बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 531–540

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

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[ श्रध्याय २ का ही सार है ' यह विशेषरूपसे - त्यत् ( अमूर्त दोनों क्षण नेत्रस्थित पुरुष-सारत्वमें ही हेतुत्व के लिये है || ५ || वर्णन बदके वाच्य एवं ब्रह्म-अध्यात्म और अधि-के विभागका कार्य -विभाग किया गया । यथा माहारजनं यथाग्न्यर्चिर्यथा तव ह वा अस्य तिनेति न ह्येत-नधेय सत्यस्य ॥ ६ ॥

हुआ वस्त्र, जैसा ला, जैसा श्वेत कमल ानता है, उसकी श्री चाली ] होती है । अब । ' नेति नेति ' इससे यह उसका नाम है । कीड़ा । ब्राह्मण ३ ] ५२५ तस्य हैतस्य पुरुषस्य करुणा-त्मनो लिङ्गस्य रूपं वक्ष्यामो वासनामयं सूतमूर्तवासनाविज्ञा-नमय संयोगजनितं विचित्रं पट । भित्तिचित्रवन्मायेन्द्रजालमृग-तृष्णिकोपमं सर्वव्यामोहास्पदम् --एतावन्मात्रमेव आत्मेति विज्ञान-वादिनो वैनाशिका यत्र भ्रान्ताः, एतदेव वासनारूपं पटरूपवदा-त्मनो द्रव्यस्य गुण इत्ति नैया -यिका वैशेषिकाञ्च सम्प्रतिपन्नाः, इदमात्मार्थं त्रिगुणं स्वतन्त्र प्रधानाश्रयं पुरुषार्थेन हेतुना प्रवर्तत इति साङ्ख्याः । औपनिषद मन्या अपि केचि-भर्तृप्रपञ्चमतो- त्प्रक्रियां रचयन्ति -पन्यासः मूर्तामूर्तराशिरेकः, परमात्मराशिरुत्तमः ताभ्याम-न्योऽयं मध्यम; किल तृतीयः कर्त्रा भोक्त्रा विज्ञानमयेन अजात-शत्रुप्रतिबोधितेन सह विद्याकर्म-पूर्वप्रज्ञासमुदायः, प्रयोक्ता उस इस इन्द्रियात्मा लिङ्गशरीर-रूप पुरुषके वासनामय, मूर्तामूर्त स्वरूपकी वासना और विज्ञानमयके संयोगसे उत्पन्न हुए वस्त्र या भित्ति-पर लिखे हुए चित्रके समान विचित्र तथा माया- इन्द्रजाल एवं मृगतृष्णा-के समान सब प्रकारके व्यामोहके आश्रयभूत रूपका वर्णन करते हैं, जिसमें कि विज्ञानवादी वैनाशिकों-को ऐसा भ्रम हो गया है कि बस इतना ही आत्मा है, नैयायिक और वैशेषिक ऐसा मानने लगे हैं कि यह वासनारूप ही पटके रूपके समान ' आत्मा ' नामक द्रव्यका गुण है तथा सांख्यवादियोंका मत है कि यह तीन गुणवाला, स्वतन्त्र एवं प्रधानरूप आश्रयवाला [ अन्त: -करण ] पुरुषार्थके हेतुसे आत्माक लिये प्रवृत्त होता है । कोई - कोई अपनेको उपनिषद्-सिद्धान्तावलम्बी माननेवाले भी ऐसी प्रक्रिया रचते हैं — एक तो मूर्तामूर्त-राशि है और दूसरी परमात्मसंज्ञक उत्तम राशि है! तथा अजातशत्रुद्वारा | जगाये हुए कर्ता, भोक्ता विज्ञानमय-के साथ जो विद्या, कर्म और पूर्व -प्रज्ञाका समुदाय है, वह पूर्वोक्त दोनोंसे भिन्न तीसरी मध्यम राशि है | [ विद्या, पूर्वप्रज्ञा और ] कर्मका

