चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 211–220

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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११८ चरकसंहिता मध्यम, स्नैहिक को बृंहण और मृदु, वैरेचनिक को शोधन और तीक्ष्ण शब्द से अभिहित

किया गया है ।

गौरवं शिरसः शूलं पीनसार्धावभेदकौ ॥ २७ ॥

कर्णाक्षिशूलं कासश्च हिक्काश्वासौ गलग्रहः । दन्तदौर्बल्यमात्रावः श्रोत्रघ्राणाक्षिदोषजः ॥२८ ॥

पूतिर्घाणास्यगन्धश्च दन्तशूलमरोचकः । हनुमन्याग्रहः कण्डूः क्रिमयः पाण्डुता मुखे ॥२ ९ ॥ श्लेष्मप्रसेको वैस्वर्यं गलशुण्ड्युपजिह्विका । खालित्यं पिञ्जरत्वं च केशानां पतनं तथा ॥३० ॥

चवथुश्चातितन्द्रा च बुद्धेर्मोहोऽतिनिद्वता । धूमपानात् प्रशाम्यन्ति बलं भवति चाधिकम् ॥ शिरोरुहकपालानामिन्द्रियाणां स्वरस्य च । न च वातकफात्मानो बलिनो ऽप्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥३२ ॥

धूमवक्त्रकपानस्य व्याधयः स्युः शिरोगताः । धूमपान से लाभ [ Advantages ] - धूमपान करने से शिर का भारीपन, शिर. शूल, पीनस, अर्धावभेदक ( Hemicrania कान और नेत्र का शूल, कास, हिचकी, दमा, गलग्रह, दांतों की दुर्बलता, कान, नाक, नेत्रों से दोषजन्य स्राव का होना, पूतिघ्राण ( नाक से दुर्गन्ध का निकलना ), आस्यगन्ध ( Foul breath ), दांत का शूल, अरोचक, हनुग्रह, मन्याग्रह, कण्डू, कृमिरोग, मुख का पीला होना, मुख से कफ का स्राव होना, स्वरभेद, गलशुण्डी, उपजिह्विका, खालित्य ( Baldness ), केशों का पीला होना, केशों का गिरना ( जैसे इन्द्रलुप्त ), छींक आना, अधिक तन्द्रा होना, बुद्धि ( ज्ञानेन्द्रियों ) का व्यामोह होना, अधिक निद्रा आना आदि रोग शान्त होते हैं और बाल, कपाल, इन्द्रियों का तथा स्वर का बल अधिक बढ़ता है । जो व्यक्ति मुख से धूम पीता है उसे जत्रु के ऊपरी भाग में होने वाले रोग विशेषकर शिरोभाग में वात - कफजन्य बलवान् व्याधियाँ नहीं होतीं ॥। २७-३२ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने भी धूम का प्रयोजन बताया है -- ' नरो धूमोपयोगाच्च प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः ’

( चि. अ. ४० ) ।

प्रयोगपाने तस्याष्टौ कालाः संपरिकीर्तिताः ॥ ३३ ॥

* वातश्लेष्मसमुत्क्लेशःकालेष्वेषु हि लक्ष्यते । स्नात्वा भुक्त्वा समुल्लिख्य तुखा दंतान्निघृप्य च ॥ नावनाञ्जननिद्रान्ते चात्मवान् धूमपो भवेत् । तथा वातकफात्मानो न भवन्त्यूर्ध्वजनुजाः ॥३५ ॥

रोगास्तस्य तु पेयाः स्युरापानास्त्रित्रयस्त्रयः । प्रायोगिक धूमपान के आठ कालों का वैज्ञानिक आधार तथा वर्णन - प्रायोगिक धूमपान के ८ काल बताये गये हैं, क्योंकि धूमपान से वात - कफ का निर्हरण किया जाता है और निम्नलिखित आठ कालों में ही वात और कफ का उत्लेश ( प्रकोप ) होता है । वे आठ काल ये हैं-- ( १ ) स्नान करने के बाद, ( २ ) भोजन करने के बाद, ( ३ ) वमन करने के बाद, ( ४ ) छींक आने के बाद, ( ५ ) दातौन ( Morning Tooth Brush ) करने के बाद, ( ६ ) नस्य लेने के बाद, ( ७ ) अञ्जन लगा लेने के बाद, ( ८ ) निद्रा से उठने के बाद ऐसा करने से जत्रु के ऊपरी भाग में वात और कफ से होने वाले रोग नहीं होते । इस प्रायोगिक धूम को एक बार में तीन घूँट ( Puffs ) पीना चाहिये । यह क्रिया तीन बार करनी चाहिये । इस प्रकार कुल नव घूँट ( Puffs ) धूम पीना चाहिये || ३३-३५ ॥ विमर्श - चक्रपाणि ने ' आपान ' शब्द पर टीका करते हुये कहा है कि एक बार में धूम लेने तथा छोड़ने को ' धूमाभ्यवहारमोक्ष ' कहते हैं, जिसे आजकल Puffs कहते हैं । भेल ने भी धूम पीने के आठ ही काल बताये हैं, यथा - ' अष्टौ धूमस्य कालाः स्युर्यस्यान्ते यं प्रशंसति । १. ' पालित्यम् ' इति पा ० । २. ' धूमरक्तकपालस्य ' इति ' धूमरिक्तकपालस्य ' इति च पा ० ।

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मात्राशितीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ११६ उत्थितस्य शयानस्य, दन्तप्रक्षालने कृते ॥ जलक्रीडानिवृत्तस्य तथा भुक्तवतोऽशनम् । क्षुतोच्चारव्यवा-यान्ते भुक्तवान्तकृतस्तथा ॥ ' किन्तु सुश्रुत ने धूम पीने के बारह काल बताये हैं, यथा- ' आद्यास्त्रयो द्वादशसु कालेषु उपादेयाः तद्यथा क्षुद् - दन्तप्रक्षालन- नस्य - स्नान - भोजन- दिवास्वप्न - मैथुन - छर्दि-मूत्रोच्चार- रुषित - शस्त्रकर्मान्तेषु ' ( चि. अ. ४० ) । ये आठ काल केवल प्रायोगिक धूमपान के हैं । यह बात आचार्य ने ‘ प्रयोगपाने ' शब्द से स्पष्ट की है । स्नैहिक धूमपान का काल - सुश्रुत ने तीनों धूमों का काल अलग - अलग बताया है— ' तत्र मूत्रो श्चारक्षवथुरुषितमैथुनान्तेषु स्नैहिकः, स्नानछर्दनदिवास्वप्नान्तेषु वैरेचनः, दन्तप्रक्षालननस्यस्नानभोज-नशस्त्रकर्मान्तेषु प्रायोगिक: ' ( चि. अ. ४० ) । इस प्रकार धूम पीने में आपान ( Puffs ) की मात्रा तीन बार में लेकर - रुक कर पुनः तीन बार, इस प्रकार नव बतायी गई है । निमितन्त्र में भगवान् निमि ने भी धूमपान की मात्रा इस प्रकार बताई है - ' धूमपाने तु विज्ञेय उच्छ्वासस्त्रिगुणः कलाः । तिस्रः कलाश्चात्र मात्रा प्रमाणं स्यात्त्रिमात्रिकम् । पिबेत् स्वस्थविधौ मात्रां दुर्बलस्तु कलां पिबेत् । अभिष्यण्णे प्रमाणं स्यात् प्रमाणं च पिवेद्रुजि ॥ तथा भोज ने भी कहा है - प्रमाणं स्नैहिके धूमे कृशो मात्रां पिवेन्नरः । बलवांस्तु पिबेत्तावद् यावदश्रु न गच्छति ॥ ' परं द्विकालपायी स्यादह्नः कालेषु बुद्धिमान् ॥ ३६ ॥

