चरक संहिता हिन्दी भाष्य
Charaka Samhita Chaukhamba Hindi · Chaukhamba · 1116 पृष्ठ · 112 खण्ड
विषय सूची
- GOVERNMENT OF INDIA ARCHEOLOGICAL SURVEY OF INDIA ARCHEOLOGICAL LIBRARY ACCESSION NO. CALL NO. D.G.A. 79 44591 Sabv / Agn / C I D.P.C. eft: विद्याभवन… 1–10
- ( ४ ) धन्वन्तरिर्दिवोदासः काशिराजोऽश्विनीसुतौ । नकुलः सहदेवार्की च्यवनो जनको बुधः । जाबालो जाजलिः पैलः करभोऽगस्त्य एव च… 11–20
- ( १४ ) त्यायुर्वेदः सा न सम्यक्, यतो हि ' सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविदद्भिदच्छिदजिनी-राजामुपसर्गेऽपि विप ' इति किपा वेदविद्धर्मविदितिवदायुर्विदिति… 21–30
- [ ४ ] है । इसके एक - एक सूत्र का विवेचन कर अनेक ग्रंथों का निर्माण किया जा सकता है | महर्षिकल्प स्वनामधन्य स्व ० कविराज गङ्गाधरजी सेन ने इस ग्रंथ की ‘… 31–40
- [ १४ ] दृढबल - वर्तमानकाल में उपलब्ध चरकसंहिता में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इस संहिता के चिकित्सा स्थान के १७ अध्याय और १२-१२ अध्याय के कल्प और सिद्धि… 41–50
- मूत्रों के पृथक् - पृथक् गुण ( २ ) ४५ | ( १ ) शूलनाशक यवागू 22 ४६ आठ प्रकार के दुग्ध दुग्धों के समान्य गुण पृथक् - पृथक् दुग्धों के गुण ४७ शोधनार्थं तीन… 51–60
- ( १७ ) प्रश्न: खेहपान से पहले क्या हिला-हित है? ( कि पानात्प्रथमं हिताहि-तम् उत्तर पान का समय ( १८-१९ ) प्रश्न संपान के बाद तथा उसके जीर्ण ( पाचन ) होने… 61–70
- प्रसह पशु - पक्षी गण भूमिशय ( बिल में रहनेवाले ) जीव आनूप वर्ग बारिशय वर्ग वारिचर वर्ग जालपशु वर्ग विष्किर वर्ग प्रतुदपक्षि वर्ग ( चोंच या पक्ष से चोट… 71–80
- मेदोवह स्रोतस की दुष्टि के हेतु अस्थिवह स्त्रोत की दृष्टि के हेतु मज्जवहस्रोतस की दृष्टि के हेतु शुक्रवाही स्रोतस की दृष्टि के हेतु मूत्रवहस्रोतस की… 81–90
- ( ४२ ) कुमारागार - वर्णन ( Pediatric Ward ) ९ ६० | बालकों में भय उत्पन्न करना उचित नहीं है बालक के योग्य शयनादि धूपन द्रव्य धारणीय मणियां बालकों के लिए… 91–100
- ५ चरकसंहिता रोग का धर्मादि प्राप्ति में बाधकत्व - आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ का उत्तम ( प्रधान ) मूल है… 101–110
- १८ चरकसंहिता कर्मविशेष - वायु च है जब उसकी वृद्धि हो जाती है तो उससे विपरीत रोगी को विश्राम कराया जाता है… 111–120
- ( १ ) निश्चेष्ट होता है । गुण चरकसंहिता ( १ ) चेष्टा स्वरूप ही है । ( २ ) द्रव्य का सिद्ध धर्म है अर्थात् गुण अपने | ( २ ) साध्यावस्था में रहता है उसके… 121–130
- ३८ चरकसंहिता ( वा. सू. अ. १ ) । इन असाध्य रोगों को प्रत्याख्येय तथा अनुपक्रम ( चिकित्सा के अयोग्य है बताया गया है… 131–140
- ४८ चरकसंहिता ( भेड़ों ) का, गौवों का पालन करने वाले तथा इनके अतिरिक्त जो भी वनवासी मनुष्य हैं, वे लोग औषधियों के नाम और रूप को जानने वाले होते हैं । १२१… 141–150
- ५८ चरकसंहिता तैल में भून कर पिप्पली और आँवले के क्वाथ से सिद्ध की गयी यवागू कण्ठरोगों में लाभकारी होती है । ३१ । ताम्रचूडर से सिद्धा रेतोमार्गरुजापहा… 151–160
