चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 231–240
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 231–240
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१३८ चरकसंहिता बलमभिवर्द्धते इत्ति ' ( सु. सू. अ. ६ ) । वर्षाऋतु में विसर्ग का प्रारम्भ होने से तथा सूर्य के कर्के और सिंहराशि पर स्थित होने से भूतलगत पदार्थों में अल्पस्नेह तथा अमृतरस की अभिवृद्धि होती है और प्राणियों में अल्पस्नेह की वृद्धि होने से अल्पबल बढ़ता है । पुनः जब सूर्य कन्या तथा तुला राशि पर आ जाता है तो उसकी किरणें अपेक्षाकृत अधिक मन्द हो जाती है । चन्द्रमा का बल मी अव्याहत ( पूर्ण ) हो जाता है जिससे शरदऋतु में भूतलगत पदार्थों में मध्यम स्नेह तथा लवणरस की वृद्धि होती है और मध्यम श्रेणी में प्राणियों का बल बढ़ता है । हेमन्त ऋतु में सूर्य वृश्चिक और धन राशि पर चला जाता है । इस समय उसका तेज अत्यन्त क्षीण हो जाता है चन्द्रमा पूर्ण बली होकर पूर्ण स्नेहोत्पादन करने लगता है जिससे द्रव्यों में मधुररस की वृद्धि होती है और उनके उपयोग से प्राणियों में बल की भी पूर्ण वृद्धि होने लगती है । आदान तथा विसर्ग काल का तुलनात्मक अध्ययन निम्नलिखित रूप में दिया जा रहा है -आदानकाल ( Period of low Nutrition or Absorption ) १. इसमें शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतु होती है । २. क्रमशःमाघ फाल्गुन, चैत्र चैत्र वैशाख वैशाख,, ज्येष्ठ- ज्येष्ठ-आषाढ़ मास होते हैं । ३. सूर्य उत्तरायण होता है । ४. आय होता है । ५. वायु अतिरुक्ष होती है । ६. चन्द्रमा का बल व्याहत ( क्षीण ) रहता है । ७. सूर्य का दल अव्याहत ( पूर्ण ) रहता है । ८. सूर्य तथा बाबु जगत का शोषण करते हैं । ९. रूक्ष रस - तिक्त, कषाय तथा कटु की वृद्धि होती है । विसर्गकाल ( Period of Nutrition or Liberation ) १. इसमें वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतुयें होती हैं । २. क्रमशः श्रावण भाद्र, क्वार- कार्तिक, अगहन-पौष मास होते हैं । ३. सूर्य दक्षिणायन होता है । ४. सौम्य होता है । ५. वायु अतिरूक्ष नहीं होती है । ६. चन्द्रमा का बल अव्याहत ( पूर्ण ) रहता है । ' ७. सूर्य का बल व्याहत ( क्षीण ) रहता है । ८. चन्द्रमा जगत को तृप्त करता है । ९. स्निग्ध रम - अम्ल " लवण तथा मधुर रस की वृद्धि होती है । १० मनुष्य को यथाक्रम दौर्बल्य की प्राप्ति होती है । १०. मनुष्य को यथाक्रम वल को प्राप्ति होती है ।. भवन्ति चात्र-आदावन्ते च दौर्बल्यं विसर्गादानयोनृणाम् मध्ये मध्यं बलं खन्ते श्रेष्ठमये च निर्दिशेत् ॥८ ॥
आदान तथा विसकाल में शारीरिक बल की स्थिति विसर्गकाल के आरम्भ तथा आदान-काल के अन्त में मनुष्यों में दुर्बलता, विसर्ग तथा आदानकाल के मध्य में मध्यम बल तथा विसर्गकाल के अन्त और आदानकाल के आरम्भ में उत्तम बल होता है ॥ ८ ॥
विमर्श - विसर्गकाल के आदि ( वर्षाऋतु: श्रावण - भादों ) और आदानकाल के अन्त ( ग्रीष्मऋतु ज्येष्ठ - आषाढ़ ) में दुर्बलना विसर्गकाल के मध्य ( शरदऋतु आश्विन कार्तिक ). और आदानकाल के मध्य ( वसन्त ऋतु: चैत्र वैशाख ) में मध्यम वल तथा विसकाल के अन्त ( हेमन्तऋतु: अगहन - पौष ) और आदानकाल के आदि ( शिशिर ऋतु: माघ फाल्गुन ) में श्रेष्ठ. बल रहता है ।
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तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १३६ शीघ्र याद करने के लिये आदान तथा विसर्गकाल में बल किस तरह घटता - बढ़ता रहता है, इसे नीचे कोष्ठक में स्पष्ट किया जा रहा है-संवत्सर आदान काल विसर्ग काल शिशिर वसन्त 1 ग्रीष्म वर्षा शरद हेमन्त माघ फाल्गुन चैत वैशाख ज्येष्ठ आषाढ आदि मध्य अन्त श्रावण भाद्र आश्विन कार्तिक मार्गशीर्ष पौष आदि मध्य अन्त 1 दौर्बल्य मध्यम बल श्रेष्ठ बल शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्धो बलिनां बली । पक्ता भवति हेमन्ते मात्राद्रव्यगुरुक्षमः ॥ ९ ॥
( ख ) षड्ऋतुचर्या ( Regimen of Six Seasons ) ( १ ) हेमन्तऋतुचर्या ( Regimen of Winter Season ) शीत ( हेमन्त ऋतु में जाठराग्नि के बलवान् होने में हेतु - हेमन्तऋतु में शीतलता-अधिक रहती है अतः शीतल वायु के स्पर्श से आभ्यन्तर अग्नि के रुक जाने के कारण बलवान् ( स्वस्थ ) पुरुषों के शरीर में जठराग्नि बलवान् होकर मात्रा और द्रव्य में गुरु आहार को पचाने में समर्थ रहती है ॥ ९ ॥
