चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 411–420
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 411–420
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३२२ चरकसंहिता प्रकुपित दोष का अंश शरीर में बिलकुल ही नहीं रह जाता है । अतः किसी भी अवस्था में पुनः वह दोष रोग उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होता है । इसलिए संशोधन औषधियों की अधिक महत्ता है । तात्पर्य यह है कि कारणान्तर से पुनः नये रूप में दोष कुपित होकर रोग उत्पन्न कर सकते हैं । पर प्रकुपित दोष संशोधन के द्वारा शरीर में रहते ही नहीं है, अतः वे रोग उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते हैं । * दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति । रोगाणां प्रसेवानां च गतानामागतिर्भुवा ॥२ ९ ॥ संशोधन की श्रेष्ठता में उपमा - दोष और वृक्ष इन दोनों को नष्ट किया जाय पर उसका मूल नष्ट न किया जाय तो, दोष और वृक्ष को नष्ट कर देने पर जो रोग और वृक्ष की पत्तियाँ चली गयी रहती हैं उनका आगमन ( उत्पत्ति ) अवश्य हो जाता है ॥ २१ ॥
विमर्श - जैसे किसी वृक्ष की डालियाँ सब काट दी जाँय पर उसका मूल न काटा जाय तो वह जल से सेचन करने पर अपने अनुकूल वसन्त आदि ऋतु को प्राप्त कर पुनः पत्ती और फूलों से युक्त हो जाता है । ठीक उसी प्रकार लङ्घन और पाचन से रोगों का नाश करने पर भी दोषों का सर्वाशिनः नाश नहीं होता है अपितु रोगों के मूल विकृत दोष बने ही रहते हैं, और काल- देश आदि तथा अपथ्यादि सेवन से कुपित होकर रोग उत्पन्न कर देते है । जिस प्रकार वृक्ष का मूलोच्छेद कर देने पर पत्ती और पुष्प की उत्पत्ति उस वृक्ष से नहीं होती है, उसी प्रकार संशोधन से रोगों के मूल कारण विकृत दोषों का सर्वांशतः नाश हो जाता है अतः उस विकृत दोष से पुनः रोग की उत्पत्ति नहीं होती है । कालान्तर में कारणान्तर से कुपित दोष से जो रोगोत्पत्ति होती है वह नूनन कारण से होती हैं न कि प्राचीन से । तात्पर्य यह है कि इसका अर्थ यह न समझा जाय कि संशोधन से दोषों को दूर करने पर जीवन पर्य्यन्त रोग
होगा ही नहीं ।
भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् । घृतुमांसरसतीरहृद्ययूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैर्निरूहैः सानुवासनैः । तथा स लभते शर्म युज्यते चायुषा चिरम् ॥ संशोधन से उत्पन्न लंघन में बृंहण पथ्य - निरन्तर औषध द्वारा संशोधन करने से शरीर और बल के क्षीण हो जाने पर आहार के द्वारा ही बृंहण करना उत्तम होता है । आहार में कौन कौन द्रव्य लेना चाहिए इस पर बताया है कि घृत, मांसरस, दूध और हृदय को बल देने वाला यूष मिला कर आहार देना चाहिए तथा बृंहण अभ्यङ्ग, उत्सादन ( उबटन ), स्नान, निरूहवस्ति तथा अनुवासन वस्ति का सेवन करना चाहिए । ऐसा करने से रोगी का कल्याण होता है और वह चिरायु होता है ॥ २२-२३ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि औषध सेवन से क्षीण होने पर रसायन औषधों से पहले बृंहण नहीं कराना चाहिए । जब उपर्युक्त उपायों से शरीर का उपचय और बल की वृद्धि हो जाय तो रसायन औषधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है, जैसा कि सिद्धिस्थान में बताया जायगा-' यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् । रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ ' ( अ. ७ ) । अतियोगानुवद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते । तैलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् || २४ || संशोधन के अतियोग की चिकित्सा - वमन विरेचन आदि के अतियोग का लक्षण यदि शरीर में उत्पन्न हो जाय तो ऐसे मनुष्यों को उपद्रव के अनुसार द्रव्यों से सिद्ध किये हुये घृत १. प्रसवानामङ्कुराणाम् । ' प्रसराणां ' न. । ३. ‘ मधुरकैर्जीवनीयैर्दशभिः ' गङ्गाधरः । २. ' भेजजक्षयिते ' ग. ।
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चिकित्साप्राभृतीयाध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् ३२३ का पान करना चाहिये । अथवा मधुर द्रव्यों से सिद्ध किये हुये तैल के द्वारा अनुवासन वस्ति देनी चाहिये ॥ २४ ॥
