चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 141–150
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 141–150
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४८ चरकसंहिता ( भेड़ों ) का, गौवों का पालन करने वाले तथा इनके अतिरिक्त जो भी वनवासी मनुष्य हैं, वे लोग औषधियों के नाम और रूप को जानने वाले होते हैं ॥ १२१ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी औषधियाँ वन में पायी जाती हैं । जो वन में रहने वाले व्यक्ति होते हैं वे ही लोग औषधियों को पहचानने में शीघ्र समर्थ होते हैं । इसलिये उन लोगों से सम्पर्क स्थापित कर औषधियों का नाम और स्वरूप जानना चाहिये । सुश्रुत में भी ' गोपालास्तापसा व्याधा ये चान्ये वनचारिणः । मूलाहाराश्च ये तेभ्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥ ' से यही भाव व्यक्त किया गया है । इस प्रकार संदिग्ध औषधियों की जो समस्या आज तक द्रव्यगुण विज्ञान में वर्त्तमान है उसमें कुछ हद तक वनों में रहने वाले लोग सहायक हो सकते हैं । न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः । ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥१२२ ॥
औषधि - नाम - ज्ञान ही सम्पूर्ण नहीं - कोई व्यक्ति औषधियों के केवल नाम का ज्ञान प्राप्त कर ले अथवा औषधियों के स्वरूप को जान ले तो इससे औषधियों का उसे पूर्ण ज्ञान हो गया है । ऐसा नहीं कहना चाहिये ॥ १२२ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि केवल औषधियों का नाम और स्वरूप मात्र जानने से ही उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता है । पूर्ण ज्ञान के लिये उनके गुण - कर्म इत्यादि से भी परिचय आवश्यक है योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते । किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥ तत्त्वविद कौन? — जो औषधियों के स्वरूप को न जानते हुये भी केवल उसके प्रयोग को जानता हो वह तत्त्व को जानने वाला कहा जाता है । फिर उस व्यक्ति के बारे में क्या कहना जो औषधियों को सब प्रकार से जानता हो ॥ १२३ ॥
विमर्श - औषधियों को ' सर्वथा ' जानने का अभिप्राय यह हो सकता है कि जो वैद्य द्रव्यों के रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव इत्यादि तथा रोगी के प्रकृति, वय, सात्म्य आदि दशविध परीक्ष्य भाव का ध्यान रखकर औषधियों का प्रयोग करता हो । इस तथ्य का संकेत नीचे के श्लोक में किया गया है । ' योगवित्त्वप्यरूपज्ञः ' के बदले ' योगविन्नामरूपज्ञः ' पाठ होने पर अर्थ यह होगा कि जो औषधियों का प्रयोग, नाम तथा रूप जानता हो उसे ही तत्त्वविद् समझना चाहिये । पहला पाठ ही अधिक प्रसङ्गानुकूल होने से लिया गया है । योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् । पुरुषं पुरुषं वीच्य स ज्ञेयो भिषगुत्तमः ॥ श्रेष्ठ चिकित्सक का लक्षण जो वैद्य प्रत्येक पुरुष की परीक्षा करके देश, काल के अनुसार इन औषधियों का प्रयोग करना जानता हो उसे उत्तम वैद्य जानना चाहिये ॥ १२४ ॥
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा । तथैौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ १२५ ॥
अविज्ञान तथा विज्ञान औषधि के प्रयोग का परिणाम - न जानी हुई ( अविज्ञात ) औषधि उसी प्रकार प्राणवानिका होती है जिस प्रकार विष, शस्त्र, अग्नि या इन्द्र का वज्र प्राण को हर लेते हैं । इसके विपरीत जानी हुई औषधि अमृत के समान प्राणरक्षिका होती है ॥ १२५ ॥
औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणैस्त्रिभिः । विज्ञातं चापि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते ॥ १२६ ॥
औषध के सम्यक् प्रयोग का महत्त्व - जिस औषध का नाम, स्वरूप तथा गुण तीनों ज्ञात न हो अथवा ज्ञान होने पर भी जिसका प्रयोग असम्यक् ( दुर्युक्त ) हो तो वे दोनों अनर्थकारी है ॥ १२६ ॥
१. ' रूपमात्रेण ' इति पा ० । २. ' योगविन्नामरूपज्ञः ' इति यो ० ।
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ४६ विमर्श - उपर्युक्त लोक में इस तथ्य पर बल दिया गया है कि किसी औषधि का न केवल नाम, रूप तथा गुग ही जानना वान्छनीय है बल्कि उसका सम्यक् प्रयोग भी जानना चाहिये । योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत् । भेषजं चापि दुर्युक्तं नीच संपद्यते विषम् ॥ १२७ ॥
तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम् । धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा ॥१२८ ॥