- ६८ चरकसंहिता अर्थात् स्वरस में मधु, शक्कर, गुड़, क्षार, जीरा, नमक, घी तथा तैल और चूर्ण डालना हो तो ३ तो ० डालना चाहिये… 161–170
- ७८ चरकसंहिता शतावरी आदि । ये धातुवर्धक द्रव्य हैं,.. अतः इनसे ओज अधिक बनने के कारण शरीर को बल अधिक मिलता है… 171–180
- ८८ ग्राही १ कटुप्रधान रस २ उष्णवीर्य ३ अग्निमहाभूतप्रधान ४ वातशामक चरकसंहिता ! स्तम्भन कषायप्रधान रस शीतवीर्य वायुमहाभूतप्रधान वातकृत् ( वातवर्धक ) फूल, (… 181–190
- चरकसंहिता आमलकी, लक्ष्मणा वा चक्र ० ), ( ६ ) अव्यथा ( कदली, गुडूची, हरीतकी वा चक्र ० ), ( ७ ) शिवा ( हरें ), ( ८ ) अरिष्टा ( कटुरोहिणी- कुटकी चक्र - ० ),… 191–200
- १०८ चरकसंहिता १ ग्राम मांस तत्त्व - - शरीर में - ४०१ कैलोरी ताप उत्पन्न करता है । १ " बसा ९ ०४ " " " " 99 37 १ 23 शाकतत्त्व ४०० 23 " 99 " ' शारीर नापमूल्य… 201–210
- ११८ चरकसंहिता मध्यम, स्नैहिक को बृंहण और मृदु, वैरेचनिक को शोधन और तीक्ष्ण शब्द से अभिहित किया गया है । गौरवं शिरसः शूलं पीनसार्धावभेदकौ । २७… 211–220
- १२८ चरकसंहिता बढ़ते हैं और सदा काले रहते हैं । इन्द्रियों ( ज्ञानेन्द्रियों ) में प्रसन्नता रहती है, मुख की त्वचा में कान्ति बढ़ती है और मस्तक पर तैल… 221–230
- १३८ चरकसंहिता बलमभिवर्द्धते इत्ति ' ( सु. सू. अ. ६ ) । वर्षाऋतु में विसर्ग का प्रारम्भ होने से तथा सूर्य के कर्के और सिंहराशि पर स्थित होने से भूतलगत… 231–240
- १४८ चरकसंहिता ( १२ ) वसन्त में गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर अन्न-पान तथा दिवास्वप्न निषिद्ध है । ( ४ ) ग्रीष्मऋतुचर्या ( १ ) दौर्बल्य - प्रधान शारीरिक बल… 241–250
- १५८ चरकसंहिता विमर्श - वेगावरोधजन्य व्याधियाँ तथा उनकी चिकित्सा का निम्न रूप में वर्णन सुविधा के लिये किया जा रहा है— वेगावरोध ( Name of Urges ) १.… 251–260
- १६८ चरकसंहिता दोषों की वृद्धि और क्षय के लक्षणों से ज्ञान कर साध्य रोगों की चिकित्सा मात्रा, काल का विचार कर व्याधि- प्रतिद्वन्द्व ( व्याधिविपरीत ) तथा… 261–270
- १७८ चरकसंहिता विषय ग्रहण किया गया है यह ज्ञान किया जाता है । बाद में इन्द्रिय से गृहीत विषय गुणयुक्त है या दोपयुक्त है… 271–280
- " चरकसंहिता र, संध्या ( गोधूलि ) के समय भोजन, अध्ययन, मैथुन और शयन न करे, बालक, , मूर्ख, दुःखपूर्वक जीवन विताने वाले तथा नपुंसकों के साथ मित्रता न करे,… 281–290
- १६८ चरकसंहिता विमर्श - तात्पर्य यह है कि आयुर्वेद के त्रिसूत्र ' हेतुलिङ्गौषधज्ञानम् ' का पूर्ण ज्ञाता ही राजा के योग्य वैद्य होता है… 291–300
- २०६ वित्तैषणा ( आत्मरक्षा सम्बन्धनी - संवेग ) ( १ ) भोजन खोजना, भूख ( २ ) भागना, भय ( ३ ) लड़ना, क्रोध ( ४ ) उत्सुकता, आश्चर्य चरकसंहिता मूलप्रवृत्तियाँ (… 301–310
- २१८ चरकसंहिता दिया गया है । ' व्यक्ता ' का अर्थ है निश्चया नक । आत्मा आदि चारों के संयोग से अनुमान भी होना है, किन्तु अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक बाद में होता… 311–320
