चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 391–400
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 391–400
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२६८ चरकसंहिता विमर्श - वृद्ध वाग्भट ने बताया है कि ' कुम्भीस्वेद ' में ऊपर जो खाट विद्याया जाता है उसके ऊपर ऐसी चादर बिछाई जाती है जो खाट से भूमि तक चारो तरफ फैली रहे यह उचित भी प्रतीत होता है क्योंकि जब घड़े के चारों तरफ का भाग खुला रहेगा तो वाष्प फैल जायगी और पूर्ण रूप से रोगी के शरीर में स्वेदन नहीं हो पायेगा । जब कपड़े से घिरा रहेगा तो पूरी बाष्प शरीर में लगेगी और उत्तम स्वेद हो जायगा । सुश्रुत ने कुम्भीस्वेद की दूसरी विधि बताई है | उनका कहना यह है कि वातघ्न मांसरस या औषधियों के गर्म क्वाथ को एक घड़े में भर कर, उस के ऊपर एक कपड़े को बाँध कर, उस घड़े को हाथ में लेकर उसके भाप को अपने शरीर में लगाना चाहिये । यथा— ' मांसरसपयोदविस्नेहधान्याम्लवातहरपत्रभङ्गकाथपूर्ण वा कुम्भीमनुतप्तां प्रावृत्यो-गृह्णीयात् ॥ ' ( सु. चि. अ. ३२ ) । कूपं शयनविस्तारं द्विगुणं चापि वेर्धतः । देशे निवाते शस्ते च कुर्यादन्तःसुमार्जितम् ॥५ ९ ॥ हस्त्यश्वगखरोष्ट्राणां करीषैर्दग्धपूरिते । स्ववच्छन्नः सुसंस्तीर्णेऽभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ( १२ ) कूपस्वेद की विधि [ Pit Sudation ] - जिस भूभाग में तीव्र हवा का प्रवेश न हो, जो समनल हो, ऐसे उत्तम स्थान पर खाट की लम्बाई - चौड़ाई के अनुसार लम्बा - चौड़ा और लम्बाई से दूनी गहराई में एक कुआं खोदवावे | फिर उस कुएँ के भीतरी भाग को अच्छी प्रकार से लीप - पोन कर चिकना और साफ सुथरा बनवावे | उस कुएँ के अन्दर हाथी, घोड़े, गौ, गदहा, और ऊँट इनके सूखे हुये लांद और गोवर को डाल कर उसमें आग लगा दे । जब उसमें धुआँ न रहे और ज्वाला शांत हो जाय तो उस गढ्ढे के ऊपर एक खाट बिछा दे और उस खाद के ऊपर एक अच्छा सुन्दर मोटा विस्तरा विद्या दे । उस विस्तरे पर वातनाशक तेलों का सारे शरीर में अभ्यंग कर एक चादर ओढ़ कर रोगी सो जाय । इस प्रकार सोने से मुख पूर्वक स्वेदन हो जाता है । इसे कृपस्वेद कहते हैं ॥ ५ ९ -६० ॥ विमर्श - इससे पहले कर्पूस्वेद ( आठवें ) का भी विधान आया है । उसमें भी एक गड्डा खोद कर वातघ्न काष्ठों को जला कर धूम के नष्ट होने पर उसके ऊपर खाट विद्या कर शयन कर स्वेद लिया जाता है । दोनों के गड्ढों में अन्तर होता है । कर्पूस्वेद में गढ़ का निचला भाग चौड़ा होता है ऊपर का भाग पतला होता है ( कर्षूः अभ्यन्तरविस्तीर्णः स्वल्पमुखी गर्नः - चक्रः ) । निचले भाग में आग के अंगारे अधिक रहते है और गढ़े का मुंह छोटा होने से देर तक उष्णता निकलती रहती है अतः उसके द्वारा अधिक काल तक ताप की प्राप्ति होती है और उत्तम स्वेद्र हो जाता है । कूपस्वेद में गड्ढे की लम्बाई - चौड़ाई एक समान होती है, गहराई लम्बाई की अपेक्षा दूनी होती है । पर गड्ढे के एक समान होने से इसका नापक्रम एक रूप में अधिक देर तक नहीं रहता है । अत: अधिक काल तक उत्तम रूप से इससे स्वेद नहीं होता है, यह दोनों में अन्तर है । सुश्रुत ने कर्षू स्वेद और कूपस्वेद का अपने यहाँ वर्णन नहीं किया है । अष्टाङ्गसंग्रह में कृप स्वेद में ही कर्षूस्वेद का अन्तर्भाव कर दिया है, पर प्रयोजन के अनुसार ये दोनों स्वंद भिन्न - भिन्न है! कुछ लोग मुश्रुत के भूस्वेद में कर्पूस्वेद और कूपस्वेद को अन्तर्भूत कर यह कहते हैं कि सुश्रुत ने इन दोनों स्वेदों को भूस्वेद में ही मान लिया है । ॐ धीतीकों तु करीषाणां यथोक्तानां प्रदीपयेत् | शयनान्तःप्रमाणेन शय्यामुपरि तत्र च ॥ ६१ ॥
सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत् । स्ववच्छन्नः स्वपंस्तत्राभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ होलाकस्वेद इत्येष सुखः प्रोक्तो महर्षिणा । इति त्रयोदशविधः स्वेदोऽग्निगुणसंश्रयः ॥ ६३ ॥
१. ' वेधन इत्यधः खननप्रमाणेन ' चक्रः । २. ' धीतीका शुष्कगोमयादिकृतोऽग्न्याश्रयविशेषः ' चक्रः ।
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स्वेदाध्यायः १४ } सूत्रस्थानम् २६६ ( १३ ) होला स्वेद की विधि [ Under Bed Sudation ] I हाथी, घोड़ा, गाय, गदहा, ऊँट के सूखे लीद और गोबर से भरी हुई एक चौड़ी - लम्बी और ऊंची बोरसी तैयार करावे जो खाट के नीचे रखी जाय और खाट के नीचे के पूरे भाग तक फैली रहे । उसमें आग लगा दे । जब लीद अच्छी प्रकार जल जाय और उसमें धुआँ न रहे तो उसके ऊपर खाट रखकर रोगी व्यक्ति अपने शरीर में वातनाशक तेल से अभ्यंग कर एक कपड़ा ओढ़ कर खाट पर सो जाय । इस प्रकार शयन करने से सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है । इसका नाम महर्षियों ने ' होला कस्वेद ' बताया है । इस प्रकार अग्नि - संयोग से होने वाले १३ स्वेदों का वर्णन यथाक्रम यहाँ कर दिया है । विमर्श -- चक्रपाणि ने धीतिका शब्द की व्याख्या निम्नलिखित रूप में की है, यथा-- ' शुष्क-गोमयादिकृतोऽग्न्याश्रयविशेषः । ग्रामीण भाषा में इसे ' बोरसी ' या ' कौड ' कहते है । यह बोरसी इतनी लम्बी - चौड़ी बनाई जाती है कि खाट के नीचे ( शयनान्त प्रमाण ) के पूरे भाग को छेक ले ।
