चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 161–170

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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६८ चरकसंहिता अर्थात् स्वरस में मधु, शक्कर, गुड़, क्षार, जीरा, नमक, घी तथा तैल और चूर्ण डालना हो तो

३ तो ० डालना चाहिये ।

* यः पिण्डो रसपिष्टानां स कल्कः परिकीर्तितः ॥

( २ ) कल्क का [ Paste ] लक्षण - रस अर्थात् दूध, जल इत्यादि किसी द्रव द्वारा पीस कर बनाया गया पिण्ड कल्क कहा जाता है । विमर्श - कल्क बनाने की विधि तथा मात्रा शार्ङ्गधर ने इस प्रकार बताई है - ' द्रव्यमा शिलापिष्टं शुष्कं वा सजलं भवेत् । प्रक्षेपावापकल्कास्ते तन्मानं कर्षसंमितम् ॥ ' अर्थात् गीले द्रव्यों को सिल पर पीस लिया जाय या सूखे द्रव्यों के चूर्णों को जलादि से पीस लिया जाय तो उसे कल्क कहा जाता है । प्रक्षेप तथा आवाप उसके पर्याय हैं । इसकी मात्रा १ तोला है । कल्क में प्रक्षेप इस नियम से छोड़ना चाहिये - ' कल्के मधु घृतं तैलं देयं द्विगुणमात्रया । सिता-समौ दद्याद् द्रवा देयाश्चतुर्गुणाः ॥ ' अर्थात् १ तोला कल्क में मधु, घृत तथा तैल दो - दो तोला ( द्विगुण ), मिश्री तथा गुड़ एक - एक तोला ( सम भाग ) और दूध आदि द्रव पदार्थ ४ तोला ( चतुर्गुण ) छोड़ना चाहिये । वौ तु कथितं द्रव्यं श्रुतमाहुश्चिकित्सकाः । ( ३ ) क्वाथ [ Decoction ] का लक्षण - द्रव्य को द्रव ( जल, दुग्धादि ) के साथ अग्नि में उबालने से प्राप्त पदार्थ को चिकित्सक लोग शृत या क्वाथ कहते हैं । विमर्श - क्वाथ की कल्पना करने की विधि का वर्णन शार्ङ्गधर ने इस प्रकार किया है- ' पानीयं घोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत् । मृत्पात्रे कापयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ॥ ' सामान्य नियम यह है कि एक पल ( ४ तो ० ) द्रव्य को १६ गुने अर्थात् ६४ तोले जल में डाल कर आग पर मिट्टी के पात्र में पकावे और अष्टमांश ( ८ तो ० ) शेष रहने पर उतार ले । अन्यत्र विशेष नियम यह है- ' कर्णादौ तु पलं यावद्दद्यात् षोडशिकं जलम् । ततस्तु कुडवं यावत्तोयमष्टगुणं भवेत् । चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावत् प्रस्थादिकं जलम् ॥ ' तथा ' मृदौ चतुर्गुणं देयं मध्यमेऽष्टगुणं तथा । द्रव्ये तु कठिने देयं बुधैः षोडशिकं जलम् || कर्पादितः पलं यावत् क्षिपेत् पोडशिकं जलम् । तदूर्ध्वं कुडवं यावत्तोय॒मष्टगुणं भवेत् । तदूर्ध्वे प्रक्षिपेन्नीरं मागं यावच्चतुर्गुणम् । तज्जलं पाययेद् धीमान् कोष्णं मृद्वग्निसाधितम् ॥ ' अर्थात् १ तोले से लेकर ४ तोले तक द्रव्य का क्वाथ बनाना हो तो १६ गुना और ५ तोले से लेकर १६ तोले तक द्रव्य का क्वाथ बनाना हो तो ८ गुना, १६ तोला से लेकर जितने भी अधिक द्रव्य का क्काय बनाना हो उसका ४ गुना जल देकर क्वाथ बनाया जाता है और अष्टमांश शेष रक्खा जाता है । द्रव्य के अनुसार - मृदु द्रव्य में ४ गुना, मध्य, द्रव्य में ८ गुना और अत्यन्त कठिन द्रव्य में १६ गुना जल देकर क्वाथ किया जाता है और क्रम से चतुर्थीश, अष्टमांश तथा पोडशांश शेष रक्खा जाता है । सामान्यतः जो क्वाथ मृदु, मध्य, कठोर औषधों के संमिश्रण से बनाया जाता है, उसमें ८ गुना जल और अष्टमांश शेष रक्खा जाता है | क्वाथ बनाते समय पात्र का मुख खुला रखना चाहिये । ढकने से क्वाथ गुरु हो जाता है जो पीने से हानिकर होता है - ' अपिधानमुखे पात्रे जलं दुर्जरतां व्रजेत् । तस्मादावरणं त्यक्त्वा काथादीनां विनिश्चयः ॥ ' ( शार्ङ्ग ) । काथ की मात्रा उत्तम ८ तो ०, मध्यम ६ तो ० और हीन ४ तो ० बतायी गई है, यथा- ' मात्रोत्तमा पलेन स्यात्रिभिक्षैस्तु मध्यमा । जघन्या तु पलार्द्धेन स्नेहक्काथौषधेषु च ॥ ' क्वाथ कब और कितनी मात्रा में पीना चाहिये, इस विषय में शार्ङ्गवर का मत है । - ' आहाररसपाके च संजाते द्विपलोन्मितम् । ' अर्थात् आहार के पूर्ण पाक हो जाने पर २ पल अर्थात् ८ तो ० क्वाथ पीना चाहिये । यदि क्वाथ में प्रक्षेप द्रव्य छोड़ना हो तो

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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ६६ उसके लिए निम्नलिखित नियम व्यवहार में लाया जाता है -- ' काथे क्षिपेत्सितामंशैश्चतुर्थाष्टम-षोडशैः । वातपित्तकफातंके विपरीतं मधु स्मृतम् ॥ जीरकं गुग्गुलुं क्षारं लवणं च शिलाजतु । ि s त्रिकटुकं चैव काथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ॥ क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद्रवं तथा । कल्कं चूर्णादिकं काथे निक्षिपेत्कर्षसंमितम् ॥ ' अतः व्यवहार में एक मात्रा क्वाथ पीने के लिए आजकल २ तो ० द्रव्य में आधा सेर ( ३२ तो ० ) जल मिला कर क्वाथ पकाया जाता है और १ छटाँक ( ४ तो ० ) शेष रहने पर छान कर पी लिया जाता है । अधिक मात्रा में क्वाथ बना कर अरिष्ट, तैल, घृत और भावना आदि कार्य में लाया जाता है । सुश्रुत ने चिकित्सास्थान के ३१ वें

