चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 241–250
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 241–250
पृष्ठ 241
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४८ चरकसंहिता ( १२ ) वसन्त में गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर अन्न-पान तथा दिवास्वप्न निषिद्ध है । ( ४ ) ग्रीष्मऋतुचर्या ( १ ) दौर्बल्य - प्रधान शारीरिक बल । ( २ ) ग्रीष्म में सूर्य अपनी तीव्र किरणों द्वारा जगत के स्नेह को खींच लेता है तथा तीव्र रूक्षता रहती है । ( ३ ) ग्रीष्म में स्वादु ( मधुर ), शीत द्रव्य तथा अन्न - पान हितकर है । ( ४ ) ग्रीष्म में शर्करायुक्त शीतल मन्थ ( सत्तू ) का सेवन करें । ( ५ ) जाङ्गल पशु - पक्षियों के मांस का सेवन करें । ( ६ ) घृत तथा दूध से युक्त शालि चावल का सेवन करें । ( ७ ) मद्यपान न करें अथवा अल्प मात्रा को अधिक जल में मिला कर पियें । ( ८ ) ग्रीष्म में दिन में शीतल गृह में सोयें । ( ९ ) रात्रि में शरीर पर चन्दन का लेप करके खुले हवादार शीतल हर्म्यमस्तक ( छत ) पर शयन करें । ( २० ) पुष्प, चन्दनोदक से शीतल पंखे की वायु तथा चन्दनोदक से शीतल हाथों का स्पर्श सेवन करें । ( ११ ) मुक्तामणि से सुसज्जित हो आसन पर बैठें । ( १२ ) ग्रीष्म में अम्ल, लवण, कटु अन्नपान, व्यायाम तथा मैथुन निषिद्ध है । ( ५ ) वर्षाऋतुचर्या ( १ ) दौर्बल्य - प्रधान शारीरिक बल । ( २ ) आदानकाल से दुर्बल हुए शरीर में जठराग्नि दुर्बल रहती है । वायु के कारण भी जाठराग्नि अत्यधिक दुर्बल हो जाती है । ( ( ३ ) वर्षाऋतु में पृथ्वी से निकलने वाली वाष्प से, मेघों के बरसने से, जल के अम्ल-विपाकी हो जाने से तथा अग्निवल के क्षीण हो जाने से वानादि दोष कुपित हो जाते हैं । ( ४ ) वर्षा में त्रिदोषन्न विधि तथा विपन्न अन्न - पान हितकर है । ( ५ ) वर्षा में वायु की शान्ति के लिये अम्ल, लवण, स्नेह का सेवन लाभकारी है । ( ६ ) जाठराग्नि - संरक्षण हेतु यव, गोधूम, जांगल पशु - पक्षियों का मांसरस, पुराने शालि चावल का सेवन यूप से करें । ( ७ ) मधु का सेवन अत्यन्त हितकारी हैं । थोड़ी मात्रा में माध्वीक, अरिष्ट तथा गरम कर ठंडा किया हुआ जल, माहेन्द्र ( वर्षा जल ), कूप जल तथा तालाब का जल पियें । ( ८ ) स्वच्छ हलका वस्त्र पहने, प्रघर्ष, उद्वर्तन उबटन, गन्ध तथा माला का सेवन करें । ( ९ ) वर्षा में उदमन्ध, दिवास्वप्न, ओस में शयन, नदी का जल, व्यायाम, आतप तथा मैथुन वर्जनीय है । ( ६ ) शरदऋतुचर्या ( १ ) शारीरिक बल मध्य रहता है । ( २ ) शरदऋतु में सूर्य की किरणों द्वारा प्रतप्तपित्त सहसा कुपित हो जाता है । ( ३ ) शरद में मधुर, लघु, शीत, सतिक्त पित्त-शामक अन्न - पान मात्रानुसार हितकर तथा सेवनीय हैं । ( ४ ) शरद् में यव, गोधूम तथा शालिचावल के साथ लाव, कपिञ्जल ( तीतर ), एग ( कृष्ण हरिण ), उरभ्र ( मेंढा ), शरन तथा शशक के मांस का सेवन योग्य ह । ( ५ ) शब्द में तिक्त द्रव्यों से सिद्ध किये हुये घृत का पान, विरेचन, रक्तमोक्षण तथा आतप सेवन करणीय है । ६ ) शरद में वसा, तेल, ओस, औदक तथा आनूप देश के प्राणियों का मांस, क्षार, दधि, दिवास्वप्न तथा प्राग्वात वर्जनीय है । इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाहारव्यपाश्रयम् । उपशेते यदौचित्यादोकः सात्म्यं तदुच्यते ॥ ४ ९ ॥ १. गङ्गाधरस्तु ‘ ओकसात्म्यम् ' इति पठति । ओकमात्म्यमभ्याससात्म्यम् ।
पृष्ठ 242
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
-ke-तस्याशितीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ( ग ) सात्म्य - वर्णन ( Homologation ) १४६ ओकसात्म्य का वर्णन - इस प्रकार चेष्टा ( बिहार ) और आहार के अनुसार ऋतुमात्म्य का उपदेश किया गया है । जो आहार और विहार उचित ( निरन्तर अभ्यस्त ) होने से उपशेते अर्थात् शरीर के लिये हितकारी होता है उसे ओकसात्म्य ( Acquired Homologation ) कहते हैं ॥ ४ ९ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि अनुचित ( अपथ्य ) आहार - विहार भी यदि निरन्तर सेवन करते रहने से प्रकृति के अनुकूल हो जायँ अतः हानि न पहुँचायें तो उन्हें ओकसात्म्य ( ओक = शरीर + सात्म्य = अनुकूल ) कहते हैं । देशानामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः । सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव च ॥५० ॥
सात्म्य वर्णन ( उपसंहार ) - सात्म्य को जानने वाले विद्वान् देश और रोगों के गुणों से विपरीत गुण वाले चेष्टित ( बिहार ) और आद्य ( आहार ) आदि को उन उन देशों और रोगों के लिये सात्म्य मानते हैं ॥ ५० ॥
