चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 201–210

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 201–210

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१०८ चरकसंहिता १ ग्राम मांस तत्त्व - - शरीर में - ४०१ कैलोरी ताप उत्पन्न करता है । १ " बसा ९ ०४ " " " " 99 37 १ 23 शाकतत्त्व ४०० 23 " 99 " ' शारीर नापमूल्य ' ( Physiological heat value ) और भौतिक नापमूल्य ( Physical heat value ) में अन्तर है । शारीर तापमूल्य ताप की वह मात्रा है जो शरीर में आहारद्रय के ज्जलन से उत्पन्न होती है तथा भौतिक तापमूल्य ताप की वह मात्रा है जो शरीर के बाहर भौतिक यन्त्रों में आहार को जलाने से प्राप्त होती है । यथा मांसतत्त्व का भौनिकतापमूल्य ५०६ है, किन्तु इसका शारीरतापमूल्य ४०१ ही है । इसका कारण यह है कि १ ग्राम मांसतत्त्व से ग्राम यूरिया उत्पन्न होता है जिसमें ००८५ ताप नष्ट हो जाता है । पूर्ण विश्राम काल में लगभग १८०० कैलोरी ताप शरीर की भौतिक क्रियाओं के समुचित रूप से निर्वाह के लिये आवश्यक है । अधिक परिश्रम के समय यह ६००० तक हो जाता है । आयु के अनुसार भी इसमें विभिन्नता होती है । एक औसत व्यक्ति के लिये निम्नांकित आहार उत्तम हो सकता है— मांसनत्त्व ( Protien ) वसा ( Fat ) औंस ४०५ ३०५ " " शाकतत्त्व ( Carbohydrate ) १४ लवण ( Salts ) १ तापमूल्य ३०७० " " 22 कैलोरी अधिक परिश्रम के समय इसकी मात्रा कुछ बढ़ा दी जानी चाहिये । इनके अतिरिक्त तापमूल्य कम रहने पर भी उनमें लवणों एवं जीवनीय द्रव्यों की उपस्थिति के कारण फल और हरे शाक भी भोजन में आवश्यक हैं । मांसव के प्रभाव - मांसतत्त्व के तीन कार्य होते हैं - ( १ ) नये तन्तुओं के निर्माण द्वारा पूर्ति करना । ( २ ) शरीर में नये द्रव्य यथा अधिवृक्क - ग्रन्थिस्राव उत्पन्न करना । ( ३ ) शरीर को नाप और शक्ति प्रदान करना । मांसतत्त्व के अधिक उपयोग से शरीर में नाइट्रोजन का आधिक्य हो जाता है, अतः उपर्युक्त कार्यों के प्रथम दो कार्य, उनमें भी मुख्यतः प्रथम कार्य के लिये उनका उपयोग किया जाता है और शेष कार्य के लिये वसा और शाकतत्त्व का प्रयोग किया जाना है । मांसतत्त्व के द्वारा जितना नाइट्रोजन शरीर के भीतर लिया जाता है यदि उससे अधिक नाइट्रोजन का उत्सर्ग हो तो वह धातुक्षय का सूचक है । इसके विपरीत, यदि ली गई मात्रा से नाइट्रोजन का उत्सर्ग कम हो, तो वह शरीर में मांस के निर्माण का सूचक है । भोजन में मांस तत्व की कमी होने से पेशी का विकास कम होता है तथा रोगक्षमता भी कम हो जाती है । मांसतत्त्व में एक विशिष्ट गुण यह होता है कि इससे शरीर की समीकरणात्मक क्रियायें उत्तेजित हो जाती है अतः नाप का उत्पादन अधिक होता है । इसलिये शीत काल तथा शीत देशों में मांसतत्त्व के अधिक परिमाण की आवश्यकता होती है और वस्तुनः उन दिनों उसका व्यवहार भी अधिक होता है । इस गुण को मांसतत्त्व का विशिष्ट प्रेरक धर्म ( Specific dynamic action ) कहते हैं | जान्तव और औद्भिद मांस्तत्त्वों की तुलना - ( १ ) जान्तव मांसत्त्व अधिक सुपाच्य अतः बुद्धिजीवियों के लिये अधिक उपयोगी होता है । यह देखा गया है कि जान्तत्र मांसनत्त्व का ९ ७ प्रतिशत तथा औद्भिद मांस का ८५ प्रतिशत शरीर में शोषित होता है । ( २ ) औद्भिद मांस में शक्ति कम होती है । ( ३ ) उतने ही मांस तत्व के लिये अधिक शाकाहार की आवश्यकता होती है । ( ४ ) पोषकता की दृष्टि से भी औद्भिद मांस्तत्त्व जान्नव मांस तत्व की अपेक्षा हीन होना है ।

