चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 171–180
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 171–180
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७८ चरकसंहिता शतावरी आदि । ये धातुवर्धक द्रव्य हैं,.. अतः इनसे ओज अधिक बनने के कारण शरीर को बल अधिक मिलता है । ( ख ) विशिष्ट - कुछ द्रव्य विशिष्ट अङ्गों को बल देते हैं यथा - आमाशय -तिक्त द्रव्य, हृदय - अर्जुन, पेशी – कषायाम्ल, सुषुम्ना - कुपीलु, नाडीसंस्थान --- तगर, रक्त - लौह । यूनानी में बल्य द्रव्यों को ' मुकब्बी ' कहते हैं । चन्दनतुङ्गपद्मकोशीरमधुकमञ्जिष्ठासारिवापयस्यासितालता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ( ८ ), ( ८ ) वर्ण्य महाकषाय [ Complexion - Promoters ] - ( १ ) चन्दन ( श्वेत चन्दन ), ( २ ) तुङ्ग, ( नागकेशर ), ( ३ ) पद्मक ( पद्मकाठ ), ( ४ ) खस, ( ५ ) मुलेठी, ( ६ ) मजीठ, ( ७ ) सारिवा ( अनन्तमूल ), ( ८ ) पयस्या ( क्षीरविदारी ), ( ९ ) सिता ( श्वेत दूर्वा ), तथा ( १० ) लता ( श्याम दूर्वा ) इन दश औषधियों को वर्ण्य कहा जाता है । विमर्श -- शरीर के वर्ण को प्राकृत अवस्था में लाने वाले द्रव्य को वर्ण्य गण कहा जाता है । अष्टाङ्गसंग्रह में भी लगभग यही द्रव्य वर्ण्य माने गये हैं - ' चन्दनतुङ्गपयस्यासितालतामधुकपद्म-' कोशीरम् । वर्ण्यो गणोऽयमुदितो मञ्जिष्ठासारिवासहितः ॥ ' ( सू. अ. १५ ) । सुश्रुत ने सू ० अ ० ३८ में लोधादिगण और एलादिगण को वर्णप्रसादन कहा है । भ्राजक पित्त के कारण अवभासिनी त्वचा में वर्ण की स्थिति होती है । पित्त का विकार ( वृद्धि या क्षय ) होने पर त्वचा का वर्ण विकृत हो जाता है । इसके कारण त्वचा का वर्ण पीत, रक्त, नील हो जाता है | वायु और कफ भी विकृत होकर भ्राजक पित्त के प्रमाण में अन्तर उत्पन्न कर क्रमशः श्यावारुण तथा शुक्लवर्ण उत्पन्न करते हैं । पित्त दुष्ट होकर रक्त को भी दूषित करता है और उससे भी त्वचा के वर्ण में विकार आते हैं । रक्ताल्पता से भी त्वचा का वर्ण पांडुर हो जाता है । वर्ण्य द्रव्य इन सब विकारों में लाभकर होता है । ये द्रव्य विशेषरूप से पित्त को ठीक करते हैं और उसके द्वारा रक्त की भी शुद्धि होती है । इनमें सारिवा, मञ्जिष्ठा, चन्दन आदि मुख्य हैं । रसवैशेषिक ने ' वर्ण्य ' के लिए ' वर्चस्व ' शब्द का प्रयोग किया है । सारिवेक्षुमूलमधुकपिप्पलीद्राक्षाविदारी कैटर्यहंस पादी बृहतीकण्टकारिका इति दशेमानि कठ्यानि भवन्ति ( ९ ), ( ९ ) कट्य महाकषाय [ Voice - Promoters ] - ( १ ) सारिवा ( अनन्तमूल ), ( २ ) ईख की जड़, ( ३ ) मुलेठी, ( ४ ) पिप्पली, ( ५ ) मुनक्का, ( ६ ) विदारीकन्द, ( ७ ) कायफल, ( ८ ) हंसपदी, ( ९ ) वनभंटा तथा ( १० ) कण्टकारी ( रैंगनी ), इन दश औषधियों को कण्ट्य कहा जाता है 1 विमर्श - कण्ठ ( स्वर ) को ठीक करने वाले द्रव्य को ' कण्ठ्य ' या ' स्वर्य ' कहते हैं, यथा— ' कण्ठाय हितं कण्ट्यम् ' ( यो. ) तथा ' कण्ठस्थितस्वराय हितं कण्ट्यम् ' ( ग ) । स्वर के विकार ( स्वरभेद ) यों तो त्रिदोषजन्य होते हैं किन्तु उन सब में कफ की प्रधानता होती है । कण्ट्य द्रव्य कफन और कफनिःसारक होने से कण्ठ को शुद्ध करते हैं आम्राम्रातकलिकुचकर मर्दवृक्षाग्लाम्लवेतस कुवलबदर दाडिममातुलुङ्गा नीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ( १० ), इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ १० ॥
( १० ) हृद्य महाकाय [ Cardiac Tonics ] - ( १ ) आम, ( २ ) आमड़ा, ( ३ ) बड़हर, ( ४ ) करौंदा, ( ५ ) वृक्षाम्ल, ( ६ ) अम्लवेतस, ( ७ ) कुवल ( बड़ी बेर ), ( ८ ) बदर ( वेर ), ( ९ ) दाडिम ( खट्टा अनारदाना ), ( १० ) मातुलुङ्ग, ये दश औषधियाँ हृद्य हैं । इस प्रकार इन चार महाकपायवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १० ॥
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पद्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ७६ विमर्श - हृदय चेतनास्थान है तथा उसमें पर ओज की स्थिति मानी गई है । यही ओज जीवन का आधार है । इसके अतिरिक्त, हृदय रस- रक्त का संवाहक यन्त्र होने से शारीर धातुओं के पोषण में प्रमुख भाग लेता है । यद्यपि इसका संकोच विकास स्वतः हुआ करता है तथापि इसकी क्रियाओं का नियमन नाडीकेन्द्रों के द्वारा होता है । दो केन्द्र हत्कार्य का नियन्त्रण करते है: - एक रोधक और दूसरा बर्धक रोधक केन्द्र प्राणदा ( परसांवेदनिक ) नाटी के द्वारा हृदय की गति को कम करता है तथा वर्धक केन्द्र सांवेदनिक सूत्रों द्वारा उसकी गति को बढ़ाता है । इस