प्रयोगे, स्नैहिके त्वेकं वैरेच्यं त्रिचतुः पिबेत् । कौन धूम कितनी बार पीना चाहिये - यद्यपि धूम पीने के उपर्युक्त आठ काल बताये गये है तथापि दिन के इन कालों में प्रायोगिक धूम केवल दो बार, स्नैहिक धूम एक बार और वैरेचनिक धूम तीन या चार बार पीना चाहिये ॥ ३६ ॥

विमर्श - धूमपान प्रायः कफज और वातज विकारों में पिया जाता है । जिस समय जिस दोष की प्रधानता हो उसी के अनुसार प्रायोगिक दो बार पीना चाहिए । यहाँ ' अह्नः कालेषु ' कहने से यह स्पष्ट है कि रात्रि में धूम नहीं पीना चाहिये | प्रायः स्नैहिक धूम वातविकारों में दिन में इन्हीं समयों में एक बार पिया जाता है - ' स्नेहनो वातं शमयति स्नेहादुपलेपाच्च ' ( चि. अ. ४० ) । वैरेचनिक धूम दिन में इन्हीं आठ समयों में तीन या चार बार पीना चाहिये । यह धूम कफ का उत्क्लेश कर उसे निकालता है - ' वैरेचनः श्लेष्माणमुत्क्लेश्यापकर्षति

रौक्ष्यात्तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद्वैशद्याच्च ' ( सु. चि. ४० ) ।

* हृत्कण्ठेन्द्रियसंशुद्धिर्लघुत्वं शिरसः शमः ॥ ३७ ॥

यथेरितानां दोषाणां सम्यक्पीतस्य लक्षणम् । सम्यक् धूमपान के लक्षण ( Signs of Proper Smoking ) 1- हृदय, कण्ठ, ज्ञानेन्द्रियों की शुद्धि, शिर का हलका होना और जो दोष बढ़े हुए हों उनकी शान्ति हो जाना ठीक - ठीक धूम पीने के लक्षण है ॥ ३७ ॥

* बाधिर्यमान्ध्यं मूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम् ॥ ३८ ॥

अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान् । अकाल में धूमपान तथा अति धूमपान के उपद्रव ( Complications ) - अकाल में ( ऊपर बताये हुये आठ कालों के अतिरिक्त काल में ) पिया हुआ और समय पर ही अधिक मात्रा में पिया हुआ धूमपान बधिरता, अन्धापन, मूकपन, रक्तपित्त और शिर में चक्कर आना ( Giddiness ) ये उपद्रव करता है ॥ ३८ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने अकाल में पीये गये धूम से होने वाले दोष इसप्रकार बताये हैं- ' अका-

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१२० चरकसंहिता लपीतः कुरुते भ्रममूर्च्छाशिरोरुजः । घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वानामुपघातं च दारुणम् || ' तथा अनियोग के उपद्रव इस प्रकार - ' तालुगलशोषपरिदाहपिपासामूर्च्छा - भ्रममदकर्णाक्षिदृष्टिनासारोगदौर्बल्या-न्यतियोगो जनयति ' ( सु. चि. अ. ४० ) । * तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम् ॥ ३ ९ ॥ स्नैहिकं धूमजे दोषे वायुः पित्तानुगो यदि । शीतं तु रक्तपित्ते स्याच्छ्लेष्मपित्ते विरूक्षणम् ॥ अकालपीत और अतिपीत धूमजन्य उपद्रवों की शान्ति के उपाय [ Management of Sompications ] – यदि वायु प्रधान रूप से प्रकुपित हो और अनुबन्ध रूप से पित्त भी प्रकुपित हो तो स्निग्ध द्रव्यों से सिद्ध किये हुये घृत का पान, नस्य, अञ्जन और तर्पण का, यदि रक्तपित्त की प्रधानता हो तो शीतल द्रव्यों से सिद्ध किये हुये घृत का पान, नस्य, अञ्जन और तर्पण का, और यदि कफ पित्त - की प्रधानता हो तो रूक्ष द्रव्यों से सिद्ध किये हुये घृत का पान, नस्य, अन और तर्पण का प्रयोग करना चाहिये ॥ ३ ९ -४० ॥ विमर्श -- उपद्रवों में मुख्य रूप से बात, रक्त तथा श्लेष्मा का प्रकोप बताया गया है । पित्त का सभी में अनुबन्ध रहता है । इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुये चिकित्सा करनी चाहिये । परं त्वतः प्रवच्यामि धूमो येषां विगर्हितः । न विरिक्तः पिबेद्धूमं न कृते बस्तिकर्मणि ॥४१ ॥

न रक्ती न विषेणार्तो न शोचन्न च गर्भिणी । न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे ॥४२ ॥

न मूर्च्छाभ्रमतृष्णासु न क्षीणे नापि च क्षते । न मद्यदुग्धे पीत्वा च न स्नेहं न च माक्षिकम् ॥ धूमं न भुक्त्वा दना च न रूक्षः क्रुद्ध एव च । न तालुशोषे तिमिरे शिरस्यभिहते न च ॥४४ ॥

न शङ्खके न रोहिण्यां न मेहे न मदात्यये । एषु धूममकालेषु मोहात्पिबति यो नरः ॥ ४५ ॥