विमर्श - सात्म्य का अर्थ है उपशय - ' सात्म्यार्थो ह्युपशयार्थ: ' ( च. नि. अ. १ ), ऐसा आचार्य ने स्वयं कहा हैं । यहाँ चार प्रकार का सात्म्य बतलाया गया है - ( १ ) ऋतुसात्म्य, ( २ ) ओक-साम्य, ( ३ ) देशसात्म्य तथा ( ४ ) रोगसात्म्य | इनके बलाबल का निरूपण इस प्रकार किया गया है - ' तत्रौकसात्म्यं सामान्यं सर्वदेशेषु सम्भवात् । ऋतोर्देशविशेषो हि सामान्याद्वल-वान् यतः ॥ देशौकःसात्म्ययोरोकः सात्म्यं तु बलवन्मतम् । तद्यथा कण्ठरोगे तु प्रश्वासगलरोधिनि || ग्रीष्मर्ती सिन्धुदेशे च पुंसि क्षीराज्यशालिनि । मुक्त्वा सात्म्यत्रयं व्याधिसात्म्यमेव प्रयोजयेत् ॥ कटु-' निक्तकषायादि रूक्षं यच्चापतर्पणम् । न ह्यस्यां व्याध्यवस्थायां ग्रैष्मिको विधिरिष्यते ॥ न सैन्धवो fafare मत्स्यानूपामिषादिकः । न चापि तत्र शाल्यन्नक्षीराज्यादि हितं तदा ॥ अनया हि दिशा सर्वमूह्यं साम्यबलाबलम् । मिथः सात्म्याद विरोधी स्यादनुरोधेन योजयेत् ॥ सर्वाण्येव हि सात्म्यानि तद्यथा पैत्तिके गदे । शरदृतौ मरौ देशे नरे मधुरशालिनि ॥ तत्रर्तुदोषपुरुष रोगसात्म्यं प्रयोजयेत् । अयमेव विधिर्ज्यायान् यत्साम्यानां चतुष्टयम् ॥ प्रयुज्यते विरोधेन विरोधे ज्ञापितो विधिः । सात्म्यस्य नियमो ह्येष आत्मना सह यत् स्थितम् ॥ आत्मा ह्यनुमतो देहो यदा द्रव्योप-योगतः । विकारं नैव भजते तस्मात्सात्म्यं निरुच्यते ॥ ' ( अ. सं. नि. अ. १ ) । तत्र श्लोकः-ऋतावृतौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किंचन । तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत्सात्म्यमेव च ॥५१ ॥
इत्यनिवेश तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के तस्याशितीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अध्यावत विषयों का उपसंहार - इस ' तस्याशितीय ' नामक अध्याय में प्रत्येक ऋतु में मनुष्यों के सेवन करने तथा सेवन न करने योग्य आहार - विहारों का कारणसहित वर्णन तथा सात्म्य का भेद और उसका विवेचन किया गया है ॥ ५१ ॥
चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृन तन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में स्वस्थवृत्त-चनुष्कविषयक तस्याशितीय नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥
पृष्ठ 243
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५० चरकसंहिता सप्तमोऽध्यायः अथातो न वेगान्धारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद ' न वेगान्धारणीयाध्याय ' की व्याख्या की जायगी ॥ जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पूर्व अध्यायों में स्वस्थवृत्त - सम्बन्धी प्रधान रूप से आहारों तथा गौण रूप से विहारों का वर्णन किया गया है । हितकर आहार, सेवन किये जाने के बाद सम्यक् परिणत होकर, अपने सार अंश से रस - रक्तादि धातुओं का निर्माण कर, मल - मूत्र द्वारा किट्ट रूप में जब शरीर से बाहर निकल जाते हैं तब स्वास्थ्य ठीक रहता है । यदि मल - मूत्रादि के वेगों को रोक लिया जाय तो हितकर आहार - विहार सेवन करने पर भी स्वास्थ्य उत्तम नहीं रह सकता । अतः वेगों के रोकने से होने वाली हानियाँ और उनकी चिकित्सा बताने के लिये इस अध्याय का आरम्भ किया जाता है । छ्न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान् मूत्रपुरीषयोः । न रेतसो नवातस्य न च्छेद्यः क्षवथोर्न च ॥३ ॥
नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् चुत्पिपासयोः । न वाष्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च ॥ ( १ ) अधारणीय वेगवर्णन ( Description of Non - Suppressible Urges ) तेरह अधारणीय वेग • बुद्धिमान् व्यक्तियों को आए हुए ( शुक्र ), ४. वात ( अपानवायु ), १. मूत्र, २, पुरीष, ३. रेस् ५. वमन, ६. क्षवथु ( छींक ), ७. उद्वार ( डकार ), ८. जृम्भा ( जॅभाई ), ९. क्षुत् ( भूख ), १०. पिपासा ( प्यास ), ११. वाष्प ( आँसू ), १२ निद्रा और १३. परिश्रम से उत्पन्न श्वास के वेगों को नहीं रोकना चाहिए ॥ ३-४ ॥ विमर्श -- उपर्युक्त तेरह वेग किसी न किसी शारीर क्रिया ( Physiological action ) के प्रतीक हैं । अतः उन्हें रोकने से हानि होने की संभावना बनी रहती है । इससे कोई न कोई विकृति ( Pathological state ) स्थायी स्वरूप ले लेती है । अष्टांगसंग्रह में कास का वेग रोकना भी हानिकारक बताया गया है, यथा- ' वेगान्न धारयेद् वातविण्मूत्रक्षवतृक्षुधाम् । निद्राकास-श्रमश्वासजृम्भाश्रुच्छर्दिरेतसाम् ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. ५ ) । चरक में बताए गए इन तेरह वेगों को रोकने से सुश्रुत ने तेरह प्रकार के उदावर्त बतलाए हैं, यथा- ' अवश्चोर्ध्वं च भावानां प्रवृत्तानां स्वभावतः । न वेगान् धारयेत् प्राज्ञो वातादीनां जिजीविषुः ॥ वातविण्मूत्रजृम्भाश्रुक्षवोद्भावमीन्द्रियैः । व्याहन्यमानैरुदितैरुदावर्तो निरुच्यते ॥ क्षुत्तृष्णाश्वासनिद्राणामुदावर्ती विधारणात् । तस्याभिधास्ये व्यासेन लक्षणं च चिकित्सितम् ॥ त्रयोदशविधश्चासौ भिन्न एतैस्तु कारणैः । ' ( सु. उ. अ. ५५ ) । चरक ने अष्टोदरीय अध्याय में केवल वात, मूत्र, पुरीप, शुक्र, छदि और छींक इन छहों का वेग रोकने से उदावर्त माना है ।
एतान् धारयतो जातान् वेगान् रोगा भवन्ति ये ।
पृथक् पृथक चिकित्सार्थं तान्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥
अधारणीय वेर्गा के धारण से रोगोत्पत्ति - इन उत्पन्न हुए वेगों को रोकने से जो रोग उत्पन्न होते हैं, चिकित्सा के लिये उनके अलग - अलग भेटों का वर्णन मैं कर रहा है, तुम सुनो ॥ ५ ॥
बस्ति मेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ६ ॥
१. ' वम्याः ' ग.
