चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 381–390
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 381–390
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२८८ चरकसंहिता प्रस्तर स्वेद के द्रव्य - दोष, रोग और मनुष्य के बल के अनुसार ऊपर बताये हुए द्रव्य प्रस्तर स्वेद में भी काम में लाये जाते हैं ॥ २७ ॥
भूगृहेषु च जेन्ताकेपूष्णगर्भगृहेषु च । विधूमाङ्गारतप्तेषु स्वभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥ २८ ॥
स्वेदन के लिये विविध स्थान --- धूम से रहित अंगारों से नपाये हुए भूगृह ( तहखाना ), जेन्ताक में, उष्ण गर्भ गृह में, सम्पूर्ण शरीर में वातघ्न तैल का मर्दन कर सोने से मुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है ॥ २८ ॥
ग्राम्यानूपौदकं मांसं पयो बस्तशिरस्तथा । वरोहमध्यपित्तासृक् स्नेहवत्तिलतण्डुलाः ॥३ ९ ॥ इत्येतानि समुत्क्वाथ्य नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् । देशकालविभागज्ञो युक्त्यपेक्षो भिषक्तमः ॥३० ॥
वारुणामृतकॅरण्डशिग्रुमूलकसर्षपैः । वासावंशकरञ्जार्कपत्रैरश्मन्तकस्य च ॥ ३१ ॥
शोभाञ्जनकसैरेयंमालतीसुरसार्जकैः । पत्रैरुत्काथ्य सलिलं नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
भूतीकपञ्चमूलाभ्यां सुरया दधिमस्तुना । मूत्रैरम्लैश्च सस्नेहैर्नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
नाडीस्वेद के द्रव्य - देश - काल के विभाग को जानने वाला और युक्ति की अपेक्षा रखने वाला उत्तम वैद्य ग्राम्य, आनूप मांस और जलीय जीवों का मांस, दूध, बकरे का शिर, सूअर का मैदा, पित्त, रक्त, तैल वाले एरण्ड आदि तथा निल एवं तण्डुल इन सबों का क्वाथ बनाकर नाडी-स्वेद में इनका प्रयोग करना चाहिए । अथवा वरना, गिलोय, एरण्ड का मूल, सहिजन की छाल, मूली का पंचाङ्ग, सरसों की पत्तो, अडूसा की पत्ती, वांस की पत्ती, करंज की पत्ती, मदार की पत्तों, अश्मन्तक ( पाषाणभेद ) की पत्ती, शोभाञ्जन, लाल सहिजन की पत्ती, कटसरैया की पत्ती, मालती की पत्ती, सफेद तुलसी की पत्ती, काली तुलसी की पत्ती इन सब का वाथ बनाकर नाडीस्वेद में प्रयोग करना चाहिए । भूतीक ( गंध नृण ), दोनों पंचमूल, मदिरा, दही का पानी, गोमूत्र, कांजी इन्हें गरम कर और भूतीकादि का क्वाथ बनाकर स्नेह मिलाकर नाडीस्वेद में प्रयोग करना चाहिए ॥ २ ९ -३३ ॥ विमर्श - नाडीस्वेद में किन द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए, इसका उल्लेख करते हुए अष्टाङ्ग-संग्रह में शोभाञ्जन के स्थान पर अशोक लेने को बताया है जैसे - ' शिग्रवरुणामृतकमूलक सर्षपसु-रमार्ज्जकवासावंशाश्मन्तकाशोक शिरीषार्ककर क्षैरण्डमालनीपत्रभृङ्गभूतीकदशमूलादिवानहरद्रव्ये’त्यादि ( अष्टाङ्ग संग्रहसूत्र, २६ अ ) और यहाँ ' भूतीकपञ्चमूलाभ्याम् ' से भूनीक ( गंधतृण ) और पञ्चमूल से महा पंचमूल का ग्रहण गंगाधर ने किया है क्योंकि महापंचमूल कफ का नाशक होता है । पर अष्टांगहृदय में दशमूल को नाडीस्वेद में प्रयोग करने को बताया है, यथा — ' दशमूलेन च पृथक् सहितैर्वा यथामलम् ' ( सू. अ. १७ ) । तथा चिकित्मा स्थान २८ अध्याय में - ' आनूपौदकमांसानि दशमूलं शतावरीम् । कुलत्थान् वदरान् मापांतिलान् रास्नां यवान् वलाम् ॥ वसादध्यारनालान्लैः सह कुम्भ्यां विपाचयेत् । नाडीस्वेदं प्रयुञ्जीत पिष्टैश्चैवोपनाह-नम् ॥ ' ( चरक ) । इसलिए यहाँ दशमूल का ही ग्रहण करना चाहिए । नाडीम्वेद में प्रयुक्त होने वाले यहाँ तीन वर्गों का उल्लेख है । क्रम से ' ग्राम्यानूप ' से वातव्याधि में, ' वरुणामृत ' से कफविकार में और ' भूतीक ' से वात - कफजन्य विकारों में प्रयोग किया जाता है । यह चक्रपाणि सम्मत है । एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्टके । स्वेदनार्थं घृत क्षीरतैलकोष्ठांश्च कारयेत् ॥ ३४ ॥
१. विधूमाङ्गारतप्तेष्वभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ' इति पा. । २. ‘ वराहमेदःपित्तासृक् ’ यो. । ३. ' स्नेहवद्यावद्वीजमेरण्डवीजादिकं, तत्र प्राधान्यान्निस्तुषीकृत्य ग्रहणार्थं पृथगुक्तं तिलतण्डुला इति ' गङ्गाधरः । ४. ' री ' इति यो. ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २८६ अवगाह स्वेद के द्रव्य क्रम से वात, कफ और वात - कफजन्य रोगों में जिन द्रव्यों से नाडी वेद का प्रयोग किया जाता है, उन्हीं द्रव्यों का क्वाथ बनाकर एक बहुत बड़े पात्र में रख कर उसमें बैठने से या अंगों को डुबो देने से अवगाह स्वेद हो जाता है । इसी प्रकार घृत, दुग्ध औरत को एक बहुत बड़े पात्र में रखकर, उसमें बैठ कर या अंगों को डुबो कर अवगाह स्वेद किया जाता है । यह अवगाह स्वेद करने की विधि बनाई गई है ॥ ३४ ॥
गोधूमशकलैश्वर्णैर्यवानामम्लसंयुतैः । सस्नेहकिण्वलवणैरुपनाहः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
गन्धैः: सुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया । उमया कुष्टतैलाभ्यां युक्तया चोपनाहयेत् ॥
चर्मभिश्रोपनद्धव्यः सलोमभिरपूतिभिः । उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः ॥ ३७ ॥
