चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 131–140
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 131–140
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३८ चरकसंहिता ( वा. सू. अ. १ ) । इन असाध्य रोगों को प्रत्याख्येय तथा अनुपक्रम ( चिकित्सा के अयोग्य है बताया गया है । अरिष्ट लक्षण वाले रोगी असाध्य होते हैं यह बात ' ध्रुवं त्वरिष्टे मरणम् ' से स्पष्ट है, यद्यपि सुश्रुत में ' ध्रुवं त्वरिष्टे मरणं ब्राह्मणैस्तत्किलामलैः । रसायनतपोजप्यतत्परैर्वा निवार्यते ॥ ' इत्यादि से अरिष्ट लक्षणों के होने पर भी रसायन प्रयोग और तपस्वी ब्राह्मणों के जप करने से अरिष्ट का नाश बताया है । इसके आधार पर नियत और अनियत भेद से अरिष्ट दो प्रकार का होता है ऐसा कुछ आचार्य मानते हैं । नियत अरिष्ट से मृत्यु हो जाती है और
अनियत अरिष्ट रसायन, तप, जप इत्यादि के प्रयोग से दूर भी हो जाते हैं ।
भूश्चात यथाद्रव्यं गुणकर्माणि वच्यते ॥ ६३ ॥
अब इसके बाद पुनः द्रव्यों के अनुसार उनके गुण - कर्म का वर्णन किया जायगा । अर्थात् आव-श्यकतानुसार भिन्न - भिन्न स्थलों में यथावश्यक द्रव्यों के गुण - कर्म का वर्णन किया जायगा ॥ ६३ ॥
* रसनार्थों रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा । निर्वृत्तौ च विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः ॥ रस का लक्षण — रसना ( जिह्वा ) के अर्थ ( विषय ) का नाम रस है । रस का आधार द्रव्य, जल और पृथ्वी है और रस की उत्पत्ति में भी जल और पृथ्वी कारण द्रव्य है । विशेष ज्ञान ( यह मधुर है, यह कटु है इत्यादि ) में वायु, आकाश और अनि कारण होते है ॥ ६४ ॥
विमर्श - रस की निरुक्ति है ' रस्यते आस्वाद्यते इति रसः । जिह्वा द्वारा जिसका स्वाद लिया जाता है उसे ग्स कहा जाता है । रस की उत्पत्ति में मुख्य रूप से जल और पृथ्वी कारण होते हैं । परन्तु वायु, आकाश और अग्नि के प्रभाव से भिन्न - भिन्न रसों की अभिव्यक्ति होती है । रस की मुख्य योनि जल ही मानी जाती है और जल में रस की प्रतीति मुख्य रूप से होती है यथा - ' सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लघ्यश्चाव्यक्तरसाः तेषां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः । ( सू.अ. २६ ) । तात्पर्य यह है कि रस को उत्पत्ति पञ्चमहा-भूत से ही होनी है फिर भी रसोत्पत्ति में जल का भाग मुख्य रहता है । अतः आयुर्वेद जल में अव्यक्त रस मानता है । * स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च । कषायश्चेति षट्कोऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः ॥ रस के भेद - ( १ ) मधुर, ( २ ) अम्ल, ( ३ ) लवण, ( ४ ) कड, ( ५ ) तिक्त और ( ६ ) कषाय इन ६ रसों का संक्षेप में संग्रह किया गया है ॥ ६५ ॥
विमर्श - संक्षेप में संग्रह का तात्पर्य यह है कि द्रव्य, देश और काल के प्रभाव के अनुसार रसों का भेद ६३ प्रकार का माना गया है । आत्रेयभद्रकाप्यीय अध्याय ( सू. अ. २६ ) की रस सम्बन्धी तद्विसम्भाषा परिषद् ( Seminar ) में अन्य पक्ष को भी वहीं देखना चाहिये । मधुरादि रसों का क्रमिक वर्णन उनके यथापूर्व बलाधिक्योत्पादक होने के कारण किया गया है ऐसा वृद्ध वाग्भट का मत है । * स्वाद्वम्ललवणा वायुं, कषायस्वादुतिक्तकाः । जयन्ति पित्तं, श्लेष्माणं कषायकटुतिक्तकाः ॥ रसों का कार्य - • स्वादु, अम्ल और लवण ये तीन रस वात को, कपाय, मधुर और तिक्त ये तीन रस पित्त को और कपाय, कटु और तिक्त ये तीन रस कफ को शान्त करते हैं ॥ ६६ ॥
१. योगीन्द्रनाथसेनस्तु ' भूयश्चात ' इत्याद्यर्धश्लोकं ' कटुतिक्तकपायाश्च कोपयन्ति समीरणम् ' इत्यनन्तरं पठति । २. ' रसनार्थ इति जिह्वाग्राह्यः द्रव्यमाधारकारणं, निर्वृत्तौ अभिव्यक्तौ विशेषे मधुरादिविशेष-निर्वृत्तौ प्रत्ययाः निमित्तकारणं, निर्वृत्तौ चेति चकाराद्विशेषेऽपि मधुरादिलक्षणेऽक्षित प्रत्ययौ, विशेषे चेति चकारादभिव्यक्तावप्याकाशादीनां कारणत्वं दर्शयति ' इति चक्रः ।
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दीर्घ ओवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ३६ विमर्श - रसों के पाञ्चभौतिक संगठन तथा उनके द्वारा शमन और कुपित होनेवाले दोषों की तालिका नीचे दी जा रही है । उपर्युक्त श्लोक में केवल दोषों को शान्त करने वाले रसों का ही निर्देश किया गया है । उत्पन्न रस रसों के उत्पादक शमन होने वाले महाभूत दोष कुपित होने वाले दोष ( १ ) मधुर जल - पृथ्वी वात - पित्त कफ ( २ ) अम्ल पृथ्वी - अग्नि वान पित्त - कफ ( ३ ) लवण जल - अग्नि वात पित्त - कफ ( ४ ) कटु वायु - अग्नि कफ पित्त - वात ( ५ ) तिक्त वायु आकाश पित्त - कफ वात ( ६ ) कषाय वायु - पृथ्वी पित्त - कफ वात रसों के उपर्युक्त पञ्चमहाभौतिक अवयवों का दोपों के प्रकोप तथा शमन से सम्बन्ध निम्नांकित रूप में समझा जा सकता है । क - ( १ ) जल और पृथ्वी से मधुर रस और कक दोनों की उत्पत्ति होती है अतः समान होने से मधुर रस