बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 741–750
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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[ अध्याय ३ ग्रहण कराने के ब्रद्ध अन्य एषणाओं-राती ही है - यदि सी बात नहीं है, पश्चात् भोजन भिक्षाचर्या किसी नहीं है, हवन के राना भी शेषप्रति-के कारण किसी नहीं है; इसके करनेवाली होनेसे योजिका नहीं है, तो पुरुष के संस्कार-है, किंतु भिक्षा-नहीं है; क्योंकि अदृष्ट भी है । उसे नियमविधि-नहीं है तो भिक्षा-जन है? - ऐसा ठीक नहीं, क्यों-से तो व्युत्थान किया गया है । तुम हो नसे सर्वनिवृत्ति फिर भिक्षा-न है? तो ठोक जाय तो हम भी ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३१ N पगम्यते हि तत् । यानि पारि- । ब्राज्येऽभिहितानि वचनानि " यज्ञोपवीत्येवाधीयीत " इत्या-दीनि तान्यविद्वत्पारिव्राज्यमात्र-विषयाणीती परिहृतानि इतरथा आत्मज्ञानबाधः स्यादिति ह्युक्तम्; " निराशिषमनारम्भं निर्नम-स्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीण-कर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः " इति सर्वकर्माभावं दर्शयति स्मृतिर्विदुषः, “ विद्वाँल्लिङ्ग-विवर्जितः " " तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञः " इति च । तस्मात् परमहंस परिव्राज्यमेव व्युत्थान-लक्षणं प्रतिपद्येतात्मवित् सर्व-कर्मसाधनपरित्यागरूपमिति यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एतमात्मानम् असाधन फलस्वभावं विदित्वा । १. तथापि क्षुधादिकी निवृत्तिके लिये कारण उसकी विधि सार्थक ही है । उसे स्वीकार करते हैं । ' संन्यासा-श्रममें जो " यज्ञोपवीती होकर ही अध्ययन करे " इत्यादि वचन कहे गये हैं, वे केवल अविद्वत्संन्यासमात्र-से सम्बन्ध रखनेवाले हैं - ऐसा कहकर उनका परित्याग किया जा चुका है; और यह भी कहा गया है कि यदि ऐसा न मानेंगे [ उन्हें विद्वत्संन्याससम्बन्धी समझेंगे ] तो आत्मज्ञानका बाघ हो जायगा । " जिसे किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो सब प्रकारके आरम्भसे शून्य तथा नमस्कार और स्तुतिसे रहित है, जो स्वयं अक्षीण है, किंतु जिसके कर्मोंका क्षय हो चुका है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं " यह स्मृति विद्वान् के समस्त कर्मोंका अभाव दिखाती है । तथा " विद्वान् लिङ्गरहित होता है " " अत: वह लिङ्गरहित और धर्मज्ञ होता है " इत्यादि वचन भी यही दिखलाते हैं । अतः आत्मवेत्ताको समस्त कर्म साधनों के परित्यागरूप व्युत्थानलक्षण परमहंस परिव्राज्य-काही आश्रय लेना चाहिये । क्योंकि पूर्ववर्ती ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञ ) लोग इस असाधनफलस्वभाव भिक्षाटनादिकी कर्तव्यता प्राप्त होनेके
