बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 561–570

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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[ अध्याय २ दन यका ज्ञान होने-स्तुका ज्ञान कैसे कोई दोष नहीं नको छोड़कर नहीं है; यदि नसे ही ] उसका ; किंतु अन्य नहीं, आत्मा ही अत: आत्माका का ज्ञान हो जाता सब कुछ किस बतलाती त है । वेद क्षत्रं तं रादुर्योऽन्यत्रा-नो देवान्वेद वेद सर्वं तं त्रमिमे लोका त्मा ॥६ ॥

को आत्मासे भिन्न जातिको आत्मासे को आत्मासे भिन्न को आत्मासे भिन्न हमासे भिन्न देखता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५३ है । सभी उसे परास्त कर देते हैं जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है । यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ब्रह्म ब्राह्मणजातिस्तं पुरुषं परादात्परादध्यात्पराक्कुर्यात कम्? यो ऽन्यत्रात्मन आत्मस्व-ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये ही है ॥ ६ ॥

ब्रह्म - ब्राह्मणजाति उस पुरुषको परादात् - पराहित- पराकृत यानी परास्त कर देती है; किसे? जो भिन्न- आत्मस्वरूपको रूपव्यतिरेकेण - आत्मैवन भव - छोड़कर अर्थात् यह ब्राह्मणजाति तीयं ब्राह्मणजातिरिति ---- तां यो वेद, तं परादध्यात्सा ब्राह्मण-जातिरनात्मस्वरूपेण मां पश्य-तीति; परमात्मा हि सर्वेषा -मात्मा । तथा क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तथा लोकाः, देवाः, भूतानि, सर्वम् । इदं ब्रह्मेति — यान्यनुक्रान्तानि तानि सर्वाणि, प्रात्मैव, यदय-मात्मा - योऽयमात्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्य इति प्रकृतः; यस्मादा-त्मनो जायत आत्मन्येव लीयत आत्ममयं च स्थितिकाले, आत्मव्यतिरेकेणाग्रहणात्, आत्मैव सर्वम् ॥ ६ ॥

आत्मा ही नहीं है, इस प्रकार जो उसे जानता है, उसे वह ब्राह्मण-जाति यह सोचकर कि यह मुझे अनात्मारूपसे देखता है, परास्त कर देती है; क्योंकि परमात्मा ही सबका आत्मा है । इसी प्रकार क्षत्र- -क्षत्रियजाति तथा लोक, देव, भूत और सर्वं, जिनका ' इदं ब्रह्म इदं क्षत्रम् ' इत्यादिरूपसे अनुक्रम है, वे सब आत्मामें ही हैं । जो यह आत्मा कि द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः इत्यादिरूपसे प्रकरणप्राप्त है; क्योंकि सब कुछ आत्मासे ही उत्पन्न होता है, आत्मामें ही लीन होता है तथा स्थितिकालमें भी आत्मस्वरूप ही है । आत्माको छोड़कर उपलब्ध न होनेके कारण सब कुछ आत्मा हो ॥६ ॥

सबकी आत्मस्वरूपताके ग्रहण में दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाका दृष्टान्त कथं पुनरिदानीमिदं सर्वमा- प्रश्न- किंतु इस समय ( स्थिति-कालमें ) ' यह सब आत्मा ही है '

पृष्ठ 562

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५५४ त्मैवेति ग्रहीतुं शक्यते? चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चि-त्स्वरूपतैवेति गम्यते । तत्र दृष्टान्त उच्यते— यत्स्वरूप-व्यतिरेकेणाग्रहणं यस्य, तस्य तदात्मत्वमेव लोके दृष्टम् । ऐसा किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है? उत्तर - सर्वत्र चिन्मात्रकी अनु-वृत्ति होनेके कारण सबकी चित्स्व-रूपता ही है - ऐसा जाना जाता है । इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है - जिसका जिसके स्वरूप-से अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह तद्रूप ही होता है-ऐसा लोकमें देखा गया है । स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्श-क्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥

वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार ताडन किये जाते हुए दुन्दुभि ( नक्कारे ) के बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी ग्रहण कर लिया जाता है ॥ ७ ॥