प्रकार दोनों केन्द्रों के परस्पर विरोध एवं सहयोग से हृत्कार्य का नियमन होता रहता है । आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से, वात, पित्त और कफ इन तीनों का विशिष्ट स्थान हृदय है । प्राणवायु, साधक पित्त एवं अवलम्बक कफ का स्थान हृदय बतलाया गया है । प्राणवायु ( Oxygen ) हृदय में विशेषरूप से रहता है । इसमें तनिक भी कमी होने से हत्येशी ठीक कार्य नहीं कर सकती । प्राणवायु के उचित परिमाण में रहने पर हृदयस्थ साधक पित्त प्रोटीन ( मांसतत्त्व ) तथा कार्बोहाइड्रेट ( शाकतत्त्व ) का पाचन ( रूपान्तर ) करता है जिससे ऊष्मा और शक्ति प्राप्त होती है । हृदयस्थ अवलम्बक कफ हृदय के विश्राम एवं परिश्रम के समय हृदय को आवश्यक शक्ति ( Rest & Reserve force ) प्रदान करता है । इसका क्षय होने पर श्वासकष्ट, शोष आदि अनेक वातिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं । हृदय को बल प्रदान करने वाले द्रव्य हृद्य ( Cardiac Tonic ) कहलाते हैं यथा अर्जुन, स्वर्ण, मुक्ता आदि । ये द्रव्य हृदयगत ओज एवं अवलम्बक कफ को बढ़ाते हैं, अतः अधिकांश हृद्य द्रव्य शीतवीर्य होते हैं । इनसे हृदय को स्थायी शक्ति प्राप्त होती है और उसकी गति में स्थिरता आती है । कुछ द्रव्य उभी होते हैं जो ऊष्मा उत्पन्न करते हैं और जिनसे हृदय को कार्यकारी शक्ति प्राप्त होती है । इसके उदाहरण वनपलाण्डु, करवीरमूल आदि हैं । हृदय को उत्तेजित कर उसकी गति को बढ़ाने वाले द्रव्य हृदयोत्तेजक ( Cardiac Stimalant ) कहलाते हैं यथा अद्रिनिलीन, सोन आदि । ये द्रव्य निम्नांकित प्रकार से कार्य करते है: - १. सांबेदनिक केन्द्र को उत्तेजित करने से यथा कोकेन, मानसिक भावावेश आदि । २. नाटियों को उत्तेजित करने सेवा सोम, सूची आदि । ३. नाडीगण्डों पर कार्य करने से— यथा तम्बाकू आदि । ४. हृत्पेशी पर कार्य करने से - यथा कैफीन, हृत्पत्री ( अतिमात्रा में ) आदि । ये द्रव्य उष्ण और रूक्ष गुण वाले होते हैं जिससे वायु और पित्त दोनों की वृद्धि होती है । पित्त ऊष्मा को और वायु गति को बढ़ा देता है । गति बढ़ने पर भी उष्ण और रूक्ष ये दोनों गुण ओज के विपरीत हैं अतः हृदयस्थ ओज पर हानिकर प्रभाव होता है । हृदय को अवसादित कर उसकी गति को कम करने वाले द्रव्य हृदयावसादक ( Cardiac depressant ) कहलाते हैं यथा अहिफेन, हृत्पत्री आदि ये द्रव्य भी रूक्षता से बात को बढ़ाते हैं किन्तु यह वात प्रभावतः हृदय को अवसादित करता है जिससे उसकी गति मन्द हो जाती है । गति कम होने से कफ का संचय होता है और उसका अवलम्बन कर्म होने के कारण तथा ओज के समान गुण होने के कारण इन द्रव्यों से हृदय को कुछ विश्राम और शक्ति प्राप्त होती है । इनका अतिमात्रा में प्रयोग करने पर हृल्लास, अरुचि, छर्दि, अतिसार, मन्द नाडी आदि विषाक्त लक्ष होते है ये द्रव्य निम्नांकित प्रकार से अपना कर्म करते है: -१. प्राणदा नाहीकेन्द्र को प्रभावित करने से यथा वत्सनाभ, हत्पत्री, कुपीतु आदि । २. नाहीगण्डों पर कार्य करने से यथा तम्बाकू ( अश्प मात्रा में ) आदि । ३ नाडियों पर कर्म करने से यथा हृत्पत्री आदि । ४. हृत्पेशी पर कर्म करने से -- यथा हृत्पत्री, वत्सनाभ, पीयूषग्रन्थि आदि ।
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चरकसंहिता धमनियों में रक्तभार बढ़ाने वाले द्रव्य रक्तभार - वर्धक कहलाते हैं, यथा कुपीलु, हृत्पत्री आदि । ये द्रव्य उष्णवीर्य होते हैं जिससे पित्त बढ़ कर समानधर्मी रक्त ( भार ) को बढ़ा देता है । कुछ द्रव्य लघुना और रुक्षता से वायु को बढ़ा कर हृदय की गति बढ़ा देते हैं तथा रक्तवाहिनियों में संकोच उत्पन्न करते हैं जिससे रक्तभार बढ़ जाता है । रक्तभार निम्नांकित कारणों से बढ़ता है: -१. सूक्ष्म धमनियों के संकोच से । २. हृदय का रक्तनिर्यात बढ़ने से । ३. रक्त का परिमाण बढ़ने से । ४. रक्त की सान्द्रता बढ़ने से । इनके विपरीत कारणों से रक्तभार कम होता है । रक्तभार-वर्धक द्रव्य निम्नांकित प्रकार से कार्य करते हैं: - १. रक्तवाहिनी चालक - केन्द्र को उत्तेजित करने से — यथा कुपीलु, हृत्पत्री आदि । २. रक्तवाहिनी - चालक नाडियों पर कार्य करने से - यथा अद्रिनिलीन, सोम आदि । ३. रक्तवाहिनियों की पेशियों पर कर्म करने से - यथा हृत्पत्री, पीयूषीन आदि । विशेषतः रक्तवाहिनियों में संकोच उत्पन्न कर ये द्रव्य रक्तभार को बढ़ाते हैं अतः इन्हें रक्तवाहिनी - संकोचक ( Vaso - constrictors ) कहते हैं । रक्तभार को कम करने वाले रक्तभारशामक कहलाते हैं यथा सर्पगन्धा आदि । इनमें कुछ द्रव्य तो शीतवीर्य