चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 301–310
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 301–310
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२०६ वित्तैषणा ( आत्मरक्षा सम्बन्धनी - संवेग ) ( १ ) भोजन खोजना, भूख ( २ ) भागना, भय ( ३ ) लड़ना, क्रोध ( ४ ) उत्सुकता, आश्चर्य चरकसंहिता मूलप्रवृत्तियाँ ( Instincts ) पुत्रेषणा सन्तान सम्बन्धो संवेग ( १ ) कामुकता ( २ ) बालरक्षा, प्रेम लोकैषणा समाज सम्बन्धी संवेग 1 ( १ ) दूसरों की इच्छा, अकेलापन ( २ ) आत्मप्रकाशन, उत्साह ( ३ ) विनीतभाव, आत्महीनता ( ४ ) हँसना, प्रसन्नता ( ५ ) रचना, तत्सम्बन्धी आनन्द ( ६ ) संग्रह और संग्रह की भावना ( ७ ) घृणा ( ८ ) दया, शरणागत होना । इस प्रकार उपर्युक्त १४ मूलप्रवृत्तियाँ होती हैं जिनके १४ संवेग ( Emotions ) होते है । इन मूलप्रवृत्तियों के अतिरिक्त तीन और जन्मजात प्रवृत्तियाँ मनुष्य में होती हैं । वे हैं - अनु-करण, सहानुभूति और सेवा । उपर्युक्त सूत्र में आचार्य ने उक्त सभी मूलप्रवृत्तियों तथा जन्मजात प्रवृत्तियों को एवं जन्मोत्तर होने वाली प्रवृत्तियों का समीकरण कर उन्हें तीन भागों में विभक्त किया है और कहा है कि इस लोक तथा परलोक में हित की आकांक्षा करने वाले मन - बुद्धि तथा पराक्रम से सम्पन्न पुरुषों की तीन एषणायें होती हैं । आसां तु खल्वेषणानां प्राणैषणां तावत्पूर्वतरमापद्येत । कस्मात्? प्राणपरित्यागे सर्वत्यागः । तस्यानुपालनं -- स्वस्थस्य स्वस्थवृत्तानुवृत्तिः, आतुरस्य विकारप्रशमने-प्रमादः, तदुभयमेतदुक्तं वच्यते च; तद्यथोक्तमनुवर्तमानः प्राणानुपालनाद्दीर्घमायुरवाप्नो तीति प्रथमैषणा व्याख्याता भवति ॥ ४ ॥
( १ ) प्राणैषणा [ Pursuit of Life ] - इन तीन एपणाओं में सर्वप्रथम प्राणैषणा आनी है क्योंकि प्राण का त्याग होने पर सांसारिक वस्तुओं का अभाव ही हो जाता है । उस प्राण की रक्षा के लिए स्वस्थ मनुष्य को स्वस्थवृत्त के पालन और रोगी मनुष्य को रोग की चिकित्सा करने में सावधानी रखनी चाहिए । स्वस्थवृत्त का पालन और रोगों का चिकित्सा कैसे करनी चाहिए यह पीछे के अध्यायों में कहा गया है और आगे भी कहा जायगा । इन बनाये हुए नियमों का ठीक - ठीके पालन करने से प्राणों की रक्षा होती है, प्राणों की रक्षा से दीर्घ आयु प्राप्त होती है । इस प्रकार प्रथम प्राणपणा की व्याख्या की गयी है ॥ ४ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है- जब मनुष्य मर जायगा तो उसका संसार ही समाप्त हो जायगा । अतः सर्वप्रथम जीवन धारण की इच्छा होती है, जीवन धारण करने के लिए स्वस्थवृत्त का पालन और रोग होने पर उत्तम चिकित्सा कराना ही परम कर्तव्य होता है । मेल- संहिता में यह बात इस प्रकार स्पष्ट की गई है, यथा --- ' तत्र प्राणैषणां पूर्व समापद्येत मानवः । धमार्थकामप्राप्तिर्हि सद्भिः प्राणैः प्रपद्यते ॥ धर्मादीनामवाप्तिश्च पुरुषार्थः परः स्मृतः । तस्माच्छरीरं सततं परिरक्षेद्धि शास्त्रतः ॥ ' ( मे. सू. अ. १५ ) ।. अथ द्वितीयं धनैषणामापद्येत; प्राणेभ्यो झनन्तरं धनमेव पर्येष्टव्यं भवति, न ह्यतः १. अस्याग्रे ' किमर्थमिति चेत् उच्यते ' इत्यधिकं पठति योगीन्द्रनाथसेनः ।
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तित्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २०६ पापात् पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादुपकरणानि पर्येष्टुं यतेत । तत्रोप-करणोपायाननुव्याख्यास्यामः तद्यथा - कृषिपाशुपाल्य वाणिज्य राजोपसेवादीनि यानि चान्यान्यपि सतामविगर्हितानि कर्माणि वृत्तिपुष्टिकराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुः तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवति इति द्वितीया धनैषणा व्याख्याता भवति ॥ ५ ॥
( २ ) धनैषणा [ Pursuit of Wealth ] प्राणैषणा के बाद दूसरी धनैषणा का स्थान आता है, क्योंकि जीवन रहने पर धन की आवश्यकता होती है । अतः उसी की प्राप्ति का साधन ढूँढ़ना पड़ता है । संसार में इससे बड़ा कोई भी पाप का फल नहीं है कि आयु बहुत बड़ी हो, पर उपभोग की कोई भी सामग्री न हो । अतः धनप्राप्ति के साधनों को प्राप्त करने में श्रम करना चाहिए | अब यहाँ पर धनप्राप्ति के साधन और उपायों का निर्देश कर रहे हैं । जैसे--( १ ) कृषि ( खेती करना ), ( २ ) पाशुपाल्य ( पशुओं का पालन करना ), ( ३ ) वाणिज्य ( व्यापार ), ( ४ ) राजोपसेवा ( नौकरी ) आदि ऐसे कार्य जिनकी निन्दा अच्छे - अच्छे लोग न करें और जो कार्य वृत्ति, पुष्टि और विपुलधनप्राप्ति के साधन हों उन्हें करना प्रारम्भ करें और ऐसे वृत्तिपुष्टिकर कार्यों को करते हुए प्रतिष्ठापूर्वक दीर्घ जीवन प्राप्त करें, इस प्रकार दूसरी धनैषणा की व्याख्या की गयी है ॥ ५ ॥
