चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 331–340

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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२३८ चरकसंहिता श्रीयशोज्ञानसिद्धानां व्यपदेशादतद्विधाः । वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः ॥५२ ॥

( ख ) सिद्धसाधित वैद्य के लक्षण - जो मनुष्य किसी श्रीमान, यशस्वी, ज्ञानी और सिद्ध पुरुषों के बहाने से स्वयं श्रीमान, यशस्वी, ज्ञानी, सिद्ध न होते हुए भी अपने को वैद्य घोषित करता है उसे सिद्धसावित वैद्य कहते हैं ॥ ५२ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि किसी श्रीमान द्वारा या यशस्वी वैद्यों द्वारा यह औषधालय चलाया गया है । मुझे उत्तम वैद्य समझ कर उसने रखा है । इस प्रकार का प्रचार कर अपने को वैद्य घोषित करने वाले तथा किसी ज्ञानी या सिद्ध पुरुष का मुझे आशीर्वाद प्राप्त है कि मैं जिस किसी को भी जो कोई औषध उठाकर दे दूँ तो वह सफल हो जाय, इस प्रकार दलालों द्वारा अपने को वैद्य घोषित करने वाले को सिद्वसावित वैद्य कहते हैं । अथवा वस्तुतः ऐसे भी मनुष्य होते हैं जिन्हें सिद्ध पुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, पर स्वयं सिद्ध नहीं होते, पर सिद्धों के आशीर्वाद के आधार पर चिकित्सा करते है और सफल भी होते हैं । उन्हें सिद्धसाधित वैद्य कहा जाता है । प्रयोगज्ञानविज्ञानसिद्धिसिद्धाः सुखप्रदाः । जीविताभिसरास्ते स्युर्वेद्यत्वं तेष्ववस्थितम् ॥५३ ॥

( ग ) वैद्य गुणयुक्त वैद्य के लक्षण – जो वैद्य ज्ञान, विज्ञान, देश, काल, मात्रा, दोष, दृष्य के आधार पर औषधियों का प्रयोग करना जानता हो और सिद्धि के आधार पर सिद्ध चिकित्सक हो, सुख को देने वाला हो, उसको ' जीविताभिसर ' कहते हैं । वस्तुतः इन्हीं व्यक्तियों में वैद्य शब्द की प्रतिष्ठा निहित है ॥ ५३ ॥

विमर्श - ' विद्यामधीते वेद वा इति वैद्यः ' जो विद्याओं का अध्ययन करता है या विद्याओं को जानता है उसे वैद्य कहते हैं । शास्त्र का विधिपूर्वक ज्ञान करने के बाद औपवियों के प्रयोग-निर्माण और प्रत्यक्ष रोगियों पर औषध प्रयोग का ज्ञान वैद्य के लिये अभीष्ट है । त्रिविधमपधमिति - दैवव्यपाश्रयं, युक्तिव्यपाश्रयं, सवावजयश्च । तत्र देवव्यपा-श्रयं मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपात गमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं - पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना, सत्वावजयः - पुनरहितेभ्यो ऽर्थेभ्यो मनोनिग्रहः ॥ ५४ ॥

( ७ ) त्रिविध औषध I औषध तीन प्रकार की होती है ( १ ) दैवव्यपाश्रय, ( २ ) युक्ति-व्यपाश्रय, ( ३ ) सत्त्वावजय । ( १ ) इनमें दैवव्यपाश्रय औषध उसे कहते हैं, जो चिकित्सा में मंत्र, औषध, मणियों का धारण किया जाना है, मंगल कर्म किये जाते हैं, देवताओं के लिए वा भूतों के लिए बलियाँ चढ़ाई जाती हैं, हवन किया जाता है, शौच, संतोष, तपस्या, स्वाध्याय, ईश्वरभजन आदि नियमों का पालन किया जाता है, प्रायश्चित्त किया जाता है । उपवास, चान्द्रायणव्रत आदि के द्वारा शरीर को शुद्ध किया जाता है । स्वस्त्यन पाठ के द्वारा अपनी कल्याण की कामना की जानी है । देवता, पूज्य, गुरु आदि को नमस्कार कर और तीर्थादि में जाकर अपने पूर्वकृत कर्मों को दूर कर रोग दूर करने का प्रयास किया जाता है । ( २ ) युक्ति-व्यपाश्रय औषध उसे कहते हैं जो चिकित्सा में आहार - विहार और औषध द्रव्यों का युक्ति-पूर्वक प्रयोग किया जाता है, ( ३ ) सत्त्वावजय औषध उसे कहने हैं जिससे चिकित्सा में afer अर्थों से मन को रोका जाता है ॥ ५४ ॥

विमर्श - ( १ ) देवव्यपाश्रय औषध प्रायः पापजन्य रोगों में भी विशेष रूप से की जाती है, जैसा कि वाग्भट ने कुष्ठ ( अ. १ ९ ) की चिकित्सा में बनाया है - ' व्रनदमयमसेवात्यागशीलाभियोगो, द्विजमुरगुरुपूजा सर्वसत्वेषु मैत्री | शिवशिवमुतताराभास्कराराधनानि, प्रकटितमलपापं कुष्ठमुन्मूल-

