चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 341–350

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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२४८ चरकसंहिता माना है यथा — ' नाभिस्थ: प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् । वेगतस्तद्वहिर्याति पातुं विष्णुपदामृ-तम् ॥ पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगवत् । प्रीणयन् देहमखिलं जीवयञ्जठरानलम् ॥ ' ( शार्ङ्गं. ) । इस प्रकार प्राणवायु के स्थान के विषय में मतभेद पाया जाता है पर कार्य में कोई भेद नहीं हैं, शरीर को धारण करना ही इसका कार्य है । यह सभी ने स्वीकार किया है कि वान का प्रधान स्थान नाभि का अधोभाग है, यथा - ' ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंश्रयाः ' से वात, पित्त, कफ का स्थान निश्चित किया गया है । यह पाँचों भेद नाभि के अधोभाग से ही विभक्त होते हैं क्योंकि मूल स्थान यही है, अतः नाभि से चलकर हृदय का स्पर्श कर फुफ्फुस में जाकर नाभि से जो श्वास मुख में आता है उसे प्राणवायु कहते हैं, इसीलिए सुश्रुत ने बनाया है- ' प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् ॥ ' ( निदा. अ. १ ) अर्थात् कुपित होने पर श्वास नली के रोगों को उत्पन्न करता है । तथा स्थान का निर्देश न कर जो वायु मुखमार्ग में गमन करती है, उसे प्राणवायु माना है । हृदय के कार्य- रहित होने पर तत्काल मृत्यु हो जाती है अतः कुछ लोग हृदय ही उसका स्थान मानते हैं । ( २ ) उदानवायु - इसका कर्म आचार्य ने ' प्रवर्तको वाचः’– वाणी को निकालना - ऐसा माना है । मुश्रुत ने भी उदान वायु का यही कर्म बताया है । यथा — ' उदानो नाम यस्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः । तेन भाषितगीतादिविशेषोऽभिप्रव-तते ॥ ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् करोति च विशेषतः ॥ ' ( सु. नि. अ.१ ) । ( ३ ) समान वायु का कर्म अग्नि को तेज करना है, यथा - ' समीरणोऽग्नेः ' । सुश्रुत ने भी बताया है - ' आनपक्काशयचरः समानो वह्निसङ्गतः । सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विविनक्ति हि ॥ गुल्मान्निसादातीसारप्रभृतीन् कुरुते गदान् ॥ ' ( सु. नि. अ. १ ) । ( ४ ) व्यान वायु का कर्म - ( १ ) शारीरिक छोटी और बड़ी सभी चेष्टाओं का प्रवर्तक है, ( २ ) सम्पूर्ण शारीरिक धातुओं का व्यूह करने वाली है, ( ३ ) शरीर का सन्धान करने वाली है, ( ४ ) छोटे - बड़े स्रोतों का भेदन ( खोलने ) करने वाली है, और ( ५ ) विकृत धातु और मलों को सुखाने वाली है । सुश्रुत ने बताया है - ' कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवह-नोद्यतः । स्वेदासृक्स्रावणश्चापि पञ्चधा चेष्टयत्यपि । क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् प्रायशः सर्वदेहगान् ॥ ’ ( सु.नि.अ. १ ) । ( ५ ) उदान वायु का कर्म - ( १ ) मलों को बाहर निकालना तथा ( २ ) गर्भ को धारण करना है । सुश्रुत ने कहा है- ' पक्काधानालयोऽपानः काले कर्षति चाप्यधः । समीरणः शकृन्मूत्रशुक्रगर्भार्तवानि च ॥ क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् घोरान् वस्तिगुदाश्रयान् ॥ ' ( सु. नि. अ. १ ) । इस प्रकार इस गद्य के द्वारा पाँचो प्रकार की वायु के सभी कर्मों का उपदेश कर दिया गया है । कुपितस्तु खलु शरीरे शरीरं नानाविधैर्विकारैरुपतपति बलवर्णसुखायुपामुपघातार्थ, मनो व्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहन्ति, विनिहन्ति गर्भान् विकृतिमापादयत्यतिकालं वा धारयति, भयशोकमोहदैन्यातिप्रलापाञ्जनयति, प्राणांश्चोपरुणद्धि । ( ६ ) प्रश्न: विकृत ( कुपित ) शारांर वायु क कर्म क्या है? ( कानि चास्य कुपिन्य शरीरचरस्व शरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर - शरीर में कुपित हुई वायु शरीर को अनेक प्रकार के रोगों से उपप्त करनी है तथा बल, वर्ग, मुख और आयु के नाश का कारण होती है, मन को दुःखित करती है, सभी इन्द्रियों की शक्ति का नाश करती है, गर्भ को नष्ट करती है, गर्भ में विकृति उत्पन्न करती है, गर्भ को गर्भाशय में सुखा कर बहुत दिनों तक धारण करनी है, शरीर तथा मन में भय, शोक, मोह, दीनता, अनि प्रलाप करना आदि उपद्रव करती है, और प्राण को भी नष्ट करने वाली होती है । विमर्श - वायु के प्रकुपित होने पर गर्भ में विकृति का तात्पर्य- अन्धा, लंगड़ा, गूंगा, अङ्गहीन, १. ' उपघाताय भवति ' यो ।