व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा । बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः ॥ ६४ ॥
स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते । ( ३ ) दश निरग्नि ( अग्निरहित ) स्वेदन ( Ten Non - Thermal Sudation ) दश निरग्नि स्वेद ( १ ) व्यायाम, ( २ ) उष्णगृह, ( ३ ) भारी ओढ़ने के वस्त्र ( कम्बल आदि ), ( ४ ) भूख, ( ५ ) मद्य आदि उष्णवीर्य द्रवों का अधिक पीना, ( ६ ) भय, ( ७ ) क्रोध, ( ८ ) उपनाह, ( ९ ) युद्ध, ( १० ) आतप, ये दश विना अनि गुण के ही स्वेदन करते हैं ॥ ६४ ॥
विमर्श - वेदश अननि स्वेद अर्थात् अग्नि के साक्षात् संयोग के बिना ही शरीर का स्वेदन करते हैं । व्यायाम का तात्पर्य दण्ड - बैठक करना या आपस में कुश्ती लड़ना है । चक्रपाणि के मतानुसार उष्ण सदन का तात्पर्य उस गर्म घर से है जो बिना अग्निसंयोग के ही गर्म हो जैसे जिस घर में खिड़की या जंगला न हो ( निर्जालक ) और दीवाल मोटी ( घनभित्ति ) हो तो वह घर गर्मी के दिनों में विना अग्नि - संयोग के ही गर्म रहता है । गुरु प्रावरण का तात्पर्य मोटे ओढ़ने से है । शीतपित्त, उदई रोग में शरीर में चमेली का तेल और गेरू लगाकर काला कम्बल ओढ़ाकर सुला दिया जाता है या शीतज्वर में अधिक गर्म कपड़ा ओड़ा दिया जाता है जिससे पसीना निकल जाता है । यहाँ उपनाह की अनग्निस्वेद में गणना की है और सुश्रुत ने इसे अग्नि - स्वेदन माना है | वस्तुतः उपनाह दोनों प्रकार का होता है, यथा- ' उपनाहो द्विविधः साग्निरनन्निश्च, तत्र यः साग्निरुपनाहः स सङ्कर एव वोद्धव्यः ' ( चक्रः ) । जब कुछ, अगर, राई आदि गर्म औषधियों का उपनाह बाँधवार गर्न कपड़े से बाँध दिया जाता है तो उसे अननि उपनाह स्वेद कहा जाता है और जब किसी वातघ्न द्रव्य को पीस कर गर्म कर बाँधा जाता है तो उसे सानि उपनाह स्वेद कहते है । सुन ने भी अननि स्वेद का वर्णन किया है, यथा- ' कफमेदोन्विते वायौ निवातातपगुप्रावरण-नियुद्धाध्वव्यायामनारहरणानपैः स्वेदमुत्पादयेदिति ' ( मु. चि. अ. ३२ ) । छ इत्युक्तो द्विविधः स्वेदः संयुक्तोऽग्निगुणैर्न च ॥ ६५ ॥
१. ' उष्णसदनमिति अग्निसंतापव्यतिरेकेण निर्जालकतया घनभित्तितया च यद्वहं स्वेदयति तद्वो-द्धव्यम् । उपनाहो द्विविधः साग्निरनग्निश्च तत्र यः साग्निरुपनाहः स संकर एव बोद्धव्यः; यस्त्वन-शिबलत्वेन शरीरीष्मरोधं कृत्वा स्वेदयति स इह बोद्धव्यः ' इति चक्रः । २. ' अग्निगुणादृते साक्षादग्निसंबन्धेन कृतादुष्णत्वाद्विना ' चक्रः ।
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३०४ चरकसंहिता आदि अंगों का लेना, स्वरस, क्काथ, कल्क, हिम, फाण्ट, चूर्ण, वटी, अवलेह, रसक्रिया आदि कल्पनाओं से प्रयोग करना तथा रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव आदि का विचार कर तथा प्रकृति-समसमवेत, विकृतिविषमसमवेत आदि संयोगों का विचार करना अत्यन्त सूक्ष्म होता है । ( ३ ) देश ( Place ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - भूमि और आतुर नेद से देश दो तरह के होते हैं । भूमि आनूप, जांगल और साधारण भेद से तीन तरह की होती है । इन देशों में किन - किन दोषों की प्रधानता - अप्रधानता कब और कैसे होती है, यह विचार । आतुर देश से तात्पर्य रोगी के शरीर से है । जैसे एक ही रोग शरीर के भिन्न - भिन्न देश में होने से उसके भिन्न - भिन्न नाम, भिन्न - भिन्न कार्य और भिन्न - भिन्न वेदनायें होती है । जैसे एक ही वायु शिर में जायेगा तो शिरःशूल, नेत्र में जायेगा जो अक्षिशूल, कान में जायेगा तो कर्मशूल उत्पन्न करता है और उसकी चिकित्सा देश के अनुसार की जाती है । ( ४ ) काल ( Time ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - काल नित्यग और आवस्थिक भेद से दो तरह का होता है । नित्यग काल में क्षण, मुहूर्त, सेकण्ड, मिनट, घंटा, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग आदि भेद से भिन्न होता है । आवस्थिक काल वय के अनुसार या रोग के अनुसार होता है । जैसे युवा अवस्था के रोग प्रायः सुखसाध्य होते