एवं पित्तसंशोधन होते हैं जिससे रक्त ( भार ) की शान्ति होती है और कुछ द्रव्य रूक्ष और लघु होने के कारण वायु को बढ़ाते हैं जिससे रक्तवाहिनियों का प्रसार होकर रक्तभार कम होता है । ये द्रव्य निम्नांकित प्रकार से कर्म करते हैं: - १. रक्तवाहिनी - चालक - केन्द्र को अवसादित करने से - यथा मादक द्रव्य आदि । २. धमनी - पेशियों पर कार्य करने से— यथा सोमल ( अतिमात्रा में ) । ३. रक्त का परिमाग घटा कर यथा रक्तमोक्षण, रेचन, स्वेदन आदि । स्वेदन से प्रथम तो रक्तभार उष्णता के कारण बढ़ता है किन्तु बाद में स्वेदागम से जलांश के निकलने पर रक्त की सान्द्रता बढ़ जाने के कारण वह कम हो जाता | ये द्रव्य विशेषतः रक्तवाहिनियों का प्रसार कर कार्य करते हैं अतः रक्तवाहिनी - प्रसारक ( Vasodilators ) कहलाते हैं । नागरचव्यचित्रकविडङ्गमूर्वागुडूचीव चामुस्त पिप्पलीपटोलानीति दशेमानि तृप्तिम्नानि भवन्ति ( ११ ), ( ११ ) तृप्तिन्न महाकपाय [ Appetisers ] - ( १ ) सोंठ, ( २ ) चव्य, ( ३ ) चित्रक, ( ४ ) वायविडङ्ग, ( ५ ) मूर्वा, ( ६ ) गिलोय, ( ७ ) वच, ( ८ ) नागरमोथा, ( ९ ) पिप्पली, ( १० ) पटोल, ये दश औषधियाँ तृप्तिघ्न होती है । विमर्श - तृप्ति कफ का एक नानात्मज ( विशिष्ट ) विकार है जिसमें आमाशय कफ से परिपूर्ण होने के कारण ( पेट ) भरा ऐसा प्रतीत होता है और पुरुष कुछ खाने की इच्छा नहीं करता और भोजन से द्वेष ( भक्तद्वेष ) होने लगता है । यथा - ' चिन्तयित्वा तु मनसा दृष्ट्वा श्रुत्वा भोजनम् । द्वेषमायाति यो जन्तुर्भक्तद्वेषः स उच्यते ॥ ' डा ० घोष ने इसका वर्णन इस प्रकार किया हैं - ' Deficiency may be due to disease of the stomach, When less acid is secreted, or may be due to accumulation of mucus, as happens in chronic gastritis ’ ( R. Ghosh - Matria medica ) इस विकार को नष्ट करने वाले द्रव्य ' तृप्तिन्न ' कहलाते हैं जैसे शुण्ठी, चित्रक आदि । यथा - ' तृप्तिः इलेष्मविकारः येन तृप्तमिवात्मानं मन्यते, तदनं तृप्तिघ्नम् ' ( च द ) । ' तृप्तिः श्लेष्मविकारभेदः, तन्नाशकम् ' ( ग. ), ये द्रव्य उष्णवीर्य, रूक्षगुण एवं कटुतिक्तकषायरस होते हैं जिससे कफ का शमन होता है । कविराज योगीन्द्रनाथ सेन ने ' तृप्ति ' को ' अरोचक ' मानकर ' तृप्तिप्न ' द्रव्य को ' अरोचकहर ' बतलाया है, यथा - ' तृप्तिं हन्तीति तृप्तिघ्नम्, अनन्नाभिनन्दनात् तृप्तिरिव तृप्तिररोचकः, स च इलेष्मजो
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ८१: विकारः ' ( यो. ) । आचार्य यादवजी ने भी इसी का अनुसरण किया है क्योंकि ' तृप्तिघ्न ’ प्रकरण में ही उन्होंने ' अरोचकहर ' तथा रोचन द्रव्यों का निर्देश उदाहरणरूप में किया है । रुचि ( Relish ) वस्तुतः पुरुष की महास्रोत विशेषतः मुख तथा आमाशय की अवस्था पर निर्भर करती है, इसमें भोजन तो आदमी कर लेता है किन्तु उसमें स्वाद नहीं मालूम होता । इस विकार को ‘ अरुचि ' कहते हैं, यथा - ' प्रक्षिप्तं तु मुखे चान्नं जन्तोर्न स्वदते मुहुः । अरोचकः स विशेय: ' । इसे दूर करने वाले द्रव्य ' रोचन ' ' रुचिकर ' या ' अरोचकहर ' कहे जाते हैं । अरोचक की उत्पत्ति तीनों दोषों से बतलाई गई है तथापि कफ की प्रधानता देखी जाती है । इसके कारण मुख का स्वाद भी बदल जाता है । वात, पित्त और कफ के कारण क्रमशः कषाय, कट्वम्ल तथा लवण रस की प्रतीति मुख में होती है, यथा - ' कषायवक्त्रश्च मतोऽनिलेन । कट्वम्लमुष्णं विरसं च पूति पित्तेन विद्यालवणं च वक्त्रम् ॥ ' ( मा. नि. ) । शारीर दोषों के अतिरिक्त कुछ मानस कारण भी होते हैं । एक ही वस्तु निरन्तर सेवन करते रहने से भी अरुचि हो जाती है, यथा - ' सातत्या स्वाभावाद्वा पथ्यं द्वेष्यत्वमागतम् । कल्पनाविधिभिस्तैस्तैः प्रियत्वं गमयेत् पुनः ॥ ' मानस भाव के आधार पर ही रुचिकर पदार्थों को ' स्वादु ', यथा--' भुक्त्वा च यत् प्रार्थयते पुनस्तत् स्वादु भोजनम् ', ' प्रिय ', ' हृद्य ' आदि संज्ञायें दी गई हैं । चरक का हृद्यगण, यथा — ' हृदयाय मनसे हितं हृद्यम् ' ( यो. ) वस्तुतः रोचन गण है । अम्ल द्रव्यों को रोचन बतलाया गया है । खट्टे पदार्थ स्वभावतः रुचिकर और रुचिवर्धक होते हैं । इसका कारण यह है कि बोधक कफ के कारण द्रव्यों का स्वाद प्रतीत होता है किन्तु मलभूत कफ के आधिक्य से जब यह आच्छन्न हो जाता है तब इसकी क्रिया न होने से अरुचि हो जाती है । अम्ल द्रव्य पार्थिव और आग्नेय होने के कारण बोधक कफ को उत्तेजित करते हैं किन्तु अनतत्त्व की उपस्थिति के कारण कफ का आवरण नहीं होने देते । ॐ कुटजबिल्वचित्रकनागरातिविषःभयाधन्वयासकदारुहरिद्रावचाचव्यानीति