पृष्ठ 244
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १५१ ( १ ) मूत्रवेग रोकने से होने वाले रोग - आए हुए मूत्र का वेग रोकने से बस्ति और लिंग में शूल, मूत्रकृच्छ्र, शिर में वेदना, विनाम ( वेदना काल में शरीर झुक जाना ) और वंक्षण में आनाह ( Swelling in lower abdomen due to distended Bladder ), ये लक्षण प्रकट हो जाते हैं ॥ ६ ॥
विमर्श - मूत्रवेग को प्रयत्नपूर्वक रोकने से वायु प्रकुपित होकर मूत्राशय तथा शिश्न में शूल उत्पन्न कर देता है । मूत्र के वेग को रोकने से मूत्राशय विस्फारित हो जाता है जिससे उसके तनाव ( Tension ) की स्वाभाविक स्थिति समाप्त हो जाती है । तनाव न होने से मूत्रत्याग कराने वाली नाडियों पर भी उत्तेजक प्रभाव नहीं पड़ता । इससे मूत्र कठिनता से बूंद - बूंद करके बार - बार निकलता है । सांधे रहने से वस्तिप्रदेश में तनाव के कारण पोडा का अनुभव होता है अतः रोगी उस पीडा को कम करने के उद्देश्य से आगे की ओर को झुक कर वहाँ की पेशियों को ढीला रखने का प्रत्यत्न करता है । मूत्र से परिपूर्ण मूत्राशय के दबाव से वंक्षणप्रदेश में भी तनात्र की अनुभूति होती है । मूत्राशय का गुदा ( Rectum ) पर दबाव पड़ने से उसमें भी पीडा होती है । अण्डकोष वस्ति के सामने ही रहते हैं अतः तनाव के कारण उसमें भी पोडा का अनुभव होता है । यही नुश्रुत ने कहा है — ' मूत्रस्य वेगेऽभिहते नरस्तु कृच्छ्रेण मूत्रं कुरुतेऽल्पमल्यन् । नेड े गुदे वङ्खण-मुष्कयोश्च नाभिप्रदेशेष्यथवाऽपि मूर्ध्नि । आनद्धवस्तिश्च भवन्ति तीव्राः शूलाश्च शूलैरिव भिन्नमूर्तेः ॥ ' ( सु. उ. अ. ५५ ) । स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् । सूत्रे प्रतिहते कुर्यात्रिविधं बस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
मूत्रवेगावरोवजन्य रोगों की चिकित्सा — मूत्र का वेग रोकने से जब रोग उत्पन्न हो जायँ और तो घी स्वेदन ( Fomentation ), अवगाहन ( Tub - bath ) और अभ्यङ्ग ( Massage ) करना का अवपीडक लेना चाहिए तथा अनुवासन, निरूह, उत्तर, इन तीनों बस्तियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ७ ॥
विमर्श - यहाँ अवपीडक का अर्थ है अधिक मात्रा में घी का प्रयोग, यथा - ' मूत्रजेषु तु पाने च प्राग्भक्तं शस्यते घृतन् । जीर्णान्तिकं चोत्तमया मात्रया योजनाद्वयम् । अवपीडकमेतच्च संज्ञितम् । ' ( अ. सं. सू. अ. ५ ) । पक्वाशयशिरःशूलं वातवर्चोऽप्रवर्तनम् । पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते ॥ ८ ॥
( २ ) पुरीषवेगावरोधजन्य रोग पुरीष का वेग रोकने से पक्काशय और होने सिर लगता में वेदना है ॥, अपान वायु एवं मलका रुक जाना, जङ्घा की पिंडलियों में ऐंठन और पेट में आध्मान विमर्श - पुरीप का प्रवर्तक अपानवायु ही है । उसका वेग प्रयत्नपूर्वक धारण करने से अपान-वायु एवं उसका आश्रय स्थल नाडीचक्र विकृत हो जाता है, फलस्वरूप वायु की प्रतिलोमगति से पुरीष पुनः बृहदन्त्र में चला जाता है और वहां बृहदान्त्र की कला द्वारा मलस्थित अवशिष्ट जलीयांश भी शोषित हो जाता है । इस प्रकार मल के पूर्णतया शुष्क हो जाने से उसके त्याग की प्रवृत्ति नहीं होती । मलाशय या आन्त्रस्थित मल से गैसों की उत्पत्ति होकर उदर में आटोप एवं शूल जैसे लक्षण उत्पन्न होते है । अधोमार्ग में पूर्णतया अवरोध होने के कारण वायु प्रतिलोम गति से ऊर्ध्व-मार्ग द्वारा डकारों के रूप में निकलता है । मलाशय के सामने की ओर मूत्राशय ( Bladder ) भी स्थित रहता है । अतः मलाशयगत प्रकुपित अपानवायु के ददाव से मूत्राशय एवं उससे सम्बन्धित शिश्न में भी पीडा की अनुभूति होती है । वमन द्वारा निकला हुआ पदार्थ अपानवायु से १. ' वातवर्चो निरोधनम् ' ग. ।
पृष्ठ 245
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५२ चरकसंहिता मिश्रित होने के कारण पुरीष के ममान ही होता है, इसी आशय से मुख द्वारा पुरीष - वमन का निर्देश सुश्रुत ने किया हैं । सुश्रुत ने पुरीषवेग रोकने से निम्नलिखित विकृतियाँ बतलाई है - ' आटोपशूलौ परिकर्तनञ्च सङ्गः पुरीपस्य तथोर्ध्ववातः । पुरीषमास्यादथवा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥ ' ( उ. अ. ५५ ) । स्वेदाभ्यङ्गावगाहाश्च वर्तयो बस्तिकर्म च । हितं प्रतिहते वर्चस्यन्नपानं प्रेमाथि च ॥ ९ ॥