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५२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ 2 कर्मराशिः, प्रयोज्यः पूर्वोक्तो | समुदाय प्रयोजक है तथा पूर्वोक्त मूर्तमूर्तभूतराशि एवं ज्ञान - कर्मके मूर्वामूर्तभूतराशिः साघनं चेति । साधन ( कार्य - कारणसमूह ) प्रयोज्य च तार्किकैः सह सन्धिं हैं । इस प्रकार तीन राशिको तत्र कल्पना कर लेनेके पश्चात् वे कुर्वन्ति । लिङ्गाश्रयश्चैष कर्म - तार्किकों के साथ सन्धि कर लेते हैं । और यह कर्मराशि लिङ्गदेहके राशिरित्युक्त्वा पुनस्ततस्त्रस्यन्तः आश्रित है, ऐसा कहकर फिर उससे साङ्ख्यत्वभयात्, सर्वः कर्म- हो जानेके डरसे डरते हुए ऐसा कहने लगते हैं कि राशि: - पुष्पाश्रय इव गन्धः पुष्प-- जिस प्रकार पुष्पके आश्रय रहने-वियोगेऽपि पुटतैलाश्रयो भवति तद्वत् - लिङ्गवियोगेऽपि परमा-स्मैकदेशमाश्रयति, स परमात्मैक-देशः किलान्यत आगतेन गुणेन कर्मणा सगुणो भवति निर्गुणोऽपि सन्, स कर्ता भोक्ता बध्यते मुच्यते च विज्ञानात्मा - इति वैशे-षिक चित्तमप्यनुसरन्ति, स च वाला गन्ध पुष्पके न रहनेपर भी पुड़िया या तैलके आश्रित रहता है उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मराशि, लिङ्ग-देहका वियोग होनेपर भी, परमात्मा-के एक देशको आश्रय करती है और परमात्माका वह एक देश अन्यसे प्राप्त हुए उस गुणरूप कमँके द्वारा, निर्गुण होनेपर भी सगुण हो जाता है तथा वह विज्ञानात्मा कर्ता भोक्ता ही बद्ध या मुक्त होता है — इस प्रकार वे वैशेषिकोंके चित्तका भी कर्मराशिर्भूतराशेरागन्तुकः, स्वतो आनेवाली अनुसरण करते हैं । भूतराशिसे वह कर्मराशि स्वतः निर्गुण एव परमात्मैकदेशत्वात् निर्गुण ही है, क्योंकि वह परमात्मा-का ही एक देश है । स्वयं उत्पन्न स्वत उत्थिता अविद्या अनागन्तु- हुई अविद्या अनागन्तुका होनेपर भी काप्युषरवदनात्मधर्मः — इत्यनया [ पृथिवीके धर्मं ] ऊसरके समान अनात्माका धर्मं हैं । इस प्रकार इस