सम्यक् प्रयोग का महत्त्व - तेज विष भी योग ( सम्यक् प्रकार ) से प्रयोग करने पर श्रेष्ठ औषधि बन जाता है और श्रेष्ठ औषवि दुर्युक्त ( असम्यक् प्रयोग ) होने पर तीक्ष्ण विष बन जाती है । इसलिए जीवन और आरोग्य के इच्छुक बुद्धिमान् व्यक्तियों के लिये यह उचित है कि युक्तिवाह्य ( सम्यक् प्रयोग न जानने वाले ) वैद्य से वे कोई भी औषध न लें ॥ १२७-१२८ ॥ विमर्श - इस सम्बन्ध में वत्सनाभ विष के प्रसंग में ये श्लोक स्मरणीय हैं--विषं प्रागहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च । आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् || तदेव युक्तियुक्तं त प्राणदायि रसायनम् | योगवाहि त्रिदोषघ्नं बृंहणं वीर्यवर्धनम् ॥ ( भा. प्र. ) कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सशेषं वासवाशनिः । सशेषमातुरं कुर्यान्नत्वज्ञमतमौषधम् ॥१२ ९ ॥ मूर्ख वैद्य की निन्दा – यदि शिर के ऊपर इन्द्र का वज्र गिर पड़े तो कदाचित् उस मनुष्य की आयु शेष रह जाय ( मनुष्य मरने से बच जाय ) परन्तु मूर्ख वैद्य द्वारा प्रयुक्त औषधियाँ कभी भी रोगी की आयु को शेष नहीं रखतीं अर्थात् निश्चित ही मार डालती हैं ॥ १२ ९ ॥
दुःखिता शयाना श्रद्दधानाय रोगिणे । यो भेषजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति ॥१३० ॥
त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः । नरो नरकपाती स्यात्तस्य सम्भाषणादपि ॥१३१ ॥
और भी —— अपने को ज्ञानी समझने वाला जो वैद्य दुःखी, शय्या पर पड़े हुए ( Bed - ridden ) श्रद्धालु रोगी को बिना समझे बूझे औषधि देता है, उस धर्महीन, पापी, मृत्यु - तुल्य दुर्मति ( मूर्ख ) वैद्य से बातचीत करने में भी मनुष्य नरक का भागी होता है । विमर्श - उपर्युक्त लोक में मूर्ख वैद्यों से सम्भाषण भी मना कर और करने वाले को नरक का भय दिखाकर आचार्य ने उस वैद्य के सामाजिक बहिष्कार ( Social Boycott ) की तरफ संकेत किया है । छद्मचर वैद्यों ( Quacks ) की यहाँ बड़ी कड़ी भर्त्सना की गयी है ॥१३० - १३१ ॥ वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव वा । पीतमत्यग्निसंतप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः ॥ १३२ ॥
तु श्रुतवतां वेषं बिभ्रता शरणागतात् । गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात् ॥ १३३ ॥
मूर्ख वैद्य द्वारा रोगी से धन लेने की निन्दा — सर्प का विष खाकर अपना प्राण गवाँना, या उबाले हुए ताम्र का जल पीकर अपने शरीर को नष्ट कर देना, या अग्नि में तपाये हुए लोहे के गोले को खा लेना अच्छा है, पर वैद्य का वेष बनाकर रोग से पीडित, शरण में आये हुए रोगियों से अन्न, पान और धन लेना अच्छा नहीं है । १३२-१३३ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि उन मूर्ख वैद्यों के लिए यह उचित ही है कि वे ऊपर बनाये हुए तीनों कारणों से मर जायें । पर । शरण में आये हुए रोगियों को बिना समझे बूझे औषधियाँ देकर उनसे धन लेना उचित नहीं है । वास्तव में तो मूर्ख वैद्य को नैतिक दृष्टि से चिकित्सा करनी ही नहीं चाहिये और उसके बदले अन्न, धन इत्यादि लेना तो और भी निन्दनीय है । * भिषग्भूषुर्मतिमानतः स्वगुणसंपदि । परं प्रयत्नमातिष्ठेत् प्राणदः स्याद्यथा नृणाम् ॥१३४ ॥
चिकित्सक सदा प्रयत्नशील रहे - इसलिए वैद्य बनने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि वह अपने गुणों की सम्पत्ति प्राप्त करने में अधिक प्रयत्नशील रहे, जिससे वह मनुष्यों को प्राण देने वाला वैद्य बन सके ॥ १३४ ॥
* तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते । स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत् ॥ ४ च ० सं ०
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५० चरकसंहिता श्रेष्ठ औषध तथा चिकित्सक - वही औषध युक्त ( श्रेष्ठ ) है जिसका प्रयोग करने पर आरोग्य की प्राप्ति हो सके और वही व्यक्ति वैद्यों में श्रेष्ठ है जो रोगियों को रोग से मुक्त कर सके ॥१३५ ॥
विमर्श - उपर्युक्त इलोक में श्रेष्ठ औषधि का बड़ा ही उच्च तथा आदर्श रूप बनाया गया है । उसी औषधि को श्रेष्ठ माना गया है जो रोगी को स्वस्थ बनावे अर्थात् एक रोन को शान्त करके दूसरे रोग की उत्पत्ति न होने दे । आजकल की भाषा में उसमें विषाक्तता ( Toxicity ) बिलकुल न हो । चिकित्सा- शास्त्रियों को इसी प्रकार की औषधियों की खोज करने का लक्ष्य रखना चाहिये | सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणाम् । सिद्धिराख्याति सर्वैश्व गुणैर्युक्तं भिषक्तमम् ॥ चिकित्सा साफल्य ही कसौटी है - सभी कर्मों में सिद्धि ( सफलता ) का प्राप्त होना ही यह सूचित करता है कि इस क्रिया का उचित रूप से प्रयोग किया गया है । यह वैद्य सम्पूर्ण वैद्योचित गुणों से युक्त है यह बात क्रिया की सिद्धि ही सूचित कर देती है ॥ १३६ ॥
विमर्श - औषधि का उचित रूप में प्रयोग होने से सिद्धि अवश्य होती है और कार्यों की सिद्धि से वैद्य की उत्तमता तथा औषधि का सुप्रयोग ज्ञान होता है । तंत्र श्लोकाः-आयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम् । सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः ॥ १३७ ॥