- २२८ चरकसंहिता शूलकासज्वरश्वासकार्श्यपाण्ड्वामयक्षयाः । अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः । ' ( सु. चि. अ. २४ )… 321–330
- २३८ चरकसंहिता श्रीयशोज्ञानसिद्धानां व्यपदेशादतद्विधाः । वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः । ५२… 331–340
- २४८ चरकसंहिता माना है यथा — ' नाभिस्थ: प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् । वेगतस्तद्वहिर्याति पातुं विष्णुपदामृ-तम्… 341–350
- २५८ चरकसंहिता घृत अपने प्राकृतिक गुण स्नेह और शैत्य को नहीं छोड़ता है, तब चित्रक के रूक्ष, उष्ण गुण और गुण, घृत का शैत्य इन परस्पर विरुद्ध गुणों का… 351–360
- २६८ चरकसंहिता आचार्य ने ' तनुत्वन् ' और ' लघुतान् ' से सूचित किया है । तेल के सेवन से पतले आदमी दृढ़, बलवान और मोट होते हैं… 361–370
- २७८ चरकसंहिता गुड़, चीनी, खट्टे अनार का रस, दही, सोंठ, मरिच, पिप्पली, संक्षेप में इन द्रव्यों का संयोग रसों के साथ किया जाता है । ८४… 371–380
- २८८ चरकसंहिता प्रस्तर स्वेद के द्रव्य - दोष, रोग और मनुष्य के बल के अनुसार ऊपर बताये हुए द्रव्य प्रस्तर स्वेद में भी काम में लाये जाते हैं । २७… 381–390
- २६८ चरकसंहिता विमर्श - वृद्ध वाग्भट ने बताया है कि ' कुम्भीस्वेद ' में ऊपर जो खाट विद्याया जाता है उसके ऊपर ऐसी चादर बिछाई जाती है जो खाट से भूमि तक चारो… 391–400
- ३१२ चरकसंहिता कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः । हृत्पार्श्वमूर्चेन्द्रियमार्गशुद्धो तथा लघुत्वेऽपि च लक्षमाणे… 401–410
- ३२२ चरकसंहिता प्रकुपित दोष का अंश शरीर में बिलकुल ही नहीं रह जाता है । अतः किसी भी अवस्था में पुनः वह दोष रोग उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होता है… 411–420
- ३३२ चरकसंहिता ' लम्भसुप्तिगुरुत्वाद्याः श्लैष्मिकाः, शिरःकम्पादितादयः वातात्मकाः ' तथा ' रक्तवित्तादिरोगाः ' का भी उल्लेख किया है… 421–430
- ३४२ चरकसंहिता • वृद्धि त्रिदोष में युगपत् वृद्धि तथा क्षय से १२ मैद -दोषों के जो विकल्प होते हैं उनका भी वर्णन कर रहा हूं… 431–440
- ३५२ चरकसंहिता इकट्ठा करते हैं वैसे ही मनुष्य के शरीर में रहने वाले गुण अपने कर्मों द्वारा ओज को एकत्रित करते हैं । १… 441–450
- ३६२ चरकसंहिता भाग में होने वाली विद्रधियाँ जब पक कर फूटती हैं तो पूय का स्राव मलद्वार से होता है… 451–460
- ३७२ चरकसंहिता शारीरिक धातुओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है ' Inflammation is the local defence of tissue of the site of damage which is caused by bacteria,… 461–470
- ३८२ चरकसंहिता ( ३ ) साध्यासाध्यता तथा विकार - नाम समस्या ( Problem of Prognosis & Diagnosis ) * सन्ति ह्येवंविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः… 471–480