दशेमा-न्यर्शोघ्नानि भवन्ति ( १२ ), ( १२ ) अर्शोघ्न महाकषाय [ Anti - Hemorrhoidals ] - ( १ ) कुटज, ( २ ) बिल्व, ( ३ ) चित्रक, ( ४ ) सोंठ, ( ५ ) अतीस, ( ६ ) हर्रे, ( ७ ) जवासा ( हिंगुआ ), ( ८ ) दारुहल्दी, ( ९ ) वच, ( १० ) चव्य, ये दश औषधियाँ अर्श रोग को दूर करती हैं । विमर्श - यकृत के विकार से प्रतीहारिणी- सिरागत रक्तसंवहन ( Portal - circulation ) में अवरोध उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण गुद्रास्थित सिराओं में रक्त संचित होने के कारण ‘ अंकुर ' उत्पन्न होते हैं । इन्हें ' अर्श ' कहते है । अर्श के कारण - दोष को शान्त कर अंकुरों को नष्ट करने वाले द्रव्यों को ' अर्शोघ्न ' कहते हैं । इनमें जो द्रव्य शीतवीर्य एवं कषाय होने के कारण. रक्तस्तम्भन भी करते हैं, उन्हें ' रक्ताशन ' तथा जो द्रव्य उष्णवीर्य होने के कारण कफवात ( कफजन्य श्लेष्मत्राव तथा वातजन्य वेदना ) को शान्त करते हैं, उन्हें ' वातार्शोघ्न ' कहते हैं । दारुहरिद्रा, नागकेशर आदि ' रक्तार्शोघ्न ' द्रव्यों के उदाहरण हैं । खदिराभयामलकहरिद्रारुपकर सप्तपर्णारग्वधकरवीरविडङ्गजातीप्रवाला इति दशे-मा कुष्ठानि भवन्ति ( १३ ), ( १३ ) कुष्ठघ्न महाकपाय [ Curative of Dermatosis ] - ( १ ) खदिर, ( २ ) हरें, ( ३ ) आँवला, ( ४ ) हल्दी, ( ५ ) भिलावा, ( ६ ) सप्तपर्ण ( छतिवन ), ( ७ ) अमलतास, ( ८ ) कनेर, ( ९ ) वायविडङ्ग, ( १० ) चमेली की पत्ती, ये दश औषवियाँ कुष्ठ रोग को दूर करती हैं । ६ च ० सं ०
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८२ चरकसंहिता विमर्श- - सुश्रुत ने आरग्बधादिगण, त्रिफला, त्रिकटु और लाक्षादिगण को कुष्ठनाशन बताया है | आयुर्वेद में ' कुष्ठ ' शब्द समस्त त्वग्दोष ( Skin - diseases ) का वाचक है, यथा - ' कुत्सितं तिष्ठति त्वक् यस्मिन् तत् कुष्ठम् ' अतः सामान्यतः सभी त्वग्दोषों में लाभकर द्रव्यों को ' कुष्ठन ' कहते हैं । कुष्ठ में दोष वात, पित्त और कफ तथा दूष्य रक्त, मांस, लमीका एवं त्वक् होते हैं । विशेषतः पित्त प्रधान होता है और वह रक्त को मुख्यतः दूषित करना है किन्तु यह रक्त - पित्त-विकार अत्युग्र नहीं होता, अतएव यह रोग चिरक्रिय ( Chronic ) माना गया है । इसलिए त्रिदोषहर मुख्यतः रक्तशोधक द्रव्य कुष्ठन होते हैं यथा खदिर, भल्लातक आदि । चन्दननलदकृतमालनक्त माल निम्व कुटज सर्षपमधुकदारुहरिद्रामुस्तानीति कण्डूमानि भवन्ति ( १४ ), दशेमान ( १४ ) कण्डून महाकपाय [ Anti - Pruritis ] ~ ( १ ) चन्दन ( सफेद ), ( २ ) नलंद ( जटामांसी, चक्र ० ), ( ३ ) अमलतास, ( ४ ) नक्तमाल ( लताकरञ्ज ), ( ५ ) नीम, ( ६ ) कुटज, ( ७ ) सरसों, ( ८ ) मुलेटी, ( ९ ) दाम्हल्दी, ( १० ) नागरमोथा, ये दश औषधियां कण्डू ( Itching ) को दूर करती हैं । विमर्श - सुश्रुत ने आरग्वधादि और पटोलादिगण को कण्डूम्न तथा एलाडिको कण्डू-नाशन माना है । जो द्रव्य कण्डू ( खुजली ) को दूर करे उसे कण्डून कहते हैं । कण्डू कफ के आधिक्य से होती है और इसका अधिष्ठान त्वचा या कला होता है । अतः कफशामक एवं त्वचा के लिए हिनकर द्रव्य इस कर्म के लिये प्रयुक्त होते हैं - यथा चन्दन, उशीर, निम्ब आदि | * अक्षीत्रमरिचगण्डीरकेबुकविडङ्गनिर्गुण्डी किणिही श्वदंष्ट्रावृपपणिकापत्रिका इति दशे-मानि किमिन्नानि भवन्ति ( १५ ), ( १५ ) कृमिघ्न महाकपाच [ Anthelmintics ] - ( १ ) अक्षीत्र ( अब्दकः ( नागर-मोथा ) शोभानो वा ( या सहिजन ) चक्र: ), ( २ ) मरिच, ( ३ ) गण्डीर ( शमटशाकं -चक्र ० ), ( ४ ) केवुक, ( ५ ) वायविडङ्ग, ( ६ ) सिन्दुवार ( ७ ) किमिही ( कटभी चक्र ० ), ( ८ ) गोखरू, ( ९ ) वृपपणिका ( मूषाकणीं भेद चक्र ० ), ( १० ) मूपाकर्णी, ये दश औषधियाँ कृमियों को दूर करती हूँ । विमर्श -च. वि. अ. ७ में २० प्रकार के कृमिरोगों का वर्णन है । जो द्रव्य शरीर के बाह्य तथा आभ्यन्तर कृमियों को नष्ट करे तथा उन्हें बाहर निकाले उसे ' कृमिघ्न ' कहते हैं । वर्णन की सुविधा के लिये इन्हें तीन वर्गों में विभाजित कर देते हैं: -- ( क ) अन्तःकृमिघ्न ( Anthelmintic or Vermicide ), ( ख ) वाह्यकृमिघ्न ( Insecticide ), ( ग ) कृमिनिःसारक ( Vermifuge ) । ये शरीर के भीतर विशेषतः अन्त्र में स्थित कृमियों को नष्ट करते हैं । इनसे कृमियों की मृत्यु न भी हो तो वे अवसादित या मूच्छित अवश्य हो जाते हैं । अतः इनसे अन्त्र में क्षोभ तथा शारीर धातुओं को भी हानि पहुँचने की आशंका रहती है । इसलिए इनका प्रयोग ऐसी मात्रा में किया जाता है जिससे कृमि मर भी जायँ और शरीर पर कोई हानिकर प्रभाव भी न हो, यथा— ' An ideal anthelmintic is one whose value depends not only upon its poisonous effects upon the parasites in the intestinal canal, but also upon its harmlessness as regards the patient ' - ( R. Ghosh -Materia medica. ) और इसीलिये इनके प्रयोग के वाद शीघ्र ही विरेचन दिया जाता है जिससे कृमि के साथ - साथ अवशिष्ट द्रव्य भी बाहर निकल जाता है । ये दो वर्गों में विभाजित किये जाते हैं - १. विशिष्ट ( Specific ) - जिस द्रव्य का किसी