रोगास्तस्य प्रजायन्ते दारुणा धूमविभ्रमात् । धूमपान के अयोग्य रोगी [ Contra Indications ] - अब इसके बाद जिन लोगों को धूमपान नहीं करना चाहिये उनका निर्देश कर रहे हैं । विरेचन करने के बाद, बस्ति देने के बाद, रक्तपित्त रोग से पीड़ित, विष से पीड़ित, शोक से दुःखी, गर्भिणी स्त्री को, थकावट ( Exhaustion ) के बाद, मदोन्मत्त होने पर, आमदोष में, पित्तज रोग में, रात्रि जागरण के बाद, मूर्च्छा ( Syncope ), भ्रम और तृष्णा रोग में, क्षीण तथा उरःक्षत रोग में, मदिरा और दूध पीने के बाद, स्नेह ( घृत, तैल इत्यादि ) पीने के बाद, मधु चाटने के बाद, दही के साथ भोजन करने के बाद, रूखे शरीर वाले, कोच से सन्तप्त, तालुशोष, तथा तिमिर ( Cataract ) रोग में, जिनके शिर में आघात लगा हो ( Head Injury ) तथा शंखक, रोहिणी ( Diphtheria ), प्रमेह और मदात्यय ( Alcoholism ) इन रोगों और स्थितियों में धूमपान नहीं करना चाहिये । इन उपर्युक्त रोगों एवं अवस्थाओं में जो अकाल में मोहवश ( अज्ञानतावश ) धूमपान करना है उसे धूमविभ्रम ( दोष ) से भयंकर रोग उत्पन्न होते हैं और वे बढ़ जाते हैं ॥ ४१-४५ ॥ विमर्श - इन अवस्थाओं में धूमपान करने से दारुण रोग होते हैं जैसे – ' भीतः क्रुद्धः शोकवांश्च दृष्टिहानिं भ्रमं कुमम् । वह्नर्ककर्मक्लान्तास्तु तथा दौर्बल्यमाप्नुयुः ॥ तृष्णास्यशोत्रमेहांस्तु क्षीणधातुः पुनः क्षयम् । रुजः पित्तानिलकृतान् व्याधीन् दौर्बल्यमेव च ॥ रक्तोल्वगः पैत्तिकश्च विवृद्धी रक्तपित्तयोः । पिपासार्त्तस्तानुशोषी मूर्त्तचलचेतनः । तेषां वृद्धिविशेषेण वाग्वातं मौनमेव च । ज्वरी मदात्ययी मद्यं पीत्वा च लभते नरः ॥ मोहं तृष्णां वक्त्रशोषं दृष्टिहानिं शिरोरुजम् । प्रजागरी शिरोरोगं निमिरी दृष्टिवैकुवम् ॥ विरिक्तो हृतदोषश्च शोषं तृष्णां शिरोरुजन् । दत्तवस्ति-१. ' न मद्यं न पयः पीत्वा ' इति यो. । २. ' न चापि भुक्तवान् दना ' यो ।

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १२१ ' दृष्टिहानिं क्षते भूयः क्षतामयान् ॥ धूमो गर्भस्य गर्भिण्याः शोषतापेन्द्रियन्यथाः । क्षौद्रसेवी घ्राण-दोषं त्वग्दोषं च समाप्नुयात् ॥ दधि स्नेहं पयो मत्स्यान् भुक्त्वा वा धूममाचरन् । दृग्दोषमूर्च्छा-हृल्लासच्छदः प्राप्नोति मानवः ' || अकाल में धूम पीने से ये दोष बताये गये हैं- ' अकालपीतः कुरुते भ्रममूर्च्छाशिरोरुजः । घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वानामुपघातं च दारुणम् ॥ ' ' धूमश्च द्वादशाद्वर्षाद्--गृह्यतेऽशीतिकान्न च ' । शार्ङ्गधर के अनुसार बारह वर्ष की आयु से पूर्व और अस्सी वर्ष की आयु के बाद का समय ही ' अकाल ' है । वाग्भट ने १८ अठारह वर्ष की आयु से पूर्व धूमपान करना मना किया है - ' न चोनाष्टादशे धूमः ' ( अष्टाङ्गहृदय सू. अ. २० ) * धूमयोग्यः पिबेद्दोषे शिरोघ्राणाक्षिसंश्रये ॥ ४६ ॥

प्राणेनास्येन कण्ठस्थे मुखेन घ्राणपो वमेत् । आस्येन धूमकवलान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत् ॥ प्रतिलोमं गतो ह्याशु धूमो हिंस्याद्धि चचुषी । नासिका से धूम निकालने में हानि - • शिर, नाक और नेत्रगत दोष हो और धूम पीने योग्य पुरुष हो तो उसे नासिका से धूमपान करना चाहिये । यदि कण्ठगत दोष हो तब मुख से धूम पीना चाहिये । नासिका से धूम पीने के बाद धूम को मुख से ही निकालना चाहिये । " धूम - कवल ( घूँट ) मुख से लेने पर नासिका से कभी भी न निकाले क्योंकि विरुद्ध मार्ग में गया हुआ धूम नेत्रों को नष्ट कर देता है ॥ ४६-४७ ॥ विमर्श - नासिका से धूमपान करने पर मुख से धूम निकालना और मुख से धूमपान करने पर भी मुख से ही धूम निकालना चाहिये । किसी भी अवस्था में नाक से धूम निकालने पर दृष्टि में हानि पहुँचती है । यहाँ धूम के भेदों का उल्लेख नहीं किया गया है पर अन्यत्र ६ भेद माने -गये हैं— ' धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा । रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः ॥ ' सुश्रुत ने अग्रांकित भेद माने हैं - ' धूमः पञ्चविधो भवति तद्यथा प्रायोगिकः स्नैहिको वैरेचनिकः कासनो वामनीयश्चेति ' और इनके प्रयोग के विषय में कहा है- ' विशेषतस्तु प्रायोगिकं घ्राणेनाददीत, स्नैहिकं मुखनासाभ्यां, नासिकया वैरेचनिकं मुखेनैवेतरौ ' तथा - ' प्रायोगिकं त्रींस्त्रीनुच्छ्वा -सानाददीत मुखनासिकाभ्यां पर्य्यायांस्त्रींश्चतुरो वेति, स्नैहिकं यावदश्रुप्रवृत्तिः, वैरेचनिकमादोष-दर्शनात्, तिलतण्डुलयवागूपीतेन पातव्यो वामनीयः, ग्रासान्तरेषु कासन्न इति ' ( चि. अ. ४० ) । ऋज्वङ्गचतुस्तच्चेताः सूपविष्टस्त्रपर्ययम् ॥ ४८ ॥