स यथा - स इति दृष्टान्तः, लोके यथा दुन्दुभेर्भेर्यादेः, हन्य-मानस्य ताड्यमानस्य दण्डा-दिना, न, बाह्याञ्छन्दान् बहिर्भूताञ्छब्द विशेषान् दुन्दुभि-शब्दसामान्यान्निष्कृष्टान् दुन्दु-भिशब्दविशेषान्न शक्नु-याद् ग्रहणाय ग्रहीतुम्, स यथा अर्थात् वह दृष्टान्त ऐसा है - लोकमें जिस प्रकार दण्डादिसे हनन - ताडन किये जाते | हुए दुन्दुभि - भेरी आदिके बाह्य शब्दको अर्थात् बाहर फैले हुए | शब्दविशेषोंको — दुन्दुभिके सामान्य शब्दमेंसे निकाले विशेष शब्दोंको हुए दुन्दुभि कोई ग्रहण नहीं कर सकता । दुन्दुभिका ग्रहण

पृष्ठ 563

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[ अध्याय २ ग्रहण जा चिन्मात्रकी अनु-सबकी चित्स्व-जाना जाता दृष्टान्त बताया जिसके स्वरूप-नहीं किया जा ही होता है -गया है । शब्दाञ्श-घातस्य वा किंतु दुन्दुभि महण कर लिया वह दृष्टान्त जिस प्रकार डन किये जाते आदिके बाह्य हर फैले हुए दुभिके सामान्य हुए दुन्दुभि ई ग्रहण नहीं बुभिका ग्रहण ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५५ दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन, दुन्दुभिशब्द - । सामान्यविशेषत्वेन दुन्दुभिशब्दा । एत इति, शब्दविशेषा गृहीता भवन्ति, दुन्दुभिशब्दसामान्य-व्यतिरेकेणाभावात्तेषाम् । दुन्दुभ्याघातस्य वा, दुन्दुभे-राहननम् आघातः, दुन्दुभ्याघात-विशिष्टस्य शब्दसामान्यस्य ग्रह-न तद्गता विशेषा गृहीता भवन्ति, न तु त एव निर्भिद्य ग्रहीतुं शक्यन्ते, विशेषरूपेणाभा - । वात्तेषाम् । तथा प्रज्ञानव्यतिरेकेण स्वप्न जागरितयोर्न कश्चिद्वस्तुवि-शेषो गृह्यते; तस्मात्प्रज्ञानव्यति-रेकेण अभावो युक्तस्तेषाम् ॥ ७ ॥

होनेसे अर्थात् दुन्दुभिके सामान्य शब्दके विशेषरूपसे ' ये दुन्दुभिके शब्द हैं, इस प्रकार वे विशेष शब्द भी गृहीत हो जाते हैं, क्योंकि दुन्दुभिके सामान्य शब्दको छोड़कर तो उनकी सत्ता ही नहीं है । अथवा दुन्दुभिके आघात— दुन्दुभिके आहननका नाम आघात -- उस दुन्दुभ्याघातविशिष्ट शब्द सामान्यका ग्रहण होनेसे उसके अन्तर्व्रर्ती विशेषोंका भी ग्रहण हो जाता है । उससे अलग करके उनका ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि विशेषरूपसे तो उनका अभाव है । इसी प्रकार स्वप्न और जागरितको किसी भी वस्तुविशेष-का प्रज्ञान से अलग ग्रहण नहीं किया जा सकता; अतः प्रज्ञान से भिन्न उनका अभाव उचित ही है ॥ ७ ॥

स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्या शब्दा-शक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥

वह [ दूसरा दृष्टान्त ] ऐसा है - जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्ख-के बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ८ ॥

पृष्ठ 564

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५५६ तथा स यथा मानस्य शब्देन श्रपूर्यमाणस्य न बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ 2 ध्माय- तथा वह [ दूसरा दृष्टान्त ] शङ्खस्य ऐसा है - जिस प्रकार बजाये जाते संयोज्यमानस्य हुए शब्दसे संयुक्त किये जाते हुए अर्थात् फूंके जाते हुए शङ्खके बाह्याञ्चब्दाञ्छ- बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता इत्यादि पूर्ववत् ऐसा ही

क्नुयादित्येवमादि पूर्ववत् । ८ ॥ अर्थ है ॥ ८ ॥

स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्शब्दाञ्श-क्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य चा शब्दो गृहीतः ॥ ६ ॥

