बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 751–760

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 751 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय ३ ( शरीर ) के गत हुए परस्परसंहत त हैं, इसलिये वे गी हैं । - ] ' अच्छा तो, वे में ओतप्रोत हैं? ' ज्ञवल्क्य ने कहा, ' हे -ने प्रश्नको अतिप्रश्न न्यायोचित प्रकारको परम्पराद्वारा पूछने-देवताको अनुमान-इस प्रकार पूछनेसे नस्तक विपतित-तित न हो जाय! ' स्वप्रश्न शास्त्रका का प्रश्न आनुमा-रण उस प्रश्न विषय-कर गया है; यह ताके विषयमें है, वह रही है; किंतु वह - अतिप्रश्न करनेके अपने प्रश्नकी ही पर्य यह है कि ' वह पपदेशसे शास्त्रद्वारा सकती है, उस अनंति-के विषयमें तू अतिप्रश्न न्तः हे गागि! यदि इच्छा न हो तो ब्राह्मण ७ ] ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१ म चैन्नेच्छसि ॥ ततो ह गार्गी । अतिप्रश्न न कर । ' तब वचक्नुको

वाचक्नवी उपरराम ॥ १ । पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये - पष्ठं गार्गीब्राह्मणम् ॥ ॥ ६ ॥ ॥ के

सप्तम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य - प्रारुणि - संवाद sarai ब्रह्मलोकानामन्तरतमं सूत्रं वक्तव्यमिति तदर्थं आरम्भः तच्च आगमेनैव प्रष्टव्यमिती-तिहासेन आगमोपन्यासः क्रियते अब ब्रह्मलोकोंका जो अन्तरतम सूत्र है, उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । उसे आगम ( आचार्योपदेश ) के द्वारा ही विचारना चाहिये, इस लिये इतिहासके द्वारा आगमका उपन्यास किया जाता है-सूत्र और ग्रन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेष्ववसाम, पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता तम-पृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिका श्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत् सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति सोऽ-ब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तद् भगवन् वेदेति

पृष्ठ 752

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 752 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिका ँश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोक सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञि-काँश्च यो वै तत् काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स वेदवित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्यो ऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वा स्तं चान्तर्या-मिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत् सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयाद् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा; वह बोला, ' हे याज्ञ-वल्क्य! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए कपिगोत्रोत्पन्न पत-चलके घर रहते थे । उसकी भार्या गन्धर्वद्वारा गृहीत थी । हमने उस ( गन्धर्व ) से पूछा, ' तू कौन है? ' उसने कहा, ' मैं आथर्वण कबन्ध हूँ । ' उसने कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, ' काप्य! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो जिसके द्वारा यह लोक परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं? ' तब उस काप्य पतञ्चलने कहा, ' भगवन्! मैं उसे नहीं जानता । ' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा, ' काप्य! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको भीतरसे नियमित करता है? ' उस पतञ्चल काप्यने कहा, ' भगवन्! मैं उसे नहीं जानता । ' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा; ' काप्य! जो कोई उस सूत्र और उस अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्मवेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है । '

पृष्ठ 753

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 753 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय ३ वेत्थ नु त्वं काप्य * सर्वाणि च पतञ्चलः काप्यो लं काप्यं याज्ञि-न्तर्यामिणमिति स वेदवित् स भ्योऽब्रवीत्तदहं स्तं चान्तर्या-तिष्यतीति वेद मिणमिति यो यथा वेत्थ तथा वह बोला, ' हे याज्ञ-ए कपिगोत्रोत्पन्न पत-गृहीत थी । हमने उस कबन्ध हूँ । ' उसने काप्य! क्या तुम उस और सारे भूत ग्रथित नहीं जानता । ' उसने तुम उस अन्तर्यामीको नीतरसे नियमित करता नहीं जानता । ' उसने कोई उस सूत्र और उस ता है, वह देववेत्ता है, नौर वह सर्ववेत्ता है । ' ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३ JAS तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने उन ( काप्य आदि ) और अन्तर्यामी-को बताया । उसे मैं जानता हूँ । हे याज्ञवल्क्य! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ता की स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा । ' [ याज्ञवल्क्य - ] ' हे गौतम! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ । ' [ उद्दालक - ] ' ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है - ' में जानता हूँ, मैं जानता हूँ ' [ किंतु यों व्यर्यं ढोल पीटनेसे क्या लाभ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो ] जिस प्रकार तुम जानते हो वह कहो ' ॥ १ ॥