पुरीषवेगावरोधजन्य रोगों की चिकित्सा -• पुरीष की रुकावट से होने वाले रोगों में स्वेदन, अभ्यङ्ग, अवगाहन, गुदा में वर्ति रखना ( Suppositories ), वस्तिकर्म तथा प्रमाथी अन्न - पान का सेवन हितकारी होता है ॥ ९ ॥
विमर्श - ' प्रमाथी ' अन्न - पान वह है जो स्रोतों से मल को अलग करे, यथा - ' निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोपसञ्चयम् । निरस्यति प्रमाथि तत् ॥ ' ( शार्ङ्ग. पू. ख. अ. ४ ) । मेढे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दों हृदि व्यथा । भवेत् प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च ॥ १० ॥
शुक्रवेगावरोवजन्य रोग - शुक्र का ( ३ ) वेग रोकने पर मेढ़ ( मृत्रेन्द्रिय - शिश्न ) तथा वृषण ( Scrotum ) में शूल, अंगमर्द, हृदय में वेदना और मूत्र का रुक - रुक कर आना, ये उपद्रव होने लगते हैं ॥ १० ॥
विमर्श - शुक्र एक गाढ़ा, पिच्छिल एवं दूधिया रंग का तरल पदार्थ है । इसका मुख्य अवयव शुक्राण्ड या शुक्रकीट है । मैथुन के समय निकलने वाले शुक्र के सब अंशों का निर्माण वृषणग्रन्थि ( Testes ) के द्वारा नहीं होना । इन ग्रन्थियों में शुक्रकीट बनते है । जो शुक्र इन ग्रन्थियों में बनता है वह इतना अधिक गाढ़ा होता है कि शुक्रकीट इसमें भलीभाँति गति नहीं कर सकते । वृपणग्रन्थि अनेक कोष्ठों का एक समूह है । इन कोष्ठों में केशवत् असंख्य नलिकायें होती है । इनमें ही शुक्र का निर्माण होता है । ये असंख्य नलिकायें आगे चलकर परस्पर मिल जाती हैं और लगभग २०-२५ बड़ी नलिकाओं का निर्माण करती है । ये नलियाँ बहुत मुड़ी रहती है । इस सानूहिक रचना को ही उपाण्ड ( Epididymis ) कहते है । इस उपाण्ड के शिखर में सब नलिकाओं के संयोग से एक बड़ी नलिका बन जाती है जिसे शुक्रप्रणाली ( Vas deferens ) कहते हैं । शुक्र इसके द्वारा शुक्राशय की ओर गमन करता है । शुक्रप्रणाली से निकलने वाले स्राव के द्वारा शुक्र कुछ तरल हो जाता है । शुक्राशय ( Seminal veisicle ) — ये दो छोटे कोप हैं जो मूत्राशय के पिछले भाग से लगे रहते हैं । इनके अन्तःपार्श्व से प्रणाली ( Vas deferens ) लगी रहती है । शुक्रप्रणाली का अन्त नोकीले सिरे से होता है और वह शुक्राशय से मिल जाती है । जहाँ शुक्रप्रणाली शुक्राशय से मिलती है वहीं से एक दूसरी नन्दिका का प्रारम्भ होता है । इसे शुत्र ( Ejaculatory duct ) कहते हैं । शुकस्रोत पौम्पग्रन्थि ( Prostate ) में प्रवेश करके मूत्रमार्ग में खुल जाते है । इस मार्ग से रमन करते हुए शुक्र में शुक्राशय तथा पौरुष ग्रन्थि का भी स्राव मिश्रित हो जाता है जिससे शुगर हो जाता है और शुक्रकीट उसमें स्वतन्त्रतापूर्वक गति कर सकते हैं । कामोत्तेजना के समय उक्त सभी अङ्ग अधिक क्रियाशील हो जाते हैं । उनमें नाव अधिक उत्पन्न होने लगता है । मैथुन ( गर्भाधान ) ही इस खाद का सदुपयोग है । यदि उत्तेजना होने पर भय अथवा अन्य कारणों से स्वस्थान से स्खलिन शुक्र के वेग को रोक दिया जाय तो अवरोध के कारण वृषणग्रन्थि, शुक्रप्रणाली, शुक्राशय तथा पौरुषग्रन्थि में सूजन एवं पीडा होने लगती है । पौरुपग्रन्थि के सान्निध्य से गुदा में भी पीडा का अनुभव होता है । शुक्रस्राव के अवरोध के फल-१. प्रमाथि अनुलोमनम् ।
पृष्ठ 246
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवेगान्धारणीयाध्याय: ७ ] सूत्रस्थानम् १५३ स्वरूप मूत्रकृच्छ्र भी हो जाना है । बार - बार इस प्रकार का अवरोव होने से प्रमेह की भी उत्पत्ति हो सकती है । अविवाहितों में प्रमेह होने का यह मुख्य हेतु है । सुश्रुत में उपर्युक्त लक्षणों के अतिरिक्त गुदा और मुष्कदेश में शोफ, शुक्राश्मरी एवं शुक्र का स्रवण ये अधिक लक्षण कहे गए हैं, यथा- ' मूत्राशये वा गुदमुष्कयोश्च शोफो रुजा मूत्रविनिग्रहश्च ।
शुक्राश्मरी तत्स्रवणं भवेद्वा ते ते विकारा विहते तु शुक्रे ॥ ' ( उ. अ. ५५ ) ।
तत्राभ्यङ्गोऽवगाहश्च मदिरा चरणायुधाः । शालिः पयो निरूहश्च शस्तं मैथुनमेव च ॥११ ॥
शुक्रावरोधजन्य रोगों की चिकित्सा शुक्र का वेग रोकने से उत्पन्न उपद्रवों में वातनाशक तैलों का अभ्यंग, अवगाहन, मदिरापान, मुर्गे के मांस का भक्षण, शालि चावल तथा दूध का सेवन, निरूबस्ति और मैथुन हितकर होते हैं ॥ ११ ॥