उपनाह स्वेद के द्रव्य - गेहूं के टुकड़े, जौ का आटा इन दोनों को कांजी और तैल आदि, स्नेह द्रञ्च, सुग - किण्व ( किट्टु ), नमक इन सत्रों को एक में पकाकर पुल्टिस बांध कर नाडीस्वेद करना उत्तम होता है । तगर आदि सुगन्ध द्रव्य, मदिरा, सुराकिट्ट, जीवन्ती, सौंफ, तीसी, कूठ, नेल इन सब को एक में पकाकर गरम कर पुल्टिस बाँधना चाहिए । ऊपर बताये हुए द्रव्यों की पुल्टिस रखकर लोनयुक्त दुर्गन्ध रहित अर्थात् जो सड़ा - गला न हो ऐसे उष्णवीर्य वाले चमड़े से बाँध देना चाहिए । यदि इस प्रकार के उष्ण वीर्य वाले चमड़े न मिल सकें तो रेशम या ऊन के
कपड़े से बाँध देना चाहिए । इस प्रकार बाँधने को उपनाह स्वेद कहते है ॥ ३५-३७ ॥
विमर्श - गन्धद्रव्य ये बताये गये हैं- ' कुपुञ्च नालिका पूर्तिकोशीरं श्वेतचन्दनम् । जटामांसी तेजपत्रं नखी मृगमदः फलम् ॥ कक्कोलं कुङ्कुमञ्चोचं लता कस्तूरिका वचा । सूक्ष्मैलागुरुमुस्तञ्च कर्चूरं ग्रन्थिपर्णकम् ॥ श्रीवासः कुन्दुरुर्देवकुसुमङ्गन्धमातृका । सिहको मिषिका मेथी भद्रमुस्तं तथा शटी ॥ जातीकोषः शैलजञ्च देवदारु सुजीवकम् । एतानि गन्धद्रव्याणि ' ( ब्रह्मपुराण ) | गंध द्रव्य जितना मिल सके उतना लेना चाहिए । यहाँ चर्म के अभाव में रेशम या ऊन बाँधने को लिखा है, पर अष्टांगहृदय में ' अभावे वातजित्पत्रकौशेयाविकशाटकैः । से वातनाशक एरण्ड आदि के पत्तों से भी बाँधना लिखा है । चरक ( चिकित्सा स्थान - के २८ वें अध्याय ) में ' एरण्डपत्रैर्बध्नीयात् ' से एरण्ड की पत्ती से बाँधने का उपदेश चरक ने भी किया है । रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् । विदाहपरिहारार्थं स्यात् प्रकर्षस्तु शीतले ॥ उपनाह स्वंद - विधि - रात्रि में बँधा हो तो दिन में खोल देना चाहिए और यदि दिन में बँधा हो तो रात्रि में खोल देना चाहिए, ऐसा करने से रक्त में दाह उत्पन्न नहीं होता है । यदि इन नियमों का पालन नहीं किया जायगा तो रक्त में दाह उत्पन्न हो जाता है । यदि शीत काल हो तो दोष के अनुसार इससे अधिक समय तक भी बाँधा जा सकता है ॥ ३८ ॥
विमर्श - बाँधने का नियम आगे चिकित्सा के २८ वें अध्याय में भी बताया गया है, यथा-' एरण्डपत्रैर्वनयाद्रात्रौ कल्यं विमोक्षयेत् । क्षीराम्बुना ततः सिक्तं पुनश्चैवोपनाहितम् ॥ मुञ्चेद्रात्रौ दिवा बद्धं चर्मभिश्च सलोनभिः । ( चरक ) । यह बंधन देश, काल, औषधि की शक्ति, रोग का बल देखकर अधिक समय या कम समय में भी खोला जा सकता है पर बंधन खोलने का सामान्य नियम उपर्युक्त ही है । १६ च ० सं ०
सङ्करः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम् ।
जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षुः कुटी भूः कुम्भिकैव च ॥ ३ ९ ॥
कूपो होला इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ।
तान् यथावत् प्रवच्यामि सर्वानेवानुपूर्वशः ॥ ४० ॥
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२६० चरकसंहिता ( २ ) तेरह अग्नि - स्वेदन विधि ( Thirteen Method of Thermal Sudation ) अग्नि - स्वेद के १३ भेद - ( १ ) संकरस्वेद, ( २ ) प्रस्तरस्वेद, ( ३ ) नाडीस्वेद, ( ४ ) परिषेकस्वेद, ( ५ ) अवगाहनस्वेद, ( ६ ) जेन्ताकस्वेद, ( ७ ) अइमघनस्वेद, ( ८ ) कर्पूस्वेद, ( ९ ) कुटीस्वेद, ( १० ) भूस्वेद, ( ११ ) कुम्भीस्वेद, ( १२ ) कूपस्वेद, ( १३ ) होलाकस्वेद | इस प्रकार ये तेरह स्वेद हैं । इनमें से प्रत्येक का यथाक्रम वर्णन किया जायगा ॥ ३ ९ -४० ॥ विमर्श - यहाँ अग्नि द्वारा होने वाले १३ स्वेदों का वर्णन किया गया है । सुश्रुत के उपर्युक्त तीन प्रकार के स्वेद में ही इनका अन्तर्भाव हो जाता है । ( १ ) तापस्वेद में ( सकर और प्रस्तर-दो स्वेदों का, ( २ ) ऊष्मस्वेद में नाडी, जेन्ताक, अश्मघन, कर्षु, कुटी, भू, कुम्भी, कूप, होलाक इन नौ स्वेदों का, ( ३ ) द्रवस्वेद में परिषेक और अवगाहस्वेद दो स्वेदों का अन्तर्भाव किया जाता हैं । ( ४ ) उपनाहस्वेद का वर्णन आचार्य ने किया है पर उसमें अग्नि का संयोग नहीं किया है | केवल उपनाह बाँधने के बाद उष्ण वीर्य वाले चर्म या रेशम आदि को बाँधना बताया है । इस प्रकार तीन स्वेदों में तेरह स्वेदों का अन्तर्भाव हो जाता है, और चौथा स्वतन्त्र अनग्निस्वेद हैं, ऐसा आचार्य ने माना है । 6 तत्र वस्त्रान्तरितैरवखान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तेरुपस्वेदनं संकरस्वेद इति विद्यात् ॥ ४१ ॥
( १ ) संकरस्वेद की विधि [ Mixed Fomentation ] - वात, कफ और वात - कफजन्य विकारों में क्रमशः पिण्डस्वेद के तीन वर्ग बनाये गये हैं । उन द्रश्यों को विधिपूर्वक निर्माण कर उन्हें वस्त्र में रख कर या विना वस्त्र में रखे जो शरीर में नाप पहुँचा कर स्वेदन किया जाता है उसे ' संकरस्वेद ' कहते हैं ॥ ४१ ॥