विमर्श -- धनप्राप्ति करने के श्रेष्ठ उपाय अन्यत्र ६ बताए गए हैं, यथा - ' स चार्थः पुरुषाणां षभिरुपायैर्भवति - ( १ ) भिक्षया, ( २ ) नृपसेवया, ( ३ ) कृषिकर्मणा, ( ४ ) विद्योपार्जनेन, ( ५ ) व्यवहारेण, ( ६ ) वणिक्कर्मणा वा ॥ ' और इन ६ उपायों में व्यापार को धन प्राप्ति का उत्तम साधन माना गया है, यथा- ' कृता भिक्षाऽनेकै वितरति नृपो नोचितमहो, कृषिः किष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्याऽतिविषमा । कुसीदाद् दारिद्र्यं परकरगतग्रन्थिशमनाद्, न मन्ये वाणिज्यात् किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ' ( पञ्चतन्त्र ) । भेल ने भी दूसरी धनैषणा का वर्णन किया है, यथा - ' धनेषणां द्वितीयां तु समापद्येत मानवः । पापीयो नास्त्यतः किञ्चिद्यथाजीवमृते धनात् ॥ धर्मकामात्रसम्बाध्य तस्माद्वित्तमुपार्जयेत् । ज्वर रोगादिका येन निरस्येदापदो बुधः ॥ ' ( सू. अ. १५ ) । * अथ तृतीयां परलोकेपणामापद्येत । संशयश्चात्र, कथं? भविष्याम इतश्च्युता न वेति कुतः पुनः संशय इति उच्यते - सन्ति के प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्यमाश्रिताः सन्ति चागमप्रत्ययादेव पुनर्भवमिच्छन्ति श्रुतिभेदाच्च-' मातरं पितरं चैके मन्यन्ते जन्मकारणम् ।
स्वभावं परनिर्माणं यदृच्छां चापरे जनाः ॥ ' इति ।
अतः संशयः - किं नु खल्वस्ति पुनर्भवो न वेति ॥ ६ ॥
( ३ ) परलोकैषणा [ Pursuit of 6ther World ] - दीर्घ • आयु और धन प्राप्ति के बाद तीसरी परलोक- एषणा का स्थान आता है । किन्तु परलोक के विषय में सन्देह है कि जब भर कर इस लोक से हम च्युत ( नष्ट ) होंगे तब पुनः जन्म लेंगे अथवा नहीं । यह सन्देह क्यों वाले होता है, है वे, इसका उत्तर आचार्य ने दिया है कि कुछ ऐसे पुरुष है जो नास्तिकवाद को मानने प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं और परोक्ष होने के कारण पुनर्जन्म को नहीं मानते । कुछ अन्य लोग है जो आस्तिक है । वे शास्त्र - प्रमाण से पुनर्जन्म को मानते हैं । श्रुतियाँ भी परस्पर विरुद्ध १. ' उपकरणमारोग्यभोगधर्मसाधनीभूतो धनप्रपञ्चः ' इति चक्रः । २. अनवमनोऽनवज्ञातो बहुमानगृहीत इत्यर्थः । ' दीर्घजीवितमनवमतः पुरुषो जीवति ' यो । ३. ' श्रुतिः प्रतिवादिवचनमेवंग्रन्थनिबद्धम् ' इति चक्रः । १४ च ० सं ०
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२१० चरकसंहिता मिलती हैं, जैसे — कोई माता - पिता को तथा कोई स्वभाव को ही जन्म का कारण मानते हैं । कोई ऐसा मानते हैं कि पर ( दूसरे ) से शरीर का निर्माण होता है । कोई जन्म का कारण यदृच्छा ( यों ही ) को मानते हैं । इसलिए सन्देह होता है कि पुनर्जन्म होता है कि नहीं ॥ ६ ॥
विमर्श - ( १ ) आज का विज्ञानवाद केवल प्रत्यक्ष को ही मानता है और प्राचीन नास्तिक चार्वाक आदि केवल प्रत्यक्ष से उपलब्ध वस्तुओं में ही विश्वास करते हैं । पुनर्जन्म प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता है । इसी प्रकार कर्म का फल और आत्मा ये सभी अप्रत्यक्ष हैं । अन ' पुनर्जन्म के ये साधक भी प्रत्यक्ष नहीं हैं । दूसरे, शास्त्र प्रमाण से पुनर्जन्म, कर्म का फल और आत्मा को मानते हैं परन्तु परस्पर विरुद्ध विचारों को देखकर श्रुति प्रमाण में भी संशय होता है । यहाँ श्रुति शब्द का अर्थ ' श्रूयते इति श्रुतिः ' अर्थात् जो मतभेद सुनाई पड़ता है उसे श्रुति कहते हैं, ऐसा समझना चाहिए । इनमें ( २ ) कुछ लोग केवल माता - पिता को ही जन्म के प्रति कारण मानते हैं । अर्थात् आत्मनिरपेक्ष माता - पिता का शोणित - शुक्र जन्म के प्रति कारण है, न कि पूर्वशरीर को छोड़कर आत्मा नवीन शरीर को धारण करता है क्योंकि आत्मा कोई वस्तु नहीं है — यह मातापितृवादी का पक्ष है । ( ३ ) कुछ लोग जन्म के प्रति स्वभाव को कारण मानते हैं । यथा— ' अङ्गप्रत्यङ्गनिवृत्तिः स्वभावादेव जायते । सन्निवेशः शरीराणां दन्तानां पतनोद्भव ॥ ' ( सु.शा. अ. ३ ) । ' तलेष्वसंभवो यश्च रोम्णामेतत् स्वभावतः ॥ ' ( सु. सू अ. २ ) । तथा - ' धातुषु क्षीयमाणेषु वर्द्धते द्वाविमौ सदा । स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ॥ ' ( सु. शा. अ. ४ ) । ' स्वभावालघो मुद्रास्तथा लावकपिञ्जलाः । स्वभावाद् गुरवो मापा वराहमहिपादयः ॥ ' ( सु. सू. अ. ४६ ) | ये सब स्वभाव से सृष्टि होने के प्रमाण और उदाहरण हैं । योगवासिष्ठ में भी कहा गया है- ' कः कण्टकानां प्रकरोति नैक्ष्ण्यं चित्रं विचित्रं मृगपक्षिणां च माधुर्यमिक्षौ कटुना मरीचे स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तम् ॥ ' अतः उत्पत्ति के प्रति आत्मा, कर्मफल आदि कारण नहीं है, न पुनर्जन्म है, किन्तु स्वभाव ही कारण है । ( ४ ) कुछ लोग पर निर्माण को जन्म का कारण मानते हैं । ' पर ' शब्द से यहाँ ईश्वर लिया जाता है - ' परः उत्कृष्टः विलक्षण सकलकार्यकारी पुरुषः ईश्वराख्यः ' अर्थात् आत्मा कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं है जिसका पुनर्जन्म हो, केवल ईश्वर जगत् का उत्पादक है । निम्न-लिखित वचनों से ईश्वर ही जन्म के प्रति कारण सिद्ध होता है, यथा - ' ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ' ( ईशा ० उ ० ) । ' ईशमेवाहमत्यर्थं न च मामीशते परः ॥ ददामि च सदैश्वर्य्यमीश्वरस्तन कीर्तितः ॥ ' ' देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् । न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव न तस्य लिङ्गम् । न कारणं करणाधिपो न तस्य न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ १ ( ५ ) पाँचवाँ मन यदृच्छ्रावादियों का है । इनका यह सिद्धान्त है कि जगत् की उत्पत्ति बिना कारण यों ही हो जाया करती है, इसमें कोई भी कारण नहीं है । जैसे मेघ विना आत्मा के जल की वर्षा करता है तथा भूमि आरमारहित अचेतन हैं, फिर भी भूमिकम्प होता है । इन घटनाओं को उत्पन्न करने वाली जो शक्ति है उसे ' यदृच्छा ' कहते हैं । यही जगत् की उत्पत्ति का कारण है, यथा- ' यदृच्छा कालभार्या ययाऽकस्मादनो वर्षति, भूमिः कम्पते लाभालाभौ भवतः ' ( नारायण ) । इस यदृच्छावाद का वर्णन भगवद्गीता में भी आया है, यथा - ' दृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निवध्यते ॥ ' ( गी. अ. ४ ) । ' यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थं लभन्ते युद्धमीदृशन् । ' ( गी. अ. २ ) । इस प्रकार उत्पत्ति के प्रति पाँच पक्षों का वर्णन मिलता है । अतः पुनर्जन्म में संदेह होता है, यह पूर्वपक्ष उपस्थित हो गया । सुश्रुत में तो उत्पत्ति के प्रति छ कारण बनाये गए हैं, यथा- स्वभाव- ' मीश्वरं कालं यदृच्छां नियतिं तथा । परिमाणं च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शिनः ॥ ' ( शा. अ. १ ' '
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i तित्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २११ अन्त में सुविधा के लिये पुनर्भव ( पुनर्जन्म ) सम्बन्धी विभिन्न पाँच विपक्षों का संग्रह निम्नांकित रूप में किया जा रहा है । अपुनर्भववादी ( Rejectors of Re birth of Spirit Theory ) ( १ ) प्रत्यक्षवादी ( पुनर्भव का परोक्ष होने से ) ( Followers of Direct Observation Theory ) ( २ ) माता- पितृचादी ( Followers of Mother & Father Theory ) ( ३ ) स्वभाववादी ( Followers of Nature Theory ) श्रुतिवादी ( परस्पर विरोध होने से ) ( Followers of Tradition Theory ) ( ४ ) परनिर्माणवादी ( ५ ) यदृच्छावादी ( Followers of Di. vine. Handi Work Theory ) Accident Theory ) Followers of तत्र बुद्धिमान्नास्तिक्यबुद्धिं जह्याद्विचिकित्सां च । कस्मात्? प्रत्यक्षं ह्यल्पम्; अनल्प-मप्रत्यक्षमस्ति, यदागमानुमानयुक्तिभिरुपलभ्यते; यैरेव तावदिन्द्रियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, तान्येव सन्ति चाप्रत्यक्षाणि ॥ ७ ॥
( १ ) पुनर्भव को अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) के कारण न मानने वाले पक्ष की शंका का समाधान -परलोक एवं पुनर्जन्म का विचार करना हो तो सर्वप्रथम बुद्धिमान् पुरुष के लिए यह उचित है कि वह नास्ति बुद्धि और विचिकित्सा ( संशय बुद्धि ) को त्याग दें । क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान करने योग्य वस्तुएँ कम है, और अप्रत्यक्ष वस्तुएँ बहुत हैं, जिनकी प्राप्ति आगम ( शास्त्र - प्रमाण ', अनुमान और युक्ति प्रमाण से होती है । दूसरी बात यह है कि यदि केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाग माना जाय तो यह दूसरा दोष आ जायगा कि जिन इन्द्रियों से प्रत्यक्ष का ग्रहण होता है वे इन्द्रियाँ ही स्वयं अप्रत्यक्ष हैं ॥ ७ ॥
विमर्श - प्रत्यक्षवादी नास्तिक मत का खण्डन आचार्य ने इस गद्यखण्ड से किया है । इसमें उन्होंने आदेश दिया है कि पुनर्जन्म या परलोक आदि के विषय में विचार करने के पूर्व नास्तिक्य - बुद्धि और संशय बुद्धि को छोड़ देना चाहिए क्योंकि जडतापूर्वक किसी पक्ष को लेकर विचार किया जाय तो सिद्धान्त का निर्णय नहीं होना है | अतः पहले अपनी बुद्धि की शुद्धि कर लेनी चाहिए । उपर्युक्त दोनें बानों को छोड़ देने से बुद्धि की शुद्धि हो जाती है । बुद्धि शुद्ध होने के बाद आचार्य ने बताया है कि जगत् में प्रत्यक्ष बहुत कम वस्तुओं का होता है किन्तु अनुमान आदि से ज्ञातव्य वस्तुएँ बहुत हैं । केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मान्ने में यह दोष बताया है कि इन्द्रियाँ स्वयं प्रत्यक्षम्य नहीं है तो क्या इन्द्रियों को न माना जाय? यदि इन्द्रियों को न मानें तो वस्तुओं का ज्ञान ही सम्भव नहीं है, यदि इन्द्रियाधिष्ठान को इन्द्रिय मान लिया जाय तो वहरे, अन्धे होने पर इन्द्रियाधिष्ठान के होते हुए ज्ञान होना चाहिए पर होता नहीं है । इसीलिये इन्द्रियों का ज्ञान अनुमान प्रमाण से किया गया है, यथा- ' चक्षुर्बुदयादिकाःकरण-कार्याः क्रिया वा सिडिक्रियावत् । सतां च रूपाणामतिसन्निकर्षादतिविप्रकर्षादावरणात् करणदौर्बल्यान्मनोऽनवस्थानात् समानाभिहारादभिभवादतिसौक्ष्म्याञ्च प्रत्यक्षानुपलब्धिः तस्मादपरीक्षितमेतदुच्यते-प्रत्यक्षमेवास्ति नान्यदस्तीति ॥ ८ ॥