विमर्श - पथ्य में दूध तथा चावल खाना चाहिए और वस्ति को शुद्ध करने वाली ( जैसे तृणपञ्चमूल आदि ) औषधियों से सिद्ध दूध का प्रयोग करना चाहिए । सुश्रुत तथा अष्टांगसंग्रह में क्रमशः स्पष्ट उल्लेख है -- ' वस्तिशुद्धिकरावापं चतुर्गुणजलं पयः । आवारिनाशक्कथितं पीतवन्तं प्रकामतः || रमवेयुः प्रिया नार्यः शुक्रोदावर्तिनं नरम् । ' ( सु. उ. अ. ५५ ) तथा ' वस्तिशुद्धिकरैः मिद्धं भजेत् क्षीरम् ' ( अष्टांगसंग्रह सु. अ. ५ ) । सङ्गो विण्मूत्र वातानामाध्मानं वेदना कुमः । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥१२ ॥
( ४ ) अपानवायु का वेग रोकने से होने वाले रोग - अपानवायु का वेग रोकने से वान, मूत्र और मल की रुकावट, उदर में आध्मान, कुम ( विना श्रम थकावट ) तथा उदर में पीड़ा और वात - सम्बन्धी अन्य रोग हो जाते हैं ॥ १२ ॥
विमर्श - अपानवायु ( Flatus ) का वेग धारण करने से इसकी प्रवर्तक वायु ( गुहा एवं वस्तिप्रदेश में स्थित अपानवायु एवं उसकी आश्रयभूत वातनाड़ियाँ ) विकृत हो जाती है । मूत्र और मल का यथासमय त्याग कराना भी इसी वायु के या वातनाड़ीमण्डल के अधीन है, अतः विकृति के परिणामस्वरूप इनकी भी रुकावट हो जाती है । इस प्रकार जब प्रवृद्ध वायु अपने प्रकृतमार्ग से नहीं निकल पाना और मलाशय में स्थित मल की रुकावट से अधिक प्रकुपित होकर ऊपर आन्त्र की ओर बढ़ता है तो उसमें आध्मान उत्पन्न कर देना है । आध्मान के कारण रोगी को वनप्रदेश तथा उदर में पीड़ा होती है । इन लक्षणों के अतिरिक्त उदर में शूल, आरोप, विषमाग्नि, विष्टव्वाजीर्ण जैसे वातजन्य रोगों की उत्पत्ति होती है । सुश्रुत वातनिरोधज उठाव से शिरःशूल, श्रम, कास, प्रतिश्याय की उत्पत्ति तथा मुख से पुरी का निकलना भी मानते ई – ‘ आध्नानशूलौ हृदयोपरोधं शिरोरुजं श्वासमनीव हिक्कान् । कासप्रतिश्यायगलग्रहांश्च वलास-पित्तप्रसरच घोरन् । कुर्यादपानोऽभिहतः स्वमार्गे हन्यात् पुरीषं मुखनः क्षिपेद् वा ॥ ' ( उ. ५५ ) । स्नेहस्वेदविधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च । पानानि वस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ॥१३ ॥
अपानवायु का वेग रोकने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा - अपानवायु का वेग रोकने से होने वाले उपद्रवों में लहन, स्वेदन, वति ( गुदावनि ), वातानुलोमक खान - पान और वातानु-लोक द्रव्यों के क्वाथ से वस्ति का प्रयोग करना चाहिए || १३ ॥ कण्डूकोठारुचिव्य शोथपाण्ड्वामयज्वराः । कुष्टहृल्लासवी सर्पाश्छदिनिग्रहजा गढ़ाः ॥ १४ ॥
( ५ ) वमन का वेग रोकने से होने वाले रोग -- निकलते हुए वमन का वेग रोकने से कण्डू, १. ' वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ध्मानं कुमो रुजा ' ग. ।
पृष्ठ 247
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५४ चरकसंहिता कोठ ( बर्रे काटे हुए का - सा शोत्र ), भोजन में अरुचि, व्यङ्ग, शोथ, पाण्डुरोग, ज्वर, कुष्ठ, हल्लास ( Nausea ) और विसर्प रोग हो जाते हैं ॥ १४ ॥
विमर्श - छर्दि को वमन भी कहते है । पञ्चकर्म चिकित्सा पद्धति में वमनकर्म से कफदोष का निर्हरण किया जाता है । इसमें औषधियों से वमन कराया जाता है । अतएव छर्दि के स्वाभाविक वेग को रोकने से कफप्रधान व्याधियों ( कण्डू, कोठ आदि ) का होना युक्तिसंगत ही प्रतीत होता है । सुश्रुत ने संक्षेप में इसका लक्षण इसी प्रकार बतलाया है - ' दैविघातेन भवेच्च कुष्ठं येनैव दोषेष्ण विदग्धमन्नम् ' ( उ. अ. ५५ ) । वाग्भट ने नेत्ररोग, कास और श्वास, चे उपद्रव अधिक बतलाए हैं — ' विसर्पकोठकुष्ठाक्षिकण्डू पाण्डवामयज्वराः । सकासश्वासहृल्लासव्यङ्गश्वयथवो वमेः ॥ ’ ( सू.अ. ४ ) ।
भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् ।
रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते ॥ १५ ॥
वमन का वेग रोकने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा - वमन का वेग रोकने से होने वाले उपद्रवों में खिला कर शीघ्र ही वमन कराना धूमपान, उपवास, रक्तमोक्षण, रूक्ष अन्न - पान का सेवन, व्यायाम और विरेचन कराना श्रेयस्कर होता है ॥ १५ ॥
विमर्श - सुश्रुत तथा वाग्भट ने कुछ अधिक चिकित्सा सूत्रों का उल्लेख किया है, चा-‘ छर्द्दयाघातं यथादशेषं सम्यक् स्नेहादिभिर्जयेत् । सक्षारलवणोपेतमभ्यङ्गं चात्र दापयेत् ॥ ' ( उ. ५५ ) ' गण्डूपधृनानाहाराः रूक्षं भुक्त्वा तदुद्रुमः । व्यायामः स्रुतिरस्रस्य शस्तं चात्र विरेचनम् ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. ४ ) मन्यास्तम्भः