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तित्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २३६ यन्ति ॥ ' सामान्यतः सभी रोगों में दैवव्यपाश्रय औषध की जाती है । इस औषध में नियन का पालन करना होता है । नियम किसे कहते हैं इस पर योगसूत्र में ' शौचसंतोषतप: -स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ' कहा है । वाग्भट ने यम का भी पालन करना बताया है । धर्मशास्त्र में भी बताया है- ' यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः । यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन् ॥ ' ' यम ' किसे कहते हैं इस पर योगसूत्र ने बताया है - ' अहिंसासत्यास्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ' अर्थात् हिंसा न करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, संचय नहीं करना इन्हें ' यम ' कहा जाता है । इनका पालन विशेष कर पापज रोगों में ही होता है और पूर्वकृत पाप रोग का कारण होता है । पूर्वजन्म में किये हुए कर्मों का नाम दैव होता है और पूर्वजन्म कृत कर्मों की शान्ति के लिए दैवव्यपाश्रय औषध बताई गई है । ( २ ) युक्तिव्यपाश्रय औषध प्रायः दोषजन्य रोगों की शान्ति के लिए प्रयुक्त होती है । रोग शारीरिक और मानस दो प्रकार के होते हैं । उनमें शारीरिक रोग विशेषतः युक्तिव्यपाश्रय से और सामान्यतः दैवव्यपाश्रय से दूर होते हैं । यह बात सूत्रस्थान के पहले अध्याय में, ' प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो देवयुक्तिव्यपाश्रयैः ' से स्पष्ट किया है तथा अन्यत्र भी कहा गया है - ' स्वहेतु दुष्टैरनिलादिदोषै -रुपप्लुतैः खेषु परिस्वलद्भिः । भवन्ति ये प्राणभृतां विकारास्ते दोपजा भेषजशुद्धिसाध्याः ॥ ' ( ३ ) सत्त्वावजय औषध -- प्रायः मानस रोगों में प्रयुक्त होती है जैसा कि - ' मानसो ज्ञान-विज्ञानधैर्य स्मृतिसमाधिभिः ' से प्रथम अध्याय में स्पष्ट किया गया है । यहाँ ' समाधि ' का अर्थ ' मन ' को समाधिस्थ करना है, जो कि चित्तवृत्ति के निरोधस्वरूप योग से सम्भव है । इन सभी औषधों के प्रयोग में विमर्श में प्रायः शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका तात्पर्य यह है कि तीनों औपर्धे, तीनों प्रकार के रोगों में प्रयुक्त होती है । पर उन उन विशेष रोगों में विशेष कर लाभकर होती हैं । शरीरदोपप्रकोपे खलु शरीरमेवाश्रित्य प्रायशस्त्रिविधमौपधमिच्छन्ति - अन्तःपरि-मार्जनं, बहिः परिमार्जनं, शस्त्रप्रणिधानं चेति । और भी - शारीरिक दोषों के कुपित होने पर शरीर को ही आश्रय बना कर तीन प्रकार की औषधियाँ प्रयुक्त होती हैं ( १ ) अन्तःपरिमार्जन, ( २ ) बहि: परिमार्जन, ( ३ ) शस्त्र-प्रणिधान । * तत्रान्तः परिमार्जनं यदन्तः शरीरमनुप्रविश्यौषधमाहारजातव्याधीन् प्रमाष्टि, यत्पुन-र्बहिःस्पर्शमाश्रित्याभ्यङ्गस्वेदप्रदेहपरिषेकोन्मर्दनाद्यैरामयान् प्रमाष्टि तद्बहिः परिमार्जनं, शस्त्र-प्रणिधानं पुनश्छेदनभेदनव्यधनदारणलेख नोत्पाटनप्रच्छन सीवनैषणक्षाराग्निजलौकसश्चेति ॥ ( क ) अन्तःपरिमार्जन की परिभाषा --- अन्तः परिमार्जन उस औषधि का नाम है जो शरीर के भीतरी भाग में प्रविष्ट होकर दूषित आहार सेवन से उत्पन्न रोगों को नष्ट करती है । ( ख ) वहि: परिमार्जन की परिभाषा - बहिः परिमार्जन औषध उसे कहते हैं जो शरीर की त्वचा का आश्रय लेकर रोगों को दूर करती है जैसे अभ्यङ्ग ( मालिश ), स्वेद, प्रदेह, परिषेक, मर्दनादि क्रिया से विभिन्न प्रकार के व्रणशोथ, वेदना आदि को नष्ट करती है । ( ग ) शस्त्रप्रणिधान की परिभाषा - शस्त्रप्रणिधान उसे कहते है जो छेदन, भेदन, व्यवन, दारण, लेखन, उत्पाटन, प्रच्छन, सीवन और एषण इन शस्त्रकर्मों के द्वारा प्रयुक्त होता है और इसी औषध में क्षार लगाना, अग्नि से जलाना, जोंक लगाना, आदि का भी ग्रहण होता है ५५ ॥ - इस प्रकार औषधों के भेद दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय, सत्त्वावजय तथा विमर्श -

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२४० चरकसंहिता अन्तःपरिमार्जन, बहि: परिमार्जन और शस्त्रप्रणिधान होते हैं इसे निम्नलिखित कोष्ठक से विशेष रूप से समझना चाहिए । देवव्यपाश्रय अन्तःपरिमार्जन संशोधन औषध युक्तिव्यपाश्रय सत्त्वावजय बहि: परिमार्जन 1 शस्त्रप्रणिधान अभ्यङ्ग, स्वेद, प्रलेपादि संशमन अष्टविध शस्त्रकर्म और अनुशस्त्र का प्रयोग वमन विरेचनादि पञ्चकर्म पाचनादिकर्म भवन्ति चात्र--प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाभ्यन्तरेण वा । कर्मणा लभते शर्म शस्त्रोपक्रमणेन वा ॥ ५६ ॥