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १०६ वसा और शाकतत्व के प्रभाव — दोनों ही पदार्थ शरीर को ताप एवं शक्ति प्रदान करते हैं, फिर भी दोनों ही शरीर के सामान्य समीकरण के लिये आहार में आवश्यक हैं । वसा नाइट्रोजन की उत्पत्ति बढ़ाता है और शाकतत्त्व उसको कम करता है और इस प्रकार उसकी मात्रा को स्थिर रखता है । वसा सेवन प्रतिदिन ६० ग्राम से कम नहीं होना चाहिये । बच्चों को तो इससे भी अधिक मात्रा आवश्यक है । कटुजनक तथा प्रतिकटुजनक पदार्थ ( Ketogenic and Antiketogenlo: - शरीर में वसा का पूर्ण चलन तभी होता है जब कि उसी समय कुछ शर्करा का भी उक्लन हो रहा हो, अन्यथा उसका ज्वलन अपूर्ण ही होता है और उससे पसिटोन पदार्थ बनते हैं । इसलिये शाकतत्त्व प्रतिकटुजनक कहलाते हैं क्योंकि वह एसिटो - एसिटिक अम्ल आदि कटु द्रव्यों की उत्पत्ति को रोकते है केवल वसा ही नहीं, मांसतत्त्व भी कहुजनक होते हैं । साधारणतः कटुजनक तथा प्रतिकटुजनक द्रव्यों का अनुपात २०१ होना चाहिये, अन्यथा वसा और मांसतस्व का पूर्ण ज्वलन नहीं होने पाना और कटुभाव ( Ketosis ) का प्रादुर्भाव होता है | कटुभाव इसलिये निम्नांकित अवस्थाओं में पाया जाता है - ( १ ) उपवास --- जब कि शाकतत्त्व की कमी हो जाती है, ( २ ) इक्षुमेह -- जिसमें शर्करा के स्वाभाविक ज्वलन में बाधा हो जाती है, ( ३ ) भोजन में जब बसा का आधिक्य होता है । फक्ङ्क जीवनीय दस्य ( Vitamins ) -- मांसतव, वसा, शाकतत्व, खनिज और जल के अतिरिक्त आहार में कुछ और सूक्ष्म पोषक द्रव्य होते हैं जिनका रासायनिक सङ्गटन निश्चित रूप से बात नहीं है । यह प्राकृत भोजन के अनिवार्य अंग है तथा मनुष्य एवं पशुओं की प्राकृतिक वृद्धि एवं विकास के लिये आवश्यक है । साथ ही यह शरीर की समीकरणात्मक क्रियाओं के सञ्चालन के लिए भी आवश्यक हैं । इन्हें ' विटामिन या जीवनीय द्रव्य ' कहते है । यह नामकरण सर्वप्रथम १ ९ ११ में फह ने किया था यह वच की तथा युग व्यक्तियों में प्राकृत स्वास्थ्य की रक्षा के लिये आवश्यक हैं, अतः इन्हें ' सहायक आहारतस्य ' भी कहते है । इनको महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनकी किया बहुत अल्प मात्राओं में होती है जब यह आहार में अनुपस्थित होते हैं तब कुछ पोषणसम्बन्धी विकार उत्पन्न होते हैं, उन्हें क्षयज रोग कहते हैं । प्रयोगों के द्वारा यह देखा गया है कि यदि प्राणी को विटामिन न देकर केवल मांसस्व, वसा, शाकतत्व और खनिज लवणों पर रक्खा जाय तो अल्पकाल में ही उसकी मृत्यु हो जाती है । जीवनीय द्रव्य इस अर्थ में आहार नहीं है कि वे शारीर धातुओं का निर्माण करते है या क्षतिपूर्ति करते है या ताप और शक्ति उत्पन्न करते हैं, बल्कि इस अर्थ में कि वे सभी कोषाणवीय क्रियाओं में निश्चित रूप से संश्लेषणात्मक वा रचनात्मक प्रभाव डालते है । यह शरीर की रक्षा और वृद्धि के लिए पूर्णतः आवश्यक है । वस्तुतः जीवनीय द्रव्य से रहित केवल मांसतत्त्व, बसा एवं शाकतत्त्व से युक्त आहार ' निर्जीव ' आहार ही कहा जा सकता है । जीवनीय द्रव्य अनेक प्रकार के होते हैं - १. जीवनीय द्रव्य ( ए ), २. जीवनीय द्रव्य ( बी ), ३. जीवनीय द्रव्य ( सी ), ४. जीवनीय द्रव्य ( डी ), ५. जीवनीय द्रव्य ( ई ), ६. जीवनीय द्रव्य ( के ) ७. जीवनीय द्रव्य ( पी ) । जीवनीय द्रव्य ' ए'- यह दूध, मक्खन, अण्डों, सभी जान्तव वसा, वृक्षों की हरी पत्तियाँ यथा कोबी इत्यादि धार हृदय और वृद्ध में पाया जाता है । वह जीवनीय द्रव्य हरी पत्तियों में होता है अतः हरी पत्तियाँ खाने वाले जन्तुओं के दूध में यह अधिक पाया जाता है । जीवनीय द्रव्य ' ए ' के तीन मुख्य कार्य हैं - १. वृद्धि में सहायता प्रदान करता है । २. सन्तानोत्पत्ति के लिये आवश्यक है । १. वचा तथा आशयों की अभ्यन्तर क्षेष्मकला के स्वास्थ्य की रक्षा करता है । इस प्रकार यह शरीर की आवश्यक रचनाओं के प्राकृत स्वास्थ्य एवं