वह [ तीसरा दृष्टान्त ] ऐसा है - जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणा-के बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता; किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ & ॥ तथा वीणायें वाद्यमानायै -वीणा या वाद्यमानायाः । अनेक-दृष्टान्तोपादानमिह सामान्यबहु-स्वख्यापनार्थम् —अनेके हि विल क्षणाश्चेतनाचेतनरूपाः सामान्य-विशेषाः - – तेषां पारम्पर्यगत्या यथैकस्मिन्महासामान्येऽन्तर्भावः प्रज्ञानघने, कथं नाम प्रदर्शयि-तव्य इति; दुन्दुभिशङ्खवीणा-शब्दसामान्यविशेषाणां यथा इसी प्रकार ' वीणा वाद्यमानायै ' 1 अर्थात् बजायी जाती हुई वीणाका इत्यादि I समझना II चाहिये । यहाँ अनेक दृष्टान्तोंका ग्रहण सामान्यों की बहुलता प्रकट करनेके लिये है । चेतन और अचेतन, सामान्य एवं विशेष अनेक और विलक्षण हैं । उनका जिस प्रकार परम्परा गतिसे एक प्रज्ञानघन महासामान्यमें अन्त-र्भाव है - यही किसी - न - किसी तरह दिखलाना है । जिस प्रकार दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाके सामान्य एवं विशेष

पृष्ठ 565

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[ अध्याय २ दुसरा दृष्टान्त ] बजाये जाते किये जाते हुए ते हुए शङ्खके - ग्रहण नहीं कर वत् ऐसा ही शब्दाश-वीणावादस्य ती हुई वीणा-॥ ६ ॥

वाद्यमानायै ' ' हुई वीणाका चाहिये । यहाँ इण सामान्यों की बनेके लिये है । , सामान्य एवं - विलक्षण हैं । परम्परा गति से सामान्यमें अन्त--न - किसी तरह प्रकार दुन्दुभि, मान्य एवं विशेष ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५७ शब्दत्वेऽन्तर्भावः, एवं स्थिति - | शब्दोंका शब्दत्वमें अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार स्थितिकाल में काले तावत्सामान्यविशेषाव्य-सामान्य और विशेषसे अभिन्न होने-तिरेकाद् ब्रह्मैकत्वं शक्यमव- के कारण ब्रह्मकी एकताका ज्ञान गन्तुम् ॥ ९ ॥ भी हो सकता है ॥ ६ ॥

परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन एवमुत्पत्तिकाले प्रागुत्पत्ते- इस प्रकार यह जाना जा सकता है कि उत्पत्तिकालमें उत्पत्तिसे पूर्व ब्रह्मैवेति शक्यमवगन्तुम् । यथा- ब्रह्म ही था । जिस प्रकार अग्निक ग्नेर्विस्फुलिङ्गधू माङ्गाराचिषां प्रा- चिनगारी, घूम, अंगार और विभागादग्निरेवेति भवत्यग्न्ये-कत्वम्, एवं जगन्नामरूपविकृतं प्रागुत्पत्तेः प्रज्ञानघन एवेति युक्तं ग्रहीतुमित्येतदुच्यते-ज्वालाओंका विभाग होनेसे पूर्व अग्नि ही है, अतः अग्निकी एकता सिद्ध होती है, उसी प्रकार नाम-रूप - विकारको प्राप्त हुआ जगत् उत्पत्तिसे पूर्वं प्रज्ञानघन ही था— ऐसा ग्रहण करना उचित है - इसीसे यह कहा जाता है— स यथाद्वैधाग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्वर-न्त्येवं वा अरे ऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्या-नान्यस्यैवैतानि निश्वसितानि ॥ १० ॥

वह [ चौथा दृष्टान्त— ] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूआँ निकलता है, हे मैत्रेयि! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस ( अथर्ववेद ), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे इस महदुद्भुतके ही निःश्वास हैं ॥ १० ॥

