बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 721–730

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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[ अध्याय ३ नमो याज्ञवल्क्य हं जरां मृत्यु-- ब्राह्मणाः पुत्रै-श्च व्युत्थायाथ वित्तैषणा या एव भवतः । बाल्येन तिष्ठा -साथ मुनिरमौनं प्रणः केन स्याद् तोह कहोल: बा; उसने ' हे याज्ञ-नी साक्षात् अपरोक्ष बाख्या करो । ' [ यह न्तर है । ' [ कहोल - ] चल्क्य - ] ' जो क्षुधा, स इस आत्माको ही से अलग हटकर वित्तेषणा है और जो T ध्य - साधनेच्छाएं ] न ) का पूर्णतया बा करे । फिर बाल्य | तथा अमौन और होता है । वह किस ही ब्राह्मण होता है,. षीतकेय कहोल चुप ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७११ अथ हैनं कहोलो नामतः, कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकेयः, पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाचेति, पूर्ववत् - यदेव साक्षादपरोक्षाद्-ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः तं मे व्याचक्ष्वेति --- यं विदित्वा बन्ध-नात् प्रमुच्यते । याज्ञवल्क्य आह - एष ते तवात्मा । किम् उपस्तकहो लाभ्यामेक-उषस्तकहोलप्रश्न- श्रात्मा पृष्टः, किं योर्विवेचनम् वा भिन्नावात्मानौ तुम्यलक्षणाविति । भिन्नाविति युक्तम्, प्रश्नयोर पुनरुक्तत्वों-पपत्तेः । यदि ह्येक आत्मा उष-स्टकहोलप्रश्नयोर्विवक्षितः, तत्रै-केनैव प्रश्नेनाधिगतत्वात्तद्विषयों द्वितीयः प्रश्नोऽनर्थकः स्यात् । न चार्थवादरूपत्वं वाक्यस्य । तस्माद् भिन्नावेतावात्मा नौ क्षेत्रज्ञ-परमात्माख्यौ इति केचिद् । व्याचक्षते । फिर इस याज्ञवल्क्यसे कहोल नामवाले कौषीतकेय – कुषीतकके पुत्रने पूछा, ' हे याज्ञवल्क्य! ' इस प्रकार पूर्ववत् सम्बोधनद्वारा अभि-मुख करके उसने कहा, ' जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो, जिसको जान-कर पुरुष बन्धन से मुक्त हो जाता है । ' याज्ञवल्क्यने कहा, ' यह तुम्हारा आत्मा है । ' यहाँ प्रश्न होता है कि उषस्त और कहोलने एक हो आत्माके विषय में पूछा है या समान लक्षणों-वाले भिन्न आत्माओंके विषयमें? [ उत्तर - ] विभिन्न आत्माओंके विषयमें मानना ही अच्छा है, क्यों-कि प्रश्नोंमें पुनरुक्तिका दोष न आना ही उचित है । यदि उषस्त और कहोल दोनों के प्रश्नोंसे एक ही आत्मा बतलाना अभीष्ट होता तो उसका ज्ञान तो एक ही प्रश्नसे हो जाता है, अतः उसके विमें दूसरा प्रश्न करना निरर्थक हो होगा; तथा इस वाक्यकी अर्थवाद-रूपता मानी नहीं जा सकती । अतः ये क्षेत्रज्ञ और परमात्मासंज्ञक भिन्न - भिन्न आत्मा ही हैं - इस प्रकार कोई कोई विद्वान् व्याख्या करते हैं ।