अध्याय में इसका वर्णन विस्तृत रूप से किया है ।

* द्रव्यादापोथितात्तोये तत्पुननिशि संस्थितात् ॥

कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः । ( ४ ) शीत [ Cold Infusion ] का लक्षण --- • कूटे हुए द्रव्य को शीतल जल में रात भर रख दे । प्रातःकाल द्रव्य को हाथ से मसल कर छान ले, इसे शीतकषाय कहा जाता है । विमर्श - शार्ङ्गधर में कहा गया है - • ' क्षुण्णं द्रव्यपलं सम्यक् षड्भिनींरपलैः प्लुतम् । निशोषितं हिमः स स्यात्तथा शीतकषायकः ॥ ' अर्थात् ४ तोले द्रव्य को कूट कर २४ तोले ( ६ गुने ) जल में मिला कर एक मिट्टी के पात्र में ढक कर रख दे । प्रातःकाल हाथ से मसल कर छान ले | यह शीतकषाय है । इसकी मात्रा ८ तो होती है । इसमें प्रक्षेप काथ के नियम के अनुसार डाला जाता है । * क्षिप्त्वोष्णतोये मृदितं तत् फाण्टं परिकीर्तितम् ॥ ) ( ५ ) फाण्ट [ Hot Infusion ] का लक्षण - द्रव्य को जौ कुट कर उष्ण जल में डाल कर हाथ से मसल ले । जब औषय का सार जल में चला आता है तो इसे फाष्ट कहा जाता है । विमर्श - - अन्यत्र फाण्ट का लक्षण यह है - ' क्षुण्णे द्रव्यपले सम्यग् जलमुष्णं विनिःक्षिपेत् । मृत्पात्रे कुडवोन्मानं ततस्तु स्रावयेत्पटात् ॥ स स्याच्चूर्णद्रवः फाण्टस्तन्मानं द्विपलोन्मितम् । सितामधु-गुडादींश्च काथवत्तत्र निःक्षिपेत् ॥ ' अर्थात् ४ तोले द्रव्य को आग पर खौलते हुये १६ तोले जल में छोड़ कर उतार लें | मसल कर ८ तो ० की मात्रा में प्रयोग करें । उपर्युक्त स्वरसादि के लक्षण-सम्बन्धी लोक चरकसंहिता के अन्दर प्रक्षिप्त रूप में माने जाते हैं । तेषां यथापूर्वं बलाधिक्यम्, अतः कषायकल्पना व्याध्यातुरबलापेक्षिणी, न त्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति ॥ ७ ॥

पञ्चविध कषाय - कल्पना के गुणों में तारतम्य अधिक बलवान ( गुरु ) होते हैं । इसलिये इन के बल पर निर्भर करता है क्योंकि सभी होनी हैं ॥ ७ ॥

इन पचविध कषाय कल्पनाओं में यथापूर्व कषाय- कल्पनाओं का प्रयोग व्यावि और रोगी कषाय- कल्पनायें सभी रोगों में लाभकारी नहीं विमर्श - चक्रपाणि ने ' यथापूर्व ' पर टीका करते हुये स्पष्ट किया है कि फाण्ट से अधिक शीत, शीत से अधित शृत, शृत से अधिक कल्क और कल्क से अधिक स्वरस वलवान होता है तथा बला-धिक्य का अभिप्राय गुरुताधिक्य बताया है । अभिप्राय यह है कि ये कल्पनायें यथापूर्व पाचन में गुरु होती हैं । इसीलिये इनका प्रयोग रोग तथा रोगी के बल पर निर्भर करता है । उदाहरणार्थं बलवान रोग या रोगी में स्वरस का प्रयोग किया जाता है क्योंकि उसमें द्रव्य का सर्वाधिक सार भाग होता १. ' प्रतप्ते निशि ' इति पा. । २. अयं कोष्ठस्थः पाठश्चक्रासंमतः ।

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७० चरकसंहिता है । तथा इसके विपरीत होने पर क्रमशः बाद की कषाय- कल्पनाओं का प्रयोग होता है अन्यथा औषधि के गुरु होने से रोगी के बल का भ्रंश होने तथा दोष के बढ़ने की सम्भावना रहती है । इसी विषय पर आगे विवेचन करते हुये चक्रपाणि ने यह मत प्रकट किया है कि सभी पुरुषों में स्वरसादि - कल्पनाओं का प्रयोग सम्भव भी नहीं है क्योंकि कुछ लोग स्वरस - द्वेषी होते हैं । ऐसी स्थिति में प्रयोग करने से अरुचि होने का भय रहता है । अन्त में चक्रपाणि ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया है कि कषाय- कल्पनायें केवल रोग तथा रोगी के बल पर ही निर्भर नहीं होतीं अपितु वह द्रव्य पर भी निर्भर करती हैं । उदाहरणार्थ उन्होंने मेध्य रसायन का निम्नांकित प्रकरण प्रस्तुत किया है -- ' मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः, क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् । रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्याः, कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्याः ॥ ' ( चि. अ. १ ) । इसमें मण्डूकपर्णी का स्वरस, मधुयष्टी का चूर्ण इत्यादि प्रयोग करने को बताया है । यहाँ कषाय कल्पनायें द्रव्य पर निर्भर कर रही हैं । पञ्चाशन्महाकषाया इति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा - जीवनीयो बृंहणीयो लेखनीयो भेदनीयः सन्धानीयो दीपनीय इति पट्कः कषायवर्गः, बल्यो वर्ण्यः कण्ठ्यो हृद्य इति चतुष्कः कषायवर्गः, तृप्तिघ्नोऽर्शोघ्नः कुष्टघ्नः कण्डून्नः क्रिमिनो विषघ्न इति षट्कः कषायवर्गः, स्तन्यजननः स्तन्यशोधनः शुक्रजननः शुक्रशोधन इति चतुष्कः कषायवर्गः, स्नेहोपः स्वेदोपगो वमनोपगो विरेचनोपग आस्थापनोपगोऽनुवासनोपगः शिरोविरेचनो-पग इति सप्तकः कषायवर्गः, छुर्दिनिग्रहणस्तृष्णानिग्रहणो हिक्कानिग्रहण इति त्रिकः कषाय-वर्ग:, पुरीषसंग्रहणीयः पुरीषेविरजनीयो मूत्रसंग्रहणीयो मूत्रविरजनीयो मूत्रविरेचनीय इति पञ्चकः कषायवर्गः, कासहरः श्वासहरः शोधहरो ज्वरहरः श्रमहर इति पञ्चकः कषाय-वर्ग:, दाहप्रशमनः शीतप्रशमन उदर्दप्रशमनोऽङ्गमर्दप्रशमनः शूलप्रशमन इति पञ्चकः कषायवर्गः, शोणितस्थापनो वेदनास्थापनः संज्ञास्थापनः प्रजास्थापनो वयःस्थापन इति पञ्चकः कषायवर्गः, इति पञ्चाशन्महाकपाया महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति । तेषामेकैकस्मिन् महाकषाये दश दशावयविकान् कषायाननुव्याख्यास्यामः, तान्येव पञ्च कषायशतानि भवन्ति ॥ ८ ॥