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११० चरकसंहिता पूर्णता की रक्षा करता है जिससे यह जीवाणुओं के आक्रमण का प्रतिकार करने में समर्थ होता है । इसीलिये इसे ' प्रतिसंक्रामक जीवनीय द्रव्य ' कहते हैं । आहार में इसकी अनुपस्थिति के निम्नलिखित परिणाम होते है - १. पोषण में कमी, २. अधिक्षय, ३. विकास में कमी, ४. नेत्र रोग - शुष्क-नैत्रता, रात्र्यन्धता आदि, ५. जीवाणुओं के संक्रमण का भय, ६. वृक्क और मूत्राशय की अश्मरी, ७. क्षय तथा अन्य फुफ्फुस के रोग । जीवनीय द्रव्य ' बी ' – यह गेहूं, चावल, दाल, मटर, शाक तथा फलों में पाया जाता है । कुछ मात्रा में मांस एवं दूध में भी मिलता है । इसकी कमी से ' बेरी वेरी ' नामक रोग हो जाता है । इसका प्रधान कार्य शाकतत्त्व के समीकरण में सहयोग प्रदान करना है । जीवनीय द्रव्य ' सी ' - यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है तथा धारोष्ण दूध में भी स्वल्प परिमाण में होता है । कोषाणुओं के ओपजनीकरण की क्रिया के लिये इसकी उपस्थिति आवश्यक है । इसकी कमी से तन्तुओं में विघटनात्मक परिवर्तन प्रारम्भ हो जाते हैं और स्कर्वी रोग उत्पन्न हो जाता है । रक्तकणों के निर्माण में भी यह सहायक होता है । अतः इसकी कमी से पाण्डुरोग हो जाता है । अस्थियों की वृद्धि में भी यह सहायक होता है । जीवनीय द्रव्य ' डी ' - जिन द्रयों में जीवनीय द्रव्य ' ए ' पाया जाता है, उनमें यह मिलता है, किन्तु उनमें निम्नलिखित विशेषता के कारण भेद स्पष्ट गोचर नहीं होता है: — जीवनीय द्रव्य ' ए ' १. वानस्पतिक तेलों में नहीं मिलता जीवनीय द्रव्य ' डी ' २. नष्ट नहीं होता । १. मिलता है । २. ताप और ओवजनीकरण से नष्ट हो जाता है । ३. सूर्य प्रकाश के द्वारा नष्ट हो जाता है । ३. सूर्य प्रकाश के नीललोहितोत्तर किरणों से उत्पन्न होता है । जीवनीय द्रव्य ' ए ' और ' डी ' द्रव्यों में विभिन्न अनुपातों में उपस्थित रहते हैं । यथा कौडलिवर तैल में ' ए ' की अपेक्षा ' डी ' अधिक होता है, किन्तु मक्खन में ' डी ' की अपेक्षा ' ए ' अधिक होता हैं । जीवनीय द्रव्य ' डी ' खटिक और स्फुरक के समीकरण से निकट सम्बन्ध रखता है अतः अस्थिक्षय के प्रतिषेध या चिकित्सा में यह विशेष महत्त्वपूर्ण है । वनस्पतियों से प्राप्त जीवनीय द्रव्य ' डी ' सूर्यप्रकाश से उत्पन्न ' डी ' तथा कौडलिवर तैल इत्यादि में रहने वाला ' डी ' कहलाता है | यह अस्थिक्षय - प्रतिषेधक तत्त्व कहा जाता है, क्योंकि आहार में इसकी अनुपस्थिति से खटिक एवं स्फुरक का प्राकृत समीकरण विकृत हो जाता है और ' अस्थिक्षय ' नामक रोग उत्पन्न हो जाता है जिसका प्रधान लक्षण है अस्थि और रक्त में खटिक एवं स्फुरक की अल्पता । इस जीवनीय द्रव्य का प्रधान कर्म है पाचन नलिका के द्वारा खटिक और स्फुरक के शोषण में योग प्रदान करना और रक्त तथा धातुओं में खटिक एवं स्फुरक के प्राकृत परिमाण की रक्षा करना । अतः अस्थि-कङ्काल के समुचिन निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है और इसीलिये उसे खटिकीकरण - जीवनीय द्रव्य कहते है । जब इस जीवनीय द्रव्य की कमी हो जाती है तब खटिक और स्फुरक पुरीष के साथ अधिक मात्रा में बाहर निकलने लगते हैं । समुचित शोषण न होने के कारण रक्त में उपर्युक्त पदार्थों की कमी हो जाती है और अस्थि तथा दाँत को वह पदार्थ पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते और प्राकृत अस्थि - निर्माण में बाधा होने लगती है । यह अस्थि एवं दाँतों के निर्माण में ही सहायक नहीं होता, हृदय के नियमन, पेशियों के संकोचन, एवं रक्त के स्कन्दन के लिए भी आवश्यक हैं । सूर्य - प्रकाश का त्वचा के नीचे बसा पर प्रभाव होने से ' जीवनीय द्रव्य डी ' उत्पन्न होता है । इसलिए खुली हवा में खुले बदन खेलने वाले बच्चों में यह अधिक मात्रा में पाया जाना

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् १११ जीवनीय द्रव्य ' ई ' - यह गर्भ की वृद्धि के लिये आवश्यक है । यह धान्याङ्कुरों, वानस्पतिक हरे शाकों में पाया जाता है । यह गेहूं के अङ्कुर के तेल में सर्वाधिक परिमाण में पाया जाता है । यह थोड़ी मात्रा में दूध, वसा, जान्तव वस्तुओं, विशेषतः वसा और पेशियों में पाया जाना है । कोडलिवर में यह नहीं मिलना । वह सन्तानोत्पत्ति के लिये आवश्यक है अतः यह सन्तानोत्पादक जीवनीय द्रव्य कहलाता है । इसके अभाव से सन्तानोत्पत्ति की क्रियाओं में विकृति हो जाती है । इसके अभाव में पुरुषों के शुक्रवह स्त्रोतों का क्षय एवं शुक्रकीटों का और शक्तिहीनता हो जाती है । स्त्रियों में यद्यपि गर्भाधान हो जाता है, पिपरासम्बन्धी क्रियाओं में बाधा होने से गर्म शीघ्र नए हो जाता है । इसका कारण यह है कि इसकी कमी से अपरा में विनाशात्मक परिवर्तन होने लगते हैं । जीवनीय द्रव्य ' के ' यह हरे शार्को, धान्यों तथा वानस्पतिक तेलों में पाया जाता है । यह रक्त के प्राकृत स्कन्दन के लिए आवश्यक है और इस प्रकार कुछ रक्तस्रावसम्बन्धी रोगों का प्रतिषेध करता है । इसमें दो तत्त्व होते हैं के ' और केरे । प्रथम तत्त्व हरे शाकों और वनस्पतियों में पाया जाता है तथा द्वितीय तत्त्व अन्त्र में जीवाणुओं के द्वारा उत्पन्न होना है कामला आदि रोगों में जब आंत्र में वित्त की कमी हो जाती है, तब इस तत्त्व का पूर्ण शोषण नहीं हो पाता और उससे रक्तस्राव की प्रवृत्ति होने लगती है । जीवनीय द्रव्य ' पी ' यह हमरी देश के खाल मिर्ची से निकाला जाता है । इसकी क्रिया जीवनीवद्रव्य ' सी ' के समान ही होती है । इसकी अनुपस्थिति से त्वचा की केशिकार्ये विदो जाती है और रक्त त्वचा में सचित एवं स्त होने लगता है । आहार के रञ्जक द्रव्य - कुछ आहार में कैरोटिन नामक पीत वर्ण का रक्षक द्रव्य होता है । और प्रायः जीवनीवद्रव्य ' ' के साथ पाया जाता है | उसकी क्रिया ' ए ' के समान ही होती है । मक्खन की शक्ति इसी द्रव्य के आधार पर होती है । निरिन्द्रिय लवण -- निरिन्द्रिय लवण शरीर के धातुनिर्माण की क्रिया में महत्त्वपूर्ण योग देते है, अतः आहार में इनका भी प्रमुख स्थान है । शरीर में उनका ओषजनीकरण नहीं होता, अतः ताप की उत्पत्ति उनसे नहीं होती जिस प्रकार कि अन्य आहार द्रव्यों से होती है, किन्तु शरीर में ताप का नियमन करने के कारण इस दृष्टि से इनका अधिक महत्त्व है । मानवशरीर में लगभग ५ प्रतिशत खनिज लवण होते हैं, अतः उनकी निम्नांकित मात्रा प्रतिदिन आहार में अवश्य मिलनी चाहिए- खरिक -१ ग्राम, स्फुरकाम्ल -४ ग्राम, मैगनेशियम - ०.५ ग्राम, कोरिन -८ ग्राम, लौह - ०.०१५ ग्राम, पोटाशियम - ३ ग्राम, सोडियम - ५ ग्राम । ये लवण प्रायः आहार में सेन्द्रिय संयोग के रूप में मिलते है यथा गन्धक मांसतस्व में, खटिक दुग्ध में तथा लौह मांस में । कार्य -- खनिज लवणों के दो मुख्य कार्य होते हैं - ( १ ) कुछ खनिज लवण धातुओं के निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं । शरीर में लगभग ९९ प्रतिशत खटिक और ७० प्रतिशत स्फुरक दाँतों और अस्थियों में पाया जाता है । इन अङ्गों की कठिनता इन्हीं लवणों पर आश्रित होती है । बच्चों में विकास के लिये खटिक की अधिक आवश्यकता होती है जो उन्हें दूध के द्वारा मिलता है । स्त्रियों को गर्भावस्था के अन्तिम दो मासों में तथा स्तन्यकाल में खटिक तथा स्फुरक की विशेष आवश्यकता होती है । खटिक की कमी से बच्चों का विकास रुक जाता है और अस्थिशोष की अवस्था उत्पन्न होती है । खटिक के समुचित सात्मीकरण के लिये जीवनीय द्रव्य ही की भी आवश्यकता होती है, अन्यथा इसके अभाव में खटिक की अत्यधिक मात्रा देने पर भी कोई लाभ नहीं होता । ( २ ) खनिजलवण शरीर के विभिन्न स्रात्रों और रसों में घुले रहते है और उनकी आलिकता एवं क्षारीयता को स्थिर रखते हैं वे हृदय, नाड़ियों तथा पेशियों की प्राकृत क्रिया के लिये भी आवश्यक अणु पहुँचाते हैं ।

