चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 1101–1110

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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१०१२ चरकसंहिता अतिप्रवृद्धया रोगाणां मनसश्च बलक्षयात् । वासमुत्सृजति क्षिप्रं शरीरी देहसज्ञकम् ॥२३ ॥

अरिष्ट - यदि मनुष्यों के शरीर में रोगों की अधिक वृद्धि हो जाय और मानसिक बल अन्य का अधिक हास हो जाय तो उस व्यक्ति की आत्मा देह नामक अपने वास स्थान को शीघ्र छोड़ देती है ॥ २३ ॥

वर्णस्वरावग्निबलं दागिन्द्रियमनोबलम् । हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा ॥ और भी - मृत्युकाल के उपस्थित होने पर वर्ण, स्वर, अग्नि - बल, वाक् शक्ति, इन्द्रियों का बल या शक्ति और मानसिक बल अत्यधिक कम हो जाते हैं, उस काल में रोगी को निद्रा निरन्तर वनी रहती है अथवा निद्रा आती ही नहीं ॥ २४ ॥

* भिषग्भेषजपानान्नगुरुमित्रद्विषश्च ये । वशगाः सर्व एवैते बोद्धव्याः समवर्तिनः ॥ २५ ॥

एतेषु रोगः क्रमते भेषजं प्रतिहन्यते । नैषामन्नानि भुञ्जीत न चोदकमपि स्पृशेत् ॥ २६ ॥

जो लोग चिकित्सक, औषध, पेय पदार्थ, अन्न, गुरु, मित्र इनसे द्वेष करते हैं अर्थात् जल, भोजन और औषध नहीं ग्रहण करते, तथा वैद्य, गुरु और मित्र जो कुछ भी उनके हित के लिए उपदेश करते हैं उसको नहीं मानते, उनको यह समझना चाहिए कि वे सभी पुरुष यमराज के वश में हो गए हैं । अर्थात् उन्हें यमराज अवश्य ले जाता है । इन व्यक्तियों में जो कोई भी रोग हो जाता है उसमें औषध का प्रयोग करना लाभदायी नहीं होता, ऐसे व्यक्तियों का अन्न चिकित्सक न खाय और इनके जल का भी स्पर्श न करे ॥ २५-२६ ॥ विमर्श - काल से प्रेरित मनुष्यों की चिकित्सा करना सर्वदा वर्जित है क्योंकि उनमें जो भी चिकित्सा की जाती है उसका फल नहीं होता इसका कारण सुश्रुत ने निम्न बताया है - ' प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च । मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥ तानि भेषज-वीर्य्याणि प्रतिघ्नन्ति जिघांसया । तस्मान्मोधाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥ ' ( सु. सू. अ. ३ ) । मरे हुए व्यक्तियों के घर का अन्न और जल जब तक आशौच समाप्त नहीं होता तब तक उन लोगों का अन्न और जल नहीं लिया जाता यह लोक और शास्त्र का व्यवहार | इस श्लोक में बताए हुए व्यक्तियों को मृत समान ही समझा गया है । अतः उनके अन्न - जल का निषेध किया गया है । * पादाः समेताश्चत्वारः सम्पन्नाः साधकैर्गुणैः । व्यर्था गतायुषो द्रव्यं विना नास्ति गुणोदयः ॥ चतुष्पादविषयक अरिष्ट - जिन व्यक्तियों की आयु समाप्त हो गई है उन व्यक्तियों में रोग उत्पन्न होने पर चारों पाद के साथ उत्तम चिकित्सा करने पर भी कोई लाभ नहीं होता क्योंकि बिना द्रव्य के गुण का उदय ( प्राप्ति ) नहीं होता ॥ २७ ॥

विमर्श - असाध्य रोगों में चिकित्सा सफल नहीं होती । इसका कारण यहाँ पर बिना द्रव्य के गुण की प्राप्ति नहीं होती यह बताया गया है, द्रव्य आत्मा है, गुण, मन एवं इन्द्रियों के संयोग से होने वाले इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, आदि हैं । जब आत्मा ही शरीर को छोड़कर जाने को प्रस्तुत होती है तो उसमें रहने वाले गुण शरीर में कैसे रह सकते हैं । गुण के अभाव में शरीर चेतनारहित हो जाता है, अतः कोई भी औषधि अपने गुण को शरीर में उत्पन्न नहीं कर पाती । * परीचयमायुर्भिषजा नीरुजस्यातुरस्य च । आयुर्ज्ञानफलं कृत्स्नमायुर्ज्ञे ह्यनुवर्तते ॥ २८ ॥

आयु परीक्षा आवश्यक - चिकित्सक को चाहिए कि स्वस्थ और रोगी इन दोनों की आयु की परीक्षा करे क्योंकि आयु के ज्ञान का फल ( अर्थात् आयु शेष हो तो औषधि देना ) आयु के ज्ञाता ( आयुर्वेदज्ञ ) को ही मिलता है ॥ २८ ॥

पृष्ठ 1102

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गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रियस्थानम् तत्र श्लोक: --१०१३ * क्रियापथमतिकान्ताः केवलं देहमाप्लुताः । चिह्नं कुर्वन्ति यद्दोषास्तदरिष्टं निरुच्यते ॥२ ९ ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थानेऽणुज्योतीय-मिन्द्रियं नामैकादशोध्यायः ॥ ११ ॥

अरिष्ट के लक्षण - • जो बढ़े हुए दोष चिकित्सा के फल को विफल कर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने के बाद जिन लक्षणों को उत्पन्न करते हैं उसे अरिष्ट कहा जाता है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - रोग के प्रधान कारण दोष ही होते हैं । यदि दोष अतिमात्रा में कुपित होते हैं तो शरीरनिर्मापक पञ्चमहाभूत को विघटित कर देते हैं और रोग की ऐसी भयंकरता उत्पन्न कर देते हैं जिसमें चिकित्सा लाभ ही नहीं करती इन उपर्युक्त अध्यायों में जितने अरिष्ट के लक्षण बताए गए हैं, वे सभी अति कुपित दोषज ही हैं । पर अरिष्ट, शकुन, दूत आदि के द्वारा भी जाना जाता है जिनका वर्णन आगे के अध्याय में किया जायगा । इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के इन्द्रियस्थान में ज्योतीय इन्द्रिय नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः अथातो गोमय चूर्णीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद गोमयचूर्णीय इन्द्रिय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ * यस्य गोमय चूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते । सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥३ ॥

एक मास का अरिष्ट - जिस मनुष्य के मस्तक पर सूखे गोबर के चूर्ण के समान चूर्ण स्नेह के साथ गिरता हो अर्थात् स्पर्श द्वारा प्रतीत होता हो, और पुनः नष्ट हो जाता हो तो उस व्यक्ति की आयु एक मास के अन्त में नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥

विमर्श - गंगाधर ने ' सस्नेहम् ' के स्थान पर ' सस्नेहे ' पढ़ा है । उनका तात्पर्य यह है कि तेल आदि लगाने से उसका नाश हो जाता है पर यह पाठ उचित नहीं मालूम पड़ता क्योंकि सुश्रुत ने भी - ' गोमय चूर्ण प्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे विलयनं च । ' इससे स्वतः चूर्ण का नष्ट होना बताया है । * निकषन्निव यः पादौ च्युतांसः परिधावति । विकृत्या न स लोकेऽस्मिंश्चिरं वसति मानवः ॥ गतिविषयक अरिष्ट - जो व्यक्ति चलते हुए अपने पैरों को भूमि में घसीटते हुए चलता है । और चलते समय जिसका अंस प्रदेश ( कन्धा ) कुछ नीचे धँसा हुआ रहता है वह व्यक्ति इस प्रकार की विकृति के साथ इन मृत्यु लोक में बहुत दिनों तक वास नहीं करता ॥ ४ ॥

* यस्य स्त्रातानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरो भृशम् । आर्द्रेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ अर्धमास का अरिष्ट - जिस पुरुष के स्नान कर चन्दन लगाने के बाद सबसे पहले छाती का १. ' निर्धर्षन्निव ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1103

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१०१४ चरकसंहिता भाग अत्यन्त सूख जाता है और शरीर का अन्य सभी भाग गीला ही रहता है तो वह मनुष्य पन्द्रह दिन तक जीवित नहीं रहता ॥ ५ ॥

यमुद्दिश्यातुरं वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् । यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ औषधविषयक अरिष्ट - • चिकित्सक जिस रोगी का उद्देश्य लेकर औषधि परिश्रम से बनाना चाहता है या औष का प्रयोग प्रयत्नपूर्वक करना चाहता है पर कर न सकता हो तो उसका जीवन दुर्लभ होता है ॥ ६ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि वैद्य के पास औषधि वर्तमान नहीं है, ऐसी दशा में उसके लिए जो औषधि निर्माण करना चाहता है तो उसके घटक द्रव्य परिश्रम करने पर भी प्राप्त न होते हों, या पात्र फूट जाय या बनने पर नष्ट हो जाय अथवा वैद्य में ही इतनी व्यस्तता आ जाय कि औषधियों का निर्माण ही न कर सके या निर्मित औपवियों की व्यवस्था भी न कर सके तो, उस रोगी को असाध्य समझना चाहिए । विज्ञातं बहुशः सिद्धुं विधिवच्चावतारितम् । न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ और भी - जो औषधि अनेकों बार प्रयोग करने पर सकल सिद्ध हुई हो, विधिपूर्वक उसका निर्माण और प्रयोग भी किया गया हो, पर वह रोगी के रोग को नाद करने में सफल सिद्ध न हो तो ऐसे रोगी की जगत् में चिकित्सा नहीं है, यह समझना चाहिए ॥ ७ ॥

आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् । यः फलं तस्य नाप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥

आहारविषयक अरिष्ट - वैद्य द्वारा उत्तम रीति से निर्मित किये गये आहार द्रव्यों का प्रयोग रोगी करता हो पर उससे कोई भी लाभ न हो तो उस व्यक्ति का जीवन दुर्लभ होता है ॥ ८ ॥

विमर्श - वैद्य द्वारा निर्मित आहार का तात्पर्य यह है कि रोगी के दोष और रोग के अनुसार वैद्य से आहार द्रव्य उपदिष्ट हों और उन्हें पाचकों द्वारा निर्मित करा कर खाया गया हो फिर भी उसका कोई फल न होता हो तो उसका जीना दुर्लभ होता है । दूताधिकारे वक्ष्यामो लक्षणानि मुमूर्षताम् । यानि दृष्ट्वा भिषक् प्राज्ञः प्रत्याख्यायादसंयमम् ** ( १ ) दूताधिकार ( Prognosis based on अब मरणासन्न मनुष्यों में होने वाले लक्षण दूताधिकार प्रकरण में लक्षणों को देखकर वुद्धिमान् वैद्य संदेहरहित होकर उसे प्रत्याख्यान कर दे, लिए त्याग दे ॥ ९ ॥

Messenger ) कहा जायगा । जिन अर्थात् चिकित्सा के मुक्तकेशेऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा । भिषगभ्यागतं दृष्ट्वा दूतं मरणमादिशेत् ॥ १० ॥

वैद्यस्थिति - विषयक अरिष्ट - वैद्य अपने केशों को खोले हुए हो अथवा नन्न स्थिति में हो, रोता हो अथवा असावनीपूर्वक बैठा हो, उस समय दून को आये हुए देखकर रोगी की मृत्यु निश्चित है, ऐसा समझना चाहिए ॥ १० ॥

सुप्ते भिषजि ये दूताश्छिन्दत्यपि च भिन्दति । आगच्छन्ति भिपक् तेषां न भर्तारमनुव्रजेत् और भी — वैद्य सोया हुआ हो, या कोई वस्तु छेदन या भेदन करता हो उस समय यदि दूत वैद्य को बुलाने आ जाय तो दूत के स्वामी की चिकित्सा करने नहीं जाना चाहिए ॥ ११ ॥