विमर्श - अतियोग में केवल घृत पीना या अनुवासन वस्ति लेना इन दो ही विधियों का प्रयोग बताया है, इसका तात्पर्य यह है कि अतियोग में शरीर अधिक दुर्बल हो जाता है । धातुयें अधिक क्षीण हो जाती हैं । ऐसी दशा में बृंहण अनुपान का सेवन उचित नहीं होता है । क्योंकि अग्नि की दुर्बलता से उसका पाचन नहीं हो पाता है । इसलिये बृंहण द्रव्यों में उत्तम और संस्कार से सभी दोषों को दूर करने वाले घृत का प्रयोग और तैल का मर्दन करना बताया है । इससे वल की वृद्धि और अग्नि की तीक्षणता दोनों ही एक साथ हो जाती हैं । अग्नि के तीन होने पर पथ्य आहारों का सेवन उचित होता है । यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् । मात्राकालबलापेक्षी स्मरन् पूर्वमनुक्रमम् || २५ || संशोधन का अयोग होने पर चिकित्सा - संशोधन पीने पर जिस व्यक्ति के शरीर में अयोग के लक्षण उपस्थित हो जाँय तो मात्रा, काल, वल की अपेक्षा रखने वाला वैद्य पहले सेवन किये गये संशोधन की मात्रा आदि का स्मरण कर स्नेहन करने के बाद पुनः संशोधन करावे || २५ || विमर्श - संशोधन की औषध सेवन करने पर कई व्यक्तियों में पच जाती है और कोई नहीं करती और कुछ लोगों में उपद्रव भी करती है । तब वैद्य को यह उचित होता है कि वह यह विचार ले कि पहले इसे कितनी मात्रा में किस प्रभाव वाली अर्थात् मृदु, मध्य और तीन संशोधन करने वाली इन औषधियों में किसका प्रयोग किया गया था जिसके सेवन से अयोग का लक्षण शरीर में प्रकट हुआ है । इन सभी वानों को ध्यान में रख कर उस व्यक्ति को इस प्रकार संशोधन औषध पिलानी चाहिये कि उससे फिर अयोग का भय होने की सम्भावना न रहे । स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये । जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ स्नेहनादि कर्म में उपद्रवों की चिकित्सा स्नेहन, स्वेदन, संशोधन और संसजन इन क्रियाओं का विधिपूर्वक प्रयोग न करने से उपद्रवहोते हैं । उन उपद्रवों की चिकित्सा सिद्धि - स्थान में कही जायगी ॥ २६ ॥
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः । हेतुसाम्यात् समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा || २७ || ( ३ ) स्वभावोपरम ( स्वभाव - उपरम ) वाद ( Theory of Natural Destruction ) स्वभावोपरमवाद - जिन कारणों से धातुओं की पुष्टि होती है यदि उन कारणों में विषमता १. ' स्मरन् पूर्वमनुक्रममित्यनेन यः पूर्वमयोगे हेतुभूतस्तं परिहरन्निति शिक्षयति ' चक्रः । २. ' जायन्त इत्यादि । देहधानवो देहस्य धारका ये भावास्ते, हेतुवैषम्यात्तेषामुत्पत्तौ स्थितौ च हेतूनां वैषम्याद्वृद्धिहान्यन्यतरस्माद्विषमा जायन्ते, तथा देहधातूनां ये हेतवस्तेषां साम्याद्वृद्धिहासव्य-तिरेकावस्थायामवस्थानात्ते देहधातवः समा जायन्ते, तयोर्देहधातुसाम्यवैषम्ययोः सदैवाविरतं स्वभावोपरमः स्वभावस्य स्वस्य धर्मस्य रूपस्य चोपरमो नाशो भवति । तत्र भावानां स्वस्वधर्माणां स्वस्वरूपाणां च सदैवातिप्रवृत्तौ हेतुरस्ति, सदैवाविरतनिरोधे विनाशे कारणं नास्तीत्यकरणं प्रतिक्षणं भङ्गः स्यादिति । तत्र केचिन्महर्षयो भावानां स्वभावोपरमेऽविरतनिरोधे हेतोरवर्तनं हेतुर्नास्तीति यदेव तोरभावस्तमेव भावानां सदा स्वभावोपरमे हेतुं मन्यन्ते ' गङ्गाधरः । ' तेषामिति विषमाणां धातूनां समानां च, सदेत्यविलम्बेन तेनोत्पन्न एव विनश्यतीत्यर्थः । प्रवृत्तिहेतुरुत्पत्तिहेतुर्भावानामस्ति, विनाशे हेतुभावानां कारणं नास्ति, यस्मात्सर्व एव भावाः प्रदीपाचिदुत्पत्तौ कारणापेक्षिणः, विनाशे तु द्वितीयक्षणाविद्यमानत्वलक्षणे सहजसिद्धे न हेत्वन्तरमपेक्षन्ते ' चक्रः ।
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३२४ चरकसंहिता आ जाती है तो शारीरिक धातुओं में भी विषमता हो जाती है, यदि कारणों में समता रहती है तो देह धातुओं में भी समता हो जाती है, इन धातुओं की शान्ति ( नाश ) स्वभाव से ही होती ' रहती है ॥ २७ ॥
विमर्श - चक्रपाणि ने ' स्वभावोपरम ' का अर्थ किया है कारण निरपेक्ष विनाश, अर्थात् जिसके नाश में कोई कारण न हो । यथा - ' स्वभावात् विनाशकारणनिरपेक्षात् उपरमो विनाशः स्वभावोपरमः । ' चक्रपाणि के मतानुसार साधन ( Equipments ) तथा भेषज सभी क्षणभङ्गी हैं । फिर भी शमन होता है, इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिये स्वभावोपरमवाद का वर्णन किया जा रहा है । क्षणिक विज्ञानवादी का मत है कि जगत् में यावत् पदार्थ हैं उन सब की प्रथम क्षण में उत्पत्ति, दूसरे क्षण में स्थिति और तीसरे क्षण में विनाश हो जाता है । यहाँ पूर्वपक्ष का उत्थान कर उत्तर दिया गया है । हेतुओं के विषम होने पर शारीरिक धातुयें विषम् होती हैं | तात्पच यह है कि सप्तधातु, वातादि दोष एवं मूत्रादि मल ये सभी खाये हुए आहार के रस के अनुसार पुष्ट होते हैं । इनकी वृद्धि और हास होता रहता है । इसका कारण यह है कि – ' वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैर्विपर्ययः ' के अनुसार जिस धातु के समान आहार- रस होता है वह आहार रस उस धातु को बढाने वाला होता है और जिस धातु के गुणों के विपरीत आहार रस होता है वह उस धातु का हास करने वाला होता है । इसी बात को समझाने