पिबेच्छिद्रं पिधायैकं दासया धूममात्मवान् । नाक से धूमपान करने की विधि - जितेन्द्रिय पुरुषों के लिये उचित है कि वे अपने अङ्ग-प्रत्यङ्ग और नेत्र को सीधा करके, धूमपान में अपने चित्त को लगा कर, सुखपूर्वक सीधे आसन से बैठ कर, नासिका का एक छिद्र बन्द कर तीन आवृत्ति द्वारा नाक से घूम का पान करें || ४८ ॥ विमर्श - धूम पीने योग्य पुरुष सीधे आसन से बैठ कर और अपने अङ्ग - प्रत्यङ्ग, विशेष कर नेत्रों को सीधा रख कर मुख ओष्ठ को खोल कर, धूमनेत्र के अग्रभाग में दृष्टि स्थिर कर एक नासिकापुर को बन्द कर तीन आवृत्ति में नासिका से धूमपान करें । यदि दूसरे नासिकापुट-से धूम पीना आवश्यक हो तो जिन नासिका छिद्र से धूम पीया गया है उसे बन्द कर तब दूसरे से धूम पीयें । सुश्रुत में - धूमपान की विधि इस प्रकार बतायी गई है - ' अथ सुखोपविष्ट ऋज्वधो-दृष्टिरतन्द्रितः स्नेहाक्तां प्रदीप्ताग्रां वर्ति नेत्रस्रोतसि प्रणिधाय धूमं पिबेत् ' ( चि. अ. ४० ) ॐ चतुर्विंशतिकं नेत्रं स्वाङ्गुलीभिर्विरेचने ॥४ ९ ॥ द्वात्रिंशदङ्गुलं स्नेहे प्रयोगेऽध्यर्धमिप्यते । ऋजु त्रिकोपार्फलितं कोलास्थ्यग्रप्रमाणितम् ॥५० ॥

१. ' ऋजु त्रिकोषमच्छिद्रं ' यो ।

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१२२ चरकसंहिता बस्तिनेत्र समद्रव्यं घूमनेत्रं प्रशस्यते । घूमनेत्र का परिमाण [ Size of Cigarette - Holder ] - - वैरेचनिक धूम पीने का नेत्र ( नली ) पीने वाले व्यक्ति की अङ्गुली से २४ अङ्गुल का, स्नैहिक, धूमपान के लिये ३२ अङ्गुल का, प्रायोगिक धूम पीने के लिए वैरेचनिक से १३ गुना लम्बा ( ३६ अङ्गुल का ) होना चाहिये । धूमनेत्र कोमल, तीन कोष वाला ( Containing Three Bulges ), बेर की गुठली जिसके अग्रभाग ( Proximal ) के छिद्र से निकल जाय, ऐसा होना चाहिए । बस्तिनेत्र के निर्माण में जो सुवर्ण आदि द्रव्य काम आते हैं, उन्हीं द्रव्यों से धूमनेत्र बनाया जाना श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ४ ९ -५० ॥ विमर्श - आचार्य चक्रपाणि ने प्रायोगिक धूमपान की नली ३६ अङ्गुल की बतायी है और उन्होंने ' अध्यर्द्ध ' का अन्वय ' चतुर्विंशति ' से किया है । उन्होंने प्रमाणस्वरूप जतुकर्ण का यह वचन उद्धृत भी किया है - ' सार्धस्त्र्यंशयुतः पूर्णो हस्तः प्रायोगिकादिषु ' । परन्तु सुश्रुत के अग्रांकित कथन से ४८ अङ्गुल वाले अर्थ का समर्थन होता है । ' अङ्गुलान्यष्टचत्वारिंशत्प्रायोगिके, द्वात्रिंशत् स्नेहने, चतुर्विंशतिर्विरेचने ' ( चि ० अ ० ४० ) । वाग्भट ने तो बताया है कि - ' तीक्ष्ण-स्नेहनमध्येषु त्रीणि चत्वारि पञ्च च । अङ्गुलीनां क्रमात् पातुः प्रमाणेनाष्टकानि तत् ' ( अ. ह. सू. २१ ) अर्थात् तीक्ष्ण धूम में ( ८ का ३ से गुणा करने पर ) २४, स्नेहन में ( ८ का ४ से गुणा करने पर ) ३२ और मध्य ( प्रायोगिक ) में ( ८ का ५ से गुणा करने पर ) ४० अङ्गुल का नेत्र होना चाहिये । इसी का समर्थन शार्ङ्गधर ने भी किया है यथा - ' चत्वारिशन्मितेस्तद्वद्द्द्वात्रिंशद्भिर्मृदो स्मृता । तीक्ष्णे चतुर्विंशतिभिः कासने षोडशोन्मितैः ॥ ' वास्तव में सुविधानुसार नेत्र की लम्बाई रख कर यथावश्यक प्रयोग करना चाहिये । चक्रपाणि ने त्रिकोष का अर्थ ' त्रिपर्व ' किया है इससे

Three Joints or Curves or Bulgings लिये जा सकते हैं ।

दूराद्विनिर्गतः पवच्छिन्नो नाडीतनूकृतः ॥ ५१ ॥

नेन्द्रियं बाधते धूमो मात्राकालनिषेवितः । घूमनेत्र से पान में लाभ- मात्रा और नियत काल पर पीया गया धूम इन नलियों में दूर: से निकले हुये तीन कोषाकार पर्वों में कमजोर होकर ( कम वेगवाला होकर ) नेत्र में क्रमशः पतला हो जाता है अतः पीने पर इन्द्रियों में किसी प्रकार, कोई भी बाधा नहीं होती ॥ ५१ ॥

* यदा चोरश्व कण्ठश्च शिरश्च लघुतां व्रजेत् ॥ ५२ ॥

कफश्च तनुतां प्राप्तः सुपीतं धूममादिशेत् । उचित धूमपान के लक्षण [ Symptoms of Proper Smoking ] - धूम पीने के बाद जब उरःप्रदेश, कण्ठ और शिर हलका हो जाय और कफ तनु ( पतला ) हो जाय तो धूम उचित मात्रा में पीया गया है ऐसा समझना चाहिये ॥ ५२ ॥

अविशुद्धः स्वरो यस्य कण्ठश्च सकफो भवेत् ॥ ५३ ॥

स्तिमितो मस्तकश्चैवमपीतं धूममादिशेत् । धूमपान के अयोग के लक्षण [ Symptoms of Low Indulgence of Smoking ] -यदि धूमपान करने के बाद भी रोगी का स्वर शुद्ध न हो, कण्ठ में कफ भरा हो और शिर जकड़ा हुआ हो तो समझना चाहिये कि धूमपान उचित मात्रा में नहीं हुआ हैं ॥ ५३ ॥

तालु मूर्धा च कण्ठश्च शुष्यते परितप्यते ॥ ५४ ॥

तृष्यते मुह्यते जन्तू रक्तं च स्रवतेऽधिकम् । शिरश्च भ्रमतेऽत्यर्थं मूर्च्छा चास्योपजायते ॥५५ ॥

इन्द्रियाण्युपतप्यन्ते धूमेऽत्यर्थं निषेविते ।

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मात्राशितीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् १२३ धूमपान के अतियोग का लक्षण [ Symptoms of Over Indulgence of Smoking ] --धूमपान का अतियोग होने से तालु, शिर और कण्ठ- शुष्कता ( dryness of the throat ) और उनमें दाह, प्यास में वृद्धि, मोह, अधिक रक्त का स्राव ( Haemmorhage ) अत्यधिक शिरोभ्रम, मूर्च्छा तथा सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में विकलता भी होने लगती है ॥ ५४-५५ ॥ * वर्षे वर्षेऽणुतैलं च कालेषु त्रिषु ना चरेत् ॥ ५६ ॥