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[ श्रध्याय २ जिक है तथा पूर्वोक्त माश एवं ज्ञान कर्मके कारणसमूह ) प्रयोज्य कार तीन राशिकी लेनेके पश्चात् वे नाथ सन्धि कर लेते हैं । कर्मराशि लिङ्गदेहके ऐसा कहकर फिर उससे न्त हो जानेके डरसे सा कहने लगते हैं कि पुष्पके आश्रय रहने-पुष्पके न रहनेपर भी के आश्रित रहता है सम्पूर्ण कर्मराशि, लिङ्ग-होनेपर भी, परमात्मा-को आश्रय करती है वह एक देश हुए उस गुणरूप कर्मके होनेपर भी सगुण हो ना वह विज्ञानात्मा कर्ता - या मुक्त होता है - इस विशेषिकोंके चित्तका भी करते हैं । भूतराशिसे वह कर्मराशि स्वतः है; क्योंकि वह परमात्मा-देश है । स्वयं उत्पन्न अनागन्तुका होनेपर भी धर्म ] ऊसरके समान धर्म हैं । इस प्रकार इस ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ. ५२७ कल्पनया साङ्ख्यचित्तमनु- । वर्तन्ते । सर्वमेतत्तार्किकैः सह सामज-तन्निरसनम् स्थकल्पनया रमणीयं पश्यन्ति, नोपनिषत्सिद्धान्तं सर्वन्यायविरोधं च पश्यन्ति; कथम्? उक्ता एव तावत्साव-यवत्वे परमात्मनःसंसारित्वसंव्रण-स्वकर्मफलदेशसंसरणानुपपच्या-दयो दोषाः; नित्यभेदे च विज्ञा-नात्मनः परेणैकत्वानुपपत्तिः । लिङ्गमेवेति चेत्परमात्मन उपचरितदेशत्वेन कल्पितं घट-करकभू छिद्राकाशादिवत्, तथा लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मदेशा-श्रयणं वासनायाः ॥ अविद्यायाश्च स्वत उत्थानम् ऊषरवत् - इत्यादि-कल्पनासे वे सांख्यमतावलम्बियोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं । तार्किकोंके साथ सामञ्जस्यकी कल्पना करके वे इस सारी व्यवस्था-को रमणीय मानते हैं, किंतु औप-निषदसिद्धान्तको तथा सब प्रकार-की युक्तियोंसे आनेवाले विरोधको नहीं देखते । सो किस प्रकार? परमात्माका सावयवत्व स्वीकार करनेपर उसमें संसारित्व, सच्छि-द्रत्व तथा कर्मफलभोगके स्थान में उत्पन्न होनेकी अनुपपत्ति आदि दोष बतलाये हो गये हैं । और यदि उनमें भेद माना जाय तो विज्ञानात्माका परमात्माके साथ अभेद होना सम्भव नहीं है । और यदि यह कहो कि घटा-काश, करकाकाश और भूछिद्रा-काशादिके समान लिङ्गशरीर ही परमात्मा के औपचारिक एक देशरूपसे कल्पित है [ अर्थात् लिङ्ग-रूप उपाधिसे कल्पित जो परमात्मा-का अंश है, वही जीवात्मा है ] तो ऐसी अवस्थामें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भी वासना परमात्मा के एक देशको आश्रित कर लेगी ' तथा ' ऊसर भूमिके समान | अविद्याका स्वयं ही उदय हुआ है ' १. स्वप्न आदि अवस्थाओंमें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर जीवात्मामें वासना नहीं रह सकती; क्योंकि लिङ्गका अभाव हो जानेपर उसके अधीन रहनेवाले जोव-का भी अभाव हो जाना सम्भव है । अतः लिङ्गका अभाव होनेपर जीवमें वासना रहती है - यह प्रक्रिया असंगत होगी; इसलिये यह मत ठीक नहीं है ।

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५२८ - बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ कल्पनानुपपन्नैव । न च वास्य । देशव्यतिरेकेण वासनाया वस्त्व-न्तरसञ्चरणं मनसापि कल्पयितुं । शक्यम् । न च श्रुतयो गच्छन्ति " कामः संकल्पो विचिकित्सा " बृ ० उ ० १ । ५ । ३ ) “ हृदये ह्येव रूपाणि " ( ३ । ९ । २० ) " ध्यायतीव लेलायतीव " ( ४ । ३ । ७ ) “ कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ” ( ४ । ४ । ७ ) " तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोका-न्हृदयस्य ” ( ४ । ३ । २२ ) इत्याद्याः । न चासां श्रुतीनां श्रुतादर्थान्तरकल्पना न्याय्या, आत्मनः परब्रह्मत्वोपपादनार्थपर-इत्यादि कल्पना असंगत ही ठहरेगी । इसके सिवा अपने निवासयोग्य स्थानको छोड़कर किसी अन्य वस्तु-में वासना सञ्चारित होनेकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा सकती । तथा इस विषय में " काम, संकल्प और संशय, ” “ हृदयमें हो रूप प्रतिष्ठित हैं ", " मानो ध्यान करता है, मानो वेगसे चल रहा है " “ जो संकल्प इसके हृदयमें स्थित हैं ", " उस समय वह हृदयके समस्त शोकोंसे पार हो जाता है ” इत्यादि श्रुतियाँ भी सहमत नहीं हैं । इन श्रुतियोंका यथाश्रुत अर्थ छोड़कर किसी दूसरे अर्थकी कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ये आत्मा-का परब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त हैं तथा इसी अर्थमें समस्त त्वादासाम्, एतावन्मात्रार्थोपक्षय- उपनिषदोंका पर्यवसान होता है । त्वाच्च सर्वोपनिषदाम् । तस्मा-च्छुत्यर्थ कल्पनाकुशलाः सर्व एवोपनिषदर्थमन्यथा कुर्वन्ति । तथापि वेदार्थश्चेत्स्यात्कामं भवतु, न मे द्वेषः । न च ' द्ववाव ब्रह्मणो रूपे ' इति राशित्रयपक्षे समञ्जसम्; अतः श्रुतिके अर्थकी कल्पना करने-में कुशल ये सभी लोग उपनिषद्क अर्थको उलटा कर करदत देते हैं । तो भी यदि वह वेदका तात्पर्य हो तो भले ही रहे, मेरा उससे कोई द्वेष नहीं है । किंतु [ भतृ प्रपञ्चके ] राशित्रय-सिद्धान्तमें ब्रह्मके दो ही रूप हैं ' ऐसा कहना उचित नहीं है; जब कि

