बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 341–350
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350
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[ अध्याय१ या क्यों की गयी क्योंकि यह कर्मका होत्रादि कर्म दुग्ध-आश्रित हैं । और जानेवाले साध्य-नों का वित्तसाध्य क पहले बतलाये मासनामक अन्न । में होनेके कारण य मिलकर उपदेश [ दर्शपूर्णमासके में समानता होने के उनके साथ अर्थमें सलिये केवल पाठ-के अर्थक्रममें अन्तर नहीं हो सकता । ना करनेसे समझने-ती है । साधनभूत एक साथ सुगमता-है और इस प्रकार अनायास ही जाती है । " क्रिया करता है ता वह सब उसीमें साधन और साध्य-के समझने में सुविधा दया की गयी है । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३५ पयोद्रव्यस्य सर्व- प्राणिति यच्च नेत्य- । प्रतिष्ठात्वनिरू- स्य कोऽर्थः १ इत्यु-पणम् च्यते तस्मिन्प-श्वने पयसि सर्वमध्यात्माधिभूता-धिदैवलक्षणं कृत्स्नं जगत्प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति प्राणचेष्टावद्यच्च न स्थावरं शैलादि । तत्र हिशब्दे -नैव प्रसिद्धावद्योतकेन व्याख्या-तम् । कथं पयोद्रव्यस्य सर्वप्रति-ष्ठात्वम् १ कारणत्वोपपत्तेः । कारणत्वं चाग्निहोत्रादिकर्म सम-चायित्वम् । अग्निहोत्राद्याहुतिवि-परिणामात्मकं च जगत्कृत्स्नमिति श्रुतिस्मृतिवादाः शतशो व्यव -स्थिताः । श्रतो युक्तमेव हिशब्देन व्याख्यानम् । यत्तद्ब्राह्मणान्तरेष्विदमाहुः कथं संवत्सरं संवत्सरं पयसा जुह्व-पयसा जुह्वदप- दप पुनर्मृत्युं जय-मृत्युं जयति तीति, संवत्सरेण किल त्रीणि षष्टिशतान्याहुतीनां सप्त च शतानि विंशतिश्चेति । १ संवत्सर में तीन सौ साठ दिन होते प्रतिष्ठित है— इस वाक्यका क्या तात्पर्य है? सो बतलाया जाता है । उस दुग्धरूप पश्वन्तमें, जो प्राणन करता है अर्थात् प्राणचेष्टासे युक्त है और जो स्थावर पर्वतादि वैसे नहीं हैं, वे सब यानी अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूप सारा ही जगत् प्रतिष्ठित है । यहाँ प्रसिद्धिके द्योतक ' हि ' शब्दसे ही इसकी व्याख्या की गयी है । किंतु दुग्ध द्रव्य सबकी प्रतिष्ठा किस प्रकार है? क्योंकि उसमें कारणत्वकी उपपत्ति है । अग्निहोत्रादि कर्मसे सम्बन्ध होना ही उसका कारणत्व है । अग्निहोत्रादिकी आहुतियोंका विपरिणाम रूप ही सारा जगत् है-इस विषयमें सैकड़ों श्रुति - स्मृतिवाद व्यवस्थित हैं । अतः ' हि ' शब्दसे इसकी व्याख्या करना उचित ही है । ब्राह्मणान्तरोंमें जो ऐसा कहा है । कि एक संवत्सरपर्यन्त दुग्धसे हवन करनेवाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो यहाँ संवत्सरसे तीन सौ साठ अथवा सात सौ बीस आहुतियाँ अभिप्रेत हैं । ' वे संवत्सरके दिन - रात हैं, प्रत्येक दिनके दोनों समयके होमकी आहुतियोंको एक मानकर समस्त आहुतियाँ भी तीन सौ साठ होंगी और प्रत्येक समयकी एक - एक आहुति माननेसे उनकी संख्या सात सौ बीस होगी ।