( ३ ) पचास महाकषाय तथा पांच सौ कषाय ( Fifty Classes of Decoctives & Five Hundred Decoctives ) पचास महाकषाय पूर्वोक्त पचास महाकषायों का अब व्याख्यान किया जा रहा है । वे निम्नांकित हैं— १. ' तृप्तिः श्लेष्मरोगः, येन तृप्तमिवात्मानं मन्यते, तद्नं तृप्तिन्नम् ' चक्रः । २. ' स्नेहोपगानीति स्नेहस्य सर्पिरादेः स्नेहनक्रियायां सहायत्वेनोपगच्छन्तीति स्नेहोपगानि, एवं वमनोपगादौ व्याख्येयं, शिरोविरेचनोपगे तु शिरोविरेचनप्रधानान्येव द्रव्याणि बोद्धव्यानि चक्रः । ३. ' पुरीषस्य विरजनं दोषसंबन्धनिरासं करोतीति पुरीषविरजनीयः, एवं मूत्रविरजनीयेऽपि व्याख्येयम् ' चक्रः । ४. ' शो-णितस्य दुष्टस्य दुष्टिमपहृत्य तं प्रकृतौ स्थापयतीति शोणितस्थापनं, वेदनायां संभूतायां तां निहत्य शरीरं प्रकृतौ स्थापयतीति वेदनास्थापनं, संज्ञां ज्ञानं च स्थापयतीति संज्ञास्थापनं, प्रजोपघातकं दोषं हत्वा प्रजां स्थापयतीति प्रजास्थापनं, वयस्तरुणं स्थापयतीति वयःस्थापनम् ' चक्रः । ' शोणितं स्थापयति अतिप्रवृत्तं स्तम्भयतीति शोणितस्थापनम् ' इति योगीन्द्रनाथसेनः ।

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षविरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ७१ क. ( १ ) जीवनीय, ( २ ) बृंहणीय, ( ३ ) लेखनीय, ( ४ ) भेदनीय, ( ५ ) सन्धानीय, ( सन्धानकारक ), ( ६ ) दीपनीय, इस प्रकार ६ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । ख. ( ७ ) बल्य, ( ८ ) वर्ण्य, ( ९ ) कण्ठ्य, ( १० ) हृद्य, इस प्रकार ४ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । ग. ( ११ ) तृप्तिघ्न, ( १२ ) अर्शोघ्न, ( १३ ) कुष्ठन्न, ( १४ ) कण्डून्न, ( १५ ) कृमिघ्न, ( १६ ) विषघ्न, इस प्रकार ६ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । घ. ( १७ ) स्तन्यजनन, ( १८ ) स्तन्यशोधन, ( १ ९ ) शुक्रजनन, ( २० ) शुक्रशोधन, इस प्रकार ४ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । ङ. ( २१ ) स्नेहोपग, ( २२ ) स्वेदोपग, ( २३ ) वमनोपग, ( २४ ) विरेचनोपग, ( २५ ) आस्थापनोपग, ( २६ ) अनुवासनोपग, ( २७ ) शिरोविरेचनोपग, इस प्रकार ७ कषाय-वर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । च. ( २८ ) छदिनिग्रहण, ( २ ९ ) तृष्णानिग्रहण, ( ३० ) हिक्कानिग्रहण, इस प्रकार ३ कषाय-वर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । छ. ( ३१ ) पुरीष संग्रहणीय, ( ३२ ) पुरीषविरजनीय, ( ३३ ) मूत्रसंग्रहणीय, ( ३४ ) मूत्र-विरजनीय, ( ३५ ) मूत्रविरेचनीय, इस प्रकार ५ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । ज. ( ३६ ) कासहर, ( ३७ ) श्वासहर, ( ३८ ) शोधहर, ( ३ ९ ) ज्वरहर, ( ४० ) श्रमहर, इस प्रकार ५ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । झ. ( ४१ ) दाहप्रशमन, ( ४२ ) शीतप्रशमन, ( ४३ ) उदर्द प्रशमन, ( ४४ ) अङ्गमर्द -प्रशमन, ( ४५ ) शूलप्रशमन ( शूल को शान्त करने वाला ), इस प्रकार ५ कषाय वर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । ञ. ( ४६ ) शोणितस्थापन, ( ४७ ) वेदनास्थापन, ( ४८ ) संज्ञास्थापन, ( ४ ९ ) प्रजा-स्थापन, ( ५० ) वयःस्थापन, इस प्रकार ५ कषायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ । इस प्रकार इन पचास महाकषायों की लक्षण और उदाहरण के रूप में व्याख्या की गयी है । इन महाकषायों के एक - एक वर्ग के अन्तर्गत दश दश कषायों की व्याख्या की जायगी । इस प्रकार ये ही पाँच सौ कषाय हो जाते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श - यहाँ प्रथम तथा तृतीय वर्ग में ६-६ महाकषायों का, द्वितीय तथा चतुर्थ वर्ग में ४-४ महाकषायों का, पांचवें वर्ग में ७ महाकषायों का, छठे वर्ग में ३ महाकषायों का, सातवें, आठवें, नवें और दसवें वर्ग में ५: महाकषायों का वर्णन है । इस प्रकार पचास महाकषायों का वर्णन किया गया है | ॐ तद्यथा— जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा काकोली क्षीरकाकोली मुद्गपर्णीमाषपण्य जीवन्ती मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्ति ( १ ), ( १ ) जीवनीय [ Nutrients ] महाकषाय - जैसे ( १ ) जीवक, ( २ ) ऋषभक, ( ३ ) मैदा, ( ४ ) महामेदा, ( ५ ) काकोली, ( ६ ) क्षीरकाकोली, ( ७ ) मुद्गपर्णी ( वनमूँग ), ( ८ ) माषपर्णी ( वनउड़द ), ( ९ ) जीवन्ती तथा ( १० ) मुलेठी, इन दश औषधियों को जीव-नीय गण कहते हैं । विमर्श - जो द्रव्य जीवन ( आयु ) के लिए हितकर हो उसे जीवनीय कहते हैं । शारीर क्रियाओं में निरन्तर जो शक्ति क्षीण होती रहती है वह इन द्रव्यों से पूर्ण होती रहती है और इसी चयापचय - व्यापार से जीवन का सञ्चालन होता है । यदि क्षति की