सम्पूर्ण कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम् । हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं संग्रहेण च ॥ १३८ ॥
रसाः सप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसंग्रहः । मूलिन्यश्व फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च ॥ १३ ९ ॥ मूत्रं क्षीराणि वृक्षाव पड् ये क्षीरत्वगाश्रयाः । कर्माणि चैव सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः ॥ वैद्यापवादो यत्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः । सर्वमेतत्समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा ॥ १४१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के दीर्घञ्जीवितीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अध्यायगत विषयों की सूची - ( १ ) आयुर्वेद शास्त्र का आगम ( प्राप्ति ) अर्थात् ब्रह्मा से लेकर भरद्वाज तक आयुर्वेद का आगमन किस प्रकार हुआ, ( २ ) आयुर्वेद के अवतरण का कारण, ( ३ ) भरद्वाज ने किस प्रकार प्राप्त किये हुये आयुर्वेद - ज्ञान का मर्त्यलोक में प्रचार किया, ( ४ ) अग्निवेश आदि महर्षियों ने आयुर्वेद सूत्रों का सूत्रण ( प्रणयन ) किया, और संहितायें बनायीं, उन संहिताओं को ऋषियों को सुनाया और उन्होंने उन संहिताओं का अनुमोदन किया । ( ५ ) आयुर्वेद के लक्षणों का प्रतिपादन, ( ६ ) सम्पूर्ण कारण और कार्य का वर्णन, ( ७ ) आयुर्वेद शास्त्र का प्रयोजन, ( ८ ) रोगों के कारण, ( ९ ) दोषों का वर्णन, ( १० ) संक्षेप में औषधों का संग्रह, ( ११ ) रस और रस के प्रत्यय ( निमित्त कारण ) तथा द्रव्य ( आधार कारण ), ( १२ ) तीन प्रकार की औषधियों का संग्रह, ( १३ ) मूलिनी, फलिनी, स्नेह, लवण, मूत्र, दूध और ऐसे ६ वृक्ष जिनका दूध और छाल प्रयोग में आती है, ( १४ ) इन द्रव्यों के कर्म तथा योग अयोग, गुण और अगुण, ( १५ ) वैद्यापवाद अर्थात् मूर्ख वैद्य की निन्दा और ( १६ ) सर्वगुण सम्पन्न वैद्य के गुणों का निर्देश, ये सभी बातें महर्षि आत्रेय ने इस प्रथम अध्याय में बतायी हैं ॥ १३७-१४१ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में भेषज-चतुष्कविषयक ' दीर्घजीवितीय ' नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ॥
१. ' तन्त्रकारस्य रीतिरियं यत् — यत्रोक्तमर्थं संग्रहेणाभिधत्ते तत्र तत्र श्लोकाः ' इति करोति, यत्र तूक्तादनधिकमुच्यते तत्र ' भवति चात्र ' इति करोति ' इति चक्रः ।
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अपामार्गतण्डुलीयाध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातोऽपामार्गतण्डुलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
५१ अब ' दीर्घं जीवितीय अध्याय के वाद ) अपामार्गनण्डुलीय नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगदान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पिछले अध्याय में सूलिनी, फलिनी आदि पञ्चकर्म में प्रयुक्त होने वालो औषधियों का वर्णन किया गया है । अत्र पञ्चकर्म में प्रयुक्त होने वाली शेष औषधियों तथा पञ्चकर्म के सैद्धान्तिक पक्ष के वर्णन के लिये इस अध्याय की रचना की गयी है, ऐसा चक्रपाणि का मत है । यहाँ अपामार्ग - बीज न कहकर जो अपामार्ग - तण्डुल कहा गया है इसका तात्पर्य यह है कि केवल भूसी रहित चावल लेना चाहिये । नाम गणना प्रस्ताव में बीज लिखा है । अतः अङ्कुर उत्पन्न कर सकने योग्य ताजा अपामार्ग का बीज लेना चाहिये । अपामार्गस्य वीजानि पिप्पलीमरिचानि च । विडङ्गान्यथ शिग्रणि सर्षपांस्तुम्बुरूणि च ॥३ ॥
अजाजीं चोजगन्धां च पीलून्येलां हरेणुकाम् । पृथ्वीकां सुरसां श्वेतां कुठेरकफणिज्झकौ ॥४ ॥
शिरीषवीजं लशुनं हरिद्रे लवणद्वयम् । ज्योतिष्मतीं नागरं च दद्याच्छीर्षविरेचने ॥ ५ ॥
गौरवे शिरसः शूले पीनसेऽर्धावभेदके । क्रिमिव्याधावपस्मारे प्राणनाशे प्रमोहके ॥ ६ ॥
( १ ) पञ्चकर्मार्थ द्रव्य - संग्रह ( Drugs used in Panchakarma Therapy ) ( १ ) शीर्षविरेचन द्रव्य तथा उनके प्रयोग - अपामार्ग ( चिचिड़ी ) का बीज, पिप्पली, मरिच, वायविडङ्ग, सहिजन का बीज, सरसें, तेजबल का फल, जीरा, अजगन्धा, पीलू वृक्ष का बीज, बड़ी इलायची, हरेणु ( सम्भालु के बीज ), पृथ्वीका ( मगरैला ), सुरसा ( तुलसीभेद ), श्वेता ( अपराजिता ), कुठेरक ( तुलसी भेद ), फणिज्झक ( मरवा ), शिरीष का बीज, लहसुन, हल्दी, दारूहल्दी, सेन्धा-नमक और काला नमक, मालकांगनी, सोंठ इन सभी औषधियों को शिर के भारी होने पर, शिरःशूल, पीनस रोग, अधकपारी ( Hemiorania ), क्रिमिज शिरोरोग, अपस्मार ( Epilepsy ), गन्धज्ञान-नाश और मूर्च्छा ( Syncope ) की अवस्था में शिरोविरेचन के निमित्त देना चाहिये || ३-६ ॥ विमर्श - इस अध्याय में पञ्चकर्म के लिये प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों का वर्णन किया गया है । यद्यपि यहाँ पञ्चकर्म का नाम नहीं लिया गया है लेकिन इसी अध्याय में आगे १४ वें श्लोक में स्पष्ट रूप से ‘ संग्रहः पाञ्चकर्मिकः ' से पञ्चकर्म का निर्देश किया गया है । पञ्चकर्म में वमन विरेचनादि सामान्य क्रम होने पर भी यहाँ शिरोविरेचन का पहले वर्णन करने का कारण यह हो सकता है कि शिर सभी इन्द्रियों में प्रधान माना गया है - ' यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ' ( सू ० अ ० १७ ) । शिर को शरीर का मूल भी माना गया है अतः जिस प्रकार मूल के १. ( ‘ अध्यायारम्भे प्रथमम् ' अपामार्गस्य बीजानि ' इति पदं ततश्च ) ' अपामार्गबीजीय ' इति संज्ञायां प्राप्तायाम् ' अपामार्गतण्डुलीय ' इति संज्ञाकरणमपामार्गादिवीजानां निस्तुषाणामेव ग्रहणार्थम् ' इति चक्रः । २. ' चाजमोदाम् ' इति यो ० ।
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५२ चरकसंहिता. स्वस्थ रहने पर वृक्ष स्वस्थ रहता है वैसे शिरःस्वरूप मूल के स्वस्थ रहने से शेष शरीर स्त्रस्थ रहता है । अतः सर्वप्रथम शिर के शोधन का वर्णन है, जैसे- ' अनामये यथा मूले वृक्षः सम्यक् प्रवर्धते । अनामये शिरस्येवं देहः सम्यक् प्रवर्धते ॥ ' इसी दृष्टिकोण से क्रमशः शिरः-शुद्धि के लिये शिरोविरेचन, आमाशय - शुद्धि के लिए वमन, पच्यमानाशय - शुद्धि के लिये विरेचन, पक्वाशय - शुद्धि के लिये निरूह और अनुवासन - वस्ति का प्रयोग यहाँ बताया गया है । शिरोविरेचन में अनेक द्रव्यों के रहने पर भी अपामार्ग का ही प्रथम निर्देश करने का कारण यह कि शिरोविरेचनों में प्रधान अपामार्ग ही माना गया है - ' प्रत्यक पुष्पी शिरोविरेचनानाम् ' ( सू ० अ ० २५ ) । यहाँ शिरोविरेचन गण का निर्देश किया गया है । यथासम्भव सभी औषधों का प्रयोग एक साथ ही करना चाहिये, अभाव में एक या दो - चार का भी प्रयोग किया जा सकता है-यथा — ' समस्तं वर्गमर्थं वा यथालाभमथापि वा ' या - ' परिसंख्यातमपि हि यद् यद्द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपहरेत् ' ( वि ० अ ० ८ ) । उपर्युक्त विमर्श चक्रपाणि सम्मत है । मदनं मधुकं निम्बं जीमूतं कृतवेधनम् । पिप्पलीकुटजेच्वाकूण्येलां धामार्गवाणि च ॥ ७ ॥
उपस्थिते श्लेष्मपित्ते व्याधादामाशयाश्रये । वमनार्थं प्रयुञ्जीत भिषग्देहमदूषयन् ॥ ८ ॥
( २ ) वमन - द्रव्य तथा उनके प्रयोग - मदनफल, मुलेठी, नीम, जीमूत ( वन्दाल ), कृतवेधन ( तिक्त तरोई का पुष्प ), पिप्पली, कुटज ( कोरैया ), इक्ष्वाकु ( तितलौकी ), एला ( इलायची ), धामार्गव, इन द्रव्यों का कफ और पित्त की वृद्धि और आमाशय की व्याधियाँ होने पर वैद्य रोगी के शरीर को हानि न पहुँचाते हुये वमन के लिये प्रयोग करे ॥ ७-८ ॥ विमर्श - ( १ ) मदनफल वमनन्द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है— ' वमनद्रव्येषु मदन-फलानि श्रेष्ठतमान्याचक्षतेऽनपायित्वात् ' ( च. क. १ ) । वमन उद्रिक्त कफ को या कफ-स्थान में आए हुए पित्त को, या आमाशय: कफ - स्थान ) स्थित सभी रोगों में कफ को निकालने में सर्वोत्तम माना गया है - ' कफप्रधानानुतिष्टान् दोपानामाशयस्थितान् । बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ ' ( चि. अ. ३ ) । मदनफल के प्रयोग का विधान कल्पस्थान के प्रथम अध्याय में देखना चाहिये । वहां पर मदनफल- पिप्पली का प्रयोग करने को बताया गया है । ( २ ) मधुक ( मुलेठी ) का क्वाथ वमनकारक होता है । यद्यपि कल्पस्थान में मुलेठी के स्वतन्त्र कल्प का वर्णन नहीं है तथापि ' इक्ष्वाकु कल्प ' में यथा - ' यष्टयाहको-विदाराद्यैर्मुष्टिमन्तर्नखं पिबेत् ' तथा ' वामार्गव कल्प ' में - ' मधुकस्य कषायेण बीजकण्ठोद्धतं फलम् ’ से इसे वमनोपग माना गया है; जैसा कि इसी स्थान के चौथे अध्याय में ' मधुमधुककोविदारक ' आदि ' दशेमानि वमनोपगानि ' से स्पष्ट होगा । ( ३ ) नीम - गंगाधर के मत से इसकी छाल का क्वाथ बनाकर वमनार्थं प्रयोग करना चाहियें । ( ४ ) जीमूत का फल और फूल लेना चाहिये-' कल्पं जीमूतकस्येमं फलपुष्पाश्रयं शृणु ' ( क. अ. २ ) | ( ५ ) कृतवेधन का बीज तथा फूल लेना चाहिये । कुटज से इन्द्रजौ लेना चाहिये - ' काले फलानि संगृह्य तयोः शुष्काणि संक्षिपेत् ' ( क. अ. ५ ) । ( ६ ) इक्ष्वाकु के बीज, फूल तथा स्वरस वमनकारक होते हैं । ( ७ ) धामार्गव के फल, फूल और के पत्तियाँ वमनकारक होती हैं— ' फलं पुष्पं प्रवालं च विधिना तस्य संहरेत् ' ( क. अ. ४ ) । ( ८ ) एला से छोटी इलायची और कुछ लोग बड़ी इलायची लेते हैं । एला को गुणों में वमननाशक ( छदिन ) माना गया है यथा- ' हल्लासविषवस्त्यास्यशिरोरुग्व-मिका सनुत् ' ( भा. म. ) ' तथा ' स्थूलैला रक्तपित्तघ्नी वमिशुक्राश्मजिद्धिमा ' ( गुणनि. ) | छोटी
