चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1111–1116
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1111–1116
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१०२२ चरकसंहिता * स्वाचारं हृष्टमव्यङ्गं यशस्यं शुक्लवाससम् । अमुण्डमजटं दूतं जातिवेशक्रियासमम् ॥६७ ॥
अनुष्ट्रखरयानस्थमसन्ध्यास्वग्रहेषु च । अदारुणेषु नक्षत्रेप्नुयेषु ध्रुवेषु च ॥ ६८ ॥
विना चतुर्थी नवमीं विना रिक्तां चतुदशीम् । मध्याह्नसर्वरात्रं च भूकम्पं राहुदर्शनम् | ६ ९ || दिना देशमशस्तं चाशस्तौत्पातिकलक्षणम् । दूतं प्रशस्तमव्ययं निर्दिशेदागतं भिषक् ॥७० ॥
प्रशस्त दूत के चिह्न - जिस दूत का आचरण सुन्दर हो, जो प्रसन्न चित्त से आया हो, अङ्ग-हीन न हो, यशस्वी हो, जो श्वेत वस्त्र धारण किये हो, जिसका शिर मुड़ा हुआ न हो, जटाधारी न हो और दूत रोगी के जाति, वेश और क्रिया में तुल्य हो, ऊँट, गदहे की सवारी पर बैठकर न आया हो, सन्ध्या समय न आया हो, ग्रह अशुभस्थान में स्थित हों ऐसे समय में न आया हो, दारुण नक्षत्रों में न आया हो, उग्र नक्षत्रों में न आया हो, ध्रुव नक्षत्र में न आया हो, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और रिक्ता तिथि में न आया हो, मध्याह्न काल, अर्धरात्रि के समय, भूकम्प के समय, राहु दर्शन के समय न आया हो, अनुचित स्थान में आकर न बैठा हो और अशुभ औत्पातिक लक्षणों में न आया हो, जो व्यग्र न हो ( घबड़ाया न हो ), इस प्रकार के आए हुए दूत श्रेष्ठ माने जाते हैं । ६०-७० ॥ विमर्श - सुश्रुत में ' शुक्लवासाः शुचिगौरः श्यानो वा प्रियदर्शनः । स्वस्यां जातौ स्वगोत्रो वा दूनः कार्यकरः स्मृतः ॥ गोयानेनागतस्तुष्टः पादाभ्यां शुभचेष्टितः । स्मृतिमान् विधिकालज्ञः स्वतन्त्रः प्रतिपत्तिमान् । अलङ्कृतो मङ्गलवान् दूतः कार्यकरः स्मृतः ॥ स्वस्थं प्राङ्मुखमासीनं समे देशे शुचौ शुचिम् । उपतियो वैद्यं स व कार्यकरः स्मृतः ॥ ' ( सू. अ. २ ९ ) | ये शुभ दूत के लक्षण बताये हैं । अशुभ दृत के लक्षण - ' वैद्यस्य पैत्र्ये देवे वा कार्ये चोत्पातदर्शने । मध्याह्ने चार्धरात्रे वा सन्ध्ययोः कृत्तिकासुच ॥ आर्द्राश्ह्णेषामघामूलपूर्वासु भरणीषु च । चतुथ्यो वा नवम्यां वा षष्ठयां सन्धिदिनेषु च ॥ वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गहिना: । ' ( सु. अ. २ ९ ) । दारुण नक्षत्र - ' मूलशिवाशक्रभुजगाधिपानि तीक्ष्णानि ॥। ' अर्थात् मूल, आर्द्रा, ज्येष्ठा, आश्लेषा ये तीक्ष्ण ( दारुण ) नक्षत्र कहे जाते हैं । उग्र नक्षत्र-पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, भरणी और मघा उग्र नक्षत्र कहे जाते हैं । ध्रुव नक्षत्र - उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद और रोहिणी ये नक्षत्र ध्रुवसंज्ञक हैं । इन नक्षत्रों से भिन्न नक्षत्रों में आये हुए दूत शुभ होते हैं । दारुणादि नक्षत्रों में, चतुर्थी आदि तिथियों में, मध्याह्न आदि समयों में आये हुए दूत को चिरकालिक रोगों में अशुभ माना जाता है । पर भयंकर एवं संक्रामक रोगों के उत्पन्न होने पर यदि इन समयों में दून आता है तो अशुभ नहीं मानना चाहिए यदि ऊपर बताये हुए समयों में विसूचिका, प्लेग, आदि भयंकर रोग उत्पन्न हो जायें और उसमें अनुकूल समय न देखकर वैद्य के पास दूत भी न आ जाये तो, रोगी वैद्य के आने के पहले ही काल - कवलित हो जायगा । अतः तत्काल उत्पन्न भयंकर रोगों में इसका विचार नहीं किया जाता किन्तु चिर काल तक चलने वाले जीर्ण ज्वर, ग्रहणी, यक्ष्मा आदि रोगों में इसका विचार किया जाता है । स्वाचार से लेकर ऊँट, गदहा की सवारी पर आये हुए दूत का विचार उभयविध रोगों में किया जाता है | दध्यक्षतद्विजातीनां वृषभाणां नृपस्य च ॥ ७१ ॥