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७२ चरकसंहिता पूर्ति इन द्रव्यों से न हो तो जीवन नष्ट हो जाय । अतः जीवन के लिए आवश्यक होने के कारण इन्हें ' जीवनीय ' कहा गया हैं, यथा - ' जीवनम् आयुः तस्मै हितं जीवनीयम् ' । ( च. द. ) । दुग्ध जीवनीय द्रव्यों में सर्वोत्तम माना गया है, यथा- ' प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तम्- ' ( च. सू. २५ ) । जीवनीय द्रव्य पार्थिव, जलीय एवं प्रायः मधुररस और शीतवीर्य होते हैं, यथा - ' पृथिव्यापां गुणैर्युक्तं जीवनीयमिति स्थितिः । ' ( र. वै. भा. ) । डा ० वा. ग. देसाई ने जीवनीय को Restoratives की संज्ञा दी है । कुछ लोग जीवनीय की समता Vitamins से करने लगे हैं । यूनानी मत में जीवनीय द्रव्य को ' मुगज्जी ' कहते हैं 1 * क्षीरिणी राजक्षवकाश्वगन्धाकाको लीक्षीरकाकोलीवाड्यायनी भदौदनीभारद्वाजीपय-स्यगन्धा इति दशेमानि बृंहणीयानि भवन्ति ( २ ), ( २ ) बृंहणीय महाकपाय [ Weight - Promoting - Drugs or Roborants ] — ( १ ) क्षीरिणी ( क्षीरलता - चक्र ० - क्षीरविदारी ), ( २ ) राजक्षवक ( दुग्धिका - चक्र ० ), ( ३ ) असगन्ध, ( ४ ) काकोली, ( ५ ) क्षीरकाकोली, ( ६ ) वाट्यायनी ( श्वेतबला - चक्र ० - कंघी ), ( ७ ) भद्रौदनी ( पीतबला - चक्र ० ), ( ८ ) भारद्वाजी ( वनकपास ), ( ९ ) पयस्या ( विदारीकन्द ) और ( १० ) ऋष्यगन्धा ( विधारा ) इन दश औषधियों को बृंहणीयगण कहते हैं! विमर्श - चरक ने बृंहण द्रव्य को शरीर में रसादि धातुओं को बढ़ा कर स्थूलता उत्पन्न करने वाला बताया है । - ' बृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृंहणम् ' ( मू ० २२ ) । शरीर में अधिक भाग मांस का होता है । अतः ये मांस धातु को विशेष रूप से बढ़ाते हैं । गुरु, मृदु, स्निग्ध, सान्द्र, स्थूल, पिच्छिल, मन्द, स्थिर और लक्षण गुण तथा शीतवीर्य द्रव्य प्रायः बृंहण होते हैं, यथा — ' गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं स्थूलपिच्छिलम् । प्रायो मन्दं स्थिरं लक्षणं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ॥ ' ( च. सू. २२ ) । मांस पार्थिव होता है, यथा— ' मांसं पार्थिवम् ' ( च. द. ) । किन्तु पृथिवी में जलतत्त्व का आधिक्य होता है, यथा- ' बृंहणं पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठम् ’ ( सु. सू. ४१ ) । बृंहणीय द्रव्यों में मांस सर्वश्रेष्ठ बतलाया गया है, यथा - ' मांसं बृंहणीयानाम् ' ( च. सू. २५ ) । ' मांसमाप्यायते मांसेन ' ( च. शा. ६ ), ' शरीरबृंहणे नान्यत् खाद्यं मांसाद्वि-शिष्यते ' ( च. सू. २७ ) तथा ' मांसेनोपचिताङ्गानां मासं मांसकरं परम् ' ( च. चि. ८ ) । इन द्रव्यों का प्रयोग क्षीण - कृश व्यक्तियों में शरीर की वृद्धि के लिए किया जाता है, यथा- ' क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः । स्त्रीमद्यनित्या ग्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृता ॥ " ( च. सू. २२ ) । इसे यूनानी में ' मुसम्मिन वदन ' कहते हैं । मुस्तकुष्ठहरिद्रादारुहरिद्रावचातिविषाकटुरोहिणीचित्रकचिरबिल्व हैमवत्य दशेमानि लेखनीयानि भवन्ति ( ३ ), इति ( ३ ) लेखनीय महाकषाय [ Weight Reducing - Drugs or Revulsives ] — ( १ ) नागरमोथा, ( २ ) कूट, ( ३ ) हल्दी, ( ४ ) दारूहल्दी, ( ५ ) वच, ( ६ ) अतीस, ( ७ ) कटुकी, ( ८ ) चित्रक, ( ९ ) चिर बिल्व ( करञ्ज चक्र ० ) और ( १० ) हैमवती ( सफेद वच ) इन दश औषधियों को लेखनीय गण कहते हैं । विमर्श - जो द्रव्य शरीर को दुबला ( कृश ) बनावे तथा शरीर में हलकापन लावे उसे लंघन कहते हैं, यथा— ' यत्किचिल्लाघवकरं देहे तल्लंघनं स्मृतम् ' ( च. सू. २२ ) । इसका नाम ' लेखन ' या ' कर्शन ' भी हैं, यथा - ' धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नोरमुष्णं वचा यवाः ॥ ' ( शा. ) । ये द्रव्य वायु और अभि तत्वों से बने होते हैं, यथा-‘ लेखनमनिलानलभूयिष्ठम् ' ( सु. सू. ४१ ) तथा लघु, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, सर और