कफ को बढ़ाता है; ( २ ) अम्ल रस पृथ्वी के सान्निध्य से कफ और अग्नि के सान्निध्य से पित्त को बढ़ाता है; ( ३ ) लवण रस जल के सान्निध्य से कफ, अनि के सान्निध्य से पित्त को बढ़ाता है; ( ४ ) कटु रस वायु के सान्निध्य से वात, अनि के सान्निध्य से पित्त को, ( ५ ) क्रिस वायु आकाश के सान्निध्य से बात को और ( ६ ) कषाय रस वायु के सान्निध्य से वात को बढ़ाता है । ख - ( १ ) मधुर रस में जल और पृथ्वी की अधिकता होने से दोनों भारी और स्थिर होते हैं, अतएव वात को; दोनों भारी, शीत और स्थिर होते हैं अतएव पित्त को शान्त करते हैं; ( २ ) अम्ल रस में पृथ्वी भारी और अग्नि उष्ण है अतः यह वात को शान्त करता है; ( ३ ) लवण रस में अग्नि की प्रधानता है अतः यह वात को शान्त करता है; ( ४ ) कटु रस वायु - अग्नि के सान्निध्य से रूक्ष और उष्ण होता है अतः कफ को शान्त करता है; ( ५ ) तिक्त रस वायु आकाश के सान्निध्य से रूक्ष और लघु होता है अतः कफ और पित्त को शान्त करता है और ( ६ ) कषाय रस वायु - पृथ्वी के सान्निध्य से रूक्ष, लघु, विशद होता है अतः कफ को, एवं रूक्ष, शीत और पृथ्वी
का सान्निध्य होने से पित्त को शान्त करता है ।
* कट्वम्ललवणाः पित्तं स्वाद्वम्ललवणाः कफम् । कटुतिक्तकषायाश्च कोपयन्ति समीरणम् ॥
दोषों को प्रकुपित करने वाले रस - कटु, अम्ल और लवण रस पित्त को; मधुर, अम्ल और लवण रस कफ को; कटु, तिक्त और कषाय रस वात को कुपित करते हैं ॥ ६७ ॥
विमर्श - यह लोक चरक की अन्य प्रतियों में प्राप्त नहीं होता । पर योगीन्द्रनाथ सेन ने यह श्लोक यहाँ पढ़ा है और वह उचित भी प्रतीत होता है क्योंकि जहाँ दोषों के शमन करने वाले रसों का वर्णन है वहाँ उनके कुपित करने वाले रसों की भी गणना होनी चाहिये थी । वृद्ध वाग्भट ने एक ही साथ दोषों के प्रशम और कुपित करने वाले रसों का वर्णन किया है यथा - ' रसाः स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः । षड् द्रव्यमाश्रितास्ते तु यथापूर्व बलावहाः ॥ तत्राद्या मारुतं नन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम् । कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. १ ) * किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद्धातुप्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥६८ ॥
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४० चरकसंहिता ( ४ ) द्रव्य - वर्गीकरण ( Classification of Drugs ) प्रभाव भेद से द्रव्यों के भेद - ( १ ) कुछ द्रव्य दोषों को शान्त करने वाले, ( २ ) कुछ द्रव्य धातुओं को दूषित करने वाले और ( ३ ) कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त में हितकारी होते हैं । इस प्रकार द्रव्यों के तीन भेद होते हैं ॥ ६८ ॥
विमर्श - ऊपर तीन प्रकार के द्रव्यों का निर्देश किया गया है जैसे ( १ ) कुछ द्रव्य विषम वातादि दोषों का निर्हरण कर या विना निर्हरण किए उनको प्राकृतावस्था में लाते है । अर्थात् शमन और शोधन क्रिया द्वारा उन्हें समभाव में स्थापित करते हैं । शमन - जैसे तेल -संह, उष्ण और गुरु गुण के कारण रूक्ष, शीत और लघु गुण वाले वायु का शमन करता है । इसी प्रकार घृत पित्त का और मधु कफ का शमन करता है । मदनफल, कुटज, कृतवेधन, त्रिवृत्, दन्ती, द्रवन्ती इत्यादि शोधन - द्रव्य हैं । ( २ ) कुछ द्रव्य धातुओं को अर्थात् प्राकृत वातादि दोष, रसादि सप्त धातु, स्वेदादि तीन मलों को दूषित करने वाले होते हैं । यथा - यवक, माष, आम-मूलक, सर्षप, दधि, किलाट, विरुद्ध भोजन इत्यादि । ( ३ ) कुछ द्रव्य स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को प्राकृत भाव में बनाए रखते है, जैसे रक्तशालि, षष्टिक, यव, गेहूँ, जाङ्गल मांस, गोदुग्ध, रसायन, वाजीकर द्रव्य इत्यादि । यहाँ जो द्रव्य केवल प्रभाव के द्वारा दोपों का प्रशमन करते हैं उनका ही ग्रहण किया गया है, जैसे आँवला तथा हर्रे अपने द्रव्य प्रभाव से ही त्रिदोष का शमन करते हैं । यद्यपि दोनों में अम्ल रस का होना पित्त के प्रकोप का कारण होना चाहिए परन्तु द्रव्य प्रभाव से ये पित्त - प्रकोपक न होकर शामक होते हैं । यहाँ दोषप्रशमन, धातुप्रदूषण, स्वस्थवृत्त में हितकारी यह तीन प्रकार कह देने से ही तीन भेद का परिचय हो जाता है तब ' त्रिविधं ' यह कहने की आवश्यकता क्या थी? त्रिविध शब्द तीन संख्या को दृढ़ करने के लिए है अतः शोधन का शमन में और रसायन तथा वाजीकरण का स्वस्थवृत्त - हितकारी में समाविष्ट कर द्रव्यों का उपर्युक्त तीन भेद ही माना जाता है । रक्तशालि, षष्टिक, यव आदि को स्वस्थवृत्त में हितकारी कहा गया है परन्तु इनका प्रयोग दोषशमनार्थ भी होता है - ' रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह । यवाग्वोदनला-जार्थे ज्वरितानां ज्वरापहाः ' ( चि. अ. ३ ) | अतः इन्हें दोषशामक भी कहना चाहिए तथा जो द्रव्य दोषशामक होता है वही द्रव्य प्रकृति, शरीर, देश, काल, मात्रा इत्यादि के अनुसार दोषकारक या धातुप्रदूषक भी हो सकता है; जो द्रव्य धातुप्रदूषक होता है वही द्रव्य प्रकृति, शरीर, सात्म्य, मात्रा इत्यादि के कारण दोषशामक भी हो सकता है, जैसे विष उदररोग में दोषशामक होता है - ' पानभोजनसंयुक्तं विषमस्मै प्रदापयेत् । यस्मिन् वा कुपितः सर्पो विसृजेद्धि फले विषम् || भोजयेत्तदुदरिणं प्रविचार्य भिषग्वरः । तेनास्य दोषसङ्घातः स्थिरो लीनो विमार्गगः ॥ विषेणाशुप्रमाथित्वादाशु भिन्नः प्रवर्तते । ( चि. अ. १३ ) । इस प्रकार के विचार से जो द्रव्य दोष-शामक हैं वे दोषप्रकोपक, जो द्रव्य धातुप्रदूषक हैं वे ही धातुशामक और जो द्रव्य स्वास्थ्य के लिए हितकारी हैं वे ही द्रव्य दोषशामक वर्ग में चले जाते हैं । अतः उपर्युक्त तीन प्रकार के द्रव्यों की कल्पना भ्रामक प्रतीत होने लगती है । इस शङ्का का उत्तर यह दिया जा सकता है कि द्रव्यों का यह तीन प्रकार का भेद ' प्रायोवाद ' के अनुसार कहा गया है । जिन तीन प्रकार के द्रव्यों का उदाहरण दिया गया है वे द्रव्य प्रायः उसी प्रकार के कार्य करते हैं जैसा कि बनाया गया है । पर कहीं - कहीं इसके विपरीत भी कार्य कर सकते हैं, जैसा कि बताया गया है - ' स्वस्थस्यौजस्करं यत्तु तद्वृष्यं तद्रसायनम् । प्रायः प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम् । प्रायः शब्दो विशेषार्थो ह्युभयं ह्युभयार्थकृत् ॥ ' ( चि. अ. १ ) हैं ।, तात्पर्य यह है कि बाधक कारण के अभाव में दोषप्रशमन -स्वभाव वाले द्रव्य दोषशामक होते
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ४१ किन्तु बाधक कारण के उपस्थित होने पर उन द्रव्यों के स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है । इसी प्रकार धातुदूषक द्रव्य भिन्न - भिन्न कारणों के उपस्थित होने पर धातुप्रशामक भी हो जाते हैं । जिस प्रकार चन्द्रकान्तमणि तथा मन्त्र के संयोग से अग्नि में दाहकत्व शक्ति नहीं रहती, मणि के अभाव में दाहकत्व की उपस्थिति होती है, इससे यह कल्पना नहीं की जाती कि अग्नि में दाहकत्व शक्ति नहीं है, परन्तु मणि के अभाव में अग्नि में दाहकत्व की कल्पना की जाती है । उसी प्रकार बाधक कारण के अभाव में जिन द्रव्यों में दोषशामकत्व शक्ति है उसे दोषप्रशमन, जिन द्रव्यों में धातुदूषकत्व शक्ति है उसे धातुप्रदूषण तथा जिन द्रव्यों में स्वस्थ रखने की शक्ति है उन्हें स्वस्थवृत्त में हितकारी माना जाना चाहिए । यहाँ दोषप्रशमन और धातुप्रदूषण ये दोनों शब्द भिन्न - भिन्न रूप में लिखे गये हैं । उचित यह होता कि दोषप्रशमन - दोष प्रदूषण या धातुप्रशमन धातुप्रदूषण पाठ होता, परन्तु ऐसा पाठ नहीं है । इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि दोष शब्द मुख्यतः त्रिदोष का बोधक हैं और धातु शब्द मुख्यतः रसासृकुमांसादि सप्त धातु का बोधक है, अतः किसी एक दोष या धातु शब्द का ग्रहण करने से एक दूसरे का ग्रहण नहीं हो पाता । इसीलिए दोनों शब्द दोष तथा धातु पढ़े गये हैं । दोष शब्द का अर्थ यहाँ केवल पीड़ाकर्तृत्व है, इस अर्थ में वातादि दोष, रसादि धातु, स्वेदादि मल ये सभी दोष समझना चाहिये अतः दोषप्रशमन से यहाँ इन सभी का प्रशमन लिया गया है । इसी तरह प्राकृतावस्था में इन सभी में देह धारकत्व है अतः धातु पद का प्रयोग किया गया है । धातु प्रदूषण से इन सभी का प्रदूषण लिया गया है । उपर्युक्त सम्पूर्ण विमर्श का मुख्य आधार चक्रपाणि सम्मत है । तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं जाङ्गमौद्भिदपार्थिवम् । उत्पत्ति भेद से द्रव्य के प्रकार - ऊपर प्रभाव के अनुसार तीन प्रकार के द्रव्यों का वर्णन किया गया है । वे ही द्रव्य योनि - भेद से पुन: ( १ ) जाङ्गम ( २ ) औद्भिद ( ३ ) पार्थिव तीन प्रकार के होते हैं । विमर्श -: - जाङ्गम ' गच्छतीति जङ्गमं तस्य भावः जाङ्गमम् ' अर्थात् जो एक स्थान से दूसरे स्थान में गमन कर सकते हों उन्हें जाङ्गम कहते हैं । जैसे जरायुज, अण्डज और स्वेदज । औद्भिद-' उद्भिद्य पृथिवीं जायते इति उद्भिद् तत्र भवम् औद्धिदम् ' अर्थात् पृथ्वी को फोड़कर जो उत्पन्न होते हैं उन्हें उद्भिद् कहते हैं, जैसे वनस्पति, वानस्पत्य, वीरुधू और औषधि । पार्थिव — पृथिव्या ' विकारः पार्थिवम् ' अर्थात् जो पृथ्वी के विकार ( खनिज ) हैं, जैसे सोना, चाँदी, लोहा आदि । मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जाऽसृगामिषम् ॥ ६ ९ ॥ विण्मूत्रचर्मरेतोऽस्थिस्नायुशृङ्गनखाः खुराः । जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः ॥ जाङ्गम द्रव्य - जाङ्गम द्रव्यों से औषध कार्य में निम्नलिखित वस्तुएँ प्रायः प्रयोग में ली जाती हैं - मधु, गोरस ( दूध, दही, घी इत्यादि ), पित्त, वसा, मज्जा, रक्त, मांस, मल, मूत्र, चर्म, शुक्र, हड्डी, स्नायु, सींग, नख, खुर, केश, रोम और गोरोचन ॥ ६ ९ -७० ॥ विमर्श - ' मधूनि ' यह बहुवचन है अतः ' माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं मधुजातयः ' ये सभी मधु की जातियाँ लेनी चाहिये और ' गोरसाः ' भी बहुवचन है अतः भैंस, बकरी इत्यादि सभी के
