श्रीगणेशाय नमः।
बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 521–530
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
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[ अध्याय २ कारण उसका ' नेति-प्रकार निर्देश किया जिनके अपवादद्वारा न - नेति ' इस प्रकार जाता है वे उस पर-माके ये दो रूप हैं । शब्द निश्चयार्थक है । चाद्वारा आरोप किये न रूपोंके द्वारा अरूप पित होता है, वे ये दो वे दो रूप कौन - से हैं? - मूर्त ही तथा ' अमूर्त ही [ वे रूप हैं ] । अर्थात् - अपने अन्य विशेषणों-हो जाता है, ऐसे और अमूर्त II दो I I ही I I रूप जाते हैं । और अमूर्तके वे अन्य न - से हैं? सो बतलाये त्यं च मर्त्य - मरण-अमृत - मर्त्यसे विपरीत T, स्थित - परिच्छिन्न गतिपूर्वक स्थित रहने-और यत् - जो जाता हो व्यापक, अपरिच्छिन्न तसे विपरीत स्वभाव-- दूसरों की अपेक्षा निरूपित किये जाने-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्य ५१५ साधारणधर्मविशेषवत्, त्यच्च - तद्वि- | वाले असाधारण धर्मविशेषवाला और त्यत् — सत्से विपरीत स्वभाव-परीतम् ' त्यत् ' इत्येव सर्वदा वाला अर्थात् ' वह ' इस प्रकार सर्वदा परोक्षरूपसे कहे जाने परोक्षाभिधानार्हम् ॥ १ ॥ योग्य ॥ १ ॥
मूर्तीमूर्त विभागपूर्वक मूर्तरूप और उसके रसका वर्णन तत्र चतुष्टर्याविशेषणविशिष्टं इस प्रकार मूर्त और अमूर्त चार विशेषण युक्त हैं । उनमें कौन - से मूर्त तथा अमूर्त च । तत्र कानि विशेषण मूर्तके हैं और कौन - से मूर्तविशेषणानि कानि चेतराणि? अमूर्तके? इसका विभाग किया इति विभज्यते- जाता है-तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्य-मेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥
जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है । यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है । उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता तदेतन्मूर्त मूर्च्छितावयवम् इत- । रेतरानुप्रविष्टावयवं घनं संहत-मित्यर्थः । किं तत् १ यदन्यत्; कस्मादन्यत्? वायोश्चान्तरिक्षाच्च । भूतद्वयात् — - परिशेषात् पृथि है । यह सत्का ही रस है ॥ २ ॥
वह यह मूर्त अर्थात् मिले हुए अवयवोंवाला है, इसके अवयव एक दूसरेमें अनुप्रविष्ट रहते हैं, यह घनीभूत अर्थात् संहत है । वह क्या हे? जो अन्य है; किससे अन्य है? वायु और अन्तरिक्ष इन दो भूतों-से; अत: बचे हुए पृथिवी आदि व्यादिभूतत्रयम् ।तीन भूत हो मूर्त हैं ।
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५१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ एतन्मर्त्यम् - यदेतन्मूर्ताख्यं भूतत्रयमिदं मत्यं मरणधर्मि; कस्मात् यस्मात्स्थितमेतत्; परि च्छिन्नार्थान्तरेण सम्प्रयुज्यमानं विरुध्यते — यथा घटः स्तम्भ -कुडचादिना; तथा मृतं स्थितं परिच्छिन्नम् अर्थान्तरसम्बन्धि ततोऽर्थान्तरविरोधान्मर्त्यम्; एत-त्सद्विशेष्यमाणासाधारणधर्मवत्, तस्माद्धि परिच्छिन्नम्, परिच्छिन्न-स्वान्मर्त्यम् अतो मूर्तम्; सूर्तत्वाद्वा मर्त्यम्, मर्त्यत्वात्स्थितम्, स्थित-त्वात्सत् । अतोऽन्योन्याव्य-भिचाराच्चतुर्णां धर्माणां यथेष्टं विशेषणविशेष्यभावो