चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 311–320
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 311–320
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२१८ चरकसंहिता दिया गया है । ' व्यक्ता ' का अर्थ है निश्चया नक । आत्मा आदि चारों के संयोग से अनुमान भी होना है, किन्तु अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक बाद में होता है, प्रत्यक्ष तत्काल होता है अत: अनुमान में यह लक्षण न चला जाय इसलिए प्रत्यक्ष के लक्षण में ' तदावे ' यह कहा गया है । ‘ तदात्वे ' का अर्थ होता है ' उसी समय ' । भ्रमात्मक ज्ञान का वारण करने के ही लिए गौतम ने यह विशेषण-विशिष्ट लक्षण बतलाया है - ' इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् । ' ( गौ. सू. १।४।४ ) | ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं अतः प्रत्यक्ष भी पाँच प्रकार का होता है । तथापि कार्य और इन्द्रियार्थों के भेद से जितने विषय हैं उतने प्रत्यक्ष होते हैं, जैसे- नेत्रबुद्धि का भेद घट-बुद्धि, पटबुद्धि, रक्तबुद्धि, पीतबुद्धि आदि जिन जिन - विषयों का नेत्र से प्रत्यक्ष होता है उतनी ही बुद्धि ( ज्ञान, प्रत्यक्ष ) होती है । इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान के भेद अनन्त होते | पर दार्शनिकों के यहाँ प्रत्यक्ष के दो भेद होते हैं - ( १ ) निर्विकल्पक और सविकल्पक । निर्विकल्पक ज्ञान में वस्तु का सविभाग ज्ञान नहीं होता, किन्तु ' यह कुछ है ' ऐसा ज्ञान होता है । उदाहरण के लिए माकाव्य ( प्रथम सर्ग ) के निम्नांकित श्लोक में निर्विकल्पक और सविकल्पक दोनों प्रत्यक्षों का वर्णन है, यथा- ' चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविनाकृतिम् । विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः ॥ श्लोक के पूर्वार्द्ध में निर्विकल्पक और उत्तरार्द्ध में सविकल्पक का वर्णन है । सविकल्पक प्रत्यक्ष के दो भेद होते है -- लौकिक और अलौकिक । पुनः लौकिक के दो भेद होते हैं — बाह्य और आभ्यन्तर । फिर बाह्य के पाँच भेद होते हैं - ( १ ) चाक्षुप प्रत्यक्ष, ( २ ) श्रावण प्रत्यक्ष, ( ३ ) रासन प्रत्यक्ष, ( ४ ) त्याच प्रत्यक्ष और ( ५ ) बाग प्रत्यक्ष | आभ्यन्तर प्रत्यक्ष या नानस प्रत्यक्ष केवल एक ही होता है । इस प्रकार लौकिक प्रत्यक्ष के छ भेद होते है क्योकि लौक्षिक प्रत्यक्ष के साधक इन्द्रियार्थसन्निकर्ष छ होते है | तर्कसंग्रह के अनुसार ये इस प्रकार हैं-( १ ) संयोग सन्निकर्ष – ' चक्षुषा घटप्रत्यचजनने संयोगः सन्निकर्षः । ' नेत्र से घड़े के प्रत्यक्ष होने में संयोग सुन्निकर्ष होता है क्योंकि घड़े से नेत्र का संयोग होता है । ( २ ) संयुक्तसमवायसन्निकर्ष- ' वट-जनने संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुः संयुक्तं घंटे रूपस्य समवायात् । ' घड़े में रहने वाले रक्त, पीन आदि रंग के प्रत्यक्ष होने में संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष होता है क्योंकि नेत्र से घड़े का संकोग होता है और घड़े में समवाय सम्बन्ध से रूप रहता है । ( ३ ) संयुक्तसमवेतसमवायसन्निकर्ष-' रूप प्रसामान्यप्रत्यक्षे संयुक्तममवेतसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुःसंयुक्त घंटे रूवं समवेतं तत्र रूपवस्य समवाया । ' घटरूप में रूपाव के प्रत्यक्ष होने में संयुक्तसमवेतसमवाय मन्निकर्ष होता है, करें कि नेत्र से संयुक्त घट में रूप समवाय सम्बन्ध से है और रूप में रूपवसाय स सेहता है । ( ४ ) सनवाय सन्निक - श्री शब्दसाक्षात्कारे समवायः सन्निकर्षः कार्यविवर वकाशस्य श्रवात् शब्दस्याशगुणवाद, गुणगुणिनोश्च समवायान् । श्रोत्र द्वारा शब्द के प्रत्यक्ष में समवाय सन्निकर्ष होता है एवं कि कान के भीतर जो आकाश है वहीं श्रवगेन्द्रिय है, और शब्द आकाश का गुन है अतः शब्द के प्रत्यक्ष में समवाय सशिप होता है क्योंकि गुप और गुणा का सम्बन्ध समवाय होता है । ( ५ ) समवेतसमवाय सन्निकप - ' शब्दसाक्षाकारे माः सन्निकर्षः, श्रोत्रमने शब्दे शब्द वन्य समाचार ॥ शब्द के यक्ष मे समवेत मन सन्निकर्ष होता है क्योकि आकाश में शब्द और शब्द मे समन्ध से रहना है । ( ६ ) विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष - ' नाय विशेषणविशेष्यावः सन्निपः, घटाभाववद्भूतलभित्र चक्षुः भूतले घटाभावस्य विशेषात् ' अभाव के प्रचक्ष ने विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष होता है क्योकि ' यह भूमि घटाभाव वाली है ' यहाँ पर भूमि से नेत्र संयुक्त है, यहाँ पर यह पृथिवी घटाभाव वाली है । यह घटाभाव पद विशेषण है तत्प्रयुक्त अभाव का
