बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 711–720
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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[ अध्याय ३ तथा जो सर्वान्तर— तर है - श्रुतिमें ' यत् ' न पदोंसे यह प्रदर्शित है कि यह प्रसिद्ध है - उस आत्माका व्याख्यान करो - जि को पकड़कर गौ दिख-प्रकार स्पष्ट बतलाओ यह है - इस प्रकार करो । कार कहे जानेपर याज्ञ-तर दिया, ' तेरा यह वन्तिर — सबका अन्त-वन्तिर ' शब्दका ग्रहणं षणोंके उपलक्षणके लिये आत् - अव्यवहित और गौण ब्रह्म - बृहत्तम अभ्यन्तर है, यह इन से युक्त है; वह कौन आत्मा है; यह जो तेरा ( देह - इन्द्रिय ) संघात आत्माके द्वारा आत्म-यह तेरा आत्मा है; कार्य - करणसंघातका । ज्युके यह कहने पर किं, पिण्ड है, उसके भीतर तरूप लिङ्गदेह है और है, जिसके विषय में सन्देह ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ म़मात्मा सर्वान्तरस्त्वया विवक्षित इत्युक्त इतर आह - यः प्राणेन मुखनासिका सञ्चारिणा प्राणिति प्राणचेष्टां करोति, येन प्राणः प्रणीयत इत्यर्थः - स ते तव कार्यकरणसङ्घातस्य आत्मा विज्ञानमयः; समानमन्यत्; यो s पानेनापानीति यो व्यानेन व्यानीतीति - छान्दसं दैर्घ्यम् । सर्वाः कार्यकरणसङ्घातगताः प्राणनादिचेष्टा दारुयन्त्रस्येव येन । क्रियन्ते - न हि चेतनावदनधि-ष्ठितस्य दारुयन्त्रस्येव प्राणनादि-चेष्टा विद्यन्ते; तस्माद् विज्ञानमये-नाधिष्ठितं विलक्षणेन दारुयन्त्र-वत् प्राणनादिचेष्टां प्रतिपद्यते -७०१ 22 है- इनमें तुम किसे मेरा सर्वान्तर आत्मा बतलाना चाहते हो? ऐसा प्रश्न करनेपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा- ' जो मुख और नासिका-द्वारा संचार करनेवाले प्राणसे प्राण-चेष्टा करता है, तात्पर्य यह है कि जिसके द्वारा प्राण प्रणीत ( चेष्टा-युक्त ) होता है, वह विज्ञानमय कार्यकरणसंघातरूप तेरा आत्मा है । शेष वाक्यका अर्थ इसीके समान है । ' यो s पानेनापानीति यो व्यानेन व्यानीति ' इस वाक्यके ' अपानीति, व्यानीति ' इन पदोंमें ' नी ' ऐसा जो दीर्घप्रयोग है, वह छान्दस है । [ तात्पर्य यह है कि ] काष्ठ-यन्त्रके समान देहेन्द्रियसंघातमें होनेवाली प्राणनादि समस्त चेष्टाएँ जिसके द्वारा की जाती हैं [ वही तेरा सर्वान्तर आत्मा है ] । जैसे किसी चेतन अधिष्ठाताकी प्रेरणा बिना लकड़ीका यन्त्र हिल नहीं सकता, उसी प्रकार इस स्थूल शरीरकी प्राणनादि चेष्टाएँ भी चेतन आत्माके बिना नहीं हो सकतीं । अतः यह अपने से भिन्न विज्ञानमय आत्मासे अधिष्ठित होकर काष्ठके यन्त्रके समान प्राणनादि चेष्टा करता है; इसलिये
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७०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ तस्मात्सोऽस्ति कार्यकरणसङ्घात- | जो इससे चेष्टा करता है, वह कार्यंकरणसंघातसे विलक्षण [ तेरा
विलक्षणः, यश्चेष्टयति ॥ १ ॥ । सर्वान्तर आत्मा ] है ॥ १ ॥