- ३६२ चरकसंहिता विमर्श -- कृमियों का वर्णन विमान के ७ वें अध्याय में, प्रमेह का वर्णन निदान के चौथे में, योनि रोग का वर्णन चि ० ३० वे अ ० में किया गया हैं… 481–490
- ४०२ चरकसंहिता नाभ्यङ्गोत्सादन परिषेकादिभिर्वातहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य; तत्रास्थापनानुवासनं तु खलु सर्वत्रोपक्रमेभ्यो वाते प्रधानतमं मन्यन्ते… 491–500
- ४१२ चरकसंहिता ष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा नारुतातपौ । पाचानान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम् । ' ( च. सू. अ. २२ ) इन सभी क्रियाओं से है… 501–510
- ४२२ चरकसंहिता नहीं है उस समय में निद्रा नहीं आती है ), विकार ( रोग जैसे -- सन्निपातज्वर, उन्माद, रक्तचाप रोग आदि में निद्रा नहीं आती है ), प्रकृति ( वात… 511–520
- ४३२ चरकसंहिता विमर्श - चक्रपाणि ने भूख - प्यास का असह्य रूप में उदय होना अर्थात् भूख - प्यास के वेग को न सह सकना यह समुचित रूप में हुये लंघन का लक्षण… 521–530
- ४४२ चरकसंहिता अथ चतुर्विंशतितमोऽध्यायः अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । १ । इति ह स्माह भगवानात्रेयः । २… 531–540
- ४५२ चरकसंहिता उसके शरीर में पसीना आने लगता है, साथ ही प्यास और संताप का भी अनुभव करता है । नेत्र रक्त और पीत वर्ण के हो जाते हैं और नेत्र में व्याकुलता… 541–550
- ४६२ वैज्ञानिकों के नाम ( Name of Scientists ) १. मौद्गल्य परीक्षि २. शग्लोना ३ वायवि ४. हिरण्याक्ष ५. कौशिक ( शौनक ) ६. भद्रकाण्य ७. भरद्वाज ८. काङ्कायन… 551–560
- ४७२ चरकसंहिता विमर्श - इस प्रकरण में उन कर्मों तथा औषधों का उपदेश किया गया है जो हितकर एवं अहितकर कर्मों और औषधों में श्रेष्ठ हैं… 561–570
- ४८२ चरकसंहिता के अध्यक्ष आत्रेय और प्रधान प्रष्टा भद्रकाप्य थे । अतः इन्हीं दोनों आचार्यों के नाम पर इस अध्याय का नाम आत्रेय भद्रकाप्यीय रखा गया है… 571–580
- ४६२ चरकसंहिता * अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद्द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमथं च तं तमभिप्रेत्य । १२… 581–590
- ५०२ चरकसंहिता विमर्श - आयुर्वेदीय वचनों के तात्पर्य को जानने के लिए प्रकृत ( प्रकरण ), देश, काल आदि का ज्ञान न किया जाय तो शब्दबोध नहीं हो सकता है… 591–600
- ५१२ चरकसंहिता मानना भी उचित प्रतीत होता है । इनका प्रयोजन क्रमशः इस प्रकार बताया है यथा- ' शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः… 601–610
- ५२२ आहार - औषत्र जाना है । ९ १ । चरकसंहिता और कर्म का सर्वदा अभ्यास अर्थात् सेवन करना वातादि दोष के विरुद्ध कहा एरण्डसीसकासक्तं शिखिमांसं यथैव हि… 611–620
- ५३२ चरकसंहिता - वच्यन्ते वारिचारिणः । हंसः क्रौञ्चो बलाका च बकः कारण्डवः प्लवः । ४१ । शरारिः पुष्करोह्वश्च केशरी मणितुण्डकः… 621–630
- ५४२ चरकसंहिता भव्यादल्पान्तरगुणं काश्मर्यफलमुच्यते । तथैवात्पान्तरगुणं तदमम्लं परूपकात् । : ३५ । वम्भारी का फल - कमरख अल्प गुग वाला होना है… 631–640