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[ अध्याय २ ना असंगत ही ठहरेगी । - अपने निवासयोग्य ड़कर किसी अन्य वस्तु-सचरित होनेकी तो कल्पना नहीं की जा स विषय में " काम, संशय, " " हृदय में ही हैं ", " मानो ध्यान वेगसे चल रहा है " इसके हृदय में स्थित मय वह हृदय के समस्त हो जाता है " इत्यादि सहमत नहीं हैं । इन यथाश्रुत अर्थ छोड़कर अर्थकी कल्पना करनी है; क्योंकि ये आत्मा-त्व प्रतिपादन करने में वाइसी अर्थ में समस्त - पर्यवसान होता है । अर्थकी कल्पना करने-सभी लोग उपनिषद्के टाकर I देते I हैं I । तो भी चिदका तात्पर्यं हो तो मेरा उससे कोई द्वेष _भतृप्रपञ्चके ] राशित्रय-ब्रह्मके दो ही रूप हैं ' ऐसा चित नहीं है; जब कि ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२ ९ यदा तु मूर्तमूर्ते तजनितवासनाश्च । मूर्तीमूर्ते द्वे रूपे, ब्रह्म च रूपि तृतीयम्, न चान्यच्चतुर्थमन्तराले-तदा एतदनुकूल मवधारणम्, द्वे एव ब्रह्मणो रूपे इति; अन्यथा ब्रह्मैकदेशस्य विज्ञानात्मनो रूपे इति कल्प्यम्, परमात्मनो वा विज्ञानात्मद्वारेणेति । तदा च रूपे एवेति द्विवचनमसमञ्जसम्, रूपाणीति वासनाभिः सह बहु-वचनं युक्ततरं स्यात् - द्वे च मूर्ता -मूर्ते वासनाच तृतीयमिति । अथ मूर्तामूर्ते एव परमात्मनो रूपे, वासनास्तु विज्ञानात्मन इति चेत् — —तदा तदा विज्ञानात्मद्वारेण विक्रियमाणस्य परमात्मनः - इतीयं वाचोयुक्तिरनर्थिका स्यात्, वास-नाया अपि विज्ञानात्मद्वारत्वस्य अविशिष्टत्वात् न च वस्तु वस्त्वन्तरद्वारेण विक्रियत इति मूर्तमूर्त और तज्जनित वासनाएं ये मूर्त और अमूर्तं दो रूप हों और उनसे रूपवान् ब्रह्म तीसरा रूप हो तथा इनके बीच में कोई चौथा रूप न हो, उसी समय ऐसा निश्चय करना ठीक होगा कि ब्रह्मके दो ही रूप हैं; नहीं तो ऐसा मानना होगा कि ये ब्रह्म के एक देश विज्ञानात्माके ही रूप हैं अथवा विज्ञानात्माके द्वारा परमात्मा के रूप हैं । उस समय भी ' रूपे ' ऐसा द्विवचनान्त प्रयोग उचित नहीं होगा, अपितु वासनाओंके साथ त्रित्व होनेके कारण ' रूपाणि ' ऐसा बहुवचनान्त प्रयोग अधिक उचित होगा; अर्थात् दो तो मूर्त और अमूर्त एवं तीसरा रूपवासेनाएँ । यदि कहो कि परमात्मा के रूप तो मूर्त और अमूर्त दो हो हैं, वासनाएँ तो विज्ञानात्माकी है तो उस अवस्था में [ मूर्तामूतके विषयमें ] ऐसी वाचोयुक्ति प्रदर्शित करना कि | ये विज्ञानात्माके द्वारा विकारको । प्राप्त होते हुए परमात्माके रूप हैं, व्यर्थं ही होगा, क्योंकि विज्ञानात्माका द्वारत्व तो वासनाओंके लिये भी ऐसा ही है । इसके सिवा एक वस्तु किसी अन्य वस्तुके द्वारा विकारको प्राप्त मुख्यया वृच्या शक्यं कल्पयितुम्; होती है - ऐसी मुख्यवृत्तिसे कल्पना बृ ० उ ० ३४-