के लिए यहाँ कहा गया है कि हेतु के विषम होने से धातुयें विषम होती हैं और हेतुओं के सम होने पर धातुयें सम होती हैं । किन्तु इन दोनों कारणों के अतिरिक्त प्रत्येक कार्य करने पर भी धातुओं का क्षय हुआ करता है जिसकी पूर्ति आहाररस से क्रम से रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र की पूर्ति होती रहती है । रस से मल रूप में कफ की उत्पत्ति और रक्त से मल के रूप में पित्त की उत्पत्ति होती रहती है । आहार सेवन से जब उसका मधुर पाक होता है तब कफ की, जब अम्ल रस की उत्पत्ति होती है अर्थात् अन्न विदग्ध होता हैं तो पित्त की और जब अन्न का पचने के बाद कटु रस बनता है तो उससे वात की उत्पत्ति होती है । इस तरह प्रत्येक कार्य करने से स्वभावतः जो धातुओं का नाश होता है उसकी पूर्ति होती रहनी है । यही क्षणिक - विज्ञानवादी बौद्धों का सिद्धान्त है कि वस्तुओं का नाश स्वभाव से ही होता है, उनके नाश में कोई कारण नहीं होता है । पूर्वोक्त तथ्य की चरक के अन्य वचनों से भी पुष्टि होती है, यथा - ( १ ) ' विकार: प्रकृति-श्चैव द्र्यं सर्वं समासतः । तद्धेतुवशगं हेतोरभावान्नानुवर्तते ॥ ' ( च. नि. अ. ८ ) तथा ( २ ) ' न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः । शीघ्रगत्वात्स्वभावात्त्वभावो न व्यतिवर्तते ॥ ' ( च. शा. अ. १ ) । वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि शरीर में सदा Wear and Tear Phenomena का कार्य चल रहा है । Wear Phenomenon ( निर्माण ) में तो आहारादि से पूर्ति होने के कारण वह सहेतुक है । परन्तु Tear Phenomenon ( उपरम ) सदा स्वाभाविक ( Natural ) गति से हो रहा है और वह अहेतुक है । स्वभावोपरमवाद आज के वैज्ञानिक विचार से मिलता जलता है । यहाँ एक ऐतिहासिक तथ्य उल्लेखनीय है । स्वभावोपरमवाद बौद्धों का मत है तथा इस वाद की चरक संहिता में छाया होने से चरक को लोग बुद्ध काल ( 600 B. C. ) का मानने लगे है । परन्तु चरकसंहिता में मांसों का प्रचुर मात्रा में वर्णन तथा प्रयोग उपर्युक्त तथ्य के विरोध में पढ़ता है ।
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चिकित्साप्राभृतीयाध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् ३२५ * प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्तत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥२८ ॥
स्वभावोपरमवाद का दार्शनिक आधार — • उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की प्रवृत्ति ( उत्पत्ति ) में, कारण होता है पर उसके निरोध ( नाश ) में कोई कारण नहीं होता है । कुछ लोग हेतु का न होना ही नाश में कारण मानते हैं ॥ २८ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह है रसासृक् धातुओं की उत्पत्ति में आहार रस आदि कारण होते हैं । पर धातुओं के नाश में कोई कारण नहीं होता है क्योंकि नाश स्वभाव से ही होता रहता है । इसी प्रकार आहार की विषमता से धातुओं में विषमता उत्पन्न हो जाती है, पर विषमता के नाश में कोई कारण नहीं हैं । इस सिद्धान्त के अनुसार जो यह बताया गया है कि ' मधुराम्ललवणा दानं शमयन्ति ' अर्थात् मधुर, अम्ल, लवण रस से वात की शान्ति होती है अर्थात् उसका नाश होता है । इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि मधुरादि रस अपने समान गुण चाली धातुओं को बढ़ाने वाले होते है, ये बढ़ी हुई धातु या दोष अपने से विपरीत गुण वाली धातुओं और दोषों को कम करते हैं, अतः ये रस वातशामक हैं ऐसा कहा जाता है । मधुर, अम्ल, लवण रस पूर्ण रूप से कफ की वृद्धि करते हैं, और अम्ल, लवण रस पूर्ण रूप से पित्त की वृद्धि करते हैं अतः इससे वायु में दुर्बलता स्वभाव से ही आ जाती है । जब दुर्बलता आ जायगी तो वायु की शान्ति स्वभावतः हो जाती है । इसी प्रकार अन्य धातु और दोषों में भी समझना चाहिए कि अपने विपरीत गुण वाले दोष या धातु के बढ़ जाने से अपनी हानि स्वभावतः हो जाती है । इसीलिए उत्पति में कारण माना है चक्रपाणि ने दीपक के जलने में तैल, बत्ती को कारण माना है । पर उसके बुझने में कोई कारण नहीं माना है क्योंकि वह स्वभावतः नष्ट होता है । इसी प्रकार तलवार उत्पन्न होने के बाद अपने स्वाभाविक लौहपन के विषय में किसी कारण की अपेक्षा नहीं रखता है क्योंकि उनमें लौहपन स्वभावतः बना रहता है । इस प्रकार स्वभावतः विनाश होने के पक्ष को स्वीकार करने पर यह स्वभावतः शंका हो जाती है कि शरीर में विषम हुई धातुओं का विनाश स्वभावतः हो जायगा, तो चिकित्सा करने का क्या प्रयोजन होगा? इस पर दूसरे पक्ष का यह कहना है कि विनाश में भी हेतु का न रहना ही कारण होता है । जैसे घड़े का नाश क्यों हुआ अर्थात् यहाँ घड़े का अभाव क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जायगा कि घड़े का यहाँ प्रयोजन नहीं है, तो प्रयोजन का अभाव नाश में अर्थात् वस्तु के न रहने में कारण होता है । इसी प्रकार विपम हुई धातुओं के सम होने का हेतु उपस्थित नहीं है अतः धातुओं में समता का अभाव है । पर अभाव स्वभावतः नहीं होता है । यह कारण माना है । इस कारण को मानने में एक बहुत बड़ा गौरव हो जाता है । जानू में जितनी वस्तुयें हैं उनका पात्र लेकर यह कहा जाय कि यह वस्तु यहाँ क्यों नहीं है तो उत्तर दिया जाय कि उस वस्तु का यहाँ प्रयोजन नहीं है, इस प्रकार जगत् की प्रत्येक वस्तु का नाम लेकर प्रश्न- वह क्यों नहीं है? उत्तर - उसका प्रयोजन नहीं है, ऐसा करते-करते जीवन समाप्त हो जायेगा पर प्रश्नोत्तर समाप्त नहीं होंगे । इसलिए स्वभावतः सभी वस्तुओं का शुव जगह नाश ( अभाव ) रहता है, नाश में कोई कारण नहीं है । धातुओं की विषमता का नाश स्वभाव से ही हो जायगा । चिकित्सा करना व्यर्थ है । इस प्रश्न को आगे की पतियों से अग्निवेश ने पुनः आस्थापित किया है । - एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत । स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥२ ९ ॥
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३२६ चरकसंहिता * भेषजैर्विषमान् धातून् कौनू समीकुरुते भिषक् । का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ स्वभाव पर मवाद के विषय में अग्निवेश की शङ्का - इस प्रकार उस विषय को कहने वाले आचार्य पुनर्वसु से अग्निवेश ने कहा कि स्वभाव से नाश होने पर चिकित्साप्राभृत वैद्य का कर्न क्या रह जायगा? हे भगवन्! वैद्य विषमता को प्राप्त किन धातुओं को औषधों से सम करेगा, चिकित्सा किसे कही जायगी और चिकित्म्प का प्रयोजन क्या रह जायगा? ॥ २ ९ -३० ॥ तच्छ्रयवचनं श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः । श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥३२ ॥
* ने नाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् । ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥
शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते । निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ स्वभावोपरमवाद के विषय में आत्रेय का उत्तर - इस प्रकार शिष्य के वचनों को सुनकर आचार्य पुनर्वसु ने कहा कि हे सौम्य, इस विषय में महर्पियों ने जिन युक्तियों को देखा है उन युक्तियों को सुनो । नित्य चलने वाले काल के नाश के कारण की तरह, नाश के कारण के अभाव होने से, उत्पन्न होने वाले भाव पदार्थों के नाश का कारण नहीं ज्ञात होता है । भाव पदार्थ जिस प्रकार उत्पन्न होता है उसी प्रकार शीघ्रगामी होने से नष्ट भी हो जाता है । इस तरह भाव पदार्थ के नाश में कोई कारण नहीं है और उसमें कोई संस्कार भी नहीं किया जा सकता है ॥ ३१-३३ ॥ विमर्श - यहाँ यह बताया गया है कि नाश के कारणों का अभाव होने से भावों के नाश का कारण नहीं ज्ञात होता । उसमें उदाहरण नित्यग काल का दिया गया है । इसमें अभाव होने से ज्ञान नहीं होता है । यह दो रूप में हो सकता है । जैसे अत्यन्ताभाव, खरगोश के सींग का अत्यन्ताभाव होता है अर्थात् उसकी उत्पत्ति भूत, भविष्य, वर्तमान किसी काल नहीं होती है । इस प्रकार भावों का नाश होता है अतः ज्ञान नहीं होना है या उसमें ज्ञान की योग्यता नहीं है? चक्रपाणि - मतानुसार जिस प्रकार पृथ्वी में कोई कील गाड़ दी जाय और दिखाई न पड़े तो अन्दर कील रहते हुए भी उसका ज्ञान नहीं होता है । इसी प्रकार वस्तुओं के नाश के कारण रहते हुए ज्ञान के योग्य वह कारण नहीं है इसलिये उसका ज्ञान नहीं होता है । १. ' कान् समीकुरुते ' इति विषमाणामस्थिरत्वेन साम्यं तत्र कर्तुं न पार्यत इत्याशयः । किमर्थ प्रयुज्यत इति यन्निवृत्त्यर्थं चिकित्सा प्रयुज्यते तद्धातुवैषम्यं स्वभावान्निवृत्तमिति चिकित्साप्रयोजनं नास्ति ' इति चक्रः । २. ' भावानां सदैव स्वभावस्योपरमो यो नाशस्तस्य कारणं न ज्ञायते नोपलभ्यते, कस्मात्? नाशकारणाभावात् । यथा नित्यगस्य कालस्य सदाऽत्ययोज्नवरतनतीतत्वं ज्ञायते तस्यात्ययस्य कारणं न ज्ञायते शीघ्रगत्वात्, यथा कालस्वभावो हि चक्रवन्द्रमणात्मकत्वाच्छीघ्रगस्तथा भावानां स्वभावोनि शीघ्रगः; नाशकारणाभावो न नाशकारणं, तहिं कथं भावानां स्वभावोपमः स्यादित्यत आह - शांत्रे-त्यादि । यो भगवो यदा यथाभूतो वर्तते यथात्वेनोत्तरावस्थानाग्भ्य पूर्वावस्थातो विपद्यते, तत्र पूर्वावस्थाया निरोध कारणं नास्ति न च तन्निरोधेऽन्यथाक्रिया पूर्वभावादन्यथा क्रियोत्तरास्ववस्था-स्वस्ति । यथा हेतुवैषम्याद्धातवो वातादयो विषमा भवन्ति विषमा एवोत्तरावस्थां तत्पूर्वावस्थिक-विषमरूपेणैवारभ्य पूर्वावस्थविषमत्वभावनाशमुपयान्ति नतु विषमस्वभावनाशं प्राप्योत्तरावस्थां साम्यस्वभावेनारभन्ते, तस्मात्प्रवृत्तौ खलु भावानां हेतुरस्ति न निरोधे ' गङ्गाधरः । ' एवं मन्यते-यद्यपि धातुवैषम्यं विनश्वरं, तथाऽपि विनश्यदपि तद्धातुवैषम्यं स्वकार्यं विषमभेव धातुमारभते, एवं सोऽप्यपरं विषममिति न धातुवैषम्यसन्ताननिवृत्तिः धातुसाम्यजनक हेतुं विना, यदा तु धातुसाम्य हे-तुरुपयुक्तो भवति, तदा तेन सहितं वैषम्य सन्ततिरहितमपि कारणं सममेव धातुसन्तानमारभते ' चक्रः ।