- ५५२ चरकसंहिता नाशक, मंगल करने वाला और मांस को बढ़ाने वाला होता है । पीनस, अतिसार, शीत लग कर आने वाले ज्वर, विषम ज्वर, अरुचि, मूत्र कृच्छ्र और शरीर के कृश… 641–650
- ५६२ चरकसंहिता * शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते । पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु || ३० ९… 651–660
- ५७२ चरकसंहिता १८. चर्मदल, १ ९. श्वित्र ( सफेद कुष्ठ ), २०. पामा २१. कोठ, २२. रक्तमण्डल ये रोग रक्त के दुष्ट होने से होते हैं । ११-१२… 661–670
- ५८२ चरकसंहिता महासिराओं का पाठ मिलता है । पर हृदय में दश । रक्तवाहिनियों का ही मूल मिलता है । काश्यप संहिता में भी — ' हृदयात् सम्प्रतायन्ते सिराणां मातरो… 671–680
- ५६२ चरकसंहिता दशप्राणायतनिकस्तथाऽर्थेदशमूलिकः । द्वावेतौ प्राणदेहार्थों प्रोक्तौ वैद्यगुणाश्रयौ । ४३ । औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः… 681–690
- ६०२ चरकसंहिता जब दो रोग के कारण एक ही होता है, तब एक ही कारण से कौन रोग होगा यह कहना कठिन हो जायगा, यथा- ' एको हेतुरनेकस्य नथैकस्यैक एव हि… 691–700
- ६१२ चरकसंहिता को बाहर निकाल कर पीड़ा उत्पन्न करते हुये सारे शरीर में फैल जाता है तब ज्वर उत्पन्न करता है || २३… 701–710
- ६२२ चरकसंहिता भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव जेषजम् । तस्मात् साध्यं मैतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । १४… 711–720
- ६३२ चरकसंहिता दोषों से दूषित होते हैं जैसे— उष्ण गुणयुक्त द्रव्यरूपी निदान से सामान्यगुण वाला पित्त दोष एवं उष्णगुण युक्त दूष्य रक्त दूषित होकर रोगों का… 721–730
- ६४२ जा रहा है-कुष्ठ १. अविसर्पणशील २. रक्तप्रधान दोष नहीं ३. वेदना अल्प या नहीं ४. सप्त द्रव्यों की दुष्टि आवश्यक ५. चिरकारी चरकसंहिता विसर्प १.… 731–740
- ६५२ चरकसंहिता कर मांस और रक्त को सुखा डालता है । फिर कफ और पित्त को गिराने लगता है, पार्श्वों में वेदना करता है, कन्धों में पीड़ा और कण्ठ को विकृत करता… 741–750
- ६६२ चरकसंहिता विमर्श - देवादि ग्रह जो पापादि कर्म करता है उसे ही उन्मत्त करते हैं । विना कारण ये ग्रह आविष्ट नहीं होते हैं, यदि बिना पापादि रूपी अशुभ… 751–760
- ६७२ चरकसंहिता रसों के भेद — रस तो ६ होते हैं । १. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. तिक्त और ६. कषाय… 761–770
- ६८२ चरकसंहिता ( ५ ) देश [ Habitat ] • देश पुनः स्थान को कहते है । द्रव्यों की उत्पत्ति और उसका प्रादेशमात्म्य को बतलाने वाला होता है… 771–780
- ६६२ चरकसंहिता दृश्यन्ते हि खलु सौम्य! नक्षत्रग्रहगणचन्द्रसूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूता-नामृतुवैकारिका भावाः, अचिरादितो भूरपि च न… 781–790
- ७०२ चरकसंहिता समुत्थानां विकाराणां पाचनमनापतर्पणसमर्थानि भवन्तिः पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्यरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम्… 791–800