( ५ ) रोग की प्रारम्भिक अवस्था में ही चिकित्सा का औचित्य ( Necessity of Treatment in Early Stage of the Disease ) बुद्धिमान् मनुष्य रोग के उत्पन्न होने पर बाहरी चिकित्सा ( वहि: परिमार्जन ), भीतरी चिकित्सा ( अन्तःपरिमार्जन ) अथवा शस्त्रप्रणिधान ( शस्त्र - चिकित्सा ) से धर्म ( कल्याण ) प्राप्त करता है ॥ ५६ ॥

वालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते । उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः ॥ ५७ ॥

और भी - जिस प्रकार अबुध ( मूखे ) मनुष्य उत्पन्न हुए अपने शत्रु को पहले नहीं समझता है उसी प्रकार बाल ( मूर्ख ) मनुष्य अज्ञानता से अथवा अपने प्रमाद से उत्पन्न हुए, रोग को नहीं समझ पाता है ॥ ५७ ॥

* अणुहिं प्रथमं भृत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते । स जातमूलो मुष्णाति चलमायुश्च दुर्मतेः ॥५८ ॥

ओर भी - द्वारा नहीं समझा गया वह रोग पहले अणु ( अल्प ) ही रहता है किन्तु बाद में बढ़ जाता है । जब बढ़ जाने से रोग का मूल वलवान् हो जाता है तो वह रोग मूर्ख मनुष्यों के वल और आयु को नष्ट कर देता है ॥ ५८ ॥

न मूढो लभते संज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते । पीडितस्तु मतिं पश्चात् कुरुते व्याधिनिग्रहे ॥५ ९ ॥ और भा — नृख मनुष्य तव तक रोग को दूर करने के लिए सचेष्ट नहीं होता है जब तक बलवान् रोग से अधिक रूप से पीडित नहीं होता है । जब रोग के बढ़ जाने पर अधिक दुखो होता है तो बाद मे ब्याथि को दूर करने के लिए सचेष्ट होता है और उसमें अपनी बुद्धि लगाता है ॥ अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींचाहूय भाषते । सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्विपगानीयतामिति ॥ ६० ॥

और भी - जब मूखे व्यक्ति भयङ्कर रोग से अधिक कष्ट पाने लगता है तो अपने पुत्रों, स्त्री, ज्ञाति, सम्बन्धी और मित्रों को बुलाकर कहता है कि अब मुझे बहुत कष्ट है, यदि कोई वैद्य मेरा सभी धन ले ले और मुझे बचा ले, तो उसे शीघ्र लाओ ॥ ६० ॥

तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम् । कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम् ॥

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तिस्त्रैषणीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् २४१ और भी - इस प्रकार भयङ्कर व्याधि से पीड़ित, दुर्बल, कृश, जिसकी इन्द्रियाँ क्षीण हो गई हैं, जो सर्वथा दीन हो गया है, जिसकी आयु समाप्तप्राय है ऐसे रोगी को बचाने में कौन वैद्य समर्थ हो सकता है? अर्थात् कोई भी उत्तम चिकित्सक रोग से जर्जरित शरीर वाले रोगी को नहीं बचा सकता है ॥ ६१ ॥

स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जीवितम् । गोधालाङ्गूलबद्धेवाकृष्यमाणा बलीयसा ॥६२ ॥

औरभी • जिस प्रकार पूँछ में रस्सी बधी हुई और किसी दीवाल आदि में चिपकी हुई गोधा, ( गोड ) बलवान् पुरुषों द्वारा खींची जाती है और यद्यपि वह अपने बचाव के लिए उस स्थान से हटती नहीं है, पर उसकी मृत्यु हो जाती है । इसी प्रकार रोग से पीड़ित हो जाने पर रक्षा करने वाले किसी वैद्य को न प्राप्त कर वह मूर्ख मनुष्य अपने जीवन से छुटकारा पा जाता हैं अर्थात् मर जाता है ॥ ६२ ॥

विमर्श - गोधा का यह स्वभाव होता है कि वह जिस स्थान को पकड़ लेती है उस स्थान को दूसरा व्यक्ति छुड़ाना चाहे तो वह भले ही मर जाय पर पकड़े हुए स्थान को नहीं छोड़ती है । उसी प्रकार जब रोग अधिक बढ़कर शरीर के धातुओं में प्रविष्ट हो जाते हैं तो रोगी भले ही मर जाय पर गेन अच्छा नहीं होता है यह उसका स्वभाव होता है । छतस्मात् प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा । भेषजैः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत् सुखमात्मनः ॥६३ ॥

उपसंहार - इसलिए रोगोत्पत्ति होने के पहले अथवा रोग की तरुण अवस्था में जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है वह औषधों के द्वारा चिकित्सा अवश्य करे ॥ ६३ ॥

विमर्श - तान्पर्य यह है कि अपना सुख चाहने वाले व्यक्तियों के लिए यह उचित हैं कि वह रोग की पूर्वरूपावस्था में जब दोषों का संचय, प्रकोप, प्रसर, स्थानसंश्रय होता रहता है उसी समय चिकित्मा करके होने वाले रोग से अपनी रक्षा कर लें, जैसा कि बतलाया गया है— ' संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः ' अथवा रोग की प्रथमावस्था में ही या दूसरी अवस्था में चिकित्सा अवश्य करा लेनी चाहिये । तीसरी अवस्था आने पर रोगी के जीवन में प्रायः सन्देह होता जाता है । तत्र श्लोकौ -एषणाः समुपस्तम्भा बलं कारणमामयाः । तित्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥६४ ॥