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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्याय: ४ ] सूत्रस्थानम् ७३ कठिनगुणयुक्त एवं उष्णवीर्य होते हैं, यथा- ' लघुष्णं तीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् | कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लंघनं स्मृतम् ॥ ' ( च. सू. २२ ) । वायु और अग्नि तत्त्व दोनों ही शोषक होते हैं तथा पृथिवी और जल ( मांसतत्त्व ) से विपरीत गुण वाले होने से विशेषरूप से मांसधातु को सुखाते हैं जिससे शरीर कृश होता है । बृहच्छरीर और वली पुरुषों में इसका प्रयोग होता है, यथा — ' बृहच्छरीरा बलिनो लंघनीया विशुद्धिभिः ' ( च. सू. २२ ) । * सुवहाकरुबूकाग्निमुखीचित्राचित्रक चिर बिल्वशङ्खिनीशकुलादनी स्वर्णक्षीरिण्य इति दशेमानि भेदनीयानि भवन्ति ( ४ ), ( ४ ) भेदनीय कषाय [ Purgatives ] - ( १ ) सुवहा ( निशोथ ), ( २ ) अर्क ( मदार ), ( ३ ) उस्बूक ( एरण्ड ), ( ४ ) अग्निमुखी ( लाङ्गलिया, चक्र ० - कलिहारी ), ( ५ ) चित्रा ( दन्ती चक्र ० ), ( ६ ) चित्रक, ( ७ ) चिरबिल्व, ( ८ ) शङ्खिनी ( श्वेतबुला - चक्र ० ), ( ९ ) शकुलादनी ( कटुरोहिणी - कटुका चक्र ० ) और ( १० ) स्वर्णक्षीरी ( भड़भाड़ ) इन दश औषधियों को भेदनीय गण कहते है । विमर्श - शार्ङ्गधर ने कटुकी को भेदन के उदाहरण में बताया है – ' मलादिकमबद्धं वा यद्वद्धं पिण्डितं मलैः । भित्त्वाऽधः पातयतिकद्भेदनं कटुकी यथा ॥ ' शरीर से मल और दोषों को निर्हरण करने वाले को भेदन द्रव्य कहते है । सामान्यतः शरीर के सब स्रोतों में जमे हुए कफाद दोष और विशेषतः आँतों में जमे हुये सूखे मल को तोड़ कर ढीला कर बाहर निकालने के लिये भेदन का प्रयोग होता है । रेचन कर्म का विस्तृत वर्णन नीचे किया जा रहा है । जो द्रव्य अधोमार्ग ( गुदा ) से दोषों को बाहर निकाले उसे रेचन या अधोभागहर कहते हैं, यथा - ' दोषहरणमधोभागं विरेचनसंज्ञकम् ' ( च. क. १ ) । इनके द्वारा अपक या पक पुरीष आदि दोष गुदमार्ग से बाहर निकल जाते है, यथा- ' विपक्कं यदपक्कं वा मलादि द्रवतां नयेत् । रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा ॥ ' ( शा. ) । रेचन द्रव्य सर्वरस, उष्णवीर्ण, तीक्ष्ण - सूक्ष्मगुणयुक्त तथा व्यवायी और विकाशी होते हैं, यथा- ' तत्रोष्णतीक्ष्णसूक्ष्मव्यवायिविकाशीन्यौषधानि ‘ “ अधःप्रवर्त्तते । ” ( च. क. १ ) । पांचभौतिक संघटन इनका पार्थिवाप्य होता है । पृथ्वी और जल महाभूत गुरु होते हैं और गुरुत्व के कारण अधोगामी स्वभाव के होते हैं, अतः ये नीचे की ओर से दोषों को बाहर निकालते हैं, यथा- ' विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठानि, पृथिव्यापो गुः ताः गुरुत्वादधो गच्छन्ति तस्माद्विरेचनमधोगुणभूयिष्ठमनुमानात् ' ( सु. सू. १४ ) । तथापि यह कर्म प्रभावजन्य माना गया है क्योंकि उपर्युक्त गुणों के रहने पर भी सब द्रव्य रेचन नहीं होते, यथा— ‘ गुरुत्वं चेह प्रभावविशेषाधिष्ठितं त्रिवृतादिसमवेतं ग्राह्यं न तु गुरुत्वमात्रम्, अन्यथा मत्स्यपिष्टान्न-मसूरादीनां विरेचकत्वं स्यात् ' ( च. द. ) । रेचन द्रव्यों का कर्म निम्नांकित प्रकार से होता है: - १. अशोष्य पार्थिव भाग का प्रभाव २. जल के शोषण में अवरोध बढ़ा कर यथा - पुरीषजनन द्रव्य, उत्पन्न कर, ३. क्षुद्रान्त्र तथा बृहदान्त्र क्षोभ उत्पन्न कर तथा ४. अन्त्रगत नाडी या पेशी को उत्तेजित कर । विभिन्न रेचन द्रव्यों का कर्म अन्त्र के विभिन्न भाग पर होता है और उनके प्रभावकाल में अन्तर होता हैं । कुछ द्रव्य शीघ्र रेचन करते हैं तथा कुछ विलम्ब से । क्षुद्रान्त्र से जिनकी क्रिया प्रारम्भ हो जाती है वे शीघ्र ही रेचनकर्म करते हैं यथा एरण्डतैल और बृहदन्त्र से जिनकी क्रिया प्रारम्भ होती है वे विलम्ब से रेचन करते हैं यथा - कुमारीसत्त्व, सनाय आदि । १. ' सरला ' इति यो ० ।