जुह्वत्यग्निं तथा पिण्डान् पितृभ्यो निर्वपत्यपि । वैद्ये दूता य आयान्ति ते घ्नन्ति प्रजिघांसवः ॥ १. ' संपादयितुमौषधम् ' इति पा ० । २. ' आहारमपि भुञ्जानः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1104

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गोमय चूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रस्थान १०१५ औरभी - अग्नि में हवन करते समय अथवा पितरों को पिण्ड दान देते समय वैद्य के पास जो दन आते हैं, वे रोगी को मार डालते हैं ॥ १२ ॥

विमर्श - हवन करते समय या पिण्ड दान करते समय दूत का आना अनुचित माना गया है. इसी प्रकार किसी भी अनुचित कर्म में वैद्य प्रवृत्त हो तो उस समय दून आ जाये तो भी अरिष्ट होता है । कथयस्यप्रशस्तानि चिन्तयत्यथवा पुनः । वैद्ये दूता मनुष्याणामागच्छति मुमूर्षताम् ॥ १३ ॥

और भी - जब वैद्य किसी अप्रशस्त ( अशुभ ) वात को कहता हो या सोच रहा हो उस समय मरणासन्न मनुष्यों के दूत आते हैं ॥ १३ ॥

मृतदग्धविनष्टानि भजति व्याहरत्यपि । अप्रशस्तानि चान्यानि वैद्ये दूना मुमूर्षताम् || १४ || और भी - जब वैद्य, मरी हुई, जली हुई, नष्ट हुई वस्तुओं के विषय में कुछ कह रहा उपर्युक्त क्रियाओं ने प्रवृत्त हो, या अन्य अशुभ कार्यों को कर रहा हो उस समय वैद्य के पास मरणासन्न व्यक्तियों के दूत आते है ॥ १४ ॥

विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक् । दूतमभ्यागतं दृष्ट्वा नातुरं तमुपाचरेत् ॥ १५ ॥

विकार के समान गुण, देश अथवा काल में आये हुए दूत को देखकर वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करें ॥ १५ । दीनभीततत्रस्त मलिनामसतीं स्त्रियम् । त्रीन् व्याकृतींश्च षण्डांश्च दूतान् विद्यान्मुमूर्षताम् ॥ स्त्रयं दूत - विषयक अरिष्ट - -- दीन होकर, भयभीत होकर, दौड़कर घबड़ा कर, और मलिन वेष में आते हुए दूत को देखकर रोगी को मरणासन्न समझना चाहिए | दुश्चरित्र स्त्री, तीन विकृत पुरुष जैसे --- लँगड़े, लूले, अन्धे और नपुंसक इस प्रकार के दूतों का आना मरणासन्न रोगियों का लक्षण है ॥ १६ ॥

अङ्गव्यसनिनं दूतं लिङ्गिनं व्याधितं तथा । संप्रेक्ष्य चोग्रकर्माणं न वैद्यो गन्तुमर्हति ॥१७ ॥

और भी II • जिसका कोई अङ्ग व्यसनी हो ( अर्थात् कटा हो या टेढ़ा हो, जैसे लँगड़े, काने, बहरे आदि ) ऐसे दूत को, लिङ्गी दूत को ( अर्थात् अपना स्वरूप ब्रह्मचारी का बनाये हो ), रोगी दूत को और उम्र कर्म जैसे कसाईपन आदि कार्य को करने वाले दूत को आया हुआ देखकर वैद्य चिकित्सा करने के लिये जाने योग्य नहीं होता ॥ १७ ॥

आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् । दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ १८ ॥

और भी - वैद्य को बुलाने के लिये या रोग का समाचार कहने के लिये गदहे और ऊँट की सवारी गाड़ी या उसी पर बैठ कर दूत को आया हुआ देखकर रोगी की पराजय होगी अर्थात् मृत्यु होगी, यह वैद्य को जान लेना चाहिए ॥ १८ ॥

पलालबुसमांसास्थिकेशलोमनखद्विजान् । मार्जनीं मुसलं शूर्पमुपानञ्च विच्युतम् ॥ १ ९ ॥ तृणकाष्टतुषाङ्गारं स्पृशन्तो लोष्टमश्म च । तत्पूर्वदर्शने दूता व्याहरन्ति मुमूर्षताम् ॥ २० ॥

और भी - वैद्य यदि दून को अपने से मिटने के पूर्व पुआल ( धान के डण्ठल ), भूसा, मांस, अस्थि, केश. रोम, नख, दाँत, झाड़, मूमल, सूप, जूता, शरीर से अलग हुआ चर्म, तृण, लकड़ी, तुप ( धान की भूसी ), अङ्गार, मिट्टी का ढेला और देखे तो यह समझ ले कि यह मरणासन्न रोगी का दूत है ॥ पत्थर के टुकड़े को स्पर्श करते हुए १ ९ -२० ॥ यस्मिंश्च दूते ब्रुवति वाक्य मातुरसंश्रयम् । पश्येन्निमित्तमशुभं तं च नानुव्रजेद्भिषक् ॥ २१ ॥

१. ‘ मार्जनीसूर्पमुसलान्युपानद्भग्नविच्युते ' इति पा ० ।

पृष्ठ 1105

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१०१६ चरकसंहिता और भी -• जिस समय दून वैद्य ते गेगी सम्बन्धी समाचार वह रहा हो, उस समय यदि वैद्य को कोई अशुभ शकुन दिखाई दे तो वह चिकित्सा करने के लिये उस दूत के साथ न जाय ॥ २१ ॥

