना दिये ] त्याच अन्न भक्षण करनेवालेको भक्षण यद्य कर जाता हूँ ” इस मन्त्रके अनुसार वति, अन्यत्र ( वैश्वदेवान्नसे भिन्न अन्न ८ भक्षण करनेमें ) ही प्रत्यवाय होना पूर्ण सम्भव है । ' द्वे देवानभाजयत् ' यह मन्त्रका मन्त्र पद है । पिताने जिन दो अन्नोंको प्राप्तौ रचकर देवताओंको बाँटा वे दो गति कौन से हैं? सो बतलाया जाता है-हुत और प्रहुत । ' हुत ' यह अग्निमें न्यं हवन करके करना कुलिहरण है, और ' प्रहुत ' हवन योरेव करना है । क्योंकि पिताने ये दो अन्न हुत और प्रहुत भाज १. देवताओंके लिये भाग निकालना ' बलिहरण ' कहलाताहै ।
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[ अध्याय १ सीने रचे हैं और योग किया है-वैश्वदेवसंज्ञक नेवाले पुरुषका होना युक्तिसङ्गत स्त्रोंमें ] बलि-प्रतिषेध नहीं किया कड़ने आदि कर्मों-वत: निन्दनीय यह शिष्ट पुरुषों-नेवाला है और प्रत्यवाय भी " मैं अन्न ही - बिना दिये ] वालेको भक्षण मन्त्र के अनुसार से भिन्न अन्न - प्रत्यवाय होना पत् ' यह मन्त्रका दो अन्नको बाँटा वेदो या जाता है-हुत ' यह अग्निमें र ' प्रहुत ' हवन दना है । क्योंकि हुत और प्रहुत है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभा ३३१ . देवानभाजयत्पिता । तस्मादेता पि गृहिणः काले देवेभ्यो जुह्वति देवेभ्य इदमन्नमस्माभिर्दीयमान मिति मन्वाना जुह्वति, प्रजुह्वति चहुत्वा बलिहरणं च कुर्वत इत्यर्थः । अथो अप्यन्य हुन् पित्रा देवेभ्यः प्रत्ते न हुतप्रहुते, किं तर्हि? दर्शपूर्णमासाविति । द्वित्वश्रवणाविशेषादत्यन्तप्रसिद्ध त्याच्च हुतप्रहुते इति प्रथमः पचः । यद्यपि द्वित्वं हुतप्रहुतयोः सम्भ-चति, तथापि श्रौतयोरेव तु दर्श-पूर्णमासयोदवान्नत्वं प्रसिद्धतरम् मन्त्रप्रकाशितत्वात् ॥ गुणप्रधान प्राप्तौ च प्रधाने प्रथमतरा अब-गतिः, दर्शपूर्णमासयोश्च प्राधा-न्यं हुतमहुतापेक्षया । तस्मात-योरेव ग्रहणं युक्तम् ' द्वे देवान-भाजयत् ' इति । देवताओंको दिये थे, इसलिये इस समय भी गृहस्थलोग समयपर देवताओंके लिये होम करते हैं; अर्थात् ' यह अन्त हमारे द्वारा देव-ताओंको दिया जाता है ’ - — ऐसा मानते हुए हवन करते हैं तथा ' प्रजुह्वति च ' अर्थात् हवन करके बलिहरण भी करते हैं । तथा किन्हीं दूसरोंका ऐसा भी. कहना है कि पिता द्वारा देवताओं-को दिये हुए दो अन्न हुत और प्रहुत नहीं हैं; तो कौन - से हैं? ' दर्श और पूर्णमास । द्विवचन - श्रवणमें समानता होनेसे और अत्यन्त प्रसिद्ध होनेसे हुत और प्रहुत ही वे अन् हैं - यह तो पहला पक्ष है । यद्यपि हुत और प्रहुतका द्वित्व सम्भव है, तो भी उनकी अपेक्षा श्रुतिप्रति-पादित दर्श और पूर्णमासका ही देवान्न होना अधिक प्रसिद्ध है, क्योंकि वे मन्त्रोक्त हैं । इसके सिवा जब गौण और प्रधान अर्थकी प्राप्ति हो तो पहले प्रधान अर्थका ही ज्ञान होगा, और हुत - प्रहुतकी अपेक्षा दर्शपूर्णमासी ही प्रधानता है । अतः ' द्वे देवानभाजयत् ' इस वाक्यसे उन्हींको ग्रहण करना उचित है [ - यह दूसरा पक्ष है ] ।
