बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 551–560
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
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[ अध्याय २ रूपसे संन्यासका विधान इच्छासे ही यह आख्या-रम्भ की जाती है-वल्क्य उद्यास्यन्वा तेऽनया कात्या-' मैं इस स्थान ( गार्हस्थ्य-नेवाला हूँ । अतः [ तेरी नी साथ तेरा बँटवारा मैत्रेयी! ' ऐसा याज्ञवल्क्य-- अर्थात् याज्ञवल्क्यनामक अपनी भार्या मैत्रेयीको ' अरे ' यह सम्बोधन है । यन् - यहाँसे ऊपर पारि-क आश्रमान्तरमें जाने-अर्थात् इस गृहस्थाश्रमसे आश्रम में जानेके लिये हूँ । इसलिये हन्त - तेरी चाहता हूँ । और इसके यह भी इच्छा है कि ] इस दूसरी भार्या कात्यायनी के रा अन्त यानी विच्छेद T ) भी कर दूँ 1 । पतिके द्वारा सम्बद्ध हुई दोनोंका जो सम्बन्ध था, अब द्रव्य-करके उस सम्बन्धका विच्छेद ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४५ विच्छेदं करवाणि द्रव्यविभागं | कर दूँगा; अर्थात् धनके द्वारा तुम कृत्वा वित्तेन संविभज्य युवां दोनोंका बंटवारा करके मैं चला गमिष्यामि ॥ १ ॥ जाऊँगा ॥ १ ॥
सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवित स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥२ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, ' भगवन्! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार अमर हो सकती हूँ? " याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, भोग - सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा । धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं ॥ २ ॥
सा एवमुक्ता होवाच-यद्यदि ' नु ' इति वितर्फे मे मम इयं पृथिवी, भगोः-भगवन्, सर्वा सागरपरिक्षिप्ता वित्तेन धनेन पूर्णा स्यात्; कथम्? न कथञ्च नेत्याक्षेपार्थः, प्रश्नार्थो चा, तेन पृथिवीपूर्णवित्तसा कर्मणाग्निहोत्रादिना । बृ ० उ ० ३५-' इस प्रकार कही जानेपर मैत्रेयीने कहा- यहाँ ' तु ' यह निपात वितर्कके लिये है । [ क्या कहा? सो बताते हैं— ] भगवन्! यदि यह समुद्रसे घिरी हुई तथा वित्त यानी धनसे पूर्ण सारी पृथिवी मेरी हो जाय, तो भी मैं किसी प्रकार [ अमर हो सकती हूँ? ] अर्थात् किसी भी प्रकार अमर नहीं हो सकती - इस प्रकार ' कथम् ' शब्द आक्षेपके अर्थ में है अथवा यह प्रश्नार्थक भी हो सकता है, अर्थात् पृथिवीभरमें भरे हुए उस धनसे सम्पन्न होनेवाले
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[ अध्याय २ बृहदारण्यकोपनिषद् ५४६ 2 । अग्निहोत्रादि कर्मसे क्या में अमर किं स्यामिति व्यवहितेन अमृता सम्बन्धः । याज्ञवल्क्यः- -प्रत्युवाच कथमिति यद्याक्षेपार्थम्, अनु • मोदनं नेति होवाच याज्ञवल्क्य इति; प्रश्नश्चेत्प्रतिवचनार्थम्; नैव स्या अमृता, किं तर्हि! यथैव लोके उपकरणवतां साध-नवतां जीवितं सुखोपाय भोग-सम्पन्नम्; तथैव तद्वदेव तव जीवितं स्यात्; अमृतत्वस्य तु नाशा मनसाप्यस्ति वित्तेन वित्तसाध्येन कर्मणेति ॥ २ ॥
हो सकती हूँ - इस प्रकार इसका व्यवहित पदोंसे सम्बन्ध है । याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया-' नहीं । ' यदि ' कथम् ' पदको आक्षे-पार्थेक माना जाय तो याज्ञवल्क्यने ' नहीं ' ऐसा कहकर उसका अनु-मोदन किया है; और यदि उसे प्रश्ना-र्थक माना जाय तो यह उत्तरके लिये है, अर्थात् तू उससे अमर नहीं हो सकती; तो क्या होगा? लोक में जैसा उपकरणवानोंका यानी नाना सामग्रियोंसे सम्पन्न लोगों का जीवन सुखके साधनभूत भोगोंसे सम्पन्न होता है, वैसा ही तेरा जीवन भी हो जायगा; धनसे अर्थात् धनसाध्य कर्मसे अमृतत्वकी तो मनसे भी | आशा नहीं है ॥ २ ॥
मैत्रेयीका अमृतत्वसाधनविषयक प्रश्न • सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्र ूहीति ॥ ३ ॥