पृष्ठ 566

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५५८ स यथा - आर्द्रैघाग्नेः, आद्वैरेधो- । मिरिद्धोऽग्निराद्वैधाग्निः, तस्मात्, अभ्याहितात्पृथग्धूमाः, पृथग्, नानाप्रकारम्, धूमग्रहणं विस्फु-लिङ्गादिप्रदर्शनार्थम्, धूमविस्फु-लिङ्गादयो विनिश्वरन्ति विनि गच्छन्ति । एवम् - यथायं दृष्टान्तः, अरे मैत्रेय्यस्य परमात्मनः प्रकृतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतत् निश्वसितमिव निश्वसितम्; यथा अप्रयत्न नैव पुरुषनिश्वासो भवत्येवं वा अरे । किं तनिश्वसितमिव ततो जातमित्युच्यते - यहग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः —– चतुर्विधं मन्त्रजातम्, इतिहास इत्युर्वशीपु-रूरवसोः संवादादिः - " उर्वशी हाप्सराः " इत्यादिब्राह्मणमेव, पुराणम् ' असद्वा इदमग्र आसीत् " ( तै ० उ ० २ । ६ । १ ) इत्यादि, विद्या देवजनविद्या वेदः सोऽयमित्याद्या, उपनिषदः “ प्रि-वह [ चौया दृष्टान्त- ] जिस प्रकार आद्र्धा अग्निसे - जो आई ( गीले ) ईंधनसे बढ़ाया गया हो उसे आर्द्रेधाग्नि कहते हैं । उस आधान किये हुए अग्निसे जैसे पृथक् धूआं निकलता है, पृथक् यानी नाना प्रकारका धुआं । यहाँ ' धूम ' शब्दका ग्रहण चिनगारी आदिको प्रदर्शित करनेके लिये है । अर्थात् धूम और चिनगारी आदि निकलते हैं । इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त हे, हे मैत्रेयि! इस परमात्मा यानी प्रकृत महदुभूतका यह निःश्वसित है अर्थात् निःश्वसितके समान निःश्वसित है; जिस प्रकार बिना प्रयत्नके ही पुरुषका नि: श्वास होता है, अरे! उसी प्रकार [ उस विज्ञानघन से यह जगत् उत्पन्न हुआ है ] । उससे निःश्वास के समान क्या उत्पन्न हुआ है? जो यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार प्रकारका मन्त्रसमुदाय है तथा इतिहास यानी उर्वशी - पुरूरवाका संवादादि " उर्वशी हाप्सराः " इत्यादि ब्राह्मण ही इतिहास है, पुराण - " आरम्भमें यह असत् ही था " इत्यादि, विद्या-| ' वेदः सोऽयम् ' इत्यादि देवजनविद्या,

पृष्ठ 567

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[ अध्याय २ दृष्टान्त - ] जिस अग्नि- जो आर्द्र या गया हो उसे हैं । उस आधान जैसे पृथक् धूआं यानी नाना हाँ ' धूम ' शब्दका नादिको प्रदर्शित अर्थात् धूम और नकलते हैं । कि यह दृष्टान्त परमात्मा यानी यह निःश्वसित है समान निःश्वसित बिना प्रयत्नके ही होता है, अरे! विज्ञानघन से यह हैं ] । " के समान क्या जो यह ऋग्वेद, और अथर्ववेद चार य है तथा इतिहास रवाका संवादादि ' इत्यादि ब्राह्मण राण - " आरम्भमें इत्यादि, विद्या-दि देवजनविद्या, ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ ९ यमित्येतदुपासीत " ( वृ ० उ ० । ४ । १ । ३ ) इत्याद्याः, श्लोका ब्राह्मणप्रभवा मन्त्राः “ तदेते

श्लोकाः " ( बृ ० ड ० ४ | ३ | ११ )

इत्यादयः; सूत्राणि वस्तुसङ्ग्रह -वाक्यानि वेदे यथा - " आत्मेत्ये-चोपासीत 124 " ( 21810 ) इत्यादीनि, अनुव्याख्यानानि मन्त्रविचरणानि, व्याख्यानान्य-र्थवादाः, अथवा वस्तुसङ्ग्रह -चाक्यविवरणान्यनुव्याख्यानानि यथा चतुर्थाध्याये ' प्रात्मेत्येवो - । पासीत ' इत्यस्य, यथा वा ' अन्यो-S सावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम् ' ( १ । ४ । १० ) इत्यस्याय मेवाध्यायशेषः, मन्त्र-विवरणानि व्याख्यानानि, एव-मष्टविधं ब्राह्मणम् । एवं मन्त्रब्राह्मणयोरेव ग्रह-णम्, नियतरचनावतो विद्य-मानस्यैव वेदस्याभिव्यक्तिः पुरुष -निश्वासवत्, न च पुरुषबुद्धिप्रयत्न-पूर्वकः; अतः प्रमाणं निरपेक्ष एव स्वार्थे; तस्माद्यत्तेनोक्तं तत्तथैव प्रतिपत्तव्यम्, आत्मनः । उपनिषद् - " प्रिय है - इस प्रकार उपासना करे " इत्यादि, श्लोक– " तदेते श्लोकाः " इत्यादि ब्राह्मण-भागके मन्त्र, सूत्र - वस्तुसंग्रह्वाक्य-जिस प्रकार कि वेदमें " आत्मा है-इस प्रकार उपासना करे ” इत्यादि मन्त्र हैं, अनुव्याख्यान - मन्त्र-विवरण, व्याख्यान -अर्थंवाद अथवा वस्तुसंग्रहवाक्यके विवरण ही अनु-व्याख्यान हैं, जिस प्रकार चतुर्थ अध्यायमें ' आत्मेत्येवोपासीत ' इस वाक्यकी व्याख्या है, अथवा ' अन्योऽ सावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवम् ' इस वाक्यका व्याख्यान यह शेष अध्याय ही है । मन्त्रविव-रणका अर्थं मन्त्रव्याख्यान है । इस प्रकार [ इतिहासादि पदोंसे कहा हुआ ] आठ प्रकारका ब्राह्मण-भाग है । इस प्रकार [ निःश्वसित -श्रुति के सामर्थ्यसे ऋग्वेदादि शब्दोंसे ] मन्त्र और [ इतिहासादिसे ] ब्राह्मणोंका ही ग्रहण करना चाहिये । पुरुषके निःश्वासोंके समान नियतरचनावान् विद्यमान वेदकी ही अभिव्यक्ति हुई है, पुरुषकी बुद्धिके प्रयत्नपूर्वक इनकी रचना नहीं हुई । इसलिये यह अपने निरपेक्ष अर्थ में ही प्रमाण है । अत: उसने ज्ञान या कर्म जिसका जैसा