त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता । भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥६५ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के तित्रैषणीयो नामैकादशो ऽध्यायः ॥ ११ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस तित्रैषणीय अध्याय में बुद्धिमान और सांसारिक विषयों से अलग रहने वाले कृष्णात्रेय ने तीन एषणाओं, तीन उपस्तम्भों, तीन प्रकार के बलों, तीन प्रकार के रोग के कारणों, तीन प्रकार के रोगों, तीन प्रकार के रोगों के मार्गों, तीन प्रकार के चिकित्सकों, और तीन प्रकार की औषधों का वर्णन किया है । इन तीन वर्गों के आठों भागों में ही सब कुछ आयुर्वेद का भाव प्रतिष्ठित है ॥ ६४-६५ ॥ १६ च ० सं ०

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२४२ किया जा रहा है -१. एषणा ( Pursuit ) २. उपस्तम्भ ( Sub - Supporters ) ३. बल ( Immurity ) ४. आयतन ( Aetiology ) ७. रोग ( Disease ) ६. रोगमार्ग ( Disease - Path. ways ) ७. भिषज ( Physician ) ८. औषध ( Therapy ) ( क ) ( ख ) चरकसंहिता १. प्राणैषणा ( Pursuit of Life ) २. धनैषणा ( Pursuit of Wealth ) ३. परलोकैषणा ( Pursuit of Other World ) १. आहार ( Diet ) २. स्वप्न ( Sleep ) ३. ब्रह्मचर्य ( Continence ) १. सहज ( Natural ) २. कालज ( Periodic ) ३. युक्तिकृत ( Acquired ) ३. काल ( परिणाम ) ( Season or Time ) १. निज ( Endogenous ) २. आगन्तुज ( Exogenous ) ३. नानस ( Mental ) १. शाखा ( बाह्यरोगमार्ग ) Peripheral System १. छद्मचर ( Impostors ) २. सिद्धसाधित ( Pretenders ) ३. जीविताभिसर ( True Healers ) १. दैवव्यापश्रय ( Divine Therapy ) २. युक्तिव्यापश्रय ( Scientific Therapy ) ३. सत्त्वावजय ( Psyco - Therapy ) १. अन्त: परिमार्जन ( Internal Purification ) २. बहि: परिमार्जन ( External Purification ) ३. शस्त्रप्रणिधान ( Operative Treatments ) चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में निर्देश-चतुष्क - विषयक नित्रेपणीय नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ || ११ ॥ विमर्श - इस ' तिस्रेषणीय ' अध्याय में ८ त्रिकों का वर्णन हैं जिनका संग्रह निम्नांकित रूप में १. असात्म्य - इन्द्रियार्थसंयोग ( Non- Homologatory contacts of Senses and their Objects ) २. कर्म ( प्रज्ञापराध ) ( Volitional Transgression ) २. मर्मास्थिमन्धयः ( मध्यम रोगमार्ग ) ( Vital parts and Bone - Joints ) ३. कोष्ठ ( शरीरमध्य, महानिम्न आम पक्वाशय ) [ आभ्यन्तर रोगमार्ग ] ( Alimentary tract )

पृष्ठ 336

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वातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् अथ द्वादशोऽध्यायः अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

२४३ अ ( तीन एषणाओं के बाद ) ' वातकलाकलीय ' अध्याय की व्याख्या की जायगी ॥ जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - दश अध्याय में रोगों के आयतन तथा मार्गों का निर्देश किया गया है, तथा रोगों के कारण त्रिदोष को भी बताया गया है । पर उस पर विशेष व्याख्या नहीं की गयी थी । अब त्रिदोष को विशेष रूप से समझाने के लिए सर्वप्रथम वात के गुण - दोषों का विवेचन इस अध्याय में किया जायगा । इसके बाद पित्त एवं कफ के गुणों का भी संक्षिप्त वर्णन किया जायगा । वात, दोषों में प्रधान है, यथा - ' पित्तं पशु कफः पङ्गुः पङ्गवो मलधातवः । वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् ॥ ' ( शार्ङ्ग. ) । अर्थात् वात के अधीन ही सब की गतियाँ हैं अतः सर्वप्रथम दात का ही वर्णन अभीष्ट हुआ । यह अध्याय इस कि चरककाल में तद्विद्य-तथ्य का प्रतीक है सम्भाषा परिषदें ( Scientific seminars or symposia ) हुआ करनीथीं । यहाँ त्रिदोष चर्चा में तत्कालीन भारत के बाहर से भी लोग आये थे । इससे यह ज्ञान होता है कि उस समय International ( अन्तर्राष्ट्रीय ) विचार - विनिमय हुआ करते थे । * वातकलाकलाज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समुपविश्य महर्षयः पत्र-च्छुरन्योन्यं - किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपणम्, उपशमनानि वाऽस्य कानि, कथं चैन मसङ्घातवन्तमनवस्थितमनासाद्य प्रकोपणप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिताकुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि वहिःशरीरेभ्यो वेति ॥ ( १ ) वात -सम्बन्धी तद्विद्य सम्भाषा - परिषद् ( Symposium on Vata Dosha ) वातसम्बन्धी विचारार्थ प्रश्नावली [ Agenda for Discussion on Vata - Dosha ] वायु की कला ( गुण ) अ - कला ( दोष ) से सम्बन्धित ज्ञान के विषय को लेकर एक दूसरे के सिद्धान्तों को जानने के लिए महर्षिगण एकत्र बैठ कर परस्पर प्रश्न करने लगे । वे प्रश्न निम्नलिखित हैं, यथा - ( १ ) वायु का क्या गुण है, ( २ ) वायु के प्रकुपित होने का क्या कारण है, ( ३ ) कुपित हुई वायु को शान्त करने वाले पदार्थ कौन हैं, ( ४ ) जब वायु असङ्घात ( अमूर्त स्वरूपहीन ) है तथा अनवस्थित ( चञ्चल ) है तो उसे प्राप्त किए बिना, प्रकुपित एवं प्रशमन करने वाले द्रव्य उसे कैसे कुपित और शान्त करते हैं? ( ५ ) अकुपित ( प्राकृत ) हो कर शरीर और अशरीर में चलने वाली वायु शरीर में चलती हुई कौन कर्म करती है, ( ६ ) कुपित ( विकृत ) होकर शरीर और अशरीर में चलने वाली वायु शरीर में चलती हुई कौन कर्म करती है, ( ७ ) अकुपित ( प्राकृत ) होकर शरीर से बाहर संसार में चलती हुई वायु संसार में क्या कार्य करती हैं, ( ८ ) कुपिन ( विकृत ) वायु संसार में चलती हुई संसार में कौन कर्म करती है । इस प्रकार वायु के सम्बन्ध में आठ प्रश्नों को उपस्थित किया गया ॥ ३ ॥