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तिन्त्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २१६ ज्ञान होता है । ( २ ) अलौकिक के ३ तीन भेद होते है - ( १ ) सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति, जिसने जाति या अर्थ के एक देश के प्रत्यक्ष होने से उस सम्पूर्ण जाति या अर्थों का सामान्यतः ज्ञान हो जाता है, जैसे एक गो - जाति का ज्ञान होने पर सम्पूर्ण गोव जाति का ज्ञान हो जाता है । ( २ ) ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति, जिससे इन्द्रियों के सन्निकर्ष के विना विषयों का ज्ञान होता है । अर्थात् ज्ञान ही उसका स्वरूप होता हैं, जैसे बरफ को देखने पर विना स्पर्श के ही यह शीतल हैं तथा मिश्री को देख कर, विना जिह्वासंयोग से ही, यह मीठी है, यह ज्ञान हो जाता है । ( ३ ) योगज, यह केवल योगियों को ही होता है । इसके भी दो भेद होते है युक्त और युञ्जान । युक्त प्रत्यक्ष योगिजनों को विना समाधि के ही सदा होता है और युआन प्रत्यक्ष समाधि में विचार करने पर होता है । यथा – ' योगजो द्विविधः प्रोक्तो युक्त - युञ्जानभेदतः । युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽ-परः ॥ ( न्या. सि. मु. ) । प्रत्यक्ष के ये भेद निम्नलिखित कोष्ठक से स्पष्ट हो जाते है । निर्विकल्पक लौकिक प्रत्यक्ष सविकल्पक अलौकिक अलौकिक प्रत्यक्ष का साधक सन्निकर्ष बाह्य आभ्यन्तर 1 सामान्य ८० ज्ञान ल ० योगज चाक्षुष. श्रावण, बारामन, त्याच मानन युक्त युञ्जान लौकिक प्रचक्ष का माधक सन्निकर्ष संयोग, संयुक्तसमवाय, नयुक्तसमवेतसमवाय, सनवीय समवेतसमवाय, विशेषणविशेष्यभाव * प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते । वह्निनिगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २१ ॥
एवं व्यवस्यन्त्यतीतं वीजात् फलमनागतम् । दृष्ट्वा बीजात् फलं जातमिव सदृशं बुधाः ( ३ ) अनुमान की परिभाषा [ Definition of Inference ] - • प्रत्यक्ष - वानपूर्वक अग्निका तीन प्रसरका त एतीने काल का अनुमान किया जाता है । धूम से छिपी हुई वर्तमान और गर्भ को देखने से मैथुननुमान होता है । इस प्रकार भूतकाल का ज्ञान किया जाता है | अनागत ( भविध्य ) फल का अनुमान वीज से किया जाता है ( पूर्ववत् एवं भविष्यकाल का अनुमान है ) बीज बो देख कर, इस बीज के समान फल उत्पन्न हुआ था, यह ( तीन ) काल का अनुमान बीज फल के विषय में भी विद्वान लोग करते है । २१-२२ ॥ विमर्श - ' अनुपत्मीयते मायने इति अनुमानम् ' अर्थात् जिसका बाद में ज्ञान होता है । उसको अनुमान कहा जाता है । यहाँ प्रत्यक्षपूर्वक अनुमान होता है, ऐसा बनाया गया है, अर्थात् जिसका कभी प्रत्यक्ष हुआ हो पर वर्तमान काल में उसकी प्रत्यक्षतः उपलब्धि न होती हो, उसी
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२२० चरकसंहिता वस्तु का अनुमान होता है । अनुमान कब होता है, इस विषय में तर्कसंग्रह में स्पष्ट कहा गया है । कि जहाँ, परामर्शजन्य ज्ञान हो वहाँ अनुमान होता है, यथा- ' परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः । ' परामर्श किसे कहते हैं इस पर बनाया गया है, कि - ' व्याप्तिविशिष्टपचधर्मताज्ञानं परामर्शः । व्याप्ति के साथ पक्षधर्मता का ज्ञान रहना परामर्श है - ' यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः ' अर्थात् जहाँ - जहाँ धूम रहता है वहाँ वहाँ अग्नि रहती है इस प्रकार का ज्ञान रहने को व्याप्ति कहा जाता है - ' व्याप्यस्य पूर्वतादिवृत्तित्वं पचधर्मता । ' व्याप्यधूम आदि के, पर्वत आदि पक्ष में होने को ‘ पक्षधर्मता ' कहते हैं । तात्पर्य यह है कि – ' पर्वतो वह्निमान् धूमात् ' यह अनुमान नभी सम्भव है, जब जहाँ - जहाँ धूम होता है, वहाँ - वहाँ आग अवश्य रहती है, इस व्याप्ति - ज्ञान के साथ पक्ष ( पर्वत ) में व्याप्य ( धूम ) की उपस्थिति दिखाई पड़े । वैसे ही जहाँ जहाँ गर्भ की स्थिति होती है, वहाँ वहाँ मैथुन अवश्य होता है, जहाँ जहाँ दीज है वहाँ वहाँ फल अवश्य होगा । इस व्याप्ति के साथ पक्षधर्मता का ज्ञान आवश्यक होता है । यदि इस प्रकार की व्याप्ति का पहले प्रत्यक्षतः ज्ञान न होगा, तो अनुमान न होगा । अतः आचार्य ने व्याप्त ज्ञान का नाम न बता कर ' प्रत्यक्षपूर्व ' का ही नाम लिया है । विमान स्थान के अ. ४ में - ' अनुनानं खलु तर्को युक्त्य-पेक्षः ' यह अनुमान का लक्षण बताया है । विज्ञात अर्थ में कार्यकारणभाव को देख कर अज्ञान अर्थ में भी उसका निश्चय करना ' युक्ति ' कहा जाता है - ' अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्व-ज्ञानार्थमूहस्तर्क: ' ( न्या. द. ११४० ) अर्थात् अविज्ञान तन्व ( सत्य ) अर्थ में कार्य - कारण का उपपत्तिपूर्वक तत्त्वज्ञान के लिए जो ऊहापोह होता है उसे तर्क कहा जाता है - ' युक्तिसापेक्ष तर्क ' का नाम अनुमान है । तात्पर्य यह कि युक्ति के द्वारा कार्य कारणभाव की कल्पना कर अविज्ञान अर्थ का ज्ञान करना, जैसे महानस में अग्नि और धूम को एक साथ देख कर उसमें कार्यकारणभाव का ज्ञान कर, किसी पर्वत पर धूम को देख कर अग्नि और धूम के कार्य कारणभाव का स्मरण कर छिपी हुई अग्नि का ज्ञान करना अनुमान कहलाता है । इस अनुमान के दो भेद होते हैं । ( १ ) स्वार्थानुमान, स्वयं कार्य कारणभाव को देख कर, अपने ज्ञान के लिए अनुमान करना । ( २ ) परार्थानुमान, कार्य - कारणभाव को दिखा कर, दूसरे व्यक्ति को समझाने के लिए अनुमान