- ७१२ मूत्रवहस्रोतस की दुष्टि के लक्षण चरकसंहिता मूत्रवह स्रोतों का मूल वस्ति और वंक्षण है, इन स्रोन के दुष्ट होने पर ये विशेष लक्षण होते है… 801–810
- ७२२ चरकसंहिता हारावलीनां च परमशिशिरवारिसंस्थितानां धारणमुरसा, क्षणे क्षणेऽग्रथ चन्दनप्रियङ्गुका-लीयमृणालशीतवातवारिभिरुत्पलकुमुद को… 811–820
- ७३२ चरकसंहिता भावित हो, मजवून हो, जिसकी पेंदी में अनेक सूक्ष्म छिद्र हों, जिसके मध्य भाग के ऊपर मट्टी का लेप कर मुखाया गया हो, रस कर ढक्कन से उसके मुख को… 821–830
- ७४२ चरकसंहिता अङ्गों को आच्छादित कर, शिर को नीचे कर, स्मरण शक्ति को ठीक रखते हुए, स्थिर मन से सभी बातों का बार - बार विचार कर और अपनी प्रतिष्ठा ठीक रहे… 831–840
- ७५२ चरकसंहिता शरीरावयवानां दाहौष्ण्यको प्रपचने हेतुवैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति । एतत् सविपर्ययमुत्तरम् । ३६… 841–850
- ७६२ चरकसंहिता है । ऐसे अपनी प्रतिज्ञा को स्थिर किया । पर बादी ने कहा- नहीं, पुरुष अनित्य है, और अनुमान का स्त्ररूप इस प्रकार किया कि ' अनित्यः पुरुषः,… 851–860
- ७७२ चरकसंहिता शयप्रकृतिमातुराहारविहारप्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपक्षते । एतानि हि येन येन दोषेणाधिकेन केननिकेन वा समनुबद्ध्यन्ते, तेन तेन… 861–870
- ७८२ चरकसंहिता च्याः; तेषां विकृतिवयैः प्रकृत्यादिबलविशेपैरायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलभ्य वयस-स्त्रित्वं विभजेत् । १२२… 871–880
- ७६२ चरकसंहिता ५. तिक्तस्कन्ध तिक्तस्कन्ध - चन्दन, नलद ( लामज्जक ), कृतमाल ( अमलतास ), नक्तमाल ( लता-करअ ), नीम, तेजबल, इन्द्रजौ, हरदी, दारुहरदी, नागरमोथा,… 881–890
- ८०२ चरकसंहिता किन्तु अव्यापक क्षेत्रज्ञ ( पुरुष ) में ही नित्यतासूचक हेतु को अव्यापक षड्धातुज पुरुष को ही नित्य जान कर उसी में आयुर्वेद शास्त्र बताता है… 891–900
- ८१२ चरकसंहिता आत्मा का कारणत्व - • जिन शास्त्र प्रमाणों से या जिन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आप्तोपदेश, के द्वारा सभी प्रमेय ( है ) विषयों को जाना जाता है,… 901–910
- ८२२ चरकसंहिता पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः । पुनः स कासो बलवांश्छदिः सा पुनरागता । एभिः प्रसिद्ध वचनैरतीतागमनं मतम्… 911–920
- ८३२ चरकसंहिता बलवत् कर्मक्षय होने से मुक्ति होती है यह सार्वतन्त्रिक सिद्धान्त है पर ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ' के अनुसार ' प्रारब्वकर्मणो… 921–930
- ८४२ चरकसंहिता बीजात् समांशादुपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसलिङ्गी भवति द्विरेताः । शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम् । १८… 931–940
- ८५२ चरकसंहिता रहित है, ऐसे स्त्री और पुरुष का ऋतुकाल में ( प्रारम्भ के तीन दिन छोड़कर ) जब संसर्ग होता है और शुद्ध शुक्र वाले पुरुष और शुद्ध योनि, गर्भाशय… 941–950
- ८६२ चरकसंहिता सुख- स्मरणार्थ मातृजादि भावों का संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा मातृज आदि भाव मातृज पितृज आत्मज सात्म्यज रसज सवज भाव भाव भाव खव् केश… 951–960