१. ‘ कला गुणः, यदुक्तं - ‘ षोडशगुणम् ' इति, अकला गुणविरुद्धो दोषः, यदि वा कला सूक्ष्मो भागः तस्यापि कला कलाकला तस्यापि सूक्ष्मो भाग इत्यर्थः ' चक्रः ।

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२४४ चरकसंहिता विमर्श - चक्रपाणि ने ' कला ' शब्द का अर्थ गुण किया है । उदाहरण में चतुष्पाद - सम्बन्धी ‘ षोडशकलम् ’ ( सू. अ. १० ) का प्रमाण दिया है और ' अकला ' शब्द का अभिप्राय गुणविरुद्ध ( दोष ) बताया है । अतएव ' वातकलाकलीय ' का अर्थ हुआ ' वातसम्बन्धी गुण - दोष ' । दूसरा अर्थ चक्रपाणि ने ' कला ' का ' सूक्ष्मभाग ' किया है और कला कला का अभिप्राय सूक्ष्म से भो सूक्ष्म अर्थात् सूक्षतम विचार बताया है । वस्तुतः इस अध्याय के विषय को देखते हुये दोनों अर्थ समान रूप से घटित होते हैं । * अत्रोवाच कुशः साङ्कृत्यायनः - रूक्षलघुशीतदारुणखरविशदाः षडिमे वातगुणा भवन्ति ॥ ४ ॥

( १ ) प्रश्न: वात के गुण क्या हैं? ( किंगुणो वायुः ), उत्तर - इस विचार गोष्ठी में साङ्कृत्यायनदेश के कुश नामक वैद्य ने प्रथम प्रश्न का उत्तर दिया - ( १ ) रूक्ष, ( २ ) लघु, -( ३ ) शीत, ( ४ ) दारुण, ( ५ ) खर, ( ६ ) विशद, ये ६ गुण वायु के होते हैं ॥ ४ ॥

विमर्श - इसी स्थान के प्रथम अध्याय में वायु के सात गुण माने गए हैं, यथा - ‘ रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः । विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ ' ( च. सू.अ. १ ) । सूक्ष्म और चल ये दो गुण अतिरिक्त बताए हैं और वहाँ दारुण गुण नहीं कहा है । सूक्ष्म का अर्थ --' देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेषु विशेद्यत्सूक्ष्ममुच्यते । ' ( शार्ङ्ग. पू. अ. ४ ) । अर्थात् शरीर के छोटे - छोटे छिद्रों ( अर्थात् सूक्ष्म स्रोत और रोमकूपों ) में जो प्रवेश कर जाय उसे ' सूक्ष्म ' कहते है, वस्तुतः वायु सभी छिद्रों में प्रवेश कर जाती है अत: इसे सूक्ष्म मानना आवश्यक है । चल का अर्थ चञ्चल होता है, वायु स्थिर नहीं होती है, इसका दूसरा नाम सदागति भी है । अर्थात् इसमें सर्वदा गति होती रहती है । यहाँ दारुण भी एक गुण बताया है । दारुण का अर्थ कठोर होता है । शोषण करना भी वायु का है । जब कोई कोमल वस्तु सूख जाती है तो उसका कठोर होना स्वाभाविक है, अतः are गुण भी कहा है । यद्यपि यह मत चरक का नहीं है फिर भी ' अप्रतिषिद्धमनुमतं भवति ' न्याय से यह गुण इन्हें भी इष्ट है । चरक के सिद्धान्त से वायु के पूर्वोक्त सात गुण है । | सुश्रुत बाबु के ये गुण माने हैं --- ' अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः । तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च ॥ ' ( नि. अ. १ ) । यह ६ गुण या ८ गुण वायु के होते हैं और वायु इन गुणों के द्वारा शरीर में रूक्षता, लघुता, शीतलता, दारुणता, खरता, चञ्चलता उत्पन्न करती है और शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करती है । तच्छ्रुत्वा वाक्यं कुमारशिरा भरद्वाज उवाच - एवमेतद्यथा भगवानाह एत एव वातगुणा भवन्ति, स त्वेवंगुणैरेवं द्रव्यैरेवंप्रभावैश्च कर्मभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासोहि धातूनां वृद्धिकारणमिति ॥ ५ ॥