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५३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ न च विज्ञानात्मा परमात्मनो वस्त्वन्तरम् तथा कल्पनायां सिद्धान्तद्दानात् ॥ तस्माद् वेदार्थ-मूढांनां स्वचित्तप्रभावा एवमादि-कल्पना अक्षरबाह्याः; न ह्यत्तर-बाह्य वेदार्थो वेदार्थोपकारी वा, निरपेक्षत्वाद्वेदस्य प्रामाण्यं प्रति तस्माद्राशित्रय कल्पना स-मञ्जसा । ' योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ' प्रकृतपरामर्शः इति लिङ्गात्मा प्रस्तु-तोऽध्यात्मे, अधिदैवे च ' य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः ' इति, ' तस्य ' इति प्रकृतोपादानात्स एवोपादी-यते योऽसौ त्यस्यामूर्तस्य रसो न तु विज्ञानमयः । ननु विज्ञानमयस्यैवैतानि रूपाणि कस्मान्न भवन्ति १ विज्ञान मयस्यापि प्रकृतत्वात्, ' तस्य ' इति च प्रकृतोपादानात् । भी नहीं की जा सकती । और विज्ञानात्मा परमात्मा से कोई भिन्न वस्तु भी नहीं है, क्योंकि ऐसी कल्पना करनेमें तो अद्वैतसिद्धान्तकी ही हानि होती है । अतः वेदार्थसे अनभिज्ञ उन पुरुषोंकी ऐसी मन-मानी कल्पना वेदाक्षरोंसे बाह्य है. और अक्षरोंको छोड़कर किया हुआ अर्थ वास्तविक वेदार्थं अथवा वेदार्थमें उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि अपने प्रामाण्य में वेद किसी-की अपेक्षा नहीं रखता; अत: राशि-त्रयकी कल्पना ठीक नहीं है । ' यह जो दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है ' इस वाक्यद्वारा अध्यात्म-प्रकरणमें लिङ्गात्माका वर्णन आरम्भ किया गया है तथा अधिदैव - प्रकरण में ' यह जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है ' इस प्रकार ' तस्य ' इस पदसे प्रकृत [ लिङ्गात्मा ] का ग्रहण किये जानेके कारण वही ग्रहण किया गया है जो कि यह अमूर्त त्यत्का रस है, विज्ञानमयका ग्रहण नहीं किया गया । पूर्व ० - यहाँ विज्ञानमयका भी - प्रकरण है, इसलिये ये विज्ञानमयके ही रूप क्यों नहीं हैं? क्योंकि ' तस्य ' इस पदसे तो प्रकृतका ही ग्रहण किया गया है ।