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२१२ चरकसंहिता प्रत्यक्ष ज्ञान में बाधक हेतु [ Exceptions of Direct Observation ] - चक्षुरिन्द्रिय से ग्राह्य रूप वाली वस्तुओं के रहने पर भी ( १ ) अत्यन्त समीप होने के कारण, ( २ ) अत्यन्त दूर होने के कारण, ( ३ ) आवरण से ढक जाने के कारण, ( ४ ) इन्द्रियों की दुर्बलता के कारण, ( ५ ) मन के चञ्चल होने के कारण, ( ६ ) समानाभिहार - एक समान कई वस्तुओं के होने के कारण, ( ७ ) किसी अन्य वस्तु से दब जाने के कारण और ( ८ ) अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण उस वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता है । अतः जो केवल प्रत्यक्ष को ही मानते हैं वह बिना बिचारे, बिना परीक्षा किये ही कहते हैं कि केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही है, अन्य प्रमाण नहीं है ॥ ८ ॥
विमर्श - प्रत्येक का उदाहरण क्रम से इस प्रकार समझना चाहिए - ( १ ) अति समीप, जैसे किसी पुस्तक को नेत्र के अति समीप लाया जाय तो अक्षर दिखाई नहीं पड़ते है । ( २ ) अति दूर, जैसे आकाश में अधिक दूर उड़ती हुई चिड़िया, अधिक दूर रखी पुस्तक के अक्षरों का ज्ञान नहीं होता है । ( ३ ) आवरण, जैसे किसी पर्दा या दीवाल का व्यवधान रहने से वस्तु के रहते हुए भी उसका ज्ञान नहीं होता है । ( ४ ) करण- दौर्बल्य, जैसे नेत्र में मोतियाविन्द हो जाय या रतौंधी आदि हो जाय तो दिखाई नहीं पड़ता है । ( ५ ) मन की चञ्चलता, जैसे कक्षा में अध्ययन करते हुए छात्र का मन किसी अन्य स्थान में लगा हो तो अध्यापक के पढ़ाए हुए पाठ का ज्ञान नहीं होता है । ( ६ ) समानाभिहार, जैसे गेहूं के दानों में मिलाये हुए अन्य गेहूं के दानों का पृथक्-करण नहीं किया जा सकता । ( ७ ) अभिभव, जैसे दिन में सूर्य के तेज से तारों का ज्ञान नहीं होता है । ( ८ ) अनि सूक्ष्म, जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं का नेत्र से ज्ञान नहीं होता है । कुछ वस्तुओं का अति विशाल होने से भी प्रत्यक्ष नहीं होता है, जैसे आकाश कितने परिमाण का है यह ज्ञान नहीं होता है । यहाँ वताए हुए प्रत्यक्षाभाव के कारणों को ही ईश्वरकृष्ण ने भी माना है । यथा-' अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियवानान्मनोऽनवस्थानात् । सौक्ष्म्याद्वा व्यवधानादभिभवात् समानाभिहा-गच्चति ॥ ' ( सांख्यकारिका ) | श्रुतयश्चैता न कारणं, युक्तिविरोधात् । आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् । द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ सर्वश्चेत् संचरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् । निरन्तरं, नावयवः कश्चित् सूक्ष्मस्य चात्मनः ॥ ( २ ) माता - पिता को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान - ये श्रुतियां भी परलोक या पुनर्भव को न मानने में कारण नहीं हैं क्योंकि युक्तिविरोध होता है । जैसे माना या पिता की आत्मा सन्तान में आती है ऐसा मान लिया जाय तो इसमें यह प्रश्न उठता है कि आत्मा का सन्तान में गमन दो प्रकार से हो सकता है - ( १ ) एक पक्ष में पूर्ण आत्मा सन्तान में गमन कर सकती है और ( २ ) दूसरे पक्ष में आत्मा का अवयव ( हिस्मा ) सन्तान में जा सकता है! पहले पक्ष में आत्मा यदि पूर्ण रूप से सन्तान में प्रवेश करती है तब यह दोष आ जायगा कि माता या पिता की मृत्यु हो जानी चाहिए । पर ऐसा दिखाई नहीं पड़ता है । यदि यह कहा जाय कि आत्मा का अवयव ( हिस्सा ) सन्तान में जाता है तो यह भी कहना उचित नहीं है क्योंकि आत्मा अवयव - रहित ( सूक्ष्म ) है । ९ -१० ॥ बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवात्मा तथैव ते । येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा ॥११ ॥
और भी - • बुद्धि और मन के विषय में यह निश्चय हो चुका है कि जैसे आत्मा सूक्ष्म हँ १. ‘ येषामेषा - माना- पितरौ जन्मकारणमित्येवंरूपा मनिस्तेषां प्राणिजन्मनि चतुविधा योनि-र्नास्ति । जराय्त्रण्डस्वेदोद्भिद्भेदाच्चतुविधा योनिरुक्ता प्राणिनामुत्पत्तौ । जरायुजानां देवनरादीनामण्ड-जानां पक्ष्यादीनां च स्तो मातापितरौ न तु स्वेदजोद्भिज्जानामित्येवं युक्तिविरोधात् ' इति गङ्गाधरः ।