- ८७२ चरकसंहिता एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिन्नित्या भावा, सन्ति चानित्याः केचित्… 961–970
- ८८२ चरकसंहिता इस प्रकार चरक ने शुद्ध सत्व के सात भेद बताए हैं जिनमें ब्राह्मसत्त्व को शुद्धतम माना है… 971–980
- ८६२ चरकसंहिता ग्राम्बुद रजोधूम नीहारैरसमावृतम् । यथाऽर्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं तथाऽमलम् । १४ । ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत् सत्त्वं संवृतायने… 981–990
- ६०२ चरकसंहिता & परिणमतस्त्वाहारस्य गुणाः शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमविरुद्धाः; विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्व विरोधिभिः शरीरम् । १६… 991–1000
- ६१२ चरकसंहिता जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ द्वौ बाहुनलकौ द्वावंसौ, द्वे अंसफलके, द्वावक्षको, एकं जत्रु, द्वे तालुके, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि,… 1001–1010
- ६२२ चरकसंहिता वाले परिचारक वर्ग को चाहिये कि मन के अनुकूल सुन्दर - सुन्दर कथाओं से उसके मन को प्रफुल्लित रखें… 1011–1020
- ६३२ चरकसंहिता पादपाः । पचते क्षीरिणो वृक्षाः ) वा कषाय रस वाले जैसे के महुआ, आंवला, जामुन आदि वृक्षों की छाल वा कोमल पत्ती के स्वरस में वख भिगोकर योनि के… 1021–1030
- III चरकसंहिता नेत्रों में शिथिलता और गर्भ के नीचे श्रोणि गुहा में उतर जाने से हृदय वन्धन - रहित प्रतीत होता है… 1031–1040
- ६५२ चरकसंहिता विमर्श - काश्यप ने जिस कुल परम्परा में जो आहार द्रव्य प्रचलित है वही देने का संकेत किया है । ' वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः… 1041–1050
- ६६२ चरकसंहिता हुए, आतुर ( रोगी ), औषध, देश, काल, रोग का आश्रय ( देश, स्थान ) आदि को देखते हुए चिकित्सा प्रारम्भ करे… 1051–1060
- II चरकसंहिता दूसरा वाक्य बोलते रहना, कहीं भी रुकना नहीं ), स्वर वैकारिक कहे जाते है । इन स्वरों के अतिरिक्त स्वर जो यहाँ नहीं कहे गए हैं, पर इन विकृत… 1061–1070
- ६८२ चरकसंहिता नेत्र और बीभत्सुरूप - जो रोगी जागते हुए प्रेतों को, विविध राक्षसों को अथवा और अन्य किमी अद्भुत ( भयानक वस्तु को देखना है ) वह रोगी जीने में… 1071–1080
- ६६२ चरकसंहिता १२ बजे के बाद ज्वर होता हो और साथ ही कफज ( गोला ) कास भयंकर रूप से हो वह व्यक्ति प्रेत के समान है अर्थात् मरणासन्न है… 1081–1090
- १००२ चरकसंहिता शय्या पर आघात करता है अर्थात् पैर उठा - उठाकर खाट पर पटकता है तो वह रोगी जीवित नहीं रहता । २०… 1091–1100
- १०१२ चरकसंहिता अतिप्रवृद्धया रोगाणां मनसश्च बलक्षयात् । वासमुत्सृजति क्षिप्रं शरीरी देहसज्ञकम् । २३… 1101–1110
- १०२२ चरकसंहिता * स्वाचारं हृष्टमव्यङ्गं यशस्यं शुक्लवाससम् । अमुण्डमजटं दूतं जातिवेशक्रियासमम् । ६७ । अनुष्ट्रखरयानस्थमसन्ध्यास्वग्रहेषु च… 1111–1116