करना । इस परार्थानुमान में - ' प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण- उपनय - निगमनात्मक ' पश्चावयववाक्य का प्रयोग किया जाता है जैसे -- ( १ ) प्रतिज्ञा - पर्वतो वह्निमान् ' ( २ ) हेतु - ' धूनानू ' ( ३ ) उदाहरण—-' यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः, यथा महानसन् ' ( ४ ) उपनय - ' तथा चायम् ' ( ५ ) निगमन - ' तस्नात्तथा ' । पुनः ये दोनों अनुमान तीन प्रकार के होते हैं, यथा- ' अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववन् शेष-वन् सामान्यतो दृष्टं च ' ( न्या. द. २१/५ ) | ( १ ) पूर्ववत् - ' यत्र कारणेन कार्यननुमीयते तत्पूर्व--वत् ' जहाँ कारण से कार्य का अनुमान किया जाता है, वहाँ पूर्ववत् अनुमान होता है, जैसे-मेघ को देख कर वृष्टि का या बीज से होने वाले फल का अनुमान यही भविष्यकाल का भी उदाहरण है । ( २ ) शेषवत् - ' यत्र कार्येण कारणमनुमीयते नतु शेषवत् । जहाँ कार्य से कारण का अनुमान किया जाता है वहाँ शेषवन् अनुमान होता है, जैसे गर्भ को देख कर मैथुन का या बीज को देख कर भूत पल का अनुमान । यही उदाहरण अतीत काल के अनुमान का भी है । ( ३ ) समान्यतो दृष्ट – ' मामा - यनोदृष्टं कार्यकारणभिन्नलिङ्गान् । जैसे धून से, अनि का अनुमान, धूम, अनिका न कार्य है न कारण है पर अग्नि से निमित्ततः उत्पन्न होता है । वहीं उदाहरण वर्तमानकाल के अनुमान का भी है । इस प्रकार तीन काल में होने वाले तीन प्रकार के अनुमानों का तीन उदाहरण देकर वर्गन कर दिया गया है । * जलकर्षणवीजर्तुसंयोगात् सस्यसंभवः । युक्तिः षड्धानुसंयोगाद्गर्भाणां संभवस्तथा ॥२३ ॥
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तिम्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २२१ मथ्यं मन्थन ( क ) मन्थान संयोगादग्निसंभवः । युक्तियुक्ता चतुष्पाद संपद्व्याधिनिबर्हणी ॥ २४ ॥
( ४ ) युक्ति प्रमाण का उदाहरण — • जिस प्रकार जल, कर्षण, बीज और ऋतु के संयोग से जौ, गेहूं आदि धान्यों की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार ६ धातुओं ( पञ्चमहाभूत और आत्मा ) के संयोग से गर्भों की उत्पत्ति हुआ करती है, यह युक्ति प्रमाण है । और ( क ) मध्य --- ( मथने योग्य नीचे रखी हुई लकड़ी ), ( ) मन्थन ( मन्थन क्रिया या ' मन्यक ' पाठ होने पर मन्थन करने वाला पुरुष ), ( ग ) मन्धान ( मन्थन करने योग्य लकड़ी को जिस दूसरी लकड़ी से मथा जाता है ) यह ऊपर रहता है । इन तीनों के संयोग से जिस प्रकार अग्नि की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार युक्तियुक्त भिषग्, द्रव्य, उपस्थाता और रोगी चिकित्सा के इन चारों पादों के रहने पर रोगों की शान्ति होती है ॥ २३-२४ ॥ विमर्श -- यहाँ दो उदाहरणों से युक्ति प्रमाण को समझाया गया है । युक्ति का लक्षण - विज्ञात अथवा अविज्ञान अर्थ में भी कार्य कारणभाव का ज्ञान करना युक्ति है । यहाँ जल, कर्षण, बीज और ऋतु इनमें विज्ञात कार्य कारणभाव का ज्ञान कर, अविज्ञात षड्धातु - संयोग से गर्भ की उत्पत्ति की कल्पना तथ्य रूप में की गयी है । जल, कर्षण आदि का ज्ञान सामान्यतः सभी व्यक्तियों को होता है क्योंकि प्रत्यक्ष है । गर्भ की उत्पत्ति अदृष्ट है । अतः विज्ञात धान्य की उत्पत्ति से अविज्ञान गर्भ की उत्पत्ति का प्रामाणिक ज्ञान युक्ति प्रमाण से किया जाता है । दूसरा उदाहरण भी ऐसा ही है । प्राचीन काल में अग्नि की उत्पत्ति अरणि - मन्धन से की जाती थी । आज कल भी यज्ञों में कर्मकाण्डी लोग अरणि - मन्थन से आग उत्पन्न करते हैं । इन तीनों के संयोग से आग निकालना प्रत्यक्ष है अतः विज्ञात है । इससे अविशन चिकित्सा के चतुष्पाद की सिद्धिस्वरूप रोग - विनाश होने की तथ्य कल्पना की जाती है ।
बुद्धिः पश्यति या भावान् बहुकारणयोगजान् ।
युक्तिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यथा ॥ २५ ॥
युक्ति की परिभाषा [ Definition of Reason or Experiment ] - • बहुत कारणों के योग से उत्पन्न अविज्ञान भावों को विज्ञान भावों के कार्यकारण भाव के अनुसार तथ्य को देखने वाली बुद्धि को युक्ति कहते है । इस युक्ति का प्रयोग तीनों - भूत, भविष्य, वर्तमान कालों में होता है | जिससे धर्म, अर्थ, काम इन तीन वर्गों की सिद्धि होती है उसे ' युक्ति ' कहते है ॥ २५ ॥
विमर्श -युक्ति का लक्षण इस प्रकार बताया गया है - ' विज्ञाते अर्थ कारणोपपत्तिदर्शनात् अविज्ञातेऽपि तदवधारणं युक्ति: ' । ( गङ्गाधर ) । इस लक्षण के आधार पर विज्ञात अर्थ के कार्य - कारण भाव की उपपत्ति का ज्ञान होने पर अनेक कारणों के संयोग से होने वाले अज्ञान भावों की उपपत्ति समझने वाली बुद्धि ( ज्ञान ) का नाम युक्ति है, ऐसा अर्थ किया गया है । यह लक्षण उदाहरण के पूर्व में होना चाहिए क्यों कि लक्षण के बाद ही उदाहरण देना ठीक है पर सभी पुस्तकों में उदाहरण पहले और बाद में लक्षण है अतः उसी तरह यहाँ भी किया गया है । वस्तुतः युक्ति को प्रमाणान्तर नहीं माना जाता है, इसका अन्तर्भाव अनुमान में कर लिया जाता है । यह वात ' अनुमानं खलु युक्त्यपेक्षस्तर्क: ' इस अनुमान - लक्षण से स्पष्ट है इसका वर्णन पहले किया जा चुका है । एपा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीचयते । परीचयं सदसच्चैवं ( व ) तथा चास्ति पुनर्भवः ॥ चतुविध परीक्षा ( प्रमाण ) का उपसंहार ' यही चार प्रकार की परीक्षा है, अन्य दूसरी १. ' मथ्यं मन्थनार्थमधःस्थकाठमरणिर्नाम मन्यनमूर्ध्वस्थकाष्ठं येन घृष्यते, मन्थानः कर्ता, एषां संयोगान्मन्थनक्रिययाऽवश्यमग्निसंभव इति युक्तिः । गङ्गाधरः ।