पृष्ठ 342

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वातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् २४६ गर्भ उत्पन्न करना है । अधिक दिनों तक गर्भाशय में गर्भ के रहने का उपवेष्टक, नागोदर और लीन होना तात्पर्य होता है । कुपित वायु प्राण को भी ( श्वास क्रिया का अवरोध कर ) नष्ट करती है । यथा - ' सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनैव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥। ' ( च ० सू ० अ ० १७ ) तथा सुश्रुत ने भी बताया है - ' चुगपत् कुपिताश्चापि देहं मिन्धुरसंशयम् ' ( मु ० नि ० अ ० १ ) । तात्पर्य यह है कि सभी चेष्टायें तथा पित्त, कफ और धातु एवं मलों में गति वायु के द्वारा होती है । जब वायु कुपित हो जायगी तब सभी चेष्टाओं में तथा वित्त, कफ धातु और मलों की गति में विकृति आ जायगी । फलस्वरूप नाना प्रकार की व्याधियाँ तथा विशेष उपद्रव बढ़ जाने पर मृत्यु भी हो जाती है । प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा - धरणीधारणं, - ज्वलज्ज्वानम्, आदित्यचन्द्रनक्षत्रग्रहगणानां सन्तानगतिविधानं, सृष्टिश्व मेघानाम्, अपां विसर्गः, प्रवर्तनं स्रोतसां, पुष्पफलानां चाभिनिर्वर्तनम् उद्भेदनं चौद्भिदानाम्, ऋतूनां प्रविभागः, विभागो धातूनां धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः, शस्याभि-वर्धनमविक्केदोपशोषणे, अवैकारिकविकारश्चेति । ( ७ ) प्रश्न: प्राकृत ( अकुपित ) लोक - वायु के कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य अकुपितस्य अशरीरचरस्य बहिःशरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर प्रकृतिभूत ( स्वस्थ ) वायु संसार में चलती है तो निम्नलिखित कर्म करती है, जैसे ( १ ) पृथिवी को धारण करना, ( २ ) अग्नि को जलाना, ( ३ ) सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र एवं ग्रहों को अपनी - अपनी गतियों में उचित रूप से रखना, ( ४ ) बादलों को उत्पन्न करना, ( ५ ) जल का बरसाना, ( ६ ) नदी और तालों को उचित रूप में बहाना, ( ७ ) फूल एवं फलों को यथासमय उत्पन्न करना, ( ८ ) उद्भिद् ( पृथिवी को फोड़ कर निकलने वाले वृक्ष आदि ) को पृथिवी को फोड़ कर निकालना, ( ९ ) ६ ऋतुओं को अलग - अलग विभक्त करना, ( १० ) सोने - चाँदी आदि धातुओं को विभक्त करना, ( ११ ) सोने-चाँदी आदि धातुओं का मान ( तौल ), संस्थान ( आकृति ) को स्पष्ट करना, ( १२ ) बीजों में गुणों का अभिसंस्कार करना, ( १३ ) जौ, गेहूँ आदि शस्य ( धान्यों ) को बढ़ाना तथा धान्यों को सड़ने से बचाना एवं समय पर पक जाने पर उन्हें मुखा देना, ( १४ ) और अवैकारिक ( जिससे संसार में कोई विकृति न हो ऐसे ) विकार ( कार्य ) को करना । विमर्श - पञ्चमहाभूत में समाविष्ट वायु ही शरीर में वात दोष नाम से प्रसिद्ध है । ' यथा लोके तथा शरीरे'- इस सिद्धान्त से वायु के जो कार्य लोक में है, वही कार्य शरीर में भी होते हैं, प्रथम शरीर में वायु के कार्य बनाकर लोक में क्या कार्य है वह यहाँ समझाया गया है । वायु पृथिवी को अपनी अक्ष ( धुरियों ) पर गमन करते समय स्थिर रखती है, अग्नि को जलाती है - इन उदाहरणों से वायु शरीर को धारण करती है, जठराग्नि को दीप्त करती है - आदि को सनझाया है । इन उदाहरणों से वायु की प्रधानता व्यक्त की गयी है । भेलसंहिता में यही बात विशेष स्पष्ट रूप से वर्णित है, यथा-- ' स्थितिः प्राणभृतां चैव सरितां चैव निःस्वनाः । पृथिव्या-श्चलनं चैव वातादेव प्रवर्तते ॥ वानेन धूमो भवति धूमादभ्रं प्रजायते । अत्राद्विमुच्यते वारि जीवानां सम्भवस्तनः ॥ अभिर्ज्वलति वातेन पुण्यानां हविषां पतिः । स्रवन्ति चापगास्तेन पृथिवीं प्रापयन्ति १. ' आदित्यादीनां सन्तानेन अविच्छेदेन गतिविधानं सन्तानगतिविधानम् ' चक्रः । २. धातूनां स्वर्णादीनां मानं स्वं स्वं विशिष्टमानन् ( स्पेसिफिक् ग्रेव्हिटी - Specific Gravity ) । ३. ' विक्लेदोपशोषणम् ' यो ।

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२५० चरकसंहिता च ॥ वायुस्तत्राधिको देवः प्रभवः सर्वदेहिनाम् । योन्यां रेतः प्रसिक्तं च वायुना युज्यते गुणैः ॥ " ( सू ० अ ० १६ ) । प्रकुपितस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति; तद्यथा - शिखरिशिखरा · वमथनम्, उन्मथनमनोकहानाम्, उत्पीडनं सागराणाम्, उद्वर्तनं सरसां, प्रतिसरणमाप-गानाम्, आकम्पनं च भूमेः, आधमनमम्बुदानां, नीहारनिर्ह्रादपांशु सिकतामत्स्यभेकोरग-क्षाररुधिराश्माशनिविसर्गः, व्यापादनं च षण्णामृतूनां शस्यानामसङ्घातः, भूतानां चोप-सर्गः, भावानां चाभावकरणं, चतुर्युगान्तकराणां मेघसूर्यानलानिलानां विसर्गः । ( ८ ) प्रश्न: विकृत ( प्रकुपित ) लोक - वायु के कर्म क्या हैं? ( कानि चास्य कुपितस्य अशरीर-चरस्य वहिःशरीरेषु चरतः कर्माणि ), उत्तर - कुपित होकर जब वायु संसार में चलती है तो उसके निम्नलिखित कर्म होते हैं, जैसे – ( १ ) समुद्रों को उत्पीदित करना ( २ ) तालाव - नालों के जल को उलटा बहाना, ( ३ ) नदी के जल को उलटे बहाना, ( ४ ) भूमिकम्प करना, ( ५ ) मेघों को अधिक गर्जाना, ( ६ ) पर्वत की चोटियों का तोड़ - फोड़ करना, ( ७ ) अनोकह ( वृक्षों ) को उखाड़ फेकना, ( ८ ) नीहार ( बर्फ ), निर्ह्राद ( विना मेघ के शब्द होना ), पांशु ( धूलि ), सिकता ( बाल ), मछली, मेढक, साँप, क्षार, रक्त, अश्म ( पत्थर ), अशनि ( वज्र ) का गिरना ( ८ ) छहों ऋतुओं को विकृत करना, ( ९ ) शस्य ( धान्यों ) को उचित मात्रा में उत्पन्न न होने देना, ( १० ) भूत ( प्राणियों ) का उपसर्ग ( विनाश ) करना, ( ११ ) भावात्मक पदार्थों का अभाव ( विनाश ) करना ( १२ ) चारों युगों के अन्न करने वाले भयंकर बादल, सूर्य, अग्नि और वायु को उत्पन्न करना । * म हि भगवान् प्रभवश्चाव्ययश्च भूतानां भावाभावकरः, सुखासुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमः, नियन्ता, प्रजापतिः, अदितिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः सर्वगः सर्वतन्त्राणां विधाता, भावानामः विभुः, विष्णुः, क्रान्ता लोकानां वायुरेव भगवानिति ॥ ८ ॥