विमर्श - पीछे पिण्डस्वेद की विधि बताई गई हैं पर जहाँ अग्निस्वेद के तेरह भेद बनाये हैं उनमें ' पिण्डस्वेद ' के नाम से नहीं बनाया है । तेरह भेदों में पहला ' संकरस्वेद ' है । संकर का अर्थ संमिश्रण होता है । पिण्डस्वेद अनेक द्रव्यों के संमिश्रण से बनाया जाता है, अतः संकरस्वेद को ही पिण्डस्वेद कहा जाता है । इसके द्वारा शरीर में साक्षात् ताप पहुँचाया जाता है इसलिये इसे तापस्वेद भी कह सकते हैं । तापस्वेद का लक्षण करते हुए वाग्भट ने बताया है । यथा - ' तापोऽग्नितप्तवसनफालहस्ततलादिभिः । ' ( अ हृ. सू. अ. १७ ) । पिण्डस्वेद में पिण्डाकार पाषाण या बालू, धूली, धान की भूसी या लोहे के चूर को अग्नितप्त कर उसे कपड़े में रख पोटली बनाकर सेक करने पर ताप शरीर में साक्षात् प्रवेश करता है अतः इसका तापस्वेद में अन्तर्भाव किया जाता है । इसकी विधि यह है कि पत्थर या लोहे के पिण्ड को अग्नि के समान लाल वर्ण करके जल में या किसी अम्लवर्ग में बुझाकर वस्त्र में बाँध कर स्वेदन किया जाता है । इसे बिना वस्त्र का स्वेदन कहा जाता है | गाय आदि का गीला गोवर लेकर या धान की भूसी, बालू आदि को कांजी में उबाल कर कपड़े में पोटली बनाकर या गर्म - गर्म तिल, उड़द, भात, खीर, खिचड़ी, मांस को कपड़े में बाँध कर वात रोग में स्वेदन किया जाना है । इसका कुछ लोग ऊष्मस्वेद में अन्तर्भाव करते हैं । शुकशमीधान्यपुलाकानां वेशवारपायस कृशरोत्कारिकादीनां वा प्रस्तरे कौशेय विकोत्त-
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २६१ रप्रच्छदे पञ्चाङ्गुलोरुवूकार्कपत्रप्रच्छदे वा स्वभ्यक्तसर्वगात्रस्य शयानस्योपस्वेदनं प्रस्तर-स्वेद इति विद्यात् ॥ ४२ ॥
( २ ) प्रस्तरस्वेद की विधि [ Hot Bed Sudation ] - प्रस्तर, शूकधान्य ( जौ, गेहूँ ), शमीधान्य ( उड़द, मूंग, चना आदि ) पुलाक ( क्षुद्रधान्य ), इनको उबाल कर अथवा गर्म - गर्म वेशवार, खीर, खिचड़ी, हलुआ आदि को एक लम्बे पत्थर या अन्य किसी फलक पर उतने दूर तक फैलाया जाता है, जितने दूर तक स्वेदन करने वाले पुरुष के सोने योग्य लम्बा हो सके, उतने दूर तक फैला कर, उसके ऊपर रेशम या ऊन का चदरा अथवा सफेद रेंड़ की पत्ती या लाल रेड़ की पत्ती या मदार की पत्ती फैला कर, उसके ऊपर स्वेदन करने योग्य पुरुष अपने शरीर में वातनाशक तैल मर्दन कर सो जाय और ऊपर से रेशम या ऊन या इन्हीं एरण्ड आदि पत्तों को ओड़ ले तो सोये हुए व्यक्ति का स्वेदन हो जाता है । इसे ' प्रस्तरस्वेद ' कहा जाता है ॥ ४२ ॥
विमर्श - - यद्यपि सुश्रुत में इसे प्रस्तरस्वेद नहीं माना है फिर भी इसका अपने यहाँ वर्णन किया है, यथा- ' कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य किलिञ्जेऽन्यस्मिन् वा तत्प्रतिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेदयेत् । एवं पांशुगोशकृत्त बबुसपलालोष्मभिः स्वेदयेत् । ' ( सु. चि. अ. ३२ ) । इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रस्तरस्वेद को वह ऊष्मस्वेद में अन्तर्भूत करते हैं । स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूलफलपत्रशुङ्गादीनां मृगशकुनपिशितशिरस्पदादीनामुष्णस्वभा-वानां वा यथार्ह मम्ललवणस्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षीरादीनां वा कुम्भ्यां बाष्पमनुद्वमन्त्या-मुत्कथितानां नाड्या शरेषीकावंशदलकरञ्जार्कपत्रान्यतमकृतया गजाग्रहस्त संस्थानया व्यामदीर्घया व्यामार्धदीर्घया वा व्यामचतुर्भागाष्टभागमूलाग्र परिणाहस्रोतसा सर्वतो वात-हरपत्रसंवृतच्छिद्रया द्विस्त्रिर्वा विनामितया वातहर सिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रो बाष्पमुपहरेत्; वाष्पो नृजुगामी विहतचण्ड वेगस्त्वचमविदहन् सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः ॥ ४३ ॥
( ३ ) नाडीस्वेदन की विधि [ Steam Kettle Sudation ] -- एक ऐसा बड़ा पात्र लिया जाय जिसमें स्वेदन करने योग्य द्रव्यों का मूल, फल, पत्र और शुङ्ग ( टूशा - अंकुर ) तथा मृग और पक्षियों का मांस, सिर, पैर आदि उष्ण स्वभाव वाले मांसों को रोगानुसार कांजी, नमक, तैल मिला कर मूत्र और दूध आदि द्रव पदार्थों को मिलाकर इस प्रकार क्वाथ किया जाय जिसमें उस बड़े पात्र से भाप बाहर निकल कर न जाय । पहले ही पात्र में एक छिद्र बना दिया जाता है । और उसी छिद्र में सरकंडे के खोखले सींक या बांस की नली, करंज की पत्ती, मदार की पत्ती इनमें से किसी एक से बनाई हुई नली जिसकी आकृति हाथी के सूंड़ की तरह चढ़ाव उतार वाली हो, उस नली को पात्र के छिद्र में लगाकर उसका मुख बन्द कर देते है । नली का जो मोटा भाग होता है वह छिद्र में लगाया जाता है और जो पतला भाग होता है वह स्वेदन करने योग्य स्थान के पास रखा जाता है । इस नली की लम्बाई साढ़े तीन हाथ होती है और चौड़ाई आधा व्याम की होती है । नली का मूल भाग जो पात्र से मिलाया जाता है उसका चौतरफा भाग व्याम के चौथाई भाग के बराबर होना चाहिये । अन्तिम भाग व्याम के आठवें भाग के समान मोटा होना चाहिये । मूल से लेकर अग्र भाग तक और उसकी मोटाई में यदि कोई छिद्र हो तो वातनाश करने वाले एरण्ड आदि के पत्ते से उसे बाँध देना चाहिये । यह नली दो - तीन जगह टेढ़ी होनी चाहिये । जब इस पात्र से निकले हुए बाष्प को वातरोगपीडित मनुष्य १. ' स्योपरि ' इति पा ० । ३. ' व्यामाध्यर्धदीर्घया ' ग. । २. ' शुङ्गवल्कादीनां ' ग. । ४. ' ह्यनूर्ध्वगामी ' इति पा.