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७३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वस्मात्साधन फलस्वरूपादेषणा- जानकर एषणालक्षण साधन और लक्षणाद् व्युत्थाय भिक्षाचर्य चरन्ति स्म दृष्टादृष्टार्थं कर्म तत्साधनं च हित्वा तस्माद् श्रद्यत्वेऽपि ब्राह्मणो ब्रह्मवित् पाण्डित्यं पण्डितभावम्, एतदा-स्मविज्ञानं पाण्डित्यम्, निर्विद्य निःशेषं विदित्वा आत्मविज्ञानं निरवशेषं कृत्वेत्यर्थः- -आचार्यत आगमतश्च, एषणाभ्यो व्युत्थाय - एषणाव्युत्थानाव-सानमेव हि तत् पाण्डित्यम् एषणातिरस्कारोद्भवत्वादेषणावि-रुद्धत्वात्; एषणामतिरस्कृत्य न · ह्यात्मविषयस्य पाण्डित्यस्योद्भव इत्यात्मज्ञानेनैव विहितमेषणा-व्युत्थानम् श्रात्मज्ञानसमान-कर्तृकत्वाप्रत्ययोपादानलिङ्ग-श्रुत्या दृढीकृतम् । तस्मादेष-णाभ्यो व्युत्थाय ज्ञानबलभावेन
बाल्येन तिष्ठ । सेत् स्थातुमिच्छेत् ॥
फलस्वरूप समस्त विषयोंसे ऊपर उठकर अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट फल-वाले सम्पूर्ण कर्म और उसके साधनको छोड़कर भिक्षाचर्या करते थे, इसलिये इस समय भी ब्राह्मण यानी ब्रह्मवेत्ता पाण्डित्य— पण्डितभावको - यह आत्मज्ञान ही पाण्डित्य है, इसे निर्विद्य – - निःशेष-तथा जानकर अर्थात् आचार्य और शाखसे पूर्णतया आत्मज्ञान सम्पा-दन करके एषणाओंसे व्युत्थान कर, क्योंकि उस पाण्डित्यका पर्यवसान एषणाओंसे व्युत्थान करनेमें ही है, कारण, वह एषणाओंके तिरस्कारसे ही उत्पन्न होता है और एषणाओं-से विरुद्ध भी है, एषणाओंका तिरस्कार किये बिना तो आत्म-विषयक पाण्डित्यका उदय ही नहीं हो सकता; अतः आत्मज्ञानद्वारा ही एषणाओंसे व्युत्थान सम्पादित होता है; आत्मज्ञान और व्युत्थान-का एक ही कर्ता है — यह सूचित करनेके लिये ' व्युत्थाय ' इस पदमें ' क्त्वा ' प्रत्ययका प्रयोग किया गया है, इसलिये इस लिङ्गभूता श्रुति उक्त अभिप्रायको और भी पुष्ट कर दिया है । अतः एषणाओंसे उत्थान कर बाल्यसे — ज्ञानबलभावसे ' तिष्ठासेत् ' — स्थित रहनेकी इच्छा करे |
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[ अध्याय ३ लक्षण साधन और स्त विषयोंसे ऊपर दृष्ट और अदृष्ट फल-कर्म और उसके ोड़कर भिक्षाचर्या लये इस समय भी ह्मवेत्ता पाण्डित्य-यह आत्मज्ञान ही निर्विद्य - निःशेष-अर्थात् आचार्य और आत्मज्ञान सम्पा असे व्युत्थान कर, ण्डित्यका पर्यवसान चान करनेमें ही है, बाओं के तिरस्कारसे है और एषणाओं-है, एषणाओं का बिना तो आत्म-का उदय ही नहीं : आत्मज्ञानद्वारा व्युत्थान सम्पादित बान और व्युत्थान-है - यह सूचित युत्थाय ' इस पदमें प्रयोग किया गया लिङ्गभूता श्रुति और भी पुष्ट कर षणाओंसे उत्थान -- ज्ञानबलभावसे त रहने की इच्छा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३ साधन फलाश्रयणं हि बलमित-रेषामनात्मविदाम्; तद् बलं हित्वा विद्वान् असाधन फलस्व-रूपात्मविज्ञानमेव बलं तद्भाव-मेव केवलमाश्रयेत्, तदाश्रयणे 3 हि करणान्येषणाविषये एनं हृत्वा स्थापयितुं नोत्सहन्ते; ज्ञानबल-हीनं हि मूढं दृष्टादृष्टविषयायाम् एषणायामेवैनं करणानि नियो-जयन्ति; बलं नाम आत्मविद्य-याशेषविषयदृष्टि तिरस्करणम्; अतस्तद्भावेन वाल्येन तिष्ठासेत् तथा " आत्मना विन्दते वीर्यम् ” ( केन ० २।