पृष्ठ 722

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७१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ तन्न; ' ते ' इति प्रतिज्ञानात्; ' एष त आत्मा ' इति हि प्रति-बच्चने प्रतिज्ञातम् । न चैकस्य कार्यकरणसङ्घातस्य द्वावात्मानौ उपपद्येते; एको हि कार्यकरण-सङ्घात एकेनात्मना आत्मवान् । न च उपस्तस्यान्यः कहोल -स्यान्यो जातितो भिन्न आत्मा भवति, द्वयोः अगौणत्वात्मस्व -सर्वान्तरत्वानुपपत्तेः । यद्येक-मगौणं ब्रह्म द्वयोरितरेणावश्यं गौणेन भवितव्यम्, तथा आत्म-त्वं सर्वान्तरत्वं च, विरुद्धत्वात् पदार्थानाम् । यद्येकं सर्वान्तरं ब्रह्म श्रात्मा मुख्यः, इतरेण सर्वान्तरेण अनात्मना अमु-ख्येनावश्यं भवितव्यम्; तस्मा-देकस्यैव द्विः श्रवणं विशेष - | विवक्षया । यत्तु पूर्वोक्तेन समानं द्वितीये प्रश्नान्तर उक्तम्, तावन्मात्रं पूर्व- । ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ' तुम्हारा ' ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है, अर्थात् उत्तरमें ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है कि ' यह तुम्हारा आत्मा है । ' और एक ही देहेन्द्रियसंघातके दो आत्मा होने सम्भव नहीं हैं, क्योंकि एक देहेन्द्रियसंघात एक ही आत्मासे आत्मवान् होता है उषस्तका आत्मा अन्य हो और कहोलका अन्य हो - ऐसा उनमें जातितः भेद नहीं हो सकता, क्योंकि दोका अगौणत्व ( मुख्यत्व ), आत्मत्व और सर्वान्तरत्व उपपन्न नहीं हो सकता । यदि दोमेंसे एक ब्रह्म मुख्य है तो दूसरेका गौण होना अवश्यम्भावी है; इसी प्रकार उनका आत्मत्व और सर्वान्तरत्व भी नहीं हो सकता, क्योंकि उन पदार्थों में विरुद्धता है । [ अभिप्राय यह है कि ] यदि एक सर्वान्तर ब्रह्म आत्मा मुख्य होगा तो दूसरेको अवश्य असर्वान्तर अनात्मा और अमुख्य होना चाहिये; अतः एकहीका कुछ विशेष विवक्षा दोबा दो बार श्रवण आ और जो बात दूसरे प्रश्नान्तरमें पूर्वं प्रश्नके ही समान कही गयी है, उतना पहले ही प्रश्नका अनुवाद है,