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ८३ विशिष्ट कृमि पर विशिष्ट कर्म होता है उसे ' विशिष्ट अन्तःकृमिघ्न ' कहते हैं यथा- चौहार, पलाश-बीज आदि गण्डूपद कृमि ( Round worm ) के लिये, तथा बिडंग, पूग आदि स्फीत कृमि ( Tape worm ) के लिये, आदि । २. सामान्य ( General ) -- इन द्रव्यों का सामान्य से सब कृमियों पर सामान्य प्रभाव होता है । वस्तुतः ये प्रकृतिविघात का कार्य करते रूप जिससे अन्त्र की परिस्थिति कृमियों के जीवन और विकास के लिये अनुकूल नहीं रह जाती हैं ये द्रव्य कटुतिक्त, कषाय, क्षार और उष्ण होते हैं, यथा - ' प्रकृतिविधातस्त्वेषां कटुतिक्तकषाय- । क्षारोष्णानां द्रत्र्यागामुपयोगः यच्चान्यदपि लेष्मपुरीष प्रत्यनीकभूतं तत् स्यात् इति प्रकृतिविधातः ” ( च.वि. ७ ) । यूनानी में कृमिघ्न द्रव्यों को ' कातिल दीदान ' कहते हैं । जो द्रव्य महास्रोत के बाहर स्थित यूका, लिक्षा आदि कृमियों को नष्ट करें उन्हें ' बाह्यकृमिघ्न ' कहते हैं यथा धन्तूर, पारद आदि । ये द्रव्य तीक्ष्ण एवं मादक होते हैं जिससे कृमि संज्ञारहित हो जाते हैं या मर जाते हैं । जो द्रव्य कृमियों को बाहर निकालें उन्हें ' कृमिनिःसारक ' कहते हैं । चरक ने इन्हें ' अपकर्षक ' कहा है । मार्गभेद से ये चार भेदों में विभक्त किए गये हैं- वमन, विरेचन, आस्थापन और शिरोविरेचन, यथा - ' स्थानगतानां तु कृमीणां भेषजेनापकर्षणं न्यायनः । तच्चतु-विधं, नद्या - शिरोविरेचनं वमनं विरेचनमास्थापनमित्यपकर्षणविविः ' ( च. वि. ७ ) । वमन से आमाशयस्थ, विरेचन से अन्त्रस्थ आस्थापन से मलाशयस्थ तथा शिरोविरेचन से शिरोनासागत कृमि बाहर निकलते हैं । इन द्रव्यों के उदाहरण तत्तत् प्रकरणों में देखना चाहिये, तथापि इनमें विरेचन द्रव्यों का ही अधिक प्रयोग होता है यथा इन्द्रयव, चिरायता आदि । हरिद्रामञ्जिष्टासुवहासूचमै लापालिन्दीचन्दनकतकशिरीषसिन्धुवारश्लेप्मातका इति दशेमानि विषघ्नानि भवन्ति ( १६ ), इति पट्कः कपायवर्गः ॥ ११ ॥
( १६ ) विपन्न महाकाय [ Anti - dotes ] - ( १ ) हल्दी, ( २ ) मजीठ, ( ३ ) सुबहा ( निशोथ ), ( ४ ) छोटी इलायची, ( ५ ) पालिन्दी ( काला निशोथ ), ( ६ ) चन्दन, ( ७ ) कलक ( निर्मली ), ( ८ ) शिरीष, ( ९ ) निर्गुण्डी, ( १० ) लसोड़ा ( श्लेष्मातको बहुवार: ), ये दश याँ विपन्न होती है । इस प्रकार यह छ महाकषायवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ ११ ॥
विमर्श - चक्रपाणि ने अन्य स्थल में सुवहा का अर्थ निशोथ किया है परन्तु यहाँ सुबहा का अर्थ ' रास्ना हाफरमाली वा ' किया है । एकरूपता की दृष्टि से सुवहा का अर्थ उपर्युक्त श्लोक में ' निशो ' ही रखा गया है । सुश्रुतसंहिता में लोधादि, अर्कादि, एलादि, पटोलादि, उत्पलादि, वादिगणों को विषघ्न बताया गया है । विषप्रभाव को नष्ट करने वाले द्रव्यों को ' विषघ्न ' या ' अगद ' कहते हैं यथा शिरीष आदि । यूनानी में विषघ्न द्रव्यों को ' तिरियाक ' और ' फ़ादजहर ' कहते हैं । वीरणशालिषष्टिकेतुवालिकादर्भ कुशकाशगुन्द्रेत्कटक तृणमूलानीति दशेमानि स्तन्य-जननानि भवन्ति ( १७ ), ( १७ ) स्तन्यजनन महाकषाय [ Galactogogues ] - ( १ ) वीरण ( खस ), ( २ ) शालि चावल, ( ३ ) सांठी चावल ( ४ ) इक्षुबालिका ( खागलिका - चक्र ० ), ( ५ ) दर्भ ( डाभ ), ( ६ ) कुश, ( ७ ) काश, ( ८ ) गुन्द्रा ( गुलुंच चक्र ० ), ( ९ ) इत्कट, ( १० ) कत्तण ( रोहिस तृण । ये दश औषधियाँ स्तन्यजनन हैं । विमर्श - सुन ने काकोल्यादिगण को स्तन्यजनन और विदारीकन्द को स्तन्यवृद्धिकर माना है ( सु. सू. ३८-४६ ) । स्तनों में स्तन्य ( दूध ) उत्पन्न करने या बढ़ाने वाले द्रव्य ' स्तन्यजनन ' कहलाते हैं, यथा शतावरी, इक्षुमूल आदि । स्तन्य आप्य होता है अतः इसको बढ़ाने