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अपामार्गतण्डुलीयाध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ५३ इलायची को कफनाशक बताया गया है — ' एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूलकृच्छ्रहृत् ’ ( भा. प्र. ) । वमनोपग द्रव्यों के वर्णन में भी आचार्य ने एला का नाम नहीं लिया है । सुश्रुत ने भी मदन, कुटज, जीमून इत्यादि वमनन्द्रव्यों का परिगणन करते समय सूत्रस्थान के ३ ९वें अध्याय में एला का नाम नहीं लिया है । किन्तु वाग्भट ने एला की गणना की है- ' मदन-मधुकलम्बानिम्बबिम्बी विशाला त्रपुसकुटजमूर्वा देवदाली कृमिघ्नम् । विदुलदहनचित्राः कोशत्रत्यौ करञ्जः कणलवणवचैलासर्षपाश्छर्दनानि ॥ ' ( वा. सू. अ. १५ ) । इन सब तथ्यों के कारण कुछ लोग वमनार्थ एला की पत्तियों का प्रयोग करने को कहते हैं । यहाँ ‘ देहमदृषयन् ' का तात्पर्य यह है कि अतियोग, अयोग तथा मिथ्यायोग इनका ध्यान रखते हुए वमन कराना चाहिये । यहाँ ' समानेश्वर्थेष्वेकत्राभिहितो विधिरन्यत्राप्यनुषञ्जनीयः ' के अनुसार ' देहमदूषयन् ' का सम्बन्ध विरेचन, बस्ति आदि सभी कर्मों के साथ किया जाता है । त्रिवृतां त्रिफलां दन्तीं नीलिनीं सप्तलां वचाम् । कम्पिल्लकं गवाक्षीं च क्षीरिणीमुदकीर्य कामम् ॥९ ॥
पीलून्यारग्वधं द्राक्षां द्रवन्तीं निचुलानि च । पक्वाशयगते दोषे विरेकार्थं प्रयोजयेत् ॥१० ॥
( ३ ) विरेचन द्रव्य तथा उनके प्रयोग — त्रिवृता ( सफेद निशोथ ), त्रिफला, दन्ती, नील का मूल, सप्तला ( सतधरिया सेहुड़ या सातला ), कड़वा वच, कम्पिल्लक ( कबीला ), गवाक्षी ( नारून ), क्षीरिणी ( भड़भाड़ ), उदकीर्थका ( करञ्ज ), पीलू, आरग्वव ( अमलतास की मज्जा ), मुनक्का, द्रवन्ती ( बड़ी दन्ती ), निचुल ( जलवेत या हिज्जल ), इन औषधियों का प्रयोग पक्काशय में दोषों के प्राप्त होने पर विरेचन के लिए किया जाता है ॥ ९ -१० ॥ विमर्श - त्रिवृत् - मूल सभी विरेचन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना गया है, यथा- ' विरेचने त्रिवृन्मूलं श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः ' ( कल्प. अ. ७ ) । अतः उसी का सर्वप्रथम नामग्रहण किया गया है । गङ्गाधर और चक्रपाणि ने क्षीरिणी से दुधिया का ग्रहण किया है । लेकिन आजकल व्यवहार में क्षीरिणी से स्वर्णक्षीरी का ग्रहण किया जा रहा है । पक्काशय को मुख्यरूप से वात का स्थान माना गया है — ' पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम् । स्थानं वातस्य तत्रापि पक्काधानं विशेषतः ॥ ' ( वा. सू. अ. १२ ) । पच्यमानाशय पित्त का स्थान माना गया है - ' ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्यो-रधोमध्योर्ध्वसंश्रयाः ' तथा ' विरेचनं पित्तहराणाम् ' से पित्त के शोधन के लिये विरेचन श्रेष्ठ उपाय माना गया है । अस्तु, इस प्रसंग में पक्काशय का अभिप्राय पच्यमानाशय ही समझना चाहिये । पाटलां चाग्निमन्थं च बिल्वं श्योनाकमेव च । काश्मर्यं शालपर्णी च पृश्निपर्णी निदिग्धिकाम् ॥ चलां श्वदंष्ट्रां बृहतीमेरण्डं सपुनर्नवम् । यवान् कुलत्थान् कोलानि गुडूचीं मदनानि च ॥ पलाशं कत्तृणं चैव स्नेहांश्च लवणानि च । उदावर्ते विबन्धेषु युन्ज्यादा स्थापनेषु च ॥ १३ ॥
( ४ ) आस्थापन वस्ति ( निरूह ) के द्रव्य तथा उनके प्रयोग - पाटला ( पाढ़ल ), अग्निमन्थ ( अरणी ), बेल की गुद्दी, सोनापाटा, काश्मर्य ( गम्भार ), सरिवन, पिठिवन, भटकटैया ( रेंगनी ), वरियरा की जड़, गोखरू, बृहती ( वनभण्टा ), एरण्ड, पुनर्नवा, यव, कुलथी, बेर, गिलोय, मैनफल, पलाश, कत्तृण ( गन्धतृणः चक्र ० ), स्नेह ( रेल, घृत आदि ), सभी नमक, इन औषधियों का प्रयोग उदावर्त और विबन्ध में तथा आस्थापन बस्ति के रूप में करना चाहिये ॥ अत एवौषधगणात् सङ्कल्प्यमनुवासनम् । मारुतघ्नमिति प्रोक्तः संग्रहः पाञ्चकर्मिकः ॥१४ ॥
( ५ ) अनुवासन बस्ति के द्रव्य – - इन्हीं औषध द्रव्यों से वातनाशक अनुवासन बस्ति की भी कल्पना करनी चाहिये । इस प्रकार यहाँ संक्षेप में पञ्चकर्म का संग्रह किया गया है ॥ १४ ॥
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५४ चरकसंहिता विमर्श -- अनुवासन बस्ति में भी इन्हीं द्रव्यों का प्रयोग बताया गया है । अनुवासन बस्ति उपर्युक्त द्रव्यों से पकाये हुए तैल या घृत से दी जानी चाहिये । उपर्युक्त द्रव्यों को वातघ्न बताया गया है । यदि पित्तघ्न या कफघ्न अनुवासन देना हो तो पित्त एवं कफनाशक अन्य द्रव्यों से सिद्ध तैल या घृत का प्रयोग किया जाना चाहिये, ऐसा चक्रपाणि का मत हैं । * तान्युपस्थितदोषाणां स्नेहस्वेदोपपादनैः । पञ्च कर्माणि कुर्वीत मात्राकालौ विचारयन् ॥१५ ॥
पूर्वकर्म - दोषों के उपस्थित ( उत्कुिष्ट ) होने पर पहले स्नेहन तथा स्वेदन कराकर मात्रा और काल का विचार करते हुये चिकित्सक को पञ्चकर्म का प्रयोग करना चाहिये ॥ १५ ॥