य श्रात्माकी अनिर्वचनीयता f स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्र यादसौ गौर- ब्र सावश्व इत्येवमेवैतद् व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षाद- भ परोक्षादब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त त्य आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः । न य अ दृष्टेष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः । एष त आत्मा सर्वान्तरो ऽतोऽन्यदार्तं ततो होषस्तश्चाक्रायण प्रथ उपरराम ॥ २ ॥
उस चाक्रायण उषस्तने कहा, ' जिस प्रकार कोई [ चलना और दौड़ना एक दिखाकर ] कहे कि यह ( चलनेवाला ) बैल है, यह ( दौड़नेवाला ) घोड़ा म है, उसी प्रकार तुम्हारा यह कथन है; अतः जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसे तुम स्पष्टतया बतलाओ । ' [ याज्ञवल्क्य- -1 मय ' यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है । ' [ उषस्त ] ' हे याज्ञवल्क्य! वह सर्वान्तर कौन सा है? ” [ याज्ञवल्क्य - ] ' तुम दृष्टिके द्रष्टाको नहीं देख सकते, श्रुति घ श्रोताको नहीं सुन सकते, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकते, विज्ञाति- अ के विज्ञाताको नहीं जान सकते । तुम्हारा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे भिन्न आर्तं ( नाशवान् ) है । ' इसके पश्चात् चाक्रायण उषस्त चुप हो पुन गया ॥ २ ॥
स होवाचोषस्तश्चाक्रायणः- उस चाक्रायण उषस्तने कहा, स्व यथा कश्चिदन्यथा प्रतिज्ञाय पूर्वम्, ' जिस प्रकार पहले कोई अन्य स्वार पुनर्विप्रतिपन्नो प्रकारसे प्रतिज्ञा कर फिर विपरीत I ज्यादन्यथा - भाषण करे, अर्थात् पहले ऐसी
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[ अध्याय ३ करता है, वह विलक्षण [ तेरा ] है ॥१ ॥
यादसौ गौर-देव साक्षाद-नाचक्ष्वेत्येष त सर्वान्तरः । न न मतेर्मन्तारं नाः । एष त स्तश्चाक्रायण चलना और दौड़ना ड़नेवाला ) घोड़ा ज्ञात् अपरोक्ष ब्रह्म [ याज्ञवल्क्य - ] य! वह सर्वान्तर देख सकते, श्रुति र सकते, विज्ञाति-सर्वान्तर है, इससे T उषस्त चुप हो ण उषस्त ने कहा, नहले कोई अन्य कर फिर विपरीत पहले ऐसी ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३ सौ गौरसावश्वो यश्चलति धावतीति वा, प्रत्यक्षं दर्श-यामीति प्रतिज्ञाय, पश्चाच्च लना-दिलिङ्गैर्व्यपदिशति, एवमेवैतद् ब्रह्म प्राणनादिलिङ्गैर्व्यपदिष्टं भवति त्वया किं बहुना । त्यक्त्वा गोतृष्णानिमित्तं व्याजम्, यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः, तं व्याचक्ष्वेति । इतर आह — यथा मया प्रथमं प्रतिज्ञातस्तवात्मा-एवंलक्षण इति तां प्रतिज्ञा-मनुवर्त एव तत्तथैव यथोक्तं मया । यत् पुनरुक्तं तमात्मानं घटादिवद् विषयीकुर्विति, तद् अशक्यत्वान्न क्रियते । कस्मात् पुनस्तदशक्यम् १ इत्याह — वस्तु-स्वाभाव्यात; किं पुनस्तद् वस्तु-स्वाभाव्यम् दृष्टयादिद्रष्टृत्वम्; दृष्टे र्द्रष्टा ह्यात्मा । दृष्टिरिति द्विविधा । | प्रतिज्ञा करके कि तुम्हें प्रत्यक्ष [ गौ | और अश्व ] दिखलाऊँगा फिर चलन आदि लिङ्गसे कहे कि जो चलती है, वह गो है और जो दोड़ता है, वह घोड़ा है; इसी प्रकार इस ब्रह्मका तुम प्राणनादि लिङ्गों-| द्वारा व्यपदेश कर रहे हो; अतः तुम गौओंकी तृष्णाके कारण ब्रह्म-वेत्ता होने का बहाना छोड़कर जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसका मेरे प्रति स्पष्ट उल्लेख