विमर्श - यहाँ हेमन्त का विशेषण दिया गया है ' शीत ' | हेमन्त स्वभावतः शीत होता है अतः ' शीत ' विशेषण का तात्पर्य यह हो सकता है कि हेमन्तऋतु में शीत पड़ने पर ही बलवान पुरुषों की अग्नि प्रवल होती है अन्यथा ऋतुवैकारिक भाव उत्पन्न होने पर हेमन्त में शीत न पड़े तो अनि प्रबल नहीं होती । अग्नि के प्रबल होने में शीतस्पर्श ( ठण्डी ) वायु से अग्नि का बाहर न निकलना हेतु बताया गया है । जैसे आवाँ के ऊपरी भाग पर मिट्टी और जल से लेप कर देने पर आग की लपटें भीतर की ओर घुस जाती हैं और भीतर आग प्रबल हो जाती है वैसे ही हेमन्तऋतु में वातावरण शीतल होने से शरीर की ऊष्मा बाहर निकल कर भीतर चली जाती है और जाठराग्नि प्रबल हो जाती है । इसलिये शालि, पष्टिक आदि मात्रागुरु और पीठी, इक्षुविकार, क्षीरविकार, उड़द, भैंस का दूध, सुअर का मांस आदि स्वभावतः गुरु द्रव्यों का पाचन उचित रूप से हो जाता है । वृद्ध वाग्भट ने इस बात को इस प्रकार स्पष्ट किया है - ' देहोष्माणो विशन्तोऽन्ताः शीते शीतानिलाहताः । जठरे पिण्डितो नाणं प्रबलं कुर्वतेऽनलम् ॥ ' ( अ.सं.सू.अ. ४ ) । स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तदा । रसं हिनस्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रकुप्यति ॥१० ॥
शीत ( हेमन्त ) ऋतु में वायु का प्रकोप - इस प्रकार अग्नि के प्रबल होने पर जब उसके बल के अनुसार इन्धन ( गुरु आहार ) नहीं मिलता तब अनि शरीर में उत्पन्न प्रथम धातु ( रस ) को जला डालती है अतः शीतल वायु का प्रकोप हो जाता है ॥ १० ॥
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१४० चरकसंहिता विमर्श - अग्नि का स्वभाव है कि पहले इन्धन रूप आहार को, आहार के अभाव में दोषों को, दोषों के अभाव में धातुओं को और धातुओं के अभाव में प्राणों को पचाती है, यथा-“ आहारान् पचति शिखी दोषानाहारवर्जितः । दोषक्षये पचेद्वातून् प्राणान् धातुक्षये तथा ॥ ' ( क्षे ० कु ० ) । जब रस तथा उसके बाद क्रमशः रक्तादि धातुओं का पाक होने लगता है तब धातुक्षय के कारण शरीर में रूक्षता आने लगती है । क्योंकि बाह्य वातावरण भी शीतल रहता है अतः स्वभावतः रूक्ष और शीतल वायु प्रकुपित हो जाती है । सुश्रुत ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है — ' हेमन्तः शीतलो रूक्षो मन्दसूर्योऽनिलाकुल: । ततस्तु शीतमासाद्य वायुस्तत्र प्रकुप्यति ॥ कोष्ठस्थः शीतसंस्पर्शादन्तः पिण्डीकृतोऽनलः । रसमुच्छ्रोपयत्याशु तस्मात् स्निग्धं सदा हितम् || ' ( सु. उ. अ. ६४ ) । तस्मात्तुषारसमये स्निग्धाम्ललवणान् रसान् । औदकानूपमांसानां मेद्यानानुपयोजयेत् ॥११ ॥
बिलेशयानां मांसानि प्रसहानां भृतानि च । भक्षयेन्मंदिरां शीधुं मधु चानुपिवेन्नरः ॥१२ ॥
गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम् । हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चायुर्न हीयते ॥१३ ॥
हेमन्त ऋतु में आहार — तुषारकाल ( हेमन्त ऋतु ) में अग्नि की प्रबलता रहती है अतः स्निग्ध पदार्थ, अम्ल रस, लवण रस, अतिमेदस्वी औदक मांस, आनूप मांस, बिलों में रहने वाले aa ( गोधा, साही आदि ) का मांस, प्रसह ( बाज, कौआ आदि ) का मांस तथा भुना हुआ मांस खाना चाहिए और मदिरा, शीधु और मधु पीना चाहिए ॥ ११-१३ ॥ विमर्श -- हेमन्त ऋतु में दूध के विकारमात्र ( दही, मलाई, रबड़ी, छेना आदि ), ईख़ के विकार ( गुड़, राव, चीनी, मिश्री आदि ), वसा, तेल, नये चावलों का भात और गरम जल का सेवन करने से आयु की हानि ( रोगोत्पत्ति ) नहीं होती । अभ्यङ्गोत्पादनं मूर्ध्नि तैलं जेन्ताकमातपम् । भजेद्भूमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा ॥ १४ ॥
शीतेषु संवृतं सेव्यं यान शयनमासनम् । प्रावाराजिन कौषेय प्रवेणीकुथकास्तृतम् ॥ १५ ॥
गुरूणवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा । शयने प्रमदां पीनांविशालोपचितस्तनीम् ॥१६ ॥
आलिङ्गयागुरुदिग्धाङ्गीं सुध्यात् समदमन्मथः । प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥१७ ॥
हेमन्त ऋतु में विहार - तैल का अभ्यंग ( मर्दन ), उत्सादन ( उबटन ), शिर पर तैल लगाना, जेन्ताकस्वेद का सेवन, धूपसेवन, उष्ण भूमिगृह ( तहखाने ) तथा उष्ण गर्भगृह ( घेरे वाले घर ) में रहना, वाहन, शयन और आसन को कपड़े के परदे आदि से ढक कर रखना तथा उन पर प्रावार ( रुई से बने भारी वस्त्र ), अजिन ( सुखकारी रोमवाले चर्म ), कौषेय ( रेशमी वस्त्र ), प्रवेणी ( मन, जूर या पट्टू से बने वस्त्र ) तथा कुथक ( कन्था, कथरी या ऊनी रंग - बिरंगे कम्बल आदि ) बिछाकर बैठना, शरीर पर भारी और गरम वस्त्र धारण करना, घिसे हुए अगर का शरीर पर गाढ़ा लेप करना, विशाल स्तनों तथा अगर से पुते हुए अंगों वाली स्वस्थ मदमाती नारी का आलिंगन करके सोना तथा यथेष्ट मैथुन करना ये सब शीत ऋतु में हितकारक विहार है ॥ विमर्श - हेमन्त ऋतु में वात का कोप रहता है तथा वातावरण शीतल रहता है अतः शीत से बचने का पूरा प्रयत्न करना चाहिये । जेन्नाक स्वेद की विधि आगे इसी स्थान के चौदहवें