रत्नानां पूर्णकुम्भानां सितस्य तुरगस्य च । सुरध्वजपताकानां फलानां यावकस्य च ॥७२ ॥
कन्यापुंवर्धमानानां बद्धस्यैकपशोस्तथा । पृथिव्या उद्धृतायाश्च वह्नेः प्रज्वलितस्य च ॥
मोदकानां सुमनसां शुक्लानां चन्दनस्य च । मनोज्ञस्यान्नपानस्य पूर्णस्य शकटस्य च ॥
१. ' त्रोप्युत्तराणि तेभ्यो रोहिण्यच ध्रुवाणि ' इति ( वृ. सं. अ. ९ ८ ) । उत्तराणि उत्तरफाल्गुनी उत्तराषाढा, उत्तरभाद्रपदा च । २. ' पावकस्य ' इति पा ० ।
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गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रियस्थानम् १०२३ नृभिर्धेन्वाः सवत्साया वडवायाः स्त्रियास्तथा । जीवञ्जीवक सिद्धार्थसारसप्रियवादिनाम् || हंसानां शतपत्राणां चाषाणां शिखिनां तथा । मत्स्याज द्विजशङ्खानां प्रिययूनां घृतस्य च ॥ रुचकादर्श सिद्धार्थरोचनानां च दर्शनम् । गन्धः सुरभिर्वर्णश्च सुशुक्को मधुरो रसः ॥ ७७ ॥
मृगपक्षिमनुष्याणां प्रशस्ताश्च गिरः शुभाः । छत्रध्वजपताकानामुत्क्षेपगमभिष्टुतिः ॥ ७८ ॥
भेरीमृदङ्गशङ्खानां शब्दाः पुण्याहनिस्वनाः । वेदाध्ययनशब्दाश्च सुखो वायुः प्रदक्षिणः ॥ पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम् । शुभ शकुन द्रव्य - दही, अक्षत, ब्राह्मण ( या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ), बैल, राजा, रल, जल से भरे हुए घड़े, सफेद घोड़े, देवताओं की ध्वजा, पताका, कच्चा फल, अग्नि, कन्या, पुरुष, कसोरा, बँधे हुए एक पशु का देखना, जोती हुई पृथ्वी का देखना, जलती हुई आग, लड्डू, सफेद फूल, चन्दन, सुन्दर खाद्य और पेय पदार्थ, मनुष्यों से भरी हुई गाड़ी, बछड़े के साथ गौ और घोड़ी, बच्चे के साथ स्त्री, चकोर, खञ्जरीट, सारस, चातक, हंस, कठफोरनी पक्षी, नीलकण्ठ, मछली, बकरा, दाँत, शंख, प्रियङ्गु, घी, सैंधा नमक, शीशा, पीली सरसों, गोरोचन इनका देखना और उत्तम गन्धों को सूँघना, अच्छी सफेद वस्तुओं का दर्शन, मधुर रस, मृग, पक्षी और मनुष्यों का सुन्दर बचन शुभ होता है । छाता, ध्वजा, पताका, इनका उड़ाना या खड़ा करना और इनका अभिवादन करना, भेरी ( नगारा ), मृदंग और शंखों का शब्द सुनना, पुण्याहवाचन का शब्द, वेदाध्ययन का शब्द, दक्षिण भाग से सुखकारी वायु का बहना ये सभी शुभ माने गये हैं । इन वस्तुओं को मार्ग में गृह में, प्रवेश करते समय देखना या सुनना आरोग्यसूचक लक्षण हैं । ऐसा वैद्य को समझना चाहिए ॥ ७१-७९ ॥ * मङ्गलाचारसंपन्नः सातुरो वैश्मिको जनः ॥ ८० ॥
श्रद्दधानोऽनुकूलश्च प्रभूतद्रव्यसंग्रहः । धनैश्वर्य सुखावाप्तिरिष्टलाभः सुखेन च ॥ ८१ ॥
gotri योग्यानां योजना सिद्धिरेव च । गृहप्रासादशैलानां नागानामृषभस्य च ॥
हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम् । सोमार्काग्निद्विजातीनां गवां नृणां पयस्विनाम् ॥ अर्णवानां प्रतरणं बृद्धिः संबाधनिःसृतिः । स्वप्ने देवैः सपितृभिः प्रसन्नैश्चाभिभाषणम् ॥ दर्शनं शुत्राणां हृदस्य विमलस्य च । मांसमत्स्यविषामेध्यच्छुत्रादर्श परिग्रहः ॥ ८५ ॥
स्वप्ने सुमनसां चैत्र शुक्लानां दर्शनं शुभम् । अश्वगोरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च । रोदनं पतितोत्थानं द्विषतां चात्रमर्दनम् ॥ ८६ ॥