प्रावृट्शरवसन्तेषु गतमेघे नभस्तले । नस्यकर्म यथाकालं यो यथोक्तं निषेवते ॥५७ ॥

न तस्य चतुर्न घ्राणं न श्रोत्रमुपहन्यते । न स्युः श्वेता न कपिलाः केशाः श्मश्रूणि वा पुनः ॥ न च केशाः प्रमुच्यन्ते वर्धन्ते च विशेषतः । मन्यास्तम्भः शिरःशूलमदितं हनुसंग्रहः ॥

पीनसार्धावभेदौ च शिरःकम्पश्च शाम्यति । सिराः शिरःकपालानां सन्धयः स्नायुकण्डराः ॥

नावनप्रीणिताश्वास्य लभन्तेऽभ्यधिकं बलम् ।

मुखं प्रसन्नोपचितं स्वरः स्निग्धः स्थिरो महान् ॥ ६१ ॥

सर्वेन्द्रियाणां वैमल्यं बलं भवति चाधिकम् । न चास्य रोगाः सहसा प्रभवन्त्यूर्ध्वजनुजाः ॥ जीर्यतश्चोत्तमाङ्गेषु जरा न लभते बलम् । ( ३ ) नस्य से लाभ - प्रतिवर्ष वर्षा, शरद् और वसंत में जब आकाश में मेघ न हों तब अणु-तैल का नस्य प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार समय के अनुसार विधिपूर्वक जो नस्य का सेवन करता है उसके नेत्र, प्राणेन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय नष्ट नहीं होने पाती हैं । उसके केश और दाढ़ी के बाल श्वेत तथा पिंगल वर्णं को नहीं प्राप्त होते हैं । केश गिरते नहीं अपितु विशेषकर बढ़ते हैं । इस अणु तेल के विधिपूर्वक नस्यसेवन से मन्यास्तंभ ( Torticollis ), शिरःशूल ( Headache ), अर्दित ( Facial Paralysis ), हनुस्तंभ ( Lock - jaw ), पीनस ( Chronic Coryza ), अर्धात्रभेदक ( Hemierania ) तथा शिरःकंप रोग शान्त होते हैं । शिरःकपाल की सिरायें, संधियाँ, स्नायु और कण्डरा इस अणुतेल के नस्य से तृप्त होकर अधिक बलवान होती हैं । मुख प्रसन्न और उपचययुक्त अर्थात् मांस से भरा हुआ प्रतीत होता है । स्वर स्निग्ध, स्थिर और गंभीर होता है । सभी इन्द्रियाँ स्वच्छ और अधिक बलवान होती हैं । जत्रुप्रदेश के ऊपरी भाग में होने वाले कोई भी रोग सहसा नहीं होते । वृद्धावस्था आने पर भी उत्तमांग ( शिर आदि ) में उसके लक्षण प्रकट नहीं होते ॥ ५६-६२ ॥ 8 चन्दनागुरुणी पत्रं दार्वीत्वमधुकं वलाम् ॥ ६३ ॥

प्रपौण्डरीकं सूचमैलां विडङ्गं बिल्वमुत्पलम् । ह्रीवेरमभयं वन्यं त्वङ्मुस्तंसारिवां स्थिराम् ॥ जीवन्तीं पृश्निपर्णी च सुरदारु शतावरीम् । हरेणुं बृहतीं व्याघ्रीं सुरभीं पद्मकेशरम् ॥ ६५ ॥

विपाचयेच्छतगुणे माहेन्द्रे विमलेऽम्भसि । तैलाद्दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत् ॥ ६६ ॥

तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत् । अथास्य दशमे पाके समांशं छागलं पयः ॥ ६७ ॥

दद्यादेपोऽणुतैलस्य नावनीयस्य संविधिः । अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत तैलस्यार्धपलोन्मिताम् ॥ faraftaaran ङ्गस्य चुना नावनैस्त्रिभिः । त्र्यहात्र्यहाञ्च सप्ताहमेतत्कर्म समाचरेत् ॥ निवातोष्णसमाचारी हिताशी नियतेन्द्रियः । तैलमेतत्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥७० ॥

प्रयुञ्जानो यथाकालं यथोक्तानश्नुते गुणान् । अणु की निर्माण विधि - चन्दन, अगर, तेजपत्र, दारूहल्दी की छाल, मुलेठी, बला, प्रपौण्डरीक, छोटी इलायची, वायविडङ्ग, बेल, नीलकमल, सुगन्धवाला, खस, वन्य ( केवटी मोथा ), दालचीनी, नागरमोथा, सारिवा ( अनन्तमूल ), सरिवन, जीवन्ती, पिठिवन, देवदारु, १. ' वर्त्मवर्षे ' ग. । २. ‘ प्रलुच्यन्ते ' ग. ' प्रलुप्यन्ते ' यो. ।