पृष्ठ 723

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[ श्रध्याय ३ ठीक नहीं है, ' ऐसी प्रतिज्ञा की उत्तर में ऐसी प्रतिज्ञा यह तुम्हारा आत्मा ही देहेन्द्रियसंघातके सम्भव नहीं हैं, न्द्रियसंघात एक ही नवान् होता है । वा अन्य हो और हो - ऐसा उनमें हो सकता, क्योंकि मुख्यत्व ), आत्मत्व उपपन्न नहीं हो में से एक ब्रह्म मुख्य गौण होना इसी प्रकार उनका वन्तिरत्व भी नहीं कि उन पदार्थों में - अभिप्राय यह है चन्तिर ब्रह्म आत्मा दूसरेको अवश्य मा और अमुख्य तः एकहीका कुछ दो बार श्रवण दूसरे प्रश्नान्तरमें मान कही गयी है, इनका अनुवाद है, ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१३ स्यैवानुवादः, तस्यैवानुक्तः । । कश्चिद् विशेषो वक्तव्य इति । कः पुनरसौ विशेषः १ इत्युच्यते पूर्वस्मिन् प्रश्ने अस्ति व्यतिरिक्त आत्मा यस्यायं सप्रयोजको बन्ध उक्त इति । द्वितीये तु, तस्यैव आत्मनोऽशनाया दिसंसा-रधर्मातीतत्वं विशेष उष्पते । यद्विशेषपरिज्ञानात् संन्याससहि-तात् पूर्वोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते । तस्मात् प्रश्नप्रति-वचनयोः ' एष त ' आत्मा ' इत्येवमन्तयोस्तुल्यार्थतैव । ननु कथमेकस्यैवात्मन अशनायाद्यतीतत्वं तद्वत्त्वं चेति विरुद्धधर्म समवायित्वमिति? न; परिहृतत्वात् । नामरूप-व्यवहारतदभाव- विकारकार्यकरण-समन्वयः लक्षणसङ्घातोपाधि मेदसम्पर्कजनितभ्रान्तिमात्रं हि संसारित्वम् इत्यसकृदवोचाम । विरुद्धश्रुति व्याख्यानप्रसङ्गेन च । क्योंकि उसीकी कुछ विशेषता बतलानी है, जो अभी बतायी नहीं गयी है । वह विशेषता क्या है? सो बतलाया जाता है; पूर्वं प्रश्नमें जिसका यह प्रयोजकोंसहित बन्ध बतलाया गया है, वह देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मा है । दूसरे प्रश्न में उसी आत्माका क्षुधादि संसारधर्मो-से परे होना यह विशेषता बतलायी जाती है, जिस विशेषता का संन्यास-पूर्वक ज्ञान होनेपर पुरुष पूर्वोक्त बन्धन से मुक्त हो जाता है । अतः ‘ एष त आत्मा ' इस इ वाक्यतक इन दोनों प्रश्न और उत्तरोंकी समानार्थता ही है । शङ्का - किंतु एक ही आत्माका क्षुधादिसे अतीत और उनसे युक्त होना - यह विरुद्धधर्मसमवायित्व किस प्रकार सम्भव है? समाधान- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका तो परिहार किया जा चुका है । उसका संसारित्व नाम - रूपात्मक विकाररूप जो देहे-न्द्रियसंघात है, उस उपाधिभेदके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिमात्र है-ऐसा हम अनेकों बार कह चुके हैं । तथा विरुद्धार्थवाची श्रुतियोंकी व्या-ख्याके प्रसङ्गमें भी यह बात कही जा

पृष्ठ 724

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७१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ यथा रज्जुशुक्तिकागगनादयः सर्परजतमलिना भवन्ति परा-ध्यारोपितधर्मविशिष्टाः, स्वतः केवला एव रज्जुशुक्तिकागग-नादयः, न चैवं विरुद्धधर्मसम -वायित्वे पदार्थानां कश्चन विरोधः । नामरूपोपाध्यस्तित्वे-" एकमेवाद्वितीयम् " ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) " नेह नानास्ति किञ्चन ' ( बृ ० उ ० ४ । ४ । १ ९ इति श्रुतयो विरुध्येरन्निति चेत १ न, सलिल फेनदृष्टान्तेन परिहृतत्वात्, मृदादिदृष्टान्तैश्च यदा तु परमार्थ दृष्टया परमात्म-तच्चाच्छ्रुत्यनुसारिभिरन्यत्वेन निरूप्यमाणे नामरूपे मृदादिवि-कारवद् वस्त्वन्तरे तच्चतो न स्तः-सलिलफेन घटादिविकारव देव, तदा तदपेक्ष्य " एकमेवाद्वि-तीयम् " " नेह नानास्ति किञ्चन " इत्यादिपरमार्थदर्शनगोचरत्वं प्रतिपद्यते । यदा तु स्वामा- । | चुकी है; जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति और आकाश आदि दूसरोंके आरोपित किये धर्मोंसे युक्त होकर सर्प, रजत और मलिन प्रतीत होते हैं, किंतु वे स्वयं शुद्ध रज्जु, शुक्ति और आकाशादि ही हैं; इस प्रकार पदार्थोंके विरुद्ध धर्मं- समवायी होनेमें कोई विरोध भी नहीं है । शङ्का - किंतु नाम - रूप उपाधिको सत्ता स्वीकार करनेपर तो " एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ", " यहाँ नाना कुछ नहीं है " इन श्रुतियोंसे विरोध होगा - ऐसा कहें तो? समाधान — नहीं, इस शङ्काका तो जल और फेनके दृष्टान्तसे तथा मृत्तिकादिके दृष्टान्तसे परिहार किया जा चुका है, जिस समय श्रुति अनुसरण करनेवाले पुरुषोंद्वारा अन्यरूपसे निरूपण किये जानेवाले नाम और रूप परमार्थदृष्टिसे मृत्तिकादिके विकार तथा जल - फेन और घटादिके विकारके समान ही परमात्मतत्त्वसे वस्तुतः कोई भिन्न पदार्थ नहीं रहते, तब उसकी दृष्टिकी अपेक्षासे ही “ एक हो अद्वितीय है " " यहाँ नाना कुछ नहीं है " इस परमार्थदृष्टिका बोध होता है । किंतु जिस समय