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७४ चरकसंहिता प्रायः रेचनद्रव्य मुखमार्ग से लेने पर प्रभावशाली होते हैं किन्तु कुछ द्रव्यों का कर्म अन्य मार्गों से देने पर भी प्रकट होता है यथा सनाय, एलुआ और इन्द्रायण का अधस्त्वक् ( Subcutaneous ) प्रयोग करने पर भी रेचन होता है क्योंकि इनका निर्हरण और उत्सर्ग अन्त्र से होता है । इसी प्रकार जयपाल - तैल त्वचा पर रगड़ने से ही रेचन करता है । चेनकी ( हरीतकी की एक जाति ) के संबन्ध में भी लिखा है कि हाथ में लेने से या उसकी छाया में स्थित होने से रेचन होता है । उनके रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श से भी रेचन होता है, यथा - ' काचिदास्वाद-मात्रेण काचिद्गन्धेन भेदयेत् । काचित् स्पर्शेन दृष्टयान्या चतुर्धा भेदयेच्छिवा ॥ ' ( भा. प्र. ) । श्रेष्ठ विरेचन वही है जिसमें पुरीष, पित्त, कफ और वायु इस क्रम से दोष निकलें, स्रोतों की शुद्धि हो जाय किन्तु कोई उपद्रव न हो, अग्नि दीप्त हो, शरीर में शक्ति, लघुता और प्रसन्नता का अनुभव हो, यथा - ' स्रोतोविशुद्धीन्द्रियसम्प्रसादो लघुत्वमूर्जोऽग्निरनामयत्वम् । प्राप्तिश्च विपित्तकफानिलानां सम्यग्विरिक्तस्य भवेत् क्रमेण ॥ ' ( च. सि. १ ) । डा ० घोष ने आदर्श रेचक के गुण इस प्रकार बनाये हैं ' An ideal purgative should not have any other effect except on the intestines. It should not irritate the stomach, but should become active only when it reaches the intestine. It should not be easily absorbed so slowly that it can exert its effect throughout intestine. ' ( R. Ghosh - Materia Medica ) विरेचन का प्रयोग निम्नांकित प्रयोजनों के लिए किया जाता है - १. विबन्ध में पुरीषसंचय को दूर करना । २. शोथरोग में रक्तवारि को धातुओं से खींचना । ३. ज्वर में तापक्रम को कम करना । ४. रक्तभार को कम करना । ५. अर्श आदि गुदमार्ग के रोगों में पुरीषनिर्हरण में सुविधा प्रदान करना । ६. पित्त एवं पित्ताश्मरी को बाहर निकालना । ७. रक्तगत मलपदार्थ ( यूरिया, यूरिकएसिड आदि ) को बाहर निकालना | ८. अन्त्रगत क्षोभक या हानिकर पदार्थों को बाहर निकालना यथा अन्नविष, अन्त्रगत पूति, अतिसार आदि । पित्त के निर्हरण के लिये विरेचन सर्वश्रेष्ठ माना गया है, यथा- ' शेषास्तु विरेच्या: - कुष्ठज्वर मेहोर्ध्वरक्तपित्तपित्त-व्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोक्ताश्च, एनेषु हि विरेचनं प्रधानतममित्युक्तमग्न्युपशमेऽग्निगृहवत् ' ( च. सि. २ ) तथा ' विरेचनं पित्तहरागाम् ' ( च. सू. २५ ) । चरक ने विरेचन द्रव्य के तीन भेद किये हैं: - १. सुखविरेचन - यथा त्रिवृत् । २. मृदुविरेचन - यथा अमलतास । ३. तीक्ष्ण-विरेचन - यथा स्नुहीदुग्ध । यथा - ' त्रिवृत् सुखविरेचनानाम्, चतुरंगुलों मृदुविरेचनानाम्, स्नुकपय-स्तीक्ष्णविरेचनानान् । ' आधुनिक दृष्टि से, विरेचन द्रव्यों का निम्नांकित वर्गीकरण किया गया है: -विरेचन १. नाडीपेशीयंत्र पर कर्न करने वाले २. अन्नगत पदार्थ का परिणाम बढ़ाने वाले यथा पीयूषीन आदि । ३. क्षोभक पुरीषजनन ( इसबगोल, बेलफल आदि ) लवणविरेचन ( मैगसल्फ आदि ) १. मृदुरेचन २. सुखविरेचन ३. तीक्ष्ण " ४. पित्त " १. लवणविरेचन ( Saline purgatives ) - लवण द्रव्य के कारण आँतों से बहुत सा जल खिंचकर अन्त्रनलिका में आ जाता है जिससे परिसरणगति बढ़ने के कारण पाखाना होता है ।

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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ७५ इससे पुरीष पतला जलीय आता है । २. मृदुविरेचन ( Laxatives ) – इनसे पुरीष कोमल होता है तथा परिसरणगति थोड़ी सी बढ़ जाती है जिससे पाखाना होता है । इसमें पुरीष अपक्क नहीं आता । इसके उदाहरण अमलतास, एरंडतैल, तुरंजबीन, गंधक, अंजीर, आलूबुखारा, हरीतकी, जैतून का तैल आदि हैं । इसे सर या अनुलोमन भी कहते हैं, यथा - ' कृत्वा पाकं मलानां यद् भित्त्वा बन्ध-मधो नयेत् । तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हारीतकी ॥ ' ( शा. ) । ३ सुखविरेचन ( Simple and Anthracene Purgatives ) - ये न अत्यन्त मृदु होते हैं और न अत्यन्त तीक्ष्ण होते हैं | अतः सुखपूर्वक दोषों का निर्हरण करते हैं यथा त्रिवृत् ( अरुण ), एलुआ, रेवन्दचीनी, सनाय आदि । इसकी क्रिया मृदुविरेचन की अपेक्षा कुछ तीव्र होती है अतः इसके द्वारा पक्क तथा अपक्क दोनों मल निकलते हैं । इसे ' मन ' भी कहते हैं, यथा- ' पक्तव्यं यदपक्त्वैव ऋिष्टं कोष्ठे मलादिकम् । नयत्यधः सनं तद्यथा स्यात् कृतमालकः ॥ ' ( शा. ) । ४. तीक्ष्णविरेचन ( Drastic Purgative ) - ये सबकी अपेक्षा तीक्ष्ण होते हैं अतः इनकी क्रिया तीव्र होती है जिससे अन्त्र में दाह एवं मरोड़ होकर पतला मल निकलता है यथा जलापा, जयपाल, इन्द्रायण, स्नुही, त्रिवृत् ( श्याम ) आदि । इसे भेदन भी कहते हैं । ५. पित्तविरेचन ( Cholagogue Purgatives ) - इनकी यकृत् और ग्रहणी पर उत्तेजक क्रिया होती है जिससे पित्त अधिक मात्रा में स्रुत होकर पुरीष के साथ बाहर निकलता है यथा पारद, एलुआ, रेवन्दचीनी, कुटकी आदि । यूनानी में मृदुविरेचन को ' मुलय्यिन ' तथा तीक्ष्णविरेचन को ' मुसहिल ' कहते हैं । मधुकमधुपर्णीपृश्निपर्ण्यम्बष्ठकीसमङ्गामोचरसधातकीलोध्रप्रियङ्गुकट्फलानीति दशे-• मानि सन्धानीयानि भवन्ति ( ५ ), ( ५ ) सन्धानीय महाकषाय [ Union - Promoters ] ( १ ) मुलेठी, ( २ ) गिलोय, ( ३ ) पिठिवन, ( ४ ) अम्बष्ठकी ( पाठा ), ( ५ ) मजीठ, ( ६ ) मोचरस, ( ७ ) धाय का फूल, ( ८ ) लोध, ( ९ ) प्रियङ्गु और ( १० ) कायफर इन दश औषधियों को सन्धानीय गण कहते हैं । विमर्श - भग्न या विच्छिन्न रक्त, मांस अस्थि आदि धात्वयवों को जोड़ने में सहायक द्रव्य ' सन्धानीय ' कहलाता है, यथा- ' सन्धानाय भग्नसंयोजनाय हितं सन्धानीयम् ' ( ग ) । सन्धानीय गण में विशेषतः कषाय द्रव्य हैं जो विच्छिन्न धात्ववयवों को संकुचित कर परस्पर मिला देते हैं, यथा - ' व्रणं कषायः सन्धत्ते ' ( सु. सू. १५ ) । पिप्पलीपिप्पलीमूलच व्यचित्रकशृङ्गवेराम्लवेतसमरिचाजमोदाभल्लातकास्थिहिङ्गुनिर्या-सा इति दशेमानि दीपनीयानि भवन्ति ( ६ ), इति षट्कः कषायवर्गः ॥ ९ ॥