वायु के चिकित्सेतर कर्म का वर्णन - वही वायु भगवान् है, संसार की उत्पत्ति का कारण है, अव्यय ( नाशरहित ) है, प्राणधारियों को उत्पन्न करने वाली तथा विनाश करने वाली है, मुख और असुख ( दु: ख ) को देने वाली है । उसी का नाम मृत्यु, यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकर्मा, विश्वरूप और सर्वग है, सभी तन्त्रों का रचयिता है । अणु ( सूक्ष्म ), विभु ( व्यापक ), विष्णु, और भगवान् वायु ही लोकों का क्रान्ता ( अतिक्रमण करने वालो ) है || ८ || विमर्श - इस प्रकार वायु में भगवान् के सभी विशेषण देकर संसार में वायु को ही प्रधान माना है तथा ' यथा लोके तथा शरीरे ' इस नियम से शरीर में भी वायु को ही प्रधान माना है । अतः सर्वसमर्थ वायु को भगवान् कहा है । तछ्रुत्वा वायविदवचो मरीचिरुवाच- यद्यप्येवमेतत्, किमर्थस्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्यामधिकृत्येयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ९ ॥

मरीचि का, उपर्युक्त वर्णन की सार्थकता के बारे में प्रश्न - इस प्रकार वायविड के वचनों को सुनकर मरीचि नामक वैद्य ने कहा कि आपने जो कहा तो सब ठीक है परन्तु आयुर्वेद शास्त्र में इस प्रकार से वायु के गुणों को कहने और जानने से क्या लाभ है । क्योंकि यह सभा आयुर्वेद शास्त्र के उपयोगी विषयों के विचार और विमर्श के लिए हो रही है ॥ ९ ॥

१. ' प्रवर्तते ' यो ।

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वातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् २५१ विमर्श - अर्थात् वायु के गुण, प्रकोप के कारण, उपशम के कारण, स्वस्थ वायु के लक्षण ये सब चिकित्सा शास्त्र के उपयोगों विषय हैं, पर कुपित वायु संसार में विभिन्न कार्यों को करती है, स्वस्थ वायु संसार को सुरक्षित रखती है, यह जानने से आयुर्वेद शास्त्र में क्या लाभ है ऐसा प्रश्न मरीचि ने किया । वायविद उवाच - भिषक् पवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्रकारिणमात्ययिकं चेन्नानु-निशम्येत् सहसा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमग्रेऽभिरचितुमभिधास्यति प्रागेवैनमत्ययभ-यात्; वायोर्यथार्था स्तुतिरपि भवव्यारोग्याय बलवर्णविवृद्धये वर्चस्वत्वायोपचयाय ज्ञानो-पपत्तये परमायुःप्रकर्षाय चेति ॥ १० ॥

मरीचि के उपर्युक्त प्रश्न- सम्बन्धी वार्योविद का उत्तर ---- इस प्रश्न का उत्तर वायविद राजर्षि ने यह दिया कि यदि वैद्य चिकित्सा करते समय उत्पन्न बलवान्, अत्यन्त परुष, अत्यन्त शीघ्रकारी और आत्ययिक ( शीघ्र ही मारक ) वायु है, यह बात नहीं समझेगा तो, चिकित्सा करने में अधिक प्रयत्नशील वैद्य ' कहीं रोगी का नाश न हो जाय ' इस भय से सर्वप्रथम सहसा प्रकुपित वायु से रक्षा करनी चाहिए ऐसा उपदेश कैसे करेगा? तथा वायु की ठीक - ठीक स्तुति भी आरोग्य के लिए तथा बल एवं वर्ण की वृद्धि के लिए, तेज की वृद्धि, शरीर का उपचय ( वृद्धि ), ज्ञान की वृद्धि और परमायु की वृद्धि के लिए होती है ॥ १० ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि वायु बहुत प्रवल होती है । शरीर में उसके कुपित होने पर जब तक वह हानि न कर सके उसके पूर्व ही यथाशीघ्र शान्त करने का उपाय करना चाहिए यह वैद्य नहीं जान पायेगा तो सर्वप्रथम उसकी चिकित्सा कैसे करेगा तथा रोगियों को उसके कुपित होने वाले कारणों से बचने का उपाय करने का आदेश कैसे देगा? बाहरी वायु भी शरीर में रोग उत्पन्न करती है यह वान विमानस्थान के ' जनपदोदध्वंसनीय ' अध्याय में कही जायगी कि बाहरी वात, जल, देश और काल विकृत होकर संसार में भयंकर रोगों को उत्पन्न कर गाँव के गाँव सहसा नष्ट कर देते हैं । उसमें भी वायु की ही प्रधानता होती है, यथा - ' वाताज्जलं जलाद्देशं देशात्कालं स्वभावतः । विद्याद्दुष्परिहार्यत्वाद्गरीयस्तरमर्थवित् ॥ ' ( च ० विमा ० अ ० ३ ) । अतः चिकित्सा शास्त्र में बाहरी वायु का गुण जानना आवश्यक है । * मरीचिरुवाच - अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभाशुभानि करोति; तद्यथा -- पक्तिमपक्तिं दर्शनमदर्शनं मात्रामात्रत्वमूष्मणः प्रकृतिविकृतिवण शौर्य भयं क्रोधं हर्षं मोहं प्रसादमित्येवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥

( २ ) पित्तसम्बन्धी तद्विद्य सम्भाषा परिषद् ( Symposium on Pitta Dosha ) प्राकृत -तथा विकृत पित्त के कर्म मरीचि ने कहा कि शरीर में पित्त के अन्तर्गत रहने वाली अभि ही कुपित तथा अकुपित ( स्वस्थ ) हो कर शरीर में शुभ और अशुभ कार्यों को करने वाली होती है, जैसे अन्न का पंचना, न पचना, नेत्रों से देखना, न देखना, शरीर में तापक्रम का ठीक रहना, न रहना, शरीर में स्वाभाविक गौर - कृष्णादि वर्णों ( रूपों ) का रहना औरत ( अस्वाभाविक ) वर्णों का होना, शौर्य ( पराक्रम ), भय ( डर ), क्रोध, हर्ष, मोह, प्रसाद ( प्रसन्नता ) आदि, इन्द्र जैसे - सुख दु: ख, इच्छा, द्वेष आदि का होना और न होना ये सभी कार्य पित्त के अन्तर्गत रहने वाली अन्नि हो सम्पादित करती है ॥। ११ ॥ विमर्श - वात, पित्त, कफ इन तीनों को त्रिस्थूण माना गया है । जैसे वात शरीर - धारण के लिए

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२५२ चरकसंहिता आवश्यक है उसी प्रकार पित्त भी आवश्यक वस्तु है । अतः मरीचि ने पित्त की प्रधानता वात की प्रधानता बनाने के बाद बनाई है, जैसा कि चरक ने ग्रहगोचिकित्सा में बताया है - ' आयुर्वर्णो वलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा । ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्वोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ शान्तेऽनौ त्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः । रोगी स्याद्विकृतेर्मूलमग्निस्तस्नान्निरुच्यते । यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादि पोष-कन् । तत्राग्निर्हेतुराहारान्न पक्काद्रसादयः ॥ ' ( च. चि. अ. १५ ) । तथा रसप्रदीप ने अग्नि को साक्षात् भगवान् और ईश्वर बताया है, यथा- ' जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽन्नस्य पात्रकः । सौक्ष्म्याद्र-सानाददानो विवेक्तुं नैव शक्यते ॥ ' पाचक पित्त का ही नाम अग्नि है । जिसकी मात्रा शरीर में निम्नलिखित रूप में बताई गई है - ' स्थूलकायेषु सत्त्वेषु यवमात्रः प्रमाणतः । हस्वकार्येषु सत्त्वेषु तिलमात्रः प्रमाणतः । कृमिकीटपतङ्गेषु वालमात्रोऽवतिष्ठते ॥ ' ( रसप्रदीप ) * तच्छ्रुत्वा मरीचित्रचः काप्य उवाच- सोम एव शरीरे श्लेष्मान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभाशुभानि करोति; तद्यथा - दाढ्यं शैथिल्यमुपचयं कार्श्यमुत्साहमालस्यं वृपतां क्लीवतां ज्ञानमज्ञानं बुद्धिं मोहमित्येवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ १२ ॥

( ३ ) कफसम्बन्धी तद्विद्यसम्भाषा - परिषद् ( Symposium on Kapha Dosha ) प्राकृत तथा विकृत कफ के कर्म – मरीचि नामक वैद्य के इन वचनों को सुन कर काप्य नामक वैद्य ने कहा कि कफ के अन्तर्गत रहने वाला सोम ही कुपित और अकुपित ( स्वस्थ ) रह कर शरीर में शुभ कार्य और अशुभ कार्यों को सम्पादित करता है । जैसे शरीर में दृढता, शिथिलता, शरीर का उपचय ( मोटापन ) और कार्य ( दुबलापन ), उत्साह और आलस्य, वृषता ( मैथुन करने की शक्ति ) और नपुंसकता, विषयों का ज्ञान और अज्ञान, बुद्धि ( यथावत् कर्म करना ), मोह ( बुद्धि का ठीक कर्म न होना ) आदि और अन्य द्वन्द्व शक्ति - अशक्ति आदि को उत्पन्न करता है ॥ १२ ॥

विमर्श - आचार्य ने ऊपर के गद्य में बताया है कि मनुष्य शरीरान्तर्गत कफ के अन्तर्गत सोम ही जब स्वस्थावस्था में रहता है तो दृढ़ता आदि शुभ कर्मों को करता है और जब विकृतावस्था में होता है तब शिथिलता आदि अशुभ कर्मों को करने वाला होता है । अन्यत्र भी कफ का कार्य यही बताया गया है - ' स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् | क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्मा -विकारजन् ॥ ' ( च. सू. अ. १८ ) । चिकित्सा शास्त्र में क्रमश: वात, पित्त, कफ की प्रधानता बनाने के लिए क्रमशः यहाँ उनका विवेचन किया गया है । * तच्छ्रुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच - सर्व एव भवन्तः सम्यगाहुर-न्यत्रैकान्तिकवचनात्; सर्व एव खलु वातपित्तश्लेप्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमव्यापन्नेन्द्रियं बलवर्णसुखोपपन्नमायुषा महतोपपादयन्ति सम्यगेवाचरिता धर्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन महता पुरुषमिह चामुष्मिश्च लोकं; विकृतास्त्वेनं महता विपर्ययेणोपपादयन्ति ऋत इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनोपघातकाल इति ॥ १३ ॥

( ४ ) त्रिदोषसम्बन्धी तद्विद्य - सम्भापा में पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय ( Decisions of Punarvasu Atreya on Tri - Dosha ) भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का त्रिदोष ( वात, पित्त, कफ ) के विषय में मत - भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने इस प्रकार काप्य के वचनों को सुनकर कहा कि आप सभी जन ठीक - ठीक कह रहे