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२२२ चरकसंहिता कोई परीक्षा नहीं है । जिन चार परीक्षाओं के द्वारा सभी परीक्षा करने योग्य सत् और असत् की परीक्षा की जाती है । उन्हीं चार परीक्षाओं द्वारा यह सिद्ध होता है कि पुनर्जन्म होता है ॥ २६ ॥
विमर्श - आचार्य ने यहाँ चार प्रमाणों का उल्लेख कर ' सम्भव अर्थापत्ति ' आदि प्रमाणों को अस्वीकृत कर दिया है । यहाँ बनाया गया है कि प्रमाणों के द्वारा सत्र - सत्तात्मक भाव पदाने और असत् - अभाव पदार्थ इन दोनों की परीक्षा करनी चाहिए । कारण यह है कि जिस इन्द्रिय से भाव पदार्थ घट आदि का ज्ञान होता है उसी इन्द्रिय से घटाभाव का भी ज्ञान होता है । तात्पर्य यह है कि चारों प्रमाणों के द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्ता और उस पदार्थ के अभाव का भी ज्ञान होता है यहाँ पुनर्जन्म का होना चार प्रमाणों से सिद्ध किया गया है उन्हीं चार प्रमागों से पुनर्जन्म का अभाव सिद्ध किया जाय तो सिद्ध नहीं हो सकता । अतः पुनर्जन्म और परलोक होता है । तत्राप्तागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिदार्थादविपरीतः परीक्षकैः प्रणीतः शिष्टानु-मतो लोकानुग्रहप्रवृत्तः शास्त्रवादः स चाप्तागमः, आप्तागमादुपलभ्यते - दानतपोयज्ञसत्या-हिंसाब्रह्मचर्याण्यभ्युदयनिःश्रेयसकराणीति ॥ २७ ॥
( ३ ) चतुर्विधप्रमाण से पुनर्भव ( पुनर्जन्म ) की सिद्धि ( Establishment of Re - birth Theory by Four Fold Methods of Investigation ) ( १ ) आप्तोदेश प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि – आप्त द्वारा प्रगीन आगम ( शास्त्र ) को वेद कहा जाता है । दूसरे कोई भी शास्त्र जो परीक्षकों द्वारा प्रणीत हों, वेद के अर्थों से अविपरीत ( अनुकूल ) हों, शिट पुरुषों द्वारा अनुमोडित हों और लोक की कल्याग - कामना से_प्रवृत्त ( रचे गये ) हो तो ऐसे शास्त्रों को भी आप्त शास्त्र कहा जाता है । आप्त द्वारा रचित शास्त्रों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि- दान, तपस्या, यज्ञ, सत्य बोलना, अहिसा का भाव रखना, ह्मचर्य का पालन करना ये अभ्युदय ( उन्नति ) और निःश्रेयस ( कल्याण ) करने वाले होते हैं । प्रायः अभ्युदय ने ऐहलौकिक उन्नति और निःश्रेयस से पारलौकिक श्रेय प्राप्त करना समझा जाता है । अथवा अभ्युदय से स्वर्ग और निःश्रेयस से मोक्ष प्राप्ति का ग्रहण किया जाता है ॥ २७ ॥
* न चानतिवृत्तसत्त्वदोषाणाम दोषैरपुनर्भवो धर्मद्वारेषूपदिश्यते ॥ २८ ॥
अन्य प्रमाण - रज और तम दोषों से रहित महर्षियों द्वारा धर्मशास्त्रों में जिन व्यक्तियों के मानसिक दोष शान्त नहीं हैं उनके लिए मोक्ष का उपदेश नहीं किया गया है ॥ २८ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है कि - ' मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयान् । वियोगः कर्मसंयोगैर-पुनर्भव उच्यते ॥ ' ( शा. अ. १ ) । रज और तम के अभाव होने पर ही मोक्ष ( अपुनर्भव ) होता है, तब रज और तम से आक्रान्त पुरुषों के लिए दान - धर्म आदि करना अपुनर्भव के लिए नहीं होता किन्तु स्वर्गादि - गमन और क्षीणपुण्य होने पर पुनः जन्म लेने के लिये ही होता है ऐसा आप्त पुरुषों द्वारा धर्मशास्त्रों में कहा गया है । धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगतभयरागद्वेपलोभमोहमा नैर्ब्रह्मपरैरातैः कर्मविद्भिरनुपहतसत्व-बुद्धिप्रचारैः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्यचतुर्भिर्दृष्ट्वोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ॥ २ ९ ॥ इसी विजय में अन्य ऋषि का मन - • जो धर्मद्वार ( दान - पुण्य आदि ) में तत्पर है और जिन लोगों के भव, राग, द्वेन, लोभ, मोह, मान ( अहङ्कार ) दूर हो गये हैं, जो क्रम ( अध्यात्म ज्ञान ) १. ' व्यवस्येदेवं पुनर्भवन् ' यो ।