पृष्ठ 568

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५६० श्रेय इच्छद्भिः, ज्ञानं ज्ञानं वा वा कर्म कम | | वेति । नामप्रकाशवशा हि रूपस्य विक्रियाव्यवस्था । नामरूपयोरेव हि परमात्मोपाधिभूतयोर्व्याक्रि- । यमाणयोः सलिलफेनवत्तत्वा-न्यत्वेनानिर्वक्तव्ययोः सर्वाव-स्थयोः संसारत्वम् — इत्यतो नाम्न एव निश्वसितत्वमुक्तम्, तद्वचनेनैवेतरस्य निश्वसितत्व-सिद्धेः । अथवा सर्वस्य द्वैतजातस्य श्रविद्याविषयत्वमुक्तम् — “ ब्रह्म तं परादात् '... ' इदं सर्वं यदय-मात्मा " ( २ । ४ । ६ ) इति । तेन वेदस्याप्रामाण्यमाशङ्क्यते । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमिदमुक्तम् । पुरुषनिश्वासवदप्रयत्नोत्थितत्वा-त्प्रमाणं वेदः, न यथा अन्यो ग्रन्थ इति ॥ १० ॥

निरूपण किया है, कल्याणकामियों-को उसे वैसा ही समझना चाहिये । रूपके विकारकी व्यवस्था नाम-प्रकाशके ही अधीन है । जल और फेनके समान जिनका वास्तविक अथवा अवास्तविक रूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता; उन पर-मात्माके उपाधिभूत एवं विकारको प्राप्त होते हुए सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित नाम और रूपको ही संसार कहते हैं, इसलिये नामके ह निःश्वसित होनेका प्रतिपादन किया है; क्योंकि उसके निरूपणसे ही रूपका भी निःश्वसितत्व सिद्ध हो जाता है । अथवा " ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है. यह सब जो कुछ है आत्मा है " इस मन्त्रद्वारा सम्पूर्ण द्वैतवर्गको अविद्याका कार्यं बतलाया है । इससे [ अविद्या-कल्पित सिद्ध होनेके कारण ] वेदके अप्रमामाणिक होनेकी आशङ्का होती है । उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ही यह कहा है – पुरुषके निःश्वास-के समान बिना प्रयत्नके उत्पन्न हुआ होनेके कारण वेद प्रमाण है, यह अन्य ग्रन्थकी तरह [ पुरुष-प्रयत्नजनित ] नहीं है ॥ १० ॥