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८४ चरकसंहिता वाले द्रव्य भी आप्य और श्लेष्मल होते हैं । इसके अतिरिक्त, नारी का स्तन्य मधुर, कषायानुरस, शीत एवं मृदु होता है यथा - ' नार्यास्तु मधुरं स्तन्यं कपायानुरसं हिमम् ' ( सु. सू. ४५ ), ' स्तन्यक्षये ‘ “ इलेष्मवर्धनद्रव्योपयोगः ( सु. सू. १५ ) | अतः ये द्रव्य भी इन्हीं गुणों से युक्त होते हैं । पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूची वत्स कफलकिराततिक्तकटुरोहिणीसारिवा इति दशेमानि स्तन्यशोधनानि भवन्ति ( १८ ), ( १८ ) स्तन्यशोधन महाकषाय [ Galacto Purifiers ] ( १ ) पाठा, ( २ ) सौंठ, ( ३ ) देवदारु, ( ४ ) नागरमोथा, ( ५ ) मूर्वा, ( ६ ) गिलोय, ( ७ ) इन्द्रजौ, ( ८ ) चिरायता, ( ९ ) कटुकी, ( १० ) अनन्तमूल ये दश औषधियाँ दुग्ध की विकृतियों को दूर करने वाली हैं । विमर्श - सुश्रुत में बचादि, हरिद्रादि एवं सुरसादिगण को स्तन्यशोधन माना गया है । दूषित स्तन्य ( दूध ) को शुद्ध करने वाले द्रव्य ' स्तन्यशोधन ' कहलाते है – ' दूषितं स्तन्यं शोधयतीति स्तन्यशोधनम् । ' दोष स्तन में पहुँच कर रक्त मांस को दूषित कर स्तन्य में विकार उत्पन्न करता है, अतः स्तन्यशोधन द्रव्य रक्तशोधक होते है और साथ ही वात, पित्त एवं कफ दोषों को भी शान्त करते हैं - यथा देवदारु ( वातहर ), सारिवा ( पित्तहर ) और शुण्ठी ( कफहर ) । * जीवकर्षभककाकोलीक्षीर का कोलीमुद्गपर्णीमाषपर्णीमेदावृद्धरुहाजटिलाकुलिङ्गा इति दशमानि शुक्रजननानि भवन्ति ( १ ९ ), ( १ ९ ) शुक्रजनन महाकपाय [ Semeno or Spermo Poietic ] - ( १ ) जीवक, ( २ ) ऋषभक, ( ३ ) काकोली, ( ४ ) क्षीरकाकोली, ( ५ ) वनमूंग, ( ६ ) वनउड़द, ( ७ ) मेदा, ( ८ ) वृद्धरुहा ( शतावरी ), ( ९ ) जटिला ( जटामांसी, उच्चटा चक्र ० ), ( १० ) कुलिङ्ग ( उच्चटाभेद चक्र ० ), ये दश औषधियाँ शुक्र को उत्पन्न करने वाली होता हैं । विमर्श - चक्रपाणि ने वृक्षरुहा पाठ होने पर ' बन्दाक ' अर्थ किया है । शुक्रजनन - शुक्र धातु को बढ़ाने वाले द्रव्य ' शुक्रजनन ' या ' शुक्रल ' कहलाते हैं, यथा - ' यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं तु तदुच्यते । यथाऽश्वगंधा मुसली शर्करा च शतावरी ॥ ' ( शा. ) । शुक्र आय ( सौम्य ), स्निग्ध, मधुर, शीत, द्रव आदि गुणों से युक्त होता है, यथ-- ' शुक्रं चाप्यन् ' ( च. द. ), ' स्फटिकाभ द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च शुक्रम् । ' ( सु. शा. २ ), स्निग्धं ' धनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च । रेतः शुद्धं विजानीयात् ॥ ' ( च. वि. ३० ) । अतः शुक्रवर्धक द्रव्य भी इन्हीं गुणों से युक्त होते है - यथा जीवक आदि । शुक्रक्षय में इन द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, यथा— ' शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धसमाख्यातानां चापरेषां द्रव्याणाम् ' ( च. शा. ६ ) । यह देहबलकर होता है । चरक ने शुक्र को शुक्रजनन बतलाया है यथा- ' शुक्रं शुक्रंग ' ( च.शा. ६ ), उसमें भी नक्र ( घड़ियाल ) का शुक्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, ' नक्ररेतो वृष्याणाम् ' ( च. सू. २५ ) । यूनानी में शुक्रजनन द्रव्यों को ' मुबल्लिद मनी ' कहते हैं । * कुष्ठैलवालुककट्फलसमुद्रफेनकदम्बनिर्यासेक्षुकाण्डे दिवत्तुर कवसुकोशीराणीति दशे-मानि शुक्रशोधनानि भवन्ति ( २० ), इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ १२ ॥
( २० ) शुक्रशोधन महाकषाय [ Semeno or Spermo Purifiers ] - ( १ ) कूठ, ( २ ) एलुवा, ( ३ ) कायफर, ( ४ ) समुद्रफेन, ( ५ ) कदम्ब का गोंद, ( ६ ) ईख, ( ७ ) काण्डे, ( ८ ) तालमखाना ( कोकिलाक्ष चक्र ० ), ( ९ ) वसुक ( वसुहट्टकः, चक्र ० ), ( १० ) खस, ये दश औषधियाँ शुक्र को शुद्ध करने वाली हैं । इस प्रकार यह चार महाकपायवर्गों का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १२ ॥
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ६५ विमर्श - जो द्रव्य शुक्रगत दोषों को दूर कर शुक्र को शुद्ध करते हैं उन्हें शुक्रशोधन कहते हैं यथा कुष्ठ, कट्फल आदि । मृद्दीका मधुकमधुपर्णीमेदाविदारीकाकोलीत्क्षीरकाकोलीजीवकजीवन्तीशालपर्ण्य इति दशमानि स्नेहोपगानि भवन्ति ( २१ ), ( २१ ) स्नेहोपग महाकषाय [ Adjuvants in Oleation Therapy ] - ( १ ) मुनक्का, ( २ ) मुलेठी, ( ३ ) गिलोय, ( ४ ) मेद्रा, ( ५ ) विदारीकन्द, ( ६ ) काकोली, ( ७ ) क्षीर-काकोली, ( ८ ) जीवक, ( ९ ) जीवन्ती, ( १० ) सरिवन, ये दश औषधियाँ स्नेहन कर्म करने में सहायता पहुँचाती हैं । विमर्श - जो द्रव्य स्नेहन द्रव्यों की शक्ति को बढ़ाते ( उनके सहायक रूप में प्रयुक्त होते ) है उन्हें स्नेहोपग कहते हैं यथा - मृद्वीका, मुलेठी आदि । शोभाञ्जनकैरण्डार्कवृश्वीर पुनर्नवायवतिलकुलत्थमापबदराणीति दशेमानि स्वेदोपगानि