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तिम्रै परणीयाध्यायः ११ } सूत्रस्थानम् २२३ में तत्पर हैं और अनुष्ठेय यज्ञादि कर्मों को जानने वाले हैं और जिन लोगों के मन और बुद्धि का प्रचार ( विचार करने की शक्ति ) नष्ट नहीं हुआ है अर्थात् जिनके मन और बुद्धि विचार करने में पूर्ण समर्थ है । ऐसे पहले के और उससे भी पहले के आप्त महर्षियों ने अपने दिव्य ज्ञान से पुनर्भव होते देख कर उसका उपदेश किया है । इस प्रकार आप्तोपदेश द्वारा पुनर्भत्र की सिद्धि होती है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - आप्तमहर्षियों ने दिव्य दृष्टि से पुनर्भव का उपदेश किया है । इससे परलोक की भी सत्ता सिद्ध हो जाती है । योगदर्शन में महर्षि आटव्य और जैगीषव्य के संवाद से स्पष्ट है कि पुनर्जन्म होता है, यथा — ' भगवानाटव्यो जैगीषव्यमुवाच दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धि-सत्त्वेन त्वया नाकतिर्यग्गर्भसम्भवं दुःखं संपश्यता देवमनुष्ययोनिषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन सुखदुःखयोः किमधिकमुपलब्धमिति भगवन्नमाटव्यं जैगीषव्य उवाच दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतवुद्धिमत्त्वेन मया नरकनिर्यग्भत्रं दुःखं संपश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन यत् किञ्चिदनुभृतं तत् सर्वे दुःखमेव प्रत्यवैमीत्यादि ' ( यो. द. विभूतिपाद १८ सूत्र भाष्य ) । प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते - मातापित्रोर्विसदृशान्यपत्यानि तुल्यसंभवानां वर्णस्वराकृ-तिसत्वबुद्धिभाग्यविशेषाः, प्रवरावरकुलजन्म, दास्यैश्वर्यं, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इहाकृतस्यावाप्तिः, अशिक्षितानां च रुदितस्तनपानहासत्रासादीनां प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः, कर्मसादृश्ये फलविशेषः, मेधा क्वचित् क्वचित् कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम्, इहागमनमित -च्युतानां च भूतानां समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ॥ ३० ॥
( २ ) प्रत्यक्ष प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि – प्रत्यक्ष प्रमाण भी प्राप्त होता है - माता - पिता के समान सन्तानों का न होना और उत्पत्ति कारण के तुल्य होने पर भी वर्ण, स्वर, आकृति, मन, बुद्धि और भाग्य में विभिन्नता होना, उत्तम और हीन कुल में जन्म होना, नौकर और मालिक होना, सुख, आयु और अमुख आयु का होना, आयु की त्रिमता । इस जगत् में जो कार्य किये जाने है उनका ही फल होना, अशिक्षित शिशु का रोना, दूध पीना, हँसना और भयभीत होना, सामुद्रिक लक्षणों का होना, कर्म की समानता होने पर भी फल में विशेषता का होना, किसी कार्य में स्मरण शक्ति का होना और किसी कार्य में स्मरण शक्ति का न होना, इस जगत् में ( आना ( जन्म लेना ) और इस संसार से च्युत ( मृत्युप्राप्त ) हुए प्राणियों का जातिस्मरण होना, समान रूप से दो व्यक्तियों को देखने पर एक को प्रिय समझना और एक को अप्रिय समझना यह पुनर्जन्म में प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ॥ ३० ॥
विमर्श - प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा भी पुनर्भव की प्राप्ति होती है इसकी सिद्धि यहाँ निम्नलिखित उदाहरणों से समझाई गई है । ( १ ) माता - पिता के सुरूप या कुरूप होने पर भी सन्तान क्रमशः कुरूप या सुरूप होती है इस प्रकार विसदृश देखकर यह समझा जाता है कि कुरूप या सुरूप होना अपने पूर्वकृत कर्म का फल होता है । ( २ ) समान उत्पत्तिस्थान ( एक माता पिता ) होने पर भी वर्ग ( क ) रूप- गौर, श्याम आदि का होना, ( ख ) स्वर ( मधुर, कठोर आदि होना ), ( ग ) आकृति ( छोटे या बड़े कद का होना ), ( घ ) सत्त्व ( मन का राजस, नामस और सात्त्विक होना ) ( ड ) बुद्धि ( अल्पबुद्धि या अधिक बुद्धि का होना ), ( च ) भाग्य ( अभागा या भाग्यवान् होना ), ( ३ ) एक काल जैसे - नक्षत्र, वार, तिथि आदि के समान होते हुए भी किसी का जन्म उत्तम कुल में और किसी का जन्म नीच कुल मे होना, ( ४ ) समान काल और कुल में जन्म होने पर भी किसी का नौकर होना या किसी का मालिक होना, ( ५ ) किसी का सुखपूर्वक या किसी का दु: पूर्वक आयु का १. एवं पुनर्भवः प्रत्यक्षमपि ' ग. ।
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२२४ चरकसंहिता भोगना और ( ६ ) आयु की विषमता - किसी का दीर्घायु होना, किसी का अल्पायु होना, ये सभी बातें जन्मान्तरीय शुभ और अशुभ कर्म के फलस्वरूप होती हैं जिससे पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्म का प्रत्यक्षीकरण होता है । ( ७ ) इस शरीर से जो कार्य नहीं किया गया है उसका फल भी प्राप्त होता है, जैसे बिना शिक्षा के ही उत्पन्न नवजात शिशुओं का रोना, दूध पीना, हँसना और डरना आदि क्रिया में प्रवृत्त होना । यदि जन्मान्तर न माना जाय तो प्रश्न होगा कि इन क्रियाओं की शिक्षा बालक को कभी मिली नहीं, तब वह उत्पन्न होते ही इन रोना आदि क्रियाओं को कैसे करता है? इस प्रश्न का उत्तर संभव नहीं होगा । और जन्मान्तर मान लेने पर अनेक जन्म में अभ्यस्त रोना आदि क्रियायें पुनर्जन्म में अनभ्यस्त होने पर भी संस्कारवश पुनः होने लगती है यह सटीक उत्तर है । न्याय - दर्शन में भी यह बात स्पष्ट की गई है, यथा — ' पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसंप्रतिपत्तेः । ' ( न्या ० द ० ३ | १ | १ ९ ), इससे पुनर्जन्म स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष होता है । ( ८ ) लक्षणोत्पत्ति - सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार गर्भ से ही हाथों में रेखाएँ, शरीर - प्रदेश में तिल, मस्से आदि उत्पन्न