अथ हैनमुद्दालको नामतः, अरुणस्यापत्यमारुणिः पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच; मद्रेषु देशेष्ववसा मोषितवन्तः पतञ्चल-स्य - पतञ्चलो नामतस्तस्यैव कपिगोत्रस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयाना यज्ञशास्त्राध्ययनं कुर्वाणाः । तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता; तमपृच्छाम-कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्धो नामतः, अथर्वणोऽपत्यमाथर्वण इति । सोऽब्रवीद गन्धर्वः पतश्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च तच्छिष्यान् — वेत्थ तु त्वं हे काप्य जानीषे तत् सूत्रम् १ किं तत् १ येन सूत्रेणायं च लोक इदं च जन्म, परश्च लोकः परं च । फिर उस याज्ञवल्क्यसे उद्दालक नामसे प्रसिद्ध आरुणि- अरुणके पुत्रने पूछा । वह बोला, ' हे याज्ञ-बल्क्य! हम मद्रदेशमें पतचलके— जो नामसे पतञ्चल था उस काप्य-कपिगोत्रीयके घर यज्ञ – यज्ञशास्त्र-का अध्ययन करते हुए रहते थे । उसकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी [ अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था ] | उससे हमने पूछा, ' तू कौन है? ' उसने कहा, ' मैं नामसे कबन्ध तथा गोत्रतः आथर्वण — अथर्वाका पुत्र हूँ । ' उस गन्धर्वने पतचल काप्य और उसके याज्ञिक शिष्योंसे पूछा, ' हे काप्य! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो? वह कौन? जिस सूत्रके द्वारा यह लोक- I यह जन्म, परलोक—

पृष्ठ 754

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 754 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ प्रतिपत्तव्यं जन्म, सर्वाणि च । भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सन्दृब्धानि सङ्ग्रथितानि स्रगिव सूत्रेण विष्टब्धानि भवन्ति येन-तत् किं सूत्रं वेत्थ? सोऽब्रवीदेवं पृष्टः काप्यः— नाहं तद् भगवन् वेदेति, तत् सूत्रं नाहं जाने हे भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्व उपाध्या-यमस्मांश्च - वेत्थं न त्वं काप्य तमन्तर्यामिणम्? अन्तर्यामीति विशेष्यते- - य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरोऽभ्यन्तरः सन् यमयति नियमयति, दारुयन्त्रमिव भ्राम-यति, स्वं स्वमुचितव्यापारं कारयतीति । सोऽब्रवीदेवमुक्तः पतञ्श्चलः काप्यः - नाहं तं जाने भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्वः; सूत्रत-दन्तर्गतान्तर्यामिणोर्विज्ञानंस्तू-पते - यः कश्चिदू वै तत् सूत्रं हे काव्य विद्याद् विजानीयात् तं चान्तर्या- । आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूत संदृब्ध - संग्रथित - सूत्रसे मोलाके समान सम्यक् प्रकारसे धारण किये हुए हैं, क्या उस सूत्रको तुम जानते हो? " इस प्रकार पूछे जानेपर उस काप्यने कहा, ' भगवन्! मैं उसे नहीं जानता । ' ' हे भगवन्! ' इस प्रकार सत्कार करते हुए उसने कहा, ' मैं उस सूत्रको नहीं जानता । ' ' उस गन्धर्वने उपाध्यायसे और हमसे फिर पूछा, ' काप्य! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो? " ' अन्तर्यामी ' इस पदका विशेषण बतलाता है - ' जो इस लोकको, परलोकको और सम्पूर्ण भूतों को अन्तर-- भीतर रहकर नियमित करता है— काष्ठयन्त्रके समान भ्रमित अर्थात् अपना - अपना उचित व्यापार कराता है [ क्या उसे तुम जानते हो? ] ' । इस प्रकार कहे जानेपर उस पतञ्चल काप्यने ' भगवन्! ' इस प्रकार सत्कार हुए कहा, ' मैं उसे नहीं जानता । ' ' उस गन्धर्वने फिर कहा; अब सूत्र और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामी-के विज्ञानकी स्तुति की जाती है-' हे काप्य! तुममेंसे जो कोई भी उस सूत्रको और सूत्र के अन्तर्गत उसी सूत्र के नियन्ता अन्तर्यामीको