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१२४ चरकसंहिता शतावर, रेणुका, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, सुरभी ( शुकशिम्बा - चक्र ०; केवांच के बीज ) और कमल का केशर इन सभी द्रव्यों को लेकर सौ - गुने आकाशीय जल में क्वाथ करें, जब यह क्काथ तेल से दशगुना शेष रह जाय तो उतार कर शीतल होने पर कपड़े से छान लें । इस क्वाथ में से प्रति बार भाग काथ लेकर तैल सिद्ध करने की विधि के अनुसार उसे ९ बार सिद्ध करें । अन्त में जब दसवों बार क्वाथ लेकर पकाने लगे तब तैल के बराबर बकरी का दूध मिला कर पुनः पाक करें । इस प्रकार पकाया हुआ यह अणुतैल नस्यविधि में प्रयुक्त होता है । इस तैल की आधा पल ( २ तो ० ) की मात्रा प्रयोग करनी चाहिये । तेल प्रयोग करने की विधि-सर्वप्रथम उत्तमांग ( शिर ) का स्नेहन - स्वेदन करने के बाद पिचु ( Cotton Swab ) को २ तोले अणुतैल में भिगो कर तीन बार नस्य दे । अर्थात् तीन बार में २ तोले तैल का प्रयोग कर डालना चाहिये । इस प्रकार प्रतिदिन तीन - तीन बार तीन - तीन दिन पर नस्य लेना चाहिये, अर्थात् एक दिन का अन्तर देकर ( on alternate days ) सात बार नस्य का सेवन करना चाहिये । नस्य लेते समय मनुष्य तेज वायुरहित उष्ण प्रदेश में रहे और हितकारी भोजन का सेवन करते हुए अपनी इन्द्रियों को वश में रखे । यह तैल त्रिदोषनाशक तथा इन्द्रियों को बल देने वाला है । समुचित काल में प्रयोग करने से यह तैल उपर्युक्त गुणों को देने वाला होता है ॥ ६३-७० ॥ विमर्श - उपर्युक्त अणुतैल के निर्माण में सामान्य - तैल - निर्माण की अपेक्षा दो अधिक विशेषतायें हैं । ( १ ) इसमें तैल का दश बार पाक किया गया है, अतएव इससे तैल के अणु अणु में औषधि का संस्कार हो जाता है । नासा प्रयोग के लिये थोड़ी मात्रा में तैल अधिक गुणकारी हो तो प्रयोग करने में सुविधा होती है । ( २ ) इसमें द्रव्यों से क्वाथ बनाने के लिये सौ- गुना जल लिया गया जो सामान्य नियम का अपवाद है । यद्यपि चक्रपाणि इससे सहमत प्रतीत नहीं होते लेकिन स्पष्ट निर्देश होने से उपर्युक्त विधि का पालन ही उचित प्रतीत होता है । इस सम्बन्ध में यह ज्ञातव्य है कि केरल के वैद्य दशावर्त ( 10 times ) तथा शतावर्त ( 1C0 times ) तैलों का निर्माण करते हैं । शायद इस प्रकार के तैलपाक का उद्देश्य तैलों की Potency ( शक्ति ) बढ़ाना हो । आजकल भी केरल के वैद्य इस प्रकार के तैल का ' निर्माण कर सफलता के साथ प्रयोग करते हैं । वे इनकी मात्रा बूँदों ( Drops ) में देते हैं । उत्तर भारत के वैद्य जिस प्रकार अभ्रकादि शतपुटी तथा सहस्रपुटी भस्मों के निर्माण में रुचि लेते हैं उसी प्रकार तैलों के निर्माण में रुचि लेने लगें तो भारत के इस भाग में प्रयोग होने से इस प्रकार के तैलों की कार्यक्षमता के बारे में वैज्ञानिक अनुसन्धान करने वालों को सामग्री जुटाने में सुविधा होगी । नस्य लेने की विधि सिद्धिस्थान ( अ. ९ ) में इस प्रकार बनायी गई है, यथा- ' उत्तानस्य शयानस्य शयने स्वास्तृते सुखम् । प्रलम्बशिरसः किञ्चित् किञ्चित् पादोन्नतस्य च ॥ दद्यान्नासापुढे स्नेहं तर्पणं बुद्धिमान् भिषक् । अनवाक्शिरसो नस्यं न शिरः प्रतिपद्यते । अत्यवाक्शिरसो नस्यं मस्तुलुङ्गे च तिष्ठति । अत एव शयानस्य शुद्धयर्थं स्वेदयेच्छिरः ॥ संस्वेद्य नासामुन्नाम्य वामेनाङ्गु पर्वगा | हस्तेन दक्षिणेनाथ दद्यादुभयतः समम् ॥ प्रनाड्या पिचुना वापि नस्तः खं यथाविधि । ' इस अगुनैल का नस्य एक दिन का व्यवधान करके ( On alternate day ) देना चाहिये और सात बार देना चाहिये । एकान्तर विधि से सात बार नस्य देने के लिये १३ दिन को आवश्यकता है । इसीलिये चक्रपाणि ने एक ऋतु में स्वस्थ व्यक्ति के लिये नस्य लेने का १३ दिन का क्रम ( Course ) बताया है । यह सात बार का क्रम सामान्य विवि है । दोष की न्यूनता या अधिकता के आधार पर इससे कम या अधिक दिनों तक भी नस्य का प्रयोग किया जा सकता है, जैसा कि अष्टाङ्गसंग्रह में कहा गया है, यथा- ' अनेन विधिना पञ्च सप्त नव वा दिनानि दद्यात्

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मात्राशितीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् १२५ आसम्यग्योगाद्वा ' ( सू. अ. २ ९ ) तथा भोज ने भी कहा है- ' एकान्तरं द्वथन्तरं वा सम्यग्दद्या-द्विचक्षणः । सप्ताहं तु परं देयं विश्रान्तस्य पुनःपुनः ॥ पञ्चविंशतिरात्रं वा यावदा साधु मन्यते । ' पति द्वौ कालौ कषायकटुतिक्तकम् ॥ ७१ ॥

भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन् । ( ४ ) दन्तपवन ( दातौन ) का वर्णन - जिसका अग्रभाग कुचला ( Crushed ) गया हो और जो रस में कषाय, कटु तथा तिक्त हो ऐसे दातौन से दांत के मांस ( Gums ) की आघात से रक्षा करते हुये प्रातः सायं दो बार दातौन करनी चाहिये ॥ ७१ ॥

विमर्श - ' द्वौ कालौ ' से प्रातः तथा सायंकाल लेना चाहिये । यक्ष्मा - चिकित्सा में भी बताया गया है -- ' द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम् ' । दोनों स्थानों पर चक्रपाणि ने सायं तथा प्रातः इस प्रकार दो काल लिये हैं । अष्टाङ्गमंग्रह में भी प्रातः और भोजन के बाद ( सायंकाल ) दातौन करने का विधान बताया गया है - ' तच्च द्वादशाङ्गुलायतं कनिष्ठिकाग्र समस्थूलम् । प्रातर्भुक्त्वा च यतवाग्भक्षयेद्दन्तधावनम् ॥ ' ( सू. अ. ३ ) निहन्ति गन्धं वैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम् ॥ ७२ ॥

निष्कृष्य रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम् । दातौन करने से लाभ - दातौन करने से मुख की दुर्गन्धि, विरसता तथा जिह्वा, दाँत और मुख में उत्पन्न होने वाले मलों के निकल जाने से भोजन में रुचि उत्पन्न होती है और शीघ्र ही दाँत साफ हो जाते हैं ॥ ७२ ॥

विमर्श - यहाँ दाँतों को साफ करने के लिये दातौन ( दन्तपवन ) का ही विधान है पर सुश्रुत ने इसके लिए मञ्जन करने का विधान बताया है, यथा - ' क्षौद्रव्योषत्रिवर्गोक्तं सतैलं लवणेन च ।

चूर्णेन तेजोवत्याश्च दन्तान्नित्यं विशोधयेत् ॥ ' ( चि. २४ ) ।

करञ्जकरवीरार्कमालतीककुभासनाः ॥ ७३ ॥

शस्यन्ते दन्तपवने ये चाप्येवंविधा द्रुमाः 1 उत्तम दातौन - करअ, कनेर, मदार, मालती, अर्जुन, असन और इन्हीं के समान अन्य वृक्ष दातौन के लिये उत्तम होते हैं ॥ ७३ ॥