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३३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्म यस्माद्देवार्थमेते पित्रा प्रक्लप्से दर्शपूर्णमासाख्ये अन्ने, तस्मात्त-योर्देवार्थत्वाविघाताय नेष्टियाजुक इष्टियजनशीलः; इष्टिशब्देन । किल काम्या इष्टयः, शातपथीयं! प्रसिद्धिः ताच्छील्यप्रत्ययप्रयो-गात्काम्येष्टियजनप्रधानो न स्या-दित्यर्थः । पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति-यत्पशुभ्य एकं प्रा-पश्वन्नमेकम् यच्छत्पिता किं पुन-स्तदन्नम्? तत्पयः । कथं पुनरव-गम्यते पशवोऽस्पान्नस्य स्वामिनः इत्यत आह - यो ह्य े प्रथमं यस्मान्मनुष्याश्च पशवश्च पयः एवोपजीवन्तीति । उचितं हि ' तेषां तदन्नम् ' अन्यथा कथं तदेवा नियमेनोपजीवेयुः १ कथमग्रे तदेवोपजीवन्ति १ इत्यु-क्योंकि ये दर्श और पूर्णमास- च्यते संज्ञक अन्न पिताने देवताओंके लिये त्तेनैव बनाये हैं, इसलिये उनकी देवार्थंता-का विघात न करनेके लिये इष्टि- पित्रा याजुक -- इष्टियजनशील नहीं होना चाहिये । ' इष्टि ' शब्द से यहाँ काम्य तस्मा इष्टियाँ ( यज्ञ ) समझनी चाहिये, त्रैवप यह शतपथ ब्राह्मणकी प्रसिद्धि है । संयु , ' इष्टियाजुक: ' इस पदमें ' उकञ् ' प्रत्यय ताच्छील्य ( तत्स्वभावता ) स्तन अर्थ में प्रयुक्त है, अतः इसका तात्पर्य पाय यही है कि प्रधानतया कामनायुक्त यज्ञोंका यजन नहीं करना चाहिये । स्तन स्यो ' पशुभ्य एकं प्रायच्छत् ' इति— पिताने पशुओंको जो एक अन्न दिया जात था, वह कौन - सा है? वह दुग्ध है । इत्य किंतु यह कैसे जाना जाता है कि इस अन्नके स्वामी पशु हैं - ऐसा नाह प्रश्न प्रश्न होनेपर कहते हैं – क्योंकि पय मनुष्य और पशु पहले यानी आरम्भ- श में दुग्धके आश्रय ही जीवन धारण करते हैं । अतः ' यह उनका अन्न जीव है ' ऐसा कहना उचित ही है । र्वथ नहीं तो वे आरम्भमें नियमसे उसीके स्य आश्रय जीवन - धारण क्यों करते? कर वे पहले उसीके आश्रय किस प्रकार जीवन धारण करते हैं? सो
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[ अध्याय१ शं और पूर्णमास-ने देवताओंके लिये उनकी देवार्थता-करनेके लिये इष्टि-नशील नहीं होना शब्दसे यहाँ काम्य समझनी चाहिये, की प्रसिद्धि है । इस पदमें ' उकञ ' - ( तत्स्वभावता ) नतः इसका तात्पर्य - तया कामनायुक्त हीं करना चाहिये । प्रायच्छत् ' इति— जो एक अन्न दिया - है? वह दुग्ध है । हाना जाता है कि मी पशु हैं- ऐसा कहते हैं — क्योंकि हले यानी आरम्भ-ही जीवन धारण ' यह उनका अन्न उचित ही है । नमें नियमसे उसीके रण क्यों करते? सीके आश्रय किस रण करते हैं? सो ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३ च्यते - मनुष्याश्च पशवश्च यस्मा - । तेनैवान्नेन वर्तन्तेऽद्यत्वेऽपि यथा पित्रा आदौ विनियोगः कृतस्तथा । तस्मात्कुमारं बालं जातं घृतं वा त्रैवर्णिका जातकर्मणि जातरूप-संयुक्तं प्रतिलेहयन्ति प्राशयन्ति । स्तनं वानुधापयन्ति पश्चात् पाययन्ति । यथासम्भवमन्येषां स्तनमेवाग्रे धापयन्ति मनुष्ये-भ्योऽन्येषां पशूनाम् । अथ वत्सं जातमाहुः ' कियत्प्रमाणो वत्सः? ' इत्येवं पृष्टाः सन्तोऽतृणाद इति । नाद्यापि तृणमत्ति, अतीव बालः, पयसैवाद्यापि वर्तत इत्यर्थः । यच्चाग्रे जातकर्मादौ घृतमुप-जीवन्ति, यच्चेतरे पय एव, तत्स-वथापि पय एवोपजीवन्ति; घृत-स्यापि