पृष्ठ 569

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[ अध्याय २ है, कल्याणकामियों-समझना चाहिये । की व्यवस्था नाम-चीन है । जल और जिनका वास्तविक विक रूपसे निरूपण सकता; उन पर-भूत एवं विकारको सम्पूर्ण अवस्थाओं में रूपको ही संसार लिये नामके ही का प्रतिपादन किया निरूपणसे ही रूपका सिद्ध हो जाता है । ब्राह्मणजाति उसे ती है " यह सब जो है ” इस मन्त्रद्वारा को अविद्याका कार्यं इससे [ अविद्या-ोनेके कारण ] वेदके होने की आशङ्का होती काकी निवृत्तिके लिये - पुरुषके निःश्वास-ना प्रयत्नके उत्पन्न रण वेद प्रमाण है, चकी तरह [ पुरुष-नहीं ॥ १० ॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६१ आत्मा ही सबका आश्रय है – इसमें दृष्टान्त किञ्चान्यत्, न केवलं स्थित्यु-त्पत्तिकालयोरेव प्रज्ञानव्यति रेकेणाभावाञ्जगतो ब्रह्मत्वम्, प्रलयकाले च ॥ जलबुद्बुदफेना-दीनामिव सलिलव्यतिरेकेणा-भावः, एवं प्रज्ञानव्यतिरेकेण तत्कार्याणां नामरूपकर्मणां तस्मिन्नेव लीयमानानामभावः । तस्मादेकमेव ब्रह्म प्रज्ञानघनमेक-रसं प्रतिपत्तव्यमित्यत श्राह । प्रलय प्रदर्शनाय दृष्टान्तः -इसके सिवा दूसरी बात यह है कि जगत्का ब्रह्मत्व केवल उत्पत्ति और स्थितिकालमें ही प्रज्ञानको छोड़कर न रहनेके कारण नहीं है, अपि तु प्रलयकाल में भी है । जिस प्रकार जल, बुदबुद और फेनादिकी सत्ता जलको छोड़कर नहीं है, उसी प्रकार प्रज्ञानसे भिन्न उसके कार्य और उसीमें लीन होनेवाले नाम, रूप और कर्मोंकी भी सत्ता नहीं है । इसलिये एक ही प्रज्ञानघन एकरस ब्रह्म है - ऐसा जानना चाहिये । इसीसे श्रुति [ निम्नि मन्त्र ] कहती है । प्रलय प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ दृष्टान्त दिया गया है-स यथा सर्वासामपाँ समुद्र एकायनमेत्र ँ सर्वेषा स्पर्शानां त्वगेकायनमेव सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव सर्वेषा रसानां जिह्वैकायन-मेवँ सर्वेषा ँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेव सर्वेषा ँ शब्दाना श्रोत्रमेकायनमेव सर्वेषा ँ संकल्पानां मन एकायनमेव सर्वासां विद्याना हृदयमेकायन-मेव सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेव सर्वेषा -मानन्दानामुपस्थ एकायनमेव सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेव सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥

वृ ० उ ० ३६-

पृष्ठ 570

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २ ५६२ दृष्टान्त - जिस प्रकार समस्त जलोका समुद्र एक अयन ( प्रलयस्थान वह ) है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोका त्वचा एक अयन है, इसी f प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस् रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अ है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्तं संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गीका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११ ॥

- स इति दृष्टान्तः यथा येन प्रकारेण सर्वासां नदीवापीतडा-गादिगतानामपाम्, समुद्रोऽन्धि -रेकायनम्, एकगमन मेकप्रलयो -ऽविभागप्राप्तिरित्यर्थः; यथायं दृष्टान्त; एवं सर्वेषां स्पर्शानां मृदुकर्कशकठिनपिच्छिलादीनां वायोरात्मभूतानां त्वगेकायनम्, त्वगिति त्वग्विषयं स्पर्शसामान्य-मात्रम्, तस्मिन्प्रविष्टाः स्पर्शवि-शेषा: - आप इव समुद्रम् - तद्-व्यतिरेकेणाभावभूता भवन्ति; तस्यैव संस्थानमात्र आसन् । तथा तदपि स्पर्शसामान्यमात्रं त्वक्छब्दवाच्यं मनःसंकल्पे मनो- । वह दृष्टान्त - जिस प्रकार सम्पूर्णं नदी, बावड़ी और तड़ागादिके | जलोंका समुद्र एकायन — एक गम-नस्थान - एक प्रलयस्थान अर्थात् अभेदप्राप्तिका स्थल है, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उसी प्रकार वायुके स्वरूपभूत मृदु, कर्कश, कठोर और पिच्छिल आदि समस्त स्पर्शोका त्वचा एक प्रलयस्थान है । त्वचासे त्वचासम्बन्धी स्पर्शसामान्यमात्र समझना चाहिये, उसीमें समुद्रमें जल समान, स्पर्शविशेष प्रविष्ट हैं, उसके बिना वे सत्ताशून्य हो जाते हैं; क्योंकि वे उसीके संस्थान-मात्र ( पृथक् आकारमात्र ) थे । इसी प्रकार वह त्वक्शब्दवाच्य स्पर्शसामान्य, त्वचाके विषयमें स्पर्श-विशेषोंके समान मनके विषय-