हैं, वृद्ध अवस्था के रोग दुःखसाध्य होते हैं । रोग के अनुसार ज्वर की अवस्था में उपवास करना चाहिए या हल्का भोजन देना चाहिए या श्वास के रोग में बार - बार औषध का प्रयोग करना चाहिए । ( ५ ) बल ( Strength ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - वल स्वाभाविक ( सहज ), काल के अनुसार ( कालज ), युक्ति के अनुसार ( युक्तिज ), अवस्था के अनुसार, देश के अनुसार बढ़ता और घटता रहता है । शरीर के बल से ही अग्नि के बल में भिन्नता आती है । ( ६ ) शरीर ( Body ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - शरीर के कृश, स्थूल, सम, मध्य, सारयुक्त, साररहित, मृदु, कठोर, सुकुमार, अधिक बड़ा, अधिक छोटा, अतिरोग वाला, बिना रोग के, अत्यन्त गौर, अत्यन्त कृष्ण, स्वस्थ, अस्वस्थ आदि सूक्ष्म भेद होते हैं । ( ७ ) आहार ( Diet ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - मनुष्यों के आहार के भक्ष्य, पेय, लेह्य, वृष्य, चर्व्य, भोज्य तथा प्रकृति, करण, देश, काल, संयोग, राशि, विरुद्ध भोजन, अध्यशन, अजीर्ण भोजन, विषमाशन, अल्पाशन आदि सूक्ष्म अवस्थान्तर होते हैं । ( ८ ) सात्म्य ( Homologation ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - सात्म्य उसे कहते हैं जो अपनी प्रकृति के अनुकूल हो । इस सात्म्य के देहसात्म्य, प्रकृतिसात्म्य, ऋतुसात्म्य, देशसात्म्य, दोपसात्म्य, ओकसात्म्य, जातिसात्म्य, कालसात्म्य, वलसात्म्य आदि अनेक सूक्ष्म भेद होते हैं । ( ९ ) सत्त्व ( Mind ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - मत्त्व कहते है मन को मन में सत्त्व, रज, तम ये तीन गुण होते हैं । इनमें रज और तम को दोष कहते है, सत्त्व को गुण कहते हैं । इनमें एक - एक की अधिकता प्रति पुरुष में पाई जाती है । इसके आधार पर सात्त्विक, राजस, तागस चे तीन प्रकार के पुरुष होते हैं और इस मन में शोक, चिन्ता, भय आदि बराबर लगे रहते हैं । इसलिए क्षण - क्षण में मन के ये दोष बदलते रहते हैं । अतः मन का विचार अत्यन्त सूक्ष्म होता है । ( १० ) प्रकृति ( Constitution ) के सूक्ष्म अवस्थान्तर - शारीरिक दोषों के अनुसार मनुष्य की वातज, पित्तज, कफज, द्वन्द्वज और सन्निपातज ये सात प्रकृतियाँ होती हैं । इनमें
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उपकल्पनीयाध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् ३०५ भी दोषों के तारतम्य से प्रकृति का भेद किया जाय तो इसके सूक्ष्म भेद अनेक हो जायेंगे । मन के दोष के अनुसार सात्त्विक के सात, राजस के छः और तामस के तीन, ये सोलह प्रकृतियाँ होती है । जिसका विचार करना कठिन होता है इसके अतिरिक्त पंच महाभूत की पाँच प्रकृतियाँ भी अलग होती है उसका भी चिकित्सा में विचार करना पड़ता है । ( ११ ) वय ( Age ) में सूक्ष्म अवस्थान्तर - वय, वाल्य, कौमार्य, कैशोर, तरुण, प्रौढ़, वृद्ध, जरा आदि अनेक अवस्थायें होती हैं । इन सबों का विचार कर चिकित्सा करने से सफलता अवश्य होती है । पर इतना सूक्ष्म विचार करना सभी के सामर्थ्य की वस्तु नहीं है | अतः दोनों विषयों का यहाँ निर्देश किया गया है । इदानीं तावत्संभारान्विविधानपि समासेनोपदेच्यामः; तद्यथा दृढं निवातं प्रवातैकदेशं सुखप्रविचार मनुपत्यकं धूमातपजलरजसामनभिगमनीयमनिष्टानां च शब्दस्पर्शरसरूप गन्धानां सोपान दूखलमुसलवर्चः स्थानस्त्रान भूमिमहानसं वास्तुविद्या कुशलः प्रशस्तं गृह-मे तावत् पूर्वमुपकल्पयेत् ॥ ६ ॥
विविध सम्भारों की संक्षेप में गणना - इस समय अनेक प्रकार की सामग्रियों का संक्षेप में उपदेश कर रहे हैं । वास्तु - विद्या का कुशल ( Engineer ), संशोधन कार्य कराने के लिए सबसे पहले एक उत्तम घर बनावे जो घर दृढ़ हो, निवात स्थान में हो, उस घर में हवा आने के लिए एक झरोखा बना हुआ हो, घर इतना चौड़ा हो कि रोगी उस घर में आरामपूर्वक चल-फिर सकता हो, वह घर किसी पर्वत की तराई में न हो, वह घर ऐसे स्थान में बनाया गया हो जहाँ धूम, धूप, जल, धूलि न जा सके तथा मन के प्रतिकूल शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध न प्राप्त हो सके । उस घर में पानी से भरा हुआ टब रखा होना चाहिए । समय पर कार्य में लाने के लिए ओखल, मूसर के अतिरिक्त पैखाने का स्थान, स्नानगृह, भोजनगृह उस घर में अलग - अलग उचित स्थान पर बना होना चाहिए ॥ ६ ॥