विमर्श -- ' उपस्थित दोष ' वह दोष है जो स्वयं बाहर निकलने के लिये चलायमान हो । उपर्युक्त प्रकार के दोष के शोधन में सुविधा होती है । यदि दोष स्वयं उपस्थित न हो तो स्नेहन-स्वेदन ( पूर्वकर्म ) द्वारा उनको बहिर्मुख कर पञ्चकर्म का प्रयोग करना चाहिये - ' क्षारोत्लिष्टो यथा वस्त्रे मलः संशोध्यतेऽम्भसा | स्नेहस्वेदैस्तथोत्क्लेश्य शोध्यते शोधनैर्मलः ॥ ' ( सि. अ. ६ ), ' स्नेहकिन्नाः कोएगा धातुगा वा स्रोतोलीना ये च शाखास्थिसंस्थाः । दोषाः स्वेदस्ते द्रवीकृत्य कोष्ठं नीताः सम्यक् शुद्धिभिर्निहियन्ते ॥ ' ( वा. सू. अ. १७ ) । कुछ लोगों के विचार से यदि दोष स्वयं उपस्थित हो तो स्नेहन - स्वेदन करना अत्यावश्यक नहीं है जैसा कि अधोलिखित से स्पष्ट है — ' कफप्रधानानुकुष्टान् दोपानामाशयस्थितान् । बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वन्यानां वमनैर्हरेत् ॥ ' ( चि. अ. ३ ) । ३ मात्राकालाश्रया युक्तिः सिद्धिर्युक्तौ प्रतिष्ठिता । तिष्ठत्युपरि युक्तिज्ञो द्रव्यज्ञानवतां सदा ॥ युक्ति का महत्त्व - किसी भी औषधि की युक्ति ( योजना ) उसकी मात्रा और काल पर निर करती हैं तथा युक्ति में सिद्धि ( सफलता ) प्रतिष्ठित ( स्थित ) है । द्रव्य का ज्ञान रखने वाले वैद्य से युक्ति को जानने वाला वैद्य सुदा श्रेष्ठ रहता है ॥ १६ ॥
विमर्श - इस श्लोक में ' युक्ति ' का महत्त्व बताया गया है तथा ' युक्तिज्ञ ' को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक माना गया है । चरकसंहिता में स्थल - स्थल पर यह जोर देकर कहा गया है कि केवल द्रव्यज्ञान से ही सफलता नहीं मिलती अदिनु उसकी सम्यक् योजना भी वैद्य को आनी चाहिये । इस सम्बन्ध में सू. अ. १ के १२१ से १३६ संख्या तक के लोक दर्शनीय हैं । उपर्युक्त लोक कभी - कभी परीक्षा में व्याख्या के लिये पूछे जाते हैं । इस सम्बन्ध में मात्रा, काल, युक्ति, मिद्धि, युक्तिज्ञ तथा द्रव्यज्ञ शब्दों में निहित भावों तथा अर्थों को स्पष्ट करना चाहिये । इस दृष्टि से यथास्थान प्रयास किया जायेगा । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यवागृविविधौषधाः । विविधानां विकाराणां तत्साध्यानां निवृत्तये ॥ ( २ ) अट्ठाईस यवागू - वर्णन ( Twenty Eight Medicated Gruels ) यत्रागू: वर्णन - इसके बाद यवागू द्वारा साध्य अनेक रोगों की निवृत्ति के लिये भिन्न-भिन्न औषधियों द्वारा सिद्ध यवागुओं का वर्णन किया जा रहा है || १७ || विमर्श - - शोधन कर्म ( पञ्चकर्म ) के बाद सामान्यतः अनि मन्द हो जाती है । इसीलिये ' संसर्जन क्रम ' ( मू. अ. १५ ) की व्यवस्था की जाती है तथा उसमे पेयादि का प्रयोग होता है । १. ' उपस्थित दोषाणामिति शाखां त्यक्त्वा कोठगमनेन तथा लीनत्व परित्यागेन प्रधानावस्था-प्राप्तदोषाणाम् ' इति चक्रः ।
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अपामार्गतण्डुलीयाध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ५५ इनके प्रयोग से अग्निदीपन होता है अतः यहाँ यवागू का वर्णन किया गया है । इस सम्बन्ध में निम्नांकित लोक द्रष्टव्य है - ' यथाऽणुरग्निस्तृणगोमयाद्यैः संधुक्ष्यमाणो भवति क्रमेण । महान् । स्थिरः सर्वसहस्तथैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तरग्निः ॥ ' ( सि ० अ ० १ ) । चक्रपाणि ने सुदशास्त्र के आधार पर यवागू बनाने के लिये जल का परिमाण इस प्रकार बताया है - ' अन्नं पञ्चगुणे तोये, यवागूः पड्गुणे पचेत् । चतुर्दशगुणे मण्डं विलेषीं तु चतुर्गुणैः ॥ सिक्वैर्विरहितो मण्ड: पेया सिक्यसमन्विता । यवागू-हुक्ा स्याद्विलेपी विरला ॥ ' इन यवागू के भेदों का पञ्चकर्म के बाद, अग्नि को तीव्र करने के लिये ' संसर्जन क्रम ' से प्रयोग किया जाना है । इसका संक्षेप मे विधान इस प्रकार है - ' पेयां विलेपीमकृतं कृतं च यूपं रसं त्रिद्विरथैकशश्च । क्रमेण सेवेत विशुद्धकायः प्रधानमध्यावरशुद्धिशुद्धः ॥
( च ० सि ० अ ० १ ) ।
पिप्पलीपिप्पलीमूलचन्य चित्रकनागरैः । यवागूर्दीपनीया स्याच्छूलघ्नी चोपसाधिता ॥
( १ ) शूलनाशक यवागू पिप्पली, पिपरामूल, चञ्य, चित्रकमूल और सोंठ से बनायी हुई या नदीपक और शूलनाशक होती है ॥ १८ ॥
विमर्श - यहाँ यवागू निर्माण करते समय पिप्पली आदि द्रव्यों की मात्रा का उल्लेख नहीं किया गया है । चक्रपाणि के मन में यवागू - निर्माणार्थं प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में जो रसप्रधान हैं उन्हें आहारद्रव्य तथा जो वीर्यप्रधान है उन्हें औषवद्रव्य माना गया है । पुनः औषधद्रव्य के वीर्य केतन भेद से निम्नांकित तीन प्रकार किये गये है -- ( १ ) तीक्ष्णवीर्य - जैसे सोंठ आदि । ( २ ) मध्यवीर्य जैसे बिल्व, अन्निमन्थादि । ( ३ ) मृदुवीर्य - जैसे आंवला आदि । सामान्य नियम बताने हवे चक्रपाणि ने कहा है कि तीक्ष्णवीचे औषधि १ क ( १ तो ० ), मध्यमवीर्य औषधि अपल ( २ तो ० ) तथा दुवर्य औषधि १ पल ( ४ तो ० ) की मात्रा में लेना चाहिये । तीक्ष्णवीर्य औषधि को १ कर्ष ( १ तो ० ) की मात्रा में लेकर १ एक प्रस्थ ( ६४ तोला ) जल में पकाने पर जब आधा शेष रहे को छान कर उस जल से यवागू का निर्माण करना चाहिये - ' कर्पमात्रं ततो द्रव्यं साधवेप्रास्केिऽम्भसि । अर्द्धशृतं प्रयोक्तव्यं पाने पेयादिसंविधौ ॥ ' कुछ लोग उपर्युक्त मात्रा