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३३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्रा अभिसम्पद्यमानाः । याजुष्मतीरिष्टका संवत्सरस्य चाहोरात्राणि, संवत्सर-मग्नि प्रजापतिमाप्नुवन्ति; एवं कृत्वा संवत्सरं जुह्वदपजयति पुनः मृत्युम् इतः प्रत्य देवेषु सम्भूतः , पुनर्न म्रियत इत्यर्थः । इत्येवं ब्राह्मणवादा आहुः, न तथा विद्यान्न तथा द्रष्टव्यम्; यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्यु-मपजयति, न संवत्सराम्यासमपे-क्षते । एवं विद्वान्सन्, यदुक्तम्-पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं पय-आहुतिविपरिणामात्मकत्वात्सर्व-स्येति, तदेकेनैवाचा जगदात्म-त्वं प्रतिपद्यते; तदुच्यते-अपजयति पुनर्मृत्यु ं पुनर्भरणम्, यजुर्वेदोक्त इष्टकारूप होकर संवत्सर-रूप अग्नि प्रजापतिको प्राप्त करते सक हैं; ' ऐसी भावना करके एक वर्ष- सव तक हवन करनेवाला पुनमृत्युको जीत लेता है, अर्थात् यहाँसे मरकर परि देवताओंमें जन्म लेकर फिर नहीं मरता । मृत - ऐसा ब्राह्मणवाद कहते हैं, किंतु ऐसा नहीं समझना चाहिये, सम ऐसी दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; स्य क्योंकि पुरुष जिस दिन भी [ दुग्धसे ] सा हवन करता है, उसी दिन पुनर्मृत्यु-को परास्त कर देता है, इसके लिये एक वर्षतक अभ्यास करने की अपेक्षा कृ नहीं रखता । अतः इस प्रकार वैरे जानकर अर्थात् ऊपर जो कहा है कि सब दुग्धकी आहुतियोंका परि- भूत णामरूप होनेके कारण यह सब दुग्धमें ही प्रतिष्ठित है, वह वैसा " ब्र ही है - ऐसा जाननेवाला पुरुष एक तदै ही दिन आहुतिप्रदान करनेसे जगत्-के आत्मत्वको प्राप्त हो जाता है । हन्त यही बात श्रुति कहती है कि वह भूत पुनमृत्यु यानी दूसरी बार मरनेको भृत १. अर्थात् जो साधक उन आहुतियों में यजुर्वेदोक्त इष्टका - दृष्टि कर उन्हें चात संवत्सरके अवयवभूत अहोरात्र मानकर दुग्धसे हवन करता है, उसे संवत्सरात्म प्रजापतिकी प्राप्ति होती है । याजुषी इष्टकाओंकी संख्या भी तीन सौ साठ ही है, अत: उनकी आहुतियों और अहोरात्रसे संख्या में समानता है ।
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[ श्रध्याय१ रूप होकर संवत्सर-तिको प्राप्त करते करके एक वर्ष-चाला पुनमृत्युको र्थात् यहाँसे मरकर लेकर फिर नहीं ह्मणवाद कहते हैं, समझना चाहिये, रखनी चाहिये; स दिन भी [ दुग्धसे ] उसी दिन पुनमृत्यु-देता है, इसलि पास करने की अपेक्षा अतः इस प्रकार ऊपर जो कहा है. आहुतियोंका परि-कारण यह सब ष्ठित है, वह वैसा ननेवाला पुरुष एक दान करनेसे जगत्-नाप्त हो जाता है । कहती है कि वह दूसरी बार मरनेको इष्टका - दृष्टि कर उन्हें है, उसे संवत्सरात्मक तीन सौ साठ ही है ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ सकृन्मृत्वा विद्वाञ्छरीरेण वियुज्य सर्वात्मा भवति न पुनमेरणाय परिच्छिन्नं शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । कः पुनर्हेतुः सर्वात्माप्त्या मृत्युमपजयति १ इत्युच्यते - सर्वं समस्तं हि यस्माद्देवेभ्यः सर्वे-भ्योऽन्नाद्यमन्नमेव तदाद्यं च सायंप्रातराहुतिप्रक्षेपेण प्रयच्छति । तद्युक्तं सर्वमाहुतिमयमात्मानं कृत्वा सर्वदेवान्नरूपेण सर्वैर्दे-वैरेकात्मभावं गत्वा सर्वदेवमयो भूत्वा पुनर्न म्रियत इति । अथैतदप्युक्तं ब्राह्मणेन -" ब्रह्म चै स्वयम्भु तपोऽतप्यत तदैक्षत न वै तपस्यानन्त्यमस्ति, हन्ताहं