( २ ) प्रश्न: वात प्रकोप के कारण कौन हैं? ( किमस्य प्रकोपणम् ), उत्तर- इस प्रकार कुश नामक वैद्य से प्रथम प्रश्न का उत्तर सुन कर और उसे स्वीकार कर कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि यह बात ठीक है जैसा कि आपने कहा । ये ही वायु के गुण होते है । इस प्रकार कुश के मत का अनुमोदन कर भरद्वाज ने दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया कि इन गुणों से युक्त वायु, इन्हीं गुण वाले द्रव्यों के, तथा इसी प्रकार के प्रभाव वाले कर्मों के अभ्यास करने से शरीर में कुपिन होती है । क्योंकि समान गुणों का अभ्यास करना धातुओं की वृद्धि का कारण होता है ॥ ५ ॥

विमर्श - कुमारशिरा ' भरद्वाज ' का विशेषण है । भरद्वाज अनेक हुए हैं । ' गर्भ में पहले बालकों में शिर की उत्पत्ति होती है ' -- ऐसा जो कहना है उसे कुमारशिरा कहते है, यह वही भरद्वाज है । अन्य भरद्वाज से इन्हें अलग करने के लिए यह विशेषण दिया है । समान गुणों के.

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जातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् २४५ सेवन से वृद्धि होती है, यह बात प्रथम अध्याय में - ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' से ऋह आए हैं । यहाँ समान गुणों का अभ्यास करना बताया है क्योंकि समान गुणों का प्रयोग करना, यदि वायु के विपरीत गुणों से अल्प रहा तो वायु को बढ़ाने में समर्थ न होगा । किन्तु उसका अभ्यास करते रहने से जब वायु का गुण शरीर में प्रबल होगा और विपरीत गुणों की फभी होगी तत्र वायु की वृद्धि होगी है, जैसा कि नियम है - ' विरुद्धगुणसंयोगे हि भूयसा अल्प-मवजीयते ' अतः जब वायु को बढ़ाना इष्ट हो तव वायु के समान रूक्षादि गुण वाले द्रव्यों का या रूक्षादि प्रभाव वाले कर्मों का अभ्यास कराना आवश्यक होता है । अथवा प्रमाद से जो व्यक्ति इस प्रकार के द्रव्यों तथा कर्मों का अभ्यास करता है, उसके शरीर में वायु बढ़ जाती है । $ तच्छ्रुत्वा वाक्यं काङ्कायनो बाह्लीकभिषगुवाच - एवमेतद्यथा भगवानाह एतान्येव प्रकोपणानि भवन्ति, अतो विपरीतानि वातस्य प्रशमनानि भवन्ति, प्रकोपणविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणमिति ॥ ६ ॥

( ३ ) प्रश्न: वातशमन के कारण क्या हैं? ( उपशमनानि वाऽस्य कानि ), उत्तर - इस प्रकार कुमारशिरा भरद्वाज के वचनों को सुन कर वाह्रीक के रहने वाले काङ्कायन नामक वैद्य ने उनके सिद्धान्त का अनुमोदन किया और कहा कि यह सिद्धान्त ठीक है जो आपने कहा है, यही कारण वात को कुपित करने वाले हैं । इस प्रकार उनके उत्तर का समर्थन कर तीसरे प्रश्न ( वात की शान्ति के क्या कारण होते हैं ) का समाधान किया कि इन्हीं रूक्षादि गुणों के विपरीत द्रव्यों और विपरीत प्रभाव वाले कर्मों के सेवन से वायु का शमन होता है । क्योंकि प्रकुपित करने वाले कारणों से विपरीत कारण वाले द्रव्य तथा कर्मों से धातुओं की शान्ति होती है ॥ ६ ॥

का तात्पर्यं ( १ स्निग्ध ), ( २ ) उष्ण, ( ३ ) गुरु, ( ४ ) स्थूल, विमर्श - विपरीत गुण ( ५ ) स्थिर, ( ६ ) पिच्छिल, ( ७ ) लक्षण और ( ८ ) मृदु गुण वाले द्रव्यों एवं कर्मों से है । प्रथम अध्याय में कहा गया है कि ' हासहेतुविशेषश्च ' । यहाँ भी विपरीत गुणों का निरन्तर अभ्यास करना वात के गुणों को शान्त करने वाला होता है, ऐसा समझना चाहिए । यहाँ निद्धान्त का उल्लेख करते समय धातु शब्द का प्रयोग आया है । उदाहरण के अनुसार वात भी धातु है क्योंकि धातु शब्द की व्युत्पत्ति - ' धारणाद्धातवः स्मृताः ' है । स्वस्थ वात भी शरीर को धारण करने वाला है । * तच्छ्रुत्वा वाक्यं बडिशो धामार्गव उवाच - एतमेतद्यथा भगवानाह एतान्येव वात-प्रकोपप्रशमनानि भवन्ति । यथा ह्येनमसङ्घातमनवस्थितमनासाद्य प्रकोपणप्रशमनानि कोपयन्ति प्रयन्ति वा तथाऽनुव्याख्यास्यामः - वातप्रकोपणानि खलु रूक्षलघु-शीतदारुणखरविशदशुपिरकराणि शरीराणां, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं गत्वाऽऽध्याय-मानः प्रकोपमापद्यते; वातप्रशमनानि पुनः स्निग्धगुरूष्णलचणमृदुपिच्छिलघन कराणि शरीराणां तथाविधेषु शरीरेषु वायुरसंज्यमानश्चरन् प्रशान्तिमापद्यते ॥ ७ ॥