विमर्श - उपर्युक्त गद्य भाग में आतुरालय ( Hospital ) सम्बन्धी विस्तृत वर्णन है, यह इस तथ्य का द्योतक है कि उस समय आतुरालय होते थे । ततः शीलशौचाचारानुरागदाच्य प्रादक्षिण्योपपन्नानुपचार कुशलान् सर्वकर्मसु पर्यवदा-तान् सूपौदनपाचकस्त्रापकसंवाहकोत्थापकसंवेशकौषधपेषकांश्च परिचारकान् सर्वकर्मस्त्र-प्रतिकूलान्, तथा गीतवादित्रोल्लापकश्लोकगाथाख्यायिकेतिहासपुराण कुशलानभिप्रायज्ञा-ननुमतांश्च देशकालविदः पारिषद्यांश्च तथा लावकपिञ्जलश शहरिणैणकाल पुच्छक मृग मातृ-कोरभ्रान्, गां दोग्ध्रीं शीलवतीमनातुरां जीवद्वत्सां सुप्रतिविहिततृणशरणपानीयां, पात्र्या-चमनीयोदकोष्ठमणिकघटपिठर पर्योग कुम्भीकुम्भकुण्डशरावदवकटो दञ्चनपरिपर्चेनमन्थान-चमंचेलसूत्रकार्पासोर्णादीनि च शयनासनादीनि चोपन्यस्तभृङ्गारप्रतिग्रहाणि सुप्रयुक्ता-स्तरणोत्तरप्रच्छदोपधानानि " सोपाश्रयाणि संवेशनोपवेश नस्नेहस्वेदाभ्यङ्ग - प्रदेहपरिषेकानु-१. ' अनुपत्यकं यद्विदूरमन्यस्य महतो गृहस्य ' चक्रः । २. ‘ उदकं पीयते येन तदुदपानम् ' चक्रः । ' सोदपानोलूखल ' इति पा ० । ३. ' उल्लापकं स्तोत्रम् ' चक्रः । ५. ‘ शरणं गृहम् ’ चक्रः । ७. ' उदञ्चनं पिधानशरावः ' चक्रः । ४. ' कथा ' यो । ६. ' पर्योगः कटाहः ' चक्रः । ८. ' परिपचनं तैलपाचनिका ' चक्रः । ९. ' भृङ्गारो नालमुखजलपात्रविशेषः, प्रतिग्रहः निष्ठीविकादिक्षेपणपात्रम् ' गङ्गाधरः । १०. ' स्वापाश्रयाणि ' इति पा. । २० च ० सं ०
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३०६ चरकसंहिता लेपनवमनविरेचनास्थापनानुवासन शिरोविरेचन मूत्रोच्चारकर्मणामुपचारसुखानि, सुप्रक्षालि-तोपधानाश्च सुश्लक्ष्णखरमध्यमा दृषदः, शस्त्राणि चोपकरणार्थानि, घूमनेत्रं च, वस्तिनेत्रं चोत्तरबस्तिकं च, कुशहस्तकं च, तुलां च, मानभाण्डं च घृततैलवसामज क्षौद्रफ'णितल-वणेन्धनोदकमधुसीधुसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकदधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लमूत्राणि च तथा शालिषष्टिकमुद्गमापयवतिलकुलत्थच दरमृद्वीका काश्मर्य परूषकाभयामलकबिभीत-कानि, नानाविधानि च स्नेहस्वेदोपकरणानि द्रव्याणि तथैवोर्ध्वहरानुलोमिकोभयभाञ्जिसं-ग्रहणीय दीपनीयपाचनीयोपशमनीय वातहरादिसमाख्यातानि चौपधानि; यच्चान्यदपि किंचि-यापदः परिसंख्याय प्रतीकारार्थमुपकरणं विद्यात् यच्च प्रतिभोगार्थं तत्तदुपकल्पयेत् ॥७ ॥
और भी - अस्पताल - निर्माण के बाद उस भवन के अन्दर जिसका शील ( स्वभाव ) उत्तम हो, पवित्र आचरण हो, रोगी व्यक्तियों में प्रेम करने वाला हो, कार्य करने में प्रत्युत्पन्नमति हो, कार्य करने में चतुर हो, सेवा करने में चतुर हो, चिकित्सासम्बन्धी या अन्य आवश्यक कार्य करने में कुशल एवं तत्पर हो, दाल और भात आदि भोजन के बनाने में चतुर भण्डारी, स्नान कराने में चतुर नौकर, देह दबाने में चतुर नौकर, रोगियों को उठाने बैठाने और लेटाने में चतुर नौकर, औषध पीसने में या बनाने में चतुर ऐसे नौकरों को इन कार्यों को करते हुये इनसे भिन्न कार्यों को करने के लिये कहा जाय तो वे प्रतिकूल न हों, इसके अतिरिक्त गाने, बजाने, स्तोत्र - पाठ करने, श्लोक पढ़ने, कथा बाँचने, कथा - कहानी सुनाने वाले, इतिहास - पुराण के सुन्दर जानने वाले, दूसरे के अभिप्राय को जानने वाले, अपने मन के अनुकूल तथा देश काल को समझाने वाले, सभासदों को नियुक्त करे इसके अतिरिक्त लाव ( लवा पक्षी ), कपिंजल ( गौरैया ), शश ( खरहा ), हरिण, एण, कालपुच्छ मृग, मृगमातृका, उरभ्र ( भेड़ ), इनको तथा दूध पीने के लिये, दूध देने वाली अच्छे स्वभाव वाली, रोगरहित, जिसका बछड़ा जीना हो, जो अच्छे प्रकार नृण से बने हुए घर में रहती हो और जिसके पीने के लिये जल आदि का उत्तम प्रबन्ध हो ऐसी अधिक दूध देने वाली गौओं को रखें, और जलपात्री ( जल पीने के लिये छोटे - छोटे पात्र जैसे गिलास आदि ), आचमनी ( चम्मच ), उदकोष्ठ ( बड़े - बड़े जल के पात्र ), मणिक ( बड़े - बड़े मट्टी के पात्र ), घट ( मट्टी के घड़े या पित्तल के घड़े ), पिठर ( बटुली बटुला ), पर्योग ( कड़ाही ), कुम्भी ( झंझर ), कुम्भ ( गगरा ), कुंड ( कुंडा ), शराव ( कसोरा ), दव ( कलछुल ), कट ( चटाई ), उदंचन ( ढक्कन ) अथवा कठोर उदंचन ( काठ का कठवत ), परिपचन ( तेल पकाने की कड़ाही ), मन्थान ( मथनी ), चमड़ा, कपड़ा, सूत्र ( डोरा ), कर्पास ( धुली हुई रुई ), ऊन ( धोया हुआ ऊन ) इन वर्तन आदि को अस्पताल में सुरक्षित रखना चाहिये । रोगी के शयन, आसन के पास भृङ्गार ( गढ़आ ) जिसमें जल गिराने के लिये एक नली लगी हुई होती है, प्रतिग्रह ( पीकदान ) रखा रहना चाहिये, खाट के ऊपर आस्तरण ( उत्तम दरी या तोसक आदि बिस्तरा ), उत्तर प्रच्छद ( चदरा ), उपधान ( तकिया ), सोपाश्रय ( छोटी - छोटी तकियायें - दो - तीन तकियायें ) ये सब अच्छी प्रकार विछे हुये और रखे हुये होने चाहिये । लेटने, बैठने, स्नेहन. स्वेदन, अभ्यंग, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापनवस्ति, अनुवासनवस्ति, शिरोविरेचन करने के कार्य में तथा मूत्र त्याग और मलत्याग में आराम देने वाले और भी जो अन्य सामग्री सुख देने वाली हो उसे भी अस्पताल में रखना परम आवश्यक १. ' उपधानः ' शिलापुत्र ' इति प्रसिद्धः ' चक्रः । २. ' कुशहस्तकं संमार्जनी ' शिवदासः, आर्द्रद्रव्यपरिपचनार्थं कुशसमूहकृत रचनाविशेषम् - इत्यन्ये । ३. ' उभयभागिक ' इति पा ० ।