करो । इतर ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा— ' मैंने जैसी पहले प्रतिज्ञा की थी कि तुम्हारा आत्मा ऐसे लक्षणोंवाला है, उस प्रतिज्ञाका मैं अनुवर्तन कर ही रहा हूँ, मैंने जैसा कहा है, वह वैसा ही है और तुमने जो कहा कि उस आत्माको घटादिके समान हमारा विषय कर दो, सो वैसा सम्भव न होने के कारण नहीं किया जाता । वह असम्भव क्यों है? सो बतलाते हैं - वस्तुका ऐसा ही स्वभाव होनेके कारण; वह वस्तु-का स्वभाव क्या है? दृष्टि आदि-का द्रष्टा होना आत्माका स्वभाव है; आत्मा दृष्टिका द्रष्टा है । दृष्टि-यह है—
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७०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ भवति — लौकिकी पारमार्थिकी । चेति तत्र लौकिकी चक्षुःसंयुक्ता अन्तःकरणावृत्तिः, सा क्रियत इति जायते विनश्यति च; या त्वात्मनो दृष्टिः– - अग्न्युष्ण-प्रकाशादिवत् सा च द्रष्टुः स्वरूपत्वान्न जायते न विनश्यति च । सा क्रियमाणयोपाधिभृतया संसृष्टे वेति व्यपदिश्यते— द्रष्टेति, भेदवच्च- द्रष्टा दृष्टिरिति च यासौ लौकिकी दृष्टिश्चक्षु-द्वारा रूपोपरक्ता जायमानैव नित्यया आत्मदृष्टया संसृष्टेव तत्प्रतिच्छाया — तया व्याप्तैव जायते तथा विनश्यति च; तेनो-पचर्यते द्रष्टा सदा पश्यन्नपि — पश्यति न पश्यति चेति न तु पुनर्द्रष्डुडष्टेः कदाचिदप्यन्यथा-स्वम्; तथा च वक्ष्यति षष्ठे " ध्याय तीव बेलायतीव " ANN लौकिकी और पारमार्थिकी; उनमें चक्षुसे संयुक्त जो अन्तःकरणकी वृत्ति है वह लौकिकी दृष्टि है; वह की जाती है, इसलिये उत्पन्न होती है और नष्ट भी होती है; किंतु जो अग्निके उष्णत्व और प्रकाशादि-के समान आत्माकी दृष्टि है, वह द्रष्टाका स्वरूप होनेके कारण न उत्पन्न होती है और न नष्ट होती है । वह क्रियमाण उपाधिभूता दृष्टि-से संसर्गयुक्त सी है, इसलिये आस्मा ' द्रष्टा ' कहा जाता है । तथा द्रष्टा, दृष्टि ऐसा भेदवत् व्यवहार होता है । और यह जो लौकिकी दृष्टि है वह मानो चक्षुद्वारा रूपसे संश्लिष्ट - सी ही उत्पन्न होनेवाली है, वह नित्य आत्मदृष्टिसे संसृष्ट-सी, उसकी प्रतिच्छाया और उससे व्याप्त ही उत्पन्न होती और ' विनाशको प्राप्त होती है । उसीके कारण, सर्वदा देखनेवाला होनेपर भी द्रष्टा के विषय में ' वह देखता है, नहीं देखता है ' ऐसा उपचार किया जाता है; किंतु द्रष्टाकी दृष्टिमें कमी अन्यथात्व नहीं होता; ऐसा छठे ( उपनिषद् के चौथे ) अध्याय-में कहेंगे भी - " मानो ध्यान करता हुआ, मानो चेष्टा करता
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[ अध्याय ३ ANN नारमार्थिकी; उनमें जो अन्तःकरणकी किकी दृष्टि है; वह सलिये उत्पन्न होती होती है; किंतु जो च और प्रकाशादि-नाकी दृष्टि है, वह होनेके कारण न और न नष्ट होती उपाधिभूता दृष्टि-' है, इसलिये आत्मा जाता है । तथा सा भेदवत् व्यवहार जो लौकिकी दृष्टि I चक्षुद्वारा रूपसे उत्पन्न होनेवाली आत्मदृष्टि से संसृष्ट-प्रतिच्छाया और उत्पन्न होती और होती है । उसीके देखनेवाला होनेपर यमें ' वह देखता है, ऐसा उपचार किया कतु द्रष्टाकी दृष्टिमें त्व नहीं होता; ऐसा दुके चौथे ) अध्याय-" मानो ध्यान मानो चेष्टा