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२६२ चरकसंहिता वातनाशक तेलों से मर्दन करा कर स्वेदन करें तब पात्र का मुख बन्द हो जाने से बाष्प ऊपर को गति नहीं कर पाती है । फलतः उसकी गति बीच में रुक जाती है, तब वह भयंकर वेग से त्वचा को नष्ट - भ्रष्ट न करते हुए शरीर का सुखपूर्वक स्वेदन कर देती है । इसे नाडीस्वेद कहना चाहिये || ४३ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि पहले से ही एक ऐसा बड़ा पात्र बनावे जिसके बगल में एक छिद्र कर के उस में मूँज की नली या बांस की नली लगावे जो हाथी के सूंड के आकार की ऊपर मोटी और नीचे पतली हो और जिसके ऊपर की मोटाई लगभग १५ इंच की हो । अग्रभाग की गोलाई सात इंच होनी चाहिये । और नली को तीन जगह से मुड़ी हुई होना चाहिये । इसमें जहाँ जहाँ छिद्र हो वहाँ वहाँ वातनाशक, रेड, महार, मेवड़ी आदि की पत्ती लगाकर बाँध देना चाहिये । इस प्रकार की नली अलग तैयार कर ले | पहले स्वेदन करने वाले द्रव्यों को जल, कांजी आदि के साथ पात्र में रखकर आग पर चढ़ावे । उस समय उस छिद्र में इस नली को लगाकर उसका मुख इस प्रकार बन्द करे जिसमें भाप बाहर न निकल सके । जल भरते समय यह भी ध्यान रखे कि छिद्र तक जल न पहुंचे । जब भाप निकलने लगे तो जिस व्यक्ति का स्वेदन करना है वह व्यक्ति पहले अपने शरीर में अथवा जहाँ स्वेदन करना है । उस प्रदेश में वातनाशक तैल का मर्दन कर निर्वात गृह में बैठकर एक पतला कपड़ा ओढ़कर जिस प्रदेश में स्वेदन करना है उस प्रदेश को कपड़े से ढक कर धीरे धीरे भाप को अपने शरीर में लगावे | इससे स्वेदन कार्य भली भाँति हो जाता है । नली को लम्बी करने का तात्पर्य यह है कि दूर तक भाप चलकर कुछ शीतल हो जाती है । नली को दो - तीन स्थान पर टेढ़ी करने का तात्पर्य यह है कि नीचे से भाप उठकर जब ऊपर चलती है तो पात्र का मुख बन्द रहने से ऊपर जा नहीं पाती और तब प्रबल वेग से नली के द्वारा बाहर चलती है । यदि नली टेढ़ी न रखी जाय तो वह कितनी भी लम्बी हो, भाप वेग से निकल कर स्वेद करने वाले स्थान पर दाह कर देती है । जब नली टेढ़ी रहती है तो भाप सीधे आकर मुड़े हुये स्थान पर टूट जाती है, फिर वहाँ से आगे वेग से चलती है और फिर मुड़े हुये स्थान पर उसका वेग कम हो जाता है । इस प्रकार दो - तीन बार जब भाप का वेग टूट जाता है तो वह शीतल भी हो जाती है और उसमें वेग भी नहीं रहता जिससे सुगमतापूर्वक स्वेदन कर्म हो जाता है । इसका वर्णन सुश्रुत में भी किया गया है, यथा - ' पार्श्वच्छिद्रेण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्या मुखमभिसन्धाय तस्मिन्द्वेि हस्तिशुण्डा-कारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत् । ' ' सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम् । हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम् ॥ सुखा सर्वाङ्गगा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम् । व्यामार्धमात्रा त्रिर्वक्रा हस्ति-हस्तसमाकृतिः ॥ स्वेदनार्थे हिता नाडी कैलिसी हस्तिशुण्डिका । ' ( सु. चि. अ. ३२ ) । * वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्काथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्वर्पणिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रं वखावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः ॥ ४४ ॥
( ४ ) परिषेक स्वेद की विधि [ Affusion Sudatuin ] -- जो वातप्रधान हों अथवा संसर्ग और सन्निपात दोषों में बात की प्रधानता वाले हों, उन्हें नाडीस्वेद में बताये हुये द्रव्यों के मूल, पत्र आदि का गर्म - गर्म क्वाथ बनाकर छोटे - बड़े या सहस्रधारा वाले ( जिस बड़े में चलनी की भाँति हजारों छिद्र किये गये हों ) घट में या बड़ी नली में भर कर रोगानुसार द्रव्यों से सिद्ध नैल को शरीर में मर्दन कर और एक हलके कपड़े से शरीर को ढंक कर विधिपूर्वक इस क्वाथ से
शरीर का स्वेदन करना चाहिये । इसे परिषेकस्वेद कहा जाता है ॥। ४४ ॥