४ ) इति श्रुत्य-न्तरात् । " नायमात्मा बल -हीनेन लभ्यः " ( मु ० उ ० ३ । २ । ४ ) इति च । बाल्यं च पाण्डित्यं च निविंद्य निःशेषं कृत्वाथ मननान्मुनि-योगी भवति; एतावद्धि ब्राह्मणेन कर्तव्यम्, यदुत सर्वानात्मप्रत्यय -अन्य जो अनात्मज्ञ हैं, उनका बल तो साधन और फलोंका आश्रय लेना ही है; उस बलको त्यागकर विद्वान्को जो असाधन-फलस्वरूप आत्मविज्ञान ही बल है, केवल उस बल भावका ही आश्रय लेना चाहिये । उसका आश्रय लेनेसे ( विषयलोलुप ) इन्द्रियाँ इसे आकृष्ट करके एषणाओं-के विषय में स्थापित करने का साहस नहीं कर सकतीं । जो ज्ञानबलसे रहित है, उस मूढको हो इन्द्रियाँ दृष्ट और अदृष्ट विषयोंकी एषणामें नियुक्त कर देती हैं; आत्मज्ञानके द्वारा समस्त विषयदृष्टिका तिरस्कार कर देना ही बल है; अतः उस बलभावसे - बाल्यसे स्थित रहनेको इच्छा करे; ऐसा ही “ आत्मज्ञानके द्वारा वीर्य ( विषयष्टिके तिरस्कार-का सामर्थ्यं ) प्राप्त होता है " इस अन्य श्रुतिसे विदित होता है, तथा " यह आत्मा बलहीनको नहीं मिल सकता " यह श्रुति भी यहो कहती है । इस प्रकार बाल्य और पाण्डित्यको निर्विद्य, निःशेष जान करके फिर मुनि - मनन करने के कारण मुनि-योगी होता है । समस्त अनात्मप्रत्ययों-का तिरस्कार करना - यही ब्राह्मण
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७३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ तिरस्करणम्; एतत् कृत्वा कृत-कृत्यो योगी भवति । • श्रमौनं च आत्मज्ञानानात्म-प्रत्ययतिरस्कारौ पाण्डित्यवाल्य- । संज्ञकौ निःशेषं कृत्वा, मौनं नाम अनात्मप्रत्ययतिरस्करणस्य | ( ब्रह्मवेत्ता ) का कर्तव्य है; ऐसा करके वह कृतकृत्य योगी हो जाता है । आत्मज्ञान और अनात्मप्रत्यय-का तिरस्कार जिनकी पाण्डित्य और बाल्यसंज्ञा है – ये अमीन हैं, इन्हें निःशेष करके तथा अनात्म-प्रत्यय तिरस्कारका पर्यवसान-, फल मौन है, उसे भी नि: शेष जान पर्यवसानं फलम्, तच्च निर्वि -. करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता द्याथ ब्राह्मणः कृतकृत्यो भवति-ब्रह्मैव सर्वमिति प्रत्यय उप-जायते । स ब्राह्मणः कृतकृत्यः, तो ब्राह्मण; निरुपचरितं हि तदा तस्य ब्राह्मण्यं प्राप्तम्; अत आह— स ब्राह्मणः केन स्यात् केन चरणेन भवेत् १ येन स्याद् येन चरणेन भवेत्, तेनेदृश एवा-यम् — येन केनचिच्चरणेन स्यात् तेनेदृश एव उक्तलक्षण एव ब्राह्मणो भवति, येन केनचि-च्चरणेनेति · स्तुत्यर्थम् — येयं ब्राह्मण्यावस्था सेयं स्तूयते, न तु चरणेऽनादरः । है । उसे ' सब ब्रह्म ही है ' ऐसा प्रत्यय उत्पन्न हो जाता है । वह ब्राह्मण कृतकृत्य है, इसलिये ब्राह्मण है; उस समय उसे उपचारशून्य ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है; इसीसे श्रुति कहती है - वह किससे अर्थात् किसी आचरणसे ब्राह्मण हो सकता है? [ उत्तर - ] जिससे अर्थात् जिस आचरण से भी हो वह ऐसा ही होगा - तात्पर्य यह है कि जिस किसी भी आचरणसे हो उससे ऐसा यानी ऐसे लक्षणोंवाला ही ब्राह्मण होता है; ' जिस किसी भी आचरण-से ' यह कथन स्तुतिके लिये है; अर्थात् ऐसा कहकर यह जो ब्राह्म- य ण्यावस्था है, उसकी स्तुति की जाती f है, इससे आचरणमें अनादर सा प्रदर्शित नहीं होता ।