करता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०१ ( ४ । ३। ७ ) ' न हि द्रष्टुष्टे । र्विपरिलोपो विद्यते " ( ४ । ३ । २३ ) इति च । तमिममर्थमाह – लौकिक्था दृष्टेः कर्मभूतायाः, द्रष्टारं स्त्र-कीयया नित्यया दृष्ट्या व्या-सारम्, न पश्येः; यासौ लौकि-की दृष्टिः कर्मभूता, सारूपो-परक्ता रूपाभिव्यञ्जिका नात्मानं स्वात्मनो व्याप्तारं प्रत्यचं व्याप्नोति; तस्मात्तं प्रत्यगात्मानं दृष्टेर्द्रष्टारं न पश्येः । तथा श्रुतेः श्रोतारं न शृणुयाः, तथा मतैर्म-नोवृत्तेः केवलाया व्याप्तारं न मन्वीथाः । तथा विज्ञातेः केव-लाया बुद्धिवृत्तेर्व्याप्तारं न विजा -नीयाः । एष वस्तुनः स्वभावः तो नैव दर्शयितुं शक्यते गवादिवत् । ' न इष्टेर्द्रष्टारम् ' इत्यत्रा-तरोण्यन्यथा व्याचक्षते केचित् - न दृष्टेर्द्रष्टारं दृष्टेः हुआ " तथा " द्रष्टा दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता " इत्यादि । उसी बातको याज्ञवल्क्य इस प्रकार कहता है - जो अपनो कर्मं-भूता लौकिकी दृष्टिका द्रष्टा और उसे अपनी नित्यदृष्टिसे व्याप्त करनेवाला है, उसे तुम नहीं देख सकते । यह जो उसकी कर्मभूता लौकिकी दृष्टि है, वह रूपसे उपरक्त होकर रूपकी अभिव्यञ्जिका है, वह अपनेको व्याप्त करनेवाले प्रत्य-गात्माको व्याप्त नहीं कर सकती; अतः उस दृष्टिके द्रष्टा प्रत्यगात्माको नहीं देख सकते । इसी प्रकार उस श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते तथा मति — केवल मनोवृत्तिके व्याप्त करनेवालेका मनन नहीं कर सकते । एवं विज्ञाति – केवल बुद्धि-वृत्तिके व्याप्त करनेवालेको नहीं जान सकते । यह [ उस ] वस्तु स्वभाव है, इसलिये उसे गौ आदिके समान दिखाया नहीं जा सकता । कोई - कोई [ भर्तृ प्रपञ्चादि ] ' न । दृष्टेर्द्रष्टारम् ' इत्यादि श्रुतिके अक्षरों-की दूसरी तरह व्याख्या करते हैं । दृष्टिके द्रष्टा अर्थात् दृष्टि के कर्ताको दृष्टिभेदमकृत्वा दृष्टि- नहीं देख सकते यानी दृष्टिभेद कर्तारं बिना किये तुम केवल दृष्टिमात्रके मात्रस्य कर्तारम्, न पश्येरिति; कर्ताको नहीं देख सकते; यहाँ वृ ० उ ० ४५-
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७०६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ दृष्टेरिति कर्मणि षष्ठी; सा दृष्टिः क्रियमाणा घटवत् कर्म भवति; द्रष्टारमिति वृजन्तेन द्रष्टुर्डष्टिकर्तृ-त्वमाचष्टे; तेनासौ दृष्टेद्रष्टा दृष्टेः कर्तेति व्याख्यातृणाम-भिप्रायः । तत्र दृष्टेरिति षष्ठयन्तेन दृष्टिग्रहणं निरर्थकमिति दोषं न पश्यन्ति; पश्यतां वा पुनरुक्तम् असारः प्रमादपाठ इति वा नं आदरः; कथं पुनराधिक्यम् १ वृजन्तेनैव दृष्टिकर्तृत्वस्य सिद्ध-त्वाद् दृष्टेरिति निरर्थकम्; तदा ' द्रष्टारं न पश्येः ' इत्येतावदेव वक्तव्यम्; यस्माद्धातोः परस्तृच् श्रूयते, तद्भास्वर्थ कर्तरि हि तृच् स्म -येते; ' गन्तारं भेत्तारं वा नयति ' १. क्योंकि ' ण्वुल्तृची कर्तरि ' इस कर्ता - अर्थ में ही होता है । | ' दृष्टे: ' इस पदमें कम में षष्ठी है, वह दृष्टि क्रियमाण होनेसे घटके समान कर्म है और ' द्रष्टारम् ' इस तृजन्त-पदसे द्रष्टाका दृष्टिकर्तृत्व बतलाया गया है; अत: उन