दुग्धों और दुग्ध की विकृतियों जैसे दही, किलाट, मक्खन का ग्रहण करना चाहिये ।
सुवर्णं समलाः पञ्चलोहाः ससिकताः सुधा । मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाञ्जने ॥७१ ॥
भौममौषधमुद्दिष्टम् -पार्थिव द्रव्य - • सोना, मल के साथ पाँचों लोहा ( चाँदी, तामा, वंग, नाग और लोहा ), बालू, चूना, मैनसिल, हरताल, मणियाँ, नमक, गेरू, अञ्जन, - ये सभी पार्थिव औषध हैं ॥ ७१ ॥
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४२ चरकसंहिता विमर्श -- चक्रपाणि ने मल शब्द से लोह - मल शिलाजतु का ग्रहण किया है । जैसा कि ‘ हेमाद्याः सूर्यसंतप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः । जत्वाभं मृदुमृत्स्नाच्छं यन्मलं तच्छिलाजतु ' से स्पष्ट है ।
- औद्भिदं तु चतुर्विधम् । वनस्पतिविरुधश्च वानस्पत्यस्तथैौषधिः ॥७२ ॥
फलैर्वनस्पतिः पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि । ओषध्यः फलपाकान्ताः प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥७३ ॥
औद्भिद - होते हैं - ( १ ) वनस्पति, ( २ ) वीरुध, ( ३ ) द्रव्य ये द्रव्य चार प्रकार के वानस्पत्य, ( ४ ) ओषधि । जिनमें केवल फल दृष्टिगोचर हो उन्हें वनस्पति, जिनमें फूल और फल दोनों दृष्टिगोचर हों उन्हें वानस्पत्य, जिनका फल पक जाने पर अन्त हो जाय उन्हें ओषधि और जो लता के रूप में फैले हों उन्हें वीरुथ कहा जाता है ॥ ७२-७३ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने भी ' अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः ' अर्थात् जिनमें फूल न हों किन्तु फल लगे हों उन्हें वनस्पति बताया है । अपुष्पा का अर्थ ' न पुष्पा अपुष्पा: ' अर्थात् पुष्प भिन्न पुष्प सदृश लेना चाहिए । भिन्नता इतनी ही है कि पुष्प का पूर्ण विकास होता है जैसा कि ' पुष्प विकसने ' ( दिवादि ) धातु से ' पुष्यतीति पुष्पम् ' जो विकास को प्राप्त होता है उसे पुष्प कहते हैं, इससे स्पष्ट है । वनस्पति में पुष्पं का विकास नहीं होता । सादृश्य इतना ही है कि कली के अन्दर पुटचक्र, दलचक्र, इत्यादि जो विकसित फूल में रहने वाले सभी अवयव हैं, उसमें पाये जाते हैं । अतः जिनमें फूल विकसित न हो किन्तु फल दिखाई पड़े उसे वनस्पति कहते हैं जैसे गूलर, वट, पाकड़, इत्यादि । अपुष्पा में नञ् समास है । न का प्रयोग ' पर्युदास ' और ' प्रसह्य ' इन दो अर्थों में प्रायः होता है जैसा कि ' द्वौ नञौ च समाख्यातौ पर्युदासप्रसह्यकौ । पर्युदासः सदृग्ग्राही प्रसह्यस्तु निषेधकृत ' से ज्ञात होगा । लोक में उपर्युक्त दृष्टि से गूलर के फूल का उदाहरण दिया जाता है जिसके अन्दर फूल के सभी अवयव अविकसित रूप में पाये जाते हैं । नञ् का दूसरा अर्थ ईषद् करके ' सूक्ष्म पुष्प वाला ' यह भी अभिप्राय निकाला जा सकता है । जिनमें फूल और फल दोनों स्पष्ट हों उन्हें वानस्पत्य या वृक्ष कहते हैं जैसे आम, जामुन, महुआ इत्यादि । सुश्रुत ने भी इन्हें वृक्ष की ही संज्ञा दी है यथा ' पुष्पफलवन्तो वृक्षाः ' । जो पककर स्वतः नष्ट हो जाते हैं जैसे दूर्वादि और या जो फल के पक जाने पर नष्ट हो जाते हैं जैसे जौ, गेहूं, धान आदि उन दोनों को औषधि कह सकते हैं । जिनके गुल्म ( झुरमुट ) और लताएँ होती है उन्हें वीरुध कहते हैं, जैसे गुडुची आदि मूलत्वक्सारनिर्यासनालस्वरसपल्लवाः । क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः ॥७४ ॥
पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाचोद्भिदो गणः । औद्भिद द्रव्य के ग्राह्य अङ्ग - मूल, छाल, सार, गोंद, नाल ( डण्ठल ), स्वरस, मृदु पत्तियाँ, क्षार, दूध, फल, फूल, भस्म ( राख ), तैल, कांटे, पत्तियाँ, शुङ्ग ( टूसा ), कन्द, प्ररोह ( वटजटा ) ये संख्या में अठारह हैं । ये औद्भिद द्रव्यों के प्रयोज्य अङ्ग | इन्हें औद्भिद गण कहते हैं || ७४ || मूलिन्यः षोडशैकोना फलिन्यो विंशतिः स्मृताः ॥ ७५ ॥
महास्नेहाश्च चत्वारः पञ्चैव लवणानि च । अष्टौ मूत्राणि संख्यातान्यष्टावेव पयांसि च ॥७६ ॥
शोधनार्थाश्च षड्वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः । य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित् ॥ मूलिनी आदि द्रव्य की गणना - मूलिनी सोलह, फलिनी एक कम बीस ( उन्नीस ), महास्नेह चार, लवण पाँच, मूत्र आठ, दूध आठ, शोधन के लिये छ ( ६ ) वृक्ष इस अध्याय में पुनर्वसु ने बताये हैं । जो वैद्य इन औषधियों का रोगों में प्रयोग करना जानता है, वह आयुर्वेद शास्त्र का ज्ञाता कहा जाता है ॥ ७१-७७ ॥ हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा । सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक श्रेणी गवाच्यपि ॥ ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका । अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी ॥