पयोविकारत्वात्पयस्त्वमेव । कस्मात्पुनः सप्तमं सत्पश्वन्नं चतु बतलाया जाता है - पिताने आरम्भ-में जैसा विनियोग किया था, उसी-के अनुसार आज भी मनुष्य और पशुगण उसी अन्नके आश्रय रहते हैं । इसीसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- इन तीन वर्णोंके लोग नवजात कुमारको जातकर्मसंस्कारके समय सुवर्णसंयुक्त ( सुवर्णकी शलाकादिसे ) घृत चटाते हैं, अथवा स्तनपान कराते हैं, अर्थात् उसके पीछे दुग्ध-पान कराते हैं । तथा जातकर्मके अनधिकारी दूसरे मनुष्योंके उत्पन्न हुए बालकको एवं मनुष्योंसे भिन्न पशुओंके बछड़ोंको भी यथासम्भव पहले स्तन ही चुसाते हैं । जब बछड़ा उत्पन्न होता है, तो उसके विषयमें यह पूछे जानेपर कि ' बछड़ा कितना बड़ा है? ' यही कहते हैं कि ' अभी घास खानेवाला नहीं हुआ ' । तात्पर्य यह है कि अभीतक घास नहीं खाता, बहुत ही छोटा है, केवल दूध पीकर ही रहता है । इस प्रकार जो पहले जातकर्म आदिमें घृतके आश्रय जीवन धारण करते हैं और जो दूसरे जीव दुग्धके ही आश्रय रहते हैं वे सब सर्वथा दुग्ध-के ही उपजीवी हैं; क्योंकि दुग्धका विकार होने के कारण घृत भी दुग्धरूप ही है । किंतु [ मन्त्र ] पश्वन्न सातवाँ | होनेपर भी यहाँ ( ब्राह्मणमें ) इसकी
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३३४ १ ब्राह र्थत्वेन व्याख्यायते १ कर्मसाधन | चतुर्थरूपसे व्याख्या क्यों की गयी DEA पयो है? [ उत्तर - ] क्योंकि यह कर्मका । कर्म हि पयःसाधनाश्रयं साधन है 1 । अग्निहोत्रादि कर्म दुग्ध- प्रति त्वात्.. रूप साधनके ही आश्रित हैं । और अग्निहोत्रादि । तच्च कर्म साधनं । वह कर्म आगे कहे जानेवाले श्वन्न विचसाध्यं वक्ष्यमाणस्यान्नत्रयस्य साध्यस्य, यथा दर्शपूर्णमासौ पूर्वोक्तावन्ने । अतः कर्म पक्षत्वात् कर्मणा सह पिण्डीकृत्योपदेशः । साधनत्वाविशेषादर्थसम्बन्धादा-नन्तर्यमकारणमिति च । व्याख्याने प्रतिपत्तिसौकर्याच्च । सुखं हि नैरन्तर्येण व्याख्यातुं शक्यन्ते-ऽन्नानि व्याख्यातानि च सुखं प्रतीयन्ते । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च १. चार अन्न साधन हैं और तीन साध्य-भूत तीन अन्नोंका वित्तसाध्य धिव साधन है जैसे कि पहले बतलाये यच्च हुए दर्श और पूर्णंमासनामक अन्न । स्था अतः कर्मके पक्षमें होनेके कारण नैव इसका कर्मके साथ मिलकर उपदेश तम किया गया है । [ दर्श - पूर्णमासके ष्ठात्व साथ ] साधनत्वमें समानता होनेके कार कारण इसका उनके साथ अर्थ में चायि भी सम्बन्ध है, इसलिये केवल पाठ- परि का आनन्तर्य इन के अर्थक्रममें अन्तर श्रुत डालनेका कारण नहीं हो सकता । स्थि इस प्रकार व्याख्या करनेसे समझने-च्या में भी सुगमता होती है । साधनभूत य अन्नोंकी व्याख्या एक साथ सुगमता- -कथं से की जा सकती है और इस प्रकार पयसा व्याख्या करनेपर अनायास ही -मृत्युं उनकी प्रतीति हो जाती है । ' फिल जो कोई प्राणनक्रिया करता है सप्त और जो नहीं करता वह सब उसीमें साध्य है; अतः उन साधन और साध्य- आहु भूत अन्नोंका विभाग करके व्याख्या करनेसे वक्ता श्रोता दोनोंके समझने में सुविधा समय होगी, इसीसे यहाँ पाठक्रमका अतिक्रमण करके पश्वन्नकी , व्याख्या की गयी है ।