हेतुहेतु-मद्भावश्च दर्शयितव्यः । सर्वथापि तु भूतत्रयं चतुष्टयविशेषण-विशिष्टं मूर्त रूपं ब्रह्मणः । तत्र ' चतुर्णामेकस्मिन्गृहीते विशेषणे इतरद्गृहीतमेव विशेषणमि-त्याह — तस्यैतस्य मूर्तस्य एतस्य मर्त्यस्य, एतस्य स्थितस्य, एतस्य यह मर्त्य है है — - यह यह जो मूर्त-संज्ञक तीन भूत हैं मर्त्य – मरणधर्मी हैं । क्यों? क्योंकि ये स्थित हैं । परिच्छिन्न वस्तु ही किसी अन्य वस्तुसे संयोग किये जानेपर उससे विरुद्ध रहती है, जिस तरह स्तम्भ और भित्ति आदिसे घट । इस प्रकार मूर्त स्थित, परिच्छिन्न और अर्था-न्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला है, अतः अर्थान्तरसे विरोध होनेके कारण वह मर्त्य है । यह सत् अर्थात् विशे-ष्यमाण असाधारण धर्मोवाला है, इसीसे परिच्छिन्न है, परिच्छिन्न होने के कारण मर्त्यं है और इसीसे मूर्त है | अथवा मूर्त होने के कारण मर्त्य है, मर्त्य होने के कारण स्थित है और स्थित होनेके कारण सत् है । अतः इन चारों धर्मोंका एक-दूसरे में व्यभिचार न होनेके कारण इनका यथेष्ट विशेष्य - विशेषणभाव और कार्य - कारणभाव दिखलाना उचित है । यह चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रय सभी प्रकार ब्रह्मका मूर्तरूप है । इन चार विशेषणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करनेपर अन्य विशेषण भी गृहीत हो ही जाते हैं; इसीसे श्रुति कहती है- - उस इस मूर्तका, इस मत्येंका, इस स्थितका
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[ अध्याय २ है - यह जो मूर्त नत हैं मर्त्य – मरणधर्मी क्योंकि ये स्थित हैं । वस्तु ही किसी अन्य किये जानेपर उससे - है, जिस तरह स्तम्भ आदिसे घट | इस प्रकार परिच्छिन्न और अर्था--ध रखनेवाला है, अतः विरोध होनेके कारण । यह सत् अर्थात् विशे-धारण धर्मोंवाला है, च्छिन्न है, परिच्छिन्न मर्त्य है और इसीसे मूर्त होनेके कारण् न होनेके कारण स्थित होनेके कारण सत् न चारों धर्मोंका एक-अचार न होनेके कारण विशेष्य - विशेषणभाव कारणभाव दिखलाना यह चार विशेषणोंसे सभी प्रकार ब्रह्मका इन चार विशेषणोंमेंसे 7 ग्रहण करनेपर अन्य गृहीत हो ही जाते हैं; कहती है - उस इस मत्यंका, इस स्थितका ब्राह्मण ३ ] ५१७ सतः-- चतुष्टयविशेषणस्य भूतत्रय -स्येत्यर्थः, एष रसः सारः इत्यर्थः । त्रयाणां हि भूतानां सारिष्ठः सविता; एतत्साराणि त्रीणि भूतानि यत एतत्कृतविभज्य -मानरूपविशेषणानि भवन्ति आधिदैविकस्य कार्यस्ततद्रूपम् -यत्सविता यदेतन्मण्डलं तपति; सतो भूतत्रयस्य हि यस्मादेष रस इत्येतद् गृह्यते । सूर्ती ह्येष सविता तपति, सारिष्ठश्च । यच्चाधिदैविकं करणं मण्डलस्याभ्यन्तरम्, तद्वक्ष्यामः ॥ २ ॥
और इस सत्का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त भूतत्रयका यह रस यानी सार है । तीनों ही D भूतोंका सारतम सविता है । तीनों भूत इसी सार-वाले हैं, क्योंकि वे इसीके द्वारा विभक्त किये हुए विभिन्न रूपोंवाले होते हैं । यह जो सविता है, जो यह सविनुमण्डल तपता है, वह आघि-दैविक कार्यका रूप है; क्योंकि यह सत्रूप भूतत्रयका रस है - इस प्रकार ग्रहण किया जाता है । यह मूर्त सविता ही तपता है और सार-तम भी है । और जो मन्डलान्तर्गत आधिदैविक करण है, उसका हम आगे वर्णन करेंगे ॥ २ ॥