भवन्ति ( २२ ), ( २२ ) स्वेद्रोपग महाकषाय [ Adjuvants in Sudation Therapy ] - ( १ ) सहिजन, ( २ ) एरण्ड, ( ३ ) मदार, ( ४ ) वृश्वीर ( श्वेतपुनर्नवा चक्र ० ), ( ५ ) पुनर्नवा ( रक्त ), ( ६ ) यव, ( ७ ) तिल, ( ८ ) कुलत्थ, ( ९ ) उड़द, ( १० ) बेर, ये दश औषधियाँ स्वेदन कर्म में सहायता पहुँचाती हैं । विमर्श - स्वेदन कर्म में सहायक द्रव्यों को स्वेदोपग कहते हैं - ' स्वेदस्य उप सहायत्वेन गच्छति इति स्वेदोपगम् ' यथा - शोभाञ्जन, एरण्ड आदि । कविराज गंगाधर ने इस कर्म को प्रभावजन्य बतलाया है, यथा - ' स्वेदोपगानि प्रभावात् ' ( गं. ) । B मधुमधुककोविदारकर्बुदारनीपविदुलबिम्बीशणपुष्पीसदापुष्पाप्रत्यक्पुष्पा इति दशे-मानवमनोपगानि भवन्ति ( २३ ), ( २३ ) वमनोपग महाकषाय [ Adjuvants in Emetic Therapy ] ( १ ) मधु, ( २ ) मुलेठी, ( ३ ) कोविदार ( लाल कचनार ), ( ४ ) कर्बुदार ( श्वेत कचनार चक्र ० ), ( ५ ) नीप ( कदम्ब ), ( ६ ) विदुल ( हिज्जल - चक्र ० ), ( ७ ) बिम्बी ( कुन्दुरु ), ( ८ ) शणपुष्पी ( घण्टारवा-चक्र ०, बनसनई ), ( ९ ) सदापुष्पी ( अर्क चक्र ० मदार ), ( १० ) प्रत्यक्पुष्पी ( अपामार्ग - चक्र ० ), ये दश औषधियाँ वमन कर्म में सहायक होती हैं अर्थात् वमन द्रव्य की इन औषधियों को मिला कर पिलाने पर सम्यक् वमन होता है । विमर्श - मन में सहायक द्रव्यों को ' वमनोपग ' कहते हैं यथा मधु, लवण, मुलेठी आदि । इनमें कुछ उनकी शक्ति को बढ़ाने हैं यथा मधु, लवण और कुछ उपद्रवों से रक्षा करते हैं यथा मुलेठी आदि । वमन द्रयों में मधु - सैन्धव का प्रयोग सर्वत्र निर्दिष्ट है । मधु कफ का विलयन करता है और सैन्यव छेदन करता है, यथा- ' सर्वेषु तु मधु सैन्धवं कफविलयनच्छेदार्थं वमनेषु विदध्यात् ' ( च. क. १ ) । इस प्रकार कफदोष के निर्हरण में ये सहायक होते हैं । * द्राक्षाकाश्मर्य परूषकाभयामलक बिभीतककुवलबदरकर्कन्धुपीलूनीति दशेमानि विरे-चनोपगानि भवन्ति ( २४ ), ( २४ ) विरेचनोग महाकषाय [ Adjuvants in Purgative Therapy ] - ( १ ) मुनक्का, ( २ ) गम्भारी का फल, ( ३ ) फालसा, ( ४ ) हर्रे, ( ५ ) आँवला, ( ६ ) बहेरा, ( ७ ) कुबल ( बड़ी बेर ), ( ८ ) बदर ( बेर ), ( ९ ) कर्कन्धु ( झड़बेर ), ( १० ) पोलू, ये दश औषधियाँ विरेचन कर्म में सहायक होती हैं ।
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" ८६ चरकसंहिता विमर्श - विरेचन के साथ प्रयुक्त होने वाले उपयोगी द्रव्यों को ' विरेचनोपग ' कहते हैं, यथा द्राक्षा आदि । ये द्रव्य विरेचन की शक्ति को बढ़ाते तथा उनमें उत्पन्न होने वाले क्षोभ एवं अन्य उपद्रवों को शान्त रखते हैं । त्रिवृद्वित्व पिप्पली कुष्ठसर्षपवचावत्सक फलशतपुष्पामधुकमदनफलानीति दशेमान्या-स्थापनोपगानि भवन्ति ( २५ ), ( २५ ) आस्थापनोपग महाकषाय [ Adjuvants in Non - oily Eremata ] — ( १ ) निशोथ, ( २ ) बेल, ( ३ ) पिप्पली, ( ४ ) कूठ, ( ५ ) सरसों, ( ६ ) बच, ( ७ ) इन्द्रजौ ( ८ ) सौंफ, ( ९ ) मुलेठी, ( १० ) मैनफल, ये दश औषधियाँ आस्थापन बस्ति में सहायता पहुँचाती हैं । विमर्श - आस्थापन कर्म में सहायक द्रव्यों को ' आस्थापनोपग ' कहते हैं यथा त्रिवृत्, इन्द्रयव आदि । ये प्रमाथी स्वभाव के होते हैं और स्रोतों से दोषों को निकालने में सहायता करते हैं । रास्नासुरदारुबिल्वमदनशतपुष्पावृश्वीर पुनर्नवाश्वदंष्ट्राग्निमन्थश्योनाका इति दशेमान्य-नुवासनोपगानि भवन्ति ( २६ ), ( २६ ) अनुवासनोपग महाकषाय [ Adjuvants in Oily Enemata ] – ( १ ) रास्ना, ( २ ) देवदारू, ( ३ ) बेत, ( ४ ) मैनफल, ( ५ ) सौफ, ( ६ ) इवेन पुनर्नवा, ( ७ ) पुनर्नवा ( लाल ), ( ८ ) गोखरू, ( ९ ) अरणी, ( १० ) सोनापाठा, ये दश औषधियाँ अनुवासन कर्म में सहायक होती है | विमर्श - जो अनुवासन कर्म में सहायक होते है वे ' अनुवासनोपग ' कहलाते है, यथा रास्ना, देवदारु आदि । ये वातशामक होते हैं । ज्योतिष्मतीक्षवकमरिचपिप्पलीविडङ्गशिग्रुसर्षपापामार्गतण्डुलश्वेतामहाश्वेता इति दशे-मानि शिरोविरेचनोपगानि भवन्ति ( २७ ) इति सप्तकः कषायवर्गः ॥ १३ ॥