व्याख्याताओंका अभिप्राय यह है कि यह दृष्टिका द्रष्टा - दृष्टिका कर्ता है । ऐसी व्याख्या करनेमें वे यह दोष नहीं देखते कि ' दृष्टे: ' इस षष्ठ्यन्तरूपसे ' दृष्टि ' पदका ग्रहण निरर्थक हो जाता है । अथवा यदि देखते होंगे तो ' यह पुनरुक्त है, असार है, प्रमादपाठ है ' ऐसा समझकर उसपर ध्यान नहीं देते । यह अधिक पाठ किस प्रकार है? दृष्टिकर्तृत्वरूप अर्थ तो [ ' द्रष्टारम् ' इस ] तृजन्त पदसे ही सिद्ध हो जाता है ' इसलिये ' दृष्टेः ' यह पद निरर्थक ही है; उस स्थिति में तो ' द्रष्टारं न पश्येः ' केवल इतना ही कहना चाहिये था; क्योंकि जिस धातुसे परे ' तृच् ' प्रत्यय सुना जाता है, वहां वह ' तृच् ' उस कर्ता - अर्थ में ही होती है; जैसे गन्ता ( गमन करनेवाले ) को अथवा भेत्ता ( भेदन करनेवाले ) को ले जाता पाणिनिसूत्रके अनुसार ' तृच् ' प्रत्यय
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[ अध्याय ३ - कर्ममें षष्ठी है, वह होनेसे घटके समान टारम् ' इस तृजन्त-ष्टिकर्तृत्व बतलाया न व्याख्याताओंका कि यह दृष्टिका कर्ता है । करने में वे यह कि ' दृष्टेः ' इस दृष्टि ' पदका ग्रहण है । अथवा यदि ' यह पुनरुक्त है, पाठ है ' ऐसा ध्यान नहीं देते । किस प्रकार है? थं तो [ ' द्रष्टारम् ' दसे ही सिद्ध हो ' दृष्टेः ' यह पद उस स्थिति में तो केवल इतना ही ; क्योंकि जिस प्रत्यय सुना जाता उस ती है; जैसे गन्ता I को अथवा भेत्ता - ) को ले जाता चार ' तृच् ' प्रत्यय ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७. इत्येतावानेव हि शब्दः प्रयुज्यते । न तु ' गतेर्गन्तारं भिदेर्भेत्तारम् ' इति असत्यर्थविशेषे प्रयोक्तव्यः न च अर्थवादत्वेन हातव्यं सत्यां गतौ; न च प्रमादपाठः, सर्वे-बामविगानात्; तस्माद् व्याख्या-तृणामेव बुद्धिदौर्बल्यम् नाध्येत्-प्रमादः । यथा त्वस्माभिर्व्याख्यातम् -लौकिकदृष्टेर्विविच्य नित्यदृष्टि-विशिष्ट आत्मा प्रदर्शयितव्यः -तथा कर्तृकर्मविशेषणत्वेन दृष्टि शब्दस्य द्विः प्रयोग उपपद्यते, आत्मस्वरूपनिर्धारणाय; " न हि द्रष्टुष्टे! ” ( ४ । ३ । २३ ) इंति च प्रदेशान्तरवाक्ये -नैव एकवाक्यतोपपन्ना भवति च " चक्षूंषि पश्यति " ( के ० उ ० १ । ६ ) " श्रोत्र -मिदं श्रुतम् " ( के ० उ ० १ है - केवल इतना हो शब्द प्रयुक्त होता है, यदि कोई अन्य विशेष अभिप्राय न हो तो ' गतिके गन्ताको ’ या ' भेदनके भेत्ताको ' ऐसा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये । जब कि इस अधिक पदप्रयोगकी दूसरी गति है तो इसे अर्थवाद कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं है, और न यह प्रमादपाठ ही है, क्योंकि सभी शाखाओंका इसमें मतभेद नहीं है । अतः यहाँ उन व्याख्याताओंकी ही बुद्धिकी दुर्बलता है, अध्ययन-कर्ताओंका प्रमाद नहीं है । किंतु जिस प्रकार हमने व्याख्या | की है कि ' आत्माको लौकिकी दृष्टि-से अलग करके नित्यदृष्टिविशिष्ट दिखाना है ' उस प्रकार आत्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये कर्म और कर्ताके विशेषणरूपसे ' दृष्टि ' शब्दका दो बार प्रयोग होना बन सकता है तथा " नं हि द्रष्टु-दृष्टेः " इस प्रदेशान्तरके वाक्यसे भी इसकी एकवाक्यता हो जाती है एवं " चक्षूंषि पश्यति ” “ श्रोत्र'-। मिदं श्रुतम् " इत्यादि अन्य ७ ) इति श्रुत्यन्तरेण एक- श्रुतियोंसे भी एकवाक्यता हो वाक्यतोपपन्ना । न्यायाच्च - एव - । जाती है । तथा युक्तिसे भी यही १. द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता । २. जिसके द्वारा चक्षु इन्द्रिय देखता है । ३. जिसके द्वारा यह श्रोत्रेन्द्रिय सुन सकता है ।