तथा व्यसनिनं प्रेतं प्रेतालङ्कारमेव वा । भिन्नं दग्धं विनाएं वा तद्वादीनि वचांसि वा || २२ || रसो वा कटुकस्तीव्रो गन्धो वा कौणपो महान् । स्पर्शो वा विपुलः क्रूरो यद्वाऽन्यदशुभं भवेत् ॥ तत्पूर्वमभितो वाक्यं वाक्यकालेऽथवा पुनः । दूतानां व्याहृतं श्रुत्वा धीरो मरणमादिशेत् ॥ वैद्य जिस समय दूत से बात कर रहा हैं या बातचीत करने के आगे या पीछे या उसी समय किसी व्यसनी बस्तु जैसे अन्धे, काने, नकटे व्यक्ति, मृत व्यक्ति, मरे हुए व्यक्ति के शृङ्गार करने योग्य कफ्फन, माला, फूलादि, फूटी या जली हुई वस्तु, नष्ट हुई वस्तु, अथवा फूटी हुई, जली हुई, नष्ट हुई वस्तुओं के विषय में वातचीत करते हुए मनुष्यों के वचन, कटु रस, तीव्र गन्ध या भयंकर सड़े हुए मुर्दों की गन्ध, किसी क्रूर वस्तु का स्पर्श होना या अन्य किसी भी अशुभ शकुनों को देखना या अनुभव करना या स्पर्श करना इत्यादि रोगी के मरने का सूचक होता है । अर्थात् ऐसे समय दूतों का बचन सुनकर यह ज्ञान कर ले कि रोगी को मृत्यु हो जायगी । अतः उसके साथ न जाय ॥ २२-२४ ॥ इति दूताधिकारोऽयमुक्तः कृत्रो मुमूर्षताम् । पथ्यातुरकुलानां च वच्याम्यौत्पातिकं पुनः ॥ मरने वाले व्यक्तियों के दूतसम्बन्धी ये सभी लक्षण कह दिये गये हैं । अब रास्ते में होने वाले और रोगी के गृह में होने वाले उत्पातों ( अरिष्टों ) की व्याख्या कर रहा हूँ ॥ २५ ॥

अवतुतमथोत्कुष्टं स्खलनं पतनं तथा । आक्रोशः संप्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम् || २६ || वस्त्रोष्णीषोत्तरासङ्गच्छत्रोपानद्युगाश्रयम् । व्यसनं दर्शनं चापि मृतव्यसनिनां तथा ॥ २७ ॥

चैत्यध्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च । हतानिष्टप्रवादाश्च दूषणं भस्मपांशुभिः ॥ २८ ॥

पथच्छेदो बिडालेन शुना सर्पेण वा पुनः । मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति ॥ शयनासनयानानामुत्तानानां च दर्शनम् । इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः ॥३० ॥

एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि । शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता ॥३१ ॥

( २ ) पथ में अरिष्टसूचक लक्षण ( Prognosis based on Inauspicious Omens Occruring in the Way ) मार्ग में होने वाले अरिष्टों का विवेचन - रोगी निरीक्षण के लिए यात्रा करते समय रास्ते में छींक, रोने का शब्द, लड़खड़ाना, गिरना, चिल्लाना, चोट का लगना, टोक लग जाना, निन्दा का शब्द सुनना, वस्त्र, पगड़ी और दुपट्टे का किसी काँटे या अन्य वस्तुओं में लग कर रुक जाना, छाता, जूना, इनमें उपद्रव होना अर्थात् छाते का टूट जाना या भूल जाना, जूतों का फट जाना या भूल जाना, मरे हुए मुर्दे के सम्बन्धियों को दुखी देखना या मरे हुए के समान दुखी होते हुए व्यक्तियों को देखना, चैत्य ( जो गाँव के बड़े वृक्ष होते हैं जिस पर जनता की धारणा रहती है । कि इस पर प्रेत अथवा देवता का वास है ), ध्वजा जैसे महागिरी ध्वजा आदि पताका, जैसे मांगलिक झण्डी आदि का भरे हुए पात्रों या चैव्य, ध्वजा, पताका जो पूर्ण हों अर्थात् अपनी स्वाभाविका-वस्था में हों उनके गिर जाने को देखना, हृत ( मारे गये ), अनिष्ट समाचारों को सुनना, झगड़े को देखना या सुनना, राख और धूलि से अपने शरीर का गन्दा हो जाना, बिल्ली, कुत्ता अथवा सर्प के द्वारा रास्ते को काट देना मृग और पक्षियों के प्रकाशमान दिशा में क्रूर वचनों को सुनना, खाट, आसन, यान ( सवारी गाड़ी ) का उत्तान रखे हुए देखना, ये सभी मार्ग में वैद्य के दृष्टिपथ में

पृष्ठ 1106

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गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रियस्थानम् १०१७ आई हुई वस्तु अशुभ होती हैं ऐसा विद्वान् मनीषी जनों का कथन हैं । मार्ग में इस प्रकार की अशुभ वस्तु को देखकर या सुनकर रोगी के घर वैद्य कभी भी न जाये ॥ २६-३१ ॥ * इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् । इमामपिच बुध्येत गृहावस्थां मुमूर्षताम् ॥३२ ॥

प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृडीजफलसर्पिषाम् । वृषब्राह्मणरत्नान्नदेवतानां च निर्गतिम् ॥ ३३ ॥

अग्निपूर्णानि पात्राणिभिन्नानि विशिखानि च । भिषङ् मुमूर्पतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति ॥ ( ३ ) आतुरकुल में अरिष्टसूचक लक्षण ( Prognosis based on Inauspicious Omen in the Home of the Patient ) इस प्रकार मार्ग में वैद्यों के द्वारा अशुभसूचक अनिष्ट उत्पातों का वर्णन कर दिया गया है, मरणासन्न रोगियों की आगे बताई जाने वाली गृह की अवस्था को भी जान लेना चाहिए । वैद्य मरणासन्न रोगियों के गृह में प्रवेश करते ही जल से भरे हुए घड़े, अग्नि, मिट्टी, बीज, हल, घृत, बैल, ब्राह्मण, रत्न, अन्न और देवताओं का निकलना देखता है, अग्नि से भरे हुए पात्र को फूटा हुआ देखता है और उस अग्नि में ज्वाला को नहीं देखता है, ( अर्थात् अग्नि शान्त रहती है ) || विमर्श - मरने के समय अशुभसूचक भाव स्वयं बिना कारण उपस्थित हो जाते हैं । जल से भरे हुए घड़े मांगलिक वस्तु हैं, इनका घर से निकल जाना मानो उसके घर की मंगल वस्तु का ही निकलना है | छिन्नभिन्नानि दग्धानि भग्नानि मृदितानि च । दुर्बलानि च सेवन्ते मुमूर्षोवैश्मिका जनाः ॥ मरणासन्न व्यक्तियों के गृह में रहने वाले उसके परिवार के मनुष्य छेदवाले, फूटे हुए पात्रों का या जली हुई या टूटी फूटी, कुचली हुई या कमजोर वस्तुओं का व्यवहार करते हैं ॥ ३५ ॥