होते हैं, जो अशुभ होने पर अशुभ फल और शुभ होने पर शुभ फल देते हैं । यह शुभ या अशुभसूचक फल जन्मान्तरीय शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार होते हैं, यह कहना होगा । अन्यथा ये लक्षण अकारण मानने पढ़ेंगे । ऐसी दशा में ' विना कारण का कार्य नहीं होता ' इस सिद्धान्त का विरोध पड़ेगा अतः जन्मान्तर होता है यह सिद्ध होता है । ( ९ ) दो व्यक्ति एक साथ एक ही कर्म को समान रूप से करते हैं पर फल में विभिन्नता देखी जाती है, जैसे दो छात्र एक ही विषय को एक ही गुरु के पास समान परिश्रम से पढ़ते हैं पर कोई अधिक तेज होता है और परीक्षा में प्रथम श्रेणी से पास होता है, किन्तु दूसरा उतना तेज नहीं होता और परीक्षा में तृतीय श्रेणी से उत्तीर्ण होता है या फेल हो जाता है । इस बुद्धि - विशेष या परीक्षा में पास- फेल होने में भी जन्मान्तरीय शुभ या अशुभ कर्म कारण होता है । ( १० ) किसी कर्म में बुद्धि का लगना और किसी कर्म में बुद्धि का न लगना भी पुनर्जन्म को प्रत्यक्ष करता है, जैसे किसी पिता के चार पुत्र है । पिता सभी को पढ़ाना चाहता है पर पुत्र अपनी रुचि के अनुसार भिन्न - भिन्न मार्गों में लग जाते है और अपनी - अपनी उन्नति करते हैं, इससे स्पष्ट है कि जन्मान्तर में जो व्यक्ति जैसे कर्म का अभ्यास किये रहता है उसकी रुचि उसी कर्म में अधिक होती है । इसीलिए वालकों को कौन सी विद्या पढ़ाई जाय यह निश्चित करने के पहले, शुभ नक्षत्र मुहूर्त में बालक को पूर्वाभिमुख या उत्तरा-भिमुख बैठाने के पूर्व वहाँ अनेक विद्याओं के पढ़ने के साधन रख देते हैं । बैठते समय बालक जिस साधन को पहले उठा ले उसी साधन से सम्बन्धित विद्या या व्यापार के द्वारा उसकी जीविका चलेगी ऐसा ज्ञान किया जाता है । बाद में उसी साधन से उसे विशेष सफलता मिलती है यह प्रत्यक्ष है । इससे स्पष्ट है कि जिस विद्याया व्यापार को प्राणी ने जन्मान्तर में अभ्यस्त किया है उसी कर्म में उसकी बुद्धि लगती है और जो कर्म नहीं किया है उस कर्म में उसकी बुद्धि नहीं लगती, ( ११ ) जातिस्मरण -- किसी - किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजन्म के कर्मों का स्मरण रहता है | यह प्रायः बाल्यावस्था में ही होता है, ऐसा सुना जाता है । जो व्यक्ति रज, नम से निर्मुक्त हो गए हैं उन्हें तो सदा स्मरण रहता है, केवल रज और तम का आवरण अतिक्रान्त जाति के स्मरण का बाधक होता है । ( १२ ) ' इहागमनमितश्च्युतानां च भूतानाम् । ' आयु समाप्त हो जाने पर यमराज के पुरुषों द्वारा जीवात्मा शीघ्र ही यमराज के पास ले जाया जाना है, और यमदूत चित्रगुप्त से पूछते हैं कि यह वही जीवात्मा है जिसकी आयु समाप्त हो गई है, या कोई दूसरा है । चित्रगुप्त की स्वीकृति के वाद पुनः जीवात्मा को यमदूत यहाँ लाकर छोड़ देते हैं और लोकिक श्राद्धादि कर्म में जीवात्मा का शरीर पिण्डों द्वारा निमित होता है जो
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तित्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २२५ द्वादशाह के दिन पुनः यसपुरी के लिए प्रस्थान कर एक वर्ष में यमपुरी को प्राप्त करता है । यह वर्णन ' प्रेतमञ्जरी ' में पाया जाता है । जिसकी आयु समाप्त नहीं है ऐसे जीवात्मा को यदि भूल ते यमदूत ले जाते हैं तो चित्रगुप्त कह देता है, कि यह वह व्यक्ति नहीं है । तव यमदूत जीवात्मा को यहाँ लाकर उसी शरीर में छोड़ देते हैं और मनुष्य जीवित हो जाता है । इसीलिए बनाया गया है कि ' इश्च्युतानां भूतानाम् ' इस संसार से जो जीवात्मा च्युत हो गया है --- उसका पुनः ' इहागमनम् ' -- इन लोक में आना परलोक की तथा पुनर्जन्म की सत्ता को सिद्ध करता है । ( १३ ) सहसा एक समान दो व्यक्तियों को देखा जाता है पर एक में प्रेम और दूसरे में द्वेष होता है । इसका कारण यह है कि पूर्व जन्म में जिस व्यक्ति से प्रेम रहा, संस्कारवश इस जन्म में उसे देखने ही प्रेम उमड़ आता है और जिससे पूर्व जन्म में द्वेष था उसे देखकर शत्रुता या द्वेष हो जाता है । इस प्रकार यहाँ ये तेरह उदाहरण देकर पुनर्जन्म को प्रत्यक्ष सिद्ध किया गया है । अत एवानुमीयते -यत् - स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं दैवसंज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत् फलम्, इतश्चान्यद्भविष्यतीति, फलाद्वीजमनुमीयते फलं च बीजात् ॥ ३१ ॥
( ३ ) अनुमान प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि - इनी प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर अनुमान किया जाता है कि पूर्व शरीर से किया गया जो अपना कृत कर्म है जिसे दैव ( भाग्य ) कहा जाता है वह अपरिहार्य है, ऐसे आनुबन्धिक कर्म का यह फल है जो इस जन्म में भोगा जा रहा है । इस शरीर से जो आनुबन्धिक कर्म किया जाता है उसका फल दूसरे जन्म में भोगना पड़ेगा! जैसे फल से बीज का अनुमान और बीज से फल का अनुमान किया जाता है ॥ ३१ ॥