( ४ ) प्रश्न: असङ्घान ( अमूर्त ) वात के प्रकोप तथा प्रशमन की प्रक्रिया क्या है? ( कथं चेन-नऩङ्घातवन्तमनवस्थितमनासाद्य प्रकोपणप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा ), उत्तर - इस कि आपने प्रकार काङ्कायन नामक वैद्य के वचनों को सुन कर धामात्र बडिश नामक वैद्य ने कहा जो कहा है वह सब ठीक है । ये ही बात को कुपित और प्रशमन करने वाले होते हैं । इस प्रकार काङ्कायन के वचनों का समर्थन कर चौथे प्रश्न का उत्तर दिया कि जिस प्रकार असङ्घात ( अमूर्त-स्वरूपहीन ) और अनवस्थित ( चञ्चल ) वायु को न प्राप्त कर वातप्रकोपक द्रव्य तथा वातशामक १. ' असज्यमानोऽनवतिष्ठमानः क्षीयमाणावयव इति यावत् ' चक्रः ।

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२४६ चरकसंहिता द्रव्य वायु को प्रकुपित तथा शान्त करते हैं उसी प्रकार व्याख्या कर रहा हूँ - वातप्रकोपक द्रव्य शरीर में रूक्षता, हलकापन, शीतलता, कठोरपन, खरदरापन, विशता और शुपिरपन उत्पन्न कर देते हैं, जब इन गुणों से युक्त शरीर हो जाता है तो इस प्रकार के शरीर में वायु अपना आश्रय बना कर बढ़ती हुई प्रकुपित हो जाती है । इसी प्रकार वातशामक द्रव्य तथा कर्म शरीर में स्निग्धता, गुरुता, उष्णता, ऋक्ष्णता, मृदुता, पिच्छिलता और स्थूलता उत्पन्न कर देते है, जब शरीर इन गुणों से युक्त हो जाता है तब इस प्रकार के शरीर में वायु न क कर चलती हुई शान्त हो जाती है ॥ ७ ॥

विमर्श - - जब वायु असङ्घात तथा अनवस्थित है अर्थात् कोई उसका रूप नहीं है और न वह स्थिर है, तब औषध - प्रयोगों से उसकी शान्ति और वृद्धि कैसे होती है क्योंकि शान्ति या वृद्धि होना किसी मूर्तवस्तु में ही पाया जाता है । इसका समाधान आचार्य ने स्वयं दिया है कि वायु शरीर में चलती है, औषधगुण शरीर में ही होता है । औषधगुण और वायु का एकाश्रय सम्बन्ध होने से, अपने गुण के समान गुण वाले द्रव्यों के संयोग से वात की वृद्धि और विपरीत गुण वाले द्रव्यों के संयोग से बात का हास होता है । अर्थात् शरीर के साथ सम्बन्ध रखने के कारण वान का क्षय और हास हुआ करता है । * तच्छ्रुत्वा बडिशवचनमवितथमृषिगणैरनुमतमुवाच वायविदो राजर्षिः - एवमेतत् सर्वमनपवादं यथा भगवानाह । यानि तु खलु वायोः कुपिताकुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि वहिः शरीरेभ्यो वा भवन्ति तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपदेशः साधयित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवच्यामः - वायुस्तन्त्रयन्त्रधरः, प्राणोदानस-मानव्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चेष्टानामुच्चावचानां, नियन्ता प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्र -याणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियार्थानामभिवोढा, सर्वशरीरधातुव्यूहकरः, सन्धानकरः शरीरस्य, प्रवर्तको वाचः, प्रकृतिः स्पर्शशब्दयोः, श्रोत्रस्पर्शनयोर्मुले, हर्षोत्साहयोयोनिः, समीर-णोऽग्नेः, दोषसंशोषणः, क्षेप्ता बहिर्मलानां, स्थूलाणुस्रोतसां भेत्ता, कर्ता गर्भाकृतीनाम्, आयुषोऽनुवृत्तिप्रत्ययभूतो भवत्यकुपितः । ( ५ ) प्रश्न: प्राकृत ( अकुपित ) शारीर - वायु के कर्म क्या है? ( कानि चास्य अकुपितस्य शरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर- इस प्रकार अविनथ ( सत्य ) और ऋपि समुदाय से समर्थित बडिशनामक वैद्य के वचन सुनकर राजर्षि वार्योविद नामक वैद्य ने कहा कि इस प्रकार यह वचन जो आपने कहा है वह अनपवाद ( सत्य ) है, ( यह कहकर पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें प्रश्न का उत्तर देने का उपक्रम किया ) । जो कुपित और अकुपिन वायु शरीर के भीतर और शरीर के बाहर चलने वाली है, वह वायु जब शरीर में चलती है तव वायु के जो कर्म होते हैं तथा शरीर के बाहर संसार में वायु के जो कर्म होते हैं, उन कर्मों के अवयवों ( विभागों ) को प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाग और आप्तोपदेश प्रमाण से सिद्ध कर वायु देवता को नमस्कार कर यथाशक्ति कह रहा हूँ । वायु तन्त्र ( शरीर ) और यन्त्र ( शरीरावयवों ) को धारण करने वाली है, प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान इन पाँचों वायुओं की आत्मा है, वायु शारीरिक सभी उच्चावच ( विविध, अनेक ) चेष्टाओं ( क्रियाओं ) का प्रवर्तक है, वायु ही मन का नियन्त्रण एवं प्रणयन करती है । सभी इन्द्रियों को अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने में प्रवृत्त कराती है । सभी इन्द्रियाओं को स्वयं ग्रहण कर एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने वाली होती है । शरीर के सभी धातुओं का व्यूह करती है ( अपने- अपने कार्यों में लगाती है, तथा अपने - अपने स्थान और मात्रा