विशेषणोंसहित अमूर्त रूप और उसके रसका वर्णन अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्त्यत्त-स्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्त्यस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥
तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत हैं, ये यत् हैं और ये ही त्यत् हैं । उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का
यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है ।
यह अधिदैवत - दर्शन है ॥ ३ ॥
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५१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ श्रथामूर्तम्- अथाधुनामूर्त-मुच्यते । वायुश्चान्तरिक्षं च यत्परिशेषितं भूतद्वयम् - एतद-मृतम्, अमृर्तत्वात्; अस्थितम्, अथोऽविरुध्यमानं क्रेन चित्, अमृतममरणधर्म । एतद्यत्स्थित-विपरीतम् व्यापि, अपरिच्छिन्नम्, यस्मात् ' यत् ' एतद् अन्येभ्यो-ऽप्रविभज्यमानविशेषम्, अत स्त्यत्, ' त्यत् ' इति परोक्षा-भिधानार्हमेव -- पूर्ववत् । तस्यैतस्या मूर्तस्य तस्यामृतस्यै -तस्य यत एतस्य त्यस्य चतुष्टयवि-शेषणस्यामूर्तस्यैष रसः कोऽसौ १ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः-करणात्मको हिरण्यगर्भः प्राण इत्यभिधीयते यः, स एषोऽमूर्त-स्य भूतद्वयस्य रसः पूर्ववत्सारिष्ठः । अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है । वायु और अन्तरिक्ष जो दो भूत रह गये हैं, वे अमृत हैं; क्योंकि वे अमूर्त हैं तथा अमूर्त होने-के कारण ही वे अस्थित हैं । बतः किसीसे भी उनका विरोध नहीं है, अमृत कहते हैं अमरणधर्मीको, यह यत् ( चल ) अर्थात् स्थितसे विप-रोत व्यापी यानी अपरिच्छिन्न है, चूँकि दूसरोंसे इस ' यत् ' के विशे-षण विभक्त नहीं हैं, इसलिये यह ' त्यत् ' है, अर्थात् ' त्यत् ' इस प्रकार पूर्ववत् परोक्षरूपसे ही पुकारे जाने योग्य है | उस इस अमूर्तका, इस अमृत-का, इस यत् ( गतिशील ) का और इस यत् ( परोक्ष ) का अर्थात् इन चार विशेषणोंसे युक्त अमूर्तका यह रस है । वह कोन है? जो कि यह इस मण्डलमें पुरुष यानी इन्द्रियात्मा हिरण्यगर्भ यानी प्राण – ऐसा कहा जाता है । वही इस अमूर्त भूत-द्वयका रस अर्थात् पूर्ववत् सारतम भाग है । एतत्पुरुषसारं चामूर्त भूतद्वयम्-- अमूर्तं भूतद्वय इस पुरुषरूप सार्-हैरण्यगर्भलिङ्गारम्भाय वाले हैं । हिरण्यगर्भंरूप लिङ्गात्माके हि भूत- आरम्भके लिये ही अव्याकृतसे द्वयामिव्यक्तिरव्याकृतात् इन दोनों भूतोंकी अभिव्यक्ति होती है । तस्माचादर्थ्यात्तत्सारं भूतद्वयम् अत: उसके लिये अर्थात् उसके । ' साधन होनेसे ये भूतद्वय उस पुरुष-
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[ अध्याय २ 220 नर्तका वर्णन किया वायु और अन्तरिक्ष जो गये हैं, वे अमृत हैं; मूर्त हैं तथा अमूर्त होने-वे अस्थित हैं । अतः उनका विरोध नहीं है, हैं अमरणधर्मीको, यह - अर्थात् स्थितसे विप-यानी अपरिच्छिन्न है, स इस ' यत् ' के विशे-नहीं हैं, इसलिये यह यत् ' त्यत् ' इस प्रकार नरूपसे ही पुकारे जाने अमूर्तका, इस अमृत ( गतिशील ) का और नरोक्ष ) का अर्थात् इन गोसे युक्त