उस मैत्रेयीने कहा, ' जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर में क्या करूंगी? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही सुभे बतलावें ॥ ३ ॥
• सा होवाच मैत्रेयी; एवमुक्ता उस मैत्रेयी कहा; इस प्रकार | कहे जानेपर मैत्रेयीने उत्तर दिया-प्रत्युवाच मैत्रेयी - यद्येवं येनाहं । यदि ऐसी है तो जिससे मैं बात
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[ अध्याय २ द कर्मसे क्या मैं अमर हूँ - इस प्रकार इसका दोंसे सम्बन्ध है । ल्क्यने उत्तर दिया-दि ' कथम् ' पदको आक्षे-वाजाय तो याज्ञवल्क्यने T कहकर उसका अनु-T है; और यदि उसे प्रश्ना-जाय तो यह उत्तरके र्थात् तू उससे अमर नहीं - तो क्या होगा? लोक में करणवानोंका यानी नाना से सम्पन्न लोगोंका जीवन धनभूत भोगोंसे सम्पन्न वैसा ही तेरा जीवन भी ा; धनसे अर्थात् धनसाध्य मृतत्वकी तो मनसे भी है ॥२ ॥
यक प्रश्न नामृतास्यां किमहं मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥
हो सकती, उसे लेकर मैं ' धन जानते हों, वही सु FF मैत्रयीने कहा; इस प्रकार पर मैत्रेयीने उत्तर दिया-बात है तो जिससे मैं
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उपदेश मैत्रेयीको f स स
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७ नामृता स्याम्, किमहं तेन वित्तेन । अमृत नहीं हो सकती, उस धनसे कुर्याम् १ यदेव भगवान्केवलम- मैं क्या करूंगी? श्रीमान् जो कुछ मृतत्वसाधनं वेद, तदेवामृतत्व- केवल अमृतत्वका साधन जानते हों, उस अमृतत्वके साधनका ही • साधनं मे मह्यं ब्रूहि ॥ ३ ॥ मुझे उपदेश करें ॥ ३ ॥
याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि तेव्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥
उन याज्ञवल्क्य जोने कहा, ' धन्य! अरी मैत्रेयी, तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी प्रिय लगनेवाली ही बात कह रही है । अच्छा आ, बैठ जा, मैं तेरे प्रति उसकी व्याख्या करूंगा, तू व्याख्यान उपदेश किये हुए मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना ' ॥ ४ ॥
स होवाच याज्ञवल्क्यः । एवं मैत्रेयीको वित्तसाध्येऽमृतत्वसाधने प्रत्या-ख्याते, याज्ञवल्क्यः स्वाभिप्राय-सम्पत्तौ तुष्ट आह; स होवाच-प्रियेष्टा, बतेत्यनुकम्प्याह, अरे मैत्रेयि नोऽस्माकं पूर्वमपि प्रिया सती भवन्ती इदानीं प्रियमेव । चित्तानुकूलं भाषसे; अत एह्या- । स्स्वोपविश व्याख्यास्यामि - - यत्ते तव इष्टम् अमृतत्वसाधनम् आत्म-ज्ञानं कथयिष्यामि । व्याचक्षाण- । उन याज्ञवल्क्यजीने कहा । इस प्रकार धनसे निष्पन्न होनेवाले अमृतत्वके साधनका त्याग कर दिये जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने अभि-प्रायकी पूर्ति से संतुष्ट होकर कहा । वे बोले- -बत अर्थात् उन्होंने अनु-कम्पा करते कहा — अरी मैत्रेयी ।! तू हमारी प्रिया इष्टा है अर्थात् पहलेहीसे हमारी प्रिया होकर इस समय भी तू प्रिय यानी अनुकूल ही भाषण कर रही है; इसलिये आ, बैठ जा, मैं तेरे अभीष्ट अमृतत्वके साधनभूत आत्म-ज्ञानकी व्याख्या अर्थात् उपदेश
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५४८ कुर्वतो । करूंगा । मेरे व्याख्यान करनेपर स्य तु मे मम व्याख्यानं तू उसका निदिध्यासन करना, अर्थात् मेरे वाक्योंका अर्थतः निश्चय निदिध्यासस्व वाक्यान्यर्थतो | करके ध्यान करने की इच्छा
निश्वयेन ध्यातुमिच्छेति ॥ ४ ॥ । करना ॥ ४ ॥
प्रियतम आत्माके लिये ही अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्म-नस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु
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[ अध्याय २ व्याख्यान करनेपर दध्यासन करना, का अर्थतः निश्चय करनेकी इच्छा य होती हैं कामाय पतिः यो भवति । हा भवत्यात्म-7 अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः य वित्तं प्रियं वति । न वा नस्तु कामाय कामाय क्षत्रं भवति । न वन्त्यात्मनस्तु अरे देवानां देवाः प्रिया तानि प्रियाणि भवन्ति । न नवत्यात्मनस्तु ब्राह्मण ४ ] ५४ ९ कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥
उन्होंने कहा – ' अरी मैत्रेयि! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजन के लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयो-जनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, by अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; " क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजन के लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं; देवताओंके प्रयोजनके लिये देवता प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देवता प्रिय होते हैं; प्राणियों के प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय होते हैं; तथा सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अरी मैत्रेयि! यह आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है । हे मैत्रेयि! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एवं विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥
स होवाच - अमृतत्वसाधनं! अमृतत्वके साधन वैराग्यका उपदेश करने की इच्छासे याज्ञवल्क्य-वैराग्यमुपदिदिक्षुर्जायापतिपुत्रा- जी स्त्री, पति एवं पुत्रादिसे, उनका दिभ्यो विरागमुत्पादयति तत्संन्या- त्याग करने के वैराग्य उत्पन्न कराते हैं । उन्होंने कहा— साय । न वै - — वैशब्दः प्रसिद्ध- ' न वै ' – यहाँ ' वै ' शब्द प्रसिद्ध वस्तुकी याद दिलाने के लिये है स्मरणार्थः; प्रसिद्धमेवैतल्लोके; | अर्थात् लोकमें यह प्रसिद्ध ही है
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय २ ५५० पत्युर्भर्तुः कामाय प्रयोजनाय । जायायाः पतिः प्रियो न भवति, किं तर्ह्यात्मनस्तु कामाय प्रयोज-नायैव भार्यायाः पतिः प्रियो भवति 1 । तथा न वा अरे जायाया इत्यादि समानमन्यत्, न वा अरे पुत्राणाम्, न वा अरे वित्तस्य, न वा अरे ब्रह्मणः, न वा अरे क्षत्रस्य, न वा अरे लोकानाम्, न वा अरे देवानाम्, नवा अरे भूतानाम्, न वा अरे सर्वस्य, पूर्वं पूर्वं यथासन्ने प्रीति -साधने वचनम्; तत्र तत्रेष्ट -! तरत्वाद्वैराग्यस्य; सर्वग्रहणमुक्ता- । नुक्तार्थम् । तस्माल्लोकप्रसिद्धमेतत् - श्रात्मैव प्रियः, नान्यत् । ‘ तदेतत्प्रेयः पुत्रात् ' इत्युपन्यस्तम्, तस्यैतद् वृत्तिस्थानीयं प्रपश्चितम् । तस्मा दात्मप्रीतिसाधनत्वाद्गौणी अन्यत्र प्रीतिः, आत्मन्येव मुख्या । तस्मा-१. वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है । कि पति यानी भर्ताके प्रयो स्त्रीको पति प्रिय नहीं होता । तो फिर क्या बात है? अपने लिये अर्थात् अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्रीको पति प्रिय होता है । इसी प्रकार ' न वा अरे जायायै ' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ भी इसीके समान समझना चाहिये । अर्थात् हे मैत्रेयि! न पुत्रोंके, न धनके, न ब्राह्मणके, न क्षत्रियके, न लोकके, न देवोंके, न भूतोंके और न अन्य सभीके प्रयोजनके लिये वे प्रिय होते । यहाँ जो - जो प्रीतिके समीपतर साधन हैं, उनका पहले - पहले वर्णन किया है; क्योंकि उन - उनमें ही वैराग्य अधिकाधिक अभीष्ट है ' सर्व ' शब्दका ग्रहण कहे और न कहे हुए सभी साधनों को सूचित करनेके लिये है । अतः यह लोकमें प्रसिद्ध है कि आत्मा ही प्रिय है, अन्य कुछ नहीं । इसका ' तदेर्तत्प्रेयः पुत्रात् ' इस वाक्यसे उल्लेख किया है, उसी वाक्यका यह व्याख्यारूप वचन कहा है । अतः, आत्माकी प्रीतिका साधन होने के कारण, जो अन्यत्र प्रीति है यह गोणी है, आत्मामें ही मुख्य प्रीति है । अतः हे मैत्रेयि! आत्मा