पृष्ठ 725

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[ श्रध्याय ३ प्रकार कि रज्जु, श आदि दूसरोंके से युक्त होकर मलिन प्रतीत होते शुद्ध रज्जु, शुक्ति - ही हैं; इस प्रकार धर्म - समवायी च भी नहीं है । T म - रूप उपाधिको करनेपर तो " एक है ”, “ यहाँ नाना श्रुतियोंसे विरोध तो? हीं, इस शङ्काका के दृष्टान्तसे तथा तसे परिहार किया समय श्रुति बाले पुरुषोंद्वारा किये जानेवाले परमार्थदृष्टि तथा जल - फेन विकारके समान वस्तुतः कोई हृीं रहते, तब क्षासे ही " एक ' यहाँ नाना कुछ परमार्थदृष्टिका किंतु जिस समय ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्याथ ७१५ विक्याविद्यया ब्रह्मस्वरूपं रञ्ज । शुक्तिकागगनस्वरूपवदेव स्वेन रूपेण वर्तमानं केनचिदस्पृष्ट-स्वभावमपि सत् — नामरूप -कृतकार्यकरणोपाधिभ्यो विवेक्रेन नावधार्यते, नामरूपोपाधिदृष्टि-रेव च भवति स्वाभाविकी, तदा सर्वोऽयं वस्त्वन्तरास्तित्वव्यव-हारः । अस्ति चायं भेदकृतो मिथ्या-व्यवहारः, येषां ब्रह्मतत्त्वादन्य-त्वेन वस्तु विद्यते, येषां च नास्ति परमार्थवादिभिस्तु श्रुत्य-नुसारेण निरूप्यमाणे वस्तुनि -किं तत्त्वतोऽस्ति वस्तु किं वा नास्तीति, ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं सर्व-संव्यवहारशून्यमिति निर्धार्यते; तेन न कश्चिद् विरोधः । न हि परमार्थावधारण निष्ठायां वस्त्वन्तरास्तिस्वं प्रतिपद्यामहे “ एकमेवाद्वितीयम् ” “ अनन्त -रमबाह्यम् ” ( बृ ० उ ०२ | ५ | १ ९ ) रज्जु, शुक्ति और आकाशके स्वरूप-के समान किसीसे भी अछूते स्वभाववाला होकर अपने निज-रूपसे विद्यमान रहते हुए भी ब्रह्म-के स्वरूपका स्वाभाविकी अविद्या-के कारण नामरूपजनित देहेन्द्रिय-रूप उपाधिसे अलग करके निश्चय नहीं किया जाता और स्वाभावि-की नाम - रूप उपाधिकी ही दृष्टि रहती है, उस समय यह ब्रह्मसे भिन्न वस्तुकी सत्तासे सम्बन्ध रखने--वाला सारा व्यवहार रहता है । तथा यह भेदकृत मिथ्या व्यव-हार तो, जिनकी दृष्टि में ब्रह्मतत्त्वसे भिन्न वस्तु है और जिनकी दृष्टिमें नहीं है, उन दोनों को ही रहता है; किंतु जो परमार्थवादी हैं वे, कौन-सी वस्तु तत्त्वतः है और कौन - सी नहीं है - इस प्रकार श्रुतिके अनुसार वस्तुका निरूपण किये जानेपर, यही निश्चय करते हैं कि सम्पूर्ण व्यवहारसे रहित एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; इसलिये उनका व्यवहार रहनेमें भी कोई विरोध नहीं है । हम परमार्थं निश्चयकी निष्ठामें किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार नहीं करते, जैसा कि " एक ही अद्वितीय ब्रह्म है " " वह अन्तरबाह्य-| शून्य है " इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध