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दीर्घजीविताध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ४३ सोलह मूलिनी द्रव्य - ( १ ) हस्तिदन्ती - नागदन्ती ( चक्र ० ) ( २ ) हैमवती - सफेद वच, ( ३ ) श्यामा - काला निशोथ, ( ४ ) त्रिवृत् - सफेद निशोथ, ( ५ ) अधोगुडा - विधारा ( वृद्धदारुक? ) ( ६ ) सप्तला - सातला या सतधरिया सेहुड़, ( ७ ) श्वेतनामा - श्वेत अपराजिता, ( ८ ) प्रत्यक्षेणी -दन्ती, ( ९ ) गवाक्षी - नारुन, ( १० ) ज्योतिष्मती - मालकङ्गुनी, ( ११ ) बिम्बी - कुन्दरु, ( १२ ) शण-पुष्पी - वनसनई, ( १३ ) विषाणिका - काकड़ा सींगी, ( १४ ) अजगन्धा - वन अजवायन, ( १५ ) द्रवन्ती-दन्ती भेद, ( १६ ) क्षीरिणी - स्वर्णक्षीरी ( भड़भाड़ ) या दुग्धिका ( चक्र ० ) ये १६ औषधियाँ मूलिनी कही जाती हैं ॥ ७८-७९ ॥ शणपुष्पी च बिम्बी च छर्दने हैमवत्यपि । श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने ॥८० ॥
एकादशावशिष्टा याः प्रयोज्यास्ता विरेचने । इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः ---मूलिनी द्रव्यों के प्रयोगस्थल – वनसनई, कुन्दुरु और वच का प्रयोग वमन के लिए, मालकांगनी का प्रयोग शिरोविरेचन के लिए तथा जो शेष ग्यारह ओषधियाँ हैं उनका प्रयोग विरेचन कर्म में होता है । इस प्रकार मूलिनी द्रव्यों के नाम और कर्म का निर्देश किया गया है ॥ ८० ॥
- फलिनीः शृणु ॥ ८१ ॥
शङ्खिन्यथ विडङ्गानि पुषं मदनानि च । धामार्गवमथेदवाकु जीमूतं कृतवेधनम् ॥ ८२ ॥
आनूपं स्थलजं चैव क्रीतकं द्विविधं स्मृतम् । प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्यक्पुष्पी तथाऽभया ॥ अन्तःकोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्च शारदम् । कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत् कुटजस्य च ॥ उन्नीस फलिनी द्रव्यों का निर्देश - ( १ ) शङ्खिनी - यवतिक्ता, ( २ ) विडङ्ग - वायविडङ्ग, ( ३ ) त्रपुष- तिक्त खीरा ( ४ ) मदन - मैनफल, ( ५ ) धामार्गव - तरोई, ( ६ ) इक्ष्वाकु -तिनलौकी, ( ७ ) जीमूत - वंदाल ( देवदाली ), ( ८ ) कृतवेधन - तिक्त तरोई, ( ९ ) आनूपक्कीतक-मुलेठी, ( १० ) स्थलज क्की तक भूमि में होने वाली मुलेठी, ( ११ ) प्रकीर्या - लताकरअ, ( १२ ) उदकीर्या - घीयाकरञ्ज, डिठोरी, ( १३ ) प्रत्यक्पुष्पी - अपामार्ग, ( १४ ) अभया - हरीतकी, ( १५ ) अन्तःकोटरपुष्पी - नीलबुघ्ना ( चक्र ० ) ( १६ ) हस्तिपर्णीशारद - शरद ऋतु में होने वाली कडुई ककड़ी, ( १७ ) कम्पिल्लक - कबीला, ( १८ ) आरग्वध- अमलतास, ( १ ९ ) कुटज फल - कुरैया का फल ( इन्द्रयव ) ये उन्नीस फलिनी ओषधियाँ हैं ॥ ८१-८४ ॥
धामार्गवमथेच्वाकुजीमूतं कृतवेधनम् । मदनं कुटजं चैव वपुषं हस्तिपर्णिनी ॥ ८५ ॥
एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च । नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पी विधीयते ॥८६ ॥
दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने । नामकर्मभिरुक्तानि फलान्येकोनविंशतिः ॥
फलिनी द्रव्यों के प्रयोगस्थल - ( १ ) धामार्गव ( घिया तरोई ), ( २ ) तीतलौकी, ( ३ ) बन्दाल, ( ४ ) कढ़ई तरोई, ( ५ ) मदनफल, ( ६ ) इन्द्रजौ, ( ७ ) खीरा, ( ८ ) कढ़ई ककड़ी ये ओषधियाँ वमन और आस्थापन वस्ति में प्रयुक्त होती हैं । ( ९ ) अपामार्ग का प्रयोग शिरोविरेचन कर्म में होता है । दश जो ओषधियाँ शेष हैं उनका प्रयोग विरेचन कर्म में होता है । इस प्रकार उन्नीस फलिनी औषधियों के नाम और कर्म का निर्देश किया गया है ॥ ८५-८७ ॥ सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेहो दृष्टश्चतुर्विधः । पानाभ्यञ्जनवस्त्यर्थं नस्यार्थं चैव योगतः ॥८८ ॥
स्नेहना जीवना बल्या वर्णोपचयवर्धनाः । स्नेहा ह्येते च विहिता वातपित्तकफापहाः ॥८ ९ ॥ चतुर्विध महास्नेह: - घृत, तेल, वसा और मज्जा ये चार प्रकार के स्नेह बनाये गये हैं । ये पान, अभ्यङ्ग, बस्ति और नस्य के लिये प्रयुक्त होते हैं । ये स्नेह शरीर को स्निग्ध करने
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४४ चरकसंहिता वाले, जीवन - शक्ति प्रदान करने वाले, वल बढ़ाने वाले, वर्ण और शरीर के उपचय को बढ़ाने वाले और प्रकुपित वात, पित्त तथा कफ को दूर करने वाले कहे गए हैं ॥। ८८-८९ ॥ सौवर्चलं सैन्धवं च विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रेण सहैतानि पञ्च स्युर्लवणानि च ॥ ९ ० ॥ पाँच नमक - ( १ ) काला नमक, ( २ ) सेंधा नमक, ( ३ ) विङनमक, ( ४ ) औद्भिद नमक ( रेह का नमक ), ( ५ ) सामुद्र नमक ( साम्भर नमक ) ये पाँच प्रकार के नमक होते है ॥ ९ ० ॥ निग्धान्युष्णानि तीच्णानि दीपनीयतमानि च । आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधौ तथा ॥
अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने । अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने ॥९ २ ॥