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७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ मेव ह्यात्मनो नित्यत्वमुपपद्यते विक्रियाभावे; विक्रियावच्च नि-त्यमिति च विप्रतिषिद्धम् । " " यायतीव लेलायतीव " ( ४ । ३ । ७ ) “ न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्वि-परिलोपो विद्यते " ( ४ । ३ । २३ ) “ एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य " ( ४ । ४ । २३ ) इति च श्रुत्यन्तराण्यन्यथा न गच्छन्ति । ननु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाते. त्येवमादीन्यप्यक्षगण्यात्मनोऽवि -क्रियत्वे न गच्छन्तीति; न; यथाप्राप्तलौकिकवाक्यानुवादि-त्वात्तेषाम् । न आत्मतत्त्व-निर्धारणार्थानि तानि; ' न दृष्टे-द्रष्टारम् ' इत्येवमादीनामन्यार्था-सम्भवाद् यथोक्तार्थपरत्वमव-गम्यते । तस्मादनवबोधादेव हि विशेषणं परित्यक्तं दृष्टेरिति । | उचित जान पड़ता है; क्योिं विकारका अभाव होनेके कारण इसी प्रकार आत्माका नित्यत्व सम्भव हो सकता है । [ किंतु यदि आत्माको दृष्टिकर्ता माना जायगा तो वह विकारी होगा ] और जो विकारी है, वह नित्य हो - ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है । इसके सिवा " ध्यायतीव लेलायतीव ” " न हि द्रष्टु'ष्टेविपरिलोपो विद्यते " " एवं नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य ” इत्यादि श्रुतियोंके अक्षरोंकी भी अन्य किसी प्रकार गति नहीं है । यदि कहो कि आत्माको विकार-हीन माननेपर तो द्रष्टा, श्रोता मन्ता, विज्ञाता इत्यादि शब्दोंकी भी कोई सङ्गति नहीं लग सकती, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वे तो यथाप्राप्त लौकिक वाक्योंका अनुवाद करनेवाले हैं । वे आत्म-तत्त्वका निर्णय करनेके लिये नहीं हैं; " न दृष्टेर्द्रष्टारम् " इत्यादि. श्रुतियोंका कोई अन्य अर्थ होना सम्भव न होनेके कारण उनका उपर्युक्त अर्थ में ही तात्पर्य समझा जाता है । अतः अन्य व्याख्याताओं-ने अज्ञानसे ही ' दृष्टे: ' इस विशेषण-का त्याग किया है । १. यह ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) की नित्य महिमा है ।
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[ अध्याय ३ पड़ता है; क्योंकि नाव होनेके कारण आत्माका नित्यत्व है । [ किंतु यदि कर्ता माना जायगा - होगा ] और जो ह नित्य हो - ऐसा रविरुद्ध है । इसके जीव लेलायतीव " विपरिलोपो विद्यते " हिमा ब्राह्मणस्य " के अक्षरोंकी भी रगति नहीं है । आत्माको विकार-तो द्रष्टा, श्रोता इत्यादि शब्दोंकी नहीं लग सकती, ठीक नहीं, क्योंकि लौकिक वाक्योंका हैं । वे आत्म-करनेके लिये नहीं टारम् " इत्यादि अन्य अर्थ होना कारण उनका तात्पर्यं समझा न्य व्याख्याताओं-टे: ' इस विशेषण-३ । ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७० ९ एष ते तवात्मा सर्वैरुक्त-विंशेषणैर्विशिष्टः, श्रत एतस्मा- । दात्मनोऽन्यदार्तम्- कार्यं वा शरी-रम्; करणात्मकं वा लिङ्गम्; एतदेवैकमनार्तमत्रिनाशि कूट-स्थम्; ततो हं उषस्तश्चाक्रायण उपरगम ॥ २ ॥