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११२ चरकसंहिता निम्नतालिका में खनिज लवण ( Minerals ) की क्रिया का विवरण दिया गया है--खनिज का नाम १. खटिक २. क्लोरीन ३. ताम्र शारीरक्रिया तदभावजन्य रोग १. अस्थि तथा दन्त का निर्माण | अस्थि और इन्त का दुर्बल विकास, ( जीवनीयद्रव्य डी की उपस्थिति में ) १. पाचन में सहायक २. आमाशयिक रस के स्राव में सहायक ३. रक्त तथा धातुओं के व्यापनभार का नियमन ४. किण्वतत्त्वों को क्रियाशील बनाना रक्तरअक द्रव्यों के निर्माण में लौह के सात्मीकरण के लिए आवश्यक अस्थिभङ्गुरता, अस्थिशोष, दन्त-कोटर, अत्यधिक रक्तस्राव | जलवा रगाशक्ति का क्षय, शरीर-भार में कमी, पाचनविकार रक्ताल्पता ४. आयोडिन १. थाइरोक्सिन का निर्माण अवटुग्रन्थि की वृद्धि ( गलगण्ड ) २. अवटुग्रन्थि का आकार तथा क्रिया नियमित रखना ३. गलगण्ड से रक्षा ५. लौह रक्तरञ्जक का निर्माण, रक्तकोषाणु का रक्ताल्पता, रक्तरञ्जक की कमी, विकास, प्राकृत वर्ण रक्तकोषाणुओं का क्षय, शारीरिक वृद्धि का निरोध शोधक प्रभाव, किण्वतत्त्वों की क्रिया में मस्तिष्क दौर्बल्य, पाचनविकार, ६. मैगनेशियम प्रेरक ७. मैंगनीज ८. स्फुरक शारीरिक वृद्धि का निरोध, हृदय-गति की तीव्रता प्राकृतिक वृद्धि के लिए आवश्यक, ताम्र के समान प्रभाव अस्थि तथा दन्त का निर्माण, किण्वतत्त्वों की क्रिया में प्रेरणा, शाकतत्त्वों तथा स्नेहों का सात्मीकरण शारीर विकास का निरोध अस्थि तथा दन्त का क्षीण विकास, शारीरिक वृद्धि का निरोध ९. पोटाशियम प्राकृत विकास, पेशीक्रिया में सहायता दुर्बल पेशीनियन्त्रण, शरीरभार में कमी, पाचनशक्तिहास १०. सोडियम कोषाणुओं तथा द्रवों में व्यापनभार का | नाडीविकार, लवणक्षय, दुर्बल नियमन, रक्तप्रवाह में क्षाररक्षण ११. गन्धक शारीर विकास के लिए आवश्यक, विच चिका तथा अन्य चर्मरोगों का प्रतिषेध, धातुओं के लौह परिमाण का नियमन जलधारणाशक्ति शारीर वृद्धि का निरोप, त्वचा-विकार

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ११३ अत ऊर्ध्वं शरीरस्य कार्यमच्यञ्जनादिकम् । स्वस्थवृत्तिमभिप्रेत्य गुणतः संप्रवक्ष्यते ॥ १४ ॥

( ख ) स्वस्थवृत्त वर्णन ( Personal Hygiene ) स्वस्थवृत्त के विषय का प्रारम्भ - अब सामान्य नियमों का वर्णन करने के बाद शरीर के लिये आवश्यक नेत्रों के लिये अञ्जन आदि कार्यों का स्वस्थवृत्त के नियमों को ध्यान में रख कर गुण के अनुसार वर्णन करेंगे ऐसा आचार्य ने कहा ॥ १४ ॥

विमर्श - इस अध्याय में अञ्जन, अभ्यङ्ग तथा धूमपान इत्यादि अनेक स्वास्थ्य - सम्वन्धी नियमों का वर्णन किया गया है । नेत्र शरीर में सर्वश्रेष्ठ माना गया है जैसा कि वाग्भट ने बताया है - ' चक्षुः प्रधानं सर्वेषामिन्द्रियाणां विदुर्बुधाः । धननीहारमुक्तानां ज्योतिषामिव भास्करः ॥ ’ ( उ. १३ ) । अतः उसकी रक्षा करना परमावश्यक है, क्योंकि - ' चक्षुरक्षायां सर्वकालं मनुष्यैर्यलः कर्त्तत्र्यो जीविते यावदिच्छा ॥ व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानाम् । पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ॥ ' ( उ. १३ ), तथा - ' सर्वात्मना नेत्रबलाय यत्नं कुर्वीत नस्याञ्जनतर्पणाद्यैः । दृष्टिश्च नष्टा विविधं जगच्च तमोमयं जायत एकरूपम् ॥ ' ( वा. उ. ) में नेत्र की प्रधानता बताई गई है । सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत् । पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्त्रावणार्थे रसाञ्जनम् ॥१५ ॥