विमर्श - अनुमान का लक्षण - ' प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते ' यह पहले कह आए हैं | अनुमान करने में प्रत्यक्ष का ज्ञान होना आवश्यक है । इसीलिए बताया गया है कि इसी प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर अनुमान किया जाता है । कर्म दो प्रकार का होता है ( १ ) सामान्य-कर्म, ( २ ) आनुवन्धिक कर्म । सामान्य कर्म का फल जीवितावस्था में प्रतिदिन भोग लिया जाता है । उसके लिए बताया गया है कि स्वकृत कर्म अपरिहार्य होता है, यथा- ' अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ' ( भ.गी. ) । दूसरा आनुबन्धिक कर्म होता हैं, जो संचित होता है उसे ही भाग्य कहा जाता है । उसी कर्म के आधार पर पुनर्जन्म होता है और सारे शुभ और अशुभ आनुवन्धिक कर्म का फल भोगना पड़ता है । इसी के लिए ' अविनाशि ' शब्द कहा गया हैं, यथा- ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । ( भ. गी ) । इस प्रकार अनुमान से पूर्वजन्म और पुनर्जन्म इन दोनों को सिद्ध किया गया है । दोनों को सिद्ध करने के लिए दो उदाहरण दिये गए हैं, जैसे फल को देख कर अतीत बोज का अनुमान किया जाता है वैसे उत्तम कुल या अधम कुल में जन्म देख कर पूर्व जन्म में किए गए शुभ या अशुभ कर्म का अनुमान कर पूर्वजन्म सिद्ध किया जाता है । तथा जैसे बीज को देख कर भविष्य में होने वाले फल का अनुमान किया जाता है वैसे इस शरीर से किए गए शुभ और अशुभ कर्म से भविष्य में पुनर्जन्म का अनुमान कर पुनर्जन्म सिद्ध किया जाता है । युक्तिचैषा - षड्धा समुदयाद्गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात् क्रिया; कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्; कर्मसदृशं फलं, नान्यस्माद्वीजादन्यस्योत्पत्तिः; इति युक्तिः ॥ ३२ ॥
( ४ ) युक्ति प्रमाण से पुनर्जन्म की सिद्धि - • पुनर्जन्म को सिद्धि में यह युक्ति है कि ६ धातुओं के समुदाय से गर्भ की उत्पत्ति होती है । कर्ता और करण के संयोग से क्रिया होती है । १५ च ० सं ०
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२२६ चरकसंहिता किए हुए कर्म का फल होता है जो कर्म नहीं किया जाता उसका फल नहीं होता है । बिना बीज के अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती । कर्म के अनुसार फल होता है, दूसरे बीज से दूसरे अङ्कुर की उत्पत्ति नहीं होती ॥ ३२ ॥
विमर्श - विज्ञात अर्थ में कार्यकारणभाव का ज्ञान कर अविज्ञान अर्थ में कार्यकारणभाव के द्वारा तथ्य का निर्धारण करना ' युक्ति ' है । अङ्कुर की उत्पत्ति में कार्यकारणभाव का ज्ञान कर गर्भोत्पत्ति में कार्यकारणभाव के द्वारा पुनर्जन्म की सिद्धि की गई है । गर्भ की उत्पत्ति में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि पाञ्चभौतिक शुक्र और शोणित का संयोग जब शुद्ध गर्भाशय में होता है और अपने पूर्वकृत कर्म के वशीभूत जीवात्मा अवक्रमण करता है तब गर्भ की उत्पत्ति होती है, यथा - ' आयुर्वेदशास्त्रेष्वसर्वगताः क्षेत्रमा नित्याश्च तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु सञ्चरन्ति धर्माधर्मनिमित्तम् ' । ( सु. शा. अ. १० ) तथा - ' भूतैश्चतुभिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात् । कर्मात्मकत्वान्नतु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥ ' ( शा. अ. २ ) । इन वाक्यों से गर्भोत्पत्ति में आत्मा कर्ता है और वह पूर्वजन्म कृत कर्मों के आधार पर विभिन्न नीच - ऊँच योनियों में गमन करता रहता है अर्थात् पूर्वजन्म के शरीर से किए गए कर्मों के आधार पर इस जन्म में शरीर धारण करना है । इस युक्तिप्रमाण से भी पूर्वजन्म और पुनर्जन्म इन दोनों की सिद्धि की गई है । एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भवे धर्मद्वारेष्ववधीयेत; तद्यथा - गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रियायामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽतिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यन-स्यायां देहवाङ्मानसे कर्मण्यक्लिष्टे देहेन्द्रियमनोऽर्थवृद्धयात्मपरीक्षायां मनःसमाधाविति; यानि चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्याणि वृत्तिपुष्टिकराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुं; तथा कुर्वन्निह चैव यशो लभते प्रेत्य च स्वर्गम्; इति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति ॥ ३३ ॥