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[ अध्याय २ जा सकती । और परमात्मा से कोई भिन्न हीं है, क्योंकि ऐसी में तो अद्वैत सिद्धान्तकी है । अतः वेदार्थसे पुरुषों की ऐसी मन-T वेदाक्षरोंसे बाह्य है. को छोड़कर किया हुआ विक वेदार्थ अथवा योगी नहीं हो सकता; प्रामाण्य में वेद किसी-हीं रखता; अत: राशि-ठीक नहीं है । दक्षिण नेत्रान्तर्गत वाक्यद्वारा अध्यात्म-त्माका वर्णन आरम्भ तथा अधिदैव - प्रकरण में आदित्यमण्डलमें पुरुष र ' तस्य ' इस पदसे मा ] का ग्रहण किये -ण वही ग्रहण किया कि यह अमूर्त त्यत्का निमयका ग्रहण नहीं हाँ विज्ञानमयका भी सलिये ये विज्ञानमयके - नहीं हैं? क्योंकि पदसे तो प्रकृतका हो या है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१ नैवम् विज्ञानमयस्यारूपि-स्वेन विजिज्ञापथिषितत्वात्; यदि हि तस्यैव विज्ञानमयस्यैतानि माहारजनादीनि रूपाणि स्युस्त -स्यैव ' नेति नेति ' इत्यनाख्येय- । रूपतयादेशो न स्यात् । नन्यन्यस्यैवासावादेशो न तु विज्ञानमयस्येति? न, षष्ठान्ते उपसंहारात्-- " विज्ञातारमरे क्रेन विजानीयात् " इति विज्ञानमयं प्रस्तुत्य " स एष नेति नेति " ( ४।५।१५ ) इति " विज्ञपयिष्यामि " इति च प्रतिज्ञाता अर्थवस्यात् । यदि च विज्ञानमयस्यैव अव्यवहार्यमात्मस्वरूपं ज्ञाप-यितुमिष्टं स्यात्प्रध्वस्तसर्वोपाधि-विशेषम्, तत इयं प्रतिज्ञार्थ -वती स्यात् — येनासौ ज्ञापितो जानात्यात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति शास्त्र निष्ठां प्राप्नोति नोतिन बिभेति कुतश्चन । सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विज्ञानमयको अरूपवान्-रूपसे बतलाना अभीष्ट है । यदि ये माहारजनादिरूप उस विज्ञानमयके ही हों तो उसीका ' नेति - नेति ' इस प्रकार अनिर्वचनीयरूपसे आदेश नहीं किया जा सकता । पूर्व ० - किंतु यह आदेश तो किसी औरका ही है, विज्ञानमयका नहीं है? सिद्धान्ती- नहीं, क्योंकि, " अरे मैत्रेयि! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने " इस प्रकार [ विज्ञानमयरूप-से ] आरम्भ करके छठे अध्यायके अन्तमें “ वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है " इस प्रकार उप-संहार किया है तथा ऐसा माननेपर ही “ विशेषरूपसे ज्ञान कराऊँगा ” यह प्रतिज्ञा भी सार्थक हो सकती है | यहाँ यदि विज्ञानमयके ही सर्वोपाधिविनिर्मुक्त व्यवहारातीत | आत्मस्वरूपका ज्ञान कराना अभीष्ट होगा तभी यह प्रतिज्ञा सार्थक हो सकेगी, जिसका ज्ञान कराये जाने-पर यह अपनेहीको ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जानता और शास्त्रनिष्ठाको प्राप्त करता है तथा किसीसे भी भयको प्राप्त नहीं होता । १. अर्थात् उपनिषद्के चौथे अध्यायमें ।