में ' द्विगु ' परिभाषा लगा कर सभी मात्राओं को दूना करके लेते हैं ।
दधिन्थविल्वचाङ्गेरी तकदाडिमसाधिता । पाचनी ग्राहिणी पेया सवाते पाञ्चमूलिकी ॥१ ९ ॥
( २ ) पाचनी तथा ग्राही पेया -- • कैथ, बेल, तीनपतिया, मट्ठा, और खट्टे अनारदाने से सिद्ध की गयी पेया पाचन और ग्राही होती हैं । ( ३ ) पञ्चमूल ( लघु ) के क्वाथ से सिद्ध पेया वातज ( अतिसार ) में हितकारी होती है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - वहाँ दो पेयाओं का निर्देश किया गया है पहली पाचनी और दूसरी ग्राहिणी । पाचन और ग्राही औषधियों का प्रयोग प्रायः अतिसार में किया जाता है अतः अतिसार का प्रसंग मान कर दूसरा पेया को वातज अतिसारनाशक कहा गया है । इस पेया में जल के बदले तक का प्रयोग बताया गया है । दूसरी पेया सरिवन, पिठिवन, भटकटैया की जड़, वनभंटा और गोखरू इन लघुपञ्चमूल के द्रव्यों के क्वाथ से सिद्ध करनी चाहिये । लघुपञ्चमूल का गुण इस प्रकार बताया गया है - ' पञ्चमूलं लघु स्वादु बल्यं पित्तानिलापहम् । नात्युगं बृंहणं ग्राहि ज्वरश्वासा-इमरीप्रणुत् ॥ ' ( भा. प्र. ) । शालपर्णीबला बिल्वैः पृश्निपर्ण्या च साधिता । दाडिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ ( ४ ) पित्तश्लैष्मिक अनिमाररोगघ्नी पेया - सरिवन, वेल और पिठिवन के काथ से बनी तथा खट्टे अनारदाने के रस से खट्टी बना कर प्रयोग की हुई पेवा पित्त - कफजन्य अतिसार में हितका होती है ॥ २० ॥
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५६ चरकसंहिता
यस्य च्छागेहीवेरोत्पलना गरैः । पेया रक्तातिसारनी पृश्निपर्ण्या च साधिता ॥ २१ ॥
( ५ ) रक्तातिसारनी पेया -- सुगन्धवाला, नीलकमल, नागर ( नागरमोथा ) और पृश्चिपण के कल्क को बकरी के अर्धोदक दुग्ध ( आधा जल + आधा दुग्ध ) में पका कर बनाई हुई पेया रक्तातिसार को नष्ट करती है ॥ २१ ॥
विमर्श - जतुकर्णसंहिता में भी यही पेया बनाई गई है पर उसमें नागर न बता कर ' घन ' बताया गया है — ‘ रक्तातिसारेऽजाक्षीरकोष्ट्रीघनजलोत्पलैः ' । अनएव नागर से सोंठ न लेकर नागरमोथा का लेना उचित प्रतीत होता है । नागरमोथा के गुण निम्नांकित बताये गये हैं— ' मुस्तं हिमं कटु ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् । कषायं कफपितास्रतृज्ज्वरारुचिजन्तुजित् ॥ ’ ( भा. प्र. ) । कुछ लोग जो नागर से सौठ का ग्रहण करते हैं वह उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि सोंठ ग्राही होते हुए भी उष्णवीर्य है, यथा- ' आग्नेयगुणभूयिष्ठं तोयांशं परिशोषयेत् । संगृह्णानि मलं तत्तु ग्राहिण्य्यादयो यथा ॥ ' ( भा. प्र. ) । अतएव रक्तातिसार में रक्तसंग्रहण के लिये उष्णवीर्य शुण्ठी की अपेक्षा शीतवीर्य नागरमोथा अधिक प्रशस्त हैं । दद्यात्सातिविषां पेयां सामे साम्लां सनागराम् । श्वदंष्ट्रा कण्टकारीभ्यां मूत्रकृच्छ्रे सफाणिताम् ॥ ( ६ ) आमानिसार तथा मूत्रकृच्छुघ्नी पेया - आमातिसार रोग में अनीस और सोंठ से बनी एवं खट्टे अनारदाने के रस से खट्टो की गयी पेया देनी चाहिये । ( ७ ) मूत्रकृच्छ रोग में गोखरू और भटकटैया के मूल के क्वाथ से बनायी गयी पेया राव ( फाणित ) मिलाकर देनी चाहिये || २२ || विडङ्गपिप्पलीमूलशिग्रुभिर्मरिचेन च । तत्रसिद्धा यवागूः स्यात्क्रिमिघ्नी ससुवर्चिका ॥२३ ॥
( ८ ) क्रिमिनी यवागू - वायविडङ्ग, पीपरामूल, सहिजन, मरिच और मट्ठा से सिद्ध की गयी यवागू सज्जीखार के साथ सेवन करने पर क्रिमिनाशक होती है ॥ २३ ॥
विमर्श - अष्टाङ्गसंग्रह में इस यवागू का विधान इस प्रकार बताया गया है — ' विडङ्गकृष्णा-मरिचपिप्पलीमूलशिघ्रभिः । पिवेत् ससर्जिकाक्षारैर्यवागूं तक्रसाधिताम् ॥ ' ( चि ० अ ० २२ ) । इसके अनुसार यहाँ पिप्पली से पीपर और मूल से पीपरामूल लेना चाहिये, क्योंकि पीपरामूल का नाम केवल ' मूल ' भी होता है - ' मूलं च पिप्पलीमूलम् ' ( राजनिघण्टु ) | यहाँ ' तक्रसिद्धा '
का तात्पर्य यह है कि अर्धोदक तक्र से यवागू पकानी चाहिये ।
मृद्वीका सारिवालाजपिप्पलीमधुनागरैः । पिपासानी विषघ्नी च सोमराजीविपाचिता ॥२४ ॥
( ९ ) पिपासा तथा त्रिप में प्रयोगार्थ यवागू - मुनक्का, अनन्तमूल, धान का लावा, पिप्पली, मधु और नागरमोथा के काथ से सिद्ध की हुई यवागू प्यास को दूर करती है । ( १० ) सोमराजी ( बाकुची ) के क्वाथ से सिद्ध यवागू विषनाशक होती है ॥ २४ ॥