अध्याय में बताई जायगी । मैथुन यथाशक्ति ही करना चाहिये ।
वर्जयेदन्नपानानि वातलानि लघूनि च । प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमागमे ॥ १८ ॥
हेमन्त ऋतु में वर्जनीय आहार - विहार शीतकाल आ जाने पर वातवर्धक एवं लघु अन्न-१. ' शांते सुसंवृतम् ' इति यो. ।
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तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १४१ पान, प्रवात ( तीव्र वायु ), प्रमिताहार ( थोड़ा नपा - तुला भोजन ) और जल में बुले सत्तु का सेवन करना चाहिये ॥ १८ ॥
हेमन्त शिशिरौ तुल्यौ शिशिरेऽल्वं विशेषणम् । रौच्यमादानजं शीतं मेघमारुतवर्षजम् ॥१ ९ ॥ तस्माद्धैमन्तिकःसर्वः शिशिरे विधिरिष्यते । निवातमुष्णं त्वधिकं शिशिरे गृहमाश्रयेत् ॥२८ ॥
( २ ) शिशिरऋतुचर्या ( Regimen of Dewy Season ) शिशिरऋतुचर्या का आधार - सामान्य रूप से हेमन्त और शिशिर दोनों ऋतुयें यद्यपि समान होती है किन्तु शिशिर में कुछ अलग विशेषता होती है । आदानकाल होने से शिशिर ऋतु में रूक्षता आ जाती है तथा मेव, वायु और वर्षा के कारण विशेष शीत पड़ने लगती है । अतः शिशिर ऋतु में भी हेमन्त ऋतु की ही सब विवियों का पालन करना चाहिये । विशेष रूप से निवात ( वायुरहित ) तथा उष्ण गृह में निवास करना चाहिये ॥ १ ९ -२० ॥ विमर्श --तापर्य यह है कि हेमन्त ऋतु में निसर्गकाल रहता है अतः स्निग्धता अधिक रहती है । शिशिर ऋतु में आदानकाल आ जाने से रूक्षता बढ़ जाती है । सुश्रुत का भी यही मत है-' शिशिरे शीतमधिकं वातवृष्ट्या कुलादिशः । शेष हेमन्तत्सर्वं विशेयं लक्षणं बुधैः ॥ ' ( सू. अ. ६ ) तथा - ' शिशिरे शीतमधिक मेघनारुतवर्षजम् । रौक्ष्यं चादानजं तस्मात्कार्यः पूर्वाधिकं विधिः ॥ "
( अ. सं. सु. अ. ४ ) ।
कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि च । वर्जयेदन्नपानानि शिशिरे शीतलानि च ॥ २१ ॥
शिशिर ऋतु में वज्ये आहार ' शिशिर ऋतु में कटुतिक्तकषाय रस तथा वातवर्धक, हल्के और शीतल अन्न - पान का त्याग कर देना चाहिए ॥ २१ ॥
-वसन्ते निचितः श्लेप्मा दिनकृद्भाभिरीरितः । कायाग्निं वाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून् ॥२२ ॥
तस्माइसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत् । * ( ३ ) वसन्त ऋतुचर्या ( Regimen of Spring Season ) वसन्त ऋतुचर्या • हेमन्तऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित ( द्रवीभूत ) होकर जठराग्नि को मन्द कर देता है अतः अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं । उस संचित कफ को दूर करने के लिये वसन्त ऋतु में वमन आदि पञ्चकर्म कराने चाहिये || २२ || गुर्वग्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ २३ ॥
वसन्तऋतु में त्याज्य आहार - विहार - वसन्त ऋतु में गुरु, अम्ल, स्निग्व और मधुर आहार तथा दिन में शयन नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥
व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवलग्रहमञ्जनम् । सुखाम्बुना शौचविधिं शीलयेकुसुमागमे ॥ २४ ॥
चन्दनागुरुदिग्धाङ्गो यवगोधूमभोजनः । शारभं शाशमैणेयं मांसं लावकपिञ्जलम् ॥ २५ ॥
भक्षयेन्निर्गदं सीधु पिवेन्माध्वीकमेव वा । वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् ॥२६ ॥
वसन्त ऋतु में सेवनीय आहार - विहार वसन्त ऋतु में व्यायाम ( Exercise ), उबटन, धूमपान, कवलग्रह, अञ्जन तथा मल - मूत्र त्याग के बाद गुनगुने जल का प्रयोग, मिले हुए चन्दन और अगर का शरीर पर लेप, जौ - गेहू, शरभ ( हरिण - भेद ), खरगोश, काला हरिण, लावा, वटेर और सफेद नीचर के मांस का भोजन, निर्गद ( दोपरहित ), सीधु और माध्वीक ( मधु निर्मित मद्य ) का पान तथा स्त्रियों और उपवनों के यौवन ( कुसुमित अवस्था ) का अनुभव करना चाहिये || विमर्श - वसन्तऋतु में वमनादि पञ्चकर्म का विधान किया गया है । शोधन - कर्मे के लिये वसन्तऋतु से फाल्गुन और चैत्र मास लेना चाहिये, यथा - ' तपस्यश्च मधुश्चैव वसन्तः शोधनं प्रति ' ( सि. अ. ६ ) । जौ - गेहू प्रायः मधुर रस वाले होते है और इनका सेवन वसन्त में
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१४२ चरकसंहिता निषिद्ध किया गया है अतः जो गेहूं पुराने लेने चाहिये । पुराने जौ - गेहूं मधुर होते हुवे भी कफ-कारक नहीं होते, यथा- प्रायो मधुरं इलेष्मलमन्यत्र मधुनः पुरागयवगोधूमात् ' ( सू. अ. २५ ) । वाग्भट ने वसन्तऋतु में शब्दतः पुराने जौ - गेहू के सेवन करने का विधान किया है, यथा--“ पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्य भुक् ' ( अ. सू. अ. ३ ) । स्त्रियों की युवावस्था और पुष्पवाटिका के पुष्पों का अनुभव करना चाहिये, यह कहने का तात्पर्य चक्रपाणि के मतानुसार यह है कि इनका सेवन अधिक नहीं करना चाहिये । केवल उतनी ही मात्रा में इनका सेवन करना चाहिये जिससे कफ का क्षय हो जाय । मयूखैर्जगतः ' स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः । स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम् ॥२७ ॥
शीतं सशर्करं मन्थं जाङ्गलान्मृगपक्षिणः । घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् ग्रीष्मे न सीदति ॥२८ ॥
* ( ४ ) ग्रीष्मऋतुचर्या ( Regimen of Summer Season ) ग्रीष्मऋतुचर्या का सैद्धान्तिक आधार -- ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार के स्नेह को सोख लेते हैं अतः इस काल में मधुर रस तथा शीत वीर्य वाले द्रव्य, द्रव तथा स्निग्ध अन्न - पान, चीनी के साथ शीतल मन्थ, जांगल पशु - पक्षियों के मांस का रस, घी - दूध, चावल, इनका सेवन करने से स्वाभाविक बल का नाश नहीं होने पाना ॥ २७-२८ ॥ विमर्श - सत्तू को शीतल जल में घृत मिलाकर इस प्रकार बोले कि न अधिक पतला होने पावे न अधिक गाढ़ा । इसे ही मन्थ कहते हैं, यथा - ' सक्तवः सर्पिषा युक्ताः शीतवारिपरिप्लुताः । नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इन्यभिवीयते ॥ ' ( चरकोपस्कार ) मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुबहूदकम् । लवणाम्लकद्वष्णानि व्यायामं चौत्र वर्जयेत् ॥ २ ९ ॥ ग्रीष्म ऋतु में वर्ज्य आहार - विहार - ग्रीष्म ऋतु में मंदिरा का सेवन अल्पमात्रा में करना चाहिये अथवा नहीं हो पीना चाहिये या अधिक जल मिलाकर पीना चाहिये । लवण, अम्ल तथा कटु रम वाले और उष्णवीर्य द्रव्यों का सेवन तथा व्यायाम नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ विमर्श - ग्रीष्म ऋतु में अम्ल और उष्ण होने के कारण मदिरा का सेवन शरीर के लिये हानिकर होता है, अतः नहीं पीना चाहिये किन्तु नित्य मदिरा पीने वाले अथवा वात कफ प्रकृति वाले को स्वल्प मात्रा में पीना चाहिये जिससे कफ का क्षय होता रहे । सदा मदिरा पीनेवाला यदि कफ - पित्त प्रकृति का हो तो ग्रीष्मऋतु में उसे अधिक जल मिलाकर मदिरा का सेवन करना चाहिये । ग्रीष्मऋतु में मदिरा सेवन का प्रधान रूप से निषेध किया गया है परन्तु सदा पीने वाले अभ्यस्त व्यक्तियों के लिये नियम भी बता दिया गया है, अन्यथा उन्हें हानि होती है, यथा-' मद्यं न पेयं पेयं वा स्वल्पं सुबहुवारि वा । अन्यथा शोषशैथिल्यदाहमोहान् करोति तत् ॥ ' ( अ ० हृ ० सू ० अ ० ३ ) । दिवा शीतगृहे निद्रां निशि चन्द्रांशुशीतले । भजेच्चन्दनदिग्धाङ्गः प्रवाने हर्म्यमस्तके || ३० || व्यजनैः पाणिसंस्पर्शेश्चन्दनोदकशीतलैः । सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणिविभूषितः ॥३१ ॥
काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च । ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ॥३२ ॥
ग्रीष्म ऋतु में विहार - • ग्रीष्म ऋतु में दिन के समय शीतल कमरे ( Air - conditioned cold room ) में तथा रात्रि के समय चाँदनी से शीतल हुये हवादार छत पर शरीर में चन्दन का लेप लगाकर सोना चाहिये, मोती- मणि आदि से देह अलंकृत करके चन्दन मिले जल से ठण्डे किये हुये पंखों की हवा और कोमल हाथों का स्पर्श प्राप्त करते हुये आसन पर बैठना चाहिये १. ' सारं ' ग. । २. ' च विवर्जयेत् ' च ।