पृष्ठ 538

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५३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ अथ पुनरन्यो विज्ञानमयः, अन्यः ' नेति नेति ' इति व्यप-दिश्यते - तदान्यददो ब्रह्मान्यो-ऽहमस्मीति विपर्ययो गृहीत: स्यात् न आत्मानमेवावेद हं ब्रह्मास्मि ' ( १ । ४ । ९ ) इति । तस्मात् ' तस्य हैतस्य ' इति लिङ्गपुरुषस्यैवैतानि रूपाणि । सत्यस्य च सत्ये परमात्म-लिङ्गात्मस्वरूप- स्वरूपे वक्तव्ये निर-निरूपणम् वशेषं सत्यं वक्त-व्यम्; सत्यस्य च विशेषरूपाणि वासनाः; तासामिमानि रूपाण्यु-च्यन्ते, एतस्य पुरुषस्य प्रकृतस्य लिङ्गात्मन एतानि रूपाणि; कानि तानि १ इत्युच्यन्ते-यथा लोके, महारजनं हरिद्रा तया रक्तं माहारजनं यथा वासो लोके, एवं स्त्र्यादिविषयसंयोगे तादृशं वासनारूपं रञ्जनाकार -मुत्पद्यते चित्तस्य, येनासौ पुरुषो रक्त इत्युच्यते वस्त्रादिवत् । और यदि विज्ञानमय कोई अन्य हो तथा ' नेति नेति ' इस वाक्यसे किसी अन्यका निर्देश किया गया हो तो उस अवस्था में ' यह ब्रह्म अन्य है तथा मैं अन्य हूँ ' ऐसा विपरीत ग्रहण किया जायगा; ' अपनेको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा ग्रहण नहीं होगा । अतः ' तस्य हैतस्य ' इत्यादि मन्त्रले बतलाये हुए ये रूप लिङ्गपुरुष ही हैं । सत्यके सत्य परमात्माका स्वरूप बतलाना है, अतः यहां सम्पूर्ण सत्य बतलाना आवश्यक है । सत्यके ही विशेषरूप वासनाएँ हैं, उनके ये रूप बतलाये जाते हैं, ये इस प्रकृत लिङ्गात्मा पुरुषके रूप हैं; वे रूप कौन - से हैं? सो बतलाये जाते हैं-लोकमें जिस प्रकार माहारजन वस्त्र - महारजन हल्दीको कहते हैं, उससे रँगा हुआ जो वस्त्र होता है, वही माहारजन है, उसी प्रकार स्त्री आदि विषयका संयोग होनेपर चित्त-का वैसा ही रञ्जनाकार वासनामय रूप उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण यह पुरुष वस्त्रादिके समान रक्त ( रँगा हुआ या अनुरक्त ) कहा जाता है ।

पृष्ठ 539

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[ अध्याय२ विज्ञानमय कोई अन्य ' नेति नेति ' इस वाक्यसे यका निर्देश किया गया अवस्था में ' यह ब्रह्म अन्य मैं अन्य हूँ ' ऐसा विपरीत या जायगा; ' अपनेको हो मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा ग्रहण । अतः ' तस्य हैतस्य ' मन्त्रसे बतलाये हुए ये रूप के ही हैं । कि सत्य परमात्माका बतलाना है, अतः यहां त्र्य बतलाना आवश्यक है । - विशेषरूप वासनाएं हैं, रूप बतलाये जाते हैं, ये लिङ्गात्मा पुरुषके रूप हैं; कौन - से हैं? सो बतलाये में जिस प्रकार माहारजन रजन हल्दीको कहते हैं, T हुआ जो वस्त्र होता है, रिजन है, उसी प्रकार स्त्री यका संयोग होनेपर चित्त-व्ही रञ्जनाकार वासनामय न्न हो जाता है, जिसके ह पुरुष वस्त्रादिके समान T हुआ या अनुरक्त ) कहा ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३३ यथा च लोके पाण्ड्वाविकम्, तथा लोकमें जिस प्रकार पाण्डु आविक ( सफेद ऊन ) होता है, अवेरिदम् श्राविकम् ऊर्णादि, यथा अवि ( भेड़ ) के विकार ऊन आदि-च तत्पाण्डुरं भवति, तथान्यद्वा-सनारूपम् । यथा च लोके इन्द्र-गोपोऽत्यन्तरक्तो भवति एवमस्य वासनारूपम् । । क्वचिद्विषयविशेषा-पेक्षया रागस्य तारतम्यम्, क्वचित्पुरुष चित्तवृत्यपेक्षया । यथा च लोकेऽग्न्यचिर्भास्वरं भवति, तथा क्वचित्कस्यचिद्वासना -रूपं भवति । यथा पुण्डरीकं शुक्लस्, तद्वदपि च वासनारूपं कस्यचिद्भवति । यथा सकृद्वि द्युत्तम्, यथा लोके सकृद्विद्योतनं सर्वतः प्रकाशकं भवति, तथा ज्ञानप्रकाशविवृद्धयपेक्षया कस्य- । चिद्वासनारूपमुपजायते । नैषां वासनारूपाणामादिरन्तो मध्यं सङ्ख्या वा, देशः कालो निमित्तं वावधार्यते — असङ्घयेयत्वाद्वास-को आविक कहते हैं, जिस प्रकार वह पाण्डुर ( श्वेतवर्ण ) होता है, उसी प्रकार दूसरी वासनाका रूप है । इसी प्रकार लोकमें जैसे इन्द्र-। गोप लाल रंगका होता है, वैसा ही इस पुरुषकी वासनाका भी रूप होता है । यहां कहीं तो विषयविशेषकी अपेक्षासे रागका तारतम्य है और कहीं पुरुष-की चित्तवृत्तिकी अपेक्षासे है । तथा लोकमें जिस प्रकार अग्नि-की ज्वाला दीप्तिमती होती है, वैसे ही कहीं कहीं किसीकी वासनाओं का रूप भी होता है । और जिस तरह पुण्डरीक ( श्वेत कमल ) सफेद रंगका होता है, उस प्रकार भी किसी-की वासनाओंका रूप होता है । जिस प्रकार सकृद्विद्युत्त - लोकमें बिजलीका एक बार चमकना सब ओर प्रकाश करनेवाला होता है, वैसे ही ज्ञानरूप प्रकाशको वृद्धिकी अपेक्षासे किसीकी वासनाका रूप हो जाता है । वासना के इन रूपोंके आदि, अन्त, मध्य, संख्या अथवा देश, काल या निमित्तका कोई निश्चय नहीं किया जा क्योंकि वासनाएँ अगणित हैं और