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तिस्त्रैपणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २१३ और एक है वैसे ही बुद्धि और मन है । माता - पिता को सृष्टि - उत्पत्ति में जो लोग कारण मानते हैं, उनके मत में चार प्रकार की योनि सम्भव नहीं होगी, यह दूसरा द्रोप आयेगा | अतः माता - पिता कारण नहीं हो सकते हैं ॥। ११ ॥ विमर्श - माता - पिता की आत्मा का गमन सन्तान में नहीं होता है, यह मान लेने पर पुनः माता - पिता सन्तानोत्पत्ति में - कारण यह मत मानने वाला अपने पक्ष की स्थापना करता है कि आत्मा कारण न हो, पर माता - पिता की बुद्धि या मन सन्तान में जाकर चेतनता उत्पन्न करते हैं, अतः माता - पिता सुन्नानोत्पत्ति में कारण हैं । इस मत का खण्डन इस श्लोक से किया गया है । बुद्धि और मन क्या वस्तु है और बुद्धि और मन सन्तान में जाते हैं ऐसा निर्णय करने पर जो आत्मा के सन्तान में गमन करने पर दोष बताया गया है वही दोष बुद्धि और मन के सन्तान में गमन करने पर होता है । अर्थात् यदि बुद्धि या मन सन्तान में सम्पूर्ण रूप से गमन करें तो माता या पिता में तत्काल बुद्धि या मन का अभाव हो जाना चाहिए । पर ऐसा होता नहीं है । यदि यह कहा जाय कि बुद्धि और मन का अवयव सन्तान में जाता है तो सूक्ष्म बुद्धि और मन का अवयव होता ही नहीं है । दूसरी आपत्ति इस मत में यह है कि - सृष्टि- उत्पत्ति में माता - पिता को कारण माना जाय तो जो चार योनियाँ ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ) मानी गई है वे नहीं हो पायेंगी । क्योंकि स्वेदज तथा उद्भिज्ज प्राणियों की उत्पत्ति माता और पिता से नहीं होती । अनः यह मानना पड़ेगा कि कर्म के वशीभूत आत्मा की प्रेरणा से माता - पिता के शरीर से शुक्र-शोगित निकल कर गर्भाशय में जाकर सन्तान के शरीर का आरम्भ करते हैं । अर्थात् शरीर की उत्पत्ति कर्मानुसार होती है और कर्म जन्मान्तरीय रहता है अतः परलोक तथा पुनर्जन्म की सिद्धि हो जाती है ।
विद्यात् स्वाभाविकं षण्णां धातूनां यत् स्वलक्षणम् ।
संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ १२ ॥
( ३ ) स्वभाव को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान - पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश एवं आत्मा इन ६ धातुओं के जो अपने लक्षण होते हैं उन्हें स्वाभाविक जानना चाहिए । इन ६ धातुओं के संयोग और वियोग में कर्म ही कारण होता है ॥ १२ ॥
विमर्श - पुनर्जन्म के प्रति स्वभाव कारण है इस मत का उत्थापन कर इसका खण्डन इस
श्लोक से किया गया है । पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों के अपने - अपने लक्षण इस प्रकार हैं - ' खरद्रव-चलोष्णत्वं नूजलानिलतेजसाम् । आकाशस्याप्रतीघातं दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ ' ( च. शा. अ. १ ) ।
आत्मा का चैतन्य होना अपना लक्षण है, यथा- ' निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियम् । चैतन्ये कारणम् ॥ ' ( च.सू.अ. १ ) । इन ६ धातुओं के अपने - अपने लक्षण स्वभाव से होते हैं । पर पञ्चमहाभूत अचेतन हैं, इनमें चेतनताका प्रादुर्भाव आत्मा के संयोग से और अचेतनता का आत्मा के वियोग से होता है | संयोग और दियोग का कोई कारण अवश्य होना चाहिए, वह कारण क्या है, इसका उत्तर यही है कि जन्मान्तरीय कने संयोग - वियोग में कारण होता है, यथा- ' भूतैश्चतुभिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनी-जव देहमुपैति देहात् । कर्मात्मकत्वान्नतु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥ ' ( च.शा. अ. २ ) यदि कर्म को कारण मान लिया जाता है तो पुनर्जन्म की सिद्धि स्पष्ट हो जाती है । यदि पञ्चमहा-भूत और आत्मा के संयोग और वियोग में स्वभाव को कारण मान लिया जाय तो ' स्वभावो दुरति-क्रमः ' के अनुसार संयोग का अभाव कभी नहीं होगा अतः कभी वियोग भी नहीं होगा । आरम्भक कर्म के क्षय होने पर ही शरीरपात -- अर्थात् वियोग ( विभाग ) होता है । कर्म, संयोग और १. ' विभागे ' ग. ।
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२१४ चरकसंहिता वियोग में कारण होता है यह बात कर्म के लक्षण से स्पष्ट है, यथा - ' संयोगे च विभागे च कार्यं द्रव्यमाश्रितम् । ' ( सू. अ. १ ) । इस वर्णन से स्वभाववादी का जो यह मत है कि दो या अधिक पदार्थों के मिलने से चेतनता स्वभाव से आ जाती है, आत्मा कोई वस्तु नहीं, उसका खण्डन हो जाता है क्योंकि स्वभावतः संयोग - विभाग में अनिश्चितता है और जन्मान्तरीय कर्म को मानने में अनिश्चितता नहीं है । अनादेश्चेतनाधातोर्नेष्यते परनिर्मितिः । पर आत्मा स चेद्धेतुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः ॥ १३ ॥
( ४ ) पर निर्माण को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शङ्का का समाधान - जो अनादि चेतना धातु ( आत्मा ) है उसका पर निर्माण अर्थात् पर ( दूसरे ) के द्वारा निर्माण नहीं हो सकना । यदि पर शब्द से ईश्वर माना जाय तो पर- निर्माण मानना अभीष्ट ही है ॥ १३ ॥