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[ अध्याय ३ का कर्तव्य है; ऐसा कृतकृत्य योगी हो - और अनात्मप्रत्यय-- जिनकी पाण्डित्य T – अमीन हैं, के तथा अनात्म-T रका पर्यवसान-उसे भी नि: शेष जान कृतकृत्य हो जाता ब्रह्म ही है ' ऐसा हो जाता है । वह है, इसलिये ब्राह्मण उसे उपचारशून्य हो जाता है; इसीसे - वह किससे अर्थात् ब्राह्मण हो सकता - ] जिससे अर्थात् से भी हो वह ऐसा चर्य यह है कि जिस दसे हो उससे ऐसा पोंवाला ही ब्राह्मण किसी भी आचरण-स्तुति के लिये है; कर यह जो ब्राह्म-की स्तुति की जाती चरण में अनादर ता । ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ अत एतस्माद् ब्राह्मण्यावस्था-नाद् अशनायाद्यतीतात्मस्वरूपाद् नित्यतृप्ताद् अन्यद् अविद्या- । विषयम् एषणालक्षणं वस्त्वन्तरम् आर्त विनाशि आर्तिपरिगृहीतम्, स्वप्नमायामरीच्युदकसमम् अ-" सारम्, आत्मैवैकः केवलो नित्यमुक्त इति । ततो ह कहोल: कौषीतकेयः उपरराम ॥ १ ॥
७३५ 2 अतः इस क्षुधादिरहित आत्म-स्वरूप नित्यतृप्त ब्राह्मण्यपदमें स्थिति होने से भिन्न जो अविद्याकी विषयभूत एषणारूप अन्य वस्तुएँ हैं, वे आर्त - विनाशी आर्तिसे व्याप्त अर्थात् स्वप्न, माया और मरु-मरीचिकाके जलके समान असार हैं; केवल एक आत्मा ही नित्यमुक्त है । तब कौषीतकेय कहोल उपरत हो गया ॥ १ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये पञ्चमं कहोलब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
षष्ठ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - गार्गी - संवाद यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तर आत्मेत्युक्तम्, तस्य सर्वान्तरस्य स्वरूपाधिगमाय श्री शाकल्यत्राह्मणाद् ग्रन्थ आरभ्यते । पृथिव्यादीनि ह्याकाशान्तानि भूतानि अन्त -बहिर्भावेन व्यवस्थितानि तेषां यद् बाह्यं बाह्यम् अधिगम्या-धिगम्य निराकुर्वन् द्रष्टुः साक्षात् सर्वान्तरोऽगौण आत्मा । जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म-सर्वान्तर आत्मा है — ऐसा कहा गया है, उस सर्वान्तरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शाकल्य-ब्राह्मणपर्यन्त आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । पृथिवीसे लेकर । आकाशपर्यंन्त सम्पूर्ण भुत अन्त-बहिर्भावसे स्थित हैं । उनमेंसे जो बाह्य - बाह्य भूत है, उसे जान-जानकर निराकरण करते हुए, जो सम्पूर्ण सांसारिक वर्मोसे रहित साक्षात् सर्वान्तर मुख्य आत्मा है,
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७३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तो दर्शयि- | उसका दर्शन द्रष्टा ( मुमुक्षु ) को कराना है; इसलिये यह आरम्भ तव्य इत्यारम्भः - किया जाता है-जलसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्तरोत्तर अधिष्ठानतत्त्वों का निरूपण अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदि सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गी ति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेति गन्धर्व-लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वा-दित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्र-लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देव-लोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोता-श्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि मातिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥१ ॥ १ ॥ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे वाचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा; वह बोली, ' हे याज्ञवल्क्य! यह जो कुछ है, सब जलमें ओतप्रोत है, किंतु वह जल