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चिकित्साप्राभूतीयाध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् ३२७ इन दो प्रश्न के उत्तर में आचार्य ने कहा है कि ' नाशकारणाभावाद ' अर्थात नाश के कारणों का सर्वथा अभाव होता है इसीलिए नाश के अभाव का कारण नहीं जाना जाता । उदाहरण के लिए नित्यग काल को बनाया है । नित्यग काल निमेष, मूहुर्त, घंटा, प्रहर, दिनरात, पक्ष, मास आदि होता है । दिन बीतता जाता है पर घंटा - मिनट कैसे नष्ट होता है यह ज्ञान नहीं होता, यह प्रत्यक्ष है । इसका कारण एकमात्र यह है कि काल बहुत शीघ्र गमन करता है और उसमें भूतकाल की उत्पत्ति क्षण - क्षण में होती जाती है पर परिलक्षित नहीं होती । इसी तरह धातुओं का या उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का विनाश सदैव इतनी जल्दी होता है कि उसका ज्ञान नहीं होता है । उदाहरण के रूप में यह भी कहा जा सकता है कि एक अध्यापक कक्षा में बैठ कर छात्रों को पढ़ा रहा है । पढ़ने वाले छात्र संख्या में सौ हैं । जो शब्द अध्यापक उच्चारण करता है वह शब्द प्रत्येक छात्र एक साथ ही सुनता है पर यह बुद्धिगम्य नहीं है क्योंकि मुख से निकला हुआ शब्द पहले समीप के छात्र के कान में जायगा और बाद में दूर में बैठने वाले छात्र के कान में पहुँचेगा । पर ऐसा नहीं होता । इसमें एक मात्र कारण यही है कि शब्द अत्यन्त शीघ्र गमन करता है । यह बात किसी को परिलक्षित नहीं होती है । इसी प्रकार भावों का नाश शीघ्र ही होता है और उसका छान नहीं होता है । यहाँ एक शंका यह होती है कि एक घड़े या कपड़े को डण्डे से फोड़ कर या आग से जला कर यह कहा जाता है कि इसका नाश हो गया । पर नाश का कारण डण्डा और आग है । तब नाश के कारण के प्रत्यक्ष रहते यह जो बताया गया है कि - ' न निरोधेऽस्ति कारणम् ' यह कहना उचित नहीं है । इस पर यह उत्तर दिया जा सकता है कि सभी भावों की सत्ता सत्कार्यवाद के अनुसार सर्वदा बनी रहती है । उसकी उत्पत्ति या विनाश नहीं होता है क्योंकि घट या वस्त्र के विनाश होने पर भी उसके उपादान कारण मिट्टी या सूत कपास में वह वर्तमान रहता है ॥ यदि ऐसा न मानें तो खरहे के सांग के समान या कछुए के दूध के समान उसको उत्पत्ति त्रिकाल में असम्भव हो जायगी । अतः यह कहा जा सकता है कि नष्ट हुआ घट या जला हुआ वस्त्र अपने उपादान कारण मिट्टी या सूत में लीन हो गया । इस प्रकार उसका आविर्भाव, तिरोभाव जो हमें प्रत्यक्ष होता है वही उत्पत्ति और विनाश है । इसी प्रकार शीघ्रगामी होने से काल जिस प्रकार भूत, अर्थात् बीता हुआ कहा जाता है । उसी प्रकार शरीरगत धातुयें भी क्षणिक होने से नष्ट हो गईं अर्थात् रूपान्तर में परिणत हो गई, यह कहा जाता है । धातुओं के परिणाम और निरोप में कोई कारण नहीं है और इसके स्वरूप में हम कोई परिवर्तन भी नहीं कर सकते । जो वस्तु जिस समय जिस रूप में रहती है वह वस्तु ठीक अपने समान ही वस्तु को दूसरे क्षण में उत्पन्न कर तीसरे क्षण में स्वयं नष्ट हो जाती है । अर्थात् प्रथम क्षेत्र में उत्पन्न होती है, दूसरे क्षण में अपने समान वस्तु को उत्पन्न करती है और तीसरे क्षण में स्वयं नष्ट हो जाती है । जब तीसरे क्षण में नष्ट होने लगती है तो उसमें किसी कारण की अपेक्षा नहीं होनी पर ये क्रियायें इतनी शीघ्र होती हैं कि इसका ज्ञान किसी को भी नहीं हो पाता । तात्पर्य यह है कि उसकी पहली अवस्था के नाश में कोई कारण नहीं है और उसके विनाश में कोई मिन किया भी नहीं होती है इससे यह सिद्ध हो गया कि दोपों के विषम होने पर रोग होते है । यह विषम अवस्था प्रथम क्षण में उत्पन्न होनी है, दूसरे क्षण में अपने समान ही विषम अवस्था को उत्पन्न कर तीसरे क्षण में स्वयं नष्ट हो जाती है । इस प्रकार पहले की विवम अवस्था -की - यों बनी रह जाती है अतः उसको कम करने के लिए चिकित्साशास्त्र की आवश्यकता होती है ।