शिरःशूलमर्दितार्घावभेदकौ ।
इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं तवथोः स्याद्विधारणात् ॥ १६ ॥
( ६ ) क्षवथु ( छक ) का वेग रोकने से होने वाले रोग छींक के वेग को रोकने से मन्यास्तम्भ, शिरःशूल, अर्दित ( Facial Paralysis ), अर्द्धावभेदक ( Hemicrania ) और ज्ञानेन्द्रियों में दुर्बलता हो जाती है ॥ १६ ॥
विमर्श - नासा द्वार से एकाएक तीव्र गति से तीव्र शब्दयुक्त वायु का निकलना ही छींक है । गन्ध का वहन परमाणुओं के द्वारा होता है । तीक्ष्ण एवं असात्म्य पदार्थ के सूंघने से उसके गन्धवह परमाणु नासा कलागत नाड्ययों को प्रक्षुभित करके छींक को उत्पन्न करते हैं । छींक के विषय में चरक और सुश्रुत की भी यही सम्मति है - ' संस्पृश्य मर्माण्यनिलस्तु मूर्ध्नि विष्वक्पथस्थः क्षवथुं करोति ' । ( च. चि. २६ ) श्राणाश्रिते मर्मणि सम्प्रदुष्टे यस्यानिलो नासिकया निरेति । कफानुयातो बहुशः सशब्दस्तं रोगमाहुः क्षवथुं विधिज्ञाः ॥ ' ( सु. उ. २२ ) । प्रागाश्रित मर्म से यहाँ प्राणनाडी के अग्रों का ग्रहण होता है । नासागुहा के विवरों में अवस्थित श्लेष्मा भी स्थानीय कला को उत्तेजित करके छींक उत्पन्न करता है । छींक से वह असात्म्य एवं बाह्य पदार्थ बाहर आ जाता है और दोष के बाहर निकल जाने से किसी प्रकार के रोग की आशङ्का नहीं रहती । इस प्रकार नासागुहा में अवस्थित दोष या असात्म्य वाह्य पदार्थ को बाहर निकालने का प्रयत्न ही छींक कहलाता है | प्रयत्नपूर्वक अथवा किसी अन्य कारण से छींक के रुक जाने पर असात्म्य पदार्थ अन्दर ही रह जाता है और स्रोतों को अवरुद्ध करके अनेक रोगों को उत्पन्न कर सकता है । शिरःशूल इसका प्रधान लक्षण है । यदि इसके कारण सातवीं नाड़ी ( Facial nerve ) पर प्रभाव पड़ जाये तो अदिन रोग भी हो सकता है । छींक न आने से शिरोभाग तथा साथ ही सम्पूर्ण शरीर में भारीपन प्रतीत होता है । छींक आ जाने से अवरोधक कारण हट जाता है अतः शरीर में हलकापन और स्वास्थ्य का अनुभव होता है । अन्य स्रोतों के समान इस
पृष्ठ 248
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १५५ स्रोत का शुद्ध तथा अवरोवरहित रहना अनिवार्य है । इसीलिये सुश्रुत ने ज्वरमुक्त के लक्षण में छींक की प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया है -- ' स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूः पाको मुखस्य च । क्षवथु-श्वान्नलिप्सा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ( उ. ३ ९ ) । छींक को रोकने से विकृति यथास्थानस्थित रह जाती है | यदि वह बढ़कर कान और आँख तक पहुँचे तो नासारोग के साथ - साथ कान और आँख के रोग भी उत्पन्न कर सकती है । साधारणतया इसका प्रभाव पाँचों ज्ञानेन्द्रियों विशेषतया नासिका में स्वाभाविक क्रिया को कम कर देता है । सुश्रुत इसका लक्षण निम्न प्रकार से करते है - " भवन्ति गाढं क्षवथोविंवाताच्छिरोऽक्षिनासाश्रवणेषु रोगाः ' ( उ. ५५ ) । इस तरह छींक के रोकने का प्रभाव सर्वशरीर पर अल्पाधिक मात्रा में होता है ।
तत्रोर्ध्वजत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः ।
हितं वातघ्नद्यं च घृतं चौत्तरभक्तिकम् ॥ १७ ॥
क्षवथु ( छींक ) का वेग रोकने से होने वाले रोगों की चिकित्सा छींक के वेग रोकने से उत्पन्न उपद्रवों में जत्रु के ऊपरी भाग में वातनाशक तेलों के अभ्यङ्गों का सेवन और भोजन के बाद वृतपान करना लाभकर होता है ॥ १७ ॥
विमर्श - वाग्भट ने संक्षेप में चिकित्सा सूत्र का इस प्रकार से उल्लेख किया है - ' तोक्ष्यधूमा-ञ्जनात्राणनावनार्कावेलोकनैः । प्रवर्तयेति सक्तां स्नेहस्वेदौ च शीलयेत् ॥ ' ( सू. अ. ४ )
हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः ।
उदारनिग्रहात्तत्र हिकायास्तुल्यमौषधम् ॥ १८ ॥
( ७ ) उद्गार ( डकार ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा इनकी चिकित्सा डकार के वेग रोकने से हिचकी, श्वास, भोजन में अरुचि, कम्म, हृदय और छाती में जकड़ाहट होती है । इसकी चिकित्सा हिचकी रोग के समान करनी चाहिए ॥ १८ ॥
विमर्श - डकार उदान वायु का कार्य है । उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति को रोकने से उदानवायु प्रकुपित होकर आन्त्रकूजन, श्वास तथा अन्य वातविकारों को उत्पन्न करती है । सुश्रुत ने कुछ विशेष उपद्रवों का उल्लेख किया है, यथा- ' कण्ठास्य पूर्णत्वमतीव तोदः कूजश्च वायोरथवाऽ-प्रवृत्तिः । उद्गारवेगेऽभिहते भवन्ति जन्तोर्विकाराः पवनप्रसूताः ॥ ' ( उ. ५५ ) ।
विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम् ।
जृम्भाया निग्रहात्तत्र सर्वं वातनमौषधम् ॥ १ ९ ॥
( ८ ) जृम्भा ( जम्भाई ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा -जम्भाई के वेग रोकने से विनाम ( शरीर का झुकना ), आक्षेप ( Convulsion ), संकोच ( अङ्गों में सिकुड़न ), शून्यता और शरीर तथा हाथ - पैरों में कम्प होने लगता है । इसमें वान नाशक औषधियाँ लाभ करती है ॥ १ ९ ॥ विमर्श -- जम्भाई में ऊर्ध्वजगत अंगों का विशेष प्रयत्न रहता है अतः इसके स्वाभाविक वेग को रोकने से ऊर्ध्वजत्रुगत रोगों के होने की सम्भावना रहती है । सुश्रुत ने जम्भाई के वेग रोकने से होने वाले उपद्रवों का इस प्रकार वर्णन किया है, यथा- ' मन्यागलस्तम्भशिरोविकारा जृम्भोपघा-तात्पवनात्मकाः स्युः । तथाक्षिनासावदनामयाच भवन्ति तीव्राः सह कर्णनादैः ॥ ' ( उ. ५५ ) । १. आद्यमन्नम् ।
कार्श्यदौर्बल्यचैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः ।
गनिग्रहात्तत्र स्निग्धोष्णं लघु भोजनम् ॥ २० ॥
पृष्ठ 249
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५६ चरकसंहिता ( ९ ) श्रुधा ( भूख ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा - भूख का वेग रोकने से शरीर में कृशता, दुर्बलता, शरीर के वर्ग में परिवर्तन, अह्नों में वेदना, भोजन में अरुचि, चक्कर आना, ये लक्षण उत्पन्न होते है । इसमें स्निग्ध और उष्ण भोजन करना हिनकर होता है ॥ २० ॥
विमर्श - ' अन्नं वै प्राणिनां प्राणाः ' अन्न ही प्राणियों का प्राण है । भूख लगने पर भी भोजन न मिलने से पाचकाग्नि धातुओं का परिपाक करने लगती है जिससे मनुष्य में दुर्बलता आ जाती है । रक्त की कमी से आँखों के आगे अन्धकार सा छा जाता है । विना परिश्रम के शरीर थका हुआ प्रतीत होता है । सुश्रुत इसका लक्षण निम्नलिखित प्रकार से करते हैं - ' तन्द्राङ्गमर्दा वरुचिर्भ्रमश्च क्षुधो विघातात्कृशता च दृष्ट: । ' ( उ. ५५ ) । वाग्भट ने इसके उपद्रव और चिकित्सा इस प्रकार बनाई है, यथा —— ‘ अङ्गभङ्गारुचिग्लानिकार्यशूलभ्रमाः क्षुधः । तत्र योग्यं लघु स्निग्धमुष्णमत्यं च भोजनन् ॥ ”
कण्ठास्यशोषो बाधिर्यं श्रमः सादो हृदि व्यथा ।
पिपासानिग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते ॥ २१ ॥
( सू. अ. ४ ) ( १० ) पिपासा ( प्यास ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा प्यास के वेग रोकने से कण्ठ और मुख का सूखना, बहिरापन, थकावट, अवसाद और हृदय में पीडा होती है । इसमें शीतल द्रव्यों से तर्पण क्रिया करनी चाहिए ॥ २१ ॥
विमर्श - शरीर से प्रतिक्षण मूत्रादि के द्वारा जलीय भाग निकलता रहता है । पिपासा ( Thirst ) उसकी पूर्ति करने की एक सांकेतिक शारीरिक संवेदना है । अतएव प्यास के वेग को काफी देर रोकने से आगे चलकर ( Dehydration ) के लक्षण होने की सम्भावना बनी रहती है 1 । वाग्भट तथा सुश्रुत ने उपद्रव तथा चिकित्सा निम्नलिखित रीति से बताई है, यथा- ' शोषाङ्गसादवा-धिर्यसंमोहभ्रमहृद्गदाः । तृष्णाया निग्रहात्तत्र शीतः स विधितिः ॥ ' ( अ. सू. ४ ) ‘ कण्ठास्यशोपः श्रवणावरोवस्तृष्णाभिघातादधृदये व्यथा च ' । ' तृष्णाघाते पिवेन्मन्यं यवागूं वापि शीतलाम् ' ( सु.उ.५५ । )
प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः ।
बापनिग्रहणात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥
( ११ ) बाप ( आँसू ) वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनका चिकित्सा —• आँसू के वेग रोकने से प्रतिश्याय, नेत्ररोग, हृदय के रोग, भोजन में अरुचि और शिर में चक्कर आने लगते हैं । इसमें रोगी को शयन, महिरा पान और प्रिय लगने वाली कथायें सुनाना हितकर होता है ॥ विमर्श - आँसू आँखों का स्वाभाविक स्राव है, जो निरन्तर अल्पाल मात्रा में निकलकर आँस की कला को आई एवं स्निग्ध रखता है । इसका निर्माण अश्रुग्रन्थि ( Lacrymal gland ) के द्वारा होता है । यह ग्रन्थि अक्षिगुहा के बाह्य एवं उपरितन भाग में स्थित रहती है । इसके दो भाग होते हैं । ऊपर का भाग नीचे के भाग से अपेक्षाकृत बड़ा और छोटे वाहन के आकार का होता है । यह भाग अक्षिगुहा ( Orbital cavity ) का निर्माण करने वाले पुरःकपालास्थि ( Frontal boue ) की अश्रुग्रन्थि खान ( Laerymal fossa ) में अवस्थित रहता है । ग्रन्थि का निम्न भाग छोटा होता है और इसे सहायक अश्रुग्रन्थि ( Accessary laerymal gland ) भी कहते है । इन दोनों ग्रन्थियों से निकलने वाले निःस्राव का वहन छोटी - छोटी लगभग बान्ह नलिकाओं के द्वारा होता है । ये नलिकायें अक्षिगुहा के उपरितन भाग के मध्य में पृथक् पृथक् छिद्रों के द्वारा खुलती है । इनसे निकले हुए अश्रु के द्वारा अक्षिकला ( Conjunctiva ) आई रहती है । इसके बाद अश्रु अश्रुप्रणाली ( Canaliculi ) के द्वारा अश्रुकुप्पिका ( Lacrymal