पृष्ठ 726

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७१६ बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय ३ इति श्रुतेः । न च नामरूप- । व्यवहारकाले त्वविवेकिनां क्रिया-कारकफलादिसंव्यवहारो नास्ती-ति प्रतिषिध्यते । तस्माज्ज्ञाना-ज्ञाने अपेक्ष्य सर्वः संव्यवहारः शास्त्रीयो लौकिकश्च अतो न काचन विरोधशङ्का । सर्ववादि-नामप्यपरिहार्यः परमार्थसंव्यव-हारकृतो व्यवहारः । तत्र परमार्थात्मस्वरूपमपेक्ष्य-प्रश्नः पुनः - कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्वर इति । प्रत्याहेतरः- योऽशनायापि -परमार्थात्मस्व- पासे, अशितुमि- । रूपनिरूपणम् च्छाशनाया, पातु-मिच्छा पिपासा; ते अशनाया-पिपासे योऽत्येतीति वक्ष्यमाणेन सम्बन्धः, अविवेकिभिस्तलमल-चदिव गगनं गम्यमानमेव तल-मले अत्येति परमार्थतः; ताभ्या-मसंसृष्टस्वभावत्वात् । तथा होता है और नाम - रूप व्यवहार-कालमें अविवेकियोंकी दृष्टिमें भी क्रिया, कारक और फलादिका सम्यक् व्यवहार नहीं होता – ऐसा प्रतिषेध भी नहीं किया जाता । अतः शास्त्रीय और लौकिक सारा ही व्यवहार ज्ञान और अज्ञानको अपेक्षासे है; इसलिये इसमें विरोव-की कोई शङ्का नहीं हो सकती । परमार्थ और संव्यवहारकृत व्यव-हार तो सभी वादियोंके लिये अपरिहार्य है । अब, पारमार्थिक आत्मस्वरूप-की अपेक्षासे ही पुनः प्रश्न किया जाता है, ' हे याज्ञवल्क्य! वह सर्वान्तर आत्मा कौन - सा है? " इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- ' जो अशनाया - पिपासा - अशनकी इच्छा अशनाया है और पीनेकी इच्छा | पिपासा - उन अशनाया और पिपासाको जो अतिक्रमण किये हुए है - इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है; अविवेकी पुरुष आकाशको तलमलादियुक्त मानते हैं, तो भी वस्तुतः वह उनसे अछूते स्वभाववाला होने के कारण तलमलको अतिक्रमण । किये हुए है । इसी प्रकार