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उपकल्पनीयाध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् ३०७ होता है | औषध आदि पीसने के लिये या मिलाने के लिये अच्छी प्रकार धोकर साफ किये हुये लोड़ा और चिकना, खरदरा मध्यम आकार की शिलवट रखनी चाहिये । आवश्यक कार्य करने के लिये शस्त्र, घूमनेत्र, वन्निनेत्र ( वस्तियंत्र ), उत्तरवस्ति यंत्र और उसकी नली भी रखनी चाहिये । कुशहस्तक ( झाड गीले द्रव्यों को पुटपाक द्वारा पकाने के लिये कुश का संग्रह ), तुला, मानमांड ( मेजर - ग्लास ) आदि वस्तुयें रखनी चाहिये । घृत, तैल, वसा, मज्जा, मधु, राव, नमक, लकड़ी, जल, मधु ( मदिरा का भेद ), सीधु, सुरा, सौवीर और तुत्रोदंक, मैरेय, मैदक, दही, दही का पानी, उदश्वित् ( मट्ठा ), धान्याम्ल ( काजी ) और मूत्र वर्ग सदा रखना चाहिये । शालि धान का चावल, षष्टिक ( साठी का चावल ) मूंग की दाल, उड़द की दाल, जौ का आटा, तिल का चूर्ण, कुल्थी की दाल, बड़ी बेर, मुनक्का, गम्भार का फल, फालसा, हरड़, आवला, बहेड़ा, इन द्रव्यों को औषध कार्य और भोजन कार्य के लिये गृह में संग्रह करना चाहिये, इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के स्नेहन, स्वेदन करने योग्य सामग्रियों और द्रव्यों का संग्रह करना चाहिये, इसी प्रकार ऊर्ध्वहर, अनुलोमन, उभयभाजि ( वमन और विरेचन दोनों कार्य करने चाली ) और सूत्र स्थान के चौथे अध्याय में बनाये हुये संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय उपशमनीय, वातहर, आदि जो औषध वर्ग बनाये गये है उन सबों को सर्वदा उस गृह में उपस्थित रखना चाहिये । इसके अतिरिक्त वमन विरेचन के विभ्रंश जाने पर जिन जिन - उपद्रवों की होने की संभावना हो सके उन सभी उपद्रवों को दूर करने के लिये, जो सामग्री या जो औषधि उचित प्रतीत हो उन सभी का संग्रह करना चाहिये और उस गृह में रहने वाले रोगी के आराम के लिये जो - जो भी सामग्रियाँ उचित प्रतीत हों उन सभी का उस घर में संग्रह करना उचित है । ७ ॥ विमर्श - यह प्राचीन काल में संशोधन कराने के लिये जो एक विशेष गृह ( Hospital ) बनाया जाता था उसमें इस प्रकार की सामग्रियों के संग्रह करने का विधान है । संभवतः आधुनिक काल में भो Hospital में जो आवश्यक सामग्री समझी जाती है उन्हें पहले से ही संग्रह कर ली जाती है तब रोगी को उस Hospital में भर्ती करना शुरू किया जाता है । संशोधन आयुर्वेदीय चिकित्सा का मुख्य अंग है इसलिये इसके लिये स्वतंत्र भवन का निर्माण और तात्कालिक जिन-जिन सामग्रियों को आवश्यकता प्रतीत हुई थी उन सभी का संग्रह करने का आदेश दिया है । परिचारकों की संख्या प्रत्येक कार्य के अनुसार अलग - अलग बताई है और उन्हें उसी कार्य में दक्ष ( Trained ) होना चाहिये यह भी आदेश दिया है । आजकल रोगियों के मनोरंजन के लिये अनेक साधन उपस्थित किये जाते हैं । प्राचीन काल में जो मनोरंजन के साधन उपस्थित थे सभी साधन उस संशोधन गृह में ही रखने का आदेश दिया है । इस प्रकार देखा जाय तो आधुनिक और प्राचीन काल के विचारों में काफी समता है । ततस्तं पुरुषं यथोक्ताभ्यां स्नेहस्वेदाभ्यां यथार्हमुपपादयेत् 1 । तं चेदस्मिन्नन्तरे मानसः शारीरो वा व्याधिः कश्चित्तीव्रतरः सहसाऽभ्यागच्छेत्तमेव तावदस्योपावर्तयितुं यतेत । ततस्तमुपावर्त्य तावन्तमेवैनं कालं तथाविधेनैव कर्मणोपाचरेत् ॥ ८ ॥
( २ ) संशोधन ( वमन विरेचनकर्म ) की प्रक्रिया ( Purifactory Measures ) पूर्वकर्म विधान ( स्नेहन - स्वेदन ) - इस प्रकार गृह का निर्माण और गृह में सभी सामग्रियों का संग्रह हो जाने के बाद जिस व्यक्ति को संशोधन पिलाना हो उसका स्नेहन, स्वेदन उचित रूप १. ' अस्मिन्नन्तरे स्नेहस्वेदकरणसमये ' चक्रः ।