( ६ ) दीपनीय महाकषाय [ Stomachics and_Digestives ] ( १ ) पिप्पली, ( २ ) पीपरामूल, ( ३ ) चव्य, ( ४ ) चित्रक, ( ५ ) अदरख, ( ६ ) अम्लवेतस, ( ७ ) मरिच, ( ८ ) अजमोदा, ( ९ ) भिलावा की गुठली तथा ( १० ) हिंजु, इन दश औषधियों को दोपनीय गण कहते हैं । यह ६ महाकषायों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ ९ ॥

विमर्श - ' पचेन्नामं वह्निच्च दीपनं तद्यथा मिशि: । ' ( शा. ) के अनुसार जो द्रव्य अग्नि को दीप्त कर आम का पाचन करे उसे दीपन द्रव्य कहते हैं । यह क्षुधा उत्पादक है परन्तु पाचक नहीं है । ये द्रव्य आग्नेय होते हैं । सम्भवतः दीपन द्रव्य क्षुधा रस ( Psychic or Appetite juice ) को बढ़ा देते हैं तथा इसी से भूख लगती है और इससे पाचन की अवस्था प्रारम्भ हो जाती है । इसे यूनानी में ' मुस्तही ' और आधुनिक चिकित्सा पद्धति में ‘ Stomachics ' कह सकते हैं । शार्ङ्गधर ने दीपन के लिए शतपुष्पा का उदाहरण दिया है ।

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७६ चरकसंहिता चरक ने केवल दीपनीय महाकषाय का वर्णन किया है पाचनीय महाकषाय का नहीं । जब कि शार्ङ्गधर, भावप्रकाश इत्यादि ग्रन्थों में दीपन तथा पाचन दो कर्मों का अलग - अलग वर्णन किया गया है । वस्तुतः दीपन और पाचन एक ही कर्म की अवस्थायें माननी चाहिये । अतएव चरकोक्त दीपनीय महाकषाय में ही पाचन द्रव्यों का भी अन्तर्भाव समझना चाहिये । शार्ङ्गधर के अनुसार पाचन को परिभाषा निम्नलिखित है - ' पचत्यामं न वह्नि च कुर्याद्यत्तद्धि पाचनम् । नागकेशरवद् विद्याद् । ' पाचन द्रव्य आमाशयिक रस के स्राव को बढ़ाकर पाचन कराते हैं । आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार इन्हें Digestives कह सकते है । दीपन और पाचन सम्बन्धी विस्तृत विवरण नीचे दिया जा रहा है । जिन द्रव्यों से अग्नि ( जाठराग्नि ) दीप्त होती ( बढ़ती ) है उसे ' दीपन ' कहते है, यथा - ' दीपनाय वह्नरुद्दीपनाय हितम् ' ( ग. ) । ' दीपनम् अन्तरग्नेः संधुक्षणं तस्मं हितं दीपनीयम् ' ( यो ) । अनि मन्द होने पर भूख कम हो जाती और पुरुष भोजन कम करता है । ऐसी स्थिति में प्रयुक्त होने पर ये द्रव्य लाभकर होते हैं और इनमें भूख बढ़ती है किन्तु इनसे अन्न का पाचन नहीं होता, यथा — ' यदग्नि-कृत् पचेन्नामं दीपनं तद्यथा घृतम् । दीपनं ह्यग्निकृत्त्वामं कदाचित् पाचयेन्न वा ॥ ' ( अ.हृ. ७ ) । ये द्रव्य आग्नेयस्वभाव, कटु, अम्ललवणरस, उष्णवीर्य तथा तीक्ष्ण- उष्ण - लघुगुण युक्त होते हैं, यथा— ' दीपनमग्निभूयिष्ठं तत्समानत्वात् ' ' पित्तलान् रसान् गुणांश्च दीपनीयम्, तदाग्नेयम् । " ( र. वै. ४ ) तथा ' कटुकाम्ललवणान् रसान्, तीक्ष्णोष्णलघून् गुणांश्चाश्रितमिति, तदग्निनैव निर्वर्त्यम् ' ( भा. ) । कुछ आचार्यों ने इनमें वायु और पृथिवी का बाहुल्य माना है, यथा-' पृथिव्य निलबाहुल्याद्दीपनं परिचक्ष्म हे ' ( भा. ) । मेरे विचार से इसमें अग्नि और वायु की प्रधानता होती है अतएव प्रारम्भ में अग्नि कम रहने पर दीपन कार्य करता है किन्तु जब अग्नि बढ़ जाती है तब उष्णता से वायु की शान्ति हो जाती है । समान वायु का कार्य अग्नि - संयुक्षण हैं, यथा - ' समानेनावधूनोऽग्निरुद्रर्यः पवनेन तु । काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुविवृद्धये ॥ ” ( च. चि. १५ ) और लोक में भी अग्नि का दीपन वायु के द्वारा होता है । इसके उदाहरण सौंफ, मरिच आदि हैं । आधुनिक दृष्टि से, आमाशय का स्राव प्राणदा के स्रावक सूत्रों से नियन्त्रित होता है । प्राणदा नाडी को उत्तेजित करने से आमाशयिक रस का स्राव बढ़ जाता है । प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि आमाशय में भोजन न रहने पर भी केवल रूप या गन्ध से प्रेरिन बात के प्रभाव के कारण आमाशय का स्राव होने लगता है । प्राणदा नाडी के स्रावक सूत्र की उत्तेजना से जो स्राव होता है उसे ' क्षुधारस ' ( Psychic or appetite juice ) कहते हैं । इसीसे भूख लगती है और इससे पाचन की अवस्था भी प्रारम्भ हो जाती है किन्तु वास्तविक पाचन आगे होने वाले स्राव से होता है, यथा - ' It is evident that sensation of taste, odour, etc reflexly stimulates the secretory fibres of vagus, the secretion so induced is termed psychic or appetite secretion. This secretion initiates gastric digestion which is supplemented by further secretion arising in the stomach itself ' ( R. Ghosh - Matera Medica ) । मेरे विचार से दीपन द्रव्य क्षुधारस को बढ़ाते हैं । कटु, अम्ल आदि द्रव्य प्राणदा को उत्तेजित करते हैं और उससे क्षुधारस का स्राव बढ़ जाता है । दीपन द्रव्य निम्नांकित प्रकार से कार्य करता है: -१. मुखगत नाड़ियों को उत्तेजित कर क्षुधारस बढ़ाने से -- यथा रुचिकर भोजन, कटु, तिक्त आदि । २. प्रागदा के स्रावक सूत्रों को उत्तेजित करने से - यथा पाइलोकार्पाइन आदि । ३. आमाशय के

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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ७७ ( Fundus ) को उत्तेजित करने से - यथा मद्य । ४. आमाशय के मुद्रिकाभाग ( Pylorus ) उत्तेजित करने से --यथा मांससत्त्व आदि । क्षार भोजन के पूर्व प्रयुक्त होने से आमाशयिक रस को बढ़ाते हैं । यूनानी में दीपन द्रव्यों को ' मुस्तही ' भी कहते हैं । अभ्यवहरण ( बुभुक्षा ) और जरण ( पाचन ) ये दोनों जठराग्नि के कार्य हैं । इन्हीं दोनों कार्यों के आधार पर दीपन- पाचन का विभाग किया गया है । दीपन द्रयों से अभ्यवहरण शक्ति बढ़ती है और पाचनद्रयों से जरणशक्ति बढ़ती है । इसी को कुछ आचार्यों ने यह भी लिखा है कि जो अग्नि को दीप्त करे किन्तु आम ( अपक्क अन्न ) का पाचन न करे उसे दीपन कहते हैं । सुश्रुत ने - सामान्य विशेष न्याय से ( अग्निवर्धक होने से ) आग्नेय द्रव्यों को दीपन माना है । ऐसा प्रतीत होता है कि दीपन - पाचन दोनों को दृष्टि में रख कर सुश्रुत ने ऐसी व्यवस्था की है । नागार्जुन ने भी ऐसा ही किया है । किन्तु इस प्रकार पाञ्चभौतिक संघटन की दृष्टि से दोनों का भेद स्पष्ट नहीं होता । कुछ आचार्य पृथिवी और वायु की अधिकता से दीपन तथा वायु और अग्नि की अधिकता से पाचन कर्म मानते हैं । अन्यत्र एक दृष्टान्त द्वारा दोनों के भेद को स्पष्ट करने की चेष्टा की गई है । जिस प्रकार एक ही अग्नि पाक में विभिन्न रूपों से भिन्न - भिन्न कार्य करती है उसी प्रकार जठराग्नि भी विभिन्न रूपों में भिन्न - भिन्न कार्यों के सम्पादन में समर्थ होती है । जैसे दीपक में स्थित अग्नि केवल प्रकाश का कार्य कर सकती है किन्तु उससे रसोई बनाने का कार्य नहीं हो सकता इसी प्रकार इन्धन की अग्नि से ओदन का पाक कर्म तो होता है किन्तु उससे प्रकाश नहीं हो सकता । आढमल ने इसका समाधान प्रभाव से किया है । इस प्रकार विभिन्न आचार्यों के विविध मतों के पर्यालोचन से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि दीपन और पाचन वस्तुतः एक ही कर्म की दो अवस्थायें हैं । दीपन प्रथम और पाचन द्वितीय अवस्था है । दीपन में अग्नि कम उद्दीप्त रहती है अतः उसमें इतनी शक्ति नहीं होती कि उससे पाचन का कार्य हो सके, उससे केवल भूख लगती है, जैसे दीपक से केवल प्रकाश हो सकता है उससे पाककर्म नहीं हो सकता क्योंकि उसमें ताप की मात्रा कम होती है । पाचन में अग्नि अधिक उद्दीप्त होती है जिससे पाचन का कर्म तो होता है किन्तु उससे क्षुधा की संज्ञा जाग्रत नहीं होती क्योंकि इसके लिए मृदु और विशिष्ट अग्नि चाहिए ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाश के लिए ताप मृदु और विशिष्ट रूप का होना चाहिए । पाञ्चभौतिक संघटन की दृष्टि से भी, दीपन लोक - पाचन में भी अग्निवाय्वात्मक हैं किन्तु दीपन में वायु की प्रधानता है और पाचन में अग्नि की । वायु के द्वारा अग्नि का दीपन होता है और अग्नि के द्वारा वस्तुओं का पाचन । ऐन्द्रधृषभ्यतिरसर्प्यप्रोक्तापयस्याश्वगन्धास्थिरारोहिणीबलातिबला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ( ७ ), ( ७ ) त्रल्य महाकषाय [ Tonics ] - ( १ ) ऐन्द्री ( गोरक्षकर्कटी चक्र ० ), ( २ ) ऋपभी ( शूकशिम्बा चक्र ०, के त्रांच का वीज ), ( ३ ) अतिरसा ( शतावरी चक्र ० ), ( ४ ) ऋभ्यप्रोक्ता ( मांसवर्णी ), ( ५ ) पयस्था ( क्षीरविदारी या काकोली चक्र ० ), ( ६ ) असगन्ध, ( ७ ) स्थिरा ( सरिवन ), ( ८ ) रोहिणी ( कटुकी ), ( ९ ) वला तथा ( १० ) अतिबला ( कंघी ), इन दश औषधियों को बल्य कहते हैं । विमर्श - जो द्रव्य शरीर के बल ( शक्ति- Vitality ) को बढ़ाते हैं उन्हें ' बल्य ' कहते हैं । बल ओज का कार्य माना गया है । ओज के ही कारण शरीर में बल रहता है । बल के अभाव में शरीर अपने कर्मों में असमर्थ तथा क्रमशः नष्ट हो जाता है । इसके दो वर्ग किये गये हैं: -( क ) सामान्य – ये शरीर के सभी अड़ों की सामान्यतः शक्ति बढ़ाते हैं यथा कपिकच्छू,