पृष्ठ 250
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवेगान्धारणीयाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १५७ sac ) में प्रवेश करते हैं जहाँ से वे एक नलिका ( Naso lacrymal duct ) के द्वारा नासिका में चले जाते है । अनुमान धारी होता है एवं साधारण अवस्य में केवल अक्षिका को आई रखने मात्र के लिये होता है तथा बाष्पीभवन के द्वारा नष्ट होता रहता है । किन्तु कदाचित् शारीरिक ( आँख या नाक ) एवं मानसिक उत्तजनाओं ( अत्यधिक हर्ष या शोक ) के फलस्वरूप अप्रन्थि प्रभावित होकर अनुभाव का अधि नात्रा में निर्माण करने लगती है खाव के निकल जाने पर ओ तथा मन दोनों में दो कपन आ जाता है । किन्तु यदि इस बैन को हठात रोक दिया जाय तो सिर में भारीपन, अनुवन्धि सम्बन्ध एवं अन्य क्षेत्रको आदि रोग हो सकते हैं । नेत्ररोगों की उत्पत्ति के सामान्य निदानों में ( अनुनिरोध ) का भी पाठ किया है । यथा -- ' आनन्दजं वाऽप्यथ शोकजं वा नेत्रोदकं प्राप्तममुञ्चतो हि । शिरोगुरुत्वं नयनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह पीनसेन ॥ ( उ. ५५ ) वाग्भट ने चिकित्सा वही और लक्षण कुछ भिन्न बताये है ---' पीनसाक्षिशिरोद्रदृश्यन्यास्तम्भरचिश्रमाः गुलमा परापन मोमयं प्रियाः कथाः ( सू. ४ )!
जृम्भा मस्तन्द्रा च शिरोरोगोऽचिगौरवम् ।
निद्राविधारणास स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥
( १२ ) निद्रा के पार करने से होने व रोग तथा उनको चिकित्सा - निद्रा के वेग को रोकने से जन्भाई, अङ्गका टूटना, तन्द्रा, शि ने वेदना, नेत्र में भारीपन, ये उपद्रव होते है । इसमें रोगी को शयन कराना और उसके हाथ और पैरों को दबाना श्रेयस्कर होता है ॥ २३ ॥
विमर्श - निद्रा के कारण का विवेचनच. सू. २१ के विनशे में किया जायगा थके हुए नाड़ी-तन्तुओं को विश्राम देने के लिए ही प्रधानतः निद्रा की उत्पत्ति होती है । उसके निरोध से वस्तुतः नाहीतन्तुओं से काम लेना थके घोड़े को मार - मार कर दौड़ाने के समान ही है । अतः पूर्वोक लक्षण उत्पन्न होते हैं । सुश्रुत ने दूध पिला कर सुन्दर - सुन्दर कथाओं को कहते हुये शयन कराने का उपदेश दिया है निद्रावाविवेक्षी सुध्या चेष्टकधारत ' ( उ.५५ ) ।
गुरुमहद्रोगसंमोहाः श्रभनिःश्वासघारणात् ।
जायन्ते तत्र विश्रामो वातघ्न्यश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥
( १३ ) अमजन्य निःश्वास वेग के धारण करने से होने वाले रोग तथा उनकी चिकित्सा परिश्रम करने से उत्पन्न श्वास के वेगों को रोकने से गुल्म, हृदयरोग और मूर्च्छा रोग हो जाता है । इसमें विश्राम और वातनाशक आहार - विहार का सेवन कराना हितकर होता है ॥ २४ ॥
विमर्श - साधारण अवस्था में मनुष्य एक मिनट में चौदह से अठारह वार श्वास लेता है । इस अवस्था में हृदय भी अपना कार्य यथावत् करता रहता है । श्वास और हृदय की गति में १: ४ का अनुमान है जितना देर में एक बार वास आना है हृदय उतनी ही देर में चार बार स्पन्दन करना है । हृदय और फुफ्फुस का यह क्रम स्वावस्था पर्यन्त बना रहता है । दौड़ने या अन्य इसी प्रकार का परिक्षन करने पर शरीर को अधिक रक्त एवं अधिक प्राग वायु ( Oxygen ) की आवश्यकता पड़ती है अतः हृदय और फुफ्फुस की गति तीव्र हो जाती है । इस अवस्था में मनुष्य हांफने लगता है, इनको ही श्वास कहते हैं । इस श्वास वेग को बलात् रोकने का प्रयत्न करने से प्राण और उदान वायु प्रकुपित होकर हृदय के कपाटों तथा फुफ्फुस के रोगों की उत्पत्ति करते हैं । वासवंग के जाने से कभी - कभी रोगी को मूच्छों मां आ जाती है । अमजन्यास रोकने पर ने मांसरस का सेवन करना लाभकर बताया है- ' भोग्यो रसेन विश्रान्तः अम श्वासागे नरः ' ( उ.५५ )