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वातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् २४७ में स्थित रखती है ) । शरीर का सन्धान ( अर्थात् गर्भावस्था में अस्थि और पेशियों दो यथास्थान जोड़ना ) करती है, वाणी को वायु ही प्रवृत्त कराती है, स्पर्श और शब्द की प्रकृति अर्थात् कारण है, वायु के द्वारा स्पर्शज्ञान होता है और शब्द की उत्पत्ति होती है | कान और त्वचा के निर्माण में मूल कारण वायु ही होती है । शरीर में हर्ष तथा उत्साह होने में वायु ही कारण होती है, यह वायु जठराग्नि को तेज करती है, दोषों को सुखाती है ( यहाँ ' शरीरदूषणाद्दोषा: ' इस नियम के अनुसार दोष से शरीर को दूषित करने वाले विकृत धातु और विकृत मल एवं पित्त, कफ लिए जाते है ), मलों को बाहर निकालती है, बड़े - बड़े और छोटे - छोटे स्रोतों का भेदन करती है, गर्भ की आकृतियों को करने वाली है, इस प्रकार अकुपित वायु शरीर के प्रत्येक कार्य को सुचारु रूप से करती हुई आयु के परिपालन में कारणभूत होती है । विमर्श - शरीर में वायु को ही प्रधान माना गया है इसीलिए तन्त्र ( शरीर ) और यन्त्र . ( शरीरावयवों ) का धारक वायु को माना है । चक्रपाणि ने- ' तन्त्रं शरीरं यदुक्तं- ' तन्त्रयन्त्रेषु भिन्नेषु तमोऽन्त्यं प्रविविक्षतान् । विनाशायेह रूपाणि यान्यवस्थान्तराणि च ॥ ' ( इन्द्रि. अ. १२ ) यह उदाहरण देकर तन्त्र शब्द से शरीर का और यन्त्र शब्द से अवयवों का ग्रहण किया है । गङ्गाधर ने भी ' यन्त्र ' शब्द से ' अवयवों ' का ही ग्रहण किया है, यथा- ' यन्त्रमस्य शरीरधातूनां यथा यस्य चालनस्थानभ्रमणादिव्यापारो यतो भवति तद् यन्त्रम् । ' तथा ' तन्त्र ' शब्द को शरीरधातु का नियोजक माना है, यथा- ' तन्त्रं शरीरधातूनां नियमः ' । इस प्रकार वायु शरीर को धारण करने से या शारीर धातुओं का नियामक होने से तन्त्रधर तथा अवयवों को धारण करने से यन्त्रवर होती है । यह वायु सम्पूर्ण शरीर को धारण करने के लिए पञ्चधा विभक्त होकर भिन्न-भिन्न अङ्गों में रहकर अपना कार्य करती है यथा - ( १ ) प्राणवायु - यह हृदय, उरःस्थान, मुख, नासिका, कान, जिल्हा, कण्ठ, मूर्वा में रहती है और वहाँ रह कर उन उन अवयवों को अपने - अपने कार्यों में लगाती है, जैसा कि यहाँ ही स्पष्ट किया गया है कि मूर्धास्थान में रहती हुई प्राणवायु ( १ ) मन का नियन्ता और प्रणेता होती है ( मन का कार्य क्षेत्र मस्तिष्क होता है अतः वहाँ रहने वाला बात उस पर अपना कार्य करता है ) ( २ ) हर्ष और उत्साह का कारण होता है, यह हर्ष और उत्साह मन के द्वारा होता है और प्राण वायु उस पर नियमन करती है । ( ३ ) सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने - अपने कार्यों में लगाती है । यह व्यापार मन का है क्योंकि पूर्व में कहा गया है - ' मनःपुरःसराणीन्द्रियाणि अर्थग्रहणे समर्थानि भवन्ति । ' और मन पर प्राण वायु का अधिकार रहता है । ( ४ ) सम्पूर्ण इन्द्रियों के अर्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्राणवायु ले जाती है तभी इन्द्रियाँ उसे ग्रहण करती है । ( ५ ) शब्द और स्पर्श की प्रकृति ( कारण ) प्राणवायु है क्योंकि शब्द और स्पर्श का ज्ञान मन को ही होता है और मन को ज्ञान तब होता है जब प्राणवायु सहायक होती है । ( ६ ) वायु ' तन्त्र यन्त्रधर ' है । यह कार्य प्राणवायु का है, यदि प्राणवायु शरीर से निकल जाय तो शीघ्र ही मृत्यु हो जायगी, नव न शरीर रहेगा न शरीरावयव अतः प्राणवायु को ही ' तन्त्र यन्त्रवर ' कहा है । ( ७ ) वायु को धारण करने में कारणभूत प्राणवायु ही है । इस प्रकार प्राणवायु के सात कर्म आचार्य ने माने हैं । सुश्रुत ने प्राणवायु के कार्य - ' वायुर्थी वक्त्रसंचारी स प्राणो नाम देहधृक् । सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्य-वलम्बते ॥ ' माने है | वायु अन्न को शरीर के भीतर ले जाती है और प्राण का धारक होती है-' कलावन्नगताः प्रायाः ' भी इसीलिए कहा है । जब अन्न प्राप्त ही नहीं होगा तो मृत्यु मुतरां सिद्ध है । कुछ लोग प्राणवायु का स्थान हृदय मानते है, यथा- ' हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभि-मण्डले । उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥ ' शार्ङ्गधर ने प्राणवायु का स्थान नाभि