भूतेष्वात्मानं जुहवानि भूतानि चात्मनीति, तत्सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठयं । बृ ० उ ० २२– ३३७ । जीत लेता है । अर्थात् वह विद्वान् एक बार मरकर — शरीरसे विलग होकर सर्वात्मा हो जाता है, पुनः मरनेके लिये परिच्छिन्न शरीर ग्रहण नहीं करता । किंतु वह सर्वात्मप्राप्तिके द्वारा जो मृत्युको जीत लेता है, इसका क्या कारण है? यह बतलाया जाता है- क्योंकि वह सायंकाल और प्रातः कालके आहुतिदानके द्वारा समस्त देवताओंको सम्पूर्ण अन्नाद्य — जो अन्न और आद्य ( भक्ष्य ) भी है - देता है । अतः अपनेको सर्वआहुतिमय करके समस्त देवताओंके अन्नरूपसे समस्त देव-ताओंके साथ एकत्वको प्राप्त होकर वह सर्वदेवमय होकर पुन: नहीं मरता — ऐसा कथन उचित ही है । ब्राह्मणने एक बात यह भी कही है - " स्वयम्भू ब्रह्म ( हिरण्यगर्भं ) ने तप ( कर्म ) किया | उसने विचार किया निश्चय ही इस तपमें अनन्तत्व ( अमृतत्व ) नहीं है । अच्छा तो मैं अपनेको भूतोंमें हवन करूँ और भूतोंको अपनेमें । अतः उसने समस्त भूतोंमें अपनेको और समस्त भूतों को अपनेमें हवन कर समस्त भूतोंका
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३३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येत् ” इति । । कस्मात्तानि न चीयन्तेऽद्यमा-अन्नानामक्षय- नानि सर्वदेति । त्वोपपादनम् यदा पित्रा अन्नानि सृष्ट्वा सप्त पृथक् पृथग्भोक्तृभ्यः प्रत्तानि, तदाप्रभृत्येव तैर्भोक्तृभि रद्यमानानि - तन्निमित्तत्वात्तेषां स्थितेः– सर्वदा नैरन्तर्येण; कृत-क्षयोपपत्तेश्च युक्तस्तेषां क्षयः । न च तानि क्षीयमाणानि, जगतो-ऽविभ्रष्टरूपेणैवावस्थानदर्शनात् । भवितव्यं चाक्षयकारणेन; तस्मा त्कस्मात्पुनस्तानि न चीयन्त इति प्रश्नः । तस्येदं प्रतिवचनम् - ' पुरुषो वा अक्षितिः ' । यथासौ पूर्वमन्ना-नां स्रष्टासीत्पिता मेधया जाया-दिसम्बन्धेन च पाङ्ककर्मणा भोक्ता च, तथा येभ्यो दत्तान्यन्नानि तेऽपि तेषामन्नानां भोक्तारोऽपि सन्तः पितर एव, मेधया तपसा श्रेष्ठत्व, स्वाराज्य और आधिपत्य प्राप्त किया । " अब ' कस्मात्तानि न क्षीयन्ते-ऽद्यमानानि सर्वदा ' इस श्रुतिका अर्थ किया जाता है । जब पिता के द्वारा रचे जाकर सात अन्न अलग-अलग भोक्ताओंको बाँटे गये थे,. तभीसे वे सर्वदा – - निरन्तर उन भोक्ताओं द्वारा खाये जा रहे हैं; क्योंकि उन अन्नोंके कारण ही उनकी स्थिति है । कृतक वस्तुका क्षय होना उचित ही है, अत: उनका भी क्षय होना युक्तियुक्त ही है । किंतु वे क्षय होते नहीं जान पड़ते, क्योंकि संसार अक्षय रूपसे ही स्थित दिखायी देता है । उनके इस अक्षय-का कोई कारण होना चाहिये; अतः यह प्रश्न होता है कि वे क्षीण क्यों नहीं होते? इसका उत्तर यह है – ' पुरुषो वा अक्षितिः ' । जिस प्रकार पहले य यह पिता विज्ञान और स्त्री आदिके सम्बन्धसे होनेवाले पाङ्क्तकर्मद्वारा क अन्नोंका रचयिता और भोक्ता था, उसी प्रकार जिन्हें वे अन्न दिये गये हैं वे भी उन अन्नोंके भोक्ता होते हुए भी उनके पिता ही हैं; क्योंकि वे भी विज्ञान और कर्मके द्वारा उन अन्नोंको