पृष्ठ 346

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वातकलाकलीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् २५३ परन्तु एकान्न ( एकपक्षीय सिद्धान्त ) वचन को छोड़ कर । क्योंकि वात, पित्त, कफ ये तीनों शरीर में प्रकृतिभूत ( समान मात्रा में ) रह कर अव्यापन्नन्द्रिय ( जिनकी इन्द्रियों में कोई भी विकार नहीं हुआ है ऐसे ) पुरुष को बल, वर्ग और सुख तथा बहुत बड़ी आयु से युक्त करते हैं । जैसे ठीक - ठीक रूप में सेवन किए हुए धर्म, अर्थ, काम पुरुष को इस लोक में और मृत्यु के वाद स्वर्ग में बहुत बड़े कल्याण से युक्त करते हैं और यदि ये वात, पित्त, कफ विकृत हो जाते है तो पुरुष को बहुत बड़े विपर्यय ( रोग ) से युक्त करते हैं और अल्पायु एवं मृत्यु को देने वाले होते हैं । जैसे प्रलय काल में त्रिकृत हुई ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ये तीनों ऋतुयें संसार को अशुभ भाव से युक्त कर नष्ट कर डालती हैं ॥ १३ ॥

विमर्श - चरकसंहिता में पुनर्वसु आत्रेय का दृष्टिकोण प्रायः समन्वयात्मक ( Synthetic ) रहा है । उदाहरण के लिये यहाँ वात, पित्त तथा श्लेष्मा के अलग - अलग पक्ष ग्रहण करने वालों की समस्या का समाधान उन्हें समन्वय में प्रतीत हुआ । यहीं नहीं, अपितु अन्यत्र राशिपुरुष तथा आमय ( रोग ) की उत्पत्ति के विवाद के समय भी उन्हें समन्वय में हल दिखाई पड़ा, यथा-' येषामेव हि भावानां संपत् संजनयेन्नरन् । तेषामेव विपद्वयाधीन्विविधान्समुदीरयेत् ॥ ' ( च. सू. अ. २५ ) । कहने का अभिप्राय यह है कि विज्ञान ( Science ) में एकान्त पक्ष उचित नहीं माना जाता है । अनएव भगवान पुनर्वनु आत्रेय की बुद्धि वैज्ञानिक तथा सर्वपक्षग्राही प्रतीत होती है । तदृषयः सर्व एवानुमेनिरे वचनमात्रेयस्य भगवतः, अभिननन्दुश्चेति ॥ १४ ॥

आत्रेय मत का समर्थन तथा उपसंहार - इस प्रकार भगवान् आत्रेय पुनर्वसु के वचनों को सुन कर सभी ऋषियों ने उनके वचन का अनुमोदन किया और उचित वचन कहने के कारण उनका अभिनन्दन भी किया ॥ १४ ॥

विमर्श - यह बात पहले भी कही जा चुकी है, यथा- ' वातपित्तकफाश्चेति त्रयो दोषाः समा-सतः । विकृताऽविकृता देहं घ्नन्ति ते वर्तयन्ति च ॥ ' ( वा. सू. अ. १ ) । भवति चात्र-तदात्रेयवचः श्रुत्वा सर्व एवानुमेनिरे । ऋषयोऽभिननन्दुश्च यथेन्द्रवचनं सुराः ॥ १५ ॥

सभी ऋषियों ने आत्रेय पुनर्वसु के इस प्रकार के वचन को सुन कर उसी प्रकार समर्थन और अभिनन्दन किया जैसे इन्द्र के वचन को सुन कर देवताओं ने समर्थन और अभिनन्दन किया था ॥ १५ ॥

तत्र श्लोकौ — गुणाः षड् द्विविधो हेतुर्विविधं कर्म यत् पुनः । वायोश्चतुर्विधं कर्म पृथक् च कफपित्तयोः ॥ महर्षीणां मतिर्या या पुनर्वसुमतिश्च या । कलाकलीये वातस्य तत् सर्वं संप्रकाशितम् ॥१७ ॥

इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के वातकलाकलीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इति निर्देशचतुष्कः ॥ ३ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - वायु के ६ गुण, २ प्रकार के कारण ( प्रकोपक और प्रशामक ) वायु के अनेक प्रकार के कर्म, फिर वायु के ४ प्रकार के कर्म [ ( १ ) कुपित शरीर-१. ' इत्येतदृषयः श्रुवा ' ग. ।