( १ ) अञ्जन ( Eye - Salves ) सौवीराञ्जन तथा रसाञ्जन का प्रयोग - ( १ ) नेत्र के लिये हितकर सौवीर अञ्जन का प्रयोग नित्य करना चाहिये । ( २ ) नेत्र से दूषित जल को निकालने के लिये पाँच या आठ दिन पर रसाञ्जन ( रसवत ) का अञ्जन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥ १५ ॥

विमर्श - रसरत्नसमुच्चय में - ( १ ) सौवीराञ्जन, ( २ ) रसाञ्जन, ( ३ ) स्रोतोञ्जन, ( ४ ) पुष्पाञ्जन और ( ५ ) नीलाञ्जन, ये पाँच प्रकार के अञ्जन बताये गये हैं । यथा-' सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् । स्रोतोऽञ्जनं तदन्यच्च पुष्पाञ्जनकमेव च । नीलाञ्जनं च तेषां हि स्वरूपमिह वर्ण्यते ॥ ' ( र. र. समु. अ. ३ ) । इनका वर्णन अलग - अलग इस प्रकार मिलता है - ( १ ) ' सौवीरमञ्जनं धूम्रं रक्तपित्तहरं हिमम् । विषहिध्माक्षिरोगघ्नं व्रणशोधनरोपणम् ॥ ' ( २ ) ' रसाञ्जनञ्च पीताभं विषवक्त्रगदापहम् । श्वासहिध्मापहं वर्ण्य वातपित्तास्रनाशनम् ॥ ' ( ३ ) ' स्रोतोञ्जनं हिमं स्निग्धं कषायं स्वादु लेखनम् । नेत्र्यं हिध्माविषच्छर्दिकफपित्तास्ररोगनुत् ॥ ' ( ४ ) ' पुष्पाञ्जनं सितं स्निग्धं हिमं सर्वाक्षिरोगनुत् । अतिदुर्धरहिध्मानं विषज्वरगदापहम् ॥ ' ( ५ ) ' नीलाञ्जनं गुरु स्निग्धं नेत्र्यं दोषत्रयापहम् । रसायनं सुवर्णघ्नं लोहमार्दवकारकम् ॥ ' आधुनिक विज्ञान के अनुसार इनको निम्नांकित मानते हैं - ( १ ) सौवीराञ्जन - ( स्टिवनाइटिस Stybnitis ), ( २ ) रसाञ्जन - ( येलो आक्साइड आफु मर्करी Yellow, oxide of mercury ), ( ३ ) स्रोतो-अन— ( अण्टीमनी सल्फाइड Antimony sulphide या बरनाग सुरमा ), ( ४ ) पुष्पाञ्जन— ( जिन्क आक्साइड Zinc oxide ) और ( ५ ) नीलाञ्जन - ( गेलेना या लेड सल्फाइड Lead sulphide ) । प्रत्येक के बारे में कुछ विस्तृत वर्णन किया जा रहा है । ( १ ) सौवीराञ्जन - यह अण्टिमनी ( Antimony ) और गन्धक ( Sulphur ) का यौगिक है, नेत्र के लिये अच्छा है । यह सुरमा वेली आसाम से आता है । शास्त्र में इसका लक्षण यह है — ‘ वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति । सौवीराञ्जनभित्याहुरायुर्वेदविदो जनाः ॥ ' ( २ ) रसाञ्जन - इसकी येलो आक्साइड आफ् मर्करी ( Yellow oxide of Mercury ) कहते हैं | आजकल प्रायः चिकित्सक रसाञ्जन शब्द से - ' दार्वीक्कायसमं क्षीरं पादं पक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनं ख्यातम् ·..... इति ॥ ' इस भावप्रकाशोक्त लक्षण विधि से बने हुए द्रव्य को ही सर्वत्र ग्रहण करते हैं । किन्तु यह उचित नहीं है । जहाँ रसनिर्माण की प्रक्रिया हो वहाँ रसाञ्जन शब्द ८ च ० सं ०

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११४ चरकसंहिता से ‘ रसगर्भ रसाञ्जनम् ' अर्थात् येलो आक्साइड आफ् मर्करी Yellow oxide of Mercury के नाम से जो खनिज आता है उसका तथा क्काथ और चूर्णादि प्रक्रिया में भावप्रकाशोक्त रसाञ्जन का ग्रहण करें । ( ३ ) स्रोतोञ्जन - यह अण्टीमनी सल्फाइड ( Antimony Sulphide ) है । बर्मा और मैसूर में थोड़ा अल्टीमनी सल्फाइड प्राप्त होता है । आजकल सफेद सुरमे के नाम से बाजारों में जो द्रव्य मिलता है वह केलसाइट है, उसे नहीं लेना चाहिये । दह चूने की जाति का एक पत्थर है, स्रोतोञ्जन नहीं है । ( ४ ) पुष्पाञ्जन - यह जिन्क आक्साइड ( Zinc oxide ) है | इसे सफेदा भी कहते हैं । यह जयपुर में बहुत बनता है तथा आजकल पाश्चात्त्य चिकित्सक नेत्र के लिये यशद के योगों का अत्यन्त प्रयोग करते हैं । ( ५ ) नीलाञ्जन – यह लेड सल्फाइड ( Lead sulphide ) या गेलेना है । यह भी नेत्र के लिये हितकर है तथा वर्मा से अधिक आता है । चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छ्लेष्मतो भयम् । ततः श्लेष्महरं कर्म हितं दृष्टेः प्रसादनम् ॥१६ ॥