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[ अध्याय १ और आधिपत्य नन क्षीयन्ते-इस श्रुतिका । जब पिता T त अन्न अलग-बाँ गये थे,. - निरन्तर उन रहे हैं; के कारण ही कृतक वस्तुका है, अत: उनका तयुक्त ही है । हीं जान पड़ते, रूपसे ही स्थित नके इस अक्षय-होना चाहिये; - है कि वे क्षीण यह है - ' पुरुषो प्रकार पहले र स्त्री आदिके नाङ्क्तकर्मद्वारा र भोक्ता था, अन्न दिये गये हैं का होते हुए भी क्योंकि वे भी राउन अन्नोंको ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३ ९ च यतो जनयन्ति तान्यन्नानि ॥ उत्पन्न करते हैं । इसीसे यह कहा तदेतदभिधीयते पुरुषो वै जाता है कि पुरुष, जो अन्नोंका योऽन्नानां भोक्ता सोऽक्षिति- भोक्ता है, वह अक्षिति यानी उनके रक्षयहेतुः । अक्षयका कारण है । कथमस्याक्षितित्वम्? इत्युच्यते- उसका अक्षितित्व किस प्रकार स हि यस्मादिदं भुज्यमानं सप्त- है? सो बतलाया जाता है — क्योंकि विधं कार्यकरणलक्षणं क्रियाफला- वह इस खाये जानेवाले कार्य - करण-रूप एवं कर्मफलात्मक सात प्रकार-स्मकं पुनः पुनर्भूयो भूयो जनयत के अन्नको पुनः पुनः – बार - बार उत्पादयति धिया धिया तत्तत्काल- ' धिया धिया'- ' - तत्तत् काल में होने-भाविन्या तया तया प्रज्ञया, कर्म- वाली तत्तद्बुद्धिसे और कर्मों यानी भिश्च वाङ्मनःकायचेष्टितैः वाक्, मन और शरीरकी चेष्टाओंसे ; यद्यदि उत्पन्न कर देता है । यदि वह इस ह यद्येतत्सप्तविधमन्नमुक्तं क्षण-मात्रमपि न कुर्यात्प्रज्ञया कर्ममिश्र, ततो विच्छिद्येत भुज्यमानत्वात्सा-तत्येन क्षीयेत ह । तस्माद्यथैवायं पुरुषो भोक्ता अन्नानां नैरन्तर्येण, यथाप्रज्ञं यथाकर्म च करोत्यपि । तस्मात्पुरुषोऽक्षितिः सातत्येन कर्तृत्वात् । तस्माद् भुज्यमानान्य-प्यन्नानि न क्षीयन्त इत्यर्थः । अतः प्रज्ञाक्रियालक्षणप्रबन्धा-रूढः सर्वो लोकः साध्यसाधन - । | उपर्युक्त सप्तविध अन्नको विज्ञान और कर्मोंके द्वारा एक क्षण भी उत्पन्न न करे, तो निरन्तर खाये जानेके कारण वह विच्छिन्न यानी क्षीण हो जाय । अतः जिस प्रकार वह पुरुष अन्नोंका निरन्तर भोक्ता हे, उसी प्रकार अपनी बुद्धि और कर्मके अनुसार उन्हें उत्पन्न भी करता है । अतः निरन्तर कर्ता होनेके कारण पुरुष अक्षिति है । इसीसे निरन्तर खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण नहीं होते - ऐसा इसका तात्पर्य है । अतः प्रज्ञा और क्रियासे लक्षित परम्परापर आरूढ़ हो साध्य तथा साधनरूपसे वर्तमान एवं कर्मका
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ ३४० क्रियाफलात्मकः संहता- | फलभूत यह सम्पूर्ण जड - चेतनमय लक्षणः • संसार क्षणिक, अशुद्ध, असार, नेकप्राणिकर्मवासना सन्तानावष्ट-व्धत्वात्क्षणिकोऽशुद्धोऽसारो नदी स्रोतः प्रदीप सन्तान कल्पः कदली- । स्तम्भवदसारः फेनमायामरीच्य-म्भःस्वप्नादिसमस्तदात्मगतदृष्टी-नामविकीर्यमाणो नित्यः सारखा निव लक्ष्यते । तदेतद्वैराग्यार्थमुच्यते – धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्तीयेत हेति – विरक्तानां ह्यस्माद्ब्रह्मविद्या आरब्धव्या चतुर्थ प्रमुखेणेति । यो चैतामक्षितिं वेदेति; वक्ष्यमाणान्यपि त्री-उपासनफलम् ण्यन्नान्यस्मिन्नवसरे व्याख्यातान्येवेति कृत्वा तेषां नदीके प्रवाह