विमर्श - वात, कफ और वातकफजन्य रोगों में सामान्यतः स्वेद का विधान है । पित्तप्रधान १. ' उत्तरवातिकानि उत्तरवाते प्रधानवाते वातश्लेष्मणि हितानि तु ग्राह्याणि ' चक्रः ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २६३ रोगों में स्वेद नहीं किया जाता है । किन्तु कफ और वात की प्रधानता रहते हुये यदि पित्त का संसर्ग रहता है तो ऐसी दशा में स्वेद किया जाता है, उसके लिये द्रवस्वेद का विधान किया गया है । * वातह रोकाय क्षीर तैलघृतपिशितरे सोष्णसलिलकोष्टकावगाहस्तु यथोक्त एवावगाहः ॥ ( ५ ) अवगाहस्वे की विधि [ Bath Sudation ] - वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ, दूध, तैल, घृत, मांसरस या गर्म जल के कोष्ठ में प्रवेश कराके स्वेदन करने को अवगाहस्वेद कहते हैं || ४५ || विमर्श - अवगाहन का तात्पर्य होता है उसमें प्रवेश करना या डूब जाना । इसका आधुनिक रूप टबबाथ हैं । इससे सर्वांगस्वेद या एकांगस्वेद भी होता है । एकांगस्वेद जैसे - हाथ का स्वेद करना होता है तो किसी एक पात्र में गर्म दूध, घी, तैल आदि में हाथ को डुबा दिया जाता है । अवगाहस्वेद की विधि सुश्रुत में भी बनाई है, यथा - ' द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यक्वाथपूर्णे कोष्ठे कटाहे, द्रोण्यां वाऽवगाह्य स्वेदयेत् । एवं पयोमांसरसयूष तैलधान्याम्लघृतव सामूत्रेष्ववगाहेत । ' ( सु.चि. अ. ३२ ) । भेलसंहिता में अवगाहस्वेद के लिये एक नौका बनाने का उपदेश दिया है और उन्होंने लिखा है कि अवगाहस्वेद के लिये एक पुरुष के बैठने पर उसके चूतड़ के निचले भाग से लेकर कण्ठ तक जितनी ऊँचाई होती है उतनी गहरी एक नौका बनावे | उस नौका की लम्बाई - चौड़ाई भी उतनी ही होनी चाहिये । उस नाव में कहीं भी छिद्र न हो । इस नौका को वातनाशक विशद गर्म क्वाथ, दूध आदि से भर कर वातनाशक तैल से मर्दन किया हुआ वातरोगी तब तक उसमें बैठे जब तक पसीना न आने लगे । स्वेदन के लिये नौका में दोषानुसार औषधों के काथ, केवल गर्म जल या वनौषधियों के पत्रों से युक्त गर्म जल डाल कर स्वेदन कराया जा सकता है अथवा बड़ी कड़ाही में आधे भाग तक गर्म जल भर कर उसमें रोगी को बैठाने से भी उसका स्वेदन कर्म हो जाता है । भावप्रकाश में बताया है कि नौका में इस प्रकार मनुष्य को बैठाना चाहिये कि उसका नाभि के ६ अंगुल ऊपर तक काभाग जल, क्वाथ आदि में डूबा रहे । यदि अधिक जल होगा तो वह पात्र से बाहर निकल जायगा । वे परिषेक और अवगाह दोनों का प्रयोग साथ ही करते हैं । उनका कहना यह है कि स्वेदन करने योग्य रोगी को टब में बैठा कर कन्धों के ऊपर गर्म जल या गर्म काथ की धारा गिरावे । इससे धारा पीठ और छाती के ऊपर पड़ती हुई नीचे चली जाती है और कोष्ठ में उचित मात्रा में क्वाथ जमा हो जाता है तथा अधिक भाग बाहर निकल जाता है । जब कोष्ठ भर जाय तो धारा गिराना बन्द कर दिया जाता है । इस प्रकार अवगाहन स्वेद का वर्णन किया गया ॥ अवगाहनस्वेद की कुल मात्रा चार मुहूर्त्त मानी गई है अथवा जब तक आरोग्य की स्थिति न आ जाय तब तक अवगाहन कराते रहना चाहिये । * अथ जेन्ताकं चिकीर्षुर्भूमिं परीक्षेत - तत्र पूर्वस्यां दिश्युत्तरस्यां वा गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमधुरमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परीवापपुष्करिण्यादीनां जलाशयानामन्यत-मस्य कूले दक्षिणे पश्चिमे वा सूपतीर्थे समसुविभक्तभूमिभागे, सप्ताष्टौ वाऽरत्नीरुपक्रम्योद-कात् प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वाऽभिमुखतीर्थं कूटागोरं कारयेत्, उत्सेधविस्तारतः परमरत्रीः पोडश, समन्तात्सुवृत्तं मृत्कर्मसंपन्नमनेकवातायनम् अस्य कूटागारस्यान्तः समन्ततो भित्तिमरत्निविस्तारोत्सेधां पिण्डिकां कारयेदाकपाटात्, मध्ये चास्य कूटागारस्य चतुष्क-कुमात्रं पुरुषप्रमाणं मृन्मयं कन्दु संस्थानं बहुसूक्ष्मच्छिद्रमङ्गौरकोष्टकस्तम्भं सपिधानं कार-१. परीवापो दीर्घिका । ३. किष्कुर्हस्तः । २. कूटागारं वर्तुलागारम् । ४. ' यया चुल्हिकया तण्डुलादीनि लोके भृज्जति तद्भर्जनचुल्हिका कन्दुनाम्नोच्यते ' गङ्गाधरः । ‘ कुन्दसंस्थानं ' च.; ‘ कुन्दः कुम्भकाराग्निसंस्थानम् ' चक्रः । ५. ' अङ्गारार्थ कोष्ठोऽवकाशो विद्यतेऽस्मिन् सोऽङ्गारकोष्ठकः, स एव स्तम्भः ' चक्रः ।
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२६४ चरकसंहिता येत्, तं च खादिराणामाश्वकर्णादीनां वा काष्ठानां पूरयित्वा प्रदीपयेत् स यदा जानीयात् साधुदग्धानि काष्टानि विगतधूमान्यवतप्तं च केवलमग्निना तदग्निगृहं स्वेदयोग्येन चोष्मणा युक्तमिति, तत्रैनं पुरुषं वातहराभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं प्रवेशयेत्, प्रवेशयश्चैनमनुशिष्यात्-सौम्य! प्रविश कल्याणायारोग्याय चेति प्रविश्य चैनां पिण्डिकामधिरुह्य पार्श्वापरपार्श्वाभ्यां यथासुखं शयीथाः, न च त्वया स्वेदमूर्च्छापरीतेनापि सता पिण्डिकैषा विमोक्तव्याऽऽ-प्राणोच्छ्वासात्, भ्रश्यमानो ह्यतः पिण्डिकाव काशाद्वारमनधिगच्छन् स्वेदमूच्र्छापरीततया सद्यः प्राणान् जह्याः, तस्मात् पिण्डिकामेनां न कथंचन मुञ्चेथाः, स्वं यदा जानीयाः--विगताभिष्यन्दमात्मानं सम्यक्प्रस्रुतस्वेदपिच्छं ' सर्वस्रोत विमुक्तं लघुभूतमपगतविबन्ध-स्तम्भ सुप्तिवेदना गौरवमिति, ततस्तां पिण्डिकामनुसरन् द्वारं प्रपद्येथाः, निष्क्रम्य च न सहसा चक्षुषोः परिपालनार्थं शीतोदकमुपस्पृशेथाः, अपर्यंत संतापक्लमस्तु मुहूर्तात् सुखोष्णेन वारिणा यथान्यायं परिषिक्तोऽश्नीयाः; इति जेन्ताकस्वेदः ॥ ४६ ॥