शस्त्रकर्मणि वर्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च । अजीर्णानाहयोर्वाते गुल्मे शूले तथोदरे ॥ ९ ३ ॥ उक्तानि लवणानि -सामान्यतः नमकों के गुण - पाँचों नमक शरीर को स्निग्ध करने वाले, गरम, तीक्ष्ण और श्रेष्ठ अग्निदीपक होते हैं । लेप के कार्यों में, स्नेहन एवं स्वेदन कर्म में, अधोमार्ग द्वारा मलों को निकालने के लिए विरेचन द्रव्यों में, ऊर्ध्वमार्ग द्वारा मलों को निकालने के लिए वमन द्रव्यों में, निरूहवस्ति में, अनुवासनबस्ति में, स्नेहाभ्यङ्ग ( मालिश ) में, भोजन में, शिरो-विरेचन कर्म में, शस्त्रकर्म ( जैसे लेखन, भेदन इत्यादि ) में, वर्त्ति, अञ्जन, उत्सादन ( उबटन ) के कर्मों में और अजीर्ण रोग, आनाह, वातविकार, गुल्म, शूल एवं उदर रोगों में इन उपर्युक्त पाँचों नमक का प्रयोग किया जाना है ॥ ९ १ - ९ ३ ॥ - ऊर्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे । मुख्यानि यानि दिष्टानि सर्वाण्यात्रेयशासने ॥ ९ ४ ॥ अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं च यत् । हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च ॥ ९ ५ ॥ सूत्रों के नाम और संख्या - अब इसके बाद जो आठ मूत्र आत्रेय के शासन ( उपदेश ) में मुख्य रूप से कहे गये हैं उनका निर्देश किया जाता है । ( १ ) भेड़ का मूत्र ( २ ) बकरी का मृत्र, ( ३ ) गोमूत्र, ( ४ ) भैंस का मूत्र, ( ५ ) हाथी का मूत्र, ( ६ ) ऊँट का मूत्र ( ७ ) घोड़े का मूत्र, ( ८ ) गदहे का मूत्र, ये आठ मूत्र होते हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥ विमर्श -- यहाँ अवि, अजा, गौ और भैंस इनका स्त्री जाति का ही मूत्र लेना चाहिए, शेष का पुंलिङ्ग का मूत्र लेना चाहिए । भावप्रकाश में भी ' गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम् ॥ ' अर्थात् गौ, बकरी, भेड़ और भैंस का स्त्री जाति का मूत्र तथा गहा, ऊँट, हाथी, मनुष्य तथा घोड़ा का पुरुष जाति का मूत्र लेना बताया गया है । परन्तु ' लाघवं जातिसामान्ये स्त्रीणां पुंसां च गौरवम् ' के अनुसार सभा स्त्री जाति का मूत्र लघु होता है और पुरुष का मूत्र गुरु होता है । अतः स्त्री जाति का ही मूत्र लेना चाहिए । अभाव में पुरुष जाति का भी मूत्र लिया जा सकता है । उष्णं तीक्ष्णमथोऽरूक्षं कटुकं लवणान्वितम् । मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमा लेपनेषु च ॥९ ६ ॥ युक्तमास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने । स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमाना हेप्वगदेषु च ॥९ ७ ॥
उदरेष्वथ चार्शःसु गुल्मकुष्टकिलासिषु । तद्युक्तमुपनाहेषु परिषेके तथैव च ॥९ ८ ॥
दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपदिश्यते । पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं शर्म चोच्यते ॥९९ ॥
श्लेष्माणं शमयेत्पीतं मारुतं चानुलोमयेत् । कर्षेत्पित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसंग्रहः ॥१०० ॥
सामान्येन मयोक्तस्तु — सामान्यतः भूत्रों के गुण- सामान्य रूप से लवण रस वाले होते हैं । मूत्र उबटन के कार्य में, १. ' रूक्षम् ' इति पा ० । सभी मूत्र गरम, तीक्ष्ण, अरूक्ष तथा कटु और लेप में, आस्थापन बस्ति में, विरेचन कर्मों
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ४५ में, स्वेदन कर्मों में, आनाह रोग में, अगद ( विषशामक ) के प्रयोगों में, उदर रोगों में, अर्श रोग में, गुल्म, कुष्ठ और किलास रोगों में प्रयुक्त होता है । तथा मूत्र उपनाह ( Poultice ) और परिषेक में प्रयुक्त होता है । यह अग्निदीपक, विपनाशक और क्रिमियों को नष्ट करने वाला होता है । पाण्डु रोग से पीड़ित रोगियों के लिए विशेष कल्याणकारी कहा गया है । मूत्र पीने से कफ को शान्त करता है, वायु का अनुलोमन करता है और गुदामार्ग से पित्त को बाहर निकालता है । यह सामान्यतः मूत्रों के गुणों का संग्रह हमने बताया है ॥ ९ ६ - १०० ॥ विमर्श - यहाँ ' लवणान्वितं कटुकम् ' मूत्र का गुण माना है अर्थात् मूत्र में प्रधान रस कटु होता है, लवण अनुरस ( अप्रधान रस ) होता है । सुश्रुत ने भी ऐसा ही कहा है- ' तत्सर्वं कटु-तीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं लघु ' ( सु. सू. अ. ४५ ) । यहाँ मूत्र तीनों दोपों में लाभकारी बताया गया है । किन्तु वाग्भट ने ' पित्तलं रूक्षतीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं कटु ' से मूत्र को पित्तवर्द्धक माना है । +
चरक का तात्पर्य यह हो सकता है कि मूत्र पित्त को बढ़ा कर अधोभाग से निकालता है ।
- पृथक्त्वेन प्रवच्यते । अविमूत्रं सतिक्तं स्यात्स्निग्धं पित्ताविरोधि च ॥ १०१ ॥
आज कषायमधुरं पथ्यं दोषान्निहन्ति च । गव्यं समधुरं किञ्चिद् दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत् ॥१०२ ॥
कण्डं च शमयेत् पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम् । अर्शः शोफोदरनं तु सत्तारं माहिषं सरम् ॥ हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम् । प्रशस्तं बद्धविण्मूत्रं विषश्लेष्मामयार्शसाम् ॥ सतिक्तं श्वासकासनमर्शोघ्नं चौष्ट्रमुच्यते । वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्टव्रण विषापहम् ॥
खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम् । इतीहोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः ॥ १०६ ॥
मूत्रों के पृथक् पृथक् - गुण - ( १ ) भेड़ का मूत्र - यह रस में तिक्त, स्निग्ध और पित्तका अविरोधी होता है । ( २ ) वकरी का मूत्र - यह रस में कपाय और मधुर, पथ्य और दोपशामक हैं । ( ३ ) गोमूत्र — गाय का मूत्र रस में कुछ मधुर, दोपनाशक और क्रिमि तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है । यदि सम्यक् आभ्यन्तर पान किया जाय तो कण्डू और दूष्योदर ( या दोषजन्य उदर रोगों ) में लाभकारी होता है । ( ४ ) भैंस का मूत्र - यह अर्श, शोफ और उदर रोगों का नाश करता है और क्षारयुक्त एवं सारक होता है । ( ५ ) हाथी का मूत्र -- यह रस में लवण, कृमि, कुष्ठ के रोगियों के लिये हितकारी है तथा जो रोगी विबंध से पीड़ित या मूत्राघात से पीड़ित या जिनके शरीर में विषजन्य विकार, या कफजन्य विकार हैं, या जो अर्श रोग से पीड़ित हैं उन सबके लिए लाभप्रद होता है । ( ६ ) ऊँट का मूत्र - यह रस में तिक्त होता है तथा श्वास, कास और अर्श रोग को दूर करता है । ( ७ ) घोड़े का मूत्र - यह रस में तिक्त और कटु होता है तथा कुष्ठ, व्रण और विष को दूर करने वाला होता है । ( ८ ) गदहे का मूत्र - यह अपस्मार, उन्माद और ग्रह रोगों को दूर करने वाला होता है । इस प्रकार मूत्रों का उनकी शक्ति के योग के अनुसार ( गुण, कर्म ) कह दिया गया है ॥ १०१-१०६ ॥ विमर्श - सामान्यतः मूत्र शब्द से गोमूत्र का ही ग्रहण किया जाता है । यह सभी मूत्रों में श्रेष्ठ और लाभकारी होता है । सभी मूत्रों के अभाव में इसी का ग्रहण किया जा सकता है, जैसा कि ' सर्वेष्वपि च मूत्रेषु गोमूत्रं गुणतोऽधिकम् । अतो विशेषात् कथने मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ॥ ^ से स्पष्ट है । इसके विशेष गुण निम्नांकित हैं - ' कण्डूकिलासगुदशूलमुखाक्षिरोगान्, गुल्मातिसार-मग्दामयमूत्ररोधान् । कासं सकष्ठजठरक्रिमिपाण्डुरोगान्, गोमूत्रमेकमपि पीतमपाकरोति ॥ ' अतः क्षीराणि वच्यन्ते कर्म चैषां गुणाश्च ये । अविक्षीरमजाक्षीरं गोक्षीरं माहिषञ्च यत् ॥१०७ ॥
उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा । आठ प्रकार के दुग्ध अब इसके बाद दुग्धों का गुण - कर्म के साथ वर्णन किया जाता है । ( १ ) भेड़ी का दूध, ( २ ) बकरी का दूध, ( ३ ) गाय का दूध, ( ४ ) भैस का दूध, ( ५ ) ऊँटनी
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४६ चरकसंहिता का दूध ( ६ ) हथिनी का दूध, ( ७ ) घोड़ी का दूध, ( ८ ) स्त्री का दूध यह आठ प्रकार का दुग्ध कहा गया है ॥ १०७ ॥
प्रायशो मधुरं स्निग्धं शीतं स्तन्यं पयो मतम् ॥। १०८ ॥ प्रीणनं बृंहणं वृप्यं मेध्यं वल्यं मनस्करम् । जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिबर्हणम् ॥१० ९ ॥
हन्ति शोणितपित्तं च सन्धानं विहतस्य च । सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा ॥
तृष्णाघ्नं दीपनीयञ्च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च । पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे ॥ अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विशेषतः । योनिशुक्रप्रदोषेषु मूत्रेषु प्रदरेषु च ॥ ११२ ॥
पुरीषे ग्रथिते पथ्यं वातपित्तविकारिणाम् । नस्यालेपावगाहेषु वमनास्थापनेषु च ॥ ११३ ॥
विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र युज्यते । दुग्धों के सामान्य गुण - प्रायः सभी दूध रस में मधुर, गुण में स्निग्ध, वीर्य में शीतल और दूध को बढ़ाने वाले होते हैं । यह आह्लाद उत्पन्न करने वाला, बृंहण ( शरीर की वृद्धि करने वाला ), वृष्य, मैध्य ( धारण - शक्ति को बल देने वाला ), बलवर्द्धक, मन को अपना कार्य करने की शक्ति देने वाला, जीवनीय - शक्ति ( Vitality ) को बढ़ाने वाला, श्रमनाशक, श्वासकास नाशक और रक्तपित्त रोग को दूर करता है । विहत ( भग्न ) का संधान करने वाला होता है । सभी जीवधारियों के लिए सात्म्य है । यह दोषों का शमन और शोधन करने वाला है । प्यास को दूर करने वाला तथा अग्निदीपक है । क्षीण तथा क्षय वाले रोगियों के लिये उत्तम है । पाण्डुरोग, अम्लपित्त, शोष ( यक्ष्मा ), गुल्म, उदररोग, अतिसार, ज्वर ( जीर्णज्वर ), दाह, विशेष कर शोध रोग, योनिरोग, शुक्रदोष, मूत्ररोग, प्रदररोग, विबन्ध तथा वात - पित्त के रोगियों के लिये दुग्ध पथ्य है । दुग्ध का प्रयोग नस्त्र, आलेप, अवगाह, वमन, आस्थापन बस्ति, विरेचन तथा स्नेहन के लिये सर्वत्र होता है ॥ १०८-११३ ॥ विमर्श - ' तत्र सर्वमेव क्षीरं प्राणिनामप्रतिषिद्धं जानिसात्म्यात् ' ( सु. सू. अ. ४५ ) के अनुसार दूध सभी प्राणियों का आहार बताया गया है । शतपथब्राह्मण में दूध ही मनुष्यों का प्रधान अन्न ( आहार ) माना गया है - ' एतद् वै पय एव अन्नं मनुष्याणाम् ' ( श. बा. २।५।