विमर्श - पर निर्माण पक्ष पर विचार करते हुए कहा गया है कि आत्मा अनादि है । यदि आत्मा से अतिरिक्त अन्य किसी से सृष्टि का निर्माण माना जाय तो वह आत्मा से पूर्व सिद्ध हो जाता है, और आत्मा की स्थिति उसके बाद की हो जायगी और तब आत्मा सादि हो जायगा । आत्मा का अनादित्व नष्ट न हो अतः इसकी उत्पत्ति नहीं मानी जाती है । जब इसकी उत्पत्ति हो न होगी तो पर - निर्माण कैसे माना जायगा? अतः पर - निर्माण पक्ष उचित नहीं है । यदि ' पर ' शब्द से उत्कृष्ट आत्मा ( परमात्मा ) का ग्रहण किया तो वह परमात्मा जीवात्मा की चेतना का कारण होता है, यह पक्ष सर्वमान्य है, क्योंकि अनादि चेतना धातु का निर्माण कर्म के आधार पर परमात्मा ( ईश्वर ) ही करता है । कर्म जन्मान्तरीय ही लिया जाता है । महाभारत में कर्ण ने कहा है- ' सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम् । कर्मायत्तं कुले जन्म ममायत्तं तु पौरुषम् ॥ ' इससे भी परलोक और पुनर्जन्म की सिद्धि होती है । न परीक्षा न परीच्यं न कर्ता कारणं न च । न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥१४ ॥
नास्ति कस्यास्ति नैवात्मा यदृच्छोपहतात्मनः । पातकेभ्यः परं चैतत् पातकं नास्तिकग्रहः ॥ ( ५ ) यदृच्छा को जन्म में कारण मानने वाले पक्ष की शका का समाधान — यदृच्छाबाद से उपहत ( नष्ट ) आमा वाले नास्तिक के मत में परीक्षा, परीक्षा का विषय, कर्ता, कारण, देवता, ऋषि, सिद्ध, कर्म, कर्म का फल, आत्मा आदि कुछ भी नहीं है । इस प्रकार नानिको का यह ग्रह ( आग्रह नज ६ ) सभी पापों से बढ़ कर महापाप है ॥ १४-६५ ॥ विमर्श - तान्पर्य यह है कि उस व्यक्ति से विवाद किया जाना है और इसी की बात मान्य भी होती है जो किसी एक बात पर दृढ़ रहे तथा कतो, कारण, कार्य आदि में किसी को भी स्वीकार करे जैसे यदि किसी मनुष्य को भूख लगी है और उसने भोजन कर किया से उनकी भूव की शान्ति हो जाती है ऐसी दशा में यदि कोई पूछे कि आपकी भूख को शान्ति वह उत्तरा-भोजन करने में । पर यदृच्छावादी उत्तर देगा कि ही शान्ति हो गई । इसी तरह घव को कुम्मकार मिट्टी से बनाता है, यह प्रत्यक्षसिद्ध है । पर हवा का मत है कि घट यो ही बन जाता है । इस प्रकार प्रत्यक्ष विरुद्धका अमान्य है । इसे आचार्य ने नास्तिक कहा है । ' नास्ति लोको सिद्धान्त अमी नास्तिक ' अर्थात आत्मा, कर्म, कर्मफल आदि न मानने वाला नास्तिक कहा जाता है । * तस्मान्मतिं विमुच्यैतानमार्गप्रसृतां बुधः । सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत् सर्वं यथातथम् ॥१६ ॥
बुद्धि प्रदीप से परीक्षा - • इसलिए अमार्ग ( अनुचित, अधम ) मे उनमति ( बुद्धि ) का त्याग कर विद्वानों को चाहिए कि सज्जन पुरुषों के बुद्धि - स्वरूप दीपक से उचित मार्ग को ठीक - ठीक रूप में देखें या प्राप्त करें ॥ १६ ॥
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तिस्रुपणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २१५ विमर्श - अपनी बुद्धि को पापमय कार्यों से हटाकर सज्जन पुरुषों द्वारा सेवित या प्रतिपादित सिद्धान्त पर चलें, जैसा कि महाभारत में स्पष्ट किया गया है, यथा- ' वेदाः प्रमाणं स्मृतयः प्रमाणं, नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ यही सज्जनों का मार्ग है और इस पर वही चल सकता है जिसकी बुद्धि शुद्ध होती है अतः बुद्धि का शोधन करने के बाद इस मार्ग पर चलने का आदेश दिया गया हैं । * द्विविधमेव खलु सर्वं सच्चासच्च तस्य चतुर्विधा परीक्षा -- आप्तोपदेशः, प्रत्यक्षम्, अनुमानं युक्तिश्चेति ॥ १७ ॥
( २ ) चतुर्विध परीक्षा ( चार प्रकार के प्रमाण ) ( Four Fold Methods of Investigation ) चार प्रकार के प्रमाण - इस पाञ्चभौतिक जगत् में सभी वस्तुएँ दो विभागों में विभक्त हैं -( १ ) सत् और ( २ ) असत् । इन दोनों की परीक्षा चार प्रकार से होती है - ( १ ) आप्तोपदेश ( Authoritative Testimony ), ( २ ) प्रत्यक्ष ( Direct Observation ), ( ३ ) अनुमान ( Inference ) और ( ४ ) युक्ति ( Reason or Experiment ) || १७ ॥ विमर्श - नास्तिक्य - बुद्धि का त्याग कर सज्जनों के बुद्धिरूपी दीपक से देखने का आदेश पहले के सूत्र में दिया गया है । वह बुद्धिरूपी दीपक कौन वस्तु है जिसके द्वारा सज्जनौं ने यथार्थ वस्तु का ज्ञान किया था? उत्तर - यह सम्पूर्ण जगत् दो विभागों में विभक्त है- ( १ ) सत्-जिसकी सत्ता जगत में दिखाई पड़ती है और जिसका अनुभव भी होता है । इसे ' भाव ' पदार्थ भी कहते है । ( २ ) असत् - जिसकी न तो सत्ता जगत् में दिखाई पड़ती और न उसकी सत्ता का अनुभव ही होता है । इसे ' अभाव ' पदार्थ भी कहते है । पदार्थ -- ( द्रव्य - गुण - कर्म - सामान्य विशेष-समवाय ) भावात्मक ' सन् ' है और चार प्रकार के अभाव पदार्थ ( प्रागभाव - प्रध्वंसाभाव - अन्योन्या-भाव और अत्यन्ताभाव ) ' असत् कहे जाते है । इन सन् और असत् पदार्थों की परीक्षा भी चार प्रकार से करनी चाहिए । परीक्षा का अर्थ है ' परीक्ष्यन्ते व्यवस्थाप्यन्ते वस्तुस्वरूपाणि अनया इति परीक्षा ' अर्थात् वस्तुओं का यथार्थ में ज्ञान जिसके द्वारा होता है उसे ' परीक्षा ' कहते हैं । इस परीक्षा का ही नाम अन्य दार्शनिकों ने ' प्रमाण ' रखा है । प्रमाण, प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) का साधन है । उदयनाचार्य ने बनाया है- ' यथार्थानुभवः प्रमा तत्साधनं च प्रमाणम् । ' अर्थात् यथार्थ अनुभव का नाम प्रमा ' और उसके सामन का नाम ' प्रमाण ' है । कोपकारों और भाष्यकारों ने प्रमाण और परीक्षा को एकार्थबाची माना है, यथा- ' प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् । उपलब्धि-साधनं ज्ञानं परीक्षा, प्रमानित्यनर्थान्तरं समाख्यानि वचनसामर्थ्यात् । परीक्ष्यने यया बुद्धया सा परीक्षा, प्रमायनेऽनेनेति करणाभिवानः प्रमानन्दः ॥ ( नङ्गाधरः ) | यथार्थ ज्ञान ( ममा ) के निश्चितीकरण के लिये तीन पदार्थों की आवश्यकता होती है - ( १ ) प्रनेव, यथार्थ अनुभव का विषय ( Object of valid experience ), या योऽर्थः प्रमीयते तत्प्रमेयन् ' ( वात्स्यायनः ), ( २ ) प्रमाता, जो प्रमार्ग के द्वारा वस्तु के ज्ञान में प्रवृत्त व्यक्ति है, उसे कहते हैं । यथा - ‘ तत्र यस्यैष्मा जिज्ञासा प्रयुक्तस्य प्रवृत्तिः स प्रमाता ' । ( वात्स्यायनः ), ( ३ ) प्रमाग, प्रमेव वस्तु के ज्ञान का साधन यथा - नार्थं प्रमिणोति तत्प्रमाणम् ' | ( वास्यायनः ) | जिस साधन के अभाव में प्रमाना एवं प्रमेय वस्तु के रहने पर भी प्रमा का ज्ञान नहीं हो पाता उसका नाम ' प्रमाण ' है । इसीलिये प्रमाण को प्रमा का साधकतम कारण कहा जाता है । ऐसे साधकतम कारण को करण
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२१६ चरकसंहिता कहा जाता है, यथा- ' साधकतमं कारणं करणमिति ' तथा ' तदेतत्त्रिविधकारणमध्ये यदसाधारणं कारणं तदेव करणम् ' । ( तर्कसंग्रहः ) । यहाँ केवल चार प्रमाण माने गये हैं - १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३. आप्तोपदेश और ४. युक्ति । पर आगे विमान स्थान में - १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान और ३. आप्तोपदेश यह तीन ही प्रनाग नाने गए हैं । चौथे युक्ति प्रमाण को अनुमान प्रमाण का अनुग्राहक होने से अलग स्वीकार नहीं किया गया है । परन्तु आयुर्वेद में युक्ति के द्वारा आयु सम्बन्धी - ज्ञान अत्यधिक रूप में किया जाता है । स्वस्थ तथा रोग - प्रतिकार विधान में युक्ति की अधिक उपयोगिता है, अतः यहाँ इसका वर्णन किया गया है पर आगे आचार्य ने- ' अनुमानं खलु तर्को युक्त्यपेक्षः । ' यह अनुमान का लक्षण बताकर युक्तिको अनुमान में ही समाविष्ट कर लिया हैं । विमानस्थान के आठवें अध्याय में उपमान को भी अलग पाचवाँ प्रमाण माना गया है, यथा - ' यदन्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रकाशनं तद् औपम्यम्, यथा दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुः स्तम्भस्य ॥ ' पर इस उपमान प्रमाण का भी में अन्तर्भाव करके तीन ही प्रमाण माने गए हैं । यद्यपि अन्य विभिन्न दार्शनिकों ने अनुमान अनेक प्रमाण माने हैं, जैसे - आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव, अभाव, चेष्टा, परिशेष आदि १० प्रमाण माने हैं जैसा कि सर्वदर्शनसंग्रह में बताया गया है — ' प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः कणाद सुगतौ पुनः । अनुमानञ्च तच्चापि सांख्याः शब्दं च तेऽपि च ॥ न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानञ्च केचन । अर्थापत्त्या संहनानि चत्वार्याहुः प्रभाकराः ॥ अभावषष्ठान्येतानि भाट्टा वेदान्तिनस्तथा । संभवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः || ' तथा ' माध्वास्तु प्रत्यक्षं शब्दश्चेति प्रमाणद्वयम् । रामानुजास्तु प्रत्यक्षानुमानशब्दाश्चेति प्रमाणत्रयमिच्छ-न्ति । चेष्टापि प्रमाणान्तरमिति तान्त्रिकाः ' इत्यादि । पर इन सभी का केवल तीन प्रमाणों में ही समावेश हो जाता है, जैसे उपमान, अर्थापत्ति, सम्भव और परिशेष का अनुमान में, अनुपलब्धि, अभाव और चेष्टा का प्रत्यक्ष में तथा ऐतिह्य का आप्तोपदेश में, इसलिए आयुर्वेद के सिद्धान्त में मुख्य रूप से तीन ही प्रमाण माने गये हैं, यथा -- ' त्रिविधं खलु रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोदेशः प्रत्यक्षमनुमानं च ' । ( वि. अ. ५ ) । स्मरण की सुविधा के लिये ये चतुर्विध प्रमाण निम्नलिखित रूप में दिये जा रहे हैं । प्रमाण ( Methods of Investigation ) आप्तोपदेश प्रत्यक्ष ( Authoritative ( Direct Testemony ) Observation ) आप्तास्तावत्-अनुनान ( Inference ) युक्ति ( Reason or Experiment ) * रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपोज्ञानबलेन ये । येषां त्रिकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ॥ १८ ॥
आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् । सत्यं वच्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ ( १ ) आप्त तथा आप्तोपदेश का लक्षण [ Sigas of Authorities ] - सर्वप्रथम आप्त का लक्षण बताया जा रहा है । अपनी तपस्या एवं ज्ञान के बल से जो रज और नम से मुक्त हो गये हैं, जिनको सदा भूत - भविष्य वर्त्तमान इन तीनों कालों का ज्ञान निर्बाध रूप से होता रहता १. ' कस्मान्नीरजस्तमसो मृषा ' न. ।
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तिम्रैपणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २१७ है और जिनकी ज्ञानशक्ति कभी भी नहीं रुकती ऐसे व्यक्तियों को आप्त, शिष्ट और विबुद्ध कहा जाता है । ऐसे आप्त व्यक्तियों के वचन या उपदेश संदेहरहित ( सत्य ) होते हैं । वे आप्त पुरुष रज और नम से शून्य होने के कारण सदा सत्य ही बोलते हैं । रज और तम से शून्य होने के कारण वे असत्य बोलेंगे ही क्यों ॥। १८-१९ ॥ विमर्श - इस प्रकार आप्त का लक्षण और उनके उपदेशों को सत्य बता कर आप्तोपदेश प्रमाण का स्पष्टीकरण किया गया है, साथ ही आप्त के दूसरे नाम रिष्ट तथा विबुद्ध भी बताये गए हैं । आप्तोपदेश से सभी धर्मशास्त्र, स्मृति, पुराण और वेदवाक्यों का ग्रहण होता है । इनके लेखक कभी भी झूठ नहीं बोलते थे क्योंकि न किसी से उन्हें प्रेम था न किसी से द्वेष । जब आप्त पुरुषों का सत्य बोलना सिद्ध हो जाता है, तब सत्यवचन प्रमाण माना ही जाता है । ' आप्त ' शब्द की निरुक्ति ' वात्स्यायन ' ने निम्नलिखित रूप से की है - ( १ ) ' आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टमर्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा ' तथा ' साक्षात्करणमर्थस्याप्तिः, तया प्रवर्त्तते इत्याप्तः । ' अर्थात् विषयों के साक्षात्कार का नाम आप्ति है और उस आप्ति के द्वारा जो कर्म करने में प्रवृत्त होता है उसे ' आप्त ' कहते हैं । ( २ ) शिष्टाः - ' स्वशक्तिबलेन कार्याकार्ये हिताहिते नित्यानित्ये प्रवृत्तिनिवृत्त्युपदेशस्य चिकीर्षया प्रयुक्तो यथार्थशासनमर्थस्य शिष्टिः, तया प्रवर्तन्ते ये ते शिष्टाः । ' अर्थात् अपनी तपस्या, ज्ञान और शक्ति के बल से कार्य - अकार्य, हित - अहित, नित्य-अनित्य इनमें क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति के उपदेश द्वारा जो अर्थों ( विषयों ) के शासन करने में प्रवृत्त होते हैं, उन्हें शिष्ट कहते हैं । ( ३ ) विबुद्धा: - ' विशिष्टा यथार्थभूता बुद्धिस्तया प्रवर्तन्ते ये विबुद्धाः ' अर्थात् बुद्धि द्वारा ग्राह्यविषयों का विशेष ज्ञान कर जो कर्म में प्रवृत्त होता है । उसे ' विवद्ध ' कहते हैं । आप्तोपदेश - प्रमाण को न्यायवार्तिककार ने शब्द प्रमाण माना है, यथा- ' आप्तोपदेशः शब्दः ' तथा ‘ आप्तवाक्यं शब्दः । ( तर्कसंग्रह ) । इसी को ऐतिह्य तथा आगम प्रमाण भी कहा जाता है । यह शब्द लौकिक, अलौकिक और साधारण भेद से तीन प्रकार का होता है और ये तीनों प्रमाण नाने जाते हैं । दूसरे मत से दृष्टार्थ, अदृष्टार्थ, सत्य और अनृत ये शब्द के चार भेद होते हैं । इनमें दृष्टार्थ और अदृष्टार्थं सत्य शब्द प्रमाण और दृष्टार्थ एवं अदृष्टार्थ अनृत शब्द अप्रमाण माने जाते हैं । ‘ * आत्मेन्द्रियमनोऽर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । व्यक्ता तदावे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ ( २ ) प्रत्यक्ष की परिभाषा [ Definition of Direct Observation ] — आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) के सन्निकर्ष ( संयोग ) होने पर उस समय में जो बुद्धि ( ज्ञान ) व्यक्त ( स्पष्ट ) होती है उसे प्रत्यक्ष कहा जाता है ॥ २० ॥
विमर्श - इन्द्रिय और विषय के सन्निकर्ष से प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, किन्तु जब तक इन्द्रियाँ मन से अधिष्ठित नहीं होतीं तब तक अपने विषय को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होतीं । कहा भी है – ' मनःपुरस्सराणीन्द्रियाण्यर्थग्रहणे समर्थानि भवन्ति । ' आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषयों का सन्निकर्ष प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण है । इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा को ही सभी वस्तुओं का ज्ञान होता है, यथा— ' ज्ञानाधिकरणमात्मा ' | जब आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञान करने में प्रवृत्त होती है तो सर्वप्रथम मन से सम्बन्ध स्थापित करती है, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ विषयों से सम्बन्ध करती हैं । इन सहायक कारणों की सहायता से आत्मा को प्रत्यक्ष का ज्ञान होता है । आत्म-न्द्रियमनोऽर्थ के संयोग से ही शुक्ति में चाँदी का तथा रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है, अनः भ्रमात्मक ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान न समझा जाय, इसलिये लक्षण में ' व्यक्ता ' यह विशेषण