( ६ ) जेन्ताकस्वेद की विधि [ Sudatorium Sudation ] - जेन्ताक - विधि से स्वेद कराने के इच्छुक व्यक्ति को सर्वप्रथम भूमि की परीक्षा करनी चाहिए । जो भूमि इस स्वेद कर्म के लिए उपयुक्त हो वह वासस्थान से पूर्वदिशा या उत्तरदिशा में रहनी चाहिए । भूमि गुणयुक्त ( उपजाऊ ) और प्रशस्त ( देखने में सुन्दर ), पृथिवी के एक भाग में, काली या पीली मिट्टी वाली हो । वह भूमिभाग किसी परीवाप ( लम्बे ताल ), पुष्करिणी ( कमल के फूलों से सुशोभित तालाब ) आदि किसी भी एक अच्छे जलाशय के दक्षिण या पश्चिम तट पर हो जिधर तालाब में सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हों तथा जहाँ का भूमिभाग समतल हो । ऐसे स्थान में, जलाशय से ७ या ८ अरत्नि ( ‘ बद्धमुष्टिररत्तिः, हाथ ) हट कर पूर्वमुख वाला या उत्तर मुख वाला कूटागार ( गोलाकार ) गृह बनवायें । पर इस कूटागार का मुख्य द्वार जलाशय की सीढ़ियों की ओर ही रखा जाय । इस कूटागार की ऊँचाई और चौड़ाई अधिक से अधिक १६ अरलि ( हाथ ) होनी चाहिये । चारों तरफ से यह घर गोलाकार होना चाहिए । इस गृह की दीवाल अच्छी प्रकार मिट्टी लगा कर लीपी - पोती गई हो । इस गृह में अनेक वातायन ( झरोखे ) होने चाहिए जिससे वायु का प्रवेश और निर्गम होता रहे । इस गृह के भीतर चारों तरफ दीवारों से सटा हुआ एक अरलि की ऊँचाई और चौड़ाई में चौतरा बनवावें, जो एक तरफ के फाटक के पास से प्रारम्भ होकर दूसरे तरफ के फाटक की दीवार तक समाप्त होता हो । इस प्रकार बने हुए कूटागार के मध्य भाग में एक ४ हाथ लम्बा, पुरुष की ऊंचाई के बराबर मिट्टी का गोलाकार अनेकों छिद्रों वाला अङ्गारकोष्ठक ( आग के अङ्गारों का कोठिला ) बनवावें, जिसमें ऊपर से ढक्कन लगा हो । उस कोठिले में खदिर या अश्वकर्ण ( साखू ) आदि वातन्न लकड़ियों को डाल कर आग लगा दें । जब यह समझ ले कि लकड़ी ठीक रूप से जल गयी है, धूम बिलकुल नहीं है, केवल अग्नि के अङ्गारे से वह अङ्गारकोष्ठक और कूटागार तप्त हो गया है, तत्र स्वेद करने योग्य ऊष्मा से युक्त उस अग्निगृह को समझ कर उस गृह में स्वेद करने योग्य व्यक्ति के शरीर वातनाशक तैल का मर्दन कराकर एक हलका कपड़ा ओढाकर प्रवेश करावें । जब स्वेद के योग्य पुरुष उस अग्निगृह में प्रवेश करने लगे तो उसे शिक्षा देकर समझा कि हे सौम्य! अपने कल्याण और आरोग्य लाभ के लिए इस कूटागार में प्रवेश करो, और इस १. ‘ स यदा ' च. ' स इत्यत्र त्वमित्यध्याहार्यम् ' चक्रः । ' त्वं यदा जानीयाश्च ' ग. । २. ' अथ व्यपगत ' ग. ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २६५ कूटागार में प्रवेश कर किनारे पर जो चौतरा बनाया गया है उस पर आरोहण करके एक बगल से, पुनः दूसरे बगल से ( करवट बदल कर दोनों करवटों से ) सुखपूर्वक शयन करो । यदि उस चौतरे पर शयन करने पर तुम पसीना से अधिक पीड़ित हो जाओ या मूर्च्छा ( मोह ) से युक्त हो जाओ तब भी जब तक तुम्हारे शरीर में श्वास - प्रश्वास रहे तब तक इस चौतरे को कभी न छोड़ना, क्योंकि इस चौतरे से गिर जाने पर पसीना और मूर्च्छा से युक्त होने के कारण मुख्य द्वार को नहीं पा सकोगे अतः शीघ्र ही मर जाओगे । इसलिए इस चौतरे को कभी भी न छोड़ना । जब तुम अपने को अभिष्यन्द ( कफदोष ) से रहित समझ लो, जब तुम्हारे शरीर से पसीने का चिपचिपा भाग ठीक तरह से निकल जाय, सारे शरीर के स्रोत खुल जाँय, जिससे अपने शरीर को हलका समझ लो, दोषों का निबन्ध, शरीर की जकड़ाहट, शून्यता, वेदना और शरीर की गुरुता नष्ट हो गई है - यह समझ लो तो उसी चौतरे के सहारे शयन किए किए धीरे - धीरे मुख्य द्वार पर चले आना और उस कूटागार से बाहर निकल आना । निकल कर सहसा नेत्रों की रक्षा करने के लिए शोतल जल से स्नान मत करना । जब यह समझ लो कि मेरे शरीर से संताप और श्रम दूर हो गया है तब एक मुहूर्त के बाद कुछ गरम जल से विधिपूर्वक परिषेक ( लान ) करना और उसके बाद भोजन करना । इस प्रकार जेन्ताकस्वेद की विधि बनाई गई है ॥ ४६ ॥