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३०८ चरकसंहिता से कर ले | स्नेहन - स्वेदन करते समय यदि रोगी को शारीरिक या मानसिक कोई तीव्र रोग सहसा आ जाय तो पहले उसी रोग को शान्त करने का प्रयास करना चाहिये | जब वह तीव्र रोग शान्त हो जाय तो जितने दिन में चिकित्सा करने से रोग शान्त हुआ हो उतने ही समय तक वह रोग पुनः न आ जाय इसलिये उसी के अनुकूल चिकित्सा आदि कार्य करना चाहिये || ८ | विमर्श - पञ्चकर्म में स्नेहन- स्वेदन करने के बाद पहले वमन कराया जाता है, इसलिये यह विधि वमन के लिये ही बताई गई है । यहाँ बताया गया है कि स्नेहन - स्वेदन करने के बाद वमन कराने की औषधि का प्रयोग चलता हो पर इसी बीच में कोई भयंकर व्यावि, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक हो, आ जाय तो उसकी चिकित्सा शीघ्र ही करनी चाहिये और जितने दिन में चिकित्सा करने पर रोग शान्त हो जाय और उतने ही दिन उसे रोगानुसार पथ्य देकर स्वस्थ कर ले । यदि वमनौपथ नः पिलानी आवश्यक समझे तो फिर स्नेहन - स्वेदन करने के बाद ही वनौषध पिलावे | * ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरः-स्नातमनुलितगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तमिष्टे नक्षत्र तिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधुमधुकसैन्धव फाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत् ॥ ९ ॥
( क ) वमन कर्म ( Emesis ) मनकर्म ( मदनफल - कपाय से ) - जब शारीरिक या मानसिक तीव्र व्याधि शान्त हो जाय, रोगी स्वस्थ हो जाय, स्नेहन - स्वेदन उचित रूप में जिस व्यक्ति का हो गया है ऐसे व्यक्ति को प्रसन्न -मन देखकर जो व्यक्ति सुखपूर्वक रात्रि में शयन कर चुका हो, जिसका पहले का खाया हुआ अन्न अच्छी प्रकार पच गया हो और जो शिर से स्नान कर चुका हो । अपने शरीर में चन्दन आदि का लेप अच्छी प्रकार किया हो, फूलों की माला धारण किये हुये हो, जो बिना फटे हुए नुन्दर वस्त्र को धारण किये हो और जो व्यक्ति देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, बृद्ध, वैद्य की विधिपूर्वक पूजा कर चुका हो, उसे अच्छे नक्षत्र, तिथि, करण, मुहूर्त में ब्राह्मणों द्वारा स्वस्त-चाचन कराकर मन्त्रों से अभिमन्त्रित मधु, मुलेठी, सेंधानमक, राव से युक्त, मदनफल - कषाय की मात्रा पिलावें ॥ ९ ॥
विमर्श - - वमन औषध पीने का समय प्रातः काल ही होता है यह बात ' सुखोषितम् ' और ' सुप्रजीर्णभक्तम्, इन दोनों पदों से स्पष्ट किया है । आगे सिद्धिस्थान में बताया जायगा कि-' अजीर्णे वर्धते ग्लानिर्विबन्धश्चापि जायते । पीतं संशोधनं चैव विपरीतं प्रवर्तते ॥ ' ( सि. अ. ६ ) अर्थात् अजीर्ण में यदि संशोधन पिया जाय तो उसका फल विपरीत होता है और शरीर में ग्लानि एवं कोष्ठ में विबन्ध हो जाता है । इसलिये भोजन के पूरे पच जाने पर संशोधन ( वमन या विरेचन ) पीना चाहिये । यहाँ पहले वमन का ही उपदेश किया गया है । यदि संशोधन में सर्वप्रथम विरेचन पिलाया जाय तो उससे कफ नीचे ग्रहणी के पास चला जाता है उससे ग्रहणी ढक जाती है जिससे पाचन क्रिया ठीक नहीं होती और शरीर में भागीपन और प्रवाहिका उत्पन्न हो जाती है । यदि औषध का वेग अल्प होता है तो कफ के द्वारा मार्ग के बन्द होने के कारण वह विरेचन औषधि नीचे न जाकर मुख से बाहर निकल आती है इसलिये पहले वमन के १. ' इष्टे नक्षत्र तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्र प्रशस्ते ' इति यो. ।
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उपकल्पनीयाध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् ३०६ द्वारा कफ को निकाल दिया जाता है जिससे मार्ग स्वच्छ हो जाता है और पी हुई विरेचन औषधि सुगमतापूर्वक अधोभाग में चली जाती हैं और विरेचन द्वारा दोषों को बाहर निकाल देती हैं जैसा कि सुश्रुत चि. अध्याय ३३ में बताया है - ' अवान्तस्य हि नम्यग्विरितस्याप्यधःस्रस्तः इलेप्मा ग्रहणीमाच्छादयति, गौरवमापादयति, प्रवाहिकां जनयति ' इत्यादि । सामान्यतः सभी प्रकार के वमन द्रव्यों के साथ मधु, मुलेठी, सेवानमक, राब आदि का प्रयोग करने के लिये यहाँ उपदेश किया गया है । क्योंकि यदि कफ शरीर में या स्त्रोनों में चपका रहता है तो उसका निकलना बड़ा कठिन होता है यद्यपि स्नेहन - स्वेदन से द्रवीभूत होकर कफ अपने कोष्ठ में चला आता है फिर भी यदि किसी कारणान्तर से अन्यथा हो गया हो या न्यून द्रव हुआ हो तो उसे गीला करने के लिये या छिन्न कर बाहर निकालने के लिये मधु और सेंधानमक का प्रयोग किया गया है, जैसा कि - कल्पस्थान अ. १ में बताया जायगा । ' सर्वेषु तु मधुसैन्धवं कफविलयनच्छेदनार्थं वमने दद्यात् । ' मदनफलकषायमात्राप्रमाणं तु खलु सर्वसंशोधनमात्राप्रमाणानि च प्रतिपुरुषम-पेक्षितव्यानि भवन्ति; यावद्वि यस्य संशोधनं पीतं वैकारिकदोपहरणायोपपद्यते न चाति-योगायोगाय तावदस्य मात्राप्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ १० ॥