अमूर्त का यह कौन है? जो कि यह पुरुष यानी इन्द्रियात्मा नी प्राण- ऐसा कहा वही इस अमूर्त भूत-अर्थात् पूर्ववत् सारतम नद्वय इस पुरुषरूप सार-रण्यगर्भरूप लिङ्गात्मा के लिये ही अव्याकृतसे इन को अभिव्यक्ति होती है । लिये अर्थात् उसके ये भूतद्वय उस पुरुष -ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभ ५१ ९ त्यस्य ह्य ेष रसः -- यस्माद्यो मण्ड-लस्थः पुरुषो मण्डलवन्न गृह्यते सारश्च भूतद्वयस्य, तस्मादस्ति मण्डलस्थस्य पुरुषस्य भूतद्वय-स्य च साधर्म्यम्, तस्माद्युक्तं प्रसिद्धवद्धेतूपादानम् - त्यस्य ह्येप रस इति । रसः कारणं हिरण्यगर्भविज्ञा-नात्मा चेतन इति केचित् । तत्र च किल हिरण्यगर्भविज्ञानात्मनः कर्म वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तृ, तत्कर्म वाय्वन्तरिक्षाधारं सद-न्येषां भूतानां प्रयोक्तृ भवति तेन स्वकर्मणा वाय्वन्तरिक्षयोः प्रयोक्तेति तयो रसः कारण-मुच्यत इति । तन्न, मूर्तरसेनातुल्यत्वात् । मृर्तस्य तु भूतत्रयस्य रसो मूर्तमेव मण्डलं दृष्टं भूतत्र यसमानजातीयम्, न चेतनः; तथामूर्तयोरपि भूत-१. भर्तृ प्रपञ्चका । रूप सारवाले ही हैं । यह त्यत्का ही सार है; क्योंकि यह जो मण्ड-लस्थ पुरुष है, इसे मण्डलके समान ग्रहण नहीं किया जा सकता; इस-लिये यह भूतद्वयका सार है; अतः मण्डलस्थ पुरुष और इन दोनों भूतों का साधम्र्म्यं है, अतः ‘ यह त्यत्-का ही सार है ' इस प्रकार प्रसिद्धके समान [ त्यत्को इसका ] हेतु बत-लाना उचित ही है । किन्हींका मत है कि हिरण्य-गर्भविज्ञानात्मा चेतन रस यानी कारण है । उस अवस्थामें हिरण्य-गर्भविज्ञानात्माका कर्म वायु और अन्तरिक्षका प्रेरक है, वह कर्म वायु और अन्तरिक्षरूप आधारवाला होकर अन्य भूतोंका प्रेरक होता है; उस अपने कर्मके द्वारा हिरण्यगर्भ-विज्ञानात्मा वायु और अन्तरिक्ष-का प्रेरक है, इसलिये उनका रस यानी कारण कहा जाता है । किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि मूर्तके रस ( सार ) से इसकी सदृशता नहीं है । तीन मूर्त भूतोंका रस तो मूर्तमण्डल ही देखा गया है, जो भूतत्रयसे समान जातिवाला अर्थात् जड है, उनका रस चेतन नहीं है । इसी प्रकार अमूर्त भूतोंका
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५२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ योस्तत्समानजातीयेनैवामूर्तरसेन युक्तं भवितुम्; वाक्यप्रवृत्तेस्तु-ल्यत्वात् यथा हि मूर्तामूर्ते चतुष्टयधर्मवती विभज्येते, तथा रसरसवतोरपि मूर्तामूर्तयोस्तुल्ये-नैव न्यायेन युक्तो विभागः, न स्वर्धवैशसम् । | भी उनके समानजातीय ही अमूर्त रस होना चाहिये '; क्योंकि दोनों वाक्योंकी प्रवृत्ति समान ही है । जिस प्रकार चार धर्मोसे युक्त मूर्त और अमूर्तका विभाग किया गया है उसी प्रकार उसी न्यायसे मूर्त रसवान् और रस तथा अमूर्त रसवान् और रसका भी विभाग करना उचित है '; अर्धजरतीय न्यायका आश्रय लेना उचित नहीं है ।. मूर्तरसेऽपि मण्डलोपाधिश्वेतनो पूर्व ० " [ जिस प्रकार हम अमूर्त विवक्ष्यत इति चेत्? अत्यन्यमिदमुच्यते, सर्वत्रैव तु मूर्तामूर्तयोर्ब्रह्मरूपेण विषति-तत्वात् । ए भूतोंके रसको चेतन मानते हैं, उसी प्रकार ] यदि मूर्तभूतोंके रसमें