और दीपककी ज्योति-के समान [ अस्थिर ], कदलीस्तम्भ-के समान असार तथा फेन, मृग-तृष्णा - जल और स्वप्नादिके समान असत्य होकर भी, जिनकी दृष्टि इसमें आसक्त है, उन बहिर्मुख लोगोंको ही अविकीर्यमाण ( स्थिर ), नित्य और सारवान् - सा दिखायी देता है; क्योंकि परस्पर मिलकर रहनेवाले नाना प्राणियोंके अनन्त कर्मों एवं उनकी वासनाओंकी परम्परासे आबद्ध हो सुस्थिर जान. पड़ता है । उससे वैराग्य करानेके लिये ही श्रुति ऐसा कहती है- ' घिया धिया जनयते कर्मभिर्यंद्धेतन्न कुर्यात्क्षीयेत ' इत्यादि । जो इससे विरक्त हैं, उन्हींके लिये [ इस उपनिषद् ] चौथे अध्यायसे लेकर ब्रह्मविद्या आरम्भ करनी है । ' यो वैतामक्षितिं वेद ' इस मन्त्रसे, आगे कहे जानेवाले तीन अन्नों की भी इस समय व्याख्या कर दी गयी है - ऐसा मानकर उनके यथार्थं याथात्म्य विज्ञानफलमुपसंहियते - स्वरूपके विज्ञान के फलका उपसंहार
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अध्याय १ बुद्ध, असार, नककी ज्योति-कदलीस्तम्भ-फेन, मृग-दि समान जिनकी दृष्टि न बहिर्मुख माण ( स्थिर ), -सा दिखायी स्पर मिलकर णियों के अनन्त वासनाओं की सुस्थिर जान रानेके लिये ही - ' धिया धिया -न कुर्यात्क्षीयेत ' से विरक्त हैं, उपनिषद् ] कर ब्रह्मविद्या वेद ' इस मन्त्रसे, तीन अन्नोंकी या कर दी गयी उनके यथार्थं फलका उपसंहार ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ यो वा एताम् अक्षितिम् अक्षय हेतुं यथोक्तं वेद, पुरुषो वा अक्षितिः सहीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत हेति । सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेत्यस्यार्थ उच्यते — मुखं मुख्यत्वं प्राधान्य-मित्येतत् । प्राधान्येनैवान्नानां पितुः पुरुषस्याक्षितित्वं यो वेद सोऽन्नमत्ति नान्नं प्रति गुणभूतः । सन् । यथाज्ञो न तथा विद्वानन्ना -नामात्मभूतः, भोक्तैव भवति, न भोज्यतामापद्यते । स देवानपि -गच्छति स ऊर्जमुपजीवति, देवा-नपिगच्छति देवात्मभावं प्रति पद्यते; ऊर्जममृतं चोपजीवतीति यदुक्तं सा प्रशंसा, नापूर्वार्थो-ऽन्योऽस्ति ॥ २ ॥
३४१ | किया जाता है - जो भी इस अक्षिति अर्थात् ऊपर बतलाये हुए अक्षय हेतुको कि ' पुरुष ही अक्षिति है, वही तत्तद्बुद्धि और कर्मोंसे इस अन्नको उत्पन्न करता है, यदि वह उत्पन्न न करे तो यह निश्चय क्षीण हो जाय ' ऐसा जानता है, [ वह प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है ] । अब ' सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन ' इस श्रुतिका अर्थ कहा जाता है— मुख — मुख्यत्व अथात् प्राधान्यको कहते हैं । जो पुरुष अन्नोंके पिता पुरुषका अक्षितित्व जानता है, वह प्रधानतासे ही अन्न भक्षण करता है, अन्नके प्रति गौण होकर नहीं । अज्ञानी की तरह ज्ञानवान् अन्नोंका आत्मभूत नहीं होता; वह भोक्ता ही रहता है, भोज्यताको प्राप्त नहीं होता । तथा ' स देवानपिगच्छति स ऊर्जेमुपजी-वति ' वह ' देवान पिगच्छति ' – देवा-त्मभावको प्राप्त होता है और ऊर्ज यानी अमृतका उपजीवी होता है -ऐसा जो कहा है वह उसकी प्रशंसा है, इसका कोई दूसरा अपूर्व अर्थ नहीं है ॥ २ ॥