मदनफल के कषाय की मात्रा मदनफल के कषाय की मात्रा का प्रमाण तथा सभी संशोधन औषवियों की मात्रा का प्रभाग प्रत्येक पुरुषों के बल तथा कोष्ठ के आधार पर अलग - अलग होता हैं, जितनी मात्रा जिस आदमी को पिलाई जाय और पीने के बाद वह विकार करने चाले दोषों को निकालने में समर्थ हो जाय और अतियोग तथा अयोग न उत्पन्न करे दहो मात्रा उस पुरुष के लिये उचित होती है । यही मदनफल कषाय की या अन्य संशोधन औषधियों की मात्रा का प्रमाण है ॥ १० ॥
विमर्श - संशोधन के लिये नियत तौल की मात्रा निर्धारित नहीं की गई है संशोधन औषध पीने के बाद यदि क्रूरकोष्ठ या व्यायाम करने वाला या बलवान् पुरुष है तो उसका संशोधन अधिक मात्रा में प्रयुक्त औषधि भी उचित रूप में नहीं कर पाती है और यदि मृदुकोष्ठ है या दुर्बल है या वह अधिक स्नेह का प्रयोग करता है तो अल्प मात्रा में औषधि प्रयुक्त होने पर भी उचित संशोधन कर देती है इसलिये तौल की मात्रा न बता कर प्रत्येक पुरुष की बलानुसार की गई मात्रा निर्धारित है फलतः जो मात्रा जिस पुरुष के लिये उपयोगी हो अर्थात् जितनी मात्रा से उसका दोष बाहर निकल जाय और कोई हानि न हो वही मात्रा उस पुरुष के लिये उचित होती है । व्यवहार की दृष्टि से मदनफल चूर्ण वमनार्थ ३-६ माशा लिया जाता । त्वक् काथ ४ से ८ तो ० तक प्रयोग होता है । * पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङ्क्षत । तस्य यदा जानीयात् स्वेदप्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रचलितं, कुत्तिसमाध्मापनेन च कुक्षिमनु-गतं, हृल्लासास्यस्रवणाभ्यामपि चोर्ध्वमुखीभूतम्, अथास्मै जानुसममसंबाधं सुप्रयुक्तास्तर-णोत्तरप्रच्छदोषधानं सोपाश्रयमासनमुपवेष्टुं प्रयच्छेत् । मन कर्म की मुख्य विधि - वमन द्रव्य विधिपूर्वक मिला देने के बाद एक मुहूर्त्त तक प्रतीक्षा करे जब उसके सिर पर या शरीर में पसीना आने लगे, तो समझना चाहिये कि दोष अब पिघल रहा है, जब शरीर में रोमांच होने लगे तो अपने स्थान से दोष चल दिया है यह जानना चाहिये । जब उसके उदर में आध्मान हो तो समझे कि दोष उसके उदर में आ गये हैं । १. ‘ कुक्षिमनुसृतं ' यो. । २. ' स्वापाश्रयं ' ग. ।
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३१० चरकसंहिता जब जी मचलाने लगे और मुख से जल निकलने लगे तो समझे कि दोप ऊर्ध्वमुख हुआहूँ । तत्र उस व्यक्ति को जानु समान ऊँचा और विस्तृत चौकी आदि पर सुन्दर तोसक आदि त्रिस्तरा चादर, विद्या दे और बड़ी तकिया और छोटी - छोटी तकियायें उस पर लगा दे । तब उस पर बैठने के लिये रोगी को आज्ञा दे दें । विमर्श - सुश्रुत ने वमन औषधि पीने के बाद हाथ को गर्म कर उदर सेकने को बताया है । इससे वमन के कर्म में सुविधा होती है । * प्रतिग्रहांश्चोपचारयेत्, लालाटप्रतिग्रहे पार्श्वोपग्रहणे नाभिप्रपीडने पृष्टोन्मर्दने चान-पत्रपणीयाः सुहृदोऽनुमतः प्रयतेरन् ॥ ११ ॥
और भी रोगी जब जानु समान ऊँचे बिस्तर पर बैठ जाय तो उसके सामने नीचे पीकदान रख दे और उसके मस्तक, दोनों पार्श्व को पकड़ने, नाभि को दबाने, पीठ को नीचे से ऊपर के ऐसे रखा जाय जो इन कार्यों के करने में लज्जा अनुकूल रहे । ऐसे अनेक मित्रों को अलग - अलग तरफ मलने में तत्पर रहने वाले मित्र वर्ग को का अनुभव न करते हों और रोगी के मन के कार्य करने के लिये नियुक्त करें ॥ ११ ॥
अथैनमनुशिष्यात्- विवृतोष्टतालुकण्ठो नातिमहता व्यायामेन वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनम्य ग्रीवा मूर्ध्वशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान् प्रवर्तयन् सुपरिलिखित नखाभ्यामङ्गुलि-भ्यामुत्पलकुमुदसौगन्धिकनालैर्वा कण्ठमभिस्पृशन् सुखं प्रवर्तयस्वति, स तथाविधं कुर्यात्, ततोऽस्य वेगान् प्रतिग्रहगतानवेक्षेतावहितः; वेगविशेषदर्शनाद्धि कुशलो योगायोगाति-योगविशेषानुपलभेत, वेगविशेषदर्शी पुनः कृत्यं यथार्हमवबुध्येत लक्षणेन; तस्माद्वेगान-वेतावहितः ॥ १२ ॥
और भी - इतने कार्य होने के बाद रोगी को इस प्रकार शिक्षा देनी चाहिये कि अपने ओठ, तालु और कंठ को खोल रखो, थोड़े परिश्रम से ही उमड़े हुये वेगों को निकालते हुये कुछ गर्दन तथा शरीर के ऊपरी भाग को झुका कर वमन के वेग के समय में ही यदि हलके वेग आवें और दोष न निकल सकें तो, नख काट दिये गये है जिनकी ऐसी दो अंगुलियों के द्वारा अथवा नील कमल, कुमुद और सौगन्धिक, इनमें किसी एक के डंठल से कंठ में स्पर्श करते हुये सुखपूर्वक वमन के वेग को प्रवृत्त करने की चेष्टा करो । ऐसी शिक्षा देने पर रोगी व्यक्ति उसी शिक्षा के अनुसार कार्य करे तव पीकदान में आये हुये वमन के वेगों को सावधानीपूर्वक वैद्य देखे क्योंकि वेग को विशेष रूप से देखने से ही कुशल वैद्य सम्यक् योग, अयोग और अतियोग की विशेषता को समझता है । वेगों को विशेष रूप से देखने वाला वैद्य अब क्या करना उचित है इस बात को लक्षणों के आधार पर समझना है इसलिये वेगों को सावधानतापूर्वक देखना चाहिये ॥ १२ ॥