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[ अध्याय २ के प्रयोजनसे नहीं होता । तो है? अपने लिये प्रयोजन के लिये होता है । इसी जायायै ' इत्यादि भी इसी के समान अर्थात् हे मैत्रेयि! किन ब्राह्मणके, किके, न देवोंके, न अन्य सभीके प्रिय होते । यहाँ समीपतर साधन सहले वर्णन किया उनमें ही वैराग्य है ' सर्व ' शब्दका कहे हुए सभी करने के लिये है । सिद्ध है कि आत्मा कुछ नहीं । इसका ब ' इस वाक्यसे उसी वाक्यका वचन कहा है । प्रीतिका साधन अन्यत्र प्रीति है त्मामें ही मुख्य मैत्रेय! आत्मा ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५१ दात्मा वै अरे द्रष्टव्यो दर्शनार्हः, दर्शन विषयमापादयितव्यः; श्रोतव्यः पूर्वमाचार्यत आगम-तश्च पश्चान्मन्तव्यस्तर्कतः; ततो निदिध्यासितव्यो निश्चयेन ध्यातव्यः एवं ह्यसौ दृष्टो भवति श्रवणमनननिदिध्यासन-साधनैर्निर्वर्तितैः । यदैकत्व-मेवान्युपगतानि, तदा सम्यग्दर्शनं ब्रह्मैकत्वविषयं प्रसीदति, नान्यथा श्रवणमात्रेण । यद्ब्रह्मक्षत्रादि कर्मनिमित्तं वर्णाश्रमादिलक्षणम् आत्मन्य-विद्याध्यारोपित प्रत्ययविषयं क्रियाकारकफलात्मकम विद्या-प्रत्ययविषयम् — रज्ज्वामित्र सर्प-प्रत्ययः, तदुपमदनार्थम् आह— आत्मनि खल्वरे मैत्रेयि दृष्टे । श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितं विज्ञातं भवति ॥ । ५ ॥ | ही द्रष्टव्य - दर्शन करने योग्य अर्थात् साक्षात्कारका विषय करने योग्य है, तथा पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण करनेयोग्य एवं पीछे तर्कद्वारा मनन करने योग्य है, इसके पश्चात् वह निदिध्या-| सितव्य अर्थात् निश्चयसे ध्यान करने । योग्य है । क्योंकि इस प्रकार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासनरूप साधनों-के सम्पन्न होनेपर ही इसका साक्षा-त्कार होता है । जिस समय इन सब साधनोंकी एकता होती है, उसी समय ब्रह्म कत्वविषयक सम्यक् दर्शनका प्रसाद होता है । अन्यथा केवल श्रवणमात्रसे से उसकी स्फुटता नहीं होती आत्मामें अविद्यासे आरोपित प्रतीतिका विषयभूत जो ब्राह्मण और क्षत्रियादि वर्णाश्रमादिरूप कर्मका निमित्त है, वह क्रिया, कारक और फलरूप तथा रज्जुमें आरोपित सर्पप्रतीति के समान अविद्याजनित प्रतीतिका विषय है । उसकी निवृत्ति के लिये श्रुति कहती हे - हे मैत्रेयि! आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान होनेपर निश्चय ही यह सब विदित अर्थात् ज्ञात हो जाता है ॥ ५ ॥
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५५२ आत्मा सबसे अभिन्न | ननु कथमन्यस्मिन्विदितेऽन्य-द्विदितं भवति १ नैष दोषः न हि आत्म-व्यतिरेकेणान्यत्किञ्चिदस्ति य-द्यस्ति न तद्विदितं स्यात्; न त्वन्य-दस्ति, आत्मैव तु सर्वम्; तस्मात्सर्वमात्मनि विदिते विदितं स्यात् । कथं पुनरात्मैव सर्वमि-त्येतच्छ्रावयति-है, इसका प्रतिपादन शङ्का - किंतु अन्यका ज्ञान होने-पर उससे भिन्न वस्तुका ' ज्ञान कैसे हो जाता है? समाधान - यह कोई दोष नहीं हैं; क्योंकि आत्माको छोड़कर और कोई भी वस्तु नहीं है; यदि होती तो [ आत्मज्ञान से ही ] उसका ज्ञान भी न होता; किंतु अन्य वस्तु तो है ही नहीं, आत्मा ही तो सब कुछ है; अतः आत्माका ज्ञान होनेपर सभीका ज्ञान हो जाता है । किंतु आत्मा ही सब कुछ किस प्रकार है, सो श्रुति बतलाती है । ब्रह्म तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्यो ऽन्यत्रा-त्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीद ँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥
ब्राह्मणजांति उसे परास्त कर देती है जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न जानता है । क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है । लोक उसे परास्त कर देते हैं जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है । देवगण उसे परास्त कर देते हैं जो देवताओंको आत्मासे भिन्न देखता है । भूतगण उसे परास्त कर देते हैं जो भूतोंको आत्मासे भिन्न देखता