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२५४ चरकसंहिता चर, ( २ ) अकुपित शरीरचर, ( ३ ) कुपित अशरीरचर, ( ४ ) अकुपित अशरीरचर कर्म ], अलग - अलग पित्त और कफ का कर्म, महर्षिगण का मत, तथा आत्रेय पुनर्वसु का मत यह सभी बातें इस ' वानकलाकलीय ' नामक अध्याय में कही गयी हैं ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - इस अध्याय के विषयों को देखने से ज्ञात होता है कि प्राचीन युग में भी किसी सन्देहास्पद विषय का निर्णय करने के लिए सभा का आयोजन कर सन्देह को दूर करने का प्रयास किया जाता था । इस वातसम्बन्धी विचार - विमर्शगोष्ठी में समवेत सभी महर्षियों ने शरीर के उपादान कारण वात, पित्त एवं कफ के विषयों में अपना - अपना मत व्यक्त किया । वार्योविद ने केवल बात को, मरीचि ने केवल पित्त को, काप्य ने कफ को ही शरीर का मूल रक्षक बताया । पुनर्वसु आत्रेय ने जो उस सभा के सभापति थे, अपना सिद्धान्त बताया कि वात, पित्त, कफ, ये तीनों ही मिलकर शरीर का धारण करने वाले हैं । क्योंकि शरीर के नानारूपात्मक और नाना-व्यापारात्मक होने के कारण उसके रूप तथा व्यापारों का मूल कारण कोई एक ही द्रव्य नहीं हो सकता किन्तु तीनों वात, पित्त, कफ शरीर के विविध व्यापारों के मूल कारण है । इस शरीर की उत्पत्ति, स्थिति एवं वृद्धि के लिए शरीर में गति पाक या परिवर्तन तथा रचना इन तीनों व्यापारों की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार सांसारिक द्रव्य की उत्पत्ति, स्थिति एवं वृद्धि में वायु, ताप और जल की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शरीर की उत्पत्ति, स्थिति और वृद्धि में समुदित रूप से वात, पित्त, कफ की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार सम्पूर्ण संसार को सोम ( चन्द्रमा ), सूर्य और वायु अपने विसर्ग, आदान और विक्षेत्र गुणों के द्वारा धारण किए रहते है उसी प्रकार कफ के अन्तर्गत रहने वाला सोन, पित्त के अन्तर्गत रहने वाली अग्नि ( सूर्य ) और वाल के अन्तर्गत रहने वाली वायु क्रमशः अपनी विसर्ग ( रचनात्मक या वृद्ध्यात्मक ) क्रिया, आदान ( पाक - परिवर्तन ) क्रिया और विशेष ( गति, जीवन, सञ्चार, चेष्टा ) क्रिया के द्वारा शरीर को धारण किए रहते है, यथा- ' दिसर्गादानविक्षेपैः सोमसूर्यानिला यथा । धारयन्ति जगहं कपित्ता-निलास्तथा ॥ ' ( सु. सू. अ. २१ ) । जब ये ही वात, पित्त, कफ विकृत हो जाने है तो शरीर नष्ट हो जाता है । यह शरीर और संसार एक रूप माना गया है । जैसे संसार में सभी कार्य होते हैं वैसे शरीर में भी सभी कार्य होते है । संसार का जीवन हवा, पानी, अग्नि, के ऊपर निर्भर है । और शरीर का भी हवा ( वात ), पानी ( कफ ), अग्नि ( पित्त ) के ऊपर निर्भर है । जब संसार का प्रलय होना होता है तब इन तीनों में विकृति आ जाती है और संसार नष्ट हो जाता है । ठीक उसी प्रकार जब शरीर का प्रलय ( नाश ) होना होता है तो ये तीनों विकृत हो जाते है और शरीर नष्ट हो जाता है । अतः इस दृष्टान्त से भली - भाँति जान कर ये तीनों विकृत न होने पायें इसके लिए परम प्रयत्न करना चाहिए । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में निर्देश चतुष्क-विषयक ‘ वातकलाकलीय ' नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ || १२ ॥ इस प्रकार निर्देशचतुष्क समाप्त हुआ ।

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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् अथ त्रयोदशोऽध्यायः अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ २ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

२५५ अव ( ' वातकलाकलीय ' नामक अध्याय के बाद ) स्नेह अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - स्वस्थ और रोगी दोनों व्यक्तियों के लिये उपयोगी ' निर्देशचतुष्क ' के चार अध्यायों का वर्णन करने के बाद अब रोगी व्यक्तियों के हित के लिए ' कल्पनाचतुष्क ' का वर्णन प्रारम्भ किया जा रहा है । व्याधियों के उन्मूलन के लिए पञ्चकर्म का प्रयोग सर्वश्रेष्ठ माना गया हैं । पञ्चकर्म के पहले स्नेहन करना प्रथम कर्तव्य है । दोषों में प्रधान वान होता है, उसे दूर करने के लिए स्नेहन करना सर्वश्रेष्ठ औषध है, अतः कल्पनाचतुष्क में स्नेहन अध्याय का प्रारम्भ पहले किया गया है । सांख्यैः संख्यातसंख्येयैः सहासीनं पुनर्वसुम् । जगद्धितार्थं पप्रच्छ वह्निवेशः स्वसंशयम् ॥ विषयप्रवेश -- जगत्प्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानियों के साथ बैठे हुए भगवान् पुनर्वसु से संसार के हिन के लिए बह्निवेश ( अग्निवेश ) में अपने सन्देहों को पूछा ॥ ३ ॥

* किंयोनयः कति स्नेहाः के च स्नेहगुणाः पृथक् । कालानुपाने के कस्य कति काश्च विचारणाः ॥ कति मात्राः कथंमानाः का च केषूपदिश्यते । कश्च केभ्यो हितः स्नेहः प्रकर्षः स्नेहने च कः ॥

द्याः के के न च स्निग्धास्त्रिग्धातिनिग्धलक्षणम् ।

किं पानात् प्रथमं पीते जीर्णे किं च हिताहितम् ॥ ६ ॥

के मृदुक्रूरकोष्टाः का व्यापदः सिद्धयश्च का अच्छे संशोधने चैव स्नेहे का वृत्तिरित्यते ॥७ ॥

विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो । स्नेहस्यामितविज्ञान ज्ञानमिच्छामि वेदितुम् ॥ स्नेहकर्म के बारे में प्रश्नावली [ Questions Regarding Sneha Karma ] - ( १ ) स्नेहों की योनि ( उत्पत्ति कारण ) क्या है, ( २ ) स्नेह कितने होते हैं, ( ३ ) अलग - अलग स्नहों के गुण क्या होते हैं, ( ४ ) किस स्नेहपान का काल क्या है, ( ५ ) किस स्नेह के पीने का अनुपान क्या है, ( ६ ) स्नहों की विचारणा ( पीने की कल्पना ) कितनी हैं और कौन - कौन है, ( ७ ) स्नेह की मात्रा क्या है, ( ८ ) स्नेह पीने में वह कितने मान ( तौल ) में लेनी चाहिए, ( ९ ) स्नेह की कितनी मात्रा किन - किन रोगों में कैसे दी जाती है, ( १० ) कौन स्नेह किस पुरुष के लिए हितकारी होता है, ( ११ ) स्नेह का प्रकर्ष कहाँ तक करना चाहिए अर्थात् एक बार स्नेह की मात्रा किनते दिन तक चलनी चाहिए, ( १२ ) स्नेहन करने योग्य पुरुष कौन - कौन होते हैं, ( १३ ) किन - किन पुरुषों को स्नेहन कर्म नहीं करना चाहिए, ( १४ ) सम्यक् स्नेहन करने पर क्या लक्षण होते है, ( १५ ) असम्यक् स्नेहन करने पर क्या लक्षण होते हैं, ( १६ ) अतिस्नेहन करने पर क्या लक्षण होते है, ( १७ ) स्नेह पीने के पूर्व क्या करना चाहिए, ( १८ ) स्नेह पीने के बाद क्या करना चाहिए, ( १ ९ ) स्नेह के पच जाने पर क्या हितकर और क्या अहितकर वस्तु होती है, ( २० ) मृदुकोष्ठ के क्या लक्षण है, ( २१ ) क्रूरकोष्ठ के क्या लक्षण हैं; ( २२ ) अविधि से स्नेह पीने पर क्या १. सम्यक् ख्यायते वस्तुतत्त्वमनया इति संख्या तत्त्वज्ञानं तद् विदन्नीति, संख्या सम्यग्ज्ञानं, तेन व्यवहरन्तीति वा सांख्या आत्मतत्त्वविदस्तैः सांख्यैः । संख्यातानि सम्यग्ज्ञातानि संख्येयानि ज्ञातव्यतत्त्वानि येस्तैः संख्यात संख्येयैः परिज्ञातसकलज्ञातव्यैः ।

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२५६ चरकसंहिता व्यापत्ति ( उपद्रव ) होती है, ( २३ ) अविधि से स्इ पी लेने पर जो उपद्रव होते हैं उनकी सिद्धि ( निराकरण ) कैसे की जाती है, ( २४ ) संशमन और संशोधन के लिए अच्छ ( केवल ) स्नेह का पान किया जाय तो उसमें कौन - कौन वृत्ति ( उपायों ) का अवलम्बन करना चाहिए, ( २५ ) स्नेह की विचारणाओं का प्रयोग किन - किन रोगों में, किन - किन मात्राओं के साथ, किस विधि से करना चाहिए । हे अमितज्ञान गुरु! इन सभी प्रश्नों का उत्तर मैं शास्त्र ज्ञानपूर्वक आपसे जानना चाहता हूँ । इस प्रकार अग्निवेश ने आत्रेय पुनर्वसु से प्रश्न किया ॥ ४-८ ॥ * अथ तत्संशयच्छेत्ता प्रत्युवाच पुनर्वसुः । स्नेहानां द्विविधा सौम्य योनिः स्थावरजङ्गमा ॥९ ॥

( १ ) प्रश्न: नइ की क्या योनियाँ हैं? ( किं योनयः ), उत्तर --- लंड की द्विविध योनियाँ ( उत्पत्ति स्थान ) - इन २५ प्रश्नों को सुनने के बाद अनिवेश के सन्देह को दूर करने वाले आत्रक पुनर्वसु ने कहा कि हे सौम्य! संहों की योनि ( उत्पत्ति स्थान ) दो प्रकार की होती है - ( १ ) स्थावर, ( Vegetable Origin ), ( २ ) जङ्गम ( Animal Origin ) || ९ ||

तिलः प्रियालाभिषुकौ बिभीतकश्चित्राभयैरण्डमधूक सर्षपाः ।

कुसुम्भबिल्वारुकमूलकातसी निकोचकाक्षोडकरञ्जशिकाः ॥ १० ॥

स्नेहाशयाः स्थावरसंज्ञिताः-( क ) स्थावर स्नेहन की योनि [ Source os Sneha ( Fats ) of Vegetable Origin ]. -तेल, प्रियाल ( चिरौंजी ), अभिधुक ( पिस्ता ), बहेरा, चित्रा ( रक्त एरण्ड, गोरक्षकर्कटी तद्वीज-मिह, यदि वा चित्रा लोहितैरण्डः इति चक्रः ), हर्रे, एरण्ड, महुवा ( कोइना ), सरसों, कुसुम्भ ( बर्रे ), बेल, आरुक ( आडू ), मूली, तोसी, निकोचक ( नीम का बीज ), अखरोट, करञ्ज, सहिजन ये सभी द्रव्य स्थावर संह के आश्रय है ॥ १० ॥

विमर्श - यहाँ बताए हुए स्थावर संह के यह आश्रय द्रव्य उपलक्षण मात्र हैं क्योंकि इनके अतिरिक्त भी स्थावर स्नेह के आश्रय है - यथा वादाम, मूँगफली, कद्दू, भिलावा, भड़भाड़, नारियल, बिनौला, चन्दन, दालचीनी, इलायची, जैतून, मालकंगुनी आदि ।

—तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणः ।

तेषां दधिक्षीरघृतामिषं वसा स्नेहेषु मज्जा च तथोपदिश्यते ॥ ११ ॥

( ख ) जङ्गम स्नेह की योनि [ Source of Sneha ( Fats ) of Animal Origin ] मछली, मृग ( पशुमात्र ), पक्षी ये जङ्गम की योनि है । इनके दही, दूध, घृत, मांस, वसा ( चर्बी ), मज्जा का प्रयोग होता है ॥ ११ ॥

विमर्श - यहाँ मछली सभी जलचर प्राणियों का उपलक्षण, मृग सम्पूर्ण चौपायों का उपलक्षण तथा पक्षी सम्पूर्ण पक्षिमात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । यद्यपि प्राणिज हों में घृत, वसा, मज्जा का ही स्नेहन कर्म में विशेषं प्रयोग होता है तथापि मांस, दही, दूध से भी स्नेहन कर्म होता है अतः इनका भी यहाँ निर्देश कर दिया गया हैं । * सर्वेषां तैलजातानां तिलतैलं विशिष्यते । बलार्थे स्नेहने चाग्रथमैरण्डं तु विरेचने ॥१२ ॥

तिलतैल तथा एरण्डतैल की श्रेष्ठता - शरीर में बलाधान के लिए तथा स्नेहन के लिए सम्पूर्ण स्थावर तैलों में तिल का तेल उत्तम होता है और विरेचन के लिए एरण्ड का तेल उत्तम होता है ॥ १२ ॥