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३२८ चरकसंहिता उदाहरण के लिए यह कह सकते हैं कि एक घण्टे पहले जो व्यक्ति गर्भ से उत्पन्न होता है वहीं व्यक्ति बाल, युवा, वृद्ध अवस्था में भी रहता है । पर यदि सोचा जाय तो बहुत ही भिन्नता होती है । इस सिद्धान्तानुसार उत्पन्न वालक दूसरे क्षण में अपने समान बालक को रख कर तृतीय क्षण में स्वयं नष्ट हो जाता है । पर यह उत्पत्ति और नाश इतना शीघ्र होता है कि इसका ज्ञान ठीक नहीं हो पाता । अब यह उत्पत्ति, स्थिति, विनाश, जब तक वह व्यक्ति जीता है तब तक बना रहता है और उसमें यह वही पुरुष है, यह वही पुरुष है इस परम्परा का ज्ञान बना रहता है । क्योंकि दूसरे क्षण में जो उत्पन्न होता है वह ठीक पहले की अवस्था के समान ही रहता है, इसी प्रकार दोषों की विषमता से यदि किसी को ज्वर हो गया तो वह प्रथम क्षण में उत्पन्न होगा, दूसरे क्षण में अपने समान ज्वर को उत्पन्न कर तीसरे क्षण में नष्ट हो जायगा तब देखने में वही पहले वाला ज्वर दिखाई देगा । इसीलिए इसमें यह व्यवहार होता है कि यह वही ज्वर हैं, यह वही ज्वर है । इस प्रकार ज्वर की सत्ता रहने पर उसकी चिकित्सा करने के लिए आयुर्वेदशास्त्र की आवश्यकता है । उसमें जो दोषों की विषमता रहती है उनको सम करना चिकित्सा है और यहां चिकित्सा-प्राभृत वैद्य का कर्म है । * याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः । सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजा स्मृतम् ॥ चिकित्सा की परिभाषा और वैद्यों का कर्तव्य - जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर में धातुयें सम होती हैं वह रोगों की चिकित्सा है और धातुओं को सम करना ही वैद्यों का कर्तव्य माना जाता है ॥ ३४ ॥
विमर्श - अर्थात् जिन क्रियाओं के करने से वृद्ध दोष क्षीण हो जायँ और क्षीण दोष वृद्ध हो जायँ उसे ही चिकित्सा कहते हैं । कारण यह है कि जब ये अपनी मात्रा से अधिक होते हैं तो रोग उत्पन्न करते हैं अतः उन्हें घटाना आवश्यक होता है और जब दोष अपनी मात्रा से कम होते हैं तब भी रोग उत्पन्न करते हैं अतः उन्हें बढ़ाना आवश्यक होता है और यही बात - ' चतुगी भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्वानुसाम्यार्थी चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ' ( चरक सू. अ. ९ ) में कही है । कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति । समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया || ३५ || चिकित्सा का उद्देश्य - शरीर में धातुओं की विषमता किस प्रकार उत्पन्न न हो और किन प्रकार शरीर में समधातुओ का अनुबन्ध ( सम्बन्ध ) बना रहे इसीलिए चिकित्सा की जाती है ॥ ३५ ॥
विमर्श -- आयुर्वेद के मुख्य दो प्रयोजन है - ' स्वस्थानां स्वास्थ्यरक्षणम्, आनुरन्य व्याधिपरि-मोक्षः । ' अर्थात् स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्तियों की रोग से रक्षा करना । यही बात यहाँ बताई है कि स्वस्थ शरीर में धातुओं की न हो सके और सम-अवस्था में दोष बने रहें । इसीलिए चिकित्सा की जाती है । * त्यागाद्विपमहेतूनां समानां चोपसेवनात् । विषमा नानुवन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥३६ ॥
धातुसाम्य प्राप्ति का साधन - धातुओं के विषम होने के जो कारण हैं उनको छोड़ देने से और धातुओं के सम होने के जो कारण हैं उनका सेवन करने से शरीर में विपन धातुओं को परम्परा नष्ट हो जाती है और धातु सम हो जाती है ॥ ३६ ॥
विमर्श - धातुओं के विषम होने का कारण क्या है यह बात पीछे ग्यारहवें अध्याय में तथा अन्यत्र भी बताई गई है- ' कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यानिमात्रकः । सम्यग्योगश्च विशेयो रोगारोग्यैककारणम् ॥ ' ( अ. सं. सू. अ. १ ) तथा असाम्य इन्द्रियार्थ के संयोग का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग और प्रज्ञापराध एवं परिणाम ये धातुओं के विषम होने के हेतु हैं । इन या
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चिकित्साप्राभृतीयाध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् ३२६ त्याग करना और सात्म्य इन्द्रियार्थों का सेवन करना इससे धातुयें सम बनी रहती है । यही कार्य करना चिकित्सा का फल है । समैस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून् संजनयेत् समान् । चिकित्साप्राभृतस्तस्मा देहसुखायुषाम् ॥ चिकित्साप्राभृत से लाभ - क्योंकि चिकित्साप्राभृत वैद्य समता उत्पन्न करने वाले कारणों से शरीर में धातुओं को सम बनाता है इसलिए देह - सुख और आयु को देने वाला कहा जाता है ॥ ३७ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च । दाता संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् || ३८ || और भी: वैद्य देह - सुख और आयु को देने वाला होता है इसलिए यह भी कहा जाता है कि वह इस लोक में धर्म, अर्थ, काम और मर जाने के बाद स्वर्ग या मोक्ष को देने वाला होता है || ३८ ॥ विमर्श - अर्थात् जब शरीर सुखी रहेगा और आयु बनी रहेगी तभी मनुष्य धर्म, अर्थ, काम संबंधी कार्यों को करेगा और ऐसा कार्य करेगा जिस कार्य को करने से इस लोक में प्रतिष्ठा होगी और मरने के बाद स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति होगी । इसलिए इन सभी को देने वाला वैद्य होता है ऐसा कहा गया है । इसी बात को — ' धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् । रोगास्तस्यापहर्त्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥ ' इसी स्थान के पहले अध्याय में भी स्पष्ट किया गया है । तत्र श्लोकाः-चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः । योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥३ ९ ॥ बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये । चिकित्सा सूत्रमात्रं च सिद्धिन्यापत्तिसंश्रयम् || ४० || याच युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् । चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत् सर्वमवदन्मुनिः ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्त ॥ १६ ॥
इति कल्पनाचतुष्कञ्चतुर्थः ॥ ४ ॥
अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस चिकित्साप्रानृतीय अध्याय में चिकित्साप्रानृत वैद्य के गुण, इससे इतर अर्थात् अपने को वैद्य समझने वाले मूर्ख वैद्य के दोप, संशोधन - सम्बन्धा सम्यग्योग, योग और अतियोग का लक्षण, बहुत दोष वाले पुरुष का लक्षण, संशोधन के गुण, संशोधन की सिद्धि और व्यापत्ति ( अयोग और अनियोग ) का चिकित्सा - सूत्र, चिकित्सा करने जो युक्ति है वह और वैद्य जिस कार्य को करता है, ये सुनी बातें महपि पुनर्वसु ने बताई 1 चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में कल्पनाचतुष्क-विषयक चिकित्साप्राभृतीय नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
इस प्रकार ' कल्पना ' नामक चौना चतुष्क समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
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३३० चरकसंहिता अथ सप्तदशोऽध्यायः अथातः कियन्तः शिरसीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अव ( चिकित्साप्रानृतीय अध्याय के वाद ) कियन्तः शिरसीय अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १२ ॥
विमर्श - इसके पूर्व अध्याय में चिकित्सा का लक्षण बताया गया है । चिकित्सा रोगों की होता है अतः रोगों के वर्णन में सर्वप्रथम शिर और हृदय के रोगों का वर्णन कर रहे है क्योंकि शिर और हृदय शरीर में अह्नों और मर्मों में उत्तम और मुख्य अङ्ग है । अतः उन्हीं का निर्देश पहले किया गया है । उपर्युक्त विचार चक्रपाणि - सम्नत है । कियन्तः शिरसि प्रोक्ता रोगा हृदि च देहिनाम् । कति चाप्यनिलादीनां रोगा मानविकल्पजाः ॥
क्ष्याः कति समाख्याताः पिडकाः कति चानघ । गतिः कतिविधा चोक्ता दोषाणां दोषसूदन ॥
अग्निवेश के प्रश्न – - ( 8 ) हे अनघ ( पापशून्य )! मनुष्यों के शिर में कितने रोग होते हैं, ( २ ) हृदय में कितने रोग होते हैं, ( ३ ) वात, पित्त, कफ इन तीनों के अलग - अलग, द्वन्द्वज और सन्निपातज के क्षय, स्थान, वृद्धि इन विकल्पों के भेद और उनसे होने वाले रोग कितने होते हैं, ( ४ ) इन वातादि दोष और धातुओं के क्षय कितने होते है, ( ५ ) पिडकायें कितनी होती हैं । हे दोषों को नष्ट करने वाले! ( ६ ) वातादि दोषों की गतियाँ कितने प्रकार की होती हैं । इन छ प्रश्नों को अग्निवेश ने आचार्य पुनर्वसु से पूछा ॥ ३-४ ॥ हुताशवेशस्य वचस्तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् । पृष्टवानसि यत् सौम्य तन्मे शृणु सविस्तरम् || ५ || आत्रेय का उत्तर — अनिवेश के वचनों को सुनकर गुरु पुनर्वसु ने कहा कि हे सौम्य! जो तुमने पूछा है, उसका उत्तर मै विस्तार से दे रहा हूँ । सुनो ॥ ५ ॥
दृष्टाः पञ्च शिरोरोगाः पञ्चैव हृदयामयाः । व्याधीनां व्यधिका षष्टिर्दोषमानविकल्पजा ॥ ६ ॥
दशाष्टौ च क्षयाः सप्त पिडका माधुमेहिकाः । दोषाणां त्रिविधा चोक्ता गतिविस्तरतः शृणु ॥ संक्षेप में सम्पूर्ण उत्तर - ( १ ) शिर में वात, पित्त, कफ, सन्निपात और कृभि से उत्पन्न होने वाले पाँच रोग होते हैं । ( २ ) वात, पित्त, कफ, त्रिपान और कृमि से यही पाँच रोग हृदय में होते है । ( ३ ) वात, पित्त, कफ, इनमें क्षय, स्थान, वृद्धि आदि मान विकल्प से बासठ रोग होते हैं । ( ४ ) क्षय अट्ठारह तरह के होते है । ( ५ ) मधुमेह की कार्ये मान होती है ।
( ६ ) दोषों की तीन प्रकार की गतियाँ होती है । अब आगे विस्तार से सुनो ॥ ६-७ ॥