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५३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

नायाः, वासनाहेतूनां चानन्त्यात् ।

तथा च वक्ष्यति षष्ठे - " इदंमया -ऽदोमयः ” ( ४ । ४ । ५ ) इत्यादि ॥

तस्मान्न स्वरूपसङ्ख्यावधार-णार्था दृष्टान्ताः - ' यथा माहारजनं वासः इत्यादयः, किं तर्हि? प्रकार प्रदर्शनार्थाः - एवम्प्रका-राणि हि वासनारूपाणीति । यत्तु वासनारूपमभिहितमन्ते सकृ-द्विद्योतनमिवेति,, तत्किल हिरण्य गर्भस्य अव्याकृतात्प्रादुर्भवत: तडिद्वत्सकृदेव व्यक्तिर्भवतीति तत्तदीयं वासनारूपं हिरण्यगर्भस्य यो वेद तस्य सकृद्विद्युत्व, ह वै इत्यवधारणार्थौ, एवमेवास्य श्रीः ख्यातिर्भवतीत्यर्थः; यथा हिरण्य-गर्भस्य - एवमेतद्यथोक्तं वासना-रूपमन्यं यो वेद । वासनाओं के हेतुओंका भी कोई अन्त नहीं है; जैसा कि छठे ( उप-निषट्के चौथे ) अध्यायमें " इदंमयः अदोमयः " आदि श्रुति बतलावेगी । अत: ' जिस प्रकार माहारजन वस्त्र होता है ' इत्यादि दृष्टान्त स्वरूप - संख्याका निश्चय करनेके लिये नहीं हैं; तो फिर किसलिये हैं? रूपों का प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये हैं अर्थात् वासनाके रूप इस-इस प्रकारके हैं — यह दिखाने के लिये हैं । अन्तमें जो ' एक बार बिजली चमकने के समान ' वासना-का रूप दिखाया गया है, वह यह दिखानेके लिये है कि अव्याकृतसे प्रादुर्भूत होते हुए हिरण्यगर्भकी विजलीके समान एक बार ही अभि-व्यक्ति होती है । अतः जो उस हिर-गर्भकी वासना के रूपको जानता है, उसकी सकृद्विद्युत्ता - सी होती है ॥ यहाँ ' ह ' और ' वै ' — ये दोनों निपात निश्वयार्थक हैं । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जो वासनाके इस अन्तिम रूपको जानता है, उसकी इसी प्रकार श्री यानी ख्याति होती है, जैसी कि हिरण्यगर्भकी ।