( २७ ) शिरोविरेचनोपग महाकषाय [ Adjuvants in Errhines ] ( १ ) मालकांगनी, ( २ ) क्षत्रक ( द्विक्काकारक चक्र ० - नकद्विकनी ), ( ३ ) मरिच, ( ४ ) पिप्पली, ( ५ ) वायविडङ्ग, ( ६ ) सहिजन, ( ७ ) सरसों, ( ८ ) अपामार्ग के बीज, ( ९ ) श्वेता ( अपराजिता चक्र ० ), ( १० ) महाश्वेता ( अपराजिताभेदः चक्र ० - नील अपराजिता ), ये दश औषधियाँ शिरोविरेचन कर्म में सहायक होती है । इस प्रकार यह सात कपायवर्ग का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १३ । 8 जम्ब्वाम्रपल्लत्रमातुलुङ्गाम्लबदरदाडिमयवयष्टिको शीरमृलाजा इति दशेमानि छर्दिनि-ग्रहणानि भवन्ति ( २८ ), ( २८ ) दि - निग्रहण महाकपाय [ Anti- Emetics ] - ( १ ) जामुन की पत्ती, ( २ ) आम की पत्ती, ( ३ ) बिजौरा नीबू, ( ४ ) बेर, ( ५ ) अनार, ( ६ ) यव, ( ७ ) सांठी चावल, ( ८ ) खस, ( ९ ) मिट्टी, ( १० ) धान का लावा, ये दश औषधियाँ छदि ( वमन ) को रोकने वाली होती हैं । विमर्श - कुछ वैद्य मिट्टी की जगह मुलतानी मिट्टी लेने की तरफ संकेत करते है । यूनानी चिकित्सा पद्धति में छदि - निग्रहण को ' मुसक्किन ' कहते हैं । सुश्रुत ने आरग्वधादि, पटोलादि और गुडूच्यादि गण को मिनाशक बताया है । जो द्रव्य वमन को रोके तथा कारणभूत दोष को शान्त करे उसे ‘ छर्दिनिग्रह्ण ' कहते हैं, यथा ' छर्दि निगृह्णाति स्तम्भयतीति छर्दिनिग्रहणम्, व्याधिहरण-
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षड्विरेचनशताश्रितीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् ८७ वचनेन तद्धेतुदोषहरणमपि लभ्यते ' ( ग ) । यथा जम्बू, आम्रपल्लव आदि । ये द्रव्य मुख्यतः शीत और कषाय होते है जिससे आमाशय की श्लेष्मल कला का क्षोभ शान्त होता है । नागरधन्वयवासकमुस्त पर्पटेकचन्दन किराततिक्तकगुडूचीहीवेर धान्य कपटोलानीति द-रोमानि तृष्णानिग्रहणानि भवन्ति ( २ ९ ), ( २ ९ ) तृष्णानिग्रहण महाकषाय [ Anti Thirst drags ] ( १ ) सोंठ, ( २ ) जवासा ( हिंगुआ ), ( ३ ) नागरमोथा, ( ४ ) पित्तपापड़ा, ( ५ ) चन्दन, ( ६ ) चिरायता, ( ७ ) गिलोय, ( ८ ) सुगन्धवाला, ( ९ ) धनियाँ, ( १० ) पटोल ये दश औषधियाँ प्यास को दूर करने वाली हैं । विमर्श - सुश्रुत ने सारिवादि, परूषकादि, उत्पलादि और त्रप्वादि गण को तृष्णाशामक माना है । जो द्रव्य तृष्णा ( ध्यास ) को कम करे उसे तृष्णानिग्रहण कहते हैं यथा नागरमोथा, पित्तपापड़ा आदि । सामान्यतः श्लेष्मल ग्रन्थियों के निरन्तर कफभूत स्राव से मुख की श्लेष्मल कला आर्द्र बनी रहती है किन्तु वात और पित्त के बढ़ जाने पर कफ का क्षय हो जाता है जिससे कला के शुष्क हो जाने पर मुखशोष और तृष्णा उत्पन्न होती है । अतएव तृष्णाशामक द्रव्य वातपित्तशामक होते हैं जो कारणभूत दोष ( वान और पित्त ) को शान्त कर देते हैं जिससे तृष्णा भी शान्त हो जाती है । अतिशीत ( बर्फ आदि ) का प्रयोग करने पर अग्नि की शान्ति से कुछ तात्कालिक सुख तो मिलता है किन्तु शैल्य के कारण वायु और बढ़ जाती है जिससे तृष्णा की और वृद्धि हो जाती है । तृष्णानिग्रहण द्रव्यों का कर्म दो प्रकार से होता है - १. स्थानिक — कुछ द्रव्य स्थानिक प्रयोग ( गण्डूष ) से मुखगत दोष को शान्त करते हैं जैसे इक्षुरस, क्षीर आदि, यथा- ' श्रीरेक्षुरसगुडोदक सितोपलाक्षौद्रशीधुमाध्वीकैः । वृक्षाम्लमातु-लुंगैर्गण्डूषास्तालुशोषघ्नाः ॥ ' ( च. चि. २२ ) । २. सामान्य – कुछ द्रव्यों का पान, व्यजन, सेक, आदि के रूप से प्रयोग होता है जिससे सामान्यतः वातपित्त दोषों का शमन होता है, यथा-- ' पानाभ्यञ्जनसे केष्विष्टं मधुशर्करायुक्तम् ' ( च. चि. २२ ) । ३ शटीपुष्करमूलबदरबीजकण्टकारिकावृहतीवृक्षरुहाभयापिप्पलीदुरालभाकुलीरशृङ्गच इति रोमानि हिक्कानिग्रहणानि भवन्ति ( ३० ), इति त्रिकः कषायवर्गः ॥ १४ ॥
( ३० ) हिक्का - निग्रहण महाकपाय [ Anti - Hicough drugs ] - ( १ ) कचूर, ( २ ) पोहकरमूल, ( ३ ) बेर, ( ४ ) छोटी कटेरी, ( ५ ) बड़ी कटेरी, ( ६ ) गिलोय, ( ७ ) हर्रे, ( ८ ) पिप्पली ( ९ ) जवामा, ( १० ) कुलीरशृंगी ( काकड़ासींगी ), ये दश औषधियाँ हिचकी को दूर करने वाली हैं । इस प्रकार यह तीन वर्ग महाकपाय का वर्णन समाप्त हुआ ॥ १४ ॥
विमर्श - जो द्रव्य हिक्का ( हिचकी ) को बन्द करे वह हिक्कानिग्रहण कहलाता है । हिक्का भी श्वास के समान बात और कफ दोषों से उत्पन्न होती है किन्तु श्वास में कफ की और इसमें वात की प्रधानता रहती है । अतः हिक्कानिग्रहण द्रव्य भी उष्णवीर्य और कफवातहर होते हैं । अतएव प्रायः श्वासहर द्रव्य हिकानिग्रहण होते हैं यथा शी, पुष्करमूल आदि । हिक्कानिग्रहण द्रव्य को यूनानी में ' मुसक्किन फाक ' कहते हैं । 8 प्रियङ्ग्वनन्ताम्रास्थिकट्वङ्गलोध्रमोचरससमङ्गाधातकीपुष्पपद्मा पद्मकेशराणीति दशे-मानि पुरीषसंग्रहणीयानि भवन्ति ( ३१ ), ( ३१ ) पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय Intestinal Astringents ] — ( १ ) प्रियङ्गु, ( २ ) अनन्ता ( अनन्तमूल - चक्र ० ), ( ३ ) आम की गुठली, ( ४ ) कट्वङ्ग ( सोनापाठा ), श्योनाक: चक्र ० ( ५ ) लोध, ( ६ ) मोचरस ( शाल्मली वेष्टकः चक्र ० ), ( ७ ) समङ्गा ( लज्जालु ), ( ८ ) धाय का