विमर्श - जिस समय वैद्य रोगी के घर में प्रवेश करे यदि उस समय उसके घर वाले प्राणी व्यसनयुक्त वस्तुओं को व्यवहार में लाते दिखाई पढ़ें, अर्थात् कोई फूटे बर्तन से जल पी रहा हो, टूटी हुई खाट, कुर्सी आदि पर बैठा हो, जली हुई लकड़ी से कुछ कार्य कर रहा हो, फटे हुए वस्त्र को धारण किये हो, ऐसे फलों को व्यवहार में लाता हो जो कुचल गये हों और और अन्य कोई भी वस्तु का व्यवहार करता हो जो बहुत ही कमजोर हो तो रोगी की मृत्यु

निश्चित होती है ।

शयनं वसनं यानं गमनं भोजनं रुतम् । श्रूयतेऽमङ्गलं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥

शयनादि विषयक अरिष्ट - जिस व्यक्ति के शयन ( साट आदि ), वसन ( वस्त्र ), सवारी, गमन ( यात्रा ), भोजन, शब्द आदि विषयों के सम्बन्ध में अमंगल सुनाई दे, उस रोगी की चिकित्सा नहीं है, अर्थात् वैद्य के जाने पर रोगी के व्यवहार में आने वाली इन वस्तुओं की निन्दा सुन पड़े तो उसकी मृत्यु निश्चित होती है ॥ ३६ ॥

शयनं वसनं यानमन्यं वाऽपि परिच्छदम् । प्रेतवद्यस्य कुर्वन्ति सुहृदः प्रेत एव सः || ३७ || जिस रोगी की मित्र- मण्डली रोगी के शयन, वस्त्र, सवारी या अन्य वस्तुओं को मरे हुए व्यक्ति के सामान व्यवहार में लाते है, उसे मरा ही समझना चाहिये ॥ ३७ ॥

विमर्श - अर्थात् मरे हुए व्यक्तियों के व्यवहार में आने वाली वस्तुओं का व्यवहार मनुष्य नहीं करते यदि करते भी हैं तो घृणापूर्वक । रोगी के जीवित रहते ही उसके ब्यवहार में आने वाले सामानों को मरे हुए व्यक्ति की सामानों की तरह घृणापूर्वक उसकी मित्रमण्डली व्यवहार

पृष्ठ 1107

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१०१८ चरकसंहिता में लावे तो रोगी की मृत्यु निश्चित रूप से समझनी चाहिए । पर यदि रोगी संक्रामक रोग से पीड़ित हो तो उसमें यह बात लागू नहीं होती । अन्नं व्यापद्यतेऽत्यर्थं ज्योतिश्चैवोपशाम्यति । निवाते सेन्धनं यस्य तस्य नास्ति चिकित्सितम् रोगी के खाने के लिए पथ्य अन्न बनाया जाता हो और वह बनाते समय या बनाने के पूर्व हीन हो जाय और आग वाली गई हो उस स्थान में तीव्र हवा का सम्बन्ध बिलकुल न हो, आग में लकड़ी भी वर्तमान हो, पर आग बुझ जाय तो उस रोगी की चिकित्सा नहीं है ॥ ३८ ॥

आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा । अतिमात्रममन्त्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ जिस रोगी के घर में अधिक मात्रा में पात्र विरतें हों या फूटते हो तो उस व्यक्ति का जीवन दुर्लभ होता है ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - सुश्रुत में बताया हुआ गृहप्रवेश - काल का अरिष्ट अधिक स्पष्ट है और रोगियों की अवस्था का भी सुन्दर रूप से चित्रण किया हैं । उन्होंने मुख्य द्वार से निकलने वाली माङ्गलिक वस्तुओं को अशुभ माना है । गृह में प्रवेश करने पर अन्य द्वारों पर यदि अशुभ शकुन को देखता हैं, उसे अरिष्ट न समझे ऐसा आदेश दिया है जैसे- ' प्रवेशेऽप्येतदुद्देशाद वेक्ष्यञ्च तथातुरे । प्रतिद्वार गृहे बाऽस्य पुनरेतन्न गण्यते ॥ केशभस्मास्थिकाष्ठा इमतुषकार्पासकण्टकाः । खट्वोर्ध्वपादा मद्यापो बसा तैलं तिलास्तुगम् ॥ नपुंसकव्यङ्गनग्नमग्नमुण्डासिताम्बराः । प्रस्थाने वा प्रवेशे वा नेष्यन्ते दर्शनं गताः ॥ भाण्डानां सङ्करस्थानात् स्थानात् संचरणं तथा । निखातोत्पादनं भङ्गः पतनं निर्गम-स्तथा ॥ वैद्यासनावसादो वा रोगी वा स्वादधोमुखः । वैद्यं सम्भाषमागोऽङ्गं कुड्यमास्तरजानि वा ॥ प्रादुनीयाद्वा करौ पृष्ठं शिरस्तथा । हस्तञ्चाकृष्य वैद्यस्य न्यसेच्छिरसि चोरसि ॥ यो वैद्यमुन्मुखः पृच्छेदुन्माष्टिं स्वाङ्गमातुरः । न स सिध्यति वैद्यो वा गृहे यस्य न पूज्यते ॥ भवने पूज्यते वापि यस्य वैद्यः स सिध्यति । शुभं शुभेषु दूतादिष्वशुभं शुभेषु च ॥ आतुरस्य ध्रुवं तस्माद् दूताढीन् लक्षयेद्भिषक् । ' ( सू. अ. २ ९ ) । इस प्रकार दूत, मार्ग और रोगी के गृहसम्बन्धी अवस्थाओं के अनुसार अरिष्ट लक्षण बताये गये हैं । भवन्ति चात्र-छ यद्द्द्वादशभिरध्यायैर्व्यासतः परिकीर्तितम् । मुमूर्षतां मनुष्याणां लक्षणं जीवितान्तकृत् ॥ तत् समासेन वच्यामः पर्यायान्तरमाश्रितम् | पर्यायवचनं ह्यर्थविज्ञानायोपपद्यते ॥४१ ॥