सिद्धा वराहनिर्यूहे यवागृहणी मता । गवेधुकानां भृष्टानां कर्शनी या समाक्षिका ॥ २५ ॥
( ११ ) काव्ये तथा मेडोरोग में प्रयोगार्थ यत्रागू - - • सूअर के मांसास से बनायी गयी यवागू बृंहणी ( शरीर को मोटा करने वाली ) होती है । ( १२ ) भुने हुए गवेधुक ( जोन्हरी, जनेग, मकई इत्यादि ) से बनी हुई यवागू मधु के साथ सेवन करने से कर्षण ( शरीर को दुबला ) करने वाली होती है ॥ २५ ॥
सर्पिष्मती बहुतिला स्नेहनी लवणान्विता । कुशामलकनिर्यूहे श्यामाकानां विरूक्षणी ॥
( १३ ) स्नेहन तथा रूक्षनार्थ पेवा - तिलप्रधान चावल की वनी यवागू घृत तथा नमक मिला कर सेवन करने पर स्नेहन करने वाली होती है । ( १४ ) कुश का मूल और आमलक के क्वाथ से बनी हुई श्यामक ( सांवा ) की यवागू शरीर को रूक्ष करने वाली होती है ॥ २६ ॥
विमर्श - सुश्रुत ने शीघ्र - स्नेहार्थं दुग्ध - साधित थोड़े चावलों वाली यवागू में घृत मिला कर
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अपामार्गतण्डुलीयाध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ५७ सेवन करने को बताया है - ' सर्पिष्मती पयःसिद्धा यवागूः स्वल्पतण्डुला । सुखोष्णा सेव्यमाना तु सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥ ' तथा वृन्द ने भी - ' सर्पिष्मती बहुतिलां स्वल्पतण्डुलाम् ' आदि से अल्प चात्रल से बनी यवागू को स्नेहार्थं प्रयुक्त किया है । इसके आधार पर उपर्युक्त श्लोक में मूल
में चावल का नाम न होने पर भी चावल से बनी ही यवागू लेनी चाहिये ।
' दशमूलीश्टता कासहिक्काश्वासकफापहा । यमके मदिरासिद्धा पक्वाशयरुजापहा ॥ २७ ॥
( १५ ) श्वास - कासनी और पक्काशयगत वात ( शूल ) में प्रयोगार्थं पेया - के क्वाथ से ' दशमूल सिद्ध की हुई यवागू कास, हिचकी, दमा और कफज विकारों को दूर करती है । १६ यमक ( घृत - तैल ) में चावल को भून कर मदिरा में सिद्ध की हुई यवागू पकाशय के शूल को दूर करती है ॥ २७ ॥
विमर्श - गङ्गाधर के मन में आधे यमक, आधी मंदिरा से यवागू बनाना चाहिये, और यमक से दाल तथा चावल का ग्रहण करना चाहिये । यह ' केचित् ' के मत में बताया गया है! कुछ लोग दशमूल में दो खण्ड करके लघुपञ्चमूल से सिद्ध यवागू कास, श्वास, हिक्का में और बृहत्पञ्चमूल से सिद्ध यवागू, कफज विकार में देना बताते हैं ऐसा चरकोपस्कार में बताया गया है तथा इसके प्रमाग में वृद्ध वाग्भट का यह पद्य उद्धृत किया गया है - ' पेयां दीपनपाचिनीम् । हस्वेन पञ्चमूलेन हिक्कारुक्श्वासकासवान् । महता पञ्चमूलेन कफार्त्तः ॥ ( अष्टाङ्गसंग्रह चि. अ. १ ) । शाकैर्मासैस्तिलैर्माषैः सिद्धा वर्चो निरस्यति । जम्ब्वाम्रा स्थिदधित्थाम्लबिल्वैः सांग्राहिकी मता ॥ ( १७ ) सारक ( रेचक ) तथा ग्राही यवागू - शाक, मांस, तिल और उड़द से सिद्ध यवागू मल को बाहर निकालती ( सारक ) है । ( १८ ) जामुन की गुठली, आम की गुठली, खट्टी कैंथ, और वेल के क्वाथ से सिद्ध यवागू मल को बाँधने वाली होती है ॥ २८ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि मल विन्ध में शाकादि से सिद्ध यवागू और अतिसार, ग्रहणी इत्यादि रोगों में जामुन आदि से सिद्ध यवागू का प्रयोग करना चाहिये । चारचित्रक्रहिङ्ग्वम्लवेतसैर्भेदिनी मता । अभयापिप्पलीमूलविश्वैर्वातानुलोमनी ॥ २ ९ ॥ ( १ ९ ) मेदिनी ( रेचक ) तथा वातानुलोमनी यवागू ( - यवक्षार, चित्रक, हींग और अम्लवेत से सिद्ध यवागू मेदिनी होती है । ( २० ) हरड़, पीपरामूल और सौंठ के क्वाथ से सिद्ध यवागू बात का अनुलोमन करती है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - बानुलोमन यवागू में कहीं - कहीं ' विश्वः ' के स्थान में ' बिल्वैः ' पाठ है । उसका आधार यह हो सकता है— ' बिल्वशलाहरीतकीपिप्पलीमूलैर्मूढवानस्य ' ( अ ० सं ० चि ० अ ० ११ ) । यहाँ नूढ वान को अनुलोमन करने वाली यवागू में विल्व का पाठ आया हुआ है ।
तत्रसिद्धा यवागूः स्याद् घृतव्यापत्तिनाशिनी ।
तैव्यापदि शस्ता स्यात् तत्रपिण्याकसाधिता ॥ ३० ॥
( २१ ) वृत तथा तैल - व्यापद् में प्रयोगार्थ यवागू - तक्र से बना यवागू घृत के अजीर्ण से होने वाले उपद्रवों को शान्त करती है । ( २२ ) तक और पिण्याक ( तिल की खली ) से सिद्ध की गयी यवागू तेल के अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले उपद्रवों को शान्त करती है ॥ ३० ॥
विमर्श - वृन तथा तैल - व्यापद् पञ्चकर्म के पूर्व स्नेहन करते समय होने की सम्भावना रहती है । गव्यमांसरसैः साम्ला विषमज्वरनाशिनी । कण्ठ्या यदानां यमके पिपल्यामलकैः शृता ॥३ ९ ॥ ( २३ ) विपनज्ञरनी तथा कण्ठरोगनी यवागू – गौ के मांसरस से सिद्ध की गयी और खट्टे अनार के रस से खट्टी बनायी गर्दा यवागू विषमज्वर को दूर करती है । ( २४ ) यव को घृत और