पृष्ठ 727

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[ अध्याय ३ म - रूप व्यवहार-योंकी दृष्टिमें भी और फलादिका नहीं होता- ऐसा किया जाता । लौकिक सारा न और अज्ञानको लिये इसमें विरोध-नहीं हो सकती । व्यवहारकृत व्यव-वादियोंके लिये आर्थिक आत्मस्वरूप-पुनः प्रश्न किया याज्ञवल्क्य! वह कौन - सा है? ' क्यने कहा - ' जो -अशनकी इच्छा र पीनेकी इच्छा अशनाया और अतिक्रमण किये र इसका आगेसे अविवेकी पुरुष मलादियुक्त मानते स्तुतः वह उनसे होने के अतिक्रमण इसी प्रकार ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१७ NNNNN मूढैः अशनायापिपासादिमद्- | यद्यपि मूढलोग ' मैं भूखा हूँ, मैं ब्रह्म गम्यमानमपि क्षुधितोऽहं प्यासा हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मको भूख - प्यास से युक्त समझते हैं तो भी पिपासितोऽहमिति, ते अत्येत्येव । उनसे असंसृष्ट स्वभाववाला होनेके परमार्थतः । ताभ्यामसंसृष्टस्व- । भावत्वात्; " न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्यः ” ( क ० उ ० २ । । २ । ११ ) इति श्रुतेः – अवि-द्वल्लोकाध्यारोपितदुःखेनेत्यर्थः । प्राणैकधर्मत्वात् समासकरणमश-नायापिपासयोः । शोकं मोहम्— शोक इति कामः; इष्टं वस्तू द्दिश्य चिन्तयतो यदरमणम्, तत्तृष्णा-मिभूतस्य कामबीजम्; तेन हि कामो दीप्यते; मोहस्तु वि-परीतप्रत्ययप्रभवोऽविवेको भ्रमः, स चाविद्या सर्वस्यानर्थस्य प्रसव -बीजम्; भिन्नकार्यत्वात्तयोः शोकमोहयोरसमासकरणम् । तौ कारण वह परमार्थतः उनका अति-क्रमण ही किये हुए है; इस विषय में " वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता, उससे बाह्य है " ऐसी श्रुति भी है । तात्पर्य यह है कि वह अविद्वान् पुरुषोंद्वारा आरोपित दुःखसे लिप्त नहीं होता । एक प्राणके ही धर्म होनेके कारण ' अशनाया ' और ' पिपासा ' पदोंका समास किया गया है । ' शोकं मोहम् ' इनमें शोक यह काम है; इष्ट वस्तुके लिये चिन्तन करनेवालेका जो अरमण ( खेद ) है, वह तृष्णाभिभूत पुरुषके कामका वीज होता है; क्योंकि उससे काम उत्तेजित होता है; मोह विपरीत प्रतीतिसे होनेवाला अविवेक यानी भ्रम है; यही समस्त अनर्थोंको उत्पत्ति-की बीजभूता अविद्या है; ' शोक और मोहके कार्य भिन्न हैं, इसलिये इनका समास नहीं किया गया । १ योगदर्शन में अविद्याका लक्षण इस प्रकार किया है- ' अनित्याशुचिदुःखा-नात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ' अर्थात् अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मामें नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि होना अविद्या है — यही विपरीत प्रतीति है ।

पृष्ठ 728

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ७१८ मनोऽधिकरणौ; तथा शरीराधि- । करणौ जरां मृत्युं चात्येति; जरेति कार्यकरणसङ्घातविपरि-' णामो वलीपलितादिलिङ्गः मृत्युरिति तद्विच्छेदो विपरिणा-मावसानः; तौ जरामृत्यू शरीरा-धिकरणावत्येति । ये ते शनायादयः प्राणमन: -शरीराधिकरणा प्राणिष्वनवरतं वर्तमाना अहोरात्रादिवत् समुद्रो-मिवच्च प्राणिषु संसार इत्युच्यन्ते, योऽसौ दृष्टेर्द्रष्टेत्यादिलक्षणः साक्षादव्यवहितोऽपरोक्षादगौणः सर्वान्तर आत्मा ब्रह्मादिस्तम्ब -पर्यन्तानां भूतानामशनायापिपा-सादिभिः संसारधर्मैः सदा न स्पृश्यते; आकाश इव घनादि-मलैः । इन दोनोंका अधिकरण मन है. इनको तथा शरीर जिनका अधि-करण है, उन जरा और मृत्युको भी आत्मा अतिक्रमण किये है । जरा - यह देहेन्द्रियसंघातका विपरिणाम है, झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना आदि इसके चिह्न हैं तथा मृत्यु शरीरका विच्छेद और विपरिणामका अन्त हो जाना है; उन शरीररूप अधिकरणवाले जरा-मृत्युका वह अतिक्रमण किये हुए है । ये जो प्राण, मन और शरीर-रूप अधिकरणवाले तथा प्राणियों में दिन - रात और समुद्रकी तरङ्गोंके समान निरन्तर रहनेवाले क्षुधादि धर्मं हैं, वे ही प्राणियोंमें ' संसार ' इस नामसे कहे जाते हैं; किंतु यह जो दृष्टिका द्रष्टा आदि लक्षणोंवाला, साक्षात् - अव्यवहित और अपरोक्ष-अगौण सर्वान्तर— ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंका आत्मा है, वह मेघादि मलोंसे आकाशके समान कभी संसारधर्मोंसे स्पर्शं नहीं किया जाता । तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं उस इस आत्मा - स्वरूपको विदुषो व्युत्थान - विदित्वा ज्ञात्वा | यह सर्वदा सम्पूर्णं संसारधर्मोसे निरूपणम् श्रयमहमस्मि परं ब्रह्म रहित नित्यतृप्त परब्रह्म मैं हूँ-सदा सर्वसंसारविनिर्मुकं नित्य- ऐसा जानकर ब्राह्मणलोग — क्योंकि