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तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १४३ तथा शीतल उद्यान, शीतल जल और शीतल पुष्पों का सेवन करना चाहिये किन्तु मैथुन से वचे रहना चाहिये ॥ ३०-३२ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने ग्रीष्मऋतुचर्या इस प्रकार बतलाई है - ' व्यायाममुष्णमाया सं मैथुनं चातिशोषि च । रसाँञ्चाग्निगुणोद्रिक्तान् निदाघे परिवर्जयेत् ॥ सरांसि सरितो वाऽपि वनानि रुचिराणि च । चन्दनानि परार्थ्याणि स्रजः सकमलोत्पलाः ॥ तालवृन्तानिलान् हारांस्तथा शीत-गृहाणि च । धर्मकाले निषेवेत वासांसि सुलघूनि च || शर्कराखण्डदिग्धानि सुगन्धीनि हिमानि च । पानकानि च सेवेत मन्थांश्चापि सशर्करान् । भोजनं च हितं शीतं सघृतं मधुरद्रवम् । श्वतेन पयसा रात्रौ शर्करामधुरेण च ॥ प्रत्यग्रकुसुमाकीर्णे शयने हर्म्यसंस्थिते । शयीत चन्दनार्द्राङ्गः स्पृश्यमानोऽ-निलः सुखैः ॥ ' ( सु ० उ ० अ ० ६३ ) । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में उष्ण गर्भगृह के तथा ग्रीष्म ऋतु में शीतगृह के वर्णन से प्रतीत होता है कि शीत- ताप नियन्त्रण ( Air Conditioning ) का किसी न किसी रूप में उस समय भी प्रयोग होता रहा होगा । आदानदुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः । स वर्षास्व निलादीनां दूषणैर्वाध्यते पुनः ॥ ३३ ॥
भूवापान्मेघनिस्यन्दात् पाकादम्लाजलस्य च । वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ तस्मात् साधारणः सर्वो विधिर्वर्षासु शस्यते । ( ५ ) वर्षाऋतुचर्या ( Regimen of Rainy Season ) वर्षाऋतुचर्या का सैद्धान्तिक आधार - आदानकाल में मनुष्य का शरीर अत्यन्त दुर्बल रहता है । दुर्वल शरीर में एक तो जठराग्नि दुर्बल रहती ही है, वर्षाऋतु आ जाने पर दूषित वातादि दोषों से दुष्ट जठराग्नि और भी दुर्बल हो जाती है । इस ऋतु में भूमि से वाष्प ( भाप ) निकलने, आकाश से जल बरसने तथा जल का अम्ल विपाक होने के कारण जब अग्नि का बल अत्यन्त क्षीण हो जाता है तब वातादि दोष कुपित हो जाते हैं । अतः वर्षाकाल में साधारण रूप से सभी विधियों ( नियमों ) का पालन करना चाहिए ॥ ३३-३४ ॥ विमर्श - साधारण नियम का तात्पर्यं त्रिदोषनाशक वस्तुओं के सेवन से है । वाग्भट ने साधारण द्रव्यों के साथ साथ अग्निदीपक द्रव्यों का सेवन भी उचित बताया है, यथा- ' बह्निनैव च मन्देन तेष्वित्यन्योन्यदूषिषु । भजेत्साधारणं सर्वमूष्मणस्तेजनं च यत् ॥ ' ( अ. हृ.सू. अ. ३ ) वर्षाऋतु में वातादि तीनों दोषों के कुपित होने का तात्पर्य यह है कि प्रधान रूप से वात कुपित होता है
किन्तु अनुबन्धस्वरूप पित्त और कफ भी कुपित हो जाते हैं ।
उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ॥ ३५ ॥
व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वर्जयेत् । वर्षाऋतु में वज्र्य आहार - विहार - वर्षाऋतु में उदमन्थ ( जल में घुला सत्तू ), दिन में सोना, अवश्याय ( ओस गिरते समय उसमें बैठना या घूमना ), नदी का जल, व्यायाम ( Exercise ), धूप में बैठना और मैथुन ( Sexual indulgence ) छोड़ देना चाहिए ॥ ३५ ॥
पानभोजन संस्कारान् प्रायः क्षौद्रान्वितान् भजेत् ॥ ३६ ॥
व्यक्ताम्ललवणस्नेहं वातवर्षाकुलेऽहनि । विशेषशीते भोक्तव्यं वर्षास्वनिलशान्तये || ३७ ॥ अग्निसंरक्षणवता यवगोधूमशालयः । पुराणा जाङ्गलैर्मासैर्भोज्या यूषैश्च संस्कृतैः ॥ ३८ ॥
पिबेत् क्षौद्रान्वितं चापं माध्वीकारिष्टमम्बु वा । माहेन्द्रं तप्तशीतं वा कौपं सारसमेव वा ॥ १. ' अनि संरक्षणवता ' ग. ।
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१४४ चरकसंहिता प्रवर्तनस्नानगन्धमाल्यपरो भवेत् । लघुशुद्धाम्वरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम् ॥ ४० ॥
वर्षाऋतु में सेवनीय आहार - विहार - • वर्षाऋतु में खाने - पीने की सभी चीजें बनाते समय उनमें मधु अवश्य मिला लेना चाहिए । वात और वर्षा से भरे उन विशेष शीतवाले दिनों में अम्ल तथा लवण रस वाले और स्नेह द्रव्यों ( घृतादि ) की प्रधानता रहनी चाहिए । जाठराग्नि की रक्षा चाहने वाले पुरुषों को भोजन में पुराने जौ, गेहूं और चावल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए | मांसाहारी व्यक्तियों को इन आहार द्रव्यों को जांगल पशु - पक्षियों के संस्कृत मांसरस के साथ तथा शाकाहारी व्यक्तियों को संस्कृत मूंग के यूष के साथ लेना चाहिए । इस ऋतु में मधु मिला कर अल्प मात्रा में माध्वीक ( महुए के मद्य ), अरिष्ट एवं जल का सेवन करना चाहिए । वर्षाऋतु में माहेन्द्र ( आकाश का ) जल, गरम करके शीतल किया हुआ जल, कूप का या सरोवर का जल पीना चाहिए । प्रघर्षण ( देह का घर्षण ), उद्वर्तन ( उबटन ), स्नान, गन्ध ( चन्दन आदि सुगंधित द्रयों ) का प्रयोग और सुगन्धित पुष्प मालाओं का धारण करना हितकर है । हलके और पवित्र वस्त्र धारण करना और क्लेशरहित सूखे ( without damp ) स्थान पर रहना चाहिए ॥ ३६-४० ॥ विमर्श - वर्षाकाल में अन्न - पान में मधु मिला कर प्रयोग करने को कहा गया है परन्तु मधु मधुर रसप्रधान होते हुए शीतल और लघु होने से अल्प वातल होता है, यथा- ' शीतं कषाये मधुरं लघु स्यात्सन्दीपनं लेहनमेव शस्तम् ॥। नेत्रामये वा ग्रहणीगदे वा विषे प्रशस्तं मधु ह्यल्पवातलम् || ' ( हारीतसंहिता ) तथा ' भधु शीतं लघु स्वादु रूक्षं स्वर्य्यं च ग्राहकम् | आनन्दकृच्च तुवरं चाल्पवातप्रदं मतम् ॥ ' ( नि. र. ) । वर्षाकाल में स्वाभाविक रूप से वात का प्रकोप रहता है अतः मधु के सेवन से तो विशेष रूप से बात का प्रकोप ही होगा, तब उसका प्रयोग क्यों किया जाय, इस शंका का समाधान चक्रपाणि ने इस प्रकार किया है कि मधु वर्षाऋतु में उत्पन्न केद का शमन करता है अत एव थोड़ी मात्रा में सेवन करने से कोई हानि नहीं है । ' क्षौद्रान्वित ' शब्द का अभिप्राय भी यही प्रतीत होता है कि मधु का प्रयोग अल्प मात्रा में ही किया जाय । सुश्रुत ने वर्षा ऋतुचर्या के साथ - साथ प्रावृट् ऋतुचर्या भी अलग कही है, यथा-वर्षाऋतुचर्या --- ' प्रक्लिन्नत्वाच्छरीराणां वर्षासु भिषजा खलु । मन्देऽग्नौ कोपमायान्ति सर्वेषां मारुतादयः ॥ तस्मात् कुंदविशुद्धयर्थं दोषसंहरणाय च । कषायतिक्तकटुकै रसैर्युक्तमपद्रवम् ॥ नाति-स्निग्धं नातिरुक्षमुष्णं दीपनमेव च । देवमन्नं नृपतये यज्जलं चोक्तमादितः ॥ तप्तावरतमम्भो वा पिवेन्मधुसमायुतम् । अह्नि मेघानिलाविष्टेऽत्यर्थशीताम्बुसङ्कुले || तरुणत्वाद्विदाहं च गच्छन्त्योषधय-स्तदा । मतिमांस्तन्निमित्तं च नातिव्यायाममाचरेत् || अत्यम्बुपानावश्यायग्राम्यधर्मातपांस्त्यजेत् । भृवाष्पपरिहारार्थं शयीत च विहायमि ॥ शीते सानौ निवाते च गुरुप्रावरणे गृहे । यायात्सङ्गं वधू-भिश्च प्रशस्तागुरुभूषितः ॥ दिवास्वममजीर्णं च वर्जयेत्तत्र यत्नतः ॥ ' ( उ. अ. ६४ ) । प्रावृट्ऋतुचर्या - यथा - ' पयो मांसरसाः कोष्णास्तैलानि च घृतानि च । बृंहणं चापि यत्किञ्चि-दभिष्यन्दि तथैव च ॥ निद्राघोपचितं चैव प्रकुप्यन्तं समीरणम् । निहन्यादनिलघ्नेन विधिना विधि-कोचिद्रः ॥ नदीजलं रूक्षमुष्णमुद्रमन्थं तथाऽऽतपम् । व्यायामं च दिवास्वप्नं व्यवायं चात्र वर्जयेत् ॥ [ नवान्नरूक्षशीताम्बुसक्तूंश्चापि विवर्जयेत् । ] यवपष्टिकगोधूमान् शालींश्चाप्यनवांस्तथा ॥ हर्म्यमध्ये निवाने च भजेच्छय्यां मृद्वृत्तरान् । सविषप्राणिविण्मूत्रलाला निष्ठीवनादिभिः ॥ समाप्तं तदा तोय-मान्तरीक्षं विषोपमम् । वायुना विषदुष्टेन प्रावृषेण्येन दृषितम् ॥ तद्धि सर्वोपयोगेषु तस्मिन् काले विवर्जयेत् । अनिष्टासव मैरेयान् मोपदेशांस्तु युक्तितः ॥ पिबेत् प्रावृषि जीर्णास्तु रात्रौ तानपि वर्जयेत् । निरूहैर्वस्तिभिश्चान्यैस्तथाऽन्यैर्मारुताप हैः ॥ कुपितं शमयेद्वायुं वार्षिकं चाचरेद्विधिन् । ' ( उ. अ.६४ ) । वर्षाकाल में कैसे स्थान पर रहना चाहिए, इस विषय में वृद्ध वाग्भट का निम्नलिखित मत
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तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १४५ विशेष विचारणीय है-- ' असरीसृपभूवाष्पशीतमारुतशीकरम् । सान्नियानं च भवनं निर्दशमशको-दुरन् ' ( अ. सं. सू. ८ ) । वर्षाशीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः । तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥४१ ॥
* ( ६ ) शरद् ऋतुचर्या ( Regimen of Beginning of Autumn Season ) शरदऋतु में पित्त का प्रकोप - वर्षाकाल में जिनको शीनसात्म्य हो गया रहता है ऐसे लोगों के अंग सहसा सूर्य की प्रखर किरणों से तप्त हो जाते है, फलतः वर्षाऋतु में संचित हुआ पित्त शरदऋतु में प्रकुपित हो जाता है ॥ ४१ ॥
तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम् । पित्तप्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाङ्क्षितैः ॥ ४२ ॥
लावान् कपिञ्जलानेणानुरभ्राञ्छर भान्छशान् । शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये ॥ तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् । धाराधरात्यये कार्यम् -शरदऋतु में सेवनीय आहार - विहार - अच्छी भूख लगने पर रस में मधुर, गुण में लघु, वीर्य में शीतल, कुछ निक्त रसयुक्त एवं पित्तको शान्त करने वाले अन्न - पान का मात्रापूर्वक सेवन करना चाहिए । घनात्यय ( घन + अत्यय = नेघ - नाश ) अर्थात् शरतऋतु में मांसाहारियों को लात्र ( वटेर ), कपिञ्जल ( गौरैया ), एण ( हिरण ), उर ( दुम्बा भेड़ ), शरभ ( बारहसिंगा ) और खरगोश का मांस खाना चाहिए | सामान्यतः सभी को चावल, जौ और गेहूं का सेवन करना चाहिए और कुष्ठाधिकार में बताए हुए तिक्तघृत का पान, विरेचन और रक्तमोक्षण क्रिया करनी चाहिए ॥ ४२-४३ ॥ विमर्श - अच्छी तरह भूख लगने पर खाने का तात्पर्य यह है कि शरदऋतु में स्वभावतः सबकी अनि मन्द रहती है क्योंकि पित्त बढ़ा रहता है । पित्त की वृद्धि से अग्निमांद्य कैसे हो जाता है इस विषय में बताया गया है - ' कट्वजीर्णविदाह्यम्लक्षाराचैः पित्तमुल्बणम् । आप्लाव-यद्धन्त्यनलं तप्तं जलमिवानलम् ॥ ' ( च. चि. अ. १५ ) । अत: भूख लगने पर ही मात्रापूर्वक भोजन का विधान किया गया है । वस्तुतः पित्त को निकालने का उत्तम उपाय विरेचन है- ' विरेचनं पित्तहराणाम् ', और विरेचन के लिये उत्तम समय शरदऋतु ही बतलाई गई है, यथा - ' हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले । घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ' ( च. शा. अ. २ ) । शरदऋतु में स्वभावतः प्रत्येक प्राणी का रक्त उष्ण रहता है, यथा- ' शरत्काले स्वभावाच्च शोणितं सम्प्रदुष्यति ' ( च. सू. अ. २४ ) । अतः तिक्तघृत के पान से या तो उस दुष्ट रक्त की शुद्धि करनी चाहिए अथवा विरेचन द्वारा उसका निर्हरण करना चाहिए । इससे प्रायः रक्त की शुद्धि
हो जाती है । यदि इतने से भी रक्त शुद्ध न हो तो रक्त का मोक्षण करा देना चाहिए ।
- आतपस्य च वर्जनम् ॥ ४४ ॥
वसां तैलमवश्यायमौदकानूपमामिषम् | क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥४५ ॥
शरदऋतु में त्याज्य आहार - विहार -- शरदऋतु में धूप का सेवन, वसा ( चर्बी ), तैल, ओस, औदक मांस ( मछली आदि का ), आनूमांस ( सूअर आदि का ), क्षार तथा दही का सेवन नहीं करना चाहिए । दिन में सोना तथा पूर्वी वायु का सेवन भी हानिकर है ॥ ४४-४५ ॥ १० च ० सं ०
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१४६ चरकसंहिता विमर्श - ' प्राग्वात ' शब्द का अर्थ पूर्वी हवा किया जाता है । यह हवा बंगाल की खाड़ी से उठने के कारण नमी ( Damp ) लिए रहती है । इसके सेवन से पुराने संधिवात ( Arthritis ) इत्यादि व्याधियाँ पुनः प्रकुपित हो जाती है अतएव इसका सेवन निषिद्ध बताया गया है । दिवा सूर्यांशु संतप्तं निशि चन्द्रांशुशीतलम् । कालेन पक्कं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥४६ ॥
हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचि । स्नानपानावगाहेषु शस्यते तद्यथाऽमृतम् ॥४७ ॥
हंसोदक का विवरण -- दिन में सूर्य की किरणों से गरम, रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से शीतल, काल - स्वभाव से पके हुए अतः निर्दोष और अगस्त्य तारा के उदय होने के प्रभाव से विषरहित हुआ जल ' हंसोदक ' कहा जाता है । यह ' हंसोदक ' शरदऋतु में विमल और पवित्र तथा स्नान, पान और अवगाहन कार्यों में अमृत के समान फल देने वाला होता है ॥ ४६-४७ ॥ विमर्श - हंसोदक एक पारिभाषिक शब्द है तथा स्वस्थवृत्त की परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है । चक्रपाणि ने इसकी निरुक्ति दो प्रकार से की है - ( १ ) ' हंसशब्देन सूर्याचन्द्रमसावभिधीयेते, ताभ्यां शोधितमुदकं हंसोदकम् ' अर्थात् हंस शब्द से सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों ग्राह्य हैं अतएव उन दोनों से शुद्ध जल की संज्ञा ' हंसोदक ' हुई । ( २ ) ' हंससेवा योग्यं हंसोदकं, हंसाः किल विशुद्ध-मेवोदकं भजन्ते ' अर्थात् हंसोदक उस जल को कहना चाहिये जिसका हंस ( Swan ) भी उपयोग कर सके क्योंकि स्वभाव के अनुसार हंस शुद्ध जल को ही पसन्द करता है । यह दोनों अर्थ परीक्षा की दृष्टि से स्मरणीय हैं । शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥४८ ॥
शरदऋतु में अनुकूल विहार: - इस ऋतु में उत्पन्न फूलों की माला, स्वच्छ वस्त्र और प्रदोष काल में चन्द्रमा की किरणों का सेवन हितकर बताया गया है ॥ ४८ ॥
विमर्श - रात्रि के मुख ( प्रारंभ ) का नाम प्रदोष है - ' प्रदोपो रजनीमुखम् ' ( अमरकोप ) । उस समय फूलों की मालायें एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करना तथा चाँदनी में बैठना चाहिए । चक्रपाणि के मतानुसार रात्रि में चन्द्रकिरणों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे शीत लगने का भय रहता है । सुश्रुत ने शरदऋतुचर्या का वर्णन इस प्रकार किया है - ' सेव्याः शरदि यत्नेन कषायस्वादुतिक्तकाः । क्षीरेक्षुविकृतिक्षौद्रशालिमुद्गादिजाङ्गलाः ॥ श्वेतस्रजश्चन्द्रपादाः प्रदोषे लघु चाम्बरम् | सलिलं च प्रसन्नत्वान् सर्वमेव तदा हितम् ॥ सरःस्वाप्लवनं चैव कमलोत्पलशालिषु । प्रदोषे शशिनः पादाश्चन्दनं चानुलेपनम् ॥ तिक्तस्य सर्पिषः पानैरसृक्स्रावैश्च युक्तितः । वर्षासूप-चितं वित्तं हरेच्चापि विरेचनैः ॥ नोपेयात्तीक्ष्णमम्लोष्णं क्षारं स्वप्नं दिवाऽऽतपम् । रात्रौ जागरणं चैव मैथुनं चापि वर्जयेत् ॥ स्वादुशीतजलं मेध्यं शुचिस्फटिकनिर्मलम् । शरच्चन्द्रांशुनिर्धोतमगस्त्यो-दयनिर्विषम् ॥ प्रसन्नत्वाच्च सलिलं सर्वमेव तदा हितम् । सचन्दनं सकर्पूरं वासश्चामलिनं लघु ॥ भजेच्च शारदं माल्यं सीधोः पानंच युक्तितः । पित्तप्रशमनं यच्च तच्च सर्वे समाचरेत् ॥ ' ( उ. अ. ६४ ) । इस प्रकार षड्ऋतुचर्या का उपदेश किया गया है । एक ऋतु के समाप्ति काल और दूसरी के प्रारम्भ - काल में किस प्रकार पूर्वऋतु के नियमों को छोड़ना तथा उत्तरऋतु के नियमों को ग्रहण करना चाहिए, इस विषय पर यहाँ प्रकाश नहीं डाला गया है किन्तु वाग्भट ने इस विषय का स्पष्ट विवेचन किया है, यथा - ' ऋतोरन्त्यादिसप्ताहावृतुसन्धिरिति स्मृतः । तत्र पूर्वो विधिस्त्याज्यः सेवनीयोऽपरः क्रमात् ॥ असात्म्यजा हि रोगाः स्युः सहसा त्यागशीलनात् । ' ( अ.हृ.सू. अ. ३ ) । अर्थात् एक ऋतु के अन्त के सात दिन और दूसरी ऋतु के आदि के सात दिन, इन चौदह दिनों का नाम ' ऋतुसन्धि ' है । एक ऋतु के अन्तिम आठ दिनों में क्रमशः उस ऋतु के नियमों का शनैः शनैः सेवन करना चाहिए । अन्यथा ( सहसा नियमों का त्याग और परिशीलन करने से )
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तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १४७ असात्म्यज रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अन्त में सुखस्मरणार्थं षड्ऋतुओं की चर्या का वर्णन निम्न-लिखित रूप में दिया जा रहा है! ( १ ) हेमन्तऋतुचर्या ( १ ) शारीरिक बल श्रेष्ठ रहता है । संक्षिप्त ऋतुचर्या ( २ ) शिशिरऋतुचर्या ( २ ) जठराग्नि अत्यन्त तीव्र रहती है । ( ३ ) अतएव गुरु द्रव्यों का पाचन सरलता से हो जाता है । ( १ ) ' हेमन्तशिशिरे तुल्ये ' के अनुसार हेमन्त और शिशिर ऋतुचर्यायें समान हैं । इस कारण हेमन्तचर्या का ही ग्रहण शिशिर में भी होता है । ( ४ ) औदक तथा आनूप देश के भेदस्वी जीवों ( २ ) शिशिर में आदानकालजन्य रूक्षता, मेघ, के स्निग्ध, अम्ल तथा लवण युक्त, मांसरस का सेवन करना चाहिये । ( ५ ) बिलेशय प्राणियों के तथा प्रसह प्राणियों के शूलपक्कमांस का भक्षण करना चाहिये । ( ६ ) अनुपान रूप में मंदिरा, शीधु तथा मधु का पान करना चाहिये । ( ७ ) हेमन्त में गोरस, इक्षुविकृति ( ईख के रस से बनी वस्तुयें ), वसा, तैल, नवौदन ( नया चावल ) तथा उष्ण जल सेवन आयुवर्धक है । ( ८ ) अभ्यङ्ग, उत्सादन, शिर में तैल लगाना, जेन्नाकस्वेद, आतपसेवन, भूमिगृह ( Under ground ) तथा उष्ण गर्भगृह में निवास करना चाहिए | ( ९ ) हेमन्त में प्रावार ( रजाई ), अजिन ( व्याघ्रादि का चर्म ), कौशेय ( रेशमी वस्त्र ), ( प्रवेणी ( सन का वस्त्र ), कुथक ( रंगीन कम्बल ) आदि द्वारा सुसंवृत ( Properly covered ) आसन का सेवन करें । ( १० ) हेमन्त में शरीर पर अगुरु का गाढ़ा लेप करें । ( ११ ) गर्म वस्त्रों का धारण करें । > ( १२ ) मद्य का पान करें । ( १३ ) अगुरु का लेप की हुई सुन्दर प्रमदा ( स्त्री ) का आलिंगन तथा इच्छानुसार मैथुन करें । ( १४ ) हेमन्त में वानल तथा लघु पदार्थ ( अन्नपान ) का त्याग कर दें । ( १५ ) थोड़ा आहार, वायु का अधिक सेवन तथा उदमन्थ ( सत्तू ) का सेवन निषिद्ध है । मारुत तथा वर्षाजन्य शीत अधिक बढ़ जाती है । इसमें हेमन्त से यही विशेषता है । ( ३ ) शिशिर में वातरहित अत्यन्त उष्ण गृह में निवास करना चाहिये ( ४ ) शिशिर में कटु, तिक्त, कषाय, वातल तथा शीतल अन्नपान का सेवन निषिद्ध है । ( ३ ) वसन्तऋतुचर्या ( १ ) मध्यम शारीरिक बल रहता है । ( २ ) जठराग्नि मन्द रहती है । ( ३ ) हेमन्त में सञ्चित कफ सूर्य की तीव्र रश्मियों द्वारा प्रकुपित होकर कायाग्नि को मन्द कर देता है । ( ४ ) इस कारण वसन्त में शोधनार्थं वमनादि पञ्चकर्म कराना चाहिये । ५ ) बसन्त में व्यायाम, उद्वर्तन ( उबटन ), धूम्रपान, कवलग्रह, अञ्जन तथा सुखोष्ण जल से स्नान आदि करना चाहिये । ( ६ ) शरीर पर चन्दन, अगुरु आदि का लेप करें । ( ७ ) यव तथा गोधूम ( गेहूं ) का भोजन करें । ( ८ ) शरभ, शशक, एण ( कृष्ण हरिण ), लाव तथा कपिल ( श्वेत तीतर ) के मांस का सेवन करें । ( ९ ) वसन्त में माध्वीक तथा सोधु का पान करें । ( १० ) स्त्रियों के यौवन का अनुभव ( मर्यादित मैथुन करें । ( ११ ) वसन्त में वनों के यौवन ( पुष्पविकास ) का सेवन करें |