नेत्ररोग में कफदोष के प्राधान्य में हेतु नेत्र तेजःस्वरूप है अतः उसे श्लेष्मा ( जल ) से विशिष्ट भय रहता है इसलिए कफनाशक कर्म नेत्र का प्रसादन ( स्वस्थ ) करने में हितकारी होते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श - चक्रपाणि ने उपर्युक्त श्लोक पर टीका करते हुये कहा है कि चक्षु इन्द्रिय में तैजस महाभूत का प्राधान्य रहता है अतएव उसके विरुद्ध आप्य महाभूत की प्रधानता वाले कफदोष से ही प्रायः नेत्र में रोग होते हैं । सुश्रुत ने सूत्रस्थान में कफदोष से पूयोत्पत्ति मानी है यथा ' ' ' नास्ति कफाच्च पूय: ' । अतः नेत्ररोग में कफदोष के रोग अधिक होने का जो वर्णन है उसका वैज्ञानिक अर्थ यह निकाला जा सकता है कि नेत्ररोग में Inflammatory diseases ( शोथ के कारण पूयोत्पादन जिनमें होता है ) का आधिक्य रहता है और ये औपसर्गिक ( Infectious ) होते हैं जो सुश्रुत के निम्नांकित वचन से ज्ञात होगा । यथा - ' प्रसङ्गाद्गात्र-संस्पर्शान्निश्वासात्सहभोजनात् । सहशय्याऽऽसनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च । औपसर्गिकरोगाश्च सङ्क्रामन्ति नरान्नरम् ॥ ' ( सु. नि. ५ ) । दिवा तन्न प्रयोक्तव्यं नेत्रयोस्तीच्णमञ्जनम् । विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति ॥१७ ॥

तस्मात् त्रान्यं निशायां तु ध्रुवमञ्जनमिष्यते । दिन में अञ्जन का प्रयोग न करने में हेतु - नेत्रों में कफनाशक तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग दिन में नहीं करना चाहिये क्योंकि विरेक ( जल - कफ निकलने ) के कारण दुर्बल दृष्टि सूर्य के प्रकाश के लगने से कमजोर हो जाती है । इसलिये जल निकालने के लिये जिस अञ्जन का प्रयोग होता है उसे निश्चित रूप से रात्रि में ही लगाना चाहिये ॥ १७ ॥

यथा हि कनकादीनां मलिनां विविधात्मनाम् ॥ १८ ॥

धौतानां निर्मला शुद्धिस्तैलचेलकचादिभिः । एवं नेत्रेषु मर्त्यानामञ्जनाश्च्योतनादिभिः ॥१ ९ ॥ दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मले नभसीन्दुवत् । अञ्जन से लाभ के बारे में उपमा - जिस प्रकार तेल, कपड़ा और बाल ( Brush ) आदि के द्वारा प्रक्षालन करने से मलिन सुवर्ण आदि धातुओं की निर्मल शुद्धि हो जाती है । उसी प्रकार मनुष्यों के नेत्रों में अञ्जन और आइच्योतन आदि के प्रयोग से दृष्टि स्वच्छ हो कर स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा की तरह चमकती है ॥ १८-१९ ॥ विमर्श -- नेत्र का सम्पर्क बाह्य वातावरण ( External Atmosphere ) से अधिक होने के कारण इसको सदा स्वस्थ रखने के लिये अञ्जनादि की विधि बताई गयी है । सुश्रुत १. स्राव्यमञ्जनं स्रावणं रसाञ्जनम् ।

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मात्राशितीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ११५ ( १ ) तर्पण, ( २ ) पुटपाक, ( ३ ) सेक, ( ४ ) आश्च्योतन, ( ५ ) अञ्जन, इन पाँच क्रियाओं को स्वस्थ नेत्र के रक्षार्थ या नेत्ररोगों के शमनार्थ प्रयोग करने का उपदेश दिया है - ' तर्पणं पुटपाकश्च सेक आइच्योतनाअने ' इनका विस्तृत वर्णन इस प्रकार मिलता है-( १ ) तर्पण - वान, धूप तथा धूलि से रहित स्थान में रोगी को उत्तान शयन करा दें । उसके नेत्र के चारों तरफ साने हुए उड़द की पीठी से दो अङ्गुल ऊँचा सम, दृढ़ और छिद्र-रहित गोलाकार घेरा बना दें । रोगी के नेत्रों को बन्द करादें । तदनन्तर गरम जल में पात्र रख कर पिघलाये हुये घृत तथा औषधसिद्ध घृत या घृतमण्ड से घेरे को भर कर रोगी को अपने नेत्र खोलने के लिये कहें । उड़द की पीठी के घेरे में इतना घृत भरें कि नेत्र के पलक डूब जायँ | इस क्रिया का नाम तर्पण है । यथा - ' वातातपरजोहीने वेश्मन्युत्तानशायिनः । आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ॥ समौ दृढावसम्बाधौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः । पूरयेद् घृतमण्डस्य विलीनस्य सुखोदके || आपक्ष्माग्रात् ततः स्थाप्यं पञ्च तद्वाक्छतानि च । स्वस्थे, कफे षट् पित्तेऽष्टौ दश वाते तदुत्तमम् ॥ ' ( सु. उत्त. अ. १८ ) । इस तर्पण क्रिया से लाभ का वर्णन इस प्रकार मिलता है – ' सुखस्वप्नावबोधत्वं वैशद्यं वर्णपाटवम् । निर्वृतिर्व्याधिविध्वंसः क्रियालाघवमेव च ॥ ' ( २ ) पुटपाक - ' ततः प्रशान्तदोषेषु पुटपाकक्षमेषु च । पुटपाकः प्रयोक्तव्यो नेत्रेषु भिषजा भवेत् । ' यह कर्म के अनुसार तीन प्रकार का होता है - ( १ ) स्नेहन, ( २ ) रोपण, ( ३ ) लेखन । इन भेदों को ध्यान में रख कर प्रयोजन के अनुसार औषधों को लेकर पुटपाक विधि से पाक कर औषध द्रव को निचोड़ कर, छान कर रोगी के नेत्र में तर्पण - विधान से प्रयुक्त किया जाता है । ( ३ ) सेक - ' सेकस्य सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः । मीलिताक्षस्य मर्त्यस्य प्रदेयश्च-तुरङ्गुलात् ॥ ' यह सेक स्नेहन, रोपण, लेखन भेद से तीन प्रकार का होता है । वातज रोगों में स्नेहन, पित्तज रोगों में रोपण और कफज रोगों में लेखन का प्रयोग करना चाहिये । इसके लिये आजकल Undine ( अनडाइन ) नामक कांच का पात्र आता है जिससे यह क्रिया सुविधा-पूर्वक की जाती है । यद्यपि आजकल केवल गरम जल या बोरिक एसिड ( Boric Acid ) मिला कर सेक किया जाता है । पर प्राचीन काल की उपर्युक्त दोषानुसार व्यवस्था उत्तम है | ( ४ ) आश्च्योतन - ' अथ आश्च्योतनं कार्य निशायां न कदाचन । उन्मीलितेऽक्षिण दृमध्ये विन्दुभिद्वर्थंङ्गुलाद्धितम् ॥ यथादोषोपयुक्तस्तु नातिप्रबलमोजसा । रोगमाश्च्योतनं हन्ति ' ' ' यह भी स्नेहन, रोपण और लेखन भेद से तीन प्रकार का होता है और क्रम से वात - पित्त-कफजन्य विकारों में प्रयुक्त होता है । इस कार्य के लिये ड्रॉपर ( Dropper ) की सहायता लेना अच्छा होता है । ( ५ ) अञ्जन - ' व्यक्तरूपेषु दोषेषु शुद्धकायस्य केवले । नेत्र एवं स्थिते दोषे प्राप्तमञ्जनमाचरेत् ॥ ' शलाका या अँगुली से नेत्र में औषध लगाने को अअन कहते हैं । यह दोषानुसार एवं कर्मानुसार लेखन, रोपण और प्रसादन भेद से तीन प्रकार का होता है । वाग्भट ने स्नेहन एक और भेद माना है किंतु उसका अन्तर्भाव प्रसादन में कर लिया जाता है । निर्माण - भेद से अञ्जन तीन प्रकार का होता है - गुटिका, रस और चूर्ण फिर वीर्यं के अनुसार तीक्ष्ण और मृदु भेद से दो प्रकार का होता है । जब तीक्ष्ण अअन के लगाने से नेत्र में कष्ट प्रतीत होता है तो उसे दूर करने के लिए जो अञ्जन लगाया जाता है उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं - ' प्रसादन एव चूर्णस्तीक्ष्णाञ्जनाभिसंतप्ते चक्षुषि प्रयुज्यमानः प्रत्यञ्जनसंज्ञां लभते ' अर्थात् तीक्ष्ण अञ्जन से सन्तप्त नेत्र में प्रसादन के लिये तीक्ष्ण अञ्जन के बाद जो अञ्जन किया जाता है उसे प्रत्यञ्जन कहा जाता है । वर्ति या रसाञ्जन लेखन के