और भी - रोगी के साथ उसके घर में रहने वाले सभी प्राणियों का मङ्गल और सुन्दर आचरण से युक्त होना, श्रद्धा करना, अनुकूल रहना, अधिक द्रव्यों का संचय करना, धन, ऐश्वर्यं, सुख की प्राप्ति, अभिलषित वस्तुओं की प्राप्ति सुखपूर्वक होना और जो द्रव्य जिस कार्य के लिए योग्य हों उस द्रव्य को उसी कार्य में उचित रूप से लगाना आरोग्यसूचक है । स्वप्न में गृह, कोठा, पर्वत, हाथी, बैल, घोड़े और पुरुषों पर अपने को चढ़ते हुए देखना या अन्य अपने हितैषियों को इन पर चढ़ते देखना, समुद्र में तैरना और तैर कर पार जाना, वृद्धि ( सन्तानों का होना ), संकटपूर्ण स्थानों से निकलते देखना, प्रसन्न देवता, पितरों से स्वप्न में बातचीत करना, और स्वप्न में चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि को प्रकाश युक्त देखना, अपने हितैषी विजातियों को, गौ, यशस्वी मनुष्यों को, श्वेत वस्त्रों को, स्वच्छ तालावों को देखना, मांस, मछली, सविष प्राणी, जैसे सर्प, बिच्छू को, अमेध्य, जैसे मल - मूत्र को, छाता, शीशा को स्वप्न में प्राप्त करना, स्वप्न में ही श्वेत वर्णं के फूलों को देखना और स्वप्न में ही घोड़ा गाड़ी या बैलगाड़ी पर चढ़कर चलना, पूर्व या उत्तर १. ' मांसस्य च ' इति पा ० ।
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१०२४ चरकसंहिता दिशा को जाना, रोना, गिरकर पुनः उठना और स्वप्न में शत्रुओं को पराजित करना, इस प्रकार का स्वप्न देखना उत्तम कहा जाता है । ये स्वप्न आरोग्य के लिए रोगी स्वयं देखता है या रोगी के हितैषी देखा करते हैं ॥ ८०-८६ ॥ * सवलक्षणसंयोगो भक्तिर्वैद्यद्विजातिषु । साध्यत्वं न च निर्वेदस्तदारोग्यस्य लक्षणम् || ८७ ॥ उत्तम रोगी के लक्षण - रोगी में सत्त्व गुणो का प्रधान होना, वैद्य और ब्राह्मणों से प्रेम
का होना, रोगों का साध्य होना, रोग नहीं छूटेगा इसलिए अधिक दुःख का अनुभव न करना ।
आरोग्य होने वाले रोगियों में ये लक्षण पाये जाते हैं ॥ ८७ ॥
* आरोग्याद्दलमायुश्च सुखं च लभते महत् । इष्टांश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः ॥ आरोग्य का फल – आरोग्य - प्राप्ति से मनुष्यों में बल, आयु और महान् सुख की प्राप्ति होती है । और मनोवान्छित अन्य वस्तुओं को भी प्राप्त करता है । इस प्रकार आरोग्य - सम्पन्न पुरुष को शुभ लक्षण कहा जाता है ॥ ८८ ॥
तत्र श्लोकौ -उक्तं गोमयचूर्णीये मरणारोग्यलक्षणम् । दूतस्वप्नातुरोत्पातयुक्तिसिद्धिव्यपाश्रयम् ॥ ८ ९ ॥ अध्याय का उपसंहार — इस गोमयचूर्णीय नामक अध्याय में दूत, स्वप्न, रोगियों में होने वाले उत्पात, युक्ति और शुद्धि के आश्रित मृत्यु एवं आरोग्यसूचक लक्षणों का निर्देश किया गया है || ८ ९ ॥
* इतीदमुक्तं प्रकृतं यथातथं तदन्ववेचयं सततं भिषग्विदा ।
तथा हि सिद्धिं च यशश्च शाश्वतं स सिद्धकर्मा लभते धनानि च ॥ ९ ० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने गोमयचूर्णीय-मिन्द्रियं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इन्द्रियस्थानं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
इन्द्रिय स्थान के ज्ञान का फल - यह क्रम से आये हुए विषयों के अनुसार इन्द्रियस्थान का वर्णन किया गया है । ज्ञानी वैद्यों को निरन्तर इस इन्द्रिय स्थान का विचारपूर्वक अध्ययन कर समझना चाहिए । इसके ज्ञान से निरन्तर चिकित्सा में सफलता और यश की प्राप्ति होती है । इस प्रकार सफल चिकित्सक धन को भी प्राप्त करता है ॥ ९ ० ॥ इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के इन्द्रिय स्थान - में गोमयचूर्णीय इन्द्रिय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥
इस प्रकार इन्द्रियस्थान समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
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