विमर्श- -सुश्रुत - में दातौनसम्बन्धी वर्णन विशेष रूप में इस प्रकार मिलता है - ' तत्रादौ दन्त-पवनं द्वादशाङ्गुलमायतम् । कनिष्ठिका परीणाहमृज्वग्रथितमव्रणम् ॥ अयुग्मग्रंथिमच्चापि प्रत्यग्रं शस्त-भूमिजम् । अवेक्ष्यतुं च दोषं च रसं वीर्य्यं च योजयेत् ॥ कषायं मधुरं तिक्तं कटुकं प्रातरुत्थितः । निम्बश्च तिक्तके श्रेष्ठः कषाये खदिरस्तथा ॥ मधुको मधुरे श्रेष्ठः करअः कटुके तथा । एकैकं घर्षयेद्दन्तं मृदुना कूर्च्चकेन च ॥ ' ( चि. अ. २४ ) | दातौन के लिये कुछ अधिक वृक्षों की संख्या स्मृति-ग्रन्थों में भी बता दी गयी है - ' खदिरश्च कदम्बश्च करअश्च तथा वटः । तिन्तिडी वेणुपृष्ठं च आम्न-निम्बौ तथैव च ॥ अपामार्गश्च विल्वश्च अर्कश्चोदुम्बरस्तथा । एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधावन-कर्मणि ॥ ' अष्टाङ्गसंग्रह में यह भी निर्देश किया गया है कि निम्नांकित वृक्षों की दातौन नहीं करनी चाहिये, यथा — ' नैव श्लेष्मातकारिष्टविभीतधवधन्वजान् । बिल्ववञ्जुलनिर्गुण्डीशिग्रतिल्वक-तिन्दुकान् ॥ कोविदारशमीपीलुपिप्पलेङ्गुदगुग्गुलून् । पारिभद्रकमम्लीकामोचक्यौ शाल्मली शणम् ॥ स्वाद्वम्ललवणं शुष्कं सुषिरं पूति पिच्छिलम् । पालाशमासनं दन्तधावनं पादुके त्यजेत् ॥ ' ( सू. अ. ३ ) । निम्नांकित रोगों में दातौन न करने का विधान सुश्रुत ने किया है- ' न खादेद्गलताल्वोष्ठ-जिह्वारोगसमुद्भवे । अथास्यपाके श्वासे च कासहिकावमीषु च ॥ दुर्बलोऽजीर्णभक्तश्च मूर्च्छार्त्तो मदपीडितः । शिरोरुगार्त्तस्तृषितः श्रान्तः पानकुमान्वितः ॥ अदिती कर्णशूली च दन्तरोगी च

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१२६ चरकसंहिता मानवः ॥ ' ( चि. अ. २४ ) जिन्हें दातौन नहीं करना चाहिये उन्हें मुखशुद्धि के लिये मञ्जन करके मुखशोधन कर लेना चाहिये । क्षेमकुतूहल में गण्डूष ( Gargle ) से मुख की शुद्धि बतायी गयी है, यथा- ' अलाभे दन्तकाष्ठस्य निषिद्धदिवसेषु वै । अपां द्वादश गण्डूषैर्मुखशुद्धिविधीयते ॥ ' दातौन या मञ्जन या गण्डूष का प्रयोग स्वस्थ व्यक्ति के अलावा रोगियों में भी आवश्यक होता है, जैसे संततज्वर ( Typhoid ) के रोगियों में मुखशोधन न करने से अन्त में कर्णमूलशोथ ( Parot •

iditis ) हो जाता है जो दारुण होता है ।

सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च ॥ ७४ ॥

जिह्वानिर्लेखनानि स्युरतीच्णान्यनृजूनि च । जिह्वामूलगतं यच्च मलमुच्छ्वासरोधि च ॥७५ ॥

दौर्गन्ध्यं भेजते तेन तस्माजिह्वां विनिर्लिखेत् । ( ५ ) जिह्वा निर्लेखन का वर्णन तथा उससे लाभ - • जिह्वा के मैल को निकालने के लिये जिह्वा-निर्लेखन ( Tongue Scraper ) सोना, चांदी, तामा, रांगा अथवा पीतल का बनाना चाहिये । परन्तु निर्णय करते समय यह ध्यान में रखना चाहिये कि इनके अग्रभाग तेज न हों ( Blunt edge ) तथा ये आकार में टेढ़े ( Curved ) हों । जिह्वा के मूल भाग में रहने वाला मल श्वास - प्रश्वास की क्रिया में बाधा पहुँचाता है तथा मुख में दुर्गन्धि उत्पन्न करता है अतएव उसे जिह्वानिर्लेखन से निकाल देना चाहिये ॥ ७४-७५ ॥ विमर्श - ऊपर तो धातुनिर्मित हो जिह्वानिर्लेखन का वर्णन है । परन्तु सुश्रुत ने वृक्ष के भी जिह्वानिर्लेखन से जिह्वा साफ करने को बताया है । आजकल प्रायः दातौन को चीर कर ही जिह्वा को साफ किया जाता है तथा Plastic के भी जिहानिर्लेखन मिलते है । दातौन की लम्बाई १२ अङ्गुल और जिह्वानिर्लेखन की लम्बाई १० अङ्गुल बतायी गयी है, यथा- ' जिह्वा -निर्लेखनं रौप्यं सौवर्णं वार्क्षमेव च । तन्मलापहरं शस्तं मृदु ऋक्ष्णं ' दशाङ्गुलम् ॥ ' धार्याण्यास्येन वैशद्यरुचि सौगन्ध्यमिच्छता ॥ ७६ ॥

जातीकटुकपूगानां लवङ्गस्य फलानि च । कक्कोलस्य फलं पत्रं ताम्बूलस्य शुभं तथा ॥ ७७ ॥