तुम्हारा यह आत्मा उपर्युक्त समस्त विशेषणोंसे विशिष्ट है; इस-लिये इस आत्मासे भिन्न और सब कार्यभूत शरीर अथवा करणात्मक लिङ्ग देह आर्तं ( नाशवान् ) है, एक यही अनार्त - अविनाशी अर्थात् क्वटस्थ है; तब चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥
इति वृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्थंमुषस्तब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
नि पञ्चम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - कहोल - संवाद बन्धनं सप्रयोजकमुक्तम्, यथ बद्धस्तस्याप्यस्तित्वमधिग-तम्, व्यतिरिक्तत्वं च । तस्ये-दानीं बन्धमोक्षसाधनं ससंन्यास-मात्मज्ञानं वक्तव्यमिति कहोल -प्रश्न आरभ्यते-प्रयोजकोंके सहित बन्धनका वर्णन किया गया और जो बद्ध है । उसका अस्तित्व तथा [ देहेन्द्रिय-संघातसे ] भिन्नत्व भी विदित हुआ । अब उसके बन्धनसे मुक्त होनेके साघनरूप संन्याससहित आत्मज्ञानका प्रतिपादन करना है, इसलिये कहोलका प्रश्न आरम्भ किया जाता है-प्रष्टव्यम् संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे
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७१० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्यु-मत्येति । एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रै-षणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठा-सेत् । बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदातं ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने ' हे याज्ञ-वल्क्य!! इस प्रकार सम्बोधित करके कहा - ' जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो । ' [ यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा ] ' यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है । ' [ कहोल - ] ' याज्ञवल्क्य! यह सर्वान्तर कौन - सा है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' जो क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, नरा और मृत्युसे परे है । उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं । जो भी पुत्रेषणा है, वही वित्तेषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकेषणा है । ये दोनों ही [ साध्य - साधनेच्छाएँ ] एषणाएं ही हैं । अत: ब्राह्मण पाण्डित्य ( आत्मज्ञान ) का पूर्णतया सम्पादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे । फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्त कर वह मुनि होता है । तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण ( कृतकृत्य ) होता है । वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है? जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है;. इससे भिन्न और सब आर्तं ( नाशवान् ) है! ' तब कौषीतकेय कहोल चुप हो गया ॥ १ ॥