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११६ चरकसंहिता लिये एक हरेणु, प्रसादन के लिये १३ हरेणु और रोपण के लिये दो हरेणु के बराबर लेना चाहिये । ' हरेणुमात्रा वत्तिः स्याल्लेखनस्य प्रमाणतः । प्रसादनस्य चाध्यर्धा, द्विगुणा रोपणस्य च । रसाञ्जनस्य मात्रा तु यथावर्तिमिता मता ॥ ' ( सु. उ. अ. १८ ) । चूर्णाअन सलाई के अग्रभाग पर जितना उठ सके उतना लेखन में दो बार, प्रसादन में तीन बार और रोपण में चार बार लगाना चाहिये । वृद्ध वाग्भट कहते हैं कि तीक्ष्णाअन की वर्ति एक मटर प्रमाण और रसक्रिया एक वायविडंग के प्रमाण से लेनी चाहिये । ( अ. सं. सू. ३२ ) । नेत्र में अञ्जन के लिये सलाई ( शलाका ) सोना, चाँदी, सींग हाथीदाँत, ताम्र, वैदूर्य, कांसा या लोहा, इनमें से किसी एक की, आठ अंगुल लम्बी, मध्य में कुछ पतली, दोनों ओर पुष्प की कली के आकार की और चिकनी बनवानी चाहिये । ध्यान रहे कि सलाई अग्रभाग में तीक्ष्ण न हो तथा अञ्जन लगाने की विधि इस प्रकार है - ' वामेनाक्षि विनिर्भुज्य हस्तेन सुसमा-हितः । शलाकया दक्षिणेन क्षिपेत् कानीनमञ्जनम् । आपाङ्गयं वा यथायोगं कुर्याच्चापि गतागतम् । वर्मोपलेपि वा यत् तदङ्गुल्यैव प्रयोजयेत् ॥ ' ( सु. उ. अ. १८ ) । तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग रात्रि में सर्वथा वर्जित है, पर मृदु अञ्जन का प्रयोग आवश्यकतानुसार विभिन्न कालों में भी किया जाता है, यथा - ' हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽअनमिष्यते । पूर्वाह्णे चापराने वा ग्रीष्मे शरदि चेष्यते । वर्षासु नाभ्रे नात्युष्णे वसन्ते च सदैव हि ॥ ' परन्तु इन अवस्थाओं में अञ्जन का प्रयोग नहीं करना चाहिये – ' भुक्तवाञ् शिरसा स्नातः श्रान्तश्वर्द्दननावनैः । रात्रौ जागरितश्चापि नान्ज्याज्ज्वरित एव च ॥ ' हरेणुकां प्रिय च पृथ्वीकां केशरं नखम् ॥ २० ॥

ह्रीवेरं चन्दनं पत्रं स्वगेलोशीरपद्मकम् । ध्यामकं मधुकं मांसी गुग्गुल्वगुरुशर्करम् ॥ २१ ॥

न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षलोध्रत्वचः शुभाः । वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले ॥ २२ ॥

श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकबर्हमथापि च । पिष्ट्वा लिम्पेच्छुरेषीकां तां वर्ति यवसन्निभाम् ॥२३ ॥