१६ ) । आधुनिक दृष्टिकोण से भी दूध पूर्णाहार ( Complete food ) है । वैज्ञानिक दृष्टि से शरीर - संवर्धन के लिए आहार द्रव्यों में जिन - जिन संगठनों की आवश्यकता होती है वे प्रायः सभी दूध में पाये जाते हैं । प्रोटीन ( Protein ), वसा ( Fat ). शर्करा ( Sugar ) इत्यादि आहार के मुख्य तत्त्व और कैल्शियम ( Calcium ) इत्यादि खनिज पदार्थ तथा जीवनीय तत्व ( Vitamins ) होने के कारण यह अपने आप में ही एक पूर्ण आहार की सामग्री दे पाता है हैं 1 नीचे के कोष्ठक में विभिन्न प्रकार के दुग्धों के संगठनों का संग्रह किया जा रहा है-Milk Protein % Fat % Carbohydrate % Vitamins % मांसतत्त्व स्नेह शर्करा जीवनीय द्रव्य दुग्ध प्र ० श ० प्र ० श ० प्र ० श ० ए ० बी ० सी ० गोदुग्ध स्त्री 29 भेड़ 99 बकरी " भैस 29 ३.३ ३.६ ४० ९ +++++ + १.४४ ७.२८ ५.२४ २.६४ +++ + + ७००४ ४० ९ +++ + ४.२६ ४०० ४.२६ +++ ४०८ ७.६७ ४.३६ +++ +
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दीर्घञ्जीवितीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् ४७
यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक्पृथक् । अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वच्याम्यशेषतः ॥
पृथक् पृथक् दुग्धों के गुण - ऊपर बताये हुए आठों दुग्धों के गुण कम से अलग - अलग सूत्रस्थान के अन्नपानादि नामक अध्याय २७ में विस्तार से पुनः कहे जायँगे ॥ ११४ ॥
अथापरे यो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः । स्स्रुर्काश्मन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक्पृथक् ॥ चमनेऽश्मन्तकं विद्यात्स्नुहीतीरं विरेचने । क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वमने सविरेचने ॥ ११६ ॥
शोधनार्थं तीन अन्य वृक्ष - अत्र फलिनी और मूलिनी के अलावा जो दूसरे तीन वृक्ष शोधन कर्मों में प्रयुक्त होते है वे ( १ ) स्नुही ( सेहुड़ और थूहर ), ( २ ) अर्क ( मदार ) और ( ३ ) अश्मन्तक हैं इनके कर्म अलग - अलग निम्नांकित हैं । ( १ ) अश्मन्तक का प्रयोग वमन के लिए, ( २ ) स्नुही क्षीर का प्रयोग विरेचन ( तीक्ष्ण ) के लिए और ( ३ ) अर्क के दूध का प्रयोग वमन और विरेचन दोनों कर्मों में होता है ॥ ११५ ११६ ॥ इमांस्त्रीनपरान् वृक्षानाहुर्येषां हितास्त्वचः । पूतीकः कृष्णगन्धा च तिल्वकश्च तथा तरुः ॥ शोधनार्थं पुनः तीन वृक्ष - और ये तीन ऐसे वृक्ष हैं जिनकी छाल शोधनार्थं प्रयुक्त होती है, ( १ ) प्ती, ( २ ) कृष्णगन्धा और ( ३ ) तिल्वक ॥ ११७ ॥
विरेचने प्रयोक्तव्यः पूतीकस्तिल्वकस्तथा । कृष्णगन्धा परीसर्पे शोथेष्वर्शःसु चोच्यते ॥ दविद्रधिगण्डेषु कुष्टेष्वप्यलजीषु च । षड्वृत्तान्छोधनानेतानपि विद्याद्विचक्षणः ॥ ११ ९ ॥ उपर्युक्त तीनों का आमयिक प्रयोग - विरेचन कर्मों के लिए पूतीक और तिल्बक का प्रयोगकरना चाहिये । विसर्प, शोथ, अर्श, दद्रु, विद्रधि, गलगण्ड, कुष्ठ और अलजी रोगों में शोधन के लिए कृष्णगन्धा का प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार फलिनी और मूलिनी से अतिरिक्त ये ६ औषधियाँ शोधन कार्य में प्रयुक्त होती हैं, ऐसा विद्वान् वैद्यों को समझना चाहिये ॥ ११८-११९ || विमर्श - यहाँ इस लोक में शोधन कर्मों में प्रयुक्त होने वाले तीन द्रव्य बताये गये हैं । इसमें पहला पूनीक है जिसका अर्थ ' चिरबिल ' लिया गया है । दूसरा कृष्णगन्धा है जिसका अर्थ‘सहिजन ' है । तीसरा तिल्वक है जिसका अर्थ सावर लोध माना जाता है । कृष्णगन्धी की छाल का प्रयोग शोधनार्थ ले सकते हैं पर शोधन से यहाँ विरेचन या वमन का ग्रहण नहीं किया गया है, किन्तु लेप द्वारा यह विसर्प, शोथ, दाद आदि रोगों में रक्त का शोधन करता है, यह अर्थ लेना चाहिये । पूतीक और तिल्बक की छाल का प्रयोग विरेचन कर्मों में होता है । यही बात सुश्रुत ने भी लिखी है - ' त्रिवृता श्यामा दन्ती …………………… ' तिल्वक कम्पिलक पूतीक महावृक्षसप्तच्छदज्योतिष्मती चेत्यधोभागहराणि ’ ( सु. सू. अ. ३ ९ ) । डल्हण ने तिल्वक का लोध और पूतीक का चिरबिल अर्थ किया है । गङ्गाधर और चक्रपाणि ने भी तिल्वक का अर्थ लोध ही किया है । चक्रपाणि ने पूतीक को कण्टकी करञ्ज माना है । लोध का गुण ग्राही होने से कुछ विद्वान् तिल्वक को लोध मानने में संकोच करते हैं । यह विवादास्पद विषय है । इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च । मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड् ये दिष्टाः पयस्त्वचः ॥ द्रव्यसम्बन्धा गणना का उपसंहार - इस प्रकार फलिनी, मूलिनी, स्नेह, नमक, मूत्र, दूध, तथा ६ वृश्च जिनमें तीन का दूध और तीन की छाल प्रयोग में आती है, इनका वर्णन कर दिया गया है ॥ १२० ॥
* ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने । अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥
( ५ ) औषधि और चिकित्सक ( Drug & Physician ) वनवासियों का औषधि - परिचय में महत्त्व १. ' येषां दृ ( दि ) ष्टाः पयस्त्वचः ' इति पा ० । -जो वन में अजा ( बकरियों ) का, अवि