भी मण्डलोपाधिक II चेतन II T ही I विवक्षित मानें तो? सिद्धान्ती - तुम्हारा यह कथन बहुत थोड़ा है, क्योंकि यहाँ [ मूर्त और अमूर्तं रस ही नहीं ] सर्वत्र ही मूर्त और अमूर्तं भूतमात्र ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं । १. अर्थात् जिस प्रकार अमूर्त भूत - वायु और अन्तरिक्ष जड जातिके हैं, उसी प्रकार उनका रस भी अमूर्त एवं जड होना उचित है । २. जैसे कि मन्त्र २ और ३ में यह बतलाया है कि ब्रह्मका मूर्तरूप मानू, मर्त्य, स्थित ( परिच्छिन्न ) और सत् है तथा अमूर्त रूप अमूर्तिमान् मूर्ति-अस्थित ( अपरिच्छिन्न ) और त्यत् है ।, अमृत, ३. जैसे रसवान् ( भूत ) मूर्त और अमूर्त दो प्रकारके हैं, तथा जड हैं, उसी प्रकार रस भी मूर्त और अमूर्त - दो प्रकारका तथा जड होना विभाग नहीं करना चाहिये कि मूर्त रस तो जड चाहिये । ऐसा क्योंकि ऐसी कल्पना अर्धजरतीय है और अमूर्तं रस चेतन है । होगी, जो अनुचित है ।
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[ अध्याय २ मानजातीय ही अमूर्त चाहिये; क्योंकि इन की प्रवृत्ति समान ही कार चार धर्मोंसे युक्त विभाग किया प्रकार उसी न्यायसे और रस तथा अमूर्त र रसका भी विभाग चत है; अर्धजरतीय वाश्रय लेना उचित जिस प्रकार हम अमूर्त चेतन मानते हैं, उसी - मूर्तभूतोंके रसमें भी क चेतन ही विवक्षित - तुम्हारा यह कथन है, क्योंकि यहाँ [ मूर्त रस ही नहीं ] सर्वत्र ही नूर्तं भूतमात्र ब्रह्मरूपसे 1 अन्तरिक्ष जड जातिके हैं, क ब्रह्मका मूर्त रूप मूर्ति-रूप अमूर्तिमान्, अमृत, के हैं, तथा जड हैं, उसी ड होना चाहिये । ऐसा और अमूर्त रस चेतन है । ब्राह्मण ३ ] पुरुषशब्दोऽचेतनेऽनुपपन्न । इति चेत्! डा.न, पक्ष पुच्छादिविशिष्टस्यैव लिङ्गस्य पुरुषशब्ददर्शनात् । “ न चा इत्थं सन्त: शक्ष्यामः प्रजाः प्रजनयितुमिमान्सप्त पुरुषानेकं पुरुषं करवामेति त एतान्सप्त पुरुषानेकं पुरुष मकुर्वन् " इत्यादौ अन्नरसमयादिषु च श्रुत्यन्तरे पुरुषशब्दप्रयोगात । इत्यधिदैवत-मित्युक्तोपसंहारोऽध्यात्म विभागो -क्स्यर्थः ॥ ३ ॥ ि
५२१ पूर्व ० - किंतु ' पुरुष ' शब्दका अचेतनमें प्रयोग होना तो सम्भव नहीं है! सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; [ तैत्तिरीय श्रुतिमें तो ] पक्ष और पुच्छविशिष्ट लिङ्गशरीरको ही पुरुष-शब्दवाची देखा गया है । तथा " हम इस प्रकार अलग - अलग रहते हुए प्रजा उत्पन्न नहीं कर सकते । अतः इन सात पुरुषोंको हम एक कर: दें - ऐसा विचारकर उन्होंने इन सात पुरुषोंको एक कर दिया " इत्यादि अन्यश्रुतियों के वाक्योंमें अन्न-रसमयादिके अर्थ में पुरुष शब्दका प्रयोग किया गया है । ' यह अधि-दैवत मूर्तामूर्त है ' ऐसा कहकर जो पूर्वोक्तका उपसंहार किया गया है, वह अध्यात्म मूर्तामूर्तका विभाग बतलाने के लिये है ॥ ३ ॥
अध्यात्म मूर्तीमूर्तके विभागपूर्वक मूर्तका वर्णन अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चा-यमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यै-तस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥
अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है । जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है उससे भिन्न है, यही मूर्त है । यह मर्त्य है, १. सात पुरुष ये हैं — श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक् और मन ।
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५२२ स्थित है यह सत् है । यह जो नेत्र है वही इस मूर्तका, इस मका, यह इस स्थितका, एवं इस सत्का सार है यह सत्का ही सार है ॥ ४ ॥
अथाधुनाध्यात्मं मूर्तमूर्तयो-विभाग उच्यते — किं तन्मूर्तम् 1 इदमेव, किं चेदम्! यदन्यत्प्राणाच्च । वायोर्यश्चापमन्तरम्यन्तरे आत्म-न्नान्मन्याकाशः खं शरीरस्थश्च यः । प्राण एतद् द्वयं वर्जयित्वा यद-1. न्यच्छरीरारम्भकं भूतत्रयम्, एत-न्मर्त्यमित्यादि ममानमन्यत्पूर्वेण । एतस्य सतो ह्येष रसः - यच्चक्षु-रिति, आध्यात्मिकस्य शरीरारम्भ-कस्य कार्यस्यैष रसः सारः; तेन हि सारेण सारखदिदं शरीरं समस्तं यथाधिदैवतमादित्यमण्डलेन । प्राथम्याच्च - चक्षुषी एव प्रथमे सम्भवतः सम्भवत इति । " तेजो रसो निरवर्तताग्निः ' इति लिङ्गात्; तैजसं हि चक्षुः एतत्सारम् आध्यात्मिकंभूतत्रयम्; सतो अथ - अब मूर्तीमूर्तका अध्यात्म-विभाग बतलाया जाता है - वह मूर्त क्या है? यह ही है, यह क्या है? जो प्राणवायुसे भिन्न है अर्थात् इस आत्मा - शरीर के भीतर जो आकाश है और जो देहस्थ प्राण है इन दोनोंको छोड़कर जो शरीरके आरम्भक तीन भूत हैं वे ही मर्त्य हैं - इस प्रकार अन्य सब पूर्ववत् समझना चाहिये । इस सत्का हो, यह जो चक्षु है, रस है । अर्थात् आध्यात्मिक यानी शरीरारम्भक भूतोका यही रस यानी सार है; जिस प्रकार अधिदैवत मूर्त-वर्ग आदित्यमण्डलके कारण सार-वान् है, उसी प्रकार यह समस्त शरीर उस सारसे ही सार-वान् है । [ शरीरके अवयवोंमें ] प्रथम होने-के कारण भी चक्षु सार हैं । उत्पन्न होनेवाले जीवके सबसे पहले नेत्र ही उत्पन्न होते हैं । इस विषय में " अग्नि तेजरूप रसवाला हुआ " यह लिङ्ग है । चक्षु भी तैजस ही हैं, आध्यात्मिक भूतत्रयचक्षुरूप सारवाले ही हैं । ' यह सत्का ही रस है ' यह
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[ अध्याय २ मूर्तका, इस मका, सार है ॥ ४ ॥
मूर्तका अध्यात्म-या जाता है - वह यह ही है, यह क्या वायुसे भिन्न है अर्थात् - शरीर के भीतर जो जो देहस्थ प्राण है छोड़कर जो शरीरके भूत हैं ह अन्य सब पूर्ववत् हिये । हो, यह जो चक्षु है, आध्यात्मिक यानी भूतोका यही रस यानी -प्रकार अधिदैवत मूर्त-ण्डलके कारण सार-प्रकार यह समस्त सारसे ही सार-अवयवोंमें ] प्रथम होने-चक्षु सार हैं । उत्पन्न चके सबसे पहले नेत्र ही - हैं । इस विषयमें रूप रसवाला हुआ " यह क्षु भी तेजस ही हैं, भूतत्रय चक्षुरूप सारवाले सत्का ही रस है ' यह ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३ 22 ह्येष रस इति मूर्तत्वसारत्वे | कथन सत् ( तीनों भूतों ) का चक्षुके मूर्तत्व एवं सारत्वमें हेतुत्व - प्रति-वर्थः ॥ ४ ॥ पादन करनेके लिये है ' ॥४ ॥
+ अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृत-मेतद्यदेतत्त्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्त्यस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥
अब अमूर्तका वर्णन करते हैं- प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है । उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है यह त्यत्का ही रस है ॥। ५ ॥ अथाधुनामूर्तमुच्यते । यत्परि-शेषितं भूतद्वयं प्राणश्च यश्चाय-मन्तरात्ममाकाशः, एतदमूर्तम् । अन्यत्पूर्ववत् । एतस्य त्यस्यैष रसः सारः, योऽयं दक्षिणेऽक्ष-पुरुषः- दक्षिणेऽक्षन्निति विशेष ग्रहणम्, शास्त्रप्रत्यक्षत्वात् लिङ्गस्य हि दक्षिणेऽक्ष्णि विशेषतोऽधिष्ठा -तृत्वं शास्त्रस्य प्रत्यक्षं सर्वश्रुतिषु अथ - अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है । जो बचे हुए दो भूत प्राण और यह देहान्तर्गत आकाश हैं, वे अमूर्त हैं । शेष अर्थं पूर्ववत् है । इस त्यत्का यह रस यानी सार है, जो कि यह दक्षिण नेत्रान्त-र्गत पुरुष है, ' दक्षिण नेत्रमें ' इस प्रकार विशेष नेत्रका ग्रहण शास्त्र-प्रत्यक्ष होनेके कारण है । लिङ्ग-देहका विशेषरूपसे दक्षिण नेत्रमें अधिष्ठातृत्व है, ऐसा शास्त्रका प्रत्यक्ष है, क्योंकि समस्त श्रुतियों-में ऐसा ही प्रयोग देखा गया १. तात्पर्य यह है कि चक्षु मूर्त है, अतः उसका तोनों मूर्त भूतों का कार्य होना उचित ही है; क्योंकि वह मूर्तके समान धर्मवाला है तथा देहके सम्पूर्ण अवयवोंमें प्रधान होनेके कारण वह आध्यात्मिक तीनों भूतोंका रस - सार है— यह सिद्ध होता है ।
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५२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ तथा प्रयोगदर्शनात् । त्यस्य । है । ' यह त्यत्का ही सार है ' यह कथन पूर्ववत् विशेषरूपसे न ह्यष रस इति पूर्ववद्विशेषतोऽ- होनेके कारण त्यत् ( अमूर्तं दोनों ग्रहणादमूर्तस्वसारत्वे एव | भूतों ) का दक्षिण नेत्रस्थित पुरुष-के अमूर्तत्व और सारत्वमें ही हेतुत्व हेत्वर्थः ॥ ५ ॥ प्रतिपादन करने के लिये है ॥ ॥
इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन ब्रह्मण उपाधिभूतयोर्मू- ' सत्य ' शब्दके वाच्य एवं ब्रह्म-यो कार्यकरण विभागेन अध्या- के उपाधिभूत अध्यात्म और अधि-त्माधिदैव तयोर्विभागो व्याख्यातः दैवत मूर्तीमूर्तके विभागका कार्य-करणभेदसे विभाग किया गया । सत्यशब्दवाच्ययोः । अथेदानीम्! अब • तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा माहारजनं चासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्त ँ सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येत-स्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेय सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥
उस इस पुरुषका रूप [ ऐसा ] है जैसा हल्दीमें रंगा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप ', जैसी अग्निकी ज्वाला, जैसा श्वेत कमल और जैसी बिजलीकी चमक होती है । जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी - मकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है । अब इसके पश्चात् ' नेति नेति ' यह ब्रह्मका आदेश है । ' नेति नेति ' इससे
बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है । ' सत्यका सत्य ' यह उसका नाम है ।
प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥ ६ ॥
१. वर्षा ऋतु में उत्पन्न होनेवाला एक लाल रंगका कीड़ा ।