विमर्श - वमन औषध पीने पर यदि रोगी अन्यमनस्क हो जाय तो उचित रूप में वेग नहीं आना है और संभवतः कभी - कभी वेग रुक भी जाता है । इसलिये ध्यानपूर्वक वमन की प्रतीक्षा करते हुये ओष्ठ, तालु, कण्ठ को खुले हुये रखने का आदेश दिया है और इस प्रकार के आसन से बैठने का आदेश दिया है जिसमें वेगों के निकलने में कोई कट न हो । यदि वेग हल्के रूप में आता हो और दोष बाहर न निकलता हो तो अंगुली या कमल आदि के इंटल से गले को स्पर्श कर १. ' प्रतिगृह्णन्तीति प्रतिग्रहा ललाटप्रतिग्रहादयः ' चक्रः । ' प्रतिग्रहांश्च ये त्वङ्गविशेषं धारयेथु-स्तानुपाचरेत् ' गङ्गाधरः । ' प्रतिग्रहान् पतद्रहान् ' शिवदासः । २. ' अनुकूलाः ' यो । ३. ' सुप्रलिखित ' ग. । ४. ' अनभिस्पृशन् ईषदभिस्पृशन्, इति गङ्गाधरः । ' कण्ठमभिस्पृशन् ' यो ।
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उपकल्पनीयाध्यायः १५ ] सूत्रस्थानम् ३११ वेग को निकालने का आदेश दिया है । यदि इन आसनों से न बैठा जाय तो वमन का वेग उचित रूप से नहीं निकलता है इसका उल्लेख वृद्ध वाग्भट ने अष्टांगसंग्रह सूत्र स्थान २७ में किया है, यथा- ' नात्युन्नतो नात्यवनतः पार्श्वापवृत्तो वा । तत्रात्युन्नतस्य पृष्ठहृदयपीडा भवति । अत्यवनतस्य शिरः कोष्ठपीडा || ' इत्यादि । अर्थात् अति उन्नत या अति नीच सिर को रख कर या बैठ कर या पार्श्व के सहारे बैठ कर वमन करने से पृष्ठ और हृदय में पीडा होती है यदि सिर को अत्यन्त नीचा कर वमन किया जाय तो सिर और कोष्ठ में पीड़ा होती है । पार्श्व में सिर रख कर वमन किया जाय तो पार्श्व, कोष्ठ, हृदय, जत्रु के ऊपरी भाग में पीड़ा होती हैं । इसलिये सिर और गर्दन को कुछ झुका कर वमन के वेग को प्रवृत्त करने का आदेश आचार्य ने दिया है । सुश्रुत ने भी वमन की विधि का उल्लेख किया है, यथा- ' ततः प्रवृत्तहृल्लासं ज्ञात्वा जानुमात्रासनोपविष्ट-माप्तैर्ललाटे पृष्ठे पार्श्वयोः कण्ठे च पाणिभिः सुपरिगृहीतमङ्गुलीगन्धर्वहस्तोत्पलनालानामन्यतमेन कण्ठमभिस्पृशन्तं वामयेत्तावद्यावत् सम्यग्वान्तलिङ्गानीति ॥ ' ( सु. चि. अ. ३३ ) । यहाँ अप्रवृत्त वेग को कमल की डंठी आदि के द्वारा निकालने को बताया है यदि स्वयंकृत वेग हो तो उसमें यह क्रिया नहीं की जाती है । ॐ तत्रामून्ययोगयोगाति योगविशेषज्ञानानि भवन्ति; वमन कर्म के अयोग, योग तथा अतियोग के लक्षण - इनमें अयोग, अतियोग और सम्यक् योग को विशेष रूप से जानने के लिए आगे लक्षणों का निर्देश किया जाता है । तद्यथा - अप्रवृत्तिः कुतश्चित्, केवलस्य वाऽप्यौषधस्य विभ्रंशो विबन्धो वेगानाम योग लक्षणानि भवन्ति; वमन के अयोग का लक्षण - वमन के वेगों का किसी विशेष कारणवश बाहर न निकलना या केवल औषधियों का बाहर निकल जाना, वेगों का विभ्रंश, विबन्ध हो जाना अयोग कहा जाता है । विमर्श - सिद्धि स्थान अ ० ६ में ' अयोगः प्रातिलोम्येन न चाल्पं वा प्रवर्तनम् ', यह लक्षण बताया गया है तथा अतियोग होने पर ' दुश्छर्दिते स्फोटक कोठकण्ड्वो हृत्खाविशुद्धिर्गुरुगात्रता च । ' ( मि. अ. १ ) इन लक्षणों का शरीर में होना बताया है । वाग्भट में भी इन्हीं लक्षणों का वर्णन किया गया है यथा - ' तत्र वेगानामप्रवर्तनम् ॥ प्रवृत्तिः सविवन्धा वा केवलस्यौषधस्य वा । अयोगस्तेन निष्ठीवकण्डूकोठज्वरादयः ॥ ' ( अ. हृ. स. अ. १८ ) तथा हीनयोग होने पर उसकी चिकित्सा का भी वर्णन वाग्भट ने वहीं किया है - ' हीनवेगः कणाधात्री सिद्धार्थलवणोदकैः । ' सुश्रुत ने भी इसका लक्षण संक्षेप में बताया है - ' कफप्रसेकं हृदयाविशुद्धिं कण्डूश्च दुश्छर्दित लिङ्गमाडु: । ' काले प्रवृत्तिरनतिमहती व्यथा यथाक्रमं दोषहरणं स्वयं चावस्थानमिति योगलक्ष-नि भवन्ति, योगेन तु दोषप्रमाणविशेषेण तीच्णमृदुमध्य विभागो ज्ञेयः; ( २ ) बमन के योग ( सम्यक् ) लक्षण - उचित समय पर वेगों का निकलना, अत्यधिक कष्ट न होना, क्रम से कफ, पित्त, वायु का निकलना और स्वयं वेग का बन्द हो जाना यह सम्यक् योग का लक्षण है । दोष के प्रभावों की भिन्नता से तीक्ष्ण, मृदु और मध्य ये तीन सम्यक् योग के भेद हैं । विमर्श - सिद्धि स्थान ( अ. १ ) में इसका लक्षण विशेष रूप से बताया हैं, यथा -- क्रमात् १. ' अप्रवृत्तिः कुतश्चिदिति सर्वस्यैवाप्रवृत्तिः, तथा केवलस्य कृत्स्नस्य शोधनीयदोषस्याप्रवृत्तिः, तथैौषधस्य विभ्रंशः प्रातिलोम्येन गमनं चक्रः । २. ' यथाक्रममिति वमने प्रथमं कफः, तदनु पित्तं, तदनु वायुः ' चक्रः । ' यथास्वम् ' ग. |