इस प्रकार चारों प्रमाणों द्वारा पुनभेत्र की सिद्धि का उपदेश हो जाने पर धर्मसावनों में सावधान रहें । धर्मसाधक कार्य कौन - कौन से हैं इस आशङ्का पर उत्तर दे रहे हैं - ( १ ) ( प्रथम आश्रम में ) गुरुसेवा, वेदाध्ययन तथा व्रतचर्या ( ब्रह्मचर्य का पालन ) में सावधान रहें, ( २ ) ( गृहस्था-श्रम में प्रवेश करें तो ) विवाह कर्म में, सन्तान उत्पन्न करने में, नौकरों के भरण - पोषण कर्म में, अतिथियों की सेवा करने में, दान करने में और अनभिध्या ( दूसरे का धन लेने की अनिच्छा ), इस क्रिया में सावधानीपूर्वक व्यवहार करें । ( ३ ) ( वानप्रस्थाश्रम में ) तपस्या करने में, दूसरे व्यक्ति के गुणों में दोषारोपण न करने में तथा कष्ट न देने वाले शारीरिक, वाचिक और मानसिक कार्यों के करने में सावधानतापूर्ण व्यवहार करें । ( ४ ) ( संन्यासाश्रम में ) देह, इन्द्रिय, मन, इन्द्रिय - मन के अर्थ ( विषय ), बुद्धि और अपनी आत्मा की परीक्षा करने में तथा मन को समाधि में लगाने के लिये सावधानीपूर्वक चेष्टा करें । इन परलोक - साधक कुछ कर्मों का उपदेश करने के बाद सामान्यतः उपदेश दे रहे हैं कि - अन्य कोई भी इसी प्रकार के कार्य, जो, सज्जन पुरुषों द्वारा अनिन्दित ( प्रशंसित ), स्वर्ग को देने वाले और वृत्ति को पुष्टि करने वाले कार्यों को करना आरम्भ करे । इस प्रकार विचारपूर्वक इन कार्यों को करने से संसार में यश मिलता है और मरने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है । इस प्रकार तीसरी परलोकैषणा की भी व्याख्या की गई है ॥ ३३ ॥
अथ खलु य उपस्तम्भाः, त्रिविधं बलं, त्रीण्यायतनानि, त्रयो रोगाः, त्रयो रोगमार्गाः, त्रिविधा भिषजः, त्रिविधमौषधमिति ॥ ३४ ॥
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तित्रैषरणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् ( ४ ) तीन - तीन ( त्रिविध ) प्रकार के अन्य सात विषय ( Seven Other Triads ) २२७ अब इसके बाद ( १ ) तीन उपस्तम्भ ( २ ) तीन प्रकार के बल, ( ३ ) रोगों के तीन आयतन, ( ४ ) तीन प्रकार के रोग, ( ५ ) रोगों के तीन मार्ग, ( ६ ) तीन प्रकार के चिकित्सक और ( ७ ) तीन प्रकार की औषधियों का वर्णन है ॥ ३४ ॥
विमर्श - इस अध्याय को तीन एषणाओं से प्रारम्भ किया गया है, अतः तीन - तीन के वर्ग के अन्य समुदायों का भी यहाँ वर्णन किया जा रहा है । त्रय उपस्तम्भा इति — आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति, एभिस्त्रिभिर्युक्तियुक्तैरुपस्तब्धमुप-स्तम्भैः शरीरं बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्तते यावदायुः संस्कारात् संस्कारमहितमनुपसेव-मानस्य, य इहैवोपदेच्यते ॥ ३५ ॥
( १ ) तीन उपस्तम्भ - त्रिविध उपस्तम्भ, आहार, स्वप्न और ब्रह्मचर्य ये तीन उपस्तम्भ है । इन तीनों उपस्तम्भों का युक्तिपूर्वक सेवन करने से यह शरीर उपस्तब्ध ( स्थिर ) हो कर जब तक संस्कारित रहना है तब तक वह वल, वर्ण, उपचय ( वृद्धि ) से उपचित हो कर उचित रूप में रहना है | यहाँ संस्कार कैसे किया जायगा इस प्रश्न पर उत्तर दिया गया है कि अहित वस्तुओं का सेवन न करना ही संस्कार है, जिसका वर्णन यहीं आगे किया जायगा ॥ ३५ ॥
विमर्श - ' उप ' का अर्थ है सहायक और ' स्तम्भ ' का अर्थ खम्भा । मकान में खम्भे दो प्रकार के होते है एक प्रधान, दूसरा अप्रधान । इस प्रसंग में शरीर आत्मा के लिए एक मकान है । इस मकान के प्रधान खम्भे वात, पित, कफ है । जैसा कि सुश्रुत ने कहा है- ' वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भव-हेतवः, तैरव्यापन्नैरयोमध्योर्ध्वसन्निविष्टैः शरीरमिदं धार्यते अगारमिव स्थूणाभिस्त्रिभिः । ( सु. सू. अ. २१ ) । यहाँ आहार, स्वम, ब्रह्मचये ये तीन उपस्तम्भ बनाये गए हैं । इसमें भी दोषों सर्वप्रथम की आहार को ही प्रधान माना गया है । क्यों कि आहार से ही रस की उत्पत्ति, वातादि उत्पत्ति और धातुओं का निर्माण होता है । आहार के अभाव में शरीर की स्थिति नहीं रह सकती । इसी लिए बताया गया है - ' कलावन्नगताः प्राणाः ' तथा - ' प्राणाः प्राणभृतामन्त्रमन्नं लोकोऽभिधावनि । वर्णः प्रसादः सौस्वर्य जीवितं प्रतिभा मुखम् ॥ तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ’ ॥ ( च. सू. अ. २७ ) । इसके बाद दूसरा स्थान स्वप्न का है । यदि प्राणी नियमित रूप से अपने सभी कार्य करते हुए यथाकाल उचित रूप में निद्रा का सेवन न करें, तो स्वास्थ्य की हानि तथा मृत्यु तक भी सम्भाव्य है, क्योंकि कार्य करने के बाद शारीरिक यन्त्रों को विश्राम देने के लिए निद्रा की अत्यधिक आवश्यकता है । यथा - ' निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः काइये बलाबलम् । ' ( अ. हृ. सू. अ. ७ ) । तथा - ' सुखायुषी परा कुर्यात् कालरात्रिरिवापरा ' ( अ. हृ. सू. अ. ७ ) । इस तरह निद्रा न सेवन करने से शारीरिक यन्त्रों को विश्राम नहीं मिलता, परिणामस्वरूप अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । इसके बाद तीसरा स्थान ब्रह्मचर्य का आता है । ब्रह्मचर्य से ब्रह्मचिन्ता भी अर्थ लिया जाता है परन्तु यहाँ ब्रह्मचर्य का तात्पर्य शुक्र - रक्षा से हैं । आहार का सार शुक्र होता है । उसकी रक्षा से आहार का फल शरीर में होता है । शुक्र की रक्षा के लिये आठ प्रकार के मैथुन-' स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् । संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृतिरेव च । एतन्मैथुनमष्टा प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ' ( या. व. स्मृति ), इनसे बचे रहना ब्रह्मचर्य कहा जाता है । ब्रह्मचर्य के न पालन करने से अनेक प्रकार के रोग होते हैं, यथा- ' अतिस्त्रीसंप्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान् । १. ‘ संस्कारः स हितमुपसेवमानस्य ' ग. ।