संधारणादिवास्वप्नाद्रात्रौ जागरणान्मदात् । उच्चैर्भाव्यादवश्यायात् प्राग्वातादतिमैथुनात् ॥ गन्धादसात्स्यादाव्राताद्वजोधूमहिमातपात् । गुर्वम्लहरितादानादतिशीताम्बुसेवनात् ॥ ९ ॥
शिरोभिघातादुष्टामादोदनाद्वाप्पनिग्रहात् मेघागमान्मनस्तापादेशकालविपर्ययात् ॥ १० ॥
वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यखं च दुष्यति । ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविधलक्षणाः ॥
१. ' वाऽप्यनिलानीनान् ' यो । २. ' क्षयस्थानवृद्धयो दोषमानं, यस्य विकल्पो दोषान्तरसंबन्धावन्धकृतो भेदः ' चक्रः । ३. ' वाऽनघ ' यो । ४. ' दिष्टाः ' इति पा. । ५. ' गतिर्वक्ष्यामि विस्तरम् ' ग. । ७. ' तापा ' इति पा. । ६. ' दुत्स्वेदाद्र ' यो. ' दात्राताद्र ' ग. ।
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३३१ ( १ ) शिरोरोग ( Diseases of the Head ) शिरोरोग का निदान और सम्प्राप्ति से, रात्रि में जागने से, नशीली वस्तुओं के पूर्वी हवा में बैठने से अधिक मैथुन करने से, शीत, धूप के सेवन करने - मल - मूत्रों के वेगों को रोकने से, दिन में शयन करने सेवन से, उच्चस्वर से बोलने से, ओस लगने से, मन के विपरीत गंधों के सेवन से, धूलि, धुआँ, से, गुरु, अम्ल और हरे ममाला जैसे - आदी, मरिचा आदि के सेवन पीने से या उसमें स्नान करने से, शिर पर चोट लगने से, आमदोन अधिक रोने से, आँसू के वेग को रोकने से, आकाश में अधिक मेवा से, अत्यन्त ठण्डे जल के के अधिक दूषित होने से, के जाने से, मानसिक कष्ट से और देश एवं काल की विपरीतता से, वातादि दोष कुपित हो जाते हैं और वे शिर में जाकर रक्त को दूषित कर देते है; फलस्वरूप शिर में अनेक प्रकार के लक्षणों से युक्त रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ८-११ ॥ विमर्श -- शिरोरोग कहने से सामान्यतया सिर में होने वाले सम्पूर्ण रोगों का ग्रहण करना चाहिए । कुछ विद्वानों ने इसी प्रकार का संग्रह किया भी है । किन्तु संहिताग्रन्थों में इस प्रकार का वर्गीकरण नहीं मिलता । उन्होंने सिर की विधि, ग्रन्थि, अर्बुद आदि का वर्णन शल्यतन्त्रान्त-र्गत उन - उन रोगों में किया है । इसी तरह कुछ रोगों का कायचिकित्सा में और कुछ का क्षुद्र रोगों ( अरूंषिका, दारुणक, खालित्य, पालित्य आदि ) में समावेश कर दिया है । प्रकृत में शिरोरोग से सिर के शूल का ग्रहण करना चाहिए । यदि इससे सिर के सभी रोगों का ग्रहण किया जाय तो ' सूर्यावर्तान्तवातार्थावभेदकशङ्खकैः ' सुश्रुत का यह वचन व्यर्थ होता है; क्योंकि सूर्यावर्त आदि स्वयं भी सिर के रोग हैं, वे पुनः सिर के किन रोगों को उत्पन्न करते हैं । इसके अतिरिक्त प्राचीन ग्रन्थों में भी सिर में होने वाले विभिन्न रोगों का वर्णन इससे पृथक् ही किया गया है । इस प्रकार शिरोरोग से सिर के शूल का ही ग्रहण किया जाता है । मधुकोशकार और चक्रपाणि का भी यही मत है — ‘ शिरोरोगशब्देन शिरोगतशूलरूपा रुजाऽभिधीयते, तेन सूर्यावर्तानन्तवाना-र्धावभेदकशङ्खकै रित्यभिधानमुपपद्यते अन्यथा तेषामेव शिरोरोगत्वात्तैः शिरोरोगा जायन्त इत्य संगतः स्यात् ' ( मधुकोश ) ' तेन नारूंषिकादयोऽत्र प्रकरणे शिरोरोगशब्देनोच्यन्ते शिरोरोगशब्दस्य शूल एव रुजाकरे वृत्तत्वात् । ' ( चक्रपाणिः ) सुश्रुत ने ग्यारह शिरोरोगों का वर्णन किया है । भावप्रकाश तथा योगरत्नाकर में भी शिरोरोग की यही संख्या बताई गई है । कुछ विद्वान् अन्यतोवान और अनन्तवात को एक नानकर केवल दस हां भेद मानते है - ' सूर्यावर्तात्रभेदाभ्यां शङ्खकेन नथैव च । दशप्रकारस्याप्यस्य लक्षणं संप्रव-क्ष्यने ॥ ' वस्तुनः यह मत ठीक नहीं; क्योंकि उक्त दोनों रोग भिन्न हैं- अन्यतोवात वादिक एवं नेत्र रोग है, सुश्रुत ने उसका पाठ वातिक गण में किया है - ' याप्योऽध तन्मयः काचः साध्याः स्युः सान्यमारुताः ॥ ' और अनन्तदान त्रिदोषज व्यादि है - ' अनन्नवानं तमुदाहरन्ति दोपत्र योत्थं शिरसों विकारम् | ' प्रधानता के आधार पर वाद, पित्त और कफ तीनों से अलग - अलग शिरोरोग की उत्पत्ति वर्णित है । वास्तव में सभी शिरोरोग त्रिदोषज होते है - ' सर्व एव शिरोरोगाः सन्निपातसमुत्थिताः । औत्कण्ठ्या दोषलिङ्गैस्ने कीतितास्तद्विदा दश ॥ ' त्रिदोषज होते हुए भी दोष की उल्बणता के अनुसार वातिक आदि व्यवहार होता है । इन रोगों के अतिरिक्त भी अनेक रोग सिर में होते हैं किन्तु यह अधिक महत्त्व के होने से पृथक् वर्णित हैं । अतएव आचार्य ने सुस्पष्ट शब्दों में कहा है- ' अतः शिरोविकाराणां कश्चिद्भेदः प्रवक्ष्यते । ' ( च. सि. ९ ) अर्थात् अब कुछ शिरोरोगों का ही वर्णन किया जायगा । इसके बाद शंखकादि पाँच रोगों का वर्णन कर -