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[ अध्याय ३ द्रष्टा ( मुमुक्षु ) को सलिये यह आरम्भ है-तत्त्वों का निरूपण याज्ञवल्क्येति च कस्मिन्नु गति कस्मिन्नु केषु गार्गीत ताश्चेति गन्धर्व-लोका ओताश्च मन्नु खल्वा-लोकेषु गार्गीति नाश्चेति नक्षत्र-लोका ओताव न्नु खलु देव-गति कस्मिन्नु प्रजापतिलोकेषु ओताश्च प्रोता-खलु ब्रह्मलोका नातिप्राक्षीर्मा ते पृच्छसि गार्ग व्युपरराम ॥१ ॥
छा; वह बोली, ' हे है, किंतु वह जल ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७ किसमें ओतप्रोत है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गागि! वायुमें । ' [ गार्गी - ] ' वायु किसमें ओतप्रोत है? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गार्गि । अन्तरिक्षलोकोंमें । ' [ गार्गी - ] ' अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य- ] ' हे गार्गि! गन्धर्वलोकों में । ' [ गार्गी - ] ' गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गाणि! आदित्यलोकोंमें । ' [ गार्गी- ] आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ” [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गागि! चन्द्रलोकोंमें । ' [ गार्गी - ] ' चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गार्गि! नक्षत्रलोकों-में । ' [ गार्गी- ] ' नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गार्गि! देवलोकों में । ' [ गार्गी - ] ' देवलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गार्गि! इन्द्रलोकोंमें । ' [ गार्गी - ] ' इन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गागि! प्रजापतिलोकोंमें । ' [ गार्गी- ] ' प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत हैं? ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गार्गि! ब्रह्मलोकों-में । ' [ गार्गी - ] ' ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं? " इसपर याज्ञवल्क्यने कहा - ' हे गागि! अतिप्रश्न मत कर । तेरा मस्तक न गिर जाय! तू, जिसके विषयमें अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषय में अतिप्रश्न कर रही है । हे गार्गि! तू अतिप्रश्न न कर । ' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ अथ हैनं गार्गी नामतः, वाचक्नवी वचक्क्रोर्दुहिता, प्रपच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्व पार्थिवं धातुजातम् अप्स्वदके श्रोतं च प्रोतं च, श्रोतं दीर्घपट-तन्तुवत् प्रोतं तिर्यक्तन्तुवद् द्विप-फिर उस याज्ञवल्क्यसे वाचक्नवी वचक्की पुत्रीने, जो नामसे गार्गी थी, पूछा । उसने ' हे याज्ञवल्क्य! ’ इस प्रकार सम्बोधित करके कहा-यह जो कुछ पार्थिव धातुसमुदाय है | वह अप् — जलोंमें ओतप्रोत है; ओत — वस्त्रकी लंबाईके तन्तुके समान और प्रोत - वस्त्रकी चौड़ाईके तन्तुके समान अथवा इससे उलटा समझो । तात्पर्य यह है कि यह अपने - बृ ० उ०४७-