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३४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ आत्माके लिये तीन अन्न और पाङ्क्ङ्कस्य कर्मणः फलभूतानि यानि त्रीण्यन्नान्युपक्षिप्तानि तानि कार्यत्वाद्विस्तीर्णविषयत्वाच्च पूर्वे-भ्योऽन्नेभ्यः पृथगुत्कृष्टानि तेषां व्याख्यानार्थ उत्तरो ग्रन्थ आ ब्राह्मणपरिसमाप्तेः । उनका आध्यात्मिक विवेचन पाङ्क्तकर्मके फलभूत जिन तीन अन्नोंका ऊपर उल्लेख किया गया है वे कार्य तथा विस्तीर्णं विषय से सम्बद्ध होनेके कारण पूर्वोक्त अन्नोंसे अलग और उनकी अपेक्षा उत्कृष्ट हैं । उनकी व्याख्याके लिये इस ब्राह्मणकी समाप्तिपर्यंन्त आगेका ग्रन्थ है-त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मने-S कुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमंन्यत्रमना अभूवं नाभौष-मिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धाधृतिरधृतिर्हीींर्धीर्भी रित्ये-तत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजा-नाति यः कश्च शब्दो वागेव सा । एषा ह्यन्तमायंत्तैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्ये-तत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन, वाणी और प्राण इन्हें उसने अपने लिये किया । ' मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं सुना ' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है । काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( धारणशक्ति ), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय - ये सब मन ही हैं । इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है । जो कुछ भी शब्द है, वह वाक्ही है;
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[ अध्याय १ कविवेचन भूत जिन तीन किया गया तीर्ण विषय से अन्नों पेक्षा उत्कृष्ट के लिये इस न्त आगेका न्यात्मने-वं नाश्रौष-। कामः र्भीरित्ये-बसा विजा-मायत्तैषा न इत्ये-वाङ्मय र प्राण इन्हें नहीं देखा, कहता है, से ही सुनता क ), अवृति, कये जानेपर चाकू ही है; ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३ क्योंकि यह अभिधेयके पर्यवसानमें अनुगत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं है । प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन - ये सब प्राण ही हैं । यह आत्मा ( शरीर ) एतन्मय अर्थात् वाङ्मय, मनोमय मय और और प्राणमय ! ही है ॥३ ॥
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति को-s स्यार्थ इत्युच्यते - मनोवाक्प्राणा एतानि त्रीण्यन्नानि तानि मनो वाचं प्राणं चात्मने आत्मार्थ-मक्कुरुत - कृतवान् सृष्ट्वा श्रादौ पिता । तेषां मनसोऽस्तित्वं स्वरूपं च मनसोऽस्तित्व - प्रति संशय इत्यत निरूपणम् आह— अस्ति ताव-न्मनः श्रोत्रादिवाह्य करणव्यति-रिक्तम्, यत एवं प्रसिद्धम् - - बाह्य-करणविषयात्मसम्बन्धे सत्यप्य -भिमुखोभूतं विषयं न गृह्णाति, ' किं दृष्टवानसीदं रूपम् १ ' इत्युक्तो वदति - ' अन्यत्र मे गतं मन आसीत्सोऽहमन्यत्रमना श्रासं ना-दर्शम् ' । तथा ' इदं श्रुतवानमि मदीयं वचः१’इत्युक्तः ‘ अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषं न श्रुतवानस्मि ' इति । तस्माद् यस्यासन्निधौ रूपादि-ग्रहणसमर्थस्यापि सतश्चक्षुरादेः । ‘ त्रीण्यात्मनेऽकुरुत ' इस मन्त्रका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है— मन, वाक् और प्राण ये तीन अन्न हैं; उन मन, प्राण और वाक्-को पिताने प्रथम उत्पन्न कर उन्हें अपने लिये नियत किया । उनमें मनके अस्तित्व और स्वरूपके विषयमें सन्देह है, इसलिये श्रुति कहती है- श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न मन भी है; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि [ कभी - कभी ] पुरुष बाह्य इन्द्रिय, विषय और आत्माका सम्बन्ध रहते हुए भी अपने सामनेके विषयको ग्रहण नहीं करता, तथा यह पूछने पर कि ' क्या तूने यह रूप देखा है? ' कहता है--' मेरा मन अन्यत्र चला गया था, अतः मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं देखा । ' तथा यह पूछनेपर कि ' क्या तूने मेरा यह वचन सुना था? ' कहता है - ‘ मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं सुना । ' अतः जिसकी सन्निधि न होनेपर, रूपादिके ग्रहण में समर्थ नेत्र आदिके
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३४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ स्वस्वविषयसम्बन्धे रूपशब्दादि -ज्ञानं न भवति, यस्य च भावे भवति, तदन्यदस्ति मनो नामा न्तःकरणं सर्वकरणविषययोगि इत्यवगम्यते । तस्मात्सर्वो हि लोको मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति, तद्वयग्रत्वे दर्शनाद्यभा-वात् । अस्तित्वे सिद्धे मनसः स्वरू-मनःस्वरूप- पार्थमिदमुच्यते— निर्देश: कामः स्त्रीव्यति-कराभिलाषादिः, संकल्पः प्रत्यु-पस्थितविषयविकल्पनं शुक्ल- ' नीलादिभेदेन, विचिकित्सा संशय -ज्ञानम्, श्रद्धा अदृष्टार्थेषु कर्म-स्वास्तिक्यबुद्धिर्देवतादिषु च, अश्रद्धा तद्विपरीता बुद्धिः, वृति-धरणं देहाद्यवसादे उत्तम्मनम् अधृतिस्तद्विपर्ययः, हीर्लज्जा, धीः प्रज्ञा, भीर्भयम्, इत्येतदेव-मादिकं सर्वं मन एव मनसो ऽन्तःकरणस्य रूपाण्येतानि ॥ होते हुए भी उन्हें अपने - अपने विषय-का सम्बन्ध होनेपर रूप एवं शब्दा-दिका ज्ञान नहीं होता और जिसके रहते हुए वह होता है, वह उन नेत्रादिसे भिन्न समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाला मन नामका अन्तःकरण है - ऐसा ज्ञात होता है । अतः सब लोग मनसे ही देखते हैं और मनसे ही सुनते हैं; क्योंकि उसके व्यग्र होनेपर दर्शनादि क्रिया नहीं होती । इस प्रकार मनका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर उसके स्वरूपके विषयमें यह कहा जाता है— काम-स्त्री - सम्बन्धकी अभिलाषादि, संकल्प-सम्मुखस्थ विषयकी शुक्ल - नीलादि भेदसे विशेष कल्पना करना, विचिकित्सा - संशयज्ञान, श्रद्धा— जिनका फल अदृष्ट है, उन कर्मों और देवतादिमें आस्तिकताका भाव रखना, अश्रद्धा - इससे विपरीत भाव रखना, धृति - धारण अर्थात् देहादिके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखना, अधृति – इसके विप-रीत होना, ह्री- लब्बा, धी – बुद्धि और भी - भय - इत्यादि प्रकार के . ये सब भाव मन ही हैं; ये सब मन अर्थात् अन्तःकरणके रूप हैं ।