तथा कर्पूरनिर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च ॥ ( ६ ) मुख में सुगन्धित द्रव्यों का धारण - मुख की स्वच्छता, भोजन में रुचि और मुख को सुगन्धित रखने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों के लिये उचित है कि वे जायफल, कटुक ( लता-कस्तूरी - चक्र ० ) का फल, पूगफल ( सुपारी ), लवंग का वृन्त, कंकोल ( शीतलचीनी ), सुन्दर पान की पत्ती, कर्पूर, छोटी इलायची का फल इन सबको मुख में धारण करें ॥ ७६-७७ ॥ विमर्श - उपर्युक्त पान को स्वतन्त्र रूप से लेने को कहा गया है परन्तु अष्टांगसंग्रह ने इन सब को पान के साथ लेनाबताया है, यथा- ' रुचिवैशद्यसौगन्ध्यमिच्छन्वक्त्रेण धारयेत् । जातीलवङ्गकर्पूर-कंकोलकटुकैः सह । ताम्बूलीनां किसलयं हृद्यं पूगफलान्वितम् ॥ विषमूर्च्छामदार्तानामपथ्यं शोषिणां च तत् । ' ( अ. सं. सू. ३ ) तथा सुश्रुत ने भी इसका समर्थन किया है, यथा - ' कर्पूरजातिकंकोल -लवङ्गकटुकाह्रयैः । सचूर्णपूगैः सहितं पत्रं ताम्बूलजं शुभम् ॥ मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम् । हनुदन्तस्वरबलजिह्येन्द्रियविशोधनम् || प्रसेकशमनं हृद्यं गलामयविनाशनम् । पथ्यं सुप्तोत्थिते भुक्तं स्नाते वान्ते च मानवे ॥ रक्तपित्तक्षतक्षीणे नृणां मूर्च्छापरीतिनाम् । रूक्षदुर्बलमर्त्यानां न हितं चास्यशोषिणाम् ॥ ' ( सु. चि. अ. २० ) । यद्यपि जायफल आदि का सेवन अलग - अलग किया जा सकता है परन्तु केवल सुपारी का सेवन स्मृतिग्रन्थों में अनुचित बताया गया है - ' अनिधाय मुखे पर्णे यः पूगं खादते नरः । मतिभ्रंशो दरिद्री स्यादन्ते न स्मरते हरिम् ॥ ' ( सुषेणदेव ) तथा — ' विना १. ' मुखम् ' इति शेषः ।

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १२७ पर्णं मुखे दत्त्वा गुवाकं भक्षयेद्यदि । तावद्भवति चाण्डालो यावद्गङ्गां न गच्छति ॥ ताम्बूलं विधवा स्त्रीणां यतीनां ब्रह्मचारिणाम् । तपस्विनाञ्च विप्रेन्द्र गोमांससदृशं ध्रुवम् ॥ ' ( ब्रह्मवैवर्त ) | कुछ विद्वान् निम्नलिखित प्रकार से पाठशुद्धि करना पसन्द करते हैं - ' तथा कर्पूरनिर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च । ' के बाद - ' सार्द्ध ताम्बूलपत्रेण भक्षयेत्मततं हितम् । ' हन्वोर्बलं स्वरबलं वदनोपचयः परः ॥ ७८ ॥

स्यात् परं च रसज्ञानमन्ने च रुचिरुत्तमा । न चास्य कण्ठशोषः स्यान्नौष्ठयोः स्फुटनाद्भयम् ॥ न च दन्ताः क्षयं यान्ति दृढमूला भवन्ति च । न शूल्यन्ते न चाम्लेन हृप्यन्ते भक्षयन्ति च ॥ परानपि खरान् भच्यांस्तैलगण्डूषधारणात् । ( ७ ) स्नेहगण्डूष से लाभ - • तैल का गण्डूष धारण करने से हनु और स्वर में बल की तथा चंदन में मांस की अच्छी प्रकार वृद्धि होती है । जिह्वा शुद्ध होती है, जिससे रसों का ज्ञान तथा अन्न में रुचि उत्तम प्रकार से होती है । मुख और कण्ठ में कभी भी शुष्कता नहीं आती ओठों के फटने का भय नहीं रह जाता । दाँतों का नाश नहीं होता अपितु उनका मूल दृढ़ होता है और उनमें शूल नहीं होता । खट्टे वस्तुओं के भक्षण करने पर भी दन्तहर्ष ( दाँत में खट्टापन ) ) नहीं होता और दाँत इतने दृढ़ हो जाते हैं कि अत्यधिक कठोर द्रव्यों का भक्षण करने पर भी उनमें विकृति नहीं आती है ॥ ७८-८० ॥ विमर्श - स्नेह को मुख में इतना भर कर धारण किया जाता है कि मुख को चला न सकें, तब उसे गण्डूष कहा जाता है । मुख में द्रव्यों को ' गण्डूष ' और ' कवल ' इन दो रूपों में धारण किया जाता है । ' कवल ' उसे कहते हैं जिसको मुख में धारण करने पर मुख चलाया जा सके, यथा — ' असंचारी मुखे पूर्णे गण्डूषः कवलश्चरः । तत्र द्रवेण गण्डूषः कल्केन कवलः स्मृतः ॥ ’ यह गण्डूष चार प्रकार का होता है, यथा- ' चतुर्विधः स्याद्गण्डूषः स्नैहिकः शमनस्तथा । शोधनो रोपणश्चैव कवलश्चापि तद्विधः ॥ ' अर्थात् ( १ ) स्लैहिक, ( २ ) शमन ( या प्रसादन ), ( ३ ) शोधन, ( ४ ) रोपण | इनका प्रयोग क्रमशः वात - पित्त - कफ - जन्य रोगों में और मुखगत व्रणों में किया जाता है, यथा- ' स्निग्धोष्णैः स्नैहिको वाते स्वादुशीतैः प्रसादनः । पित्ते, कट्वम्ललवणैरुष्णैः संशोधनः कफे ॥ कषायतिक्तमधुरैः कदुष्णो रोपणो व्रणे ॥ ' गण्डूष का सेवन पाँच वर्ष की अवस्था से लेकर मृत्यु- पर्यन्त किया जाता है, यथा- ' धार्यते पञ्चमाद्वर्षाद्गण्डूषकवलादयः । ' गण्डूष तब तक धारण करना चाहिये जब तक नेत्र तथा नासिका से जल का स्राव न होने लगे और दोषों का नाश न हो जाय यथा— ' कफपूर्णास्यता यावच्छेदो दोषस्य वा भवेत् । नेत्रघ्राणस्रुतिर्यावत्तावद्गण्डूष-धारणम् ॥ ' वातज मुखरोगों में और स्वस्थावस्था में स्नेह और गण्डूष लेना हितकर होता है । सुश्रुत ने भी कहा है — ' मुखर्वैरस्य दौर्गन्ध्य शोफजाड्यहरं परम् । दन्तदार्व्यकरं रुच्यं स्नेहगण्डूष-धारणम् । ' ( सु. चि. अ. २४ ) । नित्यं स्नेहार्द्रशिरसः शिरःशूलं न जायते ॥ ८१ ॥

न खालित्यं न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च । बलं शिरःकपालानां विशेषेणाभिवर्धते ॥

दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च । इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वग्भवति चाननम् ॥ निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूर्ध्नि तैल निषेवणात् । ( ८ ) सदा शिर पर तैल धारण करने से लाभ – जिन व्यक्तियों का शिर स्नेह ( तेल ) से सदा उन्हें आर्द्र ( तर ) रहता है उसे शिर की पीडा कभी नहीं होती है, खालित्य ( Baldness ) भी नहीं होता है, पालित्य ( असमय में वालों का श्वेत होना ) नहीं होता है, केश नहीं गिरते हैं शिरः कपाल में अधिक रूप में बल की वृद्धि होती है । केश का मूल दृढ़ होता है, बाल अधिक