विमर्श - स्थावर तैलों में तिल का तेल सर्वश्रेष्ठ होता है, यह बात सुश्रुत ने भी बताई है, यथा-१. ' चासौ ' इति पा ० ।

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स्नेहाध्यायः १३ ] सूत्रस्थानम् २५७ ' सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं विशिष्यते । निष्पत्तेस्तद्गुणत्वाच्च तैलत्वमितरेष्वपि ॥ ' ( सू. अ. ४५ ) अर्थात् तिल शब्द से ही तैल शब्द की निष्पत्ति होती है अतः सम्पूर्ण स्थावर तैलों में तिल का तैल उत्तम माना जाता है । अन्य तैल - योनि सरसों, एरण्ड आदि से उत्पन्न स्नेह को भी समान उत्पत्ति - कारण होने से लक्षणया तेल कहा जाता है । तैल को निष्पत्ति - ' निलस्य विकारः तैलम्, तिलेषु भवं तैलम् ' की जाती है । व्याकरण के आधार पर ' संप्रोदश्च कटच् । ' ( ५।२।२ ९ ) सूत्र के ऊपर ‘ स्नेहे तैलच् ’ यह वार्तिक पढ़ा गया है जो स्नेह अर्थ में तेलच् प्रत्यय का निपातन करता है -‘ तिलस्य स्नेहः तिलतैलम्, सर्वपस्य स्नेहः सर्षपतैलन्, एरण्डस्य स्नेह एरण्डतैलम् ' आदि । सभी तैलयोनियों से उत्पन्न स्नेह को तैल कहा जाता है । इसीलिए शब्दस्तोम में ' तिलादिस्निग्धवस्तूनां स्नेहस्तैलमुदाहृतम् ' बताया गया है । इससे स्पष्ट है कि सभी स्थावर स्नेहों को तैल कहा जाता है । ( कट्टयां तेलमैरण्डं वातश्लेम्महरं गुरु । कषायस्वादुतिक्तैश्च योजितं पित्तहन्त्रपि ॥ १ ॥ )

( एण्ड का तेल कटु, उष्ण, वात - कफनाशक और गुरु होता है । यदि कषाय, मधुर और तिक्त रसयुक्त पदार्थों से युक्त करके प्रयोग किया जाय तो पित्तनाशक भी होता हैं || १ || ) * सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्व स्नेहोत्तमा मताः । एषु चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥१३ ॥

( २ ) प्रश्न: स्नेह के कितने भेद ( प्रकार )? ( कति स्नेहाः ), उत्तर - चतुर्विध स्नेह -( १ ) वृत, ( २ ) तैल, ( ३ ) बसा, ( ४ ) मज्जा ये चार स्नेह सभी स्नेहों में उत्तम माने जाते है और इन चारों स्नेहों में भो सबसे उत्तम घृत माना जाता है क्योंकि यह संस्कारों से दूसरों के गुणों का अनुवर्तन करता है ॥ १३ ॥

विमर्श - स्नेह की स्थावर और जङ्गम ये दो योनियाँ मानी गई है । स्थावर द्रयों से उत्पन्न होने वाले स्नेहों में तिल का तैल और जङ्गम द्रव्यों से उत्पन्न स्नेहों में घृत, वसा और मज्जा प्रधान माने गये हैं । तिल से अतिरिक्त एरण्ड आदि का तैल तथा दधि, क्षीर, मांस आदि जङ्गम द्रव्यों से प्राप्त स्नेह अधम माने जाते हैं । इन चारों में घृत श्रेष्ठ है क्योंकि संस्कार का अनुवर्तन करता है । ‘ संस्कारो नाम गुणान्तराधानम् ' दूसरों के गुणों का अपने में धारण कर लेना संस्कार कहा जाता है । यद्यपि तैल भी दूसरे के गुणों को अपने में धारण कर लेता है अतः इसे भी श्रेष्ठ मानना चाहिए यह एक प्रश्न उठ जाता है, जिसका निराकरण आचार्य ने स्वयं कर दिया है कि ' संस्कारस्य अनु पश्चात् वर्तनमिति संस्कारानुवर्तनम् । ' अर्थात् अपने गुणों को अपने में रखते हुए बाद में अन्य गुर्गों को अपने में धारण करना । यह गुण वसा या मज्जा में नहीं पाया जाता है, जैसा कि निदानस्थान के प्रथम अध्याय म बताया जायगा -'स्नेहाद्वानं शमयति पित्तं माधुर्यशैत्यतः । घृतं तुल्यगुणं दोघं संस्कारात्त जयेत् कफम् ॥ ' तैल में भी संस्कार से गुणाधान होता है पर तैल का गुण नष्ट हो जाता है । यह एक उसमें विशेषता हो जाती है । जैसे स्वभाव से सभी तैल उष्ण होते हैं पर यदि उन्हीं का संस्कार कर बेला, चमेली, कद्दू, ब्राह्मी, आँवला आदि का तैल बनाया जाता है तो वही तैल शीतवीर्य हो जाता है, इसीलिए बताया गया है — ‘ नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित्संस्कारमनुवर्तते । यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ ” ( चक्रपाणि ) । इससे यह स्पष्ट है कि जो संस्कारित होने पर अपना गुण न छोड़े और दूसरे के गुणों को ले ले वह उत्तम और जो संस्कार से दूसरे के गुणों को ले ले और अपना गुण छोड़ दे वह उत्तम नहीं होता है । परन्तु चित्रकादि द्रश्य रूक्षोष्ण गुण से युक्त होते हैं और इससे यदि घृत का संस्कार किया जाय तो वह घृत भी उष्ण और रूक्ष हो जाता है क्योंकि संस्कार से चित्रक में रहने वाला रूक्षोष्ण गुण घृत में आ जाता है ।शंका- यह कैसे संभव है जब कि १. योगीन्द्रनाथसेनसम्मतोऽयं पाठः । १७ च ० सं ०