पृष्ठ 729

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[ अध्याय ३ धिकरण मन है, र जिनका अधि-रा और मृत्युको तक्रमण किये हुए देहेन्द्रियसंघातका झुर्रियाँ पड़ जाना, आदि इसके चिह्न वीरका विच्छेद और अन्त हो जाना है; अधिकरणवाले जरा-तक्रमण किये हुए है । , मन और शरीर-वाले तथा प्राणियों में - समुद्रकी तरङ्गोंके र रहनेवाले क्षुधादि णियों में ' संसार ' इस ते हैं; किंतु यह जो आदि लक्षणोंवाला, नवहित और अपरोक्ष-तर - ब्रह्मासे लेकर नमस्त भूतोंका आत्मा - मलोंसे आकाशके सारधर्मोसे स्पर्श नहीं आत्मा - स्वरूपको सम्पूर्ण संसारधर्मोसे परब्रह्म में हूँ-ब्राह्मणलोग — क्योंकि ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१ ९ तृप्तमिति, ब्राह्मणाः ब्राह्मणानाम् । एवाधिकारो व्युत्थाने, अतो ब्राह्मणग्रहणम्, व्युत्थाय वैपरीत्येन उत्थानं कृत्वा; कुत इत्याह-पुत्रैषणायाः पुत्रार्थैषणा पुत्रैषणा-पुत्रेणेमं लोकं जयेयमिति लोक-जयसाधनं पुत्रं प्रतीच्छा - एषणा दारसङ्ग्रहः । दारसङ्ग्रहम-कृत्वेत्यर्थः— वित्तैषणायाथ — कर्मसाधनस्य गवादेरुपादानम् - अनेन कर्म कृत्वा पितृलोकं जेष्यामीति, विद्यासंयुक्तेन वा देवलोकम्, केवलया वा हिरण्यगर्भविद्यया दैवेन वित्तेन देवलोकम् । दैवाद् वित्ताद् व्युत्थानमेव नास्तीति केचित्, यस्मात्तद्बलेन हि किल व्युत्थानमिति; तदसत्, “ एतावान्वै कामः " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १७ ) इति व्युत्थान ( संन्यास ) में ब्राह्मणोंका ही अधिकार है, इसलिये यहाँ ' ब्राह्मण ' पद ग्रहण किया गया है— ' व्युत्थाय ' विपरीतभावसे उत्थान करके, कहाँसे उत्थान करके? सो बताते हैं - पुत्रेषणासे, पुत्रके लिये जो एषणा ( इच्छा ) होती है, उसे पुत्रेषणा कहते हैं- मैं पुत्रके द्वारा यह लोक जीतूंगा, इसलिये लोक-जयके साधन पुत्रके प्रति जो इच्छा होती है वही पुत्रैषणा है; यहां ' एषणा ' से स्त्रीपरिग्रह लक्षित होता है । भाव यह कि स्त्रीसंग्रह न करके-तथा वित्तैषणासे उत्थान करके, कर्मके साधनभूत गौ आदि मानुष-वित्तको इस भाव से ग्रहण करना कि इसके द्वारा कर्म करके में पितृ-लोकपर विजय प्राप्त करूंगा अथवा विद्यासंयुक्त कर्मसे देवलोक या | केवल हिरण्यगर्भविद्यारूप देववित्त-से देवलोक प्राप्त करूंगा, [ इसका नाम वित्तैषणा है ] | किन्हीं - किन्हीं का मत है कि देव-वित्तसे तो व्युत्थान होता ही नहीं, क्योंकि उसके बलसे ही तो व्युत्थान होता है; किंतु यह ठीक नहीं है, | क्योंकि “ एतावान्वै काम: " इस