विमर्श - जेन्ताक एक स्वेद करने का विशेष प्रकार का घर होता है जिसके मध्य में एक मिट्टी का गोलाकार को बनाते हैं । उसमें अनेक छिद्र रखे जाते हैं और वातनाशक लकड़ियों को रखकर उसे फूँक दिया जाता है । जब धून समाप्त हो जाता है तो वातनाशक तैलों का मर्दन किया हुआ पुरुष कपड़ा जोड़कर उस घर में प्रवेश कर जाता है और उस घर की दीवाल के पास के चबूतरे पर बैठ जाता है । चबूतरे घर में चारों तरफ बनाये जाते है । केवल मुख्य द्वार में चबूतरा नहीं होता है । उसी चबूतरे पर मनुष्य लेट जाता है । लेटते हुए और करवट बदलते हुए फाटक के एक सिरे के चबूतरे से लेकर दूसरे सिरे के चबूतरे तक जावे और पूर्ण स्वेदन होने पर फिर जिस क्रम से गया हुआ है उसी क्रम से बाहर निकल आवे । इस प्रकार स्वेद करने के बाद सहसा शीतल जल में स्नान न करे क्योंकि इससे नेत्र में दुर्बलता आ जाती है । घर की ऊंचाई और लम्बाई कितनी होनी चाहिए इस विषय में ' अलिविस्तारो सेवाम् ' से १६ अरलि ऊँचाई और १६ अरत्नि चौड़ाई का एक स्वेदनगृह बनाना चाहिए - ऐसा बताया है । मुट्ठी बाँध कर जितनी लम्बाई हाथ की होती है उतने को ' रत्नि ' कहा जाता है और हाथ को फैलाने पर कनिष्ठिका अंगुली तक जितनी लम्बाई होती है उसे ' अति ' कहते हैं यथा ' मध्याङ्गुलीकूर्परयोर्मध्ये प्रामाणिकः करः । बद्धनुष्टिकरो रत्निररत्नः सकनिष्ठिकः ॥ ' ( हलायुध कोष ) । गृह के भीतर एक चतुष्कष्कु-मात्र पुरुषप्रमाग को क बनाया जाता है । किष्कु शब्द से हाथ लिया जाता है, यथा ' अङ्गुलं तु भवेन्मात्रं विनस्निर्द्वादशाङ्गुलः । तद्द्वयं हस्त उद्दिष्टः स च किष्कुरिति स्मृतः ॥ ' ( वास्तुविद्या ) । अतः वर के भीतर जो अरत्निनात्र ऊँचा दीवाल के किनारे - किनारे एक चबूतरा बनाया जाता है और उसमें स्नेहन के लिए जो पुरुषप्रमाण एक कोठिले के समान कोष्ठक बनाया जाता है उसने चार हाथ का अन्तर चाहिए । ऐसा करने से स्वेदन क्रिया सुगमता से हो जाती है । ज्यादे समीप होने से अग्नि की आंच की प्रबलता से जल जाने का भय हो सकता है । शयानस्य प्रमाणेन घनामश्ममयीं शिलाम् । तापयित्वा मारुतनैर्दारुभिः संप्रदीपितैः ॥४७ ॥
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२६६ चरकसंहिता व्यपोह्य सर्वानङ्गारान् प्रोच्य चैवोष्णवारिणा । तां शिलामथ कुत्रींत कौशेयाविकसंस्तराम् ॥ तस्यां स्वभ्यक्तसर्वाङ्गःस्वपैन् स्विद्यति ना सुखम् । कौरवाजिन कौशेयप्रावाराद्यैः सुसंवृतः ॥ इत्युक्तो ऽश्मघनस्वेदः-( ७ ) अश्मघनस्वेद की विधि [ Stone Bed - Sudation ] - शयन करने पर मनुष्य की जितनी लम्बाई - चौड़ाई होती हो उतनी ही लम्बी और चौड़ी एक मोटी, दृढ़, समतल, पत्थर की पटिया लेकर उसके ऊपर वातनाशक खदिर आदि की लकड़ी जलाकर गर्म करें । जब वह पत्थर की पटिया अच्छी प्रकार गरम हो जाय तो सभी अंगारों को अलग कर दें और पत्थर के पढिये के ऊपर गरम पानी डाल कर पोछ दें और उसके ऊपर रेशम या ऊन का चदरा विद्या दें । जिस पुरुष को स्वेद करना हो वह अपने शरीर में वातनाशक तेल का नर्दन करे, उस पटिया के ऊपर शयन करे और ऊपर से सूती वस्त्र, काले मृग का चर्म, रेशम का वस्त्र या
कम्बल ओढ़ ले तो सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है । इसका नाम अश्मघन स्वेद है ॥ ४७-४९ ॥
विमर्श - इस स्वेद का वर्णन सुश्रुत चिकित्सा स्थान में भी किया गया है, यथा - ' पुरुषा-याममात्रां च भूनिमुत्कीर्यं खादिरैः । काष्ठैर्दग्ध्वा तथाभ्युश्य क्षीरधान्याम्कवारिभिः । पत्रभङ्गेरवच्छाद्य शयानं स्वेदयेत् ततः । पूर्ववत् स्वेदयेद्दग्ध्वा भस्मापोद्यापि वा शिलाम् ॥ ' ( सुश्रुत - चि. ३२ ) । इस स्वेद का लक्ष्य सर्वांङ्ग में एक साथ स्वेदन करने का है । किसी भी प्रकार एक बड़े पत्थर की चट्टान को गर्म कर उस पर कपड़ा बिछा या वातनाशक एरण्ड, मेउड़ी आदि को पत्तों को विद्याकर शयन किया जाता है और ऊपर से एक कपड़ा ओढ़ लिया जाता है, जिससे पत्थर से निकली हुई भाष बाहर न जा सके । गर्म पानी से या गरम कांजी से धोने का तात्पर्य यह है कि उससे भाप
सुगमता से निकले । यदि ठण्डे पानी से भिगोया जाय तो पत्थर टूट जाने का भय रहता है ।
—कर्षस्वेदः प्रवच्यते । खानयेच्छ्यनस्याधः कर्तुं स्थानविभागवित् ॥५० ॥
धूमैरङ्गारै ri कर्पूरयेत्ततः । तस्यामुपरि शय्यायां स्वपन् स्विद्यति ना सुखम् ॥५१ ॥
( ८ ) कस्वे की विधि [ Treach Sudation ] - • कर्षूस्वेद कहा जा रहा है । स्वेदयोग्य स्थान के विभाग को जानने वाला चिकित्सक खाट के नीचे गड्ढा खोदवावे, उसके बाद उस गड्ढे में धृनरहित दहकते हुए अङ्गारों को भर दे, इस खार के ऊपर सोया हुआ व्यक्ति सुखपूर्वक स्वेद-सम्पन्न हो जाता है ॥ ५०-५१ ॥ विमर्श - कर्षू का अर्थ हण्डी के आकार का गढ़ा होता है । यह गढ़ा ऐसा बनाया जाता है कि नीचे अधिक चौड़ा रहे और ऊपर की तरफ कन चौड़ा हो । वह इतना बड़ा हो कि उसके ऊपर खाट विद्यायी जा सके, जिससे अग्नि की गर्मी पूरी खाट पर लग सके । फिर उन पर विस्तर बिछाकर या वातनाशक एरण्ड आदि की पत्तो विद्याकर शयन करने से स्वेदन हो जाता है । अत्युत्सेधविस्तारां वृत्ताकारामलोचनाम् । घनभित्तिं कुटीं कृत्वा कुष्टाद्यैः संप्रलेपयेत् ॥५२ ॥