पृष्ठ 755

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 755 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय ३ नेवाला जन्म और स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण - संग्रथित - सूत्रसे सम्यक् प्रकारसे हैं, क्या उस सूत्रको " इस प्रकार पूछे काप्यने कहा, से नहीं जानता । ' इस प्रकार सत्कार ने कहा, ' मैं उस नता । ' ने उपाध्याय से और ' काव्य! क्या तुम को जानते हो? " पदका विशेषण जो इस लोकको, सम्पूर्ण भूतों को बरहकर नियमित काष्ठयन्त्रके समान पना - अपना उचित है [ क्या उसे तुम । इस प्रकार कहे पतञ्चल काप्यने प्रकार सत्कार T, ' मैं उसे नहीं ने फिर कहा; अब नन्तर्वर्ती अन्तर्यामी-पुति की जाती है-मेंसे जो कोई भी सूत्र के अन्तर्गत यन्ता अन्तर्यामीको ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४४ मिणं सूत्रान्तर्गतं तस्यैव सूत्रस्य । नियन्तारं विद्यात् यः - इत्येवमु- । क्तेन प्रकारेण स हि ब्रह्मवित् । परमात्मवित् स लोकांश्च भूरादीन-न्तर्यामिणा नियम्यमानाँल्लो-कान् वेत्ति, स देवांश्चाग्न्यादींल्लो. किन जानाति, वेदांच सर्वप्रमाण-भूतान् वत्ति, भूतानि च ब्रह्मा-दीनि सूत्रेण ध्रियमाणानि तद-न्तर्गतेनान्तर्यामिणा नियम्य-मानानि वेत्ति, आत्मानं च कर्तुत्वभोक्तृत्वविशिष्टं तेनैवान्त -र्यामिणा नियम्यमानं वेत्ति, सर्व च जगत् तथाभूतं वेतीति । एवं स्तुते सूत्रान्तर्यामिविज्ञाने प्रलुब्धः काप्योऽभिमुखीभूतः, वयं च तेभ्यश्चास्मभ्यमभिमुखी-भूतेभ्योऽब्रवीद् गन्धर्वः सूत्र-मन्तर्यामिणं च तदहं सूत्रा-न्तर्यामिविज्ञानं वेद गन्धर्वा ब्लब्धागमः सन् । तच्चेद याज्ञवल्क्य सूत्रं तं चान्तर्या-मिणमविद्वांश्चेदब्रह्मवित् सन् यदि ब्रह्मगवीरुदजसे ब्रह्मविदां स्वभूता गा उदजसे उन्नयसि त्वम् उक्त प्रकारसे जान ले वही ब्रह्मवित्- परमात्मा को जानने-वाला है; वही अन्तर्यामोसे निय-म्यमान भरादि लोकोंको जानता है, सबके के प्रमाणभूत वेदोंको जानता हे तथा सूत्रसे धारण किये हुए और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीसे निय-मित होते हुए ब्रह्मादि भूतोंको जानता है । वह उस अन्तर्यामी से ही नियमित होते हुए कर्तृत्व -२ - भोक्तृत्व-विशिष्ट आत्माको जानता है तथा सम्पूर्ण जगत्को भी ऐसा ही जानता है । ' ' सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञान की इस प्रकार स्तुति होनेपर अत्यन्त लुब्ध होकर काप्य और हम उसके अभिमुख हुए; इस प्रकार अपने अभिमुख हुए हमलोगोंके प्रति उस गन्धर्वने सूत्र और अन्तर्यामीका वर्णन किया; सो में गन्धर्वसे आचार्योपदेश प्राप्त करके उस सूत्र और अन्तर्यामी के विज्ञानको जानता हूँ; अतः हे याज्ञवल्क्य! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जानने-वाले अर्थात् अब्रह्मवित् होकर तुम ‘ ब्रह्मगवीः ’ – ब्रह्मवेत्ताओंकी स्वभूता | गौओंको अन्यायसे ले जाओगे तो

पृष्ठ 756

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 756 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ अन्यायेन, ततो मच्छापदग्धस्य मूर्धा शिरस्ते तव विस्पष्टं पतिष्यति । एवमुक्तो याज्ञवल्क्य आह— वेद जानाम्यहं हे गौतमेति गोत्रतः, तत् सूत्रं यद् गन्धर्व -स्तुभ्यमुक्तवान् यं चान्तर्यामिणं गन्धर्वाद् विदितवन्तो यूयम्, तं चान्तर्यामिणं वेदाहमिति । एवमुक्ते प्रत्याह गौतमः --यः कश्चित् प्राकृत इदं यत्त्व-योक्तं ब्रूयात् – कथम् १ वेद वेदेति - — श्रात्मानं श्लाघयन्, किं तेन गर्जितेन कार्येण दर्शय; यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥

मेरे शापसे दग्ध तुम्हारा मूर्धा-शिर विस्पष्टतया ( निश्चय ही ) गिर जायगा । ' - इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने ' हे गौतम! ' इस प्रकार गोत्रतः सम्बोधन करते हुए कहा, ' तुम्हारे प्रति गन्धर्वने जिस सूत्रका वर्णन किया है, उसे मैं जानता हूँ तथा तुमलोगोंने जिस अन्तर्यामीको गन्धवंसे जाना है, उस अन्तर्यामी -को भी मैं जानता हूँ । ' याज्ञवल्क्यके इस प्रकार कहने-पर गौतमने उत्तरमें कहा, ' जो कोई साधारण पुरुष भी ऐसा, जैसा कि तुमने कहा है, कह सकता है; किस प्रकार कह सकता है? ' मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ ' इस प्रकार अपनी बड़ाई करता हुआ कह सकता है, परंतु उसके उस गजनसे क्या लाभ है? तुम कार्य-द्वारा उसे दिखाओ जैसा जानते | हो वैसा कहो ' ॥ १ ॥

सूत्रका निरूपण स होवाच वायुर्वै गौतम तत् सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि

पृष्ठ 757

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 757 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ श्रध्याय ३ ग्ध तुम्हारा मूर्धा -तया ( निश्चय ही ) ' कार कहे जानेपर गौतम! ' इस प्रकार करते हुए कहा, गन्धर्वने जिस सूत्रका है, उसे मैं जानता हूँ ने जिस अन्तर्यामीको है, उस अन्तर्यामी -नता हूँ । ' इस प्रकार कहने-उत्तरमें कहा, ' जो पुरुष भी ऐसा, कहा है, कह सकता कह सकता है? मैं जानता हूँ ' इस बड़ाई करता हुआ - परंतु उसके उस नाम है? तुम कार्य-चाओ जैसा जानते ॥ १ ॥

वायुना वै गौतम णि च भूतानि ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४७ सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद् वै गौतम पुरुषं प्रेत-माहुर्व्यस्र सिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्या-न्तर्यामिणं ब्रहीति ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्य ने कहा, ' हे गौतम! वायु ही वह सूत्र है; गौतम! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और समस्त भूतसमुदाय गुँथे हुए हैं । हे गौतम! इसीसे मरे हुए पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अङ्ग विस्रस्त ( विशीर्णं ) हो गये हैं; क्योंकि हे गौतम! वे वायुरूप सूत्रसे ही संग्रथित होते हैं । ' [ आरुणि - ] ' हे याज्ञवल्क्य! ठीक है, यह तो ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो ' ॥ २ ॥

स होवाच याज्ञवल्क्यः । ब्रह्म-लोका यस्मिन्नोताश्च प्रोताश्च वर्त-माने काले, यथा पृथिव्यप्सु, तत् । सूत्रम् श्रागमगम्यं वक्तव्यमिति तदर्थं प्रश्नान्तरमुत्थापितम्; अतस्तन्निर्णयायाह – वायुर्वै गौतम तत् सूत्रम्, नान्यत्; वायु-रिति सूक्ष्ममाकाशवद्विष्टम्भकं पृथिव्यादीनाम्, यदात्मकं सप्त-दशविधं लिङ्गं कर्मवासनास -मवायि प्राणिनाम्, यत्तत् समष्टिव्यष्ट्रयात्मकम्, यस्य बाह्या भेदाः सप्तसप्त मरुद्गणाः । उस याज्ञवल्क्यने कहा । जिस प्रकार जलमें पृथिवी ओतप्रोत है उसी प्रकार जिसमें वर्तमान कालमें ब्रह्मलोक ओतप्रोत हैं, शास्त्रद्वारा जानने योग्य उस सूत्रका वर्णन करना है, इसीलिये एक अन्य प्रश्न उठाया गया था, उसका निर्णय करनेके लिये याज्ञवल्क्य कहते हैं, ' हे गौतम! वायु ही वह सूत्र है, और कुछ नहीं । ' यहाँ वायु-यह आकाशके समान सूक्ष्म तत्त्व है और पृथिवी आदि भूतोंको धारण करनेवाला है; प्राणियोंका यह कर्म - वासना समवायी ( कर्म-संस्कारसे युक्त ) सत्रह अवयवोंवाला लिङ्गदेह जिससे उत्पन्न हुआ है, जो समष्टि एवं व्यष्टिरूप है तथा समुद्रकी तरङ्गोंके समान उन्चास मरुद्गण