अत्यर्थं पुनरेवेयं विवक्षा नो विधीयते । तस्मिन्नेवाधिकरणे यत् पूर्वमभिशब्दितम् । ४२ ॥ ( ४ ) मुख्य अरिष्टों का संग्रह ( Resume of the Main Prognostic - Points ) पूर्वोक्त अध्यायों का उपसंहार ' ---- जो हमने पीछे से बारह अध्यायों में जीवन को नष्ट करने वाले नरणासन्न मनुष्यों के लक्षणों को विस्तार से कहा है, उन्हीं लक्षणों को शब्दान्तरों से पुनः संक्षेप में कहता हूँ । शब्दान्तर से कहे हुए उन्हीं विषयों के अर्थों का ज्ञान अच्छी तरह हो जाता है । इसीलिये पूर्व के अध्यायों में बनाये हुए लक्षणों को पुनः कहने के लिए प्रवृत्ति हुई, इस लिए पूर्व के अध्यायों में जो - जो अरिष्ट सूचक लक्षण अलग - अलग अधिकरण में बताये हैं पुनः शब्दान्तर से यहाँ बता रहा हूँ ॥ ४०-४२ ॥ विमर्श - विस्तृत ज्ञान का उपदेश बुद्धिमान् वैद्यों के लिए होता है । अल्पज्ञ वैद्य विस्तार से कहे हुए बचनों में व्यामोह को प्राप्त हो जाते हैं । आचार्य का उपदेश मन्द बुद्धि और बुद्धिमान् दोनों प्रकार के व्यक्तियों के लिए है । बिना अरिष्ट के ज्ञान हुए सफल चिकित्सा नहीं की जा

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गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रस्थान १०१६ सकती और विस्तृत उपदेश का ग्रहण करना कठिन होता है । यह पहले भी कहा जा चुका है कि जितने अरिष्ट लक्षण बताये गये हैं वे सभी लक्षण सभी मरणासन्न व्यक्तियों में नहीं पाये जाते । यहाँ संक्षेप में बताये जाने वाले मृत्युसूचक भाव प्रायः अधिकतर मरणासन्न व्यक्तियों में पाये जाते है | इसलिए उन विस्तृत अरिष्ट लक्षणों को न जानते हुए भी जो इन संक्षेप में बताये हुए लक्षणों को जान लेता है उसे मृत्यु के काल का निश्चय ज्ञान हो जाता है । इसलिये ही मन्दबुद्धि वैद्यों के ज्ञान के लिए संक्षेप में उपदेश किया गया है । अथवा संक्षेप और विस्तृत में उपदिष्ट उपदेशों की पर्यालोचना करने से ज्ञान की वृद्धि होती है । अतः ज्ञान वृद्धयर्थं इसका संक्षेप में उपदेश किया गया है । * वसतां चरमं कालं शरीरेषु शरीरिणाम् | अभ्युग्राणां विनाशाय देहेभ्यः प्रविवत्सताम् ॥

इष्टांस्तितिक्षतां प्राणान् कान्तं वासं जिहासताम् ।

तन्त्रयन्त्रेषु भिन्नेषु तमोऽन्यं प्रविविक्षताम् ॥ ४४ ॥

विनाशायेह रूपाणि यान्यवस्थान्तराणि च । भवन्ति तानि वच्यामि यथोद्देशं यथागमम् ॥

जीवन का अन्त काल उपस्थित होने पर शरीर में वास करने वाली जीवात्मा के साथ नित्य सम्बन्धित रहने वाले भावों के विनाश के लिए, इस स्थूल शरीर को छोड़ कर दूसरे शरीर में वास की इच्छा रखने वाली, इष्ट ( अभिलषित ) प्राण के त्याग की इच्छा वाली, सुन्दर स्थूल शरीर रूपी वास स्थान को त्याग करने की इच्छा रखने वाली, तन्त्र ( शरीर ), यन्त्र ( शिरास्नायु आदि ) के भिन्न ( कार्यराहित्य ) होने पर अन्तिम तम ( मृत्यु ) में प्रवेश की इच्छा रखने वाली जीवात्मा के विनाश के लिए शरीर में जितने लक्षण और अवस्थान्तर ज्ञात होते हैं उन सभी लक्षणों को उद्देश्यों के अनुसार कह रहा हूं ॥। ४३-४५ ॥ ॐ प्राणाः समुपतप्यन्ते विज्ञानमुपरुध्यते । वमन्ति बलमङ्गानि चेष्टा व्युपरमन्ति च ॥४६ ॥

मुमूर्षु व्यक्ति के अरिष्ट लक्षण जब शरीररूपी गृह को प्राण छोड़ना चाहता है तव, प्राण ( जीवात्मा ) में ताप ( बेचैनी ) होने लगता है, विशेष ज्ञान की शक्ति रुक जाती है कुछ इसी तरह की भावना से ज्वर - निदान में पहले के गद्योक्त भावों को पुनः श्रोक के रूप में व्यक्त किया है और आचार्य ने उसे पुनरुक्त दोष नहीं माना है । अङ्ग - प्रत्यङ्गों से बल का वमन ( बाहर निकलना ) हो जाता है, अर्थात् अङ्ग दुर्बल हो जाते हैं, और चेष्टायें ( ' कर - चरणा-नुकूलव्यापारः चेष्टा ' हाथ पैर का व्यापार ) नष्ट हो जाती हैं । ४६ ॥ इन्द्रियाणि विनश्यन्ति खिलीभवति चेतना 1 । औत्सुक्यं भजते सध्वं चेतो भीराविशत्यपि ॥ इन्द्रिय शक्ति का हास - इन्द्रियों की शक्ति न हो जाती है ( ज्ञानेन्द्रिय या कर्मेन्द्रिय अपना कार्य करने में सर्वथा असमर्थ हो जाती हैं ), चेतनाशक्ति तुप्त हो जाती हैं, मन में उत्सुकता और भय प्रवेश कर जाता है ॥ ४७ ॥