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७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ गीतं वा श्रद्भिः सर्वतोऽन्तर्बहि- । भूताभिर्व्याप्तमित्यर्थः अन्यथा सक्तुमुष्टिवद् विशीर्येत । इदं तावदनुमानमुपन्यस्तम्-यत् कार्यं परिच्छिन्नं स्थूलम्, कारणेनापरिच्छिन्नेन सूक्ष्मेण व्याप्तमिति दृष्टम् - यथा पृथिवी श्रद्भिः तथा पूर्वं पूर्वमुत्तरेणो-चरेण व्यापिना भवितव्यम्, इत्येष आ सर्वान्तरादात्मनः प्रश्नार्थः । तत्र भूतानि पञ्च संहतान्ये-चोत्तरमुत्तरं सूक्ष्मभावेन व्यापकेन कारणरूपेण च व्यवतिष्ठन्ते; न च परमात्मनोऽवक तद्वयतिरेकेण व-स्त्वन्तरमस्ति ‘ “ सत्यस्य सत्यम् ” ( बृ ० उ ० २ । १ । २० ) इति श्रुतेः । सत्यं च भूतपश्चकम्, सत्यस्य सत्यं च पर आत्मा । कस्मिन्नु खन्वाप श्रोताश्च प्रोता श्रुति - तासामपि कार्यत्वात् स्थूल-त्वात् परिच्छिन्नत्वाच्च क्वचिद्धि ओतप्रोत भावेन भवितव्यम् बाहर - भीतर सब ओर विद्यमान हुए जलसे ही व्याप्त है, नहीं तो यह सत्तू की मुट्ठीके समान छिन्न-भिन्न हो जाता । यह तो अनुमानका उपन्यास किया गया, इससे यह देखा गया कि जो कार्य, परिच्छिन्न और स्थूल तत्व है, वह कारण, अप-रिच्छिन्न और सूक्ष्म तत्त्वसे व्याप्त रहता है - जिस प्रकार पृथिवी - जलसे व्याप्त है; उसी प्रकार पूर्व - पूर्वं जलादि अपने उत्तरोत्तरवर्ती कारण वायु आदिसे व्याप्त हैं; सर्वान्तर आत्मापर्यन्त इस प्रश्नका यही तात्पर्य है । तहाँ, भूत पाँच हैं, जो परस्पर मिलकर ही उत्तरोत्तर व्यापक सूक्ष्मभावसे और कारणरूपसे विद्यमान हैं । परमात्मासे नीचे उससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है जैसा कि " वह सत्य - का - सत्य है " इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है । पांचों भूत तो सत्य हैं और परमात्मा सत्य - का - सत्य है । [ अतः प्रश्न होता है कि ] जल किसमें ओत-प्रोत हैं? कार्य स्थूल और परिच्छिन्न होनेके कारण उन्हें भी किसीमें ओतप्रोतभावसे रहना चाहिये;
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[ श्रध्याय ३ ब ओर विद्यमान व्याप्त है, नहीं तो के समान छिन्न-मानका उपन्यास से यह देखा गया परिच्छिन्न और वह कारण, अप-सुक्ष्म तत्त्वसे व्याप्त प्रकार पृथिवी इसी प्रकार पूर्व - पूर्व तरोत्तरवर्ती कारण याप्त हैं; सर्वान्तर प्रश्नका यही च हैं, जो परस्पर त्तरोत्तर व्यापक नौर कारणरूपसे परमात्मा से नीचे कोई वस्तु नहीं है सत्य - का - सत्य है ” णित होता है । हैं और परमात्मा । [ अतः प्रश्न ल किसमें ओत-ल और परिच्छिन्न उन्हें भी किसी में रहना चाहिये; ब्राह्मण ६ ] शाङ्करमा ७३ ९ क्क तासामोतप्रोतभाव इति ॥ एवमुत्तरोत्तरप्रश्नप्रसङ्गो योजयि -तव्यः । वायौ गार्गीति । नवनाविति वक्तव्यम्! BTS BE नैष दोषः श्रग्नेः पार्थिवं यं वा धातुमाश्रित्य इतरभूतवत् स्वातन्त्र्येण आत्म-लाभो नास्तीति तस्मिन्नोतप्रोत -भावो नोपदिश्यते । कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरित लोकेषु गार्गीति तान्येव भूतानि संहतान्यन्तरिक्ष-लोकाः; तान्यपि गन्धर्वलोकेषु गन्धर्वलोका श्रादित्यलोकेषु, आदित्यलोकाश्चन्द्रलोकेषु, चन्द्रलोका नक्षत्रलोकेषु, नक्षत्रलोका देवलोकेषु, देवलोका इन्द्रलोकेषु, इन्द्रलोका विराट्-शरीरारम्भकेषु भूतेषु प्रजापति -लोकेषु प्रजापतिलोका ब्रह्म-लोकेषु । ब्रह्मलोका नाम ण्डारम्भकाणि भूतानि सर्वत्र हि सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण तो उनका ओतप्रोतभाव कहाँ है? इसी प्रकार आगे - आगेके प्रश्नोंके प्रसङ्गकी योजना करनी चाहिये । [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गागि! वायुमें । ' शङ्का - किंतु यहाँ तो याज्ञवल्क्य-को ' अग्निमें ' ऐसा कहना चाहिये था! समाधान - ऐसा कहने में दोष नहीं है, क्योंकि अन्य भूतोंके समान अग्निके स्वरूपकी सिद्धि किसी पार्थिव या जलीय धातुका आश्रय लिये बिना नहीं होती, इसलिये उसमें ओतप्रोतभावका उपदेश नहीं किया जाता । ( गार्गी - ) ' वायु किसमें ओत-प्रोत है? " ( याज्ञवल्क्य - ) ' हे गार्गि! अन्तरिक्षलोकोंमें । ' परस्पर संहत हुए ये भूत ही अन्तरिक्षलोक हैं । वे भी गन्धर्वलोकोंमें, गन्धर्व-लोक आदित्यलोकोंमें, आदित्यलोक चन्द्रलोकोंमें, चन्द्रलोक नक्षत्रलोकों-में, नक्षत्रलोक देबलोकोंमें, देवलोक इन्द्रलोकोंमें, इन्द्रलोक विराट् शरीरके आरम्भक भूतरूप प्रजा-पतिलोकों में और प्रजापतिलोक ब्रह्मलोकों में ओतप्रोत हैं । ब्रह्मलोक ब्रह्माण्डके आरम्भक भूतोंको कहते हैं; इन सभी लोकोंमें सूक्ष्मताके तारतम्यक्रमसे प्राणियोंके
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७४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ प्राण्युपभोगाश्रवाकारपरिणतानि । भूतानि संहतानि तान्येव पञ्चेति बहुत्रचनभाञ्जि । कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका श्रोताथ प्रोताश्वेति – स होवाच याज्ञवल्क्यो हे गार्गि मातिप्राक्षीः स्वं प्रश्नम्, न्यायप्रकारमतीत्य आगमेन प्रष्टां देवतामनुमानेन मा प्राक्षीरित्यर्थः पृच्छन्त्याश्च मा ते तव मूर्धा शिरो व्यपप्तद् विस्पष्टं पतेत्; देवतायाः स्वप्रश्न श्रागमविषयः; तं प्रश्न-• विषयमतिक्रान्तो गार्ग्याः प्रश्नः आनुमानिकत्वात् स यस्या देवतायाः प्रश्नः सातिप्रश्न्या, नातिप्रश्न्यान विप्रश्न्या, स्वप्रश्न-विषयैव, केवलागमगम्येत्यर्थः तामनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृ-च्छसि । अतो गार्गि मातिप्राक्षीः, NNA उपभोगके आश्रय ( शरीर ) के आकार में परिणत हुए परस्परसंहत वे ही पाँच भूत हैं, इसलिये वे बहुवचनके भागी हैं । [ गार्गी - ] ' अच्छा तो, वे ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं? " इसपर उस याज्ञवल्क्यने कहा, ' हे गागि! तू अपने प्रश्नको अतिप्रश्न न कर, अर्थात् न्यायोचित प्रकारको छोड़कर आचार्यंपरम्पराद्वारा पूछने-योग्य शास्त्रगम्य देवताको अनुमान-से मत पूछ । इस प्रकार पूछने से तेरा मूर्द्धा - मस्तक विपतित-विस्पष्टतया पतित न हो जाय! ' यह देवताका स्वप्रश्न शास्त्रका विषय है; गार्गीका प्रश्न आनुमा- i निक होनेके कारण उस प्रश्न विषय-का अतिक्रमण कर गया है; यह प्रश्न जिस देवताके विषयमें है, वह अतिप्रश्नया हो रही है; किंतु वह नातिप्रश्नचा - अतिप्रश्न करनेके अयोग्य अर्थात् अपने प्रश्नकी ही विषय है; तात्पर्य यह है कि ' वह केवल आचार्योपदेशसे शास्त्रद्वारा ही जानी जा सकती है, उस अनति-प्रश्नंचा देवताके विषयमें तू अतिप्रश्न करती है । अतः हे गार्गि! यदि तुझे मरनेकी इच्छा न हो तो