कुडीमध्ये भिषक् शय्यां स्वास्तीर्गामुपकल्पयेत् । प्रावाराजिन कौशेय कुथ कम्बलगोलैकैः ॥५३ ॥
हंसन्तिकाभिरङ्गारपूर्णाभिस्तां च सर्वशः । परिवार्यान्तरारोहेदभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥५४ ॥
( ९ ) कुटीस्वेद की विधि [ Cabin Sudation ] - एक ऐसा छोटा गोलाकार गृह १. ' शयानः स्विद्यते सुखम् ' यो । २. ' कौरवं कार्पासवत्रं ' चक्रः । ' रौरवाजिन ' ग. | ३. ‘ सुखं वृतः ' यो. । ४. ' कर्पू: अभ्यन्तरविस्तीर्णोऽल्पमुखो गर्तः ' । ५. ' कम्बलगोणिकैः ’ यो. । ६. ' हसन्तिका अङ्गारधानिका ' चक्रः । ७. ' परिवार्य तामारोहेतु च ।
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स्वेदाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् २६७ बनावे जिसकी ऊँचाई और चौड़ाई अधिक न हो, जिस में हवा आने - जाने के लिए एक भी खिड़की या झरोखा न हो, गृह की दीवाल मोटी हो, घर के भीतरी भाग में दीवाल के ऊपर उपनाहस्वेद की विवि में बनाई हुई कुष्ठ आदि उष्णवीर्य औषधियों का लेप किया हुआ हो, ऐसी कुटी के बीच में खाट विद्या कर उस पर सुन्दर बिछावन बिछा दे जिस पर प्रावार ( रजाई -नोमक ), अजिन ( काले मृग का चर्म ), कौशेय ( रेशमी वस्त्र ), कुथ ( ऊनी कम्बल ), कम्बल ( भेड़ का कम्बल ), गोलक ( सन के वस्त्र ) इनमें से कोई एक रखा हो । अब खाट के नीचे धूनरहित अंगारों से बोरसी को भर कर रख दे । पहले से वातन्न तेल मर्दन किया हुआ व्यक्ति खाट पर जब बैठता है तो उसका सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है ॥ ५२-५४ ॥ विमर्श -- खाट के नीचे अंगीठी रखकर यदि ओढ़ना ओढ़कर मनुष्य बैठ जाता है तो उसका स्वेदन सुखपूर्वक हो जाता है । सुश्रुत में इस स्वेद की विधि कुछ भिन्न ही बताई है । उनका कहना है कि एक चार दरवाजे का कमरा बनवावे । कमरे के भीतर खाट पर बैठ जाय और चारों दरवाज पर अंगीठी या किसी अन्य पात्र में निर्धूम अंगार रख दे जिससे हवा के जोर से आग की लपट अंदर चली जाय । इसते घर के भीतर बैठे हुए व्यक्ति का स्वेदन हो जाता है, यथा- ' पूर्ववत् कहीं वा चतुर्द्वारां कृत्वा तस्यामुपविष्टस्यान्तश्चतुर्द्वारेऽङ्गारानुपसंधाय तं स्वेदयेत् । ' ( सुश्रुत.
चि. अ. ३२ ) ।
य एवाश्मघनस्वेदविधिर्भूमौ स एव तु । प्रशस्तायां निवातायां समायामुपदिश्यते ॥ ५५ ॥
( १० ) भूस्वेद की विधि [ Ground Bed Sudation ] - अश्मघन - स्वेद की जो विधि कही गई है वही विधि प्रशस्त, निवात, समतल भूमि पर की जाय तो उसे ' भूस्वेद ' या ' भूमिस्वेद ' कहते हैं ॥ ५५ ॥
विमर्श - अष्टाङ्गसंग्रहकार ने ( सू. अ. २६ में ) भूस्वेद और अश्मघनस्वेद इन दोनों को एक ही में लिखा है । उनकी दृष्टि से दोनों एक हैं, केवल भूमि और पत्थर की भिन्नता है, अतः एक ही जगह पढ़ा है - ' पुरुषायाममात्रमधिकं वा घनं च शिलातलं भूप्रदेशं वा वातहरदारुदीप्ते -नाग्निना सर्वतस्नापयित्वाऽग्निमपोह्यो गोदकाम्लादिभिरभ्युक्ष्य यथोक्तप्रच्छदे संस्तरवत्स्वेदयेदिति घनाश्मस्वेदः ॥ ' ( अ. सं. ) । यहाँ पर घनाश्मस्वेद में ही भूस्वेद को गिन दिया है । भूस्वेद का परिगणन पृथक् से नहीं किया है । सुश्रुत में भी इन दोनों स्वेदों को एक ही में बताया है | कुम्भी वातहरकाथपूर्णां भूमो निखानयेत् । अर्धभागं त्रिभागं वा शयनं तत्र चोपरि ॥५६ ॥
स्थापयेदासनं वाऽपि नातिसान्द्रपरिच्छदम् । अथ कुम्भ्यां सुसंतप्तान् प्रक्षिपेदयसो गुडान् ॥
पावाणान् वोप्मणा तेन तत्स्थः स्विद्यति ना सुखम् ।
सुसंवृताङ्गः स्वभ्यक्तः स्नेहैरनिलनाशनैः ॥ ५८ ॥
( ११ ) कुम्भीस्वेद की विधि [ Pitcher Bed Suda ion ] - वातनाशक औषधियों के काथ से भरे हुये एक घड़े का आधा या तीसरा भाग पृथ्वी के अन्दर गाड़ दे । इसके ऊपर शयन करने योग्य खाड या बैठने के योग्य छोटी नोढ़ी रख दे, जिसपर अधिक मोटा विस्तरा न हो । इस पाट के ऊपर स्वेद करने योग्य पुरुष शयन कर जाय या छोटी मोढ़ी पर बैठ जाय । अब इसके बाद लोहे के गोले को या पत्थर के टुकड़े को अच्छी प्रकार गर्म कर घड़े में डाल दें । इससे क्वाथ • गर्म हो जाता है और उससे भाप निकलने लगती है । वह भाप रोगी व्यक्ति के शरीर में लगती है जिससे शरीर सुखपूर्वक स्वेदयुक्त हो जाता है । स्वेद लेने के पूर्व वातनाशक स्नेह से शरीर का अभ्यंग कर और एक कपड़ा ओढ़ कर रोगी को खाट पर सोना चाहिये या बैठना चाहिये । इसे ' कुम्भीस्वेद ' कहते हैं ॥ ५६-५८ ॥