* स्मृतिस्त्यजति मेधा च हृीथियौ चापसर्पतः । उपप्लवन्ते पाप्मान ओर्जस्तेजश्च नश्यति ॥ I स्मृति का नाश - मरणासत्र व्यक्ति की स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है, धारणाशक्ति कम हो जाती हैं, लज्जा और शरीर की लक्ष्मी ( शोभा ) उससे भाग जाती हैं, ' पाप्मान ' ( दुःखसंशक व्याधियां, पापजन्य व्याधियां, ) बढ़ जाती हैं, और उस पुरुष का ओज एवं तेज ( प्रभा ) नष्ट हो जाते हैं ॥ ४८ ॥

शीलं व्यावर्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्तते T । विक्रियन्ते प्रतिच्छायाश्छायाश्च विकृतिं प्रति ॥ विषम बुद्धि – मरणासन्न पुरुष का स्वभाव अधिक रूप में बदल जाता है, भक्ति ( पूर्व काल में १. ' समुपरुध्यन्ते ' इति पा ० । २. ' वेदना ' इति पा ० । ३. क्रोधः ' इति पा ० ।

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१०२० चरकसंहिता जिन जिन विषयों की अधिक इच्छा रखता था ) में अधिक परिवर्तन हो जाता है अर्थात् पूर्व से विपरीत भावों में प्रेम रखता है, परछाही में विकृति आ जाती है और छाया ( कान्ति ) में भी विकृति समाविष्ट हो जाती है ॥ ४ ९ ॥ * शुक्रं प्रच्यवते स्थानादुन्मार्गं भजतेऽनिलः । क्षयं मांसानि गच्छन्ति गच्छत्यसृगपि क्षयम् ॥ विविध अरिष्ट - मृत्यु काल आ जाने पर शुक्र विना कारण ही शुक्राशय से चूने लगता है, वायु उन्मार्ग में गमन करने लगती है, नांस और रक्त भी क्षीण हो जाते हैं ॥ ५० ॥

* ऊष्माणः प्रलयं यान्ति विश्लेषं यान्ति सन्धयः । गन्धा विकृतिमायान्ति भेदं वर्णस्वरौ तथा ॥ और भी - मृत्यु काल में शरीर मे जो अङ्ग सर्वदा उष्ण रहते हैं उनसे उष्णता निकल जाती है ( वे शीतल हो जाते हैं ), सन्धियों के बन्धन ढीले हो जाते हैं, शरीर से विकृत गन्ध निकलने लगती हैं, रूप और स्वर में विभिन्नता आ जाती है ॥ ५१ ॥

वैवर्ण्यं भजते कायः कायच्छिद्रं विशुष्यति । धूमः संजायते मूर्ध्नि दारुणाख्यश्च चूर्णकः ॥ औरभी - • मुमूर्षु पुरुषों का शरीर विरूप हो जाता है, शरीर के सभी छिद्र शुष्क हो जाते हैं, शिर के ऊपर वास्तविक धूम के न रहते हुए भी अधिक घूम प्रतीत होता है और शिरो भाग में दारुण नामक ( गोमय चूर्ण की तरह ) चूर्ण उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है ॥ ५२ ॥

* सततस्पन्दना देशाः शरीरे येऽभिलक्षिताः । ते स्तम्भानुगताः सर्वे न चलन्ति कथंचन । स्पन्दनशील स्थान में विपरीतता - मरणोन्मुख व्यक्तियों के शरीर में जो जो स्थान सदा स्पन्दनशील दिखाई देते हैं वे स्थान स्तब्ध होकर किसी तरह कुछ भी नहीं चलते हैं अर्थात् गतिशून्य हो जाते हैं ॥ ५३ ॥

* गुणाः शरीरदेशानां शीतोष्णमृदुदारुणाः । विपर्यासेन वर्तन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः ॥ विविध अरिष्ट - मरणासन्न व्यक्तियों के शारीरिक शीत, उष्ण, मृदु, और दारुण गुण विपरीत हो जाते हैं । इसी प्रकार शरीर के अन्य स्थानों में रहने वाले इसके समान या इससे भिन्न गुणों में भी विपरीतता आ जाती है ॥ ५४ ॥

विमर्श - अर्थात् शीतल प्रदेश उष्ण, उष्ण प्रदेश शीतल, मृदु प्रदेश दारुण, दारुण प्रदेश मृदु, हो जाते हैं इसी प्रकार नित्य स्निग्ध रहने वाले प्रदेश रूक्ष, रूक्ष प्रदेश स्निग्ध, काला प्रदेश शुक, शुक्कु प्रदेश काला और मांसल प्रदेश मांसरहित, अमांसल प्रदेश मांसयुक्त, छोटे प्रदेश बड़े और बड़े प्रदेश छोटे हो जाते हैं । नखेषु जायते पुष्पं पङ्को दन्तेषु जायते । जटा पचमसु जायन्ते सीमन्ताश्चापि मूर्धनि ॥५५ ॥

और भी - नखों में चित्रकारी की तरह पुष्प खचित हो जाते है, दातों में कीचड़ के समान मैल जम जाता है, पलकों में जटा बंध जाती है, और मस्तक पर विना ककड़ी से बनाए ही सीमन्त ( मांग जैसा ) बन जाता है ॥ ५५ ॥

* भेषजानि न संवृत्तिं प्राप्नुवन्ति यथारुचि । यानि चाप्युपपद्यन्ते तेषां वीर्यं न सिद्ध्यति ॥ औषधि प्रभावहीन - • रोगी के उद्देश्य से औषध का निर्माण प्रयत्न से करने पर भी निर्मित न हो सके, अनेकों बार की परीक्षित औषधि वैद्य की रुचि के अनुसार दी जाय तो भी औषधि का वीर्य ( शक्ति ) रोग में कार्यकर न होता हो तो वह असाध्यता का सूचक है ॥ ५६ ॥