पृष्ठ 730

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७२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ 2 पठितत्वादेषणामध्ये दैवस्य । वित्तस्य; हिरण्यगर्भादिदेवतावि षयैव विद्या वित्तमित्युच्यते देवलोक हेतुत्वात् न हि निरु -पाधिक प्रज्ञानघनविषया ब्रह्म-विद्या देवलोकप्राप्तिहेतुः, " तस्मात्तत्सर्वमभवत् " ( पृ ० उ ० १ । ४ । १० ) “ आत्मा ह्येषां सभवति " ( १ । ४ । १० ) इति श्रुतेः तद्बलेन हि व्युत्थानम्, " एतं वै तमात्मानं विदित्वा " ( ३।५।१ ) इति विशेषवचनात् । तस्मात् त्रिभ्योऽप्येतेभ्योऽना-त्मलोकप्राप्तिसाधनेभ्य एषणा-विषयेभ्यो व्युत्थाय - एषणा कामः " एतावान् वै कामः " ( १ । ४ । १७ ) इति श्रुतेः-एतस्मित्रिविधेऽनात्मलोकप्राप्ति-साधने तृष्णामकृत्वेत्पर्थः । सर्वा हि साधनेच्या फलेच्छैव, एषणात्रय- अतो व्याचष्टे श्रुतिः स्यैकत्वम् एकैव एषणेति कथम् १ या ह्येव पुत्रैषणा सा श्रुतिद्वारा दैववित्तको षणा बीचमें ही पढ़ा गया है और हिरण्य- व गर्भादि देवताविषयिणी विद्या ही देववित्त कही जाती है, क्योंकि वह देवलोकप्राप्तिकी हेतु है । निरु- ए पाधिक प्रज्ञानघनविषयिणी ब्रह्म-विद्या देवलोककी प्राप्तिकी हेतु नहीं है, जैसा कि " अतः वह सर्व हो गया " " वह इनका आत्मा ही हो जाता है " इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमा- ६ णित होता है । और व्युत्थान भी न ब्रह्मविद्याके ही बलसे होता है, क्योंकि इस विषयमें " उस इ आत्माको जानकर " ऐसा विशेष वाक्य है । f अतः एषणाके विषयभूत इन तीनों ही अनात्मलोकप्राप्तिके साधनोंसे व्युत्थान करके — " निश्चय इतना ही काम है " इस श्रुतिके अनुसार एषणा कामका ही नाम क्ष है - तात्पर्य यह है कि अनात्म-लोककी प्राप्तिके इस त्रिविध साधन-में तृष्णा न करके [ भिक्षाचर्या करते हैं । ] साधनसम्बन्धिनी सारी इच्छा फलेच्छा ही है, इसलिये श्रुति ऐसी व्याख्या करती है कि एक ही एषणा है; किस प्रकार? - जो भी पुत्रेषणा है, वही वित्तेषणा है; क्योंकि