अङ्गुष्टसंमितां कुर्यादष्टाङ्गुलसमां भिषक् । शुष्कां निगर्भा तां वर्ति धूमनेत्रार्पितां नरः || २४ || स्नेहाक्तामभिसंप्लुष्टां पिबेत्प्रायोगिकीं सुखाम् । ( २ ) धूमपान ( Smoking ) हरेणुकादि प्रायोगिक धूमवर्ति का निर्माण तथा प्रयोगविधि • हरेणुका ( रेणुका ), प्रियङ्गु, पृथ्वीका ( कालाजीरा, कृष्णजीरकं - चक्र ० ), केशर ( नागकेशर - चक्र ० ), नख, हीवेर ( सुगन्धवाला ), चन्दन, तेजपत्र, दालचीनी, छोटी इलायची, खस, पद्मक ( पद्माख ), ध्यामक ( सुगन्धतृण, गन्धतृणं - चक्र ० ), मधुक ( मुलेठी ), जटामांसी, गुग्गुलु, अगर, शर्करा, अच्छे बरगद की छाल, गूलर की छाल, पीपल की छाल, पाकड़ की छाल और लोव की छाल, वन्य ( केवटी मोथा, कैवर्तमुस्तकम् - चक्र ० ), सर्जरस ( राल ), नागरमोथा, शैलेय ( छड़ीला ), कमल, नीलकमल, श्रीवेष्टक ( गन्धाविरोजा ), शलकी ( कुन्दुरु ), शुकदई ( ग्रन्थिपर्णकम् - चक्र ० ), इन सभी औषधियों को पीस कर एक शरकण्डे के ऊपर लपेट कर जौ के आकार की ( बीच में मोटी आदि - अन्त में पतली ) अंगूठे के समान मोटी, आठ अङ्गुल लम्बी वर्ति बनानी चाहिये । छाया में रखने पर जब बत्ती सूख जाय तो सींक को निकाल कर घृत, तैल आदि स्नेह से आर्द्र कर धूम-नेत्र ( Cigarette Holder ) में रख कर, अग्नि से जला कर इस सुखकारी प्रायोगिक धूम का सेवन करना चाहिये ॥ २०-२४ ॥ विमर्श - आगे इसी अध्याय के ३५ लोक में कहा जायगा कि - ' नावनाअननिद्रान्ते चात्म-

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है मात्राशितीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ११७ वान् धूमपो भवेत् ' अतः अञ्जन विधान बताने के बाद धूम का वर्णन किया गया है दूसरी बात यह भी है कि - ' तीक्ष्णाञ्जनेनाञ्जितलोचनस्य, यः सम्प्रदुष्येन्न निरेति नेत्रात् । श्लेष्मा शिरःस्थः स तु पीतमात्रे, धूमै प्रशान्ति लभते नरस्य ॥ ' अतः अञ्जन के बाद धूम कहा गया है । स्वस्थवृत्त के विधान में ये तीनप्रकार के घूम का उपदेश है - ( १ ) प्रायोगिकी, ( २ ) स्नैहिकी, ( ३ ) शिरोवे -रेचनिकी, यह उपर्युक्त धूम प्रायोगिक है । वाग्भट में कहा गया है - ' पञ्चकृत्वः प्रलेपयेत् ' ( अ. सू. अ. २१ ) अर्थात् सींक पर लेप करते समय अलग - अलग पाँच बार लेप कर सुखाना चाहिये । सुश्रुत में प्रायोगिक धूम के विषय में कहा गया है - ' तत्रैलादिना कुष्ठतगरवर्ज्येन लक्ष्णपिष्टेन द्वादशाङ्गुलं शरकाण्डं क्षौमेणाष्टाङ्गुलं लेपयेत् । एषा वतिः प्रायोगिके ' तथा ' तत्र प्रायो-गिके वर्ति व्यपगतशरकाण्डां निवातातपशुष्कामङ्गारेष्ववदीप्य नेत्रमूलस्रोतसि प्रयुज्य धूममाहरे-दिति ब्रूयात् ' ( चि. अ. ४० ) । यहाँ सींक की लम्बाई नहीं बतायी गई है । वाग्भट ने सींक की लम्बाई १२ अङ्गुल की बतायी है । वर्ति का एक भाग घूमनेत्र नली ( Cigarette Holder ) में लगा कर और दूसरे भाग में आग जला कर पीना चाहिये । पीने के पहले वर्ति को स्नेह में डुबो लेना चाहिये । वसाघृतमधूच्छिष्टैर्युक्तियुक्तैर्वरौषधैः ॥ २५ ॥

afi मधुकैः कृत्वा नैहिकों धूममाचरेत् । वसादिस्नैहिकी धूम्रवर्ति वसा ( चर्बी ), घृत, मोम, मधुरक आदि उत्तम ( जीवनीयगण की ) औषधियों से युक्तिपूर्वक पूर्व विधि से स्नैहिक वर्ति का निर्माण कर स्नैहिक धूम का सेवन करना चाहिये ॥ २५ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने स्नैहिक धूम का विधान इस प्रकार बताया है - ' स्नेहफलसारमधूच्छिष्ट-सर्जरसगुग्गुलुप्रभृतिभिः स्नेहमिश्रैः स्नेहने ' ( चि. अ. ४० ) । श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला ॥ २६ ॥

गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमं मूर्धविरेचने । अपराजितादि शिरोवैरेचनिक धूम - श्वेता ( अपराजिता ), मालकांगनी, हरताल, मैनशिल, अगर, तेजपत्र आदि गन्धवर्ग की औषधियों से पूर्वोक्त विधि से निर्मित वर्ति का शिरोविरेचनार्थं धूम्रपान किया जाता है ॥ २६ ॥

विमर्श - चक्रपाणि के अनुसार अगर और तेजपत्ता इत्यादि का तात्पर्य ज्वर चिकित्सा के अगुर्वादि तेल में आये हुये औषधिगण से है । अगर के बाद यहाँ कुष्ठ और तगर, ये दो द्रव्य नहीं गये हैं क्योंकि इन दोनों का प्रयोग धूमवति में नहीं किया जाता, यथा - ' नतकुष्ठे स्रावयतो धूमवर्निप्रयोजिने । मस्तुलुङ्गं विशेषेण तस्मात्तं नैव योजयेत् ॥ ' अर्थात् तगर, कुष्ठ इन दोनों का यदि शिरोविरेचनार्थं धूम में पान किया जाय तो चक्रपाणि - मतानुसार मस्तुलुङ्ग का स्राव होने लगता है अतः धूमपान में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिये । चिकित्सा के त्रिमर्मीय अध्याय में कहा है- ' धूमवर्ति पिवेद्रन्धर कुछतगरैस्तथा ' ( चि. अ. २६ ) । प्रायः सभी ने कुष्ठ और तगर का निषेध किया है- ' एलादिना कुष्ठतगरवर्ज्येन ' ( सु. चि. अ. ४० ), ' गन्धाश्चाकुष्ठतगराः ’ ( वा. सू. अ. २१ ) यहाँ केवल प्रायोगिकी, स्नैहिकी और शिरोवैरेचनिकी वनियों का निर्देश है । सुश्रुत ने कासन और वामनीय धूम का भी वर्णन किया है । इन दोनों का समावेश ऊर्ध्व विरेचन की दृष्टि से शिरोविरेचन में कर लिया जाता है । अष्टाङ्गसंग्रह में प्रायोगिक को शमन और १. ' धूमो मूर्धविरेचनम् ' यो ० सो ० ।