* नानाप्रकृतयः क्रूरा विकारा विविधौषधाः । क्षिप्रं समभिवर्तन्ते प्रतिहत्य बलौजसी ॥५७ ॥

और भी - मरणासन्न व्यक्तियों में वातादि दोषों के विभिन्न प्रकृति के क्रूर ( कठिन ) विकार १. ' कर्म ' इति पा ० ।

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गोमयचूर्णीयेन्द्रियाध्यायः १२ ] इन्द्रियस्थानम् १०२१ ( रोग ) हो जाते हैं जिसकी शान्ति के लिए विविध औषध जो अनेकों बार की अनुभूत हैं उसका प्रयोग करने पर भी रोग बल एवं ओज को नष्ट कर शीघ्र ही बढ़ जाते हैं ॥ ५७ ॥

* शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्चेष्टा विचिन्तितम् । उत्पद्यन्तेऽशुभान्येव प्रतिकर्मप्रवृत्तिषु ॥ और भी - विभिन्न रोगों की उचित चिकित्सा - कर्म होने पर भी शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गन्ध, चेष्टा, और मानसिक विचार आदि में अशुभ लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं अर्थात् इन सभी भावों में विपरीतता आ जाती है तो वह अरिष्ट का सूचक है ॥ ५८ ॥

$ दृश्यन्ते दारुणाः स्वप्ना दौरात्म्यमुपजायते । प्रेष्याः प्रतीपतां यान्ति प्रेताकृतिरुदीर्यते ॥ और भी — जो रोगी दारुण भयंकर अशुभ स्वर्मो को देखता है, जिसकी आत्मा में दुष्टता आ जाती है, जिसके दृत या सेवकवर्ग विपरीत हो जाये अर्थात् आज्ञा का पालन न करें, उसे मृत व्यक्ति की आकृति ( मृततुल्य ) समझना चाहिए ॥ ५ ९ ॥ प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिश्चाभिवर्धते । कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरि ( नि ) टमुपलक्ष्यते ॥६० ॥

प्रकृति विकृति में परिवर्त्तन - मरणासन्न व्यक्तियों की प्रकृति अत्यधिक नष्ट हो जाती है, और विकृतियाँ अधिक बढ़ने लगती है सहसा सम्पूर्ण उत्पातजन्य अरिष्ट उसके शरीर में दिखाई देने लगते है ॥ ६० ॥

इत्येतानि मनुष्याणां भवन्ति विनशिप्यताम् । लक्षणानि यथोद्देशं यान्युक्तानि यथागमम् ॥ पूर्वोक्त प्रसंग का उपसंहार - जो उद्देश्य के अनुसार और शास्त्र के अनुसार लक्षण मैंने बताया हैं, वे ही लक्षण मरणासन्न मनुष्यों में पाये जाते हैं ॥ ६१ ॥

मरणायेह रूपाणि पश्यताऽपि भिषग्विदा । अपृष्टेन न वक्तव्यं मरणं प्रत्युपस्थितम् ॥६२ ॥

पृष्टेनापि न वक्तव्यं तत्र यत्रोपघातकम् । आतुरस्य भवेद्दुःखमथवाऽन्यस्य कस्यचित् ॥ अब्रुवन्मरणं तस्य नैनमिच्छे चिकित्सितुम् । यस्य पश्येद्विनाशाय लिङ्गानि कुशलो भिषक् ॥ मरणासन्न स्थिति की घोषणा सावधानी से करें - चिकित्सा करते समय आयुर्वेद शास्त्र ज्ञाता के लिए उचित है कि वह रोगियों के मरने के लक्षण देखते हुए भी इस व्यक्ति का मरण काल उपस्थित है यह बात बिना पूछे न कहे । यदि कोई पूछे भी तो जहाँ पर हानि की सम्भावना हो या रोगी के अधिक दुःख का कारण हो, या रोगी के अन्य हितैषी व्यक्तियों के दुःख का कारण हो वहाँ न कहे । जिस व्यक्ति के शरीर में मृत्यु का लक्षण उपस्थित हो गया है यह देखकर कुशल वैद्य को उचित है कि रोगी के मृत्युकाल को न कहते हुए उसकी चिकित्सा करने की इच्छा न करे ॥ ६२-६४ ॥ विमर्श - उपर्युक्त श्लोक में Medical Ethics का वर्णन है । रोगी के बारे में Prognosis देते समय सावधानी से व्यवहार करना चाहिए क्योंकि इसका मानसिक ( Psycological ) प्रभाव रोगी या उसके सम्बन्धियों पर अन्यथा पड़ सकता है । * लिङ्गेभ्यो मरणाख्येभ्यो विपरीतानि पश्यता । लिङ्गान्या रोग्यमागन्तु वक्तव्यं भिषजा ध्रुवम् ॥ दूतैरौत्पातिकैर्भावैः पथ्यातुरकुलाश्रयैः । आतुराचारशीलेष्टद्रव्यसंपत्तिलक्षणैः ॥ ६६ ॥

मरणासन्न व्यक्तियों के जो - जो भी अरिष्ट लक्षण बताए गए हैं उन लक्षणों से विपरीत लक्षणों को देखते हुए वैद्य को कह देना चाहिए कि रोगी आरोग्य - लाभ प्राप्त करेगा, और दूतजन्य और मार्ग के रोगी के कुल के आश्रयीभूत औत्पातिक भावों का एवं रोगी के आचरण, स्वभाव और मनोऽभिलषित द्रव्य की प्राप्ति के लक्षणों की परीक्षा करके आरोग्य अथवा मृत्यु को पहले से ही कह देना चाहिए । अर्थात् इनमें शुभ लक्षण होने से शुभ और अशुभ रहने से अशुभ की सूचना दे देनी चाहिए ॥ ६५-६६ ॥ १. ' विचेष्टितम् ' इति पा ० ।