पृष्ठ 758

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 758 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ३ समृद्रस्येवोर्मयः, तदेतद् वायध्यं । तत्त्वं सूत्रमित्य भिधीयते । वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परं लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दन्धानि भवन्ति सग्रथितानि भवन्तीति प्रसिद्ध मेतत् । अस्ति च चला लोके प्रसिद्धि:, कथम्? यस्माद् वायुः सूत्रम्, वायुना विधृतं सर्वम्; तस्माद् वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुः कथयन्ति --व्य स्रंसिषत वित्रस्तान्यस्य पुरुष--स्याङ्गानीति; 157 सूत्रापगमे हि -मण्यादीनां श्रोतानामवस्त्रंसनं ' दृष्टम्; एवं वायुः सूत्रम्, तस्मिन् मणिवत् प्रोवानिं यद् यस्याङ्गानि स्युस्ततो युक्तमेतद् वाय्त्रपग-' मेऽवसनमङ्गानाम् अतो वायुना हि गौतम सूत्रेण सःहन्धानि भवन्तीति निगमयति । एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सम्यगुक्तं -सूत्रम् तदन्तर्गतं त्विदानीं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारमन्तर्या-मिणं ब्रूहीत्युक्त आह ॥ २ ॥

जिसके बाह्य भेद हैं, वह यह वायु-तत्त्व ' सूत्र ' कहा जाता है । ' हे गौतम! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत सन्दृब्ध – संग्रथित हैं-यह प्रसिद्ध है । लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है, कैसी? क्योंकि बायु सूत्र है, इसलिये वायुने सबको धारण किया है; इसीसे हे गौतम! मृत पुरुषके विषयमें ऐसा कहते हैं किं इस पुरुषके अङ्ग विस्रस्त हो गये हैं; यह देखा गया है कि सूत्र ( धागे ) के न रहनेपर उसमें पिरोये हुए मणि आदि बिखर जाते हैं, इसी प्रकार वायु सत्र है और यदि उसमें उस प्राणीके अन मणियोंके समान पिरोये हुए हैं, तो वायुके निवृत्त होनेपर इसके अङ्गोंका विशीर्णं हो जाना उचित ही है; इसीसे याज्ञवल्क्य ऐसा निगमन करते हैं कि ' हे गौतम! ये वायुरूप सूत्रसे संग्रथित हैं । ' [ गौतमने कहा- ] ' याज्ञवल्क्य! यह ठीक ऐसा ही है, तुमने सूत्रका यथार्थं वर्णन किया है । अब तुम उसके अन्तर्वर्ती और उस सूत्रके ही नियन्ता अन्तर्यामीका वर्णन करो । ' गौतमके ऐसा कहनेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं - ॥ २ ॥

पृष्ठ 759

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 759 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ श्रध्याय ३ द हैं, वह यह वायु-जाता है । I! वायुरूप सूत्रके लोक परलोक और - दृब्ध — संग्रथित हैं-। लोकमें ऐसी सी? क्योंकि वायु नये वायुने सबको ; इसी से हे गौतम! षय में ऐसा कहते हैं अङ्ग वित्रस्त हो गये गया है कि सूत्र न रहनेपर उसमें 7 आदि बिखर जाते वायु है और उस प्राणीके अङ्ग रोये हुए हैं, वृत्त होनेपर इसके हो जाना उचित याज्ञवल्क्य ऐसा हैं कि ' हे गौतम! ये संग्रथित हैं । ' हा - ] ' याज्ञवल्क्य! ही है, तुमने सूत्रका किया है । अब तुम और उस सूत्रके ही मीका वर्णन करो । ' कहनेपर याज्ञवल्क्य ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४ ९ अन्तर्यामीका निरूपण यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यम-यत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥

जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ३ ॥

यः पृथिव्यां तिष्ठन् भवति, सोऽन्तर्यामी, सर्वः पृथिव्यां तिष्ठतीति सर्वत्र प्रसङ्गो मा भूदिति विशिनष्टि - पृथिव्या अन्तरो-ऽभ्यन्तरः । तत्रैतत् स्यात् पृथिवीदेवतैव अन्तर्यामीत्यत आह- -- यमन्तर्यामिणं पृथिवी देवतापि न वेद मय्वन्यः कश्चि- । इति । यस्य पृथिवी शरीरम् - यस्य च पृथिव्येव शरी-रम्, नान्यत् - पृथिवीदेवताया यच्छरीरम्, तदेव शरीरं यस्य; शरीरग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, करणं च पृथिव्याः, तस्य स्वकर्मप्रयुक्तं जो पृथिवीमें रहनेवाला है, वह अन्तर्यामी है; किंतु पृथिवीमें तो सभी रहते हैं, अतः ःइससे सर्वत्र अन्तर्यामीका प्रसङ्ग न हो जाय, इसलिये उसका विशेषण बतलाते हैं- ' जो पृथिवीके अन्तर - भीतर है । ' इससे यह शङ्का हो सकती है कि पृथिवी देवता ही अन्तर्यामी है, इसलिये फिर कहते हैं - ' जिस अन्तर्यामीको पृथिवी देवता भी नहीं जानती कि ' मेरे भीतर और भी कोई है । ' जिसका पृथिवी शरीर है अर्थात् पृथिवी ही जिसका ज शरीर है, कोई और नहीं; यानी जो पृथिवी देवताका शरीर है, वही जिसका शरीर है; यहां ' शरीर ' शब्द उपलक्षणांर्थंक है, अर्थात् केवल शरीर ही नहीं, पृथिवी देवताका जो करण ( इन्द्रिय ) है, वही उसका करण भी है । पृथिवी

पृष्ठ 760

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 760 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७५० वृहदारण्यकोपनिषद [ अध्याय ३ हि कार्य करणं च पृथिवीदेव- । तायाः; तदस्य स्वकर्माभावाद-न्तर्यामिणो नित्यमुक्तत्वात् । परार्थ कर्तव्यतास्वभावत्वात् परस्य यत् कार्यं करणं च तदे-चास्य, न स्वतः; तदाह — यस्य । पृथिवी शरीरमिति । देवताकार्यकरणस्येश्वरसाक्षि-मात्रसान्निध्येन हि नियमेन प्रवृ-त्तिनिवृत्ती स्याताम्; य ईदृ-गीश्वरो नारायणाख्यः, पृथिवीं देवताको कार्य और करण ( देह और इन्द्रिय ) उसके कर्मानुसार प्राप्त हुए हैं; वे ही इस अन्तर्यामीके हैं; क्योंकि नित्यमुक्त होनेके कारण उसके कोई स्वकर्म नहीं हैं । परार्थ-कर्तव्यता — - दूसरेके अर्थको करना यह अन्तर्यामीका स्वभाव है, अतः जो दूसरेके देह और इन्द्रिय हैं; वे ही इसके भी हैं, स्वतः इसके कोई देह या इन्द्रिय नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है कि जिसका पृथिवी शरीर है । देवता के देह और इन्द्रियों की f प्रवृत्ति - निवृत्ति साक्षिमात्र ईश्वरके सांनिध्यसे नियमानुसार हुआ करती है, जो ऐसा नारायणसंज्ञक | ईश्वर पृथिवीको — पृथिवी देवताको / नियमित करता है— पृथिवीके पृथिवीदेवताम् यमयति मयति स्वव्यापारे, अन्तरोऽभ्य-न्तरस्तिष्ठन्, एष त आत्मा, तव, मम च सर्वभूतानां चेत्यु-पलक्षणार्थमेतत्; अन्तर्यामी यस्त्वया पृष्टः, अमृतः सर्वसंसार-धर्मवर्जित इत्येतत् ॥ ३ ॥

भीतर विद्यमान रहकर अपने व्यापारमें नियुक्त करता है, यह f तुम्हारा आत्मा है, तुम्हारा अर्थात् तुम्हारा और मेरा समस्त प्राणियों-अ का आत्मा है – इस प्रकार ' ते ( तुम्हारा ) ' यह कथन सबके उप-लक्षणके लिये है । यही अन्तर्यामी ति है, जिसके विषय में तुमने पूछा है और